दीन में हज या ज़ियारत की क्या ज़रूरत है? क्या है गैरों की तरह तीर्थस्थल पर जाना, उनकी तरह रसुमात निभाना नहीं है? नमाज़, रोज़े, ज़कात के फायदे तो वाज़ेह हैं मगर हज के क्यों नहीं हो पाते?
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इंसान अपनी चीजों, पहचान, प्रतीकों, बुनियाद, जड़ो, परम्पराओं आदि से बहुत ज़्यादा जुड़ाव, लगाव, अपनापन महसूस करता है। ये एक प्राकृतिक गुण है जो इंसानों में आम तौर पर पाया जाता है। इसलिये ऐसी भावुकता और संबध, इंसानों के द्वारा हर क्षेत्र में प्रदर्शित होती है। ऐसी चीज़ें इंसान की असल बुनियादें होती हैं और बुनियादों से मोहब्बत महसूस करना इंसानी फितरत है। ऐसी बुनियादों, परंपराओं, धरोहरों से जुड़ा रहना एक इंसानी ज़रूरत भी है क्योंकि इंसान सिर्फ जिस्म ही नहीं बल्कि जज़्बातों का पुतला भी है। इंसान को अपने भावुक पहलुओं की पूर्ति करने की ज़रूरत होती है वर्ना एक कमी, खला इंसान में बाकी रहती है। आम तौर पर ऐसी चीज़ें इंसान पर गहरा रूहानी और जज़्बाती असर डालती हैं।
ऐसी चीजों से हर इंसान एक सा ही महसूस करें ये ज़रूरी नहीं, कुछ में ये भावना कम महसूस हो सकती है, जिसकी कई वजह हो सकती हैं। शायद सभी को वंहा ऐसी अनुभूति न हो, मगर बहुतों को होती हैं।
ऐसा ही अनुभव इंसान को परंपरागत रसुमात, तहज़ीबी रिवाजों, धार्मिक रीतियों को निभाते हुए भी होता है। इनसे इंसान को उन चीजों से जुड़े होने का, अपनेपन का, लगाव होने का महसूस होता है। ये चीज़ें उसकी बुनियादीफितरत या ज़ुरूरतों को पूरा करती हैं।
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प्रत्येक संस्था, आंदोलन, विचारधारा (धर्म का भी) का एक केंद्र होता है जंहा से वो पूरा सिस्टम जुड़ा होता है या चलाया जाता है या जहाँ से वो शुरू हुआ होता है। अक्सर ये केंद्र उस जगह होते हैं जंहा पर उस विशेष संस्था के संस्थापक रहे होते हैं या उस विचारधारा का सबसे बड़ा गढ़ होता है। अगर ऐसा कोई केंद्र ने हो तो ऐसे संस्थान शक्ति, प्रेरणा, सामूहिक एकता आदि का अभाव महसूस करते हैं और जल्दी बिखर भी सकते हैं। इनके कार्यकर्ता, अनुयायी, भक्त आदि उस केंद्र से जुड़ाव, लगाव रखते हैं बल्कि केंद्र से जुड़े रहने के लिए प्रयासरत रहते हैं और वंहा अक्सर आते जाते भी रहते हैं। जैसे किसी राजनैतिक पार्टी के कार्यकर्ता अपने मुख्यालय या हाई कमान के घर के प्रति भी यही भाव और व्यवहार रखते हैं।
बल्कि पार्टी के सबसे बड़े नेता या संस्थापक, सूत्रधारक जैसे गांधी, सावरकर, लेनिन आदि से सम्बंधित स्थानों, प्रतीकों, धरोहरों के प्रति भी ऐसी ही आस्था रखते हैं।
बच्चें अपने माता पिता, दादा दादी आदि के ज़ाती सामानों, पुराने घरों या शहरों या देशों से भी ऐसा ही लगाव और चाह रखते हैं। उन समान को संजोना और उन जगहों पर जाना पसंद करते हैं बल्कि बहुत से लोग तो उन जगह को बेचते नहीं हैं। माइग्रेशन करने वाले लोग अक्सर अपने पुराने स्थानों पर घूमने जाना बेहद पसंद करते हैं। बहुत से फिल्मी स्टार्स पाकिस्तान में अपने पुराने घरों, गलियों में जाना अपनी ज़िंदगी की आखिरी ख्वाहिश बताते हैं। यही हाल उनका भी है जो बहुत पहले दूसरे देशों में जा कर बस गए थे। उनकी नई पीढ़ी वंही पैदा हुई, वंहा के माहौल में पली, आज के फ़ास्ट लाईफ़स्टाइल के प्रभाव में बढ़ी हुई है। उन्होंने उस भाव से अपने बुजुर्गों या उनकी बुनियादों सेअधिक लगाव महसूस ही नहीं किया। इसलिए अक्सर उनमें अपने बढ़ो और अपनी जड़ों के प्रति वो भावना पैदा नहीं हो पाती है। जबकि शहरों में गांव देहात छोड़कर आये लोग, आज भी अपने मूल स्थानों से जुड़े रहते हैं।
इसी तरह जो लोग इतिहास पढ़ते, पढ़ाते हैं, इतिहास के जानकर होते है, जो लोग पुरात्तव विज्ञान, एंथ्रोपोलॉजी आदि से जुड़े हुए हैं, वो भी पुराने स्थानों, पुरानी चीजों आदि से बेहद जुड़ाव, लगाव रखते हैं। अक्सर ऐसे लोग जब किसी ऐसे स्थान पर जाते हैं जिसके बारे में बहुत पढ़ा, सुना था तो वंहा जा कर वो अनुभव करते हैं कि जैसे उनका जीवन सफल हो गया। वो हर चीज को गौर से देखते हैं, चप्पा चप्पा घूमते हैं, लंबा समय वंहा बिताते हैं, उनसे जुड़ी चीजों को याद करते हैं। उनके लिए ये विज़िट एक शानदार तजुर्बा बन जाता है। ऐसी विज़िट उनके दिलों दिमागों में इतना ज़्यादा असर डालती है कि वो लोग इसे ज़िंदगी भर याद रखते हैं बल्कि यंहा हुए एहसासात को बयान भी करते हैं। प्रसिद्ध आर्कियोलॉजीसट के.के मुहम्मद ने एक बार कहा था कि जब भी वो आगरा के किले में जाते हैं तो उन स्थानों पर समय बिताते हैं जंहा बादशाह अकबर समय बिताया करता था और जिन पगडंडियों पर अकबर चला करता था, उन पर चलकर उन्हें ऐसा लगता है जैसे कि वो भी अकबर के साथ चल रहे हैं।
यंहा तक कि बच्चों और नवयुवक स्टूडेंट्स को भी ज़ू, म्यूज़ियम, हिस्टोरिकल प्लेसेज का दौरा करवाया जाता है ताकि उन्होंने जो पढ़ा, सुना है, उसे वो हकीकत में भी एक्सपीरिएंस कर सकें।
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इस्लाम धर्म में मक्का शुरवात से ही एक केंद्र रहा है। अनेकों पैगम्बर इस जगह से जुड़े रहे हैं। इब्राहिम अलैह. के बाद तो यंहा से एक गहरा ताल्लुक बन गया था। उनकी परम्परा को मुहम्मद सल्ल. ने आगे बढ़ाया। इसमें हज भी शामिल है। इस्लाम के आखिरी नबी की पूरी ज़िंदगी मक्का, मदीना से जुड़ी रही है। हम उनके अनुयायी और उम्मत हैं। तमाम अम्बिया हमारे लीडर, रोल मॉडल हैं। उनसे जुड़े काम, चीज़ें, परम्परा, स्थान, पहलू हमारे लिए एक याददिहानी है, अलार्म, असाधारण तजुर्बा और इतिहास में टाइम मशीन विज़िट हैं।
नबी की ज़िंदगी, हर कार्य हमारे लिए एक प्रेरणा है, जिससे रोज़ हमें सीखना है। इस सीख के लिए, इंसानी जज़्बातो की पूर्ति के लिए हमें एक ट्रेनिंग, ओरिएंटेशन करने की ज़रूरत होती है। इस क्रेश कोर्स के लिए ही हज, उमराह पर जाते हैं। ऐसे कोर्स हर संस्था, कंपनी अपने स्टाफ, वालंटियर्स को साल में अक्सर करवाती रहती है और उनकी स्किल अपग्रेड करती रहती है बल्कि इसके लिए उन्हें दूसरे शहरों, देशों में भी भेजती हैं।
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हालांकि हज, उमराह संबंधित अरकान अदा करते हुए शिद्दत इख्तियार नहीं करनी चाहिए और ओवर इमोशनल हो कर चीजों को ऐसे अदा नहीं करना चाहिए कि दूसरों को तकलीफ हो या खुद हंसी का पात्र बन जाओ। ऐसा करने वालों को हज, उमराह से मिलने वाली रूहानी ताकत और फितरती ज़रूरतें पूरी नहीं होगी बल्कि ये सिर्फ खोखली प्रैक्टिस बन कर रह जायेगी। जैसे आज मुस्लिम नमाज़, रोज़े ज़कात के साथ कर रहे हैं। इन सभी इबादतों की हकीकत मुसलमानों की अक्सरियत खो चुकी है। जैसे क़ुरान को भी सिर्फ अरबी में पढ़ने तक सीमित कर दिया गया है।
क़ुरान में बताए गए इन इबादतों के नतीजे अगर उन लोगो में दिखाई नहीं दे रहे जो इन्हें अंजाम दे रहे हैं तो ऐसे तमाम लोगों को सोचने की ज़रूरत है उनसे कंहा पर कमी रह रही है।
इसलिए हर धर्म में रीति रिवाज़ों, रसुमात, परम्परा आदि का एक विशेष भाग अवश्य होता है। इनके पीछे की सच्चाई जानने की और इनसे होने वाले फायदों की निष्पक्ष जांच अवश्य करनी चाहिए।
बाकी ज़ियारत के अरकानों के उद्देश्य, रीजनिंग की कुरानिक डिटेल अलग हैं। साल में एक बार क्यों, अमीरों पर ही फ़र्ज़ क्यों, क़ुरान के अनुसार इससे क्या हासिल होता है, जैसे सवालों पर कभी और बात करंगे। यंहा अभी ज़्यादातर दुनियावी लिहाज़ से बात रखी गयी है की ज़ियारत की ज़रूरत क्या हो सकती है।
■ कुरान में जहा भी हज का जिक्र है, वहा दुनिया के लोगों का जिक्र है। (अननास: दुनिया के लोगों)। दुनिया के लोगों में ऐलान कर दो। जहा काबे का हज का जिक्र है।
Purpose of Hajj: Quran (22:27-28) says Proclaim to mankind, the pilgrim. They will come to you on foot and on camel. That they may witness for them and mention the name of Allah. On days known over what he has provided them o beast cattle.
Purpose of Hajj: Quran (22:27-28) says Proclaim to mankind, the pilgrim. They will come to you on foot and on camel. That they may witness for them and mention the name of Allah. On days known over what he has provided them o beast cattle.
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