मुक्ति, निर्वाण, फलाह, निजात, साल्वेशन शब्दों के अर्थो में थोडा अंतर है. सनातन धर्म में मुक्ति के 3 मार्ग बातए गए है। भक्ति, ज्ञान और कर्म। इनमें से किसी एक पर भी मार्ग पर चलकर मुक्ति, मोक्ष या निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है। इस्लाम धर्म में इन 3 चीजों को जोड़कर बनने वाले रास्ते को निजात, फलाह या सेलवेशन का तरीका कहा गया है। जिन्हें अरबी में तौहीद, रिसालत और आख़िरत कहा गया।
1. भक्ति यानी तौहीद (केवल एक निराकर ईश्वर या ब्रहम की उपासना करना).
2. कर्म यानी आख़िरत (धर्मानुसार अच्छे कर्म करना और बुरे कर्मों से बचना क्योंकि महाप्रलय के बाद अंतिम दिन सभी का कर्मों के आधार पर निर्णय होगा। पापियों को नरक में डाला जाएगा और पुण्यकारियों को स्वर्गे में भेजा जाएगा।)
3. ज्ञान यानी रिसालत (ज्ञान की साधना या माध्यम से। ईश्वर के भेजें ईशदूत, संदेष्टा या संदेशवाहकों द्वारा दिए गए आदेशों और शिक्षाओं का अनुसरण करना).
भक्तिमार्ग:
1. जब निष्पक्ष और तटस्थ भाव से कोई इंसान अपने आप के बारे में और पृथ्वी पर मौजूद तमान चीज़ों और इस असीमिति युनिवेर्स के बारे में तुलनात्मक रूप से सोचता है तो उसे एहसास हो जाता है कि वो इस कायानात में कुछ भी नहीं है, एक ज़र्रा भर भी नहीं है. वो समझ जाता है कि वो खुद और हर चीज़ एक रचना मात्र है. रचना और रचियिता दोनों एक डोर के दो सिरे है. यह बात प्राकृतिक है और यह हमारे अंदर रखी गयी है.
2. दुनिया में बहुत सी चीजें ऐसी हैं जिनका नाम लेने से ही ज़ेहन में चाह और मुंह में पानी आ जाता है। जैसे कोई मिठाई या ठंडा शरबत या बढ़िया पकवान। फ़िर ये कैसे हो सकता है कि पूरी क़ायनात के मालिक का नाम लिया जाए और जिस्म-रूह पर उसका नाम लेने से कोई असर न हो। यक़ीनन उसका नाम लेने में भी बहुत बरक़त है।
3. कहते है कि दुनिया की खूबसूरत हक़ीक़तें, आंखों से नहीं बल्कि दिल से महसूस की जाती हैं। फ़िर मुझे वो याद आया, वो तो सबसे बड़ी हकीकत है, वो सबसे खूबसूरत है और वो भी दिखाई नहीं देता। तो फिर उसे भी आखों से नहीं बल्कि दिल से महसूस किया जायगा.
4. ईश्वर हम सब में है और नहीं भी है। वो यंहा है भी और नहीं भी। ढूंढोगे तो मिल जायेगा और नहीं ढूंढोंगे तो नहीं मिल पायेगा. वैसे ही जैसे बहुत से लोग अपने पुरे व्यस्त जीवन में लाखों लोगों से मिल लेते हैं मगर कभी अपने आप से नहीं मिल पाते.
कर्ममार्ग:
5. इसी तरह हर इन्सान के मन में अच्छाई और बुराई की मूलभूत भावना भी मौजूद रहती है. बस अक्सर उस भावना पर इंसान स्वार्थ का पर्दा पड़ जाता है. इसका सबसे बड़ा सबूत यह है की जब किसी इन्सान के साथ कोई दूसरा बुरा करत है तो उसे दुःख होता है और जब उसके साथ कोई अच्छा करता है तो उसे ख़ुशी होती है. ये दुःख सुख अच्छे बुरे की भावना इन्सान की व्यक्तित्व का हिस्सा हैं. यह बात भी प्राकृतिक है. यह भी हमारे अंदर रखी गयी है.
6. वो परमात्मा हमसे सिर्फ अपनी भक्ति नहीं करवाना चाहता. अगर वो हमसे सिर्फ भक्ति चाहता तो हमें लोगों के समुह में नहीं बल्कि अकेले किसी जंगल में रहने के लिए भेजता. उसने इन्सान को समाज में भेजा. वो चाहता है हम अपने अंदर उसके गुण जैसे करुणा, दया, न्याय आदि पैदा करें और आस पास वालों के साथ अच्छा व्यवहार करें। असली परीक्षा तो लोगों के बीच रहकर अपना संयम बनाये रखना और अच्छे काम करते चले जाना है।
7. सुना है कि ख़्वाब धोखा नहीं बल्कि एक छोटी हक़ीक़त होते है। क्योंकि ख़्वाब के मुताबिक़ हमारा जिस्म और ज़हन रिस्पॉन्स कर रहा होता है। ख़्वाब से जागने के बाद एहसास होता है कि यह ज़िंदगी बड़ी हक़ीक़त है। जब छोटी से बड़ी हक़ीक़त में आते है तो पिछली के छोटे होने का एहसास होता है। इस दुनिया के बाद जब उस दुनिया में आंख खुलेगी तो एहसास होगा कि यह यंहा की हक़ीक़त पिछली सारी हक़ीक़तों से बड़ी है। ख़्वाब के मुक़ाबले, दुनिया बड़ी हक़ीक़त है और दुनिया के मुक़ाबले, आख़िरत यानि परलोक.
8. जब माँ के पेट के अंदर फीटस में प्राण, नफस या आत्म, रूह आती है. उसे लगता है कि बस यही उसकी दुनिया है मगर उसे जन्म लेने बाद में एहसास होता है की बाहर भी एक बहुत बड़ी दुनिया है और ये उसे पैदा करने वाली एक मां है. ऐसे ही लोगों को भी अक्सर यही लगता कि बस यही दुनिया जबकि दुबारा जन्म लेने पर एक और दुनिया हमारा इंतज़ार कर रही है और बनाने वाला भी।
9. खैर, बच्चा पैदा होता है, बड़ा होता है, बुढा होता है और मर जात है. इसी धरती के तत्वों से बना इन्सान का जिस्म इस धरती के तत्वों में वापिस मिल जाता है, चाहे दफनाये या जलाये. इसी तरत जो आत्मा शरीर में आई थी, उसे भी तो वापिस वंहा जाना चाहिए जंहा से वो आई थी. आत्मा भी उस परम आत्मा यानी परमात्मा से मिलने जायगी.
ज्ञानमार्ग:
10. लगभग हर धर्म में बुराई को ख़तम करने और अच्छाई को फ़ैलाने के लिए और नया बदलाव लाने के लिए किसी के आने की भविष्यवाणी, उनके ग्रन्थ करते हैं. मुस्लमान कहते हैं की मेहदी और ईसा आयंगे. इसाई भी जीसस या यीशु के दुबारा धरती पर आने में आस्था रखते हैं. यहूदी भी अपने मसीहा के आने के इंतज़ार में हैं. पारसी भी सोश्यांत के आने में यकीन रखते हैं. हिन्दू कहते हैं की कल्कि अवतार आयेगे. बोद्ध धर्म में 29 बुद्ध मैत्री बुद्धा आने की बात कही जाती है. जैन धर्म में हर टाइम साइकिल में तीर्थंकरों के वापिस आने की धारणा आम है.
11. इस बारे में इन धर्मों के अनुयायियों में 3 विश्वास मिलते हैं. पहली कि ये आयेगें जो टेक्स्ट बेस्ड व्यू है। दूसरी कि ये तो आ कर जा भी चुके जो की हिस्टोरिकल व्यू हैं। और तीसरी है कि ये नहीं आयंगे, ये एस्तिमेशन बेस्ड व्यू है.
12. लोग इन तीनो में से कुछ भी माने मगर एक बात सभी सामान मानते हैं कि वो आ कर सत्य, अच्छाई, सफलता का मार्ग दिखायंग। ये वही मार्ग है जो उनसे पहले आये पैगम्बर, अवतार, दूत आदि लोगों को दिखा चुके हैं. किसी भी धर्म वाले से पूछिए तो वो कहेगा कि यह मार्ग तो हमारे धर्म में बताया गया है और हमें मालूम है. कोई कहेगा ये तो श्री कृष्ण, श्री राम ने दिखाया, कोई कहेगा मोज़ेस, ईसा मसीह, मुहम्मद साहब ने दिखाया, कोई कहेगा तथागत बुद्ध, महावीर स्वामी ने दिखाया। अगर ऐसा है तो फिर किसी के आने का इंतज़ार क्यों करना, जिनको जब आना है वो तब आएंगे. मगर फ़िलहाल हमारी जिम्मेदारी यह है की हमें तो बस अपने धार्मिक मार्गदर्शक, महापुरुष के पिछले दिखाए और बताए गए मार्ग पर चलना है जिन पर वो खुद चल कर गए हैं. और हम चाहे किसी भी धर्म के हो इन सभी महापुरुषों की उन शक्षाओं को तो मान ही सकते हैं जो कॉमन है और जो अच्छी हैं।
13. बच्चो से अक्सर पूछते हैं कि बड़ा हो कर क्या बनना चाहते हो। या तो वो किसी आइडियल का नाम लेगा या किसी प्रोफेशन या फील्ड का। इसका मतलब होता है कि ये हमारे अंदर मौजूद है कि हम बड़े या महान लोगों को फॉलो करते हैं, उन्हें रोल मॉडल, आइडियल मानके बेहतर काम करते हैं। पहाड़ों, जंगल में रास्ते पर चलने से आसान होता है उस रास्ते पर चलना जिस पर पहले ही कई लोग जा चुके हैं और वंहा चलने लायक रास्ता बना चुके है। नए रास्तों पर खोने का डर भी होता है। फिर भी कोई अपना रास्ता खुद बनाना चाहे तो उसे मनाही नहीं है। मगर हर आदमी के पास इतना समय, सामर्थ्य नहीं होता इसलिय आम आदमी के लिए आसानी भी होनी चाहिए।
14. मुहम्मद साहब ने ये नहीं कहा कि वो ईश्वर के भेजे प्रथम दूत है बल्कि कहा कि उनसे पहले कई आये हैं और यही संदश लाये हैं बस उनके जाने के बाद लोग उसमे मिलावट करके बिगाड़ पैदा कर देते थे। कुछ के उन्होंने नाम बता दीया जैसे ईसा, मोसेस, अब्राहिम आदि। क़ुरान ने कहा ईश्वर ने हर समय, क्षेत्र, समुदाय में अपना संदेश और संदेश देने वाले भेजे हैं। इस्लाम कहता कि किसी के पूज्यों को बुरा न कहो और किसी भी धर्म के महापुरुष को बुरा न कहो क्योंकी शायद वो भी उसके भेजे हुए महापुरुष रहे हो।
15. सही ज्ञान के बिना भक्ति वैसे ही है जैसे सही भावना के बिना किये गए कर्म।
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मुक्ति
मुक्ति, नजात का मतलब है किसी परेशानी से बचना। जैसे कोई ट्रेफिक से बच कर रोड बदल लेता है तो यह ट्रैफिक से नजात मिलना हुईमगर मंजिल पर अभी नहीं पहुंचे हैं। इस्लाम फलाह की बात करता है। फलह का मतलब है कामयाबी यानि मंजिल तक पहुँच जाना।
ईसाइयों में अकीदा है कि इंसान जन्नत से ही पाप करके आया और ये पाप सभी को भोगना पड़ेगा। इसलिए खुदा के बेटे ईसा ने खुद पर पर ज़ुल्म सह कर सबको इस पाप मुक्ति दिला दी। यही है original sin से salvation पाना। हिन्दू धर्म में आवागमन से छुटकारा पाना मुक्ति है। बोद्ध धर्म में दुख से मुक्त होना निर्वाण है। जैन धर्म में हर मुक्त हो जाने वाली आत्मा ईश्वर है।मोक्ष, मुक्ति, निर्वाण, निजात, फलाह–का मतलब किसी परेशानी में फंसने पर बाहर निकलना। ईसाइयत में माना जाता है की एडम ईव ने गलती कर और वो गलती inherit होते होते हर बच्चा गुनहगार पैदा हो रहा है। इससे मुक्ति के लिए ईश्वर का बेटा सलीब चढ़ कर गया और सबके पाप अपने ऊपर ले गए। सबकी मुक्ति हो गई। नूह को सैलाब से बचाया गया और इससे मुक्ति हो गई। बोद्धधर्म में दुख से शुरुवात होती है और इस दुख से निवारण ही मुक्ति है। हिन्दूधर्म में बार बार जन्म लेने से मुक्ति मांगते है। इस्लाम में निजात नहीं, फलाह की बात करता है यानि कामयाबी की। फलह लफ़्ज़ बना है फललह से जिसका मतलब है किसान। क्योंकि किसान खेती में लंबे वक्त में लगे रहता है और इस मेहनत का फल उसे कटाई के बाद मिलता है। यही उसकी कामयाबी होती है।
मौत का मतलब खात्मा नहीं है, मौत का मतलब है एक ज़िंदगी से दूसरि ज़िंदगी में दाखिल होना है।
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बुद्ध, जैन मत इंसानी फितरत के खिलाफ जा कर निर्वाण हासिल करना चाहता है। निर्वाण इस जीवन, दुखों, इच्छाओं से। जबकि फितरत के तक़ाज़ों को अंजान देते हुए, फलाह पाना अब्राहिमिक धर्मो का सार है। जब एक इंसान अकेले में निर्वाण हासिल करने निकलता है तो उसके पास न परिवार, न रिश्तें होते, न रोज़मर्रा की परेशानियां, न सामाजिक लेन देन। इसलिए उसकी ज़्यादा समस्या तो आम जीवन की गायब ही ही गई। इसलीए उसे दुखों से दूर हो चूकना मसहूस होता है।
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