Tuesday, 30 April 2024

रोज़ा और उपवास

 


[ब्रह्म - ईश्वर के प्रति व्रत रखो]
व्रतं कृणुताग्निर्ब्रह्माग्निर्यज्ञो ।   
हे यजमानों, ब्रह्म के प्रति व्रत का पालन करो।
(यजुर्वेद :4 : 11)   

[ख़ुदा - ईश्वर के अनुसार रोज़े रखो]
...कुतिबा अलैकुमुस्सियामु...।
हे आस्थावानों, तुम पर रोज़े अनिवार्य किए गए हैं जैसे तुम से पहले के लोगों पर किए गए थे।
(क़ुरान :2 : 183)

[नवरात्रि]
व्रतं कृणुत ।   
व्रत का पालन करो।
(यजुर्वेद :4 : 11)   

[रमज़ान]
कुतिब अलैकुमुस्सियामु ।
तुम पर रोज़े अनिवार्य किए गए हैं।
(क़ुरान : 2 : 183


रोज़ा फ़ारसी लफ्ज़ है, जो लफ्ज़ रोज़ (दैनिक) से बना है। अरबी में रोज़े को सौम कहते हैं जिसका मतलब है रुक जाना या रोक लेना। यानी खुद को उन बातों से रोक लेना जिनकी इंसान को मनाही करी गयी है (सभी बुराइयां वगैरह)। आम दिनों में भी यह मनाहियां लागू होती है मगर साथी ही रमज़ान में खाने पीने संबंधित पाबंदीयां भी लागू हो जाती है। क़ुरान कहता है रोज़े से तक़वा पैदा होता है और तक़वे के मायने है परहेज़ करना है यानी ईश्वर की नाफरमानी करने से परहेज़ करना। रोज़ो से अल्लाह का कुरब भी हासिल होता है यानी ईश्वर की निकटता।

उपवास का अर्थ है ईश्वर के निकट वास करना (रहना)। जबकि उपासना का अर्थ है ईश्वर के निकट आसान करना (बैठना)। रहना या ठहरना हमेशा बैठने से अधिक समय के लिए होता है इसीलिये उपासना थोड़ी देर के लिए की जाती है और उपवास पूरे दिन के लिए। व्रत का अर्थ होता है संकल्प, प्रण, प्रतिज्ञा करना। ऐसे संकल्पों में एक संकल्प उपवास रखना भी हो सकता है और आंशिक समय या कुछ शर्तों के साथ रखे गए छोटे उपवासों को इसीलिए व्रत भी कहते हैं।

उपवास या रोज़ो से मनुष्यों में धर्म और आत्मन संबधित गुणों के पैदा होने के अलावा, शारीरिक और मानसिक तौर पर होने वाले लाभ अलग हैं, जिन्हें विज्ञान आज सिध्द कर चुका है बल्कि भूखे रहने पर शरीर में शूरू होने वाले लाभदायक सेल Regeneration and Maintenance प्रोसेस Autophagy पर रिसर्च करने के लिए Japanese Scientist Yoshinori Ohsumi को 2016 में Nobel Prize in Medicine भी मिल चुका है। दुनिया के कई अन्य धर्मों जैसे ईसाइयत, जुडाइज़्म, बौद्ध, जैन आदि में उपवास रखने की प्रबल धारणा मौजूद है।  

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उपवास, व्रत, उपासना, पूजा का अर्थ।


उपावास का अर्थ है निकत रहना। यह शब्द उप यानी पास, निकट और वास यानी रहना से बना है। वास सदैव अधिक समय के लिए होता है। ईश्वर की कुर्बत या निकटता प्राप्त करना ही उपवास रखने का उद्देश्य है।

व्रत का अर्थ है धारण, प्रतिज्ञा, संकल्प आदि करना है। व्यवहारिक तौर पर खान पान के रिलैक्स्ड नियमों के साथ किये गए उपवास को व्रत कहते हैं। व्रत का अर्थ बार बार घुमके आने वाला भी है। स्पष्ट है कि व्रत हर वर्ष आते हैं।

उपासना का अर्थ है, निकट आसान करना यानी बैठना। बैठना थोड़े समय के लिए होता है।

पूजा का अर्थ है उचित व्यवहार या सत्कार, सम्मान आदि करना। इसका अर्थ उपासना नहीं होता जैसा आम तौर पर समझा जाता है। 

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वैदिक ग्रंथों में व्रत और उपवास

सामान्यता वैदिक काल को दो भागों में बांटा जाता है। एक प्रारम्भिक वैदिक काल (लगभग 1500-1000 ईसापूर्व) जिसमें चारों वेदों की रचना हुई और दूसरा उत्तर वैदिक काल (लगभग 1000-500 ईसापूर्व) जिसमें पहले आरण्यक फिर ब्राह्मण ग्रंथों और फिर उपनिषदों की रचना हुई। 

■ व्रत शब्द उपवास से प्राचीन है। शास्त्रों के अनुसार उपवास का अर्थ है, निकट वास करना (रहना)। जबकि उपासना का अर्थ है, निकट आसान करना (बैठना)। रहना या ठहरना हमेशा बैठने से अधिक समय के लिए होता है इसीलिये उपासना थोड़ी समय के लिए की जाती है और उपवास लंबे समय के लिए। कालांतर में धार्मिक संकल्प हेतु अन्न त्याग करने के कर्म को उपवास कहा जाने लगा। इसी तरह प्राचीन ग्रंथों में व्रत का मूल अर्थ है संकल्प प्रण, प्रतिज्ञा करना। परन्तु बाद में सीमित प्रकृति के उपवासों को व्रत भी कहा जाने लगा क्योंकि वे भी संकल्प ही तो होते हैं।

■ वेदों में व्रत शब्द आया है परन्तु वंहा इसका अर्थ स्पष्ट रूप से उपवास नही है। वेदों में व्रत का अर्थ कोई भी संकल्प लेने से है, धार्मिक या भक्ति के आधार पर। आर्य समाजी इसके यही अर्थ लेते हैं। आम हिन्दू व्रत से उपवास रखना भी अर्थ लेते हैं क्योंकि व्रत रूपी संकल्प में अन्न त्यागना भी आता है। शतपथ ब्राह्मण में व्रत की प्रक्रिया में उपवास अंग बताया गया है। इसीलिए बाद में व्रत और उपवास को समानंतर ही माना जाने लगा। हालांकि निरुक्त में यास्क मुनि ने व्रत के दोनों अर्थ लिखें है, निवृत्ति (रोकना) और अन्न (2/14)।

यजुर्वेद 4:11 में अग्नि को ब्रह्म और ब्रह्म को अग्नि मानने का व्रत (संकल्प) करने को कहा गया है। यजुर्वेद 1:5 में भी व्रत का उल्लेख संकल्प के रूप में है। यजुर्वेद 19:30 में भी इसका यही अर्थ है (कुछ भाष्यों में संदर्भ संख्या अलग)।

■ वेदों में उपवास शब्द नहीं है और न ही किसी मंत्र से स्पष्ट रूप से अन्न त्याग करके भक्ति करने का ज्ञान होता है। इसलिए आर्य समाजी उपवास को पूर्णतया भूखे रहने की बजाय शरीर, मन को शुद्ध रखने के लिए कुछ अनुचित खाद्य को त्यागने को उपवास कहते हैं। शतपथ ब्राह्मण अनुसार इनका मत है कि किसी व्रत रूपी संकल्प किये व्यक्ति के घर पर सत्संग करवाना उपवास कहलाता था जब इस दौरान गृहस्ती को निराहार रहना पड़ता था और विद्वानों के आहार के बाद ही खाना होता था।

आरण्यक, ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों में यह शब्द प्रयोग हुआ है। कुछ स्थानों पर इस शब्द के प्रयोग से भोजन त्याग, नियंत्रित या कम करके तप, भक्ति करने के अर्थ निकलते हैं। परन्तु अधिकांश जगह स्पष्ट रूप से वंहा इसके अर्थ या व्याख्या नहीं दी गई है, इसलिए इस शब्द के अर्थ पर भिन्न मत हैं। हालांकि जिन श्लोक में उपवास शब्द आया है, वंहा से इसके सामान्य व प्रचलित अर्थ सही बैठते हैं। वैसे भी यह आवश्यक नहीं है कि ग्रंथों में उन शब्दों या क्रियाओं के अर्थ या व्याख्या खुलकर समझाई जाए जो आम जन में व्यवहारिक रूप से पहले से व्याप्त है। उपवास से आम सनातनी विद्वान अन्न त्याग कर भक्ति करने के ही अर्थ सदा से लेते आये हैं। वे वैदिक शब्द तप, संयम जैसे शब्दो से प्रसंग अनुसार उपवास अर्थ भी लेते हैं। इनके बाद के काल या ग्रंथों (स्मृतियां, पुराण आदि) में इस शब्द का अन्न त्याग के अर्थों में अविवादित रूप से आया है। पौराणिक या परंपरावादी विद्वानों में उपवास (अन्न त्याग) की धारणा बेहद प्रबल रूप से विद्यमान है।

■ शतपथ ब्राह्मण 1:1:1:6-9 में बताया गया है कि एक गृहस्थ व्यक्ति व्रत में भूखा रहे या न के बराबर ही खाये। किसी व्रत को करने पर अगले दिन यज्ञ करना होता है जिसके पश्चात व्रत समाप्त होता है। उसे यज्ञ तक कुछ भी ग्रहण करना नहीं चाहिए क्योंकि देवों के खाने से पूर्व स्वयं कुछ खाना अनुचित है। उसके व्रत के कारण देवता उसके घर में आ कर उपवास (ठहरते) करते है और इसलिए इसको उपवसथ (उपवास का दिन) कहा जाता है। 
[यंहा पर स्पष्ट है कि उपवास का समय उस गृहस्त के लिए भूखा रहने का समय है।]


 

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