Saturday, 29 August 2020

मुसलमानों पर लगाए जाने वाले इल्ज़ामों का हिन्दू ग्रंथों से हवाला


मुसलमानों पर लगाये जाने वाले आम भद्दे इल्ज़ामों का हिन्दू ग्रंथों से ही जवाब।


हूरें या अप्सराएं


हूरों को तरह बल्कि उससे भी बढकर हिन्दू धर्म में सुंदर सुंदर अप्सराएं होती है। अप्सराएं देवलोक में रहती है जिनका प्रमुख कार्य मनोरंजन, नृत्य, मदिरा पिलाना आदि है। भक्तों को इनको पाने का लालच दिया जाता है।

● शास्त्रों के अनुसार देवराज इन्द्र के स्वर्ग में 11 अप्सराएं प्रमुख सेविका थीं। ये 11 अप्सराएं हैं- कृतस्थली, पुंजिकस्थला, मेनका, रम्भा, प्रम्लोचा, अनुम्लोचा, घृताची, वर्चा, उर्वशी, पूर्वचित्ति और तिलोत्तमा। इन सभी अप्सराओं की प्रधान अप्सरा रम्भा थीं।

● अलग-अलग मान्यताओं में अप्सराओं की संख्या 108 से लेकर 1008 तक बताई गई है। कुछ नाम और- अम्बिका, अलम्वुषा, अनावद्या, अनुचना, अरुणा, असिता, बुदबुदा, चन्द्रज्योत्सना, देवी, घृताची, गुनमुख्या, गुनुवरा, हर्षा, इन्द्रलक्ष्मी, काम्या, कर्णिका, केशिनी, क्षेमा, लता, लक्ष्मना, मनोरमा, मारिची, मिश्रास्थला, मृगाक्षी, नाभिदर्शना, पूर्वचिट्टी, पुष्पदेहा, रक्षिता, ऋतुशला, साहजन्या, समीची, सौरभेदी, शारद्वती, शुचिका, सोमी, सुवाहु, सुगंधा, सुप्रिया, सुरजा, सुरसा, सुराता, उमलोचा आदि।

● “स्वर्गे लोके बहु स्त्रैणममेषाम”
(पवित्र, शद्ध जीवन, ज्ञान वाले लोगों को स्वर्ग में बहुत सी स्त्रियों का सुखमय निवास प्राप्त होता है।)
[अथर्ववेद 4:34:2]

● वराप्सर: सस्त्राणि शुरमायोधमे हतम
त्वरमाणा भिधावंती मम भर्ता भवेदिति
(युद्धस्थल में मारे गये शूरवीरों की और सहस्त्रों, हज़ारों सुंदरी अप्सराएं बड़ी उतावली होके इस आशा इसे दौड़ी जाती है कि यह मेरा पति हो जाए।)
[महाभारत:शांतिपर्व/12:98:46]

● अप्सराएं तालाबों में पक्षियों के रूप में तैरती है।
[शतपथ ब्रह्मण्ड: 11:5:1:4]


●वे दिप्तिमती आहुतियाँ स्वर्गलोक में आओ आओ कहकर यजमान का सत्कार करते हुए ले जाती हैं.

[मुण्डकोपनिषद्: मुण्डक 1]

 

गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को जीतने पर संसार की और मरने पर स्वर्ग की सफलता भोगने को कहते हैं।

 

बांदी, लौंडिया या युध्दबंदी, दासी, सेविका


वैदिक काल में दासी, सेविका, स्त्रियां (ग़ुलाम) होती थी जो पुरुषों की सेवा करती थी। युध्द में जीती हुई स्त्रियों को भी दासी बनाया जाता था। इन्हें गणिका, वेश्या, दासी आदि बहुत से नामों से जाना जाता था क्योंकि ये घरेलू, बाहरी कामों से लेके संभोग आदि के लिए आवश्यकता अनुसार व अपने द्वारा दी जाने वाली सेवा के अनुसार भिन्न भिन्न कार्य करती थी।

● जबाला अपने पुत्र सत्यकाम से कहती है कि वह नहीं जानती की असक बाप कौन है क्योंकि वो यौवन काल में बहुत जगह पर जाके सेवा करती थी।
(छान्दोग्य उपनिषद 4:4:2)

● यज्ञ करवाने वाले राजा चायमान के पुत्र अभ्यावर्ती ने हम भारद्वाज ऋषिर्यो को बीस गायें एंव रथ के साथ अनेकों सेविकाएं प्रदान की।
[ऋग्वेद: 6 : 27: 8]

● उत्तम दानी, स्वामी, सज्जनों के पालक, पुरुकुत्स के पुत्र त्रसदस्यु ने मुझे 50 स्त्रियां प्रदान की है।
[ऋग्वेद: 8 : 19: 36]

● भोजायास्ते कन्या शुम्भमाना
दान करने वालो के लिए वस्त्रों से सुज्जित कन्या होती है।
(ऋग्वेद: 10: 107:9)

● पारीबह ददौ कृष्ण: पाण्डवाना महात्मनाम।।
स्त्रियों रत्नानी वासांसि पृथक पृथगनेकश।। 26।।
(श्रीकृष्ण ने पांडव पुत्रों में से प्रत्येकको दहेज या निमंत्रण में बहुत सारी दासी - नारीयां, रत्न और वस्त्र दिए।)
[ महाभारत 4:72 (P.127)]

● रथाश्वं हस्तिनं छत्रं धनं धान्यं पशून्त्त्रियः ॥
सर्वद्रव्याणि कुप्यं च यो यज्जयति तस्य तत् ॥
(युद्ध में से रथ, घोड़ा, हाथी, धन,पशु, स्त्री, तांबा आदि धातु तथा गुड़, नमक आदि सब वस्तुओं में से जो जिसे जीतकर लावे वह उसी की होती है)
[मनुस्मृति: 7:96]

● जो सैनिक दासी को युद्ध मे जीतकर लाता है, उस पर उसी का अधिकार है!
(मनुस्मृति 7:96)

● वन्दिग्राहेण या भुक्ता हत्वा वद्धा वलाद् भयात् कृत्वा सान्तपनं कृच्छू शुध्येत् पाराशरोऽव्रवीत् ।। 

 अर्थ बन्दी बनाकर लाई जाने के बाद, मारपीट कर अथवा बलपूर्क या भयभीत करके बांध कर लाई गई औरत यादि किसी के द्वारा भोग ली गई हो तो वह कृच्छ्र सान्तपन व्रत करने से शुद्ध हो जाती है ऐसा पराशर ने कहा है.

(पाराशरस्मृती अध्याय 10 श्लोक 25)

● कामसूत्र और मुद्राराक्षक में गणिकाओं और वेश्याओं का वर्णन मिलता है।


देवदासियां और देवदासी प्रथा।

मंदिर को दान कर दी गयी कुंवारी कन्याओं या बालिकाओं को देवदासी कहा जाता था। बचपन में ही इन्हें दान कर दिया जाता था। ये भ्रष्ट ब्राह्मणो और पंडितों द्वारा सहवास के लिए प्रयोग होती थी। बाल्यकाल से वृद्धवस्था तक मंदिर की सम्पती होती थी। कहते है कि ये अधिकतर शुद्र वर्ण की कन्याएं होती थी। अग्रजों ने आके इस प्रथा को समाप्त किया।

● कालिदास के अनुसार उज्जैन के महाकाल मंदिर में अनेकों देवदासियां थी।


मूलाकर्म


● केरल में निचली जाति की स्त्रियों से अपनी छाती ढकने के लिए सदियों से कर वसूला जाता था। वरना उन्हें छाती को खुला रखके रहना पड़ता था। ये प्रथा पिछली सदी तक भी प्रचलन में थी।


दास प्रथा और मानव क्रय विक्रय।

अजितगर्त के 3 पुत्र थे। रोहित ने उससे कहा मैं तुम्हे 100 गाय दे रहा हूँ और इनमें से किसी एक को खरीद रहा हूं जिसके द्वारा याग करके स्वयं को मुक्त करवाऊंगा। उसने मंझले पुत्र शुनःशेप को बेचना स्वीकार कर लिया। फिर रोहित ने वरूण से कहा की मैं इस शुनःशेप रूप पशु से तुम्हारा याग करवाऊंगा।

[ऐतरेय ब्राह्मण :33 : 3: 7-8]


● हरिश्चन्द्र राजा हुआ है जो अजितगर्ग के पुत्र को बिकवा कर स्वयं मोल लेता है।

(वशिष्ठ स्मृति, अध्याय 17, पृष्ठ संख्या 583, पुस्तक अष्टादशस्मृति, टिकाकर पंडित  सुंदरलाल जी त्रिपाठी, खेमराज श्रीसकृष्णदास प्रकाशन)



कज़िन मैरिज या सगे संबंधी से विवाह


पूरे विश्व मे काज़ीज मैरिज आम रिवाज था और है। राजा महाराजा परिवारों में भी यह एक आम बात थी। उत्तरवैदिक काल में बनी गौत्र संस्था के कारण इसका चलन उत्तर भारत मे कम होता गया। 1955 हिन्दू मैरिज एक्ट में प्रावधान किया गया कि लड़के के लिए 7 गोत्र और लड़की के लिए 5 गोत्र दूर रिश्ता होना चाहिए सिवाए उन समाज के जंहा अन्य परम्पराएं चली आ रही है।

● हिन्दू मैरिज एक्ट (1955) से पहले कज़िन से शादियां बॉम्बे जैसे शहरों में 8% के आस पा थी। और आज भी भारत के कई राज्यों जैसे तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्रा, महाराष्ट्र में 30% के आस पास है।

● दक्षिण भारत के कई राज्य जैसे कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश और तमिलनाडु में लोग बड़े पैमाने पर अपने कज़िन के साथ शादी करते है। आंध्रा में फर्स्ट कज़िन विवाह को स्वीकृति है, केरल और तमिलनाडु में भी। अपने सगे चाचा मामा आदि तक से शादी कर लेते हैं। बल्कि कई दक्षिण भारतीय वंशों में तो पहले मामा को भांजी से शादी की प्राथमिकता दी जाती है और अगर वो मना कर दे तब बाहर रिश्ता किया जाता है। कर्नाटक में मामा भांजी विवाह को प्राथमिकता दी जाती है। तमिलनाडु में ऐसी शादियों को Maman Kalyanam कहा जाता है। द्रविड़ परिवारों में कज़िन मैरिज का आम प्रचलन है। नार्थ ईस्ट राज्यो में भी इसका प्रचलन है।

● पारसी और ईसाई समाज में भी ऐसी शादियां होती है।  कई दलित जातियों और जनजातियाँ, आदिवासियों में भी कज़िन विवाह किए जाते है।

● श्रीकृष्ण ने अपनी बहन सुभद्रा का विवाह अपनी सगी बुआ के पुत्र अर्जुन से करवाया था ! अर्जुन सुभद्रा के सगे फुफेरे भाई थे, और सुभद्रा अर्जुन की सगी ममेरी बहन थी।

(वसुदेव एक यदुवंशी जिनके पिता का नाम शूर और माता का नाम मारिषा था। ये मथुरा के राजा उग्रसेन के मन्त्री थे। पांडवों की माता कुंती वसुदेव की सगी बहन थी। पृथा (कुंती) महाराज शूरसेन की बेटी और वसुदेव की बहन थीं। शूरसेन के ममेरे भाई कुंतिभोज ने पृथा को माँगकर अपने यहाँ रखा। इससे उनका नाम 'कुंती' पड़ गया, कुंती भगवान श्रीकृष्ण की बुआ थीं। कुन्ती को इन्द्र के अंश से अर्जुन का जन्म हुआ। सुभद्रा कृष्ण की बहिन जो वसुदेव की कन्या और अर्जुन की पत्नी थीं। इनके बड़े भाई बलराम इनका ब्याह दुर्योधन से करना चाहते थे पर कृष्ण के प्रोत्साहन से अर्जुन इन्हें द्वारका से भगा लाए। सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु , महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा हैं। अर्जुन और सुभद्रा के विवाह की यही बात भागवत पुराण से भी सिद्ध होती है)
[ Shrimad Bhagvat. Skandh-9 . Paath-24. Shlok- 28-29 . Page-534/535 ]

● विराट नरेश की एक बेटी थी जिसका नाम उत्तरा था, और एक बेटा था जिसका नाम उत्तर था. अर्जुन के बेटे अभिमन्यु का विवाह उत्तरा से हुआ जिससे उनके यहाँ एक बेटा पैदा हुआ जिसका नाम परिक्षित रखा गया . परिक्षित ने अपने मामा उत्तर की बेटी इरावती से विवाह किया ।
[ Shrimad Bhagvat. Skandh-1 . Paath-16 . Shlok- 2 . Page- 63 ]

● श्रीकृषण ने अपनी क्रोस कज़िन भद्रा से विवाह किया जिन्हें उनकी 8 मुख्य रानियों (अष्टभार्य) में से माना जाता है।

● मित्रविन्दा कृष्ण की छठी पत्नी थी जो कुंती की बहन की बेटी थी और उनके पिता वासुदेव के भाई की बेटी थी।

● बुद्ध की पत्नी यशोधरा उनके सगे मामा और सगी बुआ की बेटी थीं।

● महावीर स्वामी की सुपुत्री प्रियदर्शनी का अपने कज़िन जमालि से विवाह हुआ था। जमाली महावीर की बहन सुदर्शना के पुत्र थे। [श्रीकल्पसूत्र: पदम प्रकाशन: पेज 89 ]

● शिवाजी महाराज के सुपुत्र राजाराम ने कज़िन (मैटरनल) ताराबाई से शादी की थी और शिवाजी की बेटी सुकु बाई ने भी अपने कज़िन (मैटरनल) से विवाह किया था।

● राजा अजातशत्रु ने भी अपनी कज़िन (मैटरनल) से शादी की थी।


चार शादियां या बहुपत्नीवाद


बहुतपत्नी हर युग में एक आम बात रही है। आदिवसी समाजो में भी। और हमेशा से ही दुनिया भर में राजा महाराजाओं की तो अनगिनत आधिकारिक बीवियां होती थी। हिन्दू धर्म के पात्र और ग्रन्थों में इसकी कोई कमी नहीं है।

● शिवाजी महाराज की तीसरी बीवी का नाम पुतलाबाई था।

● अग्निदेव की भी दो पत्नियां थी, स्वाहा और स्वधा!

● ऋषि कश्यप की तेरह पत्नियाँ थी, जिनसे उन्होने करोड़ संतान पैदा की!

● मनु के पुत्र उत्तानुपात की दो पत्नियां थी, सुरूचि और सुनीति!

● कृष्ण के पिता वासुदेव की दो पत्नियां थी, रोहिणी और देवकी!

● इशवाकु वंश से उत्पन्न वेधस के पुत्र हरिशचंद्र नामक राजा पुत्रविहीन थे। उनकी सौ पत्नियां थी।

[ऐतरेय ब्राह्मण : अध्य्याय 33 : खंड 1: श्लोक 1]

● महाभरत में राजा शशबिन्दु की 1 लाख पत्नियां थी।

● कृष्ण भगवान की 16000 पत्नियां-गोपियां थी। इनकी  8 मुख्य रानियों को अष्टभार्य कहा जाता है।

● राम के पिता दशरथ की पत्नियों की संख्या अलग अलग आती है। कंही 60000 है। कंही 353 है। कंही 3 है कौशिल्या, कैकेयी और सुमित्रा! वाल्मीकि रामायण (2:34:13) बताती है कि दशरथ की 350 पत्नियां थी।

● रावण की कई पत्नियां और पटरानियां थी।

● वाल्मीकि रामायण (2:8:12) में राम की सौतेली माता को उसकी सखी कहती है कि राम को राजा न बनने देना वर्ना उसकी 'रानियां' तुम पर अपने आदेश चलाएंगी। अर्थात या तो श्रीराम की भी कई पत्नियां थी या ऐसी आशा थी कि अन्य राजाओं की तरह श्री राम भी बाद में कई विवाह करँगे जो उस समय एक आम चलन था।

● इन्द्र के बारें मे कुछ कहना ही सूर्य को दीपक दिखाने के बराबर होगा। ऋषि- मुनियों के पास अप्सराओं को इन्द्र भेजता था, वो तो वैराग्य मे खुश थे! तब भी यहाँ यह सवाल उठेगा कि ऋषियों की तपस्या भंग करने के लिये इन्द्र अप्सराऐं ही क्यो भेजता था? क्या इन्द्र जानता था कि ऋषियों के मन मे अप्सराओं की इच्छा है! आखिर वह अप्सराओं के बदले हीरे-मोती के ढ़ेरों आभूषण और स्वादिष्ठ पकवान भी तो भेज सकता था, जिसकी लालच मे ऋषि-मुनि अपनी साधना तोड़ देते! पर वह हर बार अप्सरा ही भेजता था, इसका कोई तो कारण होगा! पर ओशों कहते थे कि न तो इन्द्र किसी को भेजता था और ना ही कोई उर्वशी आती थी! इन्द्र तो खुद ऋषि-मुनियों की पत्नियों के पीछे पड़ा रहता था!

● मनुस्मृति-9/83
"अधिविन्ना तु या नारी निर्गच्छेद्रुषिता गृहात् ।
सा सद्यः संनिरोध्दव्या त्याज्या वा कुलसन्निधौ।।"
अर्थात- दूसरा व्याह करने पर यदि पहली स्त्री रुष्ठ होकर घर से भागे तो उसे पकड़कर घर मे बन्द कर देना चाहिये, या उसे उसके मायके पहुँचा देना चाहिये।

● यागवल्क्य स्मृति :1:73

सुरापान करने वाली, दीर्घ रोगी, धूर्त, बाँझ, अपव्ययी,  कठोर, केवल पुत्री को जन्म देने वाली, पति का अहित करने वाली पत्नी के रहते हुए भी दूसरा विवाह कर लेना चाहिए।

● प्रजापति दक्ष ने वीरिणी के गर्भ से 60 कन्याएं उत्पन्न की। उनमें से 10 धर्म को, 13 कश्यप को, 27 चंद्रमा को, 4 अरिष्टनेमि को, 2 भृगनन्दन को, 2 कृशाश्वकों को और 2 अङ्गिरा को प्रदान की।

धर्म की 10 पत्नियां बतलायी गयी है।  

कश्यप की 13 पत्नियां थी।

कश्यप की पुलोमा और कालका मारीचि पत्नियां थी।

[मत्स्यपुराण, अध्याय 5-6]

● एक पुरुष की अनेकों पत्नियां होती है। एक पत्नी के लिए बहुतेरे पति सहमत नहीं होते है।

[ऐतरेयब्राह्मण: 12: 12: 1]


बहुपतिवाद एक आम बात।


● पाँचो पांडव पाँच अलग-अलग पिता की संतान थे. युधिष्ठिर यमराज के पुत्र थे! भीम पवनदेव के पुत्र थे! अर्जुन इन्द्र के पुत्र थे, तथा नकुल और सहदेव दोनो अश्विनी कुमारों के पुत्र थे! पर क्या आपको ये पता है कि अपने पति पाण्डु के जीते जी कुंती ने दूसरे पुरुषो से नियोग क्यो करना पड़ा?

● द्रौपदी के 5 पति थे।

● पहले ये प्रथा अधिक थी। ट्राइबल में आज भी है। हिमालय की बेल्ट और हिमाचल के आसपास में ऐसे हिन्दू गांव है जहां ये प्रचलन में है। तिब्बत, भूटान, नेपाल में भी ये प्रथा पाई जाती है। इन केसेस में मर्द आपस के सगे भाई होते थे। इसकी एक बड़ी वजह ये भी थी ऐसे इलाकों में खेती लायक ज़मीने कम होती थी और सबकी अलग शादी के कारण ये ज़मीन बंटवारा होके धीरे धीरे बिक जाएगी, इसलिए एक ही परिवार के सभी भाइयों के साथ एक स्त्री की शादी करते है।


Wife Swapping एक आम बात।


● सच्चे मित्र के 6 गुण है.. छटा गुण है कि  मित्र के मांगने पर उसके हित के लिए  सब कुछ दे देना चाहिए। अपनी पत्नी को भी निछावर कर देना चाहिये।
(महाभारत उद्योगपर्व  45:12)


विवाहित जीवन के बाहर बदचलन एक आम बात।


● स्त्री बाहर व्यभिचार कर ले तो मनु ने उसकी शुद्धि का मंत्र भी बताया है! मनु का यह भी दावा है कि यह वेदमंत्र है। 

(मनुस्मृति:9:20)
"यन्मे माता प्रलुलुभे विचरन्त्यपतिव्रता।
तन्मे रेतः पिता वृक्तामित्यस्यैतन्निदर्शनम् ।।"
'मेरी माता ने अपवित्रता पूर्वक घूमते हुये पराये घर मे जाकर पर पुरुष की इच्छा की, अतः उसके दूषित रज को मेरे पिता शुद्ध करें'।


Bestality या पशु व्याभिचार एक आम बात

 

● मनुस्मृति -11/173 मे मनु ने लिखा है-
"मानुषीषु पुरुष उदक्यायामयोनिषु।
रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्र्छं सान्तपनं चरेत् ।।"
अर्थात- जो मनुष्य अमानुषीय (मनुष्य से भिन्न योनि मे, जैसे जानवर आदि) रजस्वला स्त्री से, अथवा योनि से भिन्न स्थान मे (जैसे गुदामैथुन) और जल मे वीर्यपात करता है, वह कृच्र्छसान्तपन करने से शुद्ध होता है।


बाल विवाह एंव ज़बरदस्ती विवाह एक आम बात।



यूनाइटेड नेशन की रिपोर्ट 2005 के अनुसार भारत मे 30% विवाह बाल विवाह होते हैं । विकिपीडिया के अनुसार बाल विवाह के मामले में भारत विश्व के दूसरे नम्बर का देश है। आज़ादी पूर्व ही बालविवाह को रोकने के लिए कई लोग आगे आये जिन्होंने ब्रिटिश सरकार द्वारा एक बिल पास करवाया जिसे Special Marriage Act कहा जाता हैं इसके अंतर्गत शादी के लिए लडको की उम्र 18 वर्ष एवं लडकियों की उम्र 14 वर्ष निर्धारित की गयी एवं इसे प्रतिबंधित कर दिया गया। फिर भी सुधार न आने पर बाद में  Child Marriage Restraint नामक बिल पास किया गया इसमें लडको की उम्र बढ़ाकर 21 वर्ष और लडकियों की उम्र बढ़ाकर 18 वर्ष  कर दी गयी। इनसे भी काम न बना तो कानून को और सख़्त करने के लिए 2006 में बाल विवाह निषेध अधिनियम बनाया गया।


● वाल्मीकि रामायण से यह सिद्ध है कि सीता जी की आयु मात्र 6 वर्ष थी जब उनका 13 वर्ष के राम जी के साथ विवाह हुआ। विवाह के बाद सीता 12 वर्ष तक अयोध्या में ही रहीं। वनवास के समय उनकी आयु 18 वर्ष थी। अर्थात विवाह के समय उनकी आयु 6 वर्ष थी और श्रीराम की 13 वर्ष क्योंकि दोनों की उम्र में 7 वर्ष का अंतर था।

सीता जी कहती हैं कि विवाह के बाद 12 वर्ष तक मैंने महल में रहकर अपने पति के साथ सभी भोग भोगे। 13वें वर्ष के प्रारंभ में वनवास के लिए जाते समय मेरे पति की आयु 25 वर्ष थी और मेरे जन्म काल से लेकर वन जाने तक 18 वर्ष हो गई थी।

[श्रीमद्बाल्मीकीय रामायण, अरण्यकाण्ड, सप्तचत्वारिंश सर्ग, श्लोक 1-10, पृष्ठ 598 ]


● इसके अलावा भक्तिकाल के एक दोहे में श्री राम और सीता जी की उम्र में 9 वर्ष का अंतर बताया गया है। यानी इसके अनुसार विवाह के समय सीता जी आयु 6 वर्ष और राम जी आयु 15 वर्ष होनी चाहिए।

वर्ष अठ्ठारह की सिया, सत्ताईस के राम।

कीन्हो मन अभिलाष तब, करनो है सुर काम।।

[रामकथा दोहा]


●   15 वर्षीय राम ने मिथिला के राजा की 6 वर्षीय पुत्री सीता से विवाह किया।

(स्कन्दपुराण : भाग 2/ब्रह्मा कांड : खण्ड 2/धर्मआरण्य कांड: अध्याय 30/राम जीवनी: श्लोक 8-9)


● 
"उत्कृष्ठायाभिरूपाय वराय सदृशाय च।
अप्राप्तामपि तां तस्मै कन्यां दद्याद्यथाविधिः।।
अर्थात- उत्तम कुल और सुन्दर वर मिल जाये तो कन्या के विवाह योग्य न होने पर भी ऐसे वर से उसका विवाह विधिवत कर देना चाहिये।

(मनुस्मृति ने 9:88)


●  30 वर्ष का पुरूष 12 वर्ष की कन्या से और 24 वर्ष का युवा 8 वर्ष की बालिका से विवाह करे।

 (मनुस्मृति 9 : 94)

 

● स्वामी दयानंद सत्यार्थ प्रकाश के 4थें समुल्लास (पृष्ट 72) में लिखते हैं कि 24 वर्ष की स्त्री और 48 वर्ष के पुरुष का विवाह उत्तम है।

 

● 30 वर्ष का पुरुष 10 वर्ष की कन्‍या को, जो रजस्‍वला न हुई हो, पत्‍नी रूप में प्राप्‍त करे अथवा 21 वर्ष का पुरुष 7 वर्ष की कुमारी के साथ विवाह करे। यदि पिता, भ्राता आदि अभिभावक ऋतुमती होने के पहले कन्‍या का विवाह न कर दें तो ऋतुमती होने के पश्‍चात तीन वर्ष तक कन्‍या अपने विवाह की बाट देखे। चौथा वर्ष लगने पर ही वह स्‍वयं ही किसी को अपना पति बना ले।

[महाभारत:अनुशासन पर्व: 44 अध्याय श्लोक 13-18]


● चक्र ऋषि के पुत्र उषस्ति अपनी अल्पव्यस्क (जिसके स्तन आदि, स्त्रिजनोचित चिन्ह प्रकट नहीं हुए हैं) पत्नी के साथ बड़ी दीन अवस्था के रहते थे।

[छान्दोग्यउपनिषद : प्रपाठक 1: खंड 10: श्लोक 1, शंकरभाष्य व प. श्रीराम शर्मा आचार्य भाष्य ]


● यदि विवाह करना हो तो अपने से तृतीयांश (तिहाई आयु वाली) अवस्था वाली कन्या से विवाह करे तथा अधिक या अल्प केश वाली अथवा अति साँवली या पाण्डुवर्णा ( भूरे रंग की ) स्त्री से सम्बन्ध न करे। जिसके जन्म से ही अधिक या न्यून अंग हों, जो अपवित्र, रोमयुक्त, अकुलीना अथवा रोगिणी हो उस स्त्री से पाणिग्रहण न करे।

(विष्णुपुराण, खंड 3अध्याय 10श्लोक 16-17)


● ऋतुदर्शनात प्रागेव दिया कन्या...  प्रतिपत्तेऋत्येके।।

कन्या का विवाह ऋतुदर्शन (रजोदर्शन या माहवारी) से पहले कर देना चाहिए। ऐसा न करने वाला पिता दोषी है। कन्या के वस्त्र पहनने (लज्जा का अनुभव करने) से पहले ही उसका कन्यादान कर देना चाहिए।

 [गौतमधर्मसूत्र: 2: 9: 22-24]

 

●  दद्याद्गुणवते कन्यां नग्निकां ब्रह्मचारिणे । 

अपि वा गुणहीनाय नोपरुन्ध्याद्रजस्वलाम् ॥

कन्या जब नंगी ही घूमती हो ( अर्थात् लज्जा भाव से शून्य अत्यन्त अल्प अवस्था में हो ) तभी गुणवान् ब्रह्मचारी को विवाह में देनी चाहिए अथवा गुणहीन व्यक्ति को भी विवाह में दे देना उचित है किन्तु उसके रजस्वला होने पर अपने घर में रखना उचित नहीं।

(बोधायन धर्मसूत्र : चतुर्थप्रश्ने : अध्याय 1: श्लोक 12)


● अष्टवर्षा भवेद्गौरी... भवेत्कन्या अत ऊर्ध्वं रजस्वला।
प्राप्ते तु द्वादशे... मासि रजस्तस्याः पिबन्ति...।
माता चैव पिता चैव ज्येष्ठो भ्राता... नरकं यान्ति...।
यस्तां समुद्वहेत्कन्यां ब्राह्मणो मदमोहितः...।

आठ वर्ष की लड़की गौरी, नौ वर्ष की रोहिणी और दस वर्ष की कन्या कहलाती है। इसके बाद रजस्वला कहलाती है।
बारह बरस होने पर जो कन्या दान नहीं कर देते तो उनके पितर स्वयं उस कन्या का रज (मासिकधर्म का रक्त) प्रति मास पीते रहते हैं।
माता , पिता और जेठा भाई ये तीनों रजस्वला कन्या को देखने से नरक में जाते हैं।
जो ब्राह्मण मद से मोहित होकर उस रजस्वला कन्या को ब्याह लेता है वह असम्भाषणीय और पंक्तिबाह्य होकर वृषलीपति कहलाता है।
(पराशर स्मृति : 7: 6-9)

● पिता ऋतुकाल (रजस्वला) के भय से शीघ्र ही कन्या का विवाह कर दे। जो कन्या कुंवारी अवस्था में ऋतुमति होती है उसका पिता पाप को भोगी है। 
(वशिष्ट स्मृति : अध्याय 17:70) 

● 
नाग्निका तु श्रेष्ठा।
अग्निका कन्या (जिसका मासिक धर्म न आया हो) विवाह के लिए श्रेष्ठ होती है। (जिस कन्या का मासिक धर्म प्रकाशित हो चुका हो। ऐसी प्राष्ठ यौवना को अनग्निका कहते है।)
[गोभिलगृह्यसूत्र :  प्रपाठक 3 : श्लोक 6]
{नगनिका वह कन्या होती है जो बालकाल में माहवारी आने से पहले नग्न घुमती फिरती है)

 

श्रीमद्भागवत पुराण (10वा स्कन्ध - उत्तरार्ध, अध्याय 53, श्लोक  51-52) में लिखा है कि रुक्मणि के हरण और विवाह के समय वह स्यामा (जिसे रजस्वला न हुई हो) थी। 

ऋषि गौतम न्याय दर्शन (गौतम 18: 21-23) - कन्या का विवाह उसके यौवन आरम्भ से पहले कर देना चाहिए, जो इसकी उपेक्षा करता है वो पाप करता है, वस्त्र पहनने लगे उससे पहले कर देना चाहिए.   

योग वशिष्ट (वशिष्ट 17:70) – रजस्वला होने के डर से पिता को कन्या विवाह तभी कर देना चाहिए जब वह नगन घुमती रहती है क्यूंकि अगर यौवन आरम्भ होने तक वह घर में रूकती है तो पिता को पाप लगता है.

● बुद्धिमान जन अपनी अविवाहित पुत्रियों का विवाह कर देते हैं, मासिक धर्म आरंभ होने से पहले।; जब छोटे बाल (गुप्तांगों पर) दिखाई देते हैं तो सोम आनंद लेता है, जब उसे रजस्वला होने लगती है तो गंधर्व आनंद लेता है और जब स्तन उभरने लगे तो अग्नि आनंद लेती है।  एक व्यक्ति जो अपनी पुत्री का यौवनारम्भ से पहले ही विवाह कर देना चाहिए। बुद्धिमान लोग कन्या की 8 वर्ष की आयु में ही विवाह करने की अनुशंसा (संस्तुति) करते हैं।

(पदमपुराण : भूमिखंड/II : अध्याय 85 : 62-66a; उत्तरखंड/VI : अध्याय 118 : 2-15)

 

●  जब वह 8 वर्ष की हो गयी, पिता ने पुत्री के विवाह का सोचा। 

(स्कन्द पुराण मे जगह जगह 8 वर्ष की कन्या को कामुकता की दृष्टि से देखा गया है। )

[स्कन्द पुराण: Vl : 195 : 13-14]


● भारतरत्न महामहोपाध्याय डॉ पांडुरंग वामन काणे, धर्मशास्त्र का इतिहास, खंड 1, पृष्ठ संख्या 272 और 273 पर है-

"मनु (९ /९४) के मत से ३० वर्ष का पुरुष १२ वर्ष की लड़की से या २४ वर्ष का पुरुष ८ वर्ष की लड़की से विवाह कर सकता है। इसी के आधार पर विष्णुपुराण ने कन्या एवं वर की विवाह-अवस्थाओं का अनुपात १/३ रखा है। अंगिरा के मत से कन्या वर से २ , ३ , ५ या अधिक वर्ष छोटी हो सकती है। महाभारत (आश्वमेधिकपर्व ५६/२२-२३) में एक स्थल पर यह आया है कि वर की अवस्था १६ वर्ष की होनी चाहिए, और गौतम अपनी कन्या का विवाह उत्तंक से करने को तैयार है यदि उत्तंक की अवस्था १६ वर्ष की हो। सभापर्व ( ६४।१४ ) एवं वनपर्व ( ५।१५ ) में एक ऐसी लड़की की उपमा दी गयी है जो ६० वर्ष के पुरुष से विवाह नहीं करना चाहती। इससे स्पष्ट है कि उन दिनों ६० वर्ष के पुरुष से कन्याओं का विवाह सम्भव था । महाभारत (अनुशासन पर्व (४४/१४) में वर एवं कन्या की विवाह - अवस्थाएँ क्रम से ३० तथा १० या २१ तथा ७ हैं, किन्तु उद्वाहतत्त्व ( पृ० १२३ ) एवं श्रौतपदार्थनिर्वचन ( पृ० ७६६ ) ने महाभारत को उद्धृत कर लिखा है कि ३० वर्ष का पुरुष १६ वर्ष की कन्या से विवाह कर सकता है (किन्तु यहाँ 'षोडशवर्षाम्' के स्थान में 'दश वर्षाम्' होना चाहिए, षोडशवर्षाम्  मुद्रण अशुद्धि है)। वह आगे लिखते हैं कि- ऋग्वेद की दो ऋचाओं (१/१२६/६-७) से पता चलता है कि लड़कियाँ युवा होने के पूर्व विवाहित होती थीं। ऋग्वेद (१/५१/१३) में एक स्थान पर ऐसा आया है कि इन्द्र ने बुड्ढे कक्षीवान् को वृचया नामक स्त्री दी जो अर्भा (बच्ची) थी। किन्तु 'अर्भा' शब्द केवल 'महते' के विरोध में प्रयुक्त हुआ है। 'महते' शब्द का अर्थ है बड़ा जो कक्षीवान् के लिए प्रयुक्त हुआ है और किसी निश्चित अवस्था का द्योतक नहीं है। यहाँ केवल इतना ही कहा जा सकता है कि ऋग्वेद में कन्याएँ किसी भी अवस्था में (युवा होने के पूर्व या उपरान्त) विवाहित हो सकती थीं और कुछ जीवन भर अविवाहित रह जाती थीं। अन्य संहिताएँ एवं ब्राह्मणग्रन्थ विवाह अवस्था पर कोई प्रकाश डालते दृष्टिगोचर नहीं होते । छान्दोग्योपनिषद् में कहा है कि उपस्ति चाक्रायण कुरु देश में अपनी पत्नी के साथ रहते थे जो ' आटिकी ' (शंकराचार्य के अनुसार अविकसित कन्या) है । गृह्यसूत्रों एवं धर्मसूत्रों के अनुशीलन से पता चलता है कि लड़कियाँ युवावस्था के बिलकुल पास पहुँच जाने या उसके प्रारम्भ होने के उपरान्त ही विवाहित हो जाती थीं। हिरण्यकेशि० ( १/१९/२), गोभिल० (३।४।६ )।


अपनी उम्र में पहुंचने से पहले ही लड़कियों की शादी कर देनी होती थी. हिंदू विधि और देश के रिवाज के अनुसार लडकी के पिता पर यह अनिवार्य था कि वह बालिग होने से पहले उसकी शादी कर दे यधपी विदाई मे अकसर देर की जाती थी जो लगभग 3 साल होती थी।  (The Oriental, the Ancient, and the Primitive, Page 208)

 

●  Swami Vivekananda says; 'A girl of eight is married to a man of thirty, and the parents are jubilant over it.... And if anyone protests against it, the plea is put forward, "Our religion is being overturned." What sort of religion have they who want to see their girls becoming mothers before they attain puberty even and offer scientific explanations for it? Many, again, lay the blame at the door of the Mohammedans. They are to blame, indeed! Just read the Grihya-Sutras through and see what is given as the marriageable age of a girl...There it is expressly stated that a girl must be married before attaining puberty. The entire Grihya-Sutras enjoin this. And in the Vedic Ashvamedha sacrifice worse things would be done... All the Brâhmanas mention them, and all the commentators admit them to be true. How can you deny them? What I mean by mentioning all this is that there were many good things in the ancient times, but there were bad things too. The good things are to be retained, but the India that is to be, the future India. must be much greater than ancient India.'

(Source: The Complete Works of Swami Vivekananda/Volume 6/Epistles - Second Series/LXXI Rakhal)
https://en.wikisource.org/wiki/The_Complete_Works_of_Swami_Vivekananda/Volume_6/Epistles_-_Second_Series/LXXI_Rakhal



 विधवा पुनर्विवाह निषेद्ध


● (मनुस्मृति:9:65)
"नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते क्वचित् ।
न विवाहविधावुक्तं विधवावेदनं पुनः।।"
विवाह के वेदमंत्रों मे नियोग का कही उल्लेख नही है, और न ही विवाह विषयक शास्त्रों मे विधवा विवाह का उल्लेख है।


 दहेज प्रथा।

●  रामायण/रामचरितमानस बताती है कि भगवान राम को सीताजी से शादी के बाद दहेज मिला था जिसमे सोना, आभूषण, वस्त्र, भैंसे, गाएं और विभिन्न वस्तुएं थी। इतना वशाल दहेज़ था कि कहना ही संभव नहीं।

● स्त्रीधन, पराया धन, कन्यादान जैसी शब्द और प्रथाएं ही काफी है ये बताने के लिए की स्त्रीयों की स्थिति तुच्छ समझी।जाती थी और आज भी है।

● कृष्ण ने अपनी बहन सुभद्रा के दहेज में अर्जुन को अन्य चीजों के साथ साथ सुंदर वेशों वाली, कांतिमयी, सुवर्ण के आभूषणों को धारण करने वाली, छोटेछोटे रोमों से युक्त, गोरे वर्ण वाली तथा सेवा में चतुर एक हजार अलंकृत स्त्रियां दी थीं.

"स्त्रीणां सहस्रं गौरीणां सुवेषाणां सुवर्चसाम् सुवर्णशतकण्ठीनामरोमाणां स्वलंकृताम्. परिचर्यासु दक्षाणां प्रददौ पुष्करेक्षणः "

(महाभारत, आदि पर्व, 220/49-50)


मेहर या मूल्य।

यदि एक मनुष्‍य ने विवाह पक्‍का करके कन्‍या का मूल्‍य दे दिया हो, दूसरे ने मूल्‍य देने का वादा करके विवाह पक्‍का किया हो, तीसरा उसी कन्‍या को बलपूर्वक ले जाने की बात कर रहा हो, चौथा उसके भाई-बन्‍धुओं को विशेष धन का लोभ दिखाकर ब्‍याह करने को तैयार हो और पाँचवा उसका पाणिग्रहण कर चुका हो तो धर्मत: उसकी कन्‍या किसकी पत्‍नी मानी जायेगी?..; कन्या के भाई बंधु जिसे कन्या धर्म पूर्वक परिग्रहण की विधि से दान कर देते है अथवा जिसे मूल्य लेकर दे डालते है।
[महाभारत:अनुशासन पर्व: 44 अध्याय श्लोक 19-20, 24]


तलाक़

हिंदी में तलाक के लिए कोई शब्द है ही नहीं। क्योंकि सनातन संस्कृति में तलाक कांसेप्ट पाया नहीं जाता। किसी भी सनातनी ग्रन्थ में तलाक जैसे कॉन्सपेट का ज़िक्र नहीं है। सामाजिक कानून की किताबो को स्मृति कहते है जो 20 से भी अधिक है। सबसे अधिक मान्य मनुसमृति है जो मनु की लिखी हुई मानी जाती है, उसमें बाल विवाह, बहुविवाह, गौत्र आदि का ज़िक्र है पर तलाक का नहीं। सनातन परमपरा में पति मरने पर ही स्त्री अलग हो सकती है। इसलिए सती प्रथा और विधवा आश्रम जैसी चीज़ें ईजाद हुई जिनका उल्लेख ग्रंथो में भी है। हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 के बाद हिन्दू समाज में तलाक का कानून प्रोविजन किया गया।


3 तलाक, हलाला या 11 नियोग।


तलाक जैसा नियम बेहद असंतुष्ट, पीड़ादायक संबंधों को समाप्त करने के लिए एक उपाय है जब कोई अन्य रास्ता विवाहित जीवन को बचाने का न हो। ये भी एक आम रिवाज़ था और है दुनिया भर में पर भारतीय संस्कृति में ये नहीं पाया जाता इसलिए संस्कृत में इस शब्द को कोई पर्यायवाची नहीँ है। आरम्भ से ही भारतीय संस्कृति में स्त्री को तलाक पाने का अधिकार नहीं दिया गया। पति कितना भी अत्यचारी हो, पत्नी जीवन भर उसे झेलती रहेगा और संस्कारी पतिव्रता स्त्री कहलाई जाएगी। स्त्री आज़ाद न हो जाये इसलिय पति के मरने पर सती कर दी जाएगी। पति सहयोग न करता हो, परवाह न करता हो जैसे केस में भी पत्नी को अलग होने की बजाय नियोग करने का आदेश है।

नियोग का अर्थ है संतान प्राप्ति के लिए किसी पराए मर्द के साथ संभोग करना। ग्रंथों में नियोग करने पर बड़ा ज़ोर दिया गया है। विधवा स्त्री को 11 पुरुषों से नियोग की अनुमति दी गई है। यदि पति 3 साल से कमाने विदेश में है तो पत्नी नियोग करके संतान पैदा कर सकती है जो कि उसके पति की ही संतान माना जायेगा। पति दुखदायी हो, मार पिटाई करता हो, लड़ाई झगडा करता हो तो पत्नी किसी पुरुष से नियोग करके संतान उत्पन्न कर सकती है जो पति की ही संतान मानी जायेगी और संपत्ति में अधिकार भी पाएगी। सुहागन स्त्रियां भी नियोग किया कर सकती। अगर पुरूष से न रहा जाए तो वह विधवा से नियोग कर सकता है। विधवा भी देवर के साथ नियोग कर सकती है।


● जिस स्त्री का पति मार गया हो वो छह महीने तक व्रत करें और फिर छह महीने पश्चात स्त्री का पिता और भाई उस स्त्री का नियोग करवाये अर्थात दूसरे पुरुष से गर्भ धारण करवाये। पतिके समान ही वह स्त्री उस पुरुष की सेवा करे। 

(वशिष्ठ स्मृति, अध्याय 17, पृष्ठ संख्या 584, पुस्तक अष्टादशस्मृति, टिकाकर पंडित  सुंदरलाल जी त्रिपाठी, खेमराज श्रीसकृष्णदास प्रकाशन)



स्त्री अपहरण, नमेहरम संबध, नाजायज़ संबंध, अप्राकृतिक संभोग

जो संतान अथवा स्त्रियों का अपहरण करता है.. जो किसी दूसरे को धोखा देकर उसकी स्त्री को भोग करता है .. जो अगम्या (अर्थात जिससे विवाह अवैध हो) स्त्री के साथ संभोग करता हो.. जो ब्राह्मण आदि उच्च वर्ण के लोग कुत्ते तथा गधे आदि निन्द जीवों को पालते है.. जो यज्ञ आदि विहित कर्मों के अतिरिक्त अन्यत्र भी पशुओं का वध  करते है (अर्थात यज्ञ में पशु वध की आज्ञा है).. जो अपने ही वर्ण की स्त्री को वीर्यपान कराता है (उसे भी नरक में वीर्यपात पिलाते है).. नरक में जा गिरते है। [भागवतपुराण : 5:26:8-36]


महिला चरित्र हनन एक आम बात।


● मनु मनुस्मृति-9/2 मे लिखते हैं- "अस्वतन्त्रः स्त्रियः कार्याः पुरुषैः स्वैर्दिवानिशम्।"
अर्थात- पुरुष द्वारा अपने स्त्रियों को कभी स्वतंत्रता नही देनी चाहिये।

● मनुस्मृति-8/77
"एकोऽलुब्धस्तु साक्षी स्याद् बह्वच्य शुच्योऽपि न स्त्रियः।
स्त्रीबुद्धेरस्थिरत्वात्तु दोषैश्चान्येऽपि ये वृताः"
अर्थात- एक निर्लोभी पुरुष भी साक्षी हो सकता है, परन्तु अनेक स्त्रियां पवित्र होने पर भी साक्षी नही हो सकती, क्योंकि स्त्रियों की बुद्धि चंचल होती है! और अन्य मनुष्य भी जो दोषों से घिरें हैं, साक्षी होने के योग्य नही होते।


क़ुरान में औरतें खेती है या ग्रंथों में स्त्रियां खेती है


● मनुस्मृति-9/33 मे एक श्लोक लिखा है-
"क्षेत्रभूता स्मृता नारी बीजभूतः स्मृत पुमान।
क्षेत्रबीजसमायोगात् सम्भवः सर्वदेहिनाम् ।।"
अर्थात- स्त्री को क्षेत्र (खेत) रूप, तथा पुरुष को बीज (अनाज) रूप कहा गया है। खेत और बीज के संयोग से सभी जीवों की उत्पत्ति होती है।

●  मनु ने 9/41 मे कहा है कि पराये खेत मे पुरुष को अपना बीज नही बोना चाहिये,

● और 9/49 मे कहते हैं-
"येऽक्षेत्रिणो बीजवन्तः परक्षेत्रप्रवापिणः।
ते वै सस्यस्य जातस्य न लभन्ते फलं क्वचित् ।।"
अर्थात- जिसके पास खेत (स्त्री) नही है, वह दूसरे के खेत मे बीज बोता है तो उसमे उत्पन्न धान्य (बालक) को वह पाने का अधिकारी नही है।

● अध्याय-9 श्लोक- 34- 35- 36 और 37 में भी स्त्री को खेतरूपी ही लिखा है।


अधिक संतान और गौद लेना एक आम बात।


● धृतराष्ट्र की पत्नि गांधारी ने सौ पुत्रो को जन्म दिया था, जिन्हे कौरव कहा जाता है!

● महाभरत में राजा शशबिन्दु की 1 लाख पत्नियां और हर पत्नी के 1000 बच्चे थे। इस तरह उनकी 1 करोड़ पुत्र थे।

● ऋग्वेद 10 बच्चे पैदा करने को कहता है:
हे इंद्र, इस पत्नी को उत्तम पुत्रो वाली कर और इससे मेरे 10 बच्चे पैदा कर।
[ऋग्वेद 10 : 85 : 45]

● ऋग्वेद 7.4.8 में कहा गया है--
नहि ग्रभायारण: सुशेवोऽन्योदर्यो मनसा मन्तवा उ अघा चिदोक: पुनरित्स एत्या नो वाज्यभीषाडेतु नव्य।।
अर्थात् दूसरे के पेट से जो उत्पन्न हुआ है उसको कभी अपना पुत्र न समझे | अन्योदर्य पुत्र का मन सदैव वहीं जायेगा जहाँ से वह आया है , इसलिए अपने ही पुत्र को पुत्र समझना चाहिए ।
(यानी नियोग संतान, सन्तान गोद लेना और सरोगेसी को अस्वीकृत करा गया है)

● दक्ष प्रजापति की अस्सी करोड़ संताने हुई। 

दक्ष पाञ्चजनी के गर्भ से 1 हज़ार पुत्रों ने जन्म लिया।

वीरिणी के गर्भ से पुनः 1 हज़ार पुत्रों को उत्पन्न किया।

ब्रह्मा के मानस पुत्ररूप गणेश्वरों के 84 करोड़ पुत्र उत्पन्न हुए।

बलि के 100 पुत्र उत्पन्न हुए जिनमें बाण ज्येष्ठ था।

हिरण्याक्ष के 4 पुत्रों से उत्पन्न हुए पुत्र पौत्रों की संख्या 77 करोड़ थी। 

दनु ने कश्यप के संयोग से 100 बलशाली पुत्रो को प्राप्त किया। 

[मत्स्यपुराण, अध्याय 4-6]


पुत्र संतान को शुभ मानना।


●  पुत्रविहीन के लिए इस लोक का कोई सुख नहीं होता।

[ऐतरेय ब्राह्मण :3:2:12]


मुसलमान बनाओ या वैदिक बनाओ ज़बरदस्ती


● वैदिक ईश्वर आज्ञा देता है कि सब मनुष्यों को वेदि अर्थात वैदिक बनाओ।
[यजुर्वेद 2:1]


काफिर, मुश्रिक या अनार्य, दस्यु, वेदननिन्दक 


सनातन धर्म न मानने वालों को उनके कर्म, लक्षण, रूप, पहचान, मान्यता आदि के आधार पर अलग अलग नामों से पुकारा जाता था।

● आर्य लोग, दूसरों को अनार्य कहकर, दास-दस्यु कहकर दुत्कारते थे।

● महर्षि मनु के काल में सनातन धर्म से अलग धर्म को दस्युधर्म कहा जाता था।

● विदेशियों को मलेच्छ कह कर पुकारा जाता था।

● वैदिक देवताओं या मत के विरोधियों को  ब्रह्मद्विष कहा जाता था।

● ग्रंथों में वेदनिन्दक, नास्तिक, शूद्रों, दस्युओं, ब्रह्मद्विषो को कठोर दंड देने का उल्लेख जगह जगह है।

● असुर, राक्षस, चंडाल, दैत्य, दानव, पिशाच नामक आदिवासी जनजातियाँ थी। जिनके कत्लेआम से ग्रन्थ और इतिहास भरा पड़ा है। आर्यों ने यही हाल बुद्धों और जैनियों का भी किया गया।

● हत्वी दस्युन प्रार्यं वर्णमावत्

[ऋग्वेद 3.34.9]

इंद्र ने दस्युओं को मारकर आर्यवर्णों का पालन किया।

● हे शूर इंद्र, दस्यु तुम्हारे द्वारा सताए गए।

[ऋग्वेद 2.11.18]

● यथावशं नयति दासमार्यः ।

[ऋग्वेद 5.34.6]

इन्द्र दासकर्म करने वालों को वश में रखते है।

● तुम लुटेरों को कंपित करो। जो संग्राम की इच्छा करते है, उन सभी शत्रुओं को विशेष रूप से पराजित करो।

[अथर्वेद:19:46:2]

● कृण्वन्तो विश्वमार्यम्।

सम्पूर्ण विश्व को आर्य बनाने वाला और आदनशीलों को मारने वाला/ सब शत्रुओं का नाश करते हुए, सब प्रकार के  आर्यत्व को दें।

(ऋग्वेद:9:63:5)

● इन्द्रो वर्धन्तु अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम्।

अपघ्नन्तोsरावणः॥ 

(ऋग्वेद 9।63।5 - आर्य समाजी वेदार्थ)

अर्थात्! हे सत्कर्मों में निपुण सज्जनो ! परमैश्वरीयशालियों को बढ़ाते हुए, पापियों का नाश करते हुए , सम्पूर्ण संसार को आर्य बनाओ । 


● राक्षस हंता अर्थात मारने वाले है। अमित्रों के नाशक है। वे राक्षस नाशक है। हम राक्षसों की गर्दन काट कर अलग करते है। उनका नाश करते है। 

(यजुर्वेद 5 :24- 26)



काफिरों को मारो या गैर सनातनियों को मारो



“वृशच प्र वृशच सं वृशच दह प्र दह सं दह”
(दुश्मन - वेद निंदक को काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूंक दे, भस्म कर दे।)
[अथर्वेद 12:5:62/7]

 

शत्रु के भीतर भय पैदा करने के लिये उसके अन्न, जलायश जला दो और राज्य मे घेरा डालो।
(मनुस्मृति 7/194)


स साधुभि ब्रहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दक:
साधुओं को चाहिए कि नास्तिक और वेदनिन्दाको को समाज से निकाल दें।
[मनुस्मृति:2:11]


“यथा हि चोरः स, तथा ही बुद्ध स्तथागतं।
नास्तिक मंत्र विद्धि तस्माद्धि यः शक्यतमः प्रजानाम्
स नास्तिकेनाभिमुखो बुद्धः स्यातम् ।।”
(वाल्मीकी रामायण: अयोध्याकांड, सर्ग -109, श्लोक: 34)
जैसे चोर दंडनीय होता है, इसी प्रकार ‘बुद्ध’ और और उनके नास्तिक अनुयायी भी दंडनीय है।


पर्दा या घूँघट


पर्दा दुनिया भर के विभिन्न समाजों में एक आम रिवाज़ रहा है। घूँघट, संस्कृत के अवगुण्ठन शब्द से आया है जिसका मतलब होता है वील, क्लोक, कवर, हाईड।

● In the Rig Veda, Adhivastra denotes the outer cover (veil).  In the Atharvaved Veda, Upavasana, denotes veil.

● वेदों में:
“अपने चक्षु झुकाए रखा करो, ऊपर न देखा करो। अपने दोनों पैरों को एक दूसरे से सटा कर चलो। तुम्हारे मुख और पांव न दिखाई दे। अपने वस्त्र मत खोलो, एवं स्वयं को छिपाकर रखा करो”

(ऋग्वेद - 8:33:19/20)

● वाल्मीकि रामायण (5th Cen BC)  में राम सीता को घूँघट हटा कर प्रजा को चेहरा दिखाने को कहते है वनवास पर जाने से पहले।

(रामायण : 6: 114 : 28 -30)

● वाल्मीकि रामायण में रावण की पत्नियों का भी घूँघट करने का उल्लेख है। रावण के मरने पर उसकी पत्नियां और पटरानी मंदोदरी, बिना घूँघट के दौड़ कर रावण के शव के पास इकट्ठा हो जाती है।

(रामायण : 6 : 111 : 61 - 62 )

●  जब लक्ष्मण जी को सीता जी के आभूषण और ओढ़नी पहचानने का अवसर मिला तो लक्ष्मण जी ने जवाब दिया कि मैं इन्हें नहीं पहचनता क्योंकि मैं तो केवल उनके पांव पहचानता हूँ। अर्थात सीता जी अपने देवर लक्ष्मण से घूंघट करती थी।

(रामायण : 4 : 6: 11 - 22)

●  तुलसी रामायण में सीता जी द्वारा दशरथ और अन्य लोगों से घूंघट करने का वर्णन है। 

(रामचरितमानस : दोहा 116 : चौपाई 1 -4 )

● महाभारत :1:210:14-16, देवीभागवतपुराण : 9:18:1 -26, देवीभागवतपुराण : 9:19:2-94, पद्मपुराण : 1:43:128-133, शिवपुराण: रुद्रसंहिता: खण्ड 2: अध्याय 19 : श्लोक 26- 27 में मुख को घूंघट, वस्त्र आदि से ढकने का उल्लेख है।

● इसी तरह रामकथा मे भी राम चन्द्र जी भी सीता जी से पराये आदमियों (परशूराम) से परदा करने को कहते हैं :- जब श्रीराम चन्द्र ने परशुराम को आते देखा तो वे सीता जी से बोले ''हे सीता वह हमारे बड़े है, अपने आपको घूंघट में छिपा लो और चक्षुओं को झुका लो, '' (8वी शताब्दी में भवभूति द्वारा रामकथा आधारित महावीरचरित्र, एक्ट 2, पेज 71).  

● 7वी शताब्दी में माध नामक कवि ने (शिशुपालवध , व. 17 में) श्रीकृष्ण के घर की स्त्रियों के घूंघटधारी होने का उल्लेख किया है।

● उत्तर गुप्त काल मे घूँघट किया जाता था। शूद्रक की मृच्छकटिका (3 - 4 सदी) में घूँघट (बधृशब्द एव अवगुण्ठन सकामपुरषान्तर्हरिनिवार कत्वादावरणम्‌) का उल्लेख है। कालिदास के अभिज्ञानशाकुनतलम (4 - 5 सदी) में घूँघट (का स्विदवगुण्ठनवती नातिपरिस्फुटशरीरलावण्या) करने का बहुत उल्लेख है।  पंडित विश्वनाथ (14 सदी) रचयित साहित्य दर्पण में भी घूंघट (संलीना स्वेषु गात्रेषु मूकीकृतविभूषणा अवगुण्ठनसंवीता कुलजाभिसरेद्यदि) का उल्लेख है। प्राचीन काल के महाकाव्यों और बाद के ग्रंथों में भी घूंघट आदि का उल्लेख मिलता है जैसे हर्षचरित कादम्बरी, प्रतिमानाटकम और यंहा तक कि सांख्यतत्त्वकौमुदी में भी।

प्राचीन इतिहास काल (मौर्य, गुप्ता) के घूँघट में स्त्रियों के चित्र उकेरे गए सिक्के, आकृतियां आदि भी पाए गए है।

कुलवधुओं में पर्दा-प्रथा का चलन था, स्त्रियां घर से बाहर घूंघट निकालकर  जाती थीं। स्पष्ट है कि उच्च कुल की नारियां बिना अवगुण्ठन के बाहर नहीं आती थीं। यद्यपि उच्चकुल की नारियां विशेष अवसरों पर ही बाहर निकलती थीं। मुख्यता राजशाही स्त्रियां घूंघट या पर्दा करती थी। भारत में प्रदा प्रथा थी पर समुदाय, स्थान, परम्परा अनुसार अलग अलग। कंही राज घरानों में था, कंही केवल समाज में, कंही दोनो जगह और कंही थी ही नही। छोटे छोटे राज्य या समुदाय के पर्दे पर अपने ही नियम थे। घूंघट आज भी विभिन्न क्षेत्रों जैसे विषेकर राजस्थान और विभिन्न ऊंची और निचली जातियों में आसानी से देखा जा सकता है। 

ये हो सकता है की सामान्य जन में पर्दा मुस्लिम के आने के बाद आया हो। पर ये भी हो सकता है कि पर्दा जबरन या बचाव के कारण नहीं बल्की प्रेणना व प्रभाव से आया हो क्योंकि भारतीय संस्कृति में ये प्रचलन में तो था ही और लोग अपनी भूली हुई मान्यताओं पर आत्मग्लानि के कारण अक्सर वापिस आ जाते है जब गैर लोगों को वैसा ही करते पाते है।



सती यानी पत्नी को पति की चिता के साथ जलाना


सती नाम सती उस देवी के लिए आता है जिसने खुद को जला लिया था, अपने पिता द्वारा स्वयं और पति शिव का अपमान होने पर। सती शब्द का संस्कृत में प्रयोग ही 'अच्छी पत्नी' के लिए होता था। राजा राममोहन राय ने मुग़लो या मुसलमानों को इसका दोष नहीँ दिया बल्कि 1829 में अपने ही समाज से इसके विरुद्ध लड़ाई लड़ी।

● 3rd सदी सदी में गुप्ता काल मे सती का प्रचलन अधिक था जिसके साक्ष्य मौजूद है। सती पिल्लर्स ऑफ एरन पर सती का उल्लेख मिलता है। 510 ईसवी के इस अभिलेख में सेनापति गोपराज की पत्नी के सती होने का वर्णन है। यह सती का अभी तक प्राप्त पहला साक्ष्य है। कलचुरी साम्राज्य (9वी शताब्दी, आज का छत्तीसगढ़ क्षेत्र) में बहुविवाह और सती प्रथा का प्रचलन था। राजा गांगेयदेव के साथ 11 वी सदी में 100 रानियों सती हुई थी।

● मेधनाथ की मौत के बाद सुलोचना सती हुई थी।

● महाभारत मे पाण्डु की पत्नि माद्री भी पाण्डु के साथ सती हुई थी, और यही से यह क्रूर प्रथा प्रबल हो गयी।

● गरुणपुराण/अध्याय-10 श्लोक-35 से 56 तक मे लिखा है-
"पति की मृत्यु के बाद पतिव्रता नारी को पति के साथ ही परलोकगमन करना चाहिये, महिला लज्जा और मोह त्यागकर श्मशान भूमि मे जाये, चिता की परिक्रमा करके महिला चिता पर चढ़े और अपने पति को गोद मे लिटाये, तथा अग्नि को गंगाजल समान मानकर खुद को पति के साथ भस्म कर ले"

इसी अध्याय के 41 वें श्लोक मे लिखा है कि महिला पहले प्रसव करके पुत्र पैदा कर दे, उसके बाद उसे 'सती' हो जाना चाहिये!

इसी पुराण 54वें श्लोक मे महिला को डराया भी गया है कि "यदि वह क्षणमात्र होने वाली पीड़ा के कारण सती होने का सुख नही भोगती है तो वो महिला जन्म- जन्मातर तक विरहाग्नि मे जलती रहती है, और जो महिला सती हो जाती है वह 14 इन्द्रों के कार्यकाल तक स्वर्ग मे पति के साथ रमण करती है!

●  सती प्रथा का उल्लेख "नारदपुराण अध्याय-7" मे भी है, पर वहाँ जरा सा रहम किया गया है!

नारदपुराण अध्याय-7/52 के श्लोक मे लिखा है-
"बालापत्याश्च गर्भिण्यो ह्यदृष्टऋतवस्तथा।
रजस्वला राजसुते नारोहन्ति चिंता शुभे।।"
अर्थात- जिस महिला की संतान बहुत छोटी हो, जिसकी उम्र इतनी कम हो कि उसे अभी तक माहवारी ना शुरू हुई हो, जो गर्भवती हो, और जिसे माहवारी आ रही हो, उसे पति के साथ चिता पर नही चढ़ना चाहिये।

● शिवाजी महाराज की रानी पुतलाबाई सती हुई थी और एक अन्य बीवी सकवरबाई भी सती होना चाहती थी पर उनकी बेटी होने के कारण उन्हें ऐसा करने स्व रोक दिया गया था।

● भगवान शंकर की पत्नी सती का अग्नि में प्रवेश करना और शरीर त्यागना।

[श्रीमद्भागवत : स्कंध 4: अध्याय 4]


अल्लाह शरीरधारी है या वैदिक ईश्वर ।


●  क़ुरान में कई जगह गुढ़, अलंकृत भाषा में अल्लाह को हाथ वाला, तख्त वाला कहा गया है। जो सिर्फ मिसाल के तौर पर है। अगर इसको शाब्दिक अर्थों में लोगे तो गलत हो जाएगा क्योंकि इसी तरह की उपमा वेदों में भी ईश्वर के लिए प्रयोग हुई है।

●  ऋग्वेद (10:81:2) कहता है की ईश्वर समस्त जगत का दृष्टा है। ऋग्वेद आगे (10:81:3) बताता है कि ईश्वर तो सब दिशाओं की और मुख, बांह और पाँव किए हुए है।  अथर्वेद (4:1:6) कहता है कि जगत उत्पत्ति से पहले ईश्वर सोया हुआ सा था।  तो क्या इन मंत्रों का अर्थ ये हुआ कि ईश्वर का शरीर है? नहीँ। 

●  यजुर्वेद का मंत्र है:- सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिं विश्वतो वृत्त्वात्यतिष्ठतदशांगुलम् ।। अर्थात वह पुरुष यानी ईश्वर हजारों सिर, हजारों नेत्र और हजारों पैरों वाला है। वह इस ब्रह्माण्ड को चारों ओर से घेरकर भरी दस अंगुल पर खड़ा है।


केवल वेद ही मनुष्य बनने को कहता है, क़ुरान नही।


इल्ज़ाम आता है की ऋग्वेद (10.53.6) में ईश्वर कहता है, "मनुष्य बनों" जबकि क़ुरान कहता है की मुसलमान बनों।  मतलब जिनसे कहा गया कि मनुष्य बनो, तो पहले क्या मनुष्य नहीं थे या मनुष्य से हीन थे? ऋग्वेद (10.53.6) का यही मंत्र आगे कहता है कि मनुष्य बन कर उस ईश्वर की उपासना करो अर्थात जो उस ईश्वर से अलग किसी भी अन्य की उपासन करता है वो मनुष्य नही है। परन्तु आज तो लगभग सभी हिन्दू भाई उस एक ईश्वर को छोड़ कर अन्यो की उपासना कर रहे है तो क्या वो वेद अनुसार मनुष्य हुए?

वैसे यजुर्वेद (2:1) में वैदिक ईश्वर आज्ञा देता है कि सब मनुष्यों को 'वैदिक' बनाओ। यानी वेद स्वयं चाहते है कि मनुष्य मनुष्य से आगे बढ़े और वैदिक बने।


पुत्री से संभोग।

● ब्रह्मा का शरीर 2 भागो में विभक्त होक आधा स्त्री और आधा पुरुष रूप हो गया। वह स्त्री शतरूपा या सरस्वती कही गई। ब्रह्मा ने अपने शरीर से उत्पन्न स्त्री को पुत्री स्वीकार किया पर उसे देख मुग्ध हो गए। उस ने झुककर प्रणाम किया तब ब्रह्मा उसे पुनः देखने लगे। ब्रह्मा ने चरणों में पड़ी शतरूपा का पाणिग्रहण किया जिससे उसके गर्भ से मनु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।

[मत्स्यपुराण, अध्याय 3, श्लोक 30-47 एंव अध्याय 4, श्लोक 1-32, पेज 21-25]

● मनु ने संतान की इच्छा से घी, दही और मट्ठा जलों में चढ़ाया। तब एक स्त्री उत्पन्न हुई। उसने कहा की मनु की लड़की हूँ और मैं उसी की हूँ जिसने मुझे जना है। उसने मनु से कहा की मैं तेरी हूँ। तूने जलों में जो घी मट्ठा अर्पण किया, उसी से तूने मुझे उत्पन्न किया इसलिए तू मेरा प्रयोग कर। उसके द्वारा इस प्रजा को उत्पन्न किया जो मनु की संतान है।

[शतपथ ब्राह्मण :1:8:1]


पत्नी को माता और पति को पुत्र मानना।


●  पति वीर्य रूप में पत्नी में प्रवेश करता है। वह पति गर्भ होकर पत्नीरूप माता को प्राप्त करता है। उस पत्नी रूप माता के गर्भ में पुनः नया होकर दसवें महीने में उत्पन्न होता है। जिस कारण से इस गर्भ धारण करने वाली पत्नी के गर्भ में पति पुत्र के रूप में पुनः उत्पन्न होता है। उसी कारण से जाया पत्नी, जाया उत्पन्न करने वाली होती है। ये पत्नी इसमें पुत्र रूप में पति के होने के कारण भूति और इससे पुत्ररूप से पति के उत्पन्न होने के कारण आभूति है। अंत इस पत्नी में बीज रूप रेत को धारण कराया जाता है।

[ऐतरेय ब्राह्मण : अध्य्याय 33 : खंड 1: श्लोक 9-10]



हवा हवाई जन्म


● ब्रह्मा के मातृ विहीन पुत्रो में उनके दाहिने अंगूठे से दक्ष प्रजापतिप्रकट हुए, हृदय से कामदेव का जन्म हुआ, हथेली से ब्रह्मपुत्र भरत प्रकट हुए। ब्रह्मा का शरीर 2 भागो में विभक्त होक आधा स्त्री और आधा पुरुष रूप हो गया। वह स्त्री ब्रह्मा की पुत्री सरस्वती कहलाई गई। 

[मत्स्यपुराण, अध्याय 3-4]

● मनु ने संतान की इच्छा से घी, दही और मट्ठा जलों में चढ़ाया। तब एक स्त्री उत्पन्न हुई। उसने आगे कहा की तूने जलों में जो घी मट्ठा अर्पण किया, उसी से तूने मुझे उत्पन्न किया।

[शतपथ ब्राह्मण :1:8:1]


नरबलि

● देवताओं ने परम पुरुष को हवि माना है। उसको हवि मानके यज्ञ का आरंभ  किया। देवताओं ने जिस यज्ञ का विस्तार किया, उस यज्ञ में परम पुरुष को ही हवि के पशु के रूप में बांधा। 

[यजुर्वेद: 31: 15 -16]

● इक्षवाकु वंश से उतपन्न वेधस के पुत्र हरिशचंद्र नामक राजा पुत्रविहीन थे। उनकी सौ पत्नियां थी। राजा ने वरुण से प्राथना की मेरे पुत्र उत्पन्न हो जाये तो उस से तुम्हारे लिए यजन करूँगा। फिर रोहित नामक पुत्र हुआ। वरुण ने कहा अब याग करो। राजा ने कहा ये पशु दस दिन का हो जाए उसके बाद।  फिर कहा इस यज्ञीय पशु के दांत उत्पन्न हो जाय तब। फिर कहा इस पुत्ररूप पशु के दांत गिर जाए तब। 

[ऐतरेय ब्राह्मण : अध्य्याय 33 : खण्ड 1]

अजितगर्त के 3 पुत्र थे। रोहित ने उससे कहा मैं तुम्हे 100 गाय दे रहा हूँ और इनमें से किसी एक को खरीद रहा हूं जिसके द्वारा याग करके स्वयं को मुक्त करवाऊंगा। उसने मंझले पुत्र शुनःशेप को बेचना स्वीकार कर लिया। फिर रोहित ने वरूण से कहा की मैं इस शुनःशेप रूप पशु से तुम्हारा याग करवाऊंगा।

[ऐतरेय ब्राह्मण :33 : 3: 7-8]

अजितगर्त  ने कहा मुझे एक सौ गाय दो तो मैं 'शुन: शेप' को बलि के लिए नियुक्त कर दूंगा अर्थात यूप में बांध दूंगा। सो वह वध के लिए यज्ञयुप में बांधा गए। अजितगर्त ने कहा एक सौ गाय और दो तो इस  शुनःशेप का वध कर दूंगा सो वह तलवार की धार को तीक्ष्ण करता हुआ आ गया। शुनःशेप ने विचार किया कि ये तो मुझे मनुष्य से व्यतिरिक्त बकरे इत्यादि पशु के समान मुझको विशेष रूप से मार डालेंगे। सो उसने एक एक करके सभी देवताओं से अनुग्रह किया। इससे उसके बंधन भी एक एक करके खुलते गए। अंत में सभी बंधन खुल गए।

[ऐतरेय ब्राह्मण : 33:4:1-13]

● शुनःशेप ने सूर्य से बंधकर जिनको पुकारा था, वे ही राजा वरुण हमें बंधन से मुक्त करे। लकड़ी के तीनों यूपों से बंधे शुनःशेप ने वरुण का आह्ववान किया था इसलिए वरुण ने उसको बंधन से छुड़ा दिया था। हे वरूण हम यज्ञों में हवि प्रदान करके तुम्हारे क्रोध को समाप्त करते है। मेरे सिर में बंधे हुए फंदे को ऊपर से और पैरों में बंधे हुए फंदे को नीचे से खोल दो तथा कमर में बंधे हुए फंदे को बीच में ढीला कर दो।

[ऋग्वेद: 1: 24: 12-15]

● प्रचीन काल में अश्वमेध की तरह 'नरमेध' का विधान था। डाक्टर रमेशचंद्र मजूमदार ने अपनी पुस्तक एसेंट इंडिया के पेज 85-86 में लिखा है कि जिस पुरुष को पुरुषमेध में बलि के लिए चुना जाता था, उसे एक साल पहले से स्वतंत्र घोषित कर दिया जाता था, वर्ष भर वह हर तरह की इच्छा पूर्ति बेरोकटोक करता था, साल के बाद उसकी मालिश की जाती थी फिर उसकी बलि दी जाती थी।  नरमेध की प्रथा ब्रिटिश सरकार ने सन 1845 में ऐक्ट 21 बना के प्रतिबंधित किया था।

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वेदों में खुले तौर पर होमो दे.व का उल्लेख नहीं है. कुछ वेस्टर्न और मोडर्न विद्वान दो-चार दे.व को होमो इन्टरप्रेट करते हैं.  हालाँकि पुराणों में ऐसे दे.व पूजे गए हैं जो ट्रांस या होमो थे।


बैठ कर मूत्र करने का ज़िक्र तो कंहीं नहीं पढ़ा हिन्दू ग्रंथों में मगर आयुर्वेदिक किताबो में है। मूत्र विसर्जन के बाद पानी से अंग धोने का ज़िक्र हिन्दू ग्रंथ में है.
 

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                 (धर्मशास्त्र का इतिहास)

दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...