सबसे बड़ा धर्म इंसानियत है या सभी धर्म समान है, ऐसा कहना या मानना कितना उचित है?
किसी अंतर्धार्मिक सभा में छोटे से भाषण के दौरान या फिर किसी अजनबी गैर धर्म के अनुयायी के साथ थोड़ी सी बातचीत के दौरान, ये कहना कि सबसे बड़ा धर्म इंसानियत है या सभी धर्म समान है, या इसका समर्थन करना, क्या नाजायज़ है?
■ सबसे बड़ा धर्म या मज़हब इंसानियत है। ऐसा कहने वाले अक्सर दो तरह के लोग होते हैं, पहले आस्तिक और दूसरे नास्तिक।
● अगर कोई आस्तिक या कोई मुस्लिम या हिन्दू, ऐसी बात कहता है तो हमें समझ लेना चाहिए कि..
इस्लाम में हर अमल का दारोमदार नियत पर है। हर चीज़ पर जब हमारी पकड़ होगी तो उसमें हमारी नियतें सबसे अहम रोल निभाएंगी। किसी पर कोई हुक्म लगाने, फतवा देने या किसी को जज करने से पहले ठोस सबूतों को बुनियाद बनाने की बात भी इस्लाम करता है। इसलिये किसी के मुंह से कोई असामान्य जुमला सुनने के बाद, उस शख्स या उस जुमले के ऊपर कोई सख्त फैसला लेने से पहले कही गयी बात का मौका, मेहल या कॉन्टेक्स्ट अच्छी तरह जान लेना चाहिए।
पहली बात, धर्म के मायने सिर्फ दीन के नहीं होते, धर्म व्यक्तिगत कर्तव्य को भी कहा जाता है जैसे अहिँसा परमो धर्म या जैसे गीता में श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को ये बताना कि युद्ध ही उसका धर्म है। इसी तरह मज़हब लफ्ज़ भी सिर्फ दीन के लिए ही नहीं बल्कि पंथ, मत वगैरह के लिए भी इस्तेमाल होता है। दरअसल आस्तिकों द्वारा ये बात कहना कि इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है दरअसल, इंसान के एक सामाजिक प्राणी होने के नाते, व्यक्तिगत कर्तव्य के अर्थ में कही जाती है।
दूसरी बात अगर ये मान भी लिया जाए कि वो धर्म यानी दीन की बात कर रहा है तो भी अन्य कई तर्कों के आधार पर ऐसा मानना गलत हो जायेगा। जैसे कि अगर वाकई कोई आस्तिक इंसान, इंसानियत को सबसे बड़ा धर्म मानता होता तो वो व्यक्ति अपनी ज़िंदगी में किसी भी धर्म को नहीं मान रहा होता। मतलब वो इस्लाम या हिन्दू धर्म का अनुसरण नहीं कर रहा होता, न ही ऐसा हमें दिख रहा होता और न ही वो ऐसा दिखा रहा होता। वो तो अपना मूल धर्म छोड़ चुका होता और सिर्फ इंसानियत मान रहा होता । मगर असल में ऐसी बात कहने वाला व्यक्ति अपने ही धर्म को सच्ची श्रद्धा से मान रहा होता है और इंसानियत को सबसे बड़ा धर्म भी बता रहा होता है, यानी कि उसने ऐसी बात किसी विशेष संदर्भ में कही है।
तीसरी बात, अगर इसका मतलब यही होता कि सभी इंसानियत धर्म अपना लो और अपना अपना मूल धर्म छोड़ दो तो ऐसी बात कहने वाला किसी भी महफ़िल से शायद ही ज़िंदा वापिस आता। बल्कि किसी की ऐसी बात पर तो जनता उलटा ताली बजाती है क्योंकि इस बात का असल मतलब क्या है, ये लोग अच्छी तरह से जानते, समझते हैं। असल में लोग अच्छी तरह जान, बूझ रहे होते है कि ऐसा कहने वाला ये बात सिर्फ इंसानियत या अखलाकियात की ओर तवज्जो दिलाने के लिए कह रहा है, लोगों को आपस में प्रेम, करुणा, दया आदि पैदा करने को कह रहा है, न कि अपना धर्म छोड़ कर इंसानियत अपनाने को।
ऐसी चीज़ें अक्सर एक खास तरह के मौके, महल में कही जाती है जिनका मतलब 100% लफ़ज़न लेने से मसले पैदा हो जाते हैं। इसलिये इन्हें लफ्ज़ के ऐतबार से नहीं बल्कि कॉन्टेक्स्ट के हिसाब से देखना चाहिये। ऐसी बात कहना का मतलब सिर्फ यही होता है कि कोई भी धर्म हो, उसमें सबसे बड़ा हिस्सा इंसानियत यानी अखलाकियात का होता है और सभी को इंसानियत पर सबसे ज़्यादा ज़ोर देना चाहिये। यानी ये बात इंसानों के इंसानो से संबंध और व्यवहार के मामलो में कही जाती है। लिहाज़ा किसी खास मौके, महल के मुताबिक ऐसा कहना या इसका समर्थन करना गलत नहीं है।
● अगर कोई नास्तिक या लामज़हब टाइप का व्यक्ति ऐसी बात कह रहा है तो आमतौर पर उसका मतलब यही होता है कि सब धर्म बेकार है, उन्हें छोड़ो और सिर्फ इंसानियत अपनाओ। वो ये बात 'अक्सर' धार्मिक लोगो को तंज़ के अंदाज़ में कहते हैं।
ऐसे लोगों की बात आप खामोशी से सुन सकते हैं या फिर उन्हें प्यार से बाद में समझा सकते है कि धर्म ने ही इंसानियत की नींव रखी है। इंसानियत पर सबसे अधिक जोर धर्म ही देता है भले ही लोग प्रक्टिकली ऐसे नहीं दिखते हो क्योंकि लोग आज नकली धार्मिक बने जो घूम रहे हैं। हालांकि ये धर्म ही जिसने लोगों को पूरी तरह से बुरा बनने से रोक रखा है अगर धर्म नहीं होता तो ये दुनिया इससे भी ज़्यादा बुरी होती।
तमाम धर्मों के बुनियाद में इंसानियत या अखलाकियात हैं सो इंसानियत को सबसे बड़ा धर्म या दीन बनाने वाले और इस पर सभी इंसानो का इत्तिफाक करवाना चाहने वाले, इस तरह दुनिया में एक और धर्म पैदा कर रहे हैं। क्योंकि इस पर भी सभी इत्तेफाक नहीं कर पाएंगे। कल को इसके मानने वाले भी बिगाड़ पैदा कर लेंगे तो फिर एक और धर्म पैदा करना पड़ेगा। फिर शायद विज्ञान एक नया धर्म बना देंगे। जब भी कोई नया मत किसी के खिलाफ खड़ा होता है तो अक्सर पुराने मत भी खत्म नहीं हो जाते इसलिए इंसानियत या विज्ञान को धर्म बनाने के बाद भी बाकी धर्म भी कायम रहंगे।
जिसके नज़दीक जो सबसे अहम चीज़ होती है, वो वही चीज़ सबसे बड़ा काम बताता है। जैसे एक मां दुनिया का सबसे अहम काम मां की सेवा बताएगी और एक पत्नी अपनी सेवा। एक सिपाही देश की सेवा बताएगा और एके गरीब गरीबों की सेवा। यानी व्यक्तिगत तौर लार अलग अलग राय इस पर होती है। मगर जब इंसान एक समुदाय के तौर पर इस पे गौर करते हैं तो मजमुई तौर पर इंसानियत को ही सबसे अहम काम पाते हैं जो सही भी है। मगर इस पर आखिरी तौर पर फैसले उसका होगा जिसने इंसान को बनाया है। उसने अपने ताल्लुक़ से बता दिया है कि मुझे याद रखना, मुझे वक़्त देना और इंसानों के ताल्लुक से बता दिया कि इंसानियत पर कायम रहना। पर अगर इंसान उससे ताल्लुक को काट ले और सिर्फ इंसानों से जोड़ ले तो यही अन्याय है। जैसे कोई इंसान मां बाप से रिश्ता तोड़ ले जो उसे उसे पैदा करने है और हमेशा लोगों की सेवा में लगा रहे। वैसे इंसान को मां बाप और बाकी सब नैमतें देने वाला खुदा तो सबसे बढ़ कर है, उसके आगे तो किसी को तवज्जो नहीं दी जायेगी। उसके साथ जो रिश्ता है, वो बाकी सभी रिश्तों से बड़ा है। इस दुनिया का मालिक बता चुका है सबसे पहला सवाल वो अपने बारे में ही करेगा की मेरे बारे में क्या मानते थे और उसी ने ये भी बता दिया है कि सबसे बड़ी खिदमत इंसानियत की सेवा है। अगर लोगों को खुदा से ऊपर इंसानों को ही रखना है तो फिर लोग हर काम का सिला भी इंसानो से ले लिया करे जो अक्सर मिलेगा ही नहीं।
इस्लाम के सभी आदेश 4 भागों में बांटे जा सकते है, एक खुदा से मुत्तालिक जो सबसे अहम हिस्सा है, दूसरा बदन की सफाई से मुताल्लिक, तीसरा खाने की पाकीज़गी से मुताल्लिक और चौथा, इंसानो के मुत्तालिक अखलाकियात जो सबसे बड़ा हिस्सा है। इनमें अखलाकियात ही दुसरो से संबंधित है बाकी तो अपने और खुदा के बीच के मामले हैं। अखलाकियात का मतलब है जो बुनियादी नैतिकता इंसान अपने बातिन में महसूस करता है। ये पूरी दुनिया में एक जैसी ही रहती हैं। अखलाकियात को ही इंसानियत कहते हैं। क़ुरान में इसे मारूफ (अच्छाई) और मुनकर (बुराई) से भी ताबीर किया गया है। इंसान केवल शरीर नहीं है बल्कि एक आत्मा भी है, इस आत्मा की तृप्ति अध्यात्म से होती है इसलिए इंसान कभी धर्म को छोड़कर सुकून नहीं पाता है। इस तृप्ति को इंसानियत या विज्ञान मुहैय्या नहीं करवा सकते क्योंकि ये उनका विषय ही नहीं है।
■ किसी मौके, महल पर अगर कोई संक्षेप में कहे कि सभी धर्म बराबर है, समान है, एक हैं और हम सबको मानते हैं तो इसमें कोई बवाल खड़ा करने की ज़रूरत नहीं है।
ऐसी बातें अक्सर दूसरे धर्म वालों से थोड़ी सी मुलाकात में भाईचारा, एकता बढ़ाने और दूसरे धर्मों के प्रति सम्मान दिखाने के लिए कह दी जाती हैं। ऐसी बातें सभी धर्मों को लोगों को एक करने और साथ लाने के लिए कही जाती है। ऐसे मेलमिलाप के माहौल में यह कहना कि मेरा धर्म अलग है और तुम्हारा अलग, मेरा धर्म बड़ा है और तुम्हारा छोटा, मेरा धर्म तो मैं पूरा मानता हूँ और तुम्हारा बिल्कुल भी नहीं, ऐसा कहना प्रेम की बजाए नफरत के बीज बो देगा। अगर ऐसी बात कहना वाला कोई व्यक्ति प्रैक्टिकली वाकई सभी धर्मों में ज़रा सा भी अंतर नहीं पाता तो वो व्यक्ति प्रैक्टिकली सभी धर्मों का अनुसरण कर रहा होता। ऐसी बातों को भी कॉन्टेक्स्ट में देखना चाहिए।
सभी धर्म नैतिकता या अखलाकियात पर ज़ोर देते हैं। सभी आस्तिक धर्मों में ईश्वर, परलोक और कर्मों के कांसेप्ट मौजूद है, किसी न किसी रूप में। सभी धर्म मूलभूत रूप से इंसान को अच्छा बनने पर ज़ोर देते हैं। आखिर ऐसे सभी धर्मों का निचोड या निष्कर्ष एक ही निकलता है। इन बातों के मद्देनजर भी कोई किसी अंतर्धार्मिक सभा में आस्तिकों की मेजोरिटी के सामने, ऐसा कह दे तो इसमें नाराज़ होने वाली बात नहीं।
वैसे भी क़ुरान कहता है कि कोई भी धर्म वालें हो अगर वो ईश्वर, परलोक, आख़िरत में विश्वास करने वाले और अच्छे कर्म करने वाले हुए तो उनके लिये ईश्वर के पास इनाम है। गौर करने वाली बात ये है कि इसमें रिसालत को बुनियाद नहीं बनाया गया है।
अगर कोई व्यक्ति ऐसी बात सुनके ये समझ भी ले कि इस्लाम, हिंदूइस्म, ईसाइयत, सिक्खीज़्म किसी भी धर्म को मानो, बात एक ही है तो इसमें भी गुस्सा करने की ज़रूरत नहीं है। ये तो अल्लाह की ही स्कीम है कि लोगों को अलग अलग धर्म में पैदा किया और उनके इल्म, समझ, हालातों वगैरह के अनुसार ही उनका हिसाब होगा। उन तक कितना दीन पहुँचा और कितना उनको दिल से समझ आया, इसके अनुसार उनका हिसाब होगा। नहीं पहुँचा या कतई समझ नहीं आया तो भी अल्लाह इसी के अनुसार हिसाब लेगा।
ख़ैर अगर ऐसी बात सुनके कोई ये भी समझने लगे कि सब धर्म अपनी जगह सही है, तो ये उसकी कम समझी का नतीजा भले हो मगर नतीजे के ऐतबार से अच्छा ही है। क्योंकि आज के पूरे विश्व में फैले इस्लामोफोबिया माहौल में और भारत मे चालू प्रोपगंडा की आग, हिंदुत्व की लपटों में जंहा हिन्दू धर्म को ही एकमात्र सत्य माना और थोपा जा रहा हो, वंहा पर कोई आपकी बात सुनके इस्लाम के प्रति ये नज़रिया पैदा कर ले कि इस्लाम भी हक़ हो सकता है तो ये एक बड़ी कामयाबी होगी।
वैसे अगर कोई ये कहे कि हम सब एक हैं या सारे इंसान बराबर है तो इस बात को भी हम कॉन्टेक्स्ट में समझते हैं जबकी इंसान अलग अलग होते है और सभी बराबर भी नहीं होते। हम इस बात का मतलब यही लेते हैं कि हम सब एक साथ हैं और कोई ऊंचा नीचा नहीं है।
■ ऐसे ही सब धर्म सम्मानीय है, कहना भी कतई गलत नहीं।
किसी भी धर्म या उसके पूज्यों को गलत नहीं कहना चाहिए। सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए। यही हर धर्म की शिक्षा है।
■ सबसे पहले देश है, ऐसा कहना कितना सही है.
कोई कहे कि सबसे पहले देश है, हिंदुस्तान है और कोई धर्मिक कहे हमारे लिये तो सबसे पहले इस्लाम है या हिन्दुधर्म है। हो सकता है कोई कह दें मेरे लिए तो सबसे पहले मेरे मां बाप या बच्चें हैं। असल में इस तरह की बातों को भी उसके मौके महल के मुताबिक समझना चाहिए।
जैसे जिन्नाह को पाक ने कायदे (क़यादत करने वाला) आज़म (सबसे बड़ा) कहा। फिर मज़हबी लोगों ने शुरू किया कि सबसे बड़ा कायद तो सिर्फ अल्लाह का पैगम्बर ही हो सकता है। जबकि लक़ब देने वालों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि इस नाम से उनका रुतबा नबी के बराबर हो गया है। दरअसल ये लक़ब सियासत के मैदान में था। ऐसे ही जब कोई बच्चा अपने फादर को वर्ल्ड का बेस्ट फादर कहता है तो वो अपने दायरे की बात कर रहा होता है।
● वैसे देश के संविधान ने हर धर्म को मनाने की छूट दी है। भारतवासियों को अपना देश, संविधान भी प्यारा है और अपना धर्म भी। दोनों में किसी एक को चुनने का सवाल ही पैदा ही नहीं होता क्योंकि दोनों ही एक दूसरे का रास्ता नहीं काटते हैं बल्कि एक दूसरे के सहायक हैं। ऐसे सवाल उतने ही बचकाने है जितना किसी से ये पूछना कि आपको दोनों आंखों में से कौन सी आंख प्यारी है या मां बाप में से कौन ज़्यादा प्यारे हैं।
■ निष्कर्ष
किसी अंतर्धार्मिक सभा में 2-4 मिनट के भाषण में या किसी गैर धर्म वाले से 2-4 मिनट की बातचीत में ऐसा कुछ भी कहना या इनका समर्थन करना गलत नहीं होता। हर जगह, हर समय, हर बात नहीं समझाई जा सकती। हम सिर्फ मुसलमान ही नहीं है कि इस्लाम का ही पैगाम देंगे बल्कि हम एक इंसान भी है और सामाजिक प्राणी भी जिनकी अपने आस पड़ोस वालो के प्रति ज़िम्मेदारी भी है, उनसे एक रिश्ता भी है और उनके लिए इंसानियत के संदेशवाहक भी। बाद में जब मौका या समय मिलेगा तो पूरी बात समझायी जायगी।
अगर कोई इंसान ऐसी कोई बात बोलना पसन्द नहीं करता तो वो ऐसा हरगिज़ न बोले। मगर कोई दूसरा व्यक्ति ऐसा कहे और वो इंसान इसका खंडन करे या जनता इस बात पर तालियां बजाने की बजाए पिन ड्राप साइलेन्स कायम कर दें तो सरासर गलत होगा।
हालांकि ये सत्य है कि सबसे बड़ा धर्म तो ईश्वर का ही होगा और जिसे वो धर्म कहेगा, वही धर्म माना जायेगा। ईश्वर एक है तो उसका धर्म भी एक ही होगा और उसका एक धर्म ही सफलता की गारंटी होगा। ये बात समझाने की है और इसे समझने के लिए किसी को समय कम लग सकता है और किसी को ज़्यादा। कोई एक वाक्य में समझ सकता है और कोई लंबी चर्चा के बाद और कोई शायद कभी नहीं।
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मूल धर्म और मानवता में कोई अंतर नहीं है।
गलत
चीजों का समर्थन किसी को नहीं करना चाहिए। चाहे वो आस्था ही क्यों न हो।
धर्म और आस्था में ज़मीन आसमान का अंतर है। मैं मूल धर्म जिसमें सबसे बड़ी
शिक्षा इंसानों के लिए इंसानियत बताई गई है, का समर्थन करता हूँ । देवी
देवतावाद का नहीं पर हां इस आस्था का अनादार नहीं करता क्योंकि अनादर करने
से इंसानी जज़्बात हर्ट होते है। धर्म के बिगड़े स्वरूप और आस्थाओं को
क्रिटिसाइज करनी चाहिए पर तहज़ीब में। क्रिटिसिज़्म सही हुआ तो समझदार को ऐसी
मान्यताएं फ़ौरन छोड़ देनी चाहिए वरना उसका सत्य जवाब देना चाहिए और उचित
जवाब न हो तो कटु हुज्जती यानी कट्टरता या ढीढता नहीं दिखाना चाहिए वर्ना
पाखंड हो जाएगा। ऐसे ही दोहरे और अंधभक्तों के कारण ही दुनिया का बेड़ा गर्क
हुआ है, भारत मे भी। ये हर जगह है कंही कम कंही अधिक। कंही धर्म के, कंही
वर्ण, कंही क़ौम, कंही नस्ल के आधार पर ये अन्याय करते है। धर्म, हिन्दू
धर्म, ब्राह्मणवाद सब अलग अलग चीज़ें है। सेकुलरज़िम इंसानियत का तकाजा है,
जो सबको अपनाना चाहिए।
इंसानियत
और धर्म (मूल रूप में) सीधा संबंध है क्योंकि जितनी भी बातें आज इंसानियत
का रूप समझी जाती है वो सभी धर्म के आदेश है। अंतर इतना है कि आम लोगों की
तरह आप भी धर्म में गढ़ ली गयी और मिलावट कर दी गयी फिजूल बातों को धर्म मान
रहे हो। ये ऐसे ही जैसे एक तो बुद्ध का नास्तिकतावाद है और दूसरा चार्वाक
का। धर्म बचाने के लिए कोई अमानवीयता नहीं बरती जा सकती है धर्म यही कहता
है पर आम धार्मिक इसके उलट मानता है ये सच है और ऐसे कुकर्मों का दोष उनका
अपना है, असल धर्म का नहीँ। तो सच्चा आदमी वही है जो असली धर्म और नकली
धार्मिकों में फर्क कर और समझे। नामज़ या टीका, घण्टी पाखण्ड है, कैसे है।
तो फिर तो विपश्यना भी पाखण्ड हो जायेगी। नास्तिकता का चोगा पहन के खुगर्ज़ी
से जीवन जीना भी कट्टरता है। नास्तिकता का चोगा पहन के खुगर्ज़ी से जीवन
जीना भी पाखंड और कट्टरता है। दुनिया मे बहुत चीज़ें है जो समानता पर है
अपवाद के साथ। अपवाद हर जगह होते है। अगर समानता है ही नहीं तो फिर
संविधान में जगह जगह जिस समानता की बात कही गयी है वो बेमानी और खोखली हो
गई। सेकुलर शब्द का इतिहास और आज उसका प्रसंग जानिए पहले। प्यार शांति
इंसानियत, नॉन डीसकर्मिनेशन, सेकुलर रूलिंग ये असल धर्म की ही शिक्षाएं है।
अधर्म इनसे दूर ले जाता है। अधर्म (जिसमें नास्तिकता भी शामिल है) लोगों
को नफरत करना भी सिखाता है अपवाद के साथ।
हिन्दू
धर्म, मूल सनातन धर्म का मिलावटी स्वरूप है जिसका मुख्य ब्राह्मण वर्ग ही
है, उनकी स्वीकृति के बिना उनके धर्म में छेड़छाड़ नहीं कि जा सकती थी। जिन
फायदों के तहत ऐसा किया गया वही ब्राह्मणवाद है। ये मूलतः सोच का नाम है।
ये ब्राह्मणवाद दूसरी क़ौमों और नस्लों में भी देखा जाता है जंहा इनका नाम
नया है। ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद में भी अंतर है। अपवाद हर जगह है। मैंने
अभी तक इस्लाम को ऊपर रखा ही नहीं, पर आपने अधर्म, नास्तिकता को सबसे ऊपर
रखा है। यंहा तक कि आपने ही इंसानियत कि सिर्फ और सिर्फ नास्तिकता या अधर्म
से रिलेटिविटी साबित करने की कोशिश की है। सबसे अधिक आतंक धार्मिक
(नाममात्र के) फेलातें है सच है। पर अधार्मिक भी फेलातें मिलते है कुछ
उदाहरण इतिहास में है। ज़यादातर लोग अपनी खुदगर्ज़ी और फायदों के लिए बुरे
काम करते है और उसके लिए धर्म सहारा लेते है। ऐसे ही कुछ अधार्मिक भी यही
काम करते हुए अधर्म का सहारा लेते है। डिस्क्रिमिनिएशन मूल धर्म नहीं,
बनवाती धर्म सीखाता है। डिक्रिमिनशन न करने का अर्थ अपनी पहचानें खतम करना
नहीं होता बल्कि पहचानों के आधार पर किसी का जायज़ हक़ ख़त्म न करना होता है।
असल धर्म की असली शिक्षा लोगों को सर्वश्रेष्ठ बनाने की होती है जो बन गया
वो असल धार्मिक है, जो न बन पाए वो नाममात्र का।
अच्छा
बनके दिखाना नहीं है, बनना उद्देश्य है। क्या अच्छा होना और इंसानियत अलग
अलग है। अगर अलग है तो दोनों को परिभाषा दो। अगर अलग नहीं है तो फिर अच्छा
बनने या खुद में इंसानियत वापिस पैदा करने के प्रयास पर आप तंज क्यो कर रहे
हो। इंसानीयत इंसानों का सर्वश्रेष्ठ रूप ही है, तो फिर धर्म का उद्देश्य
गलत कैसे। अगर इंसानियत सर्वश्रेष्ठ नहीं तो आप क्यों इंसानियत वापिस लोगों
में पैदा करने पर ज़ोर दे रहे है। अगर सर्वश्रष्ठ है तो धर्म का और आपका
उद्देश्य अलग कंहा हुआ। इंसानियत पैदा करना और अच्छा बनाना अलग अलग है फिर
तो इंसानियत बुरी हो जायगी। इंसानियत प्राकृतिक है तो अच्छा होना भी तो
प्राकृतिक है। या बुराई होना प्राकृतिक है। अच्छा बनना होड़ है फिर तो इंसान
बनना भी होड़ हो जाएगी। मानव जब पैदा होता है तो प्राकृति पर पैदा होता है
यानी इंसनियत पर या अच्छाई पर। फिर ये दोनों अलग कैसे हो गए। तुम्हरा मतकब
तो यही निकल रहा है कि अच्छा होना बुरी बात है और इंसनियत होना अच्छा।
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