Tuesday, 19 December 2023

आर्य, अरब-हिन्द संबंध, भारत के नाम, गीता में भारत, संजय, एकेश्वरवाद

 


नबी ने जिन हदीसों में फरमाया कि नई आने वाली क़ौम ईरान और यमन के लोग होंगे तो इसमें आप ने हिन्द के लोग क्यों नहीं कहा जबकि उस वक़्त हिन्द लफ्ज़ और खित्ते का तसव्वुर अरब में वाज़ेह था?


ऐसा माना जाता है कि आर्यन मध्य एशिया से लगभग 1500-2000 ईसा पूर्व ईरान और भारत में आये थे। द्रविड़ लोगों का मेसोपोटामिया, यमन, ओमान के साथ व्यापार था। सिंधी लोग सिंध में रहते थे और अरबों के साथ व्यापार करते थे। अरबों और भारत के बीच व्यापार 1000-100 ईसा पूर्व तक पुराना हो सकता है। अरब में भारत की तलवारों और मसालों को हिंद शब्द से जोड़कर पुकारा जाता था। हमें कुरान में कुछ भारतीय-अरबी शब्द मिलते हैं।

एक मतानुसार ईरानियों ने जब सिन्धु नदी के आस पास कब्जा किया तो शब्द हिन्दू वजूद में आया, स को ह से बदले जाने पर. यूनानियों के लिए हीण्डिया से इण्डिया बना.  यानी सिंध से हिन्द बना और हिन्द से हिन्दू और हिन्दू से हिन्दुस्तान.  दुसरे मतानुसार नबी के वक़्त में अरबों का मानना ​​था कि सिंध और हिंद अलग-अलग देश हैं। यानी सिंध हिंदुस्तान, किरमान (ईरान) और साजिस्तान (अफगानिस्तान) की सीमाओं से घिरा स्थान माना जाता था जबकि चीन की सीमा से लगे इलाकों को हिन्द माना जाता था. अरबियों ने सिन्धु भूमि को सिंध कहा और बाकी भारत को हिन्द. 9वीं शताब्दी तक अरब सिंध को गुजरात तक मानते थे। मुसलमानों के भारत में आने से पहले पुरे भारत का कोई एक नाम नहीं था. यंहा अलग अलग राज्य थे और राज्यों के अलग-अलग नाम थे.

नबी के वक़्त में अरबो के लिए हिन्द में आने के लिए दो ही रूट थे। एक फारस से होते हुये सिंध,अफगान वगैरह की तरफ से और दूसरा अरब सागर से होते हुए गुजरात, मालाबार, कोंकण की तरफ से। अरब इन इलाकों के बाहरी हिस्सो से ही व्यापार करते थे। लेन देन के बाद यंही से वापिस हो जाते थे। पूरे हिन्द से आया समान, इन्ही रूट या इलाकों में बिकता था क्योंकि ये बिज़नेस हब थे। ज्यदातर यंही के लोग भी व्यापार के लिए मेसोपोटामिया, ईरान, यमन वगैरह जाते थे, न कि अंदुरनी हिन्द के। इन हब्स, रूट्स पर आने वाले अरबों को इन इलाकों में बसे लोगों की नसल, उनकी एन्सेस्टरल हिस्ट्री वगैरह की कोई खास मालूमात नही थी। मालूमात हो भी नहीं सकती थी क्योंकि यंहा के उच्च वर्ण के लोग वैदिक काल के बाद से अपना नाता सेंट्रल एशिया, ईरान, यमन वगैरह से तोड़ चुके थे या टूट चुका था। धार्मिक आधार पर वो खुद का उच्च मानने के अलावा खुद को भारत भूमि का प्रथम और मूल बाशिंदें मानते थे। इसके अलावा वो अरबवासी जो कभी हिन्द आये ही नहीं जैसे नबी और ज़्यादातर सहाबा, उन्हें तो यंहा आने वाले अरबों से भी कम यंहा की नस्लो, धर्मों, इतिहास की जानकारी थी। इन सब बातों को तो नबी के कई सदियों बाद अल बरुनी ने दर्ज किया और तब जाके मुसलमानों को इनके बारे में गहन जानकारी हुई जैसे यंहा के ब्राह्मण कितने अहंकारी है, छुपे हुए एकेश्वरवादी है, वैदिक ज्ञान किसी को नहीं देते, यंहा गूढ़ वर्ण व्यवस्था है वगैरह वगैरह। जब अरबो को इन चंद बाहरी इलाकों की ही खास जानकारी नहीं थी तो फिर इन इलाको के पीछे बसे बाकी अंदरूनी हिन्द की अवाम के बारे में तो बिल्कुल भी इल्म नहीं था कि वो कौन कौन और क्या क्या और किस तरह की हैं, हिन्द कंहा तक फैला, कितने अलग अलग तरह की क़ौमें यंहा हैं, वगैरह।

जैसा हदीसों में आया है कि अजीब तरह से ईमान लाने वाली क़ौम को नबी ने हिन्द की क़ौम नहीं कहा (जबकि हिन्द नाम और स्थान का उन्हें इल्म था) बल्कि ईरान और यमन की क़ौम कहा यानी वंहा बसे आर्यन, सिंधी, द्रविड़ियन लोग का नाम लिया। इसके पीछे दो ही वजह नज़र आ रही हैं:-

1. उस वक्त ये क़ौमें हिन्द के इन दो रूट के आस पाया नहीं रह रही थी। बल्कि ये अंदुरनी हिन्द इलाको में आबाद थी.
2. क्योंकि नबी हिन्द नहीं आये थे इसलिए आपको इसका यंहा की क़ौमों का इल्म नहीं था। मगर क्योंकि ईरान, यमन अरब के करीबी इलाके थे, आपको इन दोनों देशों की क़ौमों का इल्म था (जो भले ही यंहा कम तादात में आबाद थे जैसे द्रविड़ियन, सिंधी)।

Once a deputation of some newly convered people of the Harith tribe called on prophet. As he glanced at their faced, he remarked: Who are these people who resemble the people of India (rijal al hind) ~ Sirat Ibn Hisham, Tabri

The Prophet is reported to have compared Moses to the Jats in physique ~ Majma Al bahr

Once aisha fell ill, her nephews sent for a Jat physician to treat her ~ Al Adab al Mufrad

There are also a lot of well establish evidence to show the Sabaens and Nabataeans had engaged in trade with India (Hunter, 1997) ~ Early Arab Trade with India: Special reference to Kerala by Dr. Faisal Babu M.

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मुझे इसमें ऐसा लिखा नहीं मिला। मगर ये एक प्रामाणिक तथ्य है कि यमन से भारत (सिंध, दक्षिणी भारत) के सांस्कृतिक, व्यापारिक सम्बन्ध थे (संभवत सिंधु घाटी सभ्यता काल से ही)। वंहा से आके व्यापारी यंहा बसते थे और यंहा से वंहा। इतिहासकार मानते हैं कि यमन में सिंधी, द्रविड़ लोग छोटे स्तर पर जा कर बसते रहे हैं। डिटेल में शायद किसी और किताब में ऐसा मिलेगा। जनेटिक्ली सिंधीयों में आर्यन जीन की भागीदारी रही है। यमनी और भारतीयों की शक्लों सूरत में समानता है। 
 
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भारोपीय परिवार की भाषाओं की दो शाखाएँ मानी गई हैं  -  सतम् तथा केंतुम्।
सतम् के अंतर्गत आने वाली भाषाओं के चार वर्ग हैं -   इंडो-ईरानियन, बाल्टोस्लेविक, आर्मेनियन, आल्वेनियन।
इंडो-ईरानियन के अंतर्गत मुख्य दो भाषा वर्ग हैं - ईरानी वर्ग की भाषाएँ तथा भारतीय आर्य भाषाएँ। प्राचीन फारसी तथा अवेस्ता ईरानी वर्ग की भाषाएँ हैं। वैदिक संस्कृत, लौकिक संस्कृत, प्राकृत, पालि, अपभ्रंश तथा आधुनिक आर्यभाषाएँ भारतीय आर्यभाषा परिवार के अंतर्गत आती हैं।
 
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प्रोफेसर कृष्णस्वामी एंगेयर एम ए लिखते है की श्वेत हूणों का मातृकुल मग कबीला था। कृष्णास्वामी यूनानी लेखक अमेनियस मार्सेलिन्स का हवाला देते हुए लिखते हैं कि हूण लोग आलन लोगो से मिलते जुलते थें जो यूरोप के डोन नदी से लेके ईरान -चीन तक फैले हुए थे और पहले मेसाजेटे कहलाते थें। चीनी लोग इन्हें अनसाई कहते थे, जिसका अर्थ होता है 'दैत्य'। मग स्त्रियां जादू -टोने ,औझाई के लिए प्रसिद्ध थी शायद इसीलिए चीनी इन्हें 'दैत्य' कहते थे।
हरप्रसाद शात्री जैसे कई इतिहासकार पुष्यमित्र को ईरानी मूल का मग पुरोहित मानते है। जो 'मिहिर' है वही अर्थ 'मित्र'का है, दोनों का सम्बंध अग्नि पूजा और सूर्य से है।

ज़ुर्थुस्थ सूर्य  उपासक और अग्निपूजक मग पारसी था। मित्र  और मिहिर परस्पर जुड़े हुए धार्मिक विश्वास हैं, जोकि ज़ुर्थुस्थ धर्म से प्रभावित हूणों के साथ भारत आये। कृष्ण के पुत्र साम्ब द्वारा भारत में सूर्य मंदिर कि स्थापना और सूर्य पूजा के लिए  शकद्वीप से मग ब्राह्मणों को बुलाने की कथा भी वराह पुराण में आती हैं। 


मितानी साम्राज्य के लोगों की संस्कृति और भाषा हिटाइट या हुर्रित (Hurrian) भाषा से जुड़ी थी, न कि संस्कृत से। मितानी साम्राज्य में संस्कृत या वैदिक संस्कृति के प्रभाव हैं. ऐसा माना जाता है कि आर्य-वंशीय लोग जिन्होंने सिंधु-सप्त सिंधु (Indus Valley) क्षेत्र और उत्तर भारत में संस्कृत भाषा और संस्कृति को स्थापित किया, उनके साथ संपर्क के कारण संस्कृत या संस्कृत जैसी भाषाएँ मध्य एशिया में पनपीं। हालांकि, हुर्रित संस्कृति और भाषा में भारतीय प्रभाव का पता नहीं चला है, लेकिन यह संभव है कि आर्य प्रवासी संस्कृत भाषा या उनके धार्मिक प्रभाव से परिचित थे, और इसलिए उनके नामों में संस्कृत के तत्व थे।
 
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मितानी साम्राज्य के लोगों की संस्कृति और भाषा हिटाइट या हुर्रित (Hurrian) भाषा से जुड़ी थी, न कि संस्कृत से। मितानी साम्राज्य में संस्कृत या वैदिक संस्कृति के प्रभाव हैं. ऐसा माना जाता है कि आर्य-वंशीय लोग जिन्होंने सिंधु-सप्त सिंधु (Indus Valley) क्षेत्र और उत्तर भारत में संस्कृत भाषा और संस्कृति को स्थापित किया, उनके साथ संपर्क के कारण संस्कृत या संस्कृत जैसी भाषाएँ मध्य एशिया में पनपीं। हालांकि, हुर्रित संस्कृति और भाषा में भारतीय प्रभाव का पता नहीं चला है, लेकिन यह संभव है कि आर्य प्रवासी संस्कृत भाषा या उनके धार्मिक प्रभाव से परिचित थे, और इसलिए उनके नामों में संस्कृत के तत्व थे। 
 
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Aryan (Indo/Iranian)-European hypothesized migrations 
 
 
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जम्बुद्वीप, भारतवर्ष, आर्यावर्त भारतखण्ड, हिन्द, इंडिया आदि नाम


जम्बुद्वीप
जम्बुद्वीप सबसे पुराना नाम है. इसे विश्व के एक बड़े भूभाग के रूप में वर्णित किया गया है। इतिहास और पौराणिक तथ्यों के आधार पर जंबुद्वीप को Most parts of Asia मान सकते हैं। जम्बूद्वीप सप्त महाद्वीपों में से एक है (जिसमें भारतीय उपमहाद्वीप शामिल है) जो पृथ्वी के केन्द्र में स्थित है। इसका नामकरण जामुन वृक्ष के नाम पर हुआ है। ब्रह्मपुराण में जम्बूद्वीप का उल्लेख है। पुराणों (जैसे विष्णुपुराण जो कि मौर्य वंश से संबंधित है चन्द्रगुप्त मौर्य और अशोक जैसे शासक हुए हैं।) में जम्बूद्वीप का उल्लेख है जिसके मध्य में सुमेरु/मेरु पर्वत है। बाद में जम्बूद्वीप के आठ द्वीप बन गए जिनमें एक है सिंहल/लंका है। श्री दुर्गा पूजन/ तर्पण में एक मंत्र में पढ़ते हैं कि ‘’जम्बूद्वीपे, भरतखण्डे, आर्यावर्ते.... अर्थात जम्बूद्वीप के भारतखण्ड के आर्यवर्त में’’।  भागवत पुराण में इसके 9 खंड बातये गए हैं। वर्तमान उपलब्ध आंकड़ों में अशोक ने 3rd Cent. BC में अपने राज्य को जंबुद्वीप कहा है। जैन धर्म में भी जंबुद्वीप का उल्लेख है। बौद्ध धर्म में भी इसका उल्लेख है, ऐसा कहा जाता है।


भारतवर्ष:
इसका अर्थ है भारत का क्षेत्र। भरत के नाम पर ही देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। संस्कृत में वर्ष का एक अर्थ क्षेत्र, भाग भी होता है. यह पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को संदर्भित करता है और इसे जम्बूद्वीप के भीतर एक क्षेत्र के रूप में भी देखा जाता है। यह जम्बूद्वीप का एक अंग था। इस का उल्लेख महाभारत, पुराणों आदि ग्रंथों में होता है। महाभारत में इसे मनु के पुत्र भारत का क्षेत्र बताया है। 


भारतखण्ड:  
इसका अर्थ है भरत के वंशजो का खंड। इसमें राजा भरत शासन करते थे। इसका उपयोग वेदों, महाभारत, रामायण और पुराणों में हुआ है। मनु का जिस खण्ड पर शासन था उसे भारतवर्ष कहा गया। मनुमृति ने इस स्थान पर चार वर्णों का अस्तित्व विधमान बताया है।


आर्यावर्त:  
संस्कृत ग्रंथों में उत्तरी भारत को आर्यावर्त (शाब्दिक अर्थ: आर्यों का निवास स्थान) कहा गया है। यह हिमालयन, गंगा और जमुना के आस पास के पूरे क्षत्र को माना जाता है। विभिन्न धर्मसूत्रों में इसका उल्लेख है। मनु की दृष्टि में आर्यावर्त के भीतर ब्रह्मवर्त नामक भूभाग है। आर्यावर्त के बाहर के देश म्लेच्छ देश माने जाते थे जहां तीर्थयात्रा के अतिरिक्त जाने पर इष्टि या संस्कार करना आवश्यक होता था। इसे वैदिक काल में वैदिक और आर्य संस्कृति और सभ्यता का केंद्र माना जाता था। पुराणों और महाभारत में यह नाम आया है। 


सप्तसिंधु
ऋग्वेद में आर्यों का निवासस्थल सप्तसिंधु प्रदेश के नाम से अभिहित किया जाता है। सिन्ध का सात नदियों वाले प्रसिद्ध सप्तसिन्ध/ सप्तसिन्धु क्षेत्र को प्राचीन फ़ारसी में हफ़्तहिन्दू कहा जाता था.

अजनाभवर्ष
भारत का प्राचीन नाम अजनाभवर्ष था। भरत के नाम पर बाद में भारतवर्ष पड़ा। 

भारत:  
भारत नामक स्थान विष्णु पुराण और महाभारत में प्रयोग हुआ है जो कि मूलतः भारतवर्ष या भरतखंड ही हो सकता है।

भारत नाम आधुनिक भारत के लिए प्रयोग हुआ है यधपि इस नाम ले आधार भरत शब्द से ही बना है। 

भरत नाम के अनेक व्यक्ति हुए हैं. इसलिए यह तार्किक है कि भारत का नाम किसी व्यक्ति विशेष के नाम पर न होकर जाति-समूह के नाम पर प्रचलित हुआ.

महाभारत में शब्द भारत पहले ही उपलब्ध है, इसका पहले नाम जयसंहिता था। महाभारत के अनुसार हस्तिनापुर के दुष्यन्त और शकुंतला के पुत्र भरत के नाम पर भारत पड़ा जो स्वयं एक चक्रवर्ती सम्राट हुए। हो सकता है दशरथ पुत्र और प्रभु श्री राम के अनुज भरत जिन्होंने खड़ाऊँ राज किया, के नाम पर यह नाम पड़ा हो। नाट्यशास्त्र वाले भरतमुनि भी हुए हैं. एक राजर्षी भरत का भी उल्लेख है। मतस्यपूराण में मनु को प्रजा को जन्म देने और उसका भरण-पोषण करने के कारण भरत कहा गया. विष्णुपुराण के अनुसार भारत नाम इसलिए पड़ा क्योंकि यहां राजा भरत के वंशज रहते थे। भारत नाम अनेकों पुराणों में आया।

भारत के नामकरण के सूत्र जैन परम्परा में भी मिलते हैं. प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा.

ऋग्वेद में कहा गया है कि विश्वामित्र की प्रार्थना भारत की प्रजाति को सुरक्षित करती है। ऋग्वेद में दस राजाओं के युद्ध का वर्णन है जिसमें भारत नामक जनसमूह के राजा सुदास का नाम आया है। भरत के नाम से एक आदिम वैदिक जनजाति भी थी जो दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व तक आबाद थी। ये भरतजन अग्निपूजक व यज्ञप्रिय थे. वैदिकी में भरत / भरथ का अर्थ अग्नि या विश्वरक्षक है और यह एक राजा का नाम है. यह राजा वही भरत है जो सरस्वती, घग्घर के किनारों पर राज करता था. संस्कृत में भर शब्द का एक अर्थ है युद्ध, समूह, जनगण, भरणपोषण। इनके नाम पर यह नामों पर भी यह नाम पड़ा हो सकता है।

हाथीगुम्फा शिलालेख में भारतवर्ष का उल्लेख मिलता है। 



हिन्द:  
मेसोपोटामियाई संस्कृतियों से हिन्दुओं का सम्पर्क था. अक्कद, सुमेर, मिस्र सब से भारत के रिश्ते थे. ये हड़प्पा दौर की बात है. ईरानी-हिन्दुस्तानी पुराने सम्बन्धी थे. हिन्दू दरअसल ग्रीक इंडस, अरब, अक्काद, पर्शियन सम्बन्धों का परिणाम है. हिन्दुश शब्द तो ईसा से भी दो हज़ार साल पहले अक्कादी सभ्यता में था. भारत-यूरोपीय भाषाओं में ह का रूपान्तर अ हो जाता है परंतु स का अ नहीं होता. सिन्ध सिर्फ़ नदी नहीं सागर, धारा और जल का पर्याय था. सिन्ध का सात नदियों वाले प्रसिद्ध सप्तसिन्ध/ सप्तसिन्धु क्षेत्र को प्राचीन फ़ारसी में हफ़्तहिन्दू कहा जाता था. हिंदुस्तान शब्द का इतिहास हिन्दुकुश पहाड़ियों से भी जुड़ा हुआ है। ईरानी (पर्शिया) का शब्द 'हिन्दू' एवं संस्कृत के शब्द सिन्धु से भी हिन्दुस्तान शब्द की उत्पत्ति हुई हो सकती है।शायद मध्य पर्शियाई काल में पहली शताब्दी सीई से, प्रत्यय -स्तान (फारसी) जोड़ा गया था । संस्कृत का स्थान फ़ारसी में स्तान हो जाता है.

इस प्रकार, 262 AD सिंध को सासानी सम्राट शापुर प्रथम के नक्श-ए-रुस्तम शिलालेख में हिंदुस्तान के रूप में संदर्भित किया गया था। अरब देशों में को हिन्द (अरबी : अलहिन्द) कहा जाता है।  हिन्दू और हिन्द (फारसी) दोनों शब्द इंडो-आर्यन/ संस्कृत सिंधु (सिंधु नदी क्षेत्र) से आए हैं। 

आचमेनिड सम्राट Darius-I ने लगभग 516 BC में सिंधु घाटी पर विजय प्राप्त की और हिंदूश (हाय-डु-यू-एस) का उपयोग सिंधु घाटी के लिए किया। लगभग 500 BC में Darius-I की मूर्ति पर यह नाम मिस्र के आचमेनिड प्रांत के रूप में भी जाना जाता था, जहां इसे (Hnd-wꜣ-y / इंडिया) लिखा गया था। 

ईरान पहले फ़ारस और उससे भी पहले अर्यनम, आर्या अथवा आर्यान. अवेस्ता में इन नामों का उल्लेख है. माना जाता है कि हिन्दूकुश के पार जो आर्य थे उनका संघ ईरान कहलाया और पूरब में जो थे उनका संघ आर्यावर्त कहलाया. भारत का नाम सुदूर पश्चिम तक तो ख़ुद ईरानियों ने ही पहुँचाया था. कुर्द सीमा पर बेहिस्तून शिलालेख पर उत्कीर्ण हिन्दुश शब्द इसकी गवाही देता है.


इंडिया:  
इंडिया नाम की उत्पत्ति सिंधु नदी के अंग्रेजी नाम इंडस (सिंधु) से हुई है जो यूनानियों द्वारा 4th Cent. BC से प्रचलन में है। इंडिया नाम पुरानी अंग्रेजी में 9वीं सदी में मिलता है। हिन्दु कुश पर्वतों में सिकंदर की जीत हुई तो इन पर्वतों को यूनानी भाषा में कौकासोस इन्दिकोस (Caucasus Indicus) यानि भारतीय पर्व' बुलाया जाने लगा। इंडिका (3rd Cent. BC ) का प्रयोग मेगास्थनीज़ ने किया.
 
 

गीता में भारत और संजय कौन थे? 

गीता में भरत के पुत्रों को भारतपुत्र और भारत के वंश को भरतवंशी कहा गया है। गीता में इसका अर्थ भारत की संतान के रूप में है। श्रीकृष्ण ने गीता में अर्जुन को भारत कहकर संबोधित किया है। कहा जाता है विभिन्न संदर्भों भारत का अर्थ विश्व से भी है क्योंकि कृष्ण पूरे विश्व को संदेश देने आए थे। 

पूरी महाभारत वेदव्यास ने लिखी है और संजय गीता सूना रहे हैं, सूर्य इसका प्रत्यक्षदर्शी है. जिस समय कृष्ण पार्थ (अर्जुन) को गीता का उपदेश दे रहे थे उस समय इस उपदेश को विश्व में चार और लोग सुन रहे थे जिसमें हनुमान, महर्षि व्यास के शिष्य तथा धृतराष्ट्र की राजसभा के सदस्य संजय और बर्बरीक शामिल थे। जब गीता का उपदेश चल रहा उस दौरान पवन पुत्र हनुमान अर्जुन के रथ पर बैठे थे जबकि संजय, धृतराष्ट्र से गीता आख्यान कर रहे थे। धृतराष्ट्र ने पूरी गीता संजय के मुख से सुनी। कृष्ण की मंशा थी कि धृतराष्ट्र को भी अपने कर्त्तव्य का ज्ञान हो और एक राजा के रूप में वो भारत को आने वाले विनाश से बचा लें।
 
गीता में एकेश्वरवाद, बहुदेववाद, अवतारवाद सभी का मिश्रण है। इसलिए इसमें व्याख्या की मुख्य भूमिका हो जाती है. 
 
कम जानकार लोगो को इसके चुनिंदा श्लोकों से कन्विंस किया जा सकता है। या उन्हें किसी श्लोक पर अपनी एकेश्वरवादी व्याख्या दे कर। बाकी जानकार लोगों के साथ ये तरीका काम नहीं करेगा। ज्ञानी हो या नहीं हो, दोनों तरह के लोग ये बात दिल से जानते हैं कि श्री कृष्ण थे तो एक इंसान ही। ये पॉइंट न्यूट्रल सोच वाले लोग भी स्वीकार कर ही लेते हैं, भले ही उनके गुरु या ग्रंथ कुछ भी कहे। जो धर्मांध हैं, वो नहीं मानते क्योंकि उनकी अपनी मजबूरीयां हैं.। 

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