पूजा का अर्थ होता है, उचित व्यवहार करना, सम्मान करना, सत्कार करना, अभिवादन करना आदि अर्थात जो जिस व्यवहार को पाने के योग्य है, उसके साथ वैसा ही आचरण करना। महाभारत (अनुशासन पर्व : 145 अध्याय) में मां बाप के साथ अच्छा व्यवहार करने को पूजा कहा गया है। मनुस्मृति (3: 58-59) में स्त्रियों का आभुषण, वस्त्रों व भोजन आदि से सत्कार करने को पूजा कहा गया है।
पूजा का अर्थ उपासन करना नहीं होता, न ही आरती उतारना होता है। वेदों में उपासना, स्तुति आदि शब्द प्रयोग हुए हैं। पूजा तो बहुत बाद में जा कर उपासना के समानांतर प्रयोग होना शुरू हुआ।
मूल रूप से पूजा किसी मनुष्य की, किसी वस्तु की या किसी भी पर्दाथ की हो सकती है। जैसे माता पिता का सम्मान करना और उनकी बात मानना, उनका पूजन है, अपने पुरखों के लिए प्रार्थना करना और उनके नाम पर भोज खिलना पितृपूजा है, गुरु को सम्मान देना और उनकी आज्ञा मानना, गुरुपूजा है, कन्याओं को अधिकार, उपहार आदि देना कन्यापूजा है, पेट की भूख मिटाना पेट पूजा है, भूमि में हल जोतना भूमिपूजा है, सूर्य के साथ योग, व्यायाम करना सूर्यपूजा है, तुलसी के पौधे को आगंन में लगा कर शुद्ध हवा लेना तुलसीपूजा है, प्रकृति के साथ व्यायाम करना और उसको संजोए रखना प्रकृतिपूजा है, मूर्ति बना कर अपने महापुरुषों को स्मरण करना, उन्हें यादगार बनाए रखना और उन्हें श्रद्धान्जलि देना ही मूर्तिपूजा है।
बुद्ध की मृत्यु के कुछ सदी बाद यूनानियों ने भारत पर आक्रमण किया और यहीं राजपाट चलाने के लिए बस गए, जिन्हें यवन कहा गया। कुछ समय बाद यवनों ने बौद्ध धर्म अपना लिया और उन्होंने बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण आरम्भ किया क्योंकि यूनान में यूनानी देवताओं की मूर्तियां बनाना यूनानी संस्कृति का एक अभिन्न अंग हुआ करता था। इस मूर्ति निर्माण के साथ बुद्ध और बौद्ध धर्म की लोकप्रियता इतनी बढ़ती गयी कि अपने धर्म को पीछा छूटते हुए देख कर जैनियों ने भी महावीर की मूर्तियों का निर्माण शुरू किया। क्योंकि बौद्ध, जैन और हिन्दू धर्म लंबे समय से आपस में वैचारिक संघर्ष और एक दूसरे से श्रेष्ठ होने का प्रतियोगिता में घिरे हुए थे, इसलिए हिंदू धर्म में भी मूर्ति निर्माण शुरू हुआ। देखते ही देखते हिन्दू धर्म के महापुरुषों, देवताओं आदि की मूर्तियों की पूजा भी शुरू हो गई। इन मूर्तियों के निर्माण से पहले ही, बौद्ध और जैन धर्म के प्रवर्तकों और दिव्यजनों के लोगों पर पड़े प्रभाव को देखते हुए, हिन्दू धर्म भी अपने महापुरषों जैसे राम, कृष्ण व कई देवताओं के बारे में प्रचार-प्रसार शुरू कर चुका था।
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वेदों में मूर्तिपूजा नहीं है। बल्कि पूजने योग्य किसी की मूर्ति का भी उल्लेख नहीं है। वैदिक काल में पूजने के लिए मूर्तियां नहीं बनाई जाती थी। मूर्ति पूजा तो अभी 2.5 हज़ार साल पहले ही शुरू हुई, बौद्धों या यूं कहें कि यूनानियों के कारण। असल में पूजा से मुराद यंहा उपासना से है, वैसे दोनों के अर्थ अलग अलग हैं।
सबसे पहले ये देखना होगा कि वेदों का जो अनुवाद हम पढ़ रहे हैं वो किस दृष्टिकोण से अनुवाद या भाष्य किया गया है। जैसे कि कर्मकांड, भाषीय, अध्यात्म या दार्शनिक आधार पर। हर प्रकार में वेदों के अर्थ थोड़े बदल जाते हैं बल्कि कर्मकांडी (सनातन धर्मी विद्वानों के) और भाषीय (आर्य समाजियों के) आधार के अनुवादों में तो बहुत ज़्यादा अंतर आ जाता है।
कर्मकांड वालों में प्रकृति पूजा या देव पूजा के उल्लेख भरे पड़े हैं। एकेश्वरवाद का भी कंही कंहीं उल्लेख है। जबकि भाषीय या निरुक्त आदि के आधार पर हुए भाष्यों में एकेश्वरवाद ही एकेश्वरवाद है और उन्होंने वेदों में आये सभी नामों को ईश्वर के ही गुणवाचक नाम बताए हैं। इस प्रकार से जिन प्राकृतिक चीजों या देवताओं के नाम वेदों में लिखे हैं, वो ईश्वर के गुणात्मक नाम बन जाते हैं। हालांकि इनमें से बहुत से नाम वाकई ईश्वर के गुणात्मक नाम हैं भी।
वेद की भाषा और शैली बहुत प्राचीन है और इसलिये बहुत जटिल भी। इसलिए इनके अनुवादों में भी अंतर आ जाता है। ईश्वर की धारणा वेदों में, वैदिक काल में, बाद में भी हमेशा से विद्मान रही है।
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सबसे
बड़ा जुर्म शिर्क क्यों?
सबसे
बड़ा जुर्म शिर्क क्यों है और इसकी सजा
हमेशा की जहन्नुम क्यों है? क्योंकि ये सबसे बड़ा झूठ और नाइंसाफी है. इस्लाम में अनंत काल की सजा बुरे कर्म नहीं बल्कि, ईमान न होने का दंड है। ईमान और अमल दो अलग बातें हैं। अपने मालिक से वफादारी ईमान है
अगर कोई कितने भी
अच्छे काम कर मगर वो दूसरे देश के लिए काम कर रहा है, जासूसी कर रहा है तो उसके
अच्छे काम भी nil हो
जाते हैं और उसे सजा मिलती है। देशद्रोह या गद्दारी की कठोरतम सजा है। उसके द्वारा किए जीवन भर किए गए अच्छे कर्म उसकी फांसी या उम्र कैद की सजा नहीं बचा सकते। इसलिए उसे तो सजा
मिलेगी या फिर सज़ा के बाद मुमकिन हुआ तो खुशगवार समय आने पर कुछ शर्तों के तहत वापिस deport
कर
दिया जाएगा। मुश्रीक भी गद्दार है क्योंकि वो उस एक मालिक के निजाम में है। इससे
फायदा उठाते हैं। उसे भी सजा मिलेगी। अगर किसी मुश्रीक के खुदा का कोई देश होता तो आखिरत में उसे भी वहा भेज दिया जाता पर ऐसा नहीं है। यानि ऐसा नहीं होगा कि जब नरक में जाओगे तो आपसे यह कह दिया जायगा कि जिसे आप अपना दाता मानते थे, आपको हमारे वाले नरक से उसके स्वर्ग में डेपोर्ट किया जा रहा है। क्योंकि एक ही नरक और स्वर्ग हैं। असल में जब कोई एक ही सर्वशक्तिशाली है तो उसके निजाम के
मुताबिक ही सजा मिलेगी।
मूर्ति माध्यम है?
हिन्दू
कहते हैं वो मूर्तियों को नहीं पूजते, बल्कि इनके माध्यम से उस
सर्वशक्तिमान को ही पूजते है। (यह माध्यम वाली बात फिजुल है,
न ऐसा उस पालनहार ने कही कहा है, न किसी ग्रन्थ में है और न ही ये natural
है)। हिन्दू यह भी कहते हैं कि जब अभ्यास हो जाता है तो निराकार पर चले
जाते है (मगर आज तक ऐसे किसी इंसान का example
नहीं दे पाए।)
क्या ईश्वर जड़ पदार्थ में है।
ईश्वर
न असंभुति में है और न संभूति में है। असंभुति, वह वस्तु है जो सृष्टि में
मनुष्य की उत्पत्ति से पहले ही निर्मित थी अर्थात सूर्य, पहाड़, पेड़ आदि।
और संभूति वह वस्तु है जिनका निर्माण मनुष्य ने असंभुति का ही प्रयोग कर के
किया अर्थात लकड़ी, धातु, पत्थर आदि से निर्मित वस्तुएँ। दोनों को पूजना
ईश्वर द्वारा प्रतिबंधित है।
अईश्वर न ठोस में है और न कठोर में। वह तो उस स्थान में विद्यमान होता है जो कोमल हो, नम्र हो, मृदु हो। वह तो मन में विराजता है।
ईश्वर
न काष्ट में अर्थात न लकड़ी में है, न पाषाण में अर्थात न पत्थर में है, न
मृण में अर्थात न मिट्टी में है। वह इनमें वास नही करता है। वह कंकड़,
चट्टान, पहाड़, धरती में भी वास नही करता है। वे तो भाव अर्थात मन में बसता
है, भावना में रहता है।
ईश्वर को मूर्त रूप में पूजना।
उसका
एक सत्य का न तो कोई आरम्भ है, न अंत (अनन्त), उसका न ही कोई आकार है
अर्थात रूप रंग या शरीर। वह सर्वव्यापी है मतलब पूरे ब्राह्मण का कण कण वो
देख रहा है, उस की दृष्टि से कुछ नही छुपा। उसका कोई रूप रंग शरीर, आकार,
प्रतिमा, मूर्ति, चित्र, आदि नही बनाया जा सकता। न सोचा जा सकता है क्योंकि
वो हमारी दृष्टि और समझ से बहुत बाहर का अस्त्तिव है। इसलिए उसे कोई
मूर्ति या चित्र या आकार न दिया जाए वो खुद कहता है। क्योंकि चित्र में
लगने वाले रंग, कागज़, कपड़ा आदि उसी का बनाया हुआ है, वह खुद नही है.
मूर्ति की मिट्टी उसकी बनाई हुई है, वो खुद मिट्टी नही है।
वंही
ईश्वर खुद अपने संदेशों में कह चुका है कि मेरा न आकर है न प्रतिमा न
तस्वीर। जब वो खूद कह रहा है है तो हम कौन होते है उस अपने चित्रों और
मूर्तियों में ढालने वाले? जबकि ये भी सत्य है की हम ने जब उसे देखा ही नही
तो हम उसे आपने शब्दों, चित्रों मूर्तियों में ढाल ही नही सकते। और देख भी
होता अगर तो भी उसके अस्त्तिव को मनुष्य अपनी सीमितताओं के चलते, कैद या
कैच कर ही नही सकता। सब प्रयत्न फैल है। हमने उसे रूप मनुष्य जैसा या किस
वस्तु जैसा देके उसके निर्देशों का उल्लंघन किया है। उसे पता है कि हम उसे
माप ही नही सकते इसलिए उसने मना किया हमें उसे आकार देने के लिए।
मैं
किसी बंदर को कंहु की अपने लिए एक भगवान या देवता बना लो तो यकीनन एक बंदर
जैसा देवता बनाएगा या उस चीज़ की तरह जो उसके देखी हो। तभी तो मनुष्य ने
ईश्वर को भी मनुष्य का रूप दे रखा है या उन वस्तओं का जो हमने देख रखी है
हमारे आस पास है जैसे पेड़, अग्नि, सांप जानवर आदि।
कहते
हूं कि आरम्भ में ध्यान केंद्रित करने के लिए मूर्तिपूजा का सहारा लिया
जाता। अच्छा मान लिया तो आज तक कोई नही मिला मुझे ये कहे कि वह अब परिपक्व
हो चुका है और इसलिए उसने पूर्तिपूजा छोड़ दी है। ऐसे कोई व्यक्ति नहीं हुआ
आज तक। मूर्तिपूजा भी दूसरी आदतों की तसह खून में बस जाती है।
हम
मुसलमान फिर तो पहले से ही परिपक्व है कि हमें ध्यान लगाने के लिए पूर्ति
की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। हम पहले ही ऊंची स्टेज में पहुंचे हुए है।
मूर्तिपूजा
सबसे पहले यूनान से शुरू हुई। फिर बौद्ध धर्म और जैन धर्म से होती हुई
भारत में आम जन की प्रथा बन गयी। अरबी भाषा मे बुद्ध को बूत कहते थे जिनकी
सबसे पहले बड़े पैमाने पर मूर्तिया बननी शुरू हुई थी उस समय।
अगर
ईश्वर कञ कञ में है तो फांसी दिए गए अपराधी में भी ईश्वर होना चाहिए।
पत्थर में ईश्वर है तो दो पत्थर को टकराओ तो क्या ईश्वर से ईश्वर टकरा
जाएगा। मूर्तिया तो बाद में आई, पत्थर तो पहले से था तो फिर ईश्वर मूर्ति
में नहीं पत्थर में हुआ। उसका रूप मानकर बनाई है तो उसका रूप कब कंहा
किसने कैसे देखा? भावनाओ से पत्थर में ईश्वर दिखता है तो फिर स्वामी दयानंद
कह के गए है कि मिट्टी को चीनी मानने से वो चीनी नहीं हो जाएगी। आर्य
समाजियो का मत है कि कञ कञ में ईश्वर है पर कञ कञ ईश्वर नहीं है।
महाभारत
काल से पतन शुरू हुआ और मूर्तिपूजा शुरू हुई। इससे पहले मूर्तिपूजा नहीं
थी। यूनान से शुरू और यंहा बौद्ध ने शुरू की, देखम देख जैन ने अपने
तीर्थंकरों की और फिर हिन्दुओ ने अपने महापुरुषों की जैसे शंकर, राम और
कृष्ण। इन्ही मूर्तियों को देखने के लिए मंदिर में रखा जाए लगा। कमरे में
अंधरे के कारण दीपक जलाना, सत्कार और दीर्घायु, विजय प्राप्ति और रक्षा के
लिए आरती और भेंट के बदले चढ़ावे शुरू हुए। मूर्तिपूजा कुछ लोगों की आय का
साधन बन गया।
जड़ मूर्ति हम बनाते है और चेतन मूर्ति हम है जो ईश्वर ने बनाई है। प्राण प्रतिष्ठा केवल ईश्वर कर सकता है जो वो हमारे साथ करता है।
पूजा
के कई अर्थ होते है जो वस्तु संबंधित अर्थों में प्रयोग होते है जैसे आदर,
सम्मान, सेवा, पालन करना, इच्छाओं को पूर्ण, योग्य व्यवहार करना, उपदेश
सुनना, वस्तु का उचित प्रयोग करना, सुधार हेतु दंड देना, शिक्षा लेना देना,
आपूर्ति करना और तृप्त करना आदि।
जड़
मूर्ति की पूजा से मतलब उसका सही प्रयोग करना है। जैसे पेट पूजा का मतलब
भूख मिटानी है। तुलसीपूजा का मतलब उसका औषधीय उपयोग करना है। गंगाजल पूजा
का मतलब उसका सेवन करना है। माता पिता की पूजा उनका सम्मान करना है। भगवान
की पूजा से मतलब उनका सम्मान और अनुसरण करने से है। महाभारत के अनुशासन
पर्व (13) के 145 अध्याय में मां बाप की पूजा करना उनका सत्कार, सम्मान,
आदर करने को बताया गया है।
उपासना
बना है शब्द उप (निकट) और आसन (बैठना) से और इसका अर्थ है समीप बैठना यानी
ईश्वर के समीप आ जाना। किसी वस्तु के समीप आने पर उस वस्तु के गुण हमें
अनुभव होने लगते है और हम में भी पैदा होने लगते है। आग या बर्फ के पास
बैठने से ऐसा ही होता है। वेदों में यही शब्द प्रयोग हुआ है। रामायण महाभरत
पुराणों आदि में श्रीराम और श्रीकृष्ण द्वारा की जाने वाली आराधना के लिए
संध्या शब्द भी प्रयोग हुआ है।
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