इस पूरे मुद्दे को समझना और इसका हल समझना इतना आसान नही है। हमे बहुत से पहलू देखने चाहिये। दीन के ऐतबार से न सही, दुनिया के ऐतबार से इसे समझने की कोशिश करेंगे तो भी हल की तरफ जरूर बढ़ेंगे।
सबसे पहले इस इलाके और कौम के सामान्य इतिहास पर नजर डाल लेते हैं। इस इलाके (फिलिस्तीन) का नाम पहले कनान था। पिछली सदी में अंग्रेजों से आजादी के बाद हज़रत याक़ूब उर्फ इस्राइल के नाम पर इस देश का नाम इस्राइल रखा गया और यंहा के लोग इस्राइली कहलाने लगे। इनके 12 बेटों की नस्लों को ही बनी इस्राइल कहा गया यानि इस्रायल की कौम वाले लोग। बनी इस्राइल एक कौम है। Judaism एक मजहब का नाम है। ह. याकूब के बेटे Judah की कौम को Juda और उनके राज्य को Judea कहा गया। Jews, Judaism, यहूद, यहूदी, यहूदीयत आदि सभी शब्द Judah से ही बने हैं।
लगभग 4 हज़ार साल पहले हज़रत इब्राहिम ने अपने एक बेटे इस्माइल को अरब में और दूसरे बेटे इसहाक़ को कनान में आबाद किया। अल्लाह ने इन दोनों की कौमों को अज़ीम बनाने का वादा किया था जो पूरा किया गया। इसहाक के बेटे हुए हज़रत यूसुफ और उनके बेटे हुए हज़रत याक़ूब। हज़रत याकूब का नाम इस्रायल भी था यानि अल्लाह के लिए संघर्ष करने वाला या ख़ुदा का बंदा। याकूब के 12 बेटे थे और इनके ही 12 कबीले हुए। इनमें से एक हज़रत यूसुफ कनान से निकल कर मिस्र के वज़ीर बने और फिर उन्होंने अपने भाइयों को मिस्र में बुला कर बसा दिया। फिर इनकी नस्लों वंहा ने उरूज से ज़वाल का सफर तय किया और आखिर में फिरौनों की गुलाम बन गयीं। फिर इनमें से एक कबीले लेवि में से ह. मूसा उठे और अपने साथ बनी ईसराएल के 12 कबीलों को कनान के पास ले आये। मगर इन्होंने बुज़दिली की वजह से जंग करने और कनान में घुसने से मना कर दिया। इसके बाद ये आस पास के इलाकों (वर्तमान इज़राइल) में भटकते रहे। मगर आखिर में Joshua द्वारा कनान को जीतने के बाद फिर यंही बस गए और हुकूमत करते रहे। इस वक़्त तक येरूशलेम इनके पास नहीं आया था और स्थानीय कबीलों के पास ही था (ज़ाहिर है तब इस शहर की मज़हबी हैसियत भी नहीं बनी थी). फिर इन कबीलों में से यहूदा कबीले में ह. दावूद हुए और उन्होंने येरूशलेम को जीता। उनके बेटे सुलैमान हुए और उन्होंने वंहा इबादतगाह बनवाई। इनके बाद इन कबीलों में लड़ाइयां हुआ और ये दो गिरोह में बंट गए, 10 कबीलों ने उत्तर में Israel राज्य बनाया और 2 ने दक्षिण में Judah राज्य (येरूशलेम इसमें शामिल था)।
8वीं सदी ई.पु. में असीरियों की इस्राइल राज्य पर जीत के बाद ये 10 कबीले फिर से बाहर निकल गए और कंहा गायब हो गए कुछ नहीं पता।
इसी तरह 5वीं सदी ई.पु. में बेबीलोनियन ने यहूदा राज्य को जीत लिया और वंहा बचे 2 कबीलों को भगा दिया। कुछ वक्त बाद ही पारसियों ने यहूदा को जीत कर, यहूदियों को यंहा वापिस बुलवाया। यही आज यहूदी कहलाते हैं।
वो खोए हुए, 10 कबिले कंहा बसे, इन पर अलग अलग दावे मिलते हैं। अनुमान है कि ये कबीले दूसरी कौमों में जा कर मिल कर गए। ये भी अनुमान है कि फिर बेहद बाद में यही क़ौमें इस्लाम में शामिल हो गए होंगी। इनमें से एक Bene Israel नामक क़ौम महाराष्ट्र में पाई गई है जिसे Zebulun या Ephraim कबीले से निकला हुआ माना गया है। इसी तरह एक Bnei Menashe नामक क़ौम मणिपुर में पाई गई है जिसे Menashe कबीले से निकला हुआ माना गया है। इन दोनों क़ौमों में इस्राइली होने की मौखिक परम्पराएं, यहूदी धर्म के कुछ रिवाज और कुछ जेनेटिकल सबूत भी मिले हैं। इन्हें आज इज़राल और रब्बियों द्वारा स्वीकार किया जा चुका है। इसी तरह का पश्तों (पठान, जैसे युसुफ़ज़ई, ह. यूसुफ के नाम पर है) भी ऐसा ही दावा करते हैं मगर न तो उनमें जेनेटिकली ऐसे सबूत मिले है और न ही उन्हें स्वीकार किया गया है। शायद इसलिए यहूदी रिवायतों में ऐसा लिखा मिलता है कि इन कबीलों में से कुछ पूर्व की ओर चले गए थे। इनसे पहले 2 और क़ौमों को इन कबीलों से जुड़ा होना इन्हीं आधारों पर सही पाया गया था, पहले इथोपिया के Beta Israel और दूसरे दक्षिण अफ्रीका के Lemba. वैसे इन 12 कबीलों की गिनती और बाद में इनके मिक्सअप से बनी क़ौमों पर विद्वान कई अलग भी मत रखते हैं।
प्राचीन इतिहास
● लगभग 3500 BC में येरुशलम के इलाके में बसावट शुरू हुई। 1800 BC में येरुशलम शहर की Wall बनाई गई।
● इसी दौरान हज़रत इब्राहीम (1800s BC) ने बेटे हज़रत ईसहाक को इस जगह यानि कनान में बसाया था और तबलीग की जिम्मेदारी दी थी। इसहाक के बेटे हज़रत याकूब (Jacob) थे और इन्हें इस्राइल नाम भी दिया गया. याकूब के 12वें बेटे हज़रत यूसुफ थे जो मिस्र में हुकूमत चलाने लगे थे। उन्होंने अपने परिवार वालों (जो कुल 76 लोग थे) को कनान से मिस्र बुला लिया जो अपनी खुशी से वहा आए और बस गए।
● Judah याकूब के बेटे थे और बादशाह हुए (1600s BC). फिर ये लोग लगभग सदियों तक फेरोहों के गुलाम रहे और इनकी आबादी लाखों में पहुँच चुकी थी।
● हज़रत मूसा (1300s BC) इन्हें उस वक्त के फेरोह से छुड़ा कर वापिस कनान ले गए। जाने में 40 साल लगे क्योंकि इन्होंने इलाके में घुसने के लिए मना कर दिया था। इसलिए मूसा इनसे अलग हो गए। मूसा के बाद Joshua/Yusha (1250s BC) ने भार संभाला और 12 कबीलों के साथ कनान को जीता। इन्होंने स्थानीय लोगों के साथ जंग के बाद उन्हे बाहर खदेड़ा। स्थानीय लोग आस-पास बस गए और अरबों मे घुल-मिल गए, यही लोग आज के फिलिसतीनी हैं।
● इसके बाद हज़रत दाऊद (1000s BC) और फिर उनके बेटे हज़रत सुलेमान (950s BC) King of Israel हुए। सुलेमान ने यंहा पहली यहूदी इबादतगाह Solomon's Temple बनवाया और उन्हे पिता से Throne of Solomon मिला। दावूद और सुलेमान के वक्त में इन्होंने बहुत तरक्की करी।
● 10 कबीलों के द्वारा Kingdom of Israel और 2 कबीलों के द्वारा Kingdom of Judah बनाए गए (900s BC)। सीरिया के असीरियों ने (700s BC) में इनपर हमला करा और जीत के बाद यंहा से सभी यहूदी कबीलों को भगा दिया। फिर बेबीलोन के बादशाह ने (550s BC) येरूशलम पर हमला कर पहली इबादतगाह को तोड़ दिया और यहूद लोगों को गुलाम बना कर बेबीलोन ले गया। इसके बाद ईरानी बादशाह Cyrus (संभवत जुलकरनैन) ने बेबीलोन और येरूशलम पर कब्जा किया और इन्हें (500s BC) आजाद करवा कर वापिस लाया और यंहा दूसरी यहूदी इबादतगाह बनवाई। फिर Nehemiah (probable Prophet) ने Wall का पुनर्निर्माण किया। इसके बाद यंहा इरानियों का 200 साल तक कब्जा रहा।
● यूनानी सिकंदर (300s BC) ने येरूशलम जीता। फिर रोमन (60s BC) आ गए। ईसा (30s AD) के बाद रोमन ने यहूदियों को (70s AD) यंहा से भगाया और दूसरी इबादतगाह को तोड़ दिया।
● इसके बाद रोमन ईसाई हो गए। बादशाह Constantine द्वारा (300s AD) ईसाइयत अपनाने के बाद सभी ईसाई हो गए। उसने उस जगह Church of Holy Sepulchre बनाया जहा उन्हे लगा की यंहा ईसा को सलीब दी गई थी। इन्होंने 300 साल यहूदियों पर ज़ुल्म किया और Temple को कूड़ाघर बना दिया।
● अंत में इस जगह पर हज़रत उमर ने (630s AD) कब्जा किया और यंहा एक मस्जिद बनवाई। उम्मययदों ने (690s AD) Dome of the Rock बनवाया। फिर यह क्रूसेडर (1100s AD) के कब्जे में चला गया. इसके बाद सलाउद्दीन अययुबी (1200s AD) ने वापिस अपने कब्ज़े में लिया। इसके बाद 2 बार लगभग 15 साल तक टुकड़ों में ईसाई हुकूमत रही। यानि ईसाइयों की 100 साल और मुस्लिम की 1200 साल यंहा हुकमत रही। 1500s AD में यह ऑटोमान, तुर्की के नियंत्रण में आ गया। प्रथम विश्व युद्द (1917 AD) में ओटोमन एम्पायर के बिखरने से पहले ये खिलाफत के नियंत्रण में ही था.
हालिया इतिहास
पहली वर्ल्ड वार के बाद ब्रिटेन को इस जगह की कमान मिल गयी. दुसरे वर्ल्ड वार के दौरान यहूदी हिटलर से बहुत से मुल्कों से बचकर इस इलाके में आते चले गए. जिसके बाद दोनों में तनाव बढ़ता चला गया. 1947 में टू नेशन और येरुशलम को कॉमन बनाने का फैसला हुआ जैसा भारत में हुआ था. यहूदियों ने मान लिया मगर अरबियों ने नकार दिया. 1948 अँगरेज़ यूँही छोड़ कर चले गए. अगले दिन इजराइल ने खुद के गठन का ऐलान कर दिया. इसके फोरण बाद मिस्र, जॉर्डन, सीरिया, इराक जैसे देशों ने मिलकर इस्राइल पर हमला कर दिया. हार के बाद UNO ने इसे दो टुकड़ों में बाँट दिया. 1967 के 6 दिनों के युद्द में कई देश शामिल हुए मगर येरूशलम इस्राइल के कब्जे मे चला गया। अब तक कई युद्द हो चुके हैं। 1982 में मिस्र इजराएल से समझौता करने वाला पहला देश बना और फिर अन्यों ने भी किया. UNO ने 1949 में ही इज्राएल को मान्यता दे दी थी. आज तक 162/193 देश मान्यता दे चुके हैं. 1950 में इस्राइल ने Law of Return बना कर दुनिया के सभी यहूदीयों को नसल की बुनियाद पर वापिस इस्राइल मे बसने का काम शुरू कर दिया।
वर्तमान स्तिथि
इस लैंड के तीन पार्ट हैं, एक है इजराएल. दूसरी जगह है गाजा पट्टी, जंहा सभी मुस्लिम रहते हैं और उन्ही का अन्दुरुनी शासन है. तीसरी है वेस्ट बैंक (येरुशेलम सम्मिलित) जंहा मिक्स आबादी है और दोनों पक्षों का मिश्रित शासन है. येरूशलम को दो भाग है, East Jerusalem इस्राइल के पास है और West Jerusalem (Old City) जोर्डन के पास है जिसमे अल अक्सा है।
संगठन
बहुत सी फिलिस्तीनी तंजीमें इजराईल से सियासी बातचीत करती रही है. पलेस्तीन लिबरेशन आर्गेनाईजेशन यानी PLO (1964), फिलिस्तीनी नेशनल अथॉरिटी (1994) जैसे बड़े संगठन रहे हैं. यासिर अराफात पीएलओ के नेता थे और समझौतों में यकीन रखते थे. इन सभी ग्रुप में आपस मे बहुत इख़्तेलाफ़ हैं. हल न निकलता हुआ देख 1987 में हमास बना. बाकी के मुकाबले हमास एक आर्म्ड आर्गेनाईजेशन है. ज़्यादातर फिलिस्तीनी इनके समथक है। हमास को इजराईल ने ही सपोर्ट देके दूसरी फिलिस्तीनी तंजीमों को कमज़ोर करने के लिए खड़ा किया था. पर अब यह इजराइल के कण्ट्रोल से बाहर है.
कुछ तथ्य
इस एरिया में शूरवात से ही यानि लगभग पिछले 3-4 हजार साल से उथल पुथल रही है।
यंहा कम या
ज़्यादा तादाद में तीनों कौमे साथ साथ बसी रही हैं। सदियों से यंहा यहूदी ही आबाद
थे और कई बार अन्दर बहार होते रहे हैं. मगर 100 साल पहले तक यहाँ अधिकतर मुस्लिम
ही रह रहे थे. आखिरी बार यंहा मुस्लिम आबाद थे और अब यहूदियों ने यह जगह कब्ज़ा रखी हैं.
मस्जिदे अलअक्सा से यहूदी, इसाई और मुस्लिम तीनों जुड़ाव और ऐतिहासिक संबध रखते हैं. किसी भी धर्म वाले का ये कहना कि यंहा सिर्फ उन्हीं का महजबी हक़ है, ये गलत होगा. जमीनी हक़ की बात अलग है
मुस्लिमों के राज में अक्सर आम यहूदी महफूज़ रहा है. मुस्लिम की जंगे यहूदीयों के साथ कभी नहीं हुई बल्कि ईसाइयों के साथ हुई।
ऐसा नहीं है कि मुस्लिम मुल्क ने इसे जीतने के लिए कोई जंग नहीं छेड़ी। कोशिशें हुई मगर फिर बंद हो गयी। आखिर कोई भी देश अपने को कब तक युध्द में झोंके रख सकता है। इकॉनमी हिल जाती है। कई ने देशों वक़्त के साथ समझौते किये. सबके अपने फायदे-मजबूरियां हैं. किसी के सहारे कब तक लड़ाई की जा सकती है? ज्यादातर देशों ने इस्राइल को मान्यता दे दी है। दुनिया आगे बढ़ रही है और व्यापार, तरक्की पर ध्यान केंद्रित कर रही है। इस्राइल से लड़ने वाले मुस्लिम या अरबी मुल्क, हर युद्द में कम होते चले गए हैं. हर देश तरक्की के बाद ही अपनी बात मनवा सकता है.
ऊपर से हर युद्द के बाद इज्राएली विस्तार करता गया है. तो सोचना यह है कि फिर जंग क्यों छेड़ते हैं?
फिलिस्तीन में सिर्फ ज़ुल्म ही नहीं बल्कि जेनोसाइड है. हम सबको इसकी मजम्मत करनी चाहिए. गुस्सा आना भी लाज़मी है. हम जो कर सकते हैं वो हमे करना चाहिए, जैसे ऐड भेजें, दुवा करे, बॉयकोट करे, सियासी प्रेशेर डालें.
दूसरा रुख
बहुत से इजराईल या अमरीका विरोधी देश हमास को हथियार मुहया करवाते हैं. जैसे अलकायदा, आईसीस आदि को होते थे. हमास जैसे संगठन कट्टर या आतंकी कहलाये जाते हैं. हमास ने अटैक क्यों किया? किसने करवाया? जबकि सब जानते थे कि इजराईल को छुवा भी तो वो फिलिस्तीन से डबल बदला लेगा. ऐसा ही हुआ. अगर नुकसान फिलिस्तीन को हुआ तो इनसे ऐसा करवाने वाले को फायदा हुआ होगा. हमला करवाने वाले कौन हैं?
इजराईल दुनिया के सबसे बेहतरीन ख़ुफ़िया एजेंसी माने जाने वाली मोसाद को इस हमले का पता नहीं लग पाया और न ही अमेरिका को. ऐसा कैसे हो सकता हैं? हालाँकि कुछ रिपोर्ट्स कह रही कि अमरीका को पता था मगर उनसे छुपाये रखा, इसके पीछे अमरीका का क्या फायदा हो सकता है? कुछ रिपोर्ट्स कह रही हैं कि अमरीका आदि देशों ने इजराईल को हमले के बारे मे आगाह कर दिया था मगर इजराईल ने कुछ नहीं किया. क्या मोसाद पहले ही एक्शन न लेके, हमला होने का इंतज़ार कर रहा था ताकि फिलिस्तीन को खतम करने का बहाना मिल सके?
कुछ रिपोर्ट्स का कहना है कि इज़राएली PM नेतान्याहू अपना जनाधार खो रहे थे और ये हादसा उनको वापिस स्थापित करने और चुनाव जीतने का काम करेगा। नेता गण राजनैतिक फायदे के लिए कुछ भी कर सकते हैं, चाहे कोई भी देश हो। मगर ये भी सही है कि अटैक के बाद सियासी तौर पर उनकी बहुत आलोचना हो रही है।
रशिया समर्थित एक बहुत अहम ट्रांसपोर्ट कोर्रिडर रशिया, भारत, ईरान, यूरोप को जोड़ता है. इसके विरुद्ध अमरीका समर्थित एक ट्रैड रूट सऊदी से इजराईल को जोंडने वाला था. इसके लिए अमेरिका इन दोनों देशों को करीब भी लाया था जिसने सुर्खियाँ भी बटोरी थी. मगर इस हमले के बाद ये योजना खटाई में पड गयी है क्योंकि अरब के लोग अब इसे नहीं स्वीकारेंगे. इसलिए इसके पीछे रशिया, इरान का हाथ बताया जा रहा है.
इस पूरे खेल के पीछे चीन, रूस और अमेरिका है। अमेरिका एक ध्रुवीय (unipolar) दुनिया चाहता है, चीन दो ध्रुवीय (bipolar) और रूस बहु धुर्वीय (multipolar). पूरे विश्व में वर्चस्व, सत्ता, ध्रुवीकरण की लड़ाई चालू है जिसका एक मैदान मिडल ईस्ट और फिलीस्तीन भी है। हैथियार बनाने वालो को हथियार टेस्ट करने और बेचने दोनों के लिए एक वार ज़ोन चाहिए होते हैं. इन सबके बीच खुद को पिसने से बचाने वाले देश ही सही-सलामत रह पाते हैं। मुस्लिम देशों को आ बैल मुझे मार वाली कहावत खुद पर लागू नहीं करनी चाहिए।
यहूदी पक्ष
जैसे Islamophobia है वैसे ही Judeophobia भी है। तौहीद पर धर्मों में मुस्लिम के बाद यहूद ही सबसे ज्यादा अटल हैं (आर्य समाजी भी), ईसाइयों से भी ज्यादा क्योंकि उन्होंने खुदा के 3 टुकड़े कर दिए। यहूदी पहले कभी मानते होंगे मगर अब उजैर को अल्लाह का बेटा नहीं मानते। इनके यंहा शर्क की सजा मौत है।
यहूदी दुनिया की हर फील्ड में टॉप पर हैं. इन्हें बचपन में ही सबसे आगे रहने की सीख दी जाती है. दुनिया के कानून के मुताबिक ये काम कर रहे हैं और रिजल्ट हासिल कर रहे हैं. किसी कौम में ऐसे अच्छे लोग मौजूद हो और उनका एक हिस्सा दूसरों पर ज़ुल्म करे मगर अल्लाह उन्हें नहीं रोक रहा तो फिर अल्लाह यही होने देना चाहता है.
सारे यहूदी दुशमन नहीं होते. बहुत से मुस्लिम और फिलिस्तीन को सपोर्ट करते हैं. यहूदीओं का एक वर्ग Naturei Karta फिलिस्तीन के हक़ में है और किसी भी यहदी स्टेट के खिलाफ है जब तक उनका मसीहा नहीं आ जाता. अमेरिका में जब ट्रम्प ने मुस्लिमो के खिलाफ एक डेटाबेस बनाने को कहा था तो Anti Defemation League of Jews नामक संगठन ने अपने लोगों को मुस्लिम घोषित करने को कहा था. ऐसे और भी बहुत से यहूद लोग हैं जो हक़ का साथ देते हैं. यहूदी और ज़ायोनिस्ट अलग अलग हैं जैसे हिन्दू और हिदुत्वादी अलग अलग हैं या इस्लाम और इस्लामिस्ट.
इस पूरे कम्पाउन्ड को हरमशरीफ़ कहते हैं। हरमशरीफ़ में यहूदीयों का जाने का टाइम फिक्स है। जबकि Temple of Mount में ही Solomon Temple होना माना जाता है। अलअक्सा से मेराज हुई माना जाता है और इसे कूबबत सखरा कहते है। अलअक्सा में यहूदी नहीं जा सकते। इसराईली चाहे तो जबरदस्ती क्या नहीं कर सकते मगर वो ऐसा नहीं कर रहे। यह उनकी अच्छी बात है।
इज़राएल पीएम ने 2008 मे शांति वार्ताओं में फिलिसतीनी पीएम को पेशकश की थी कि येरूशलम को फिलिसतीन की राजधानी बना लो, सभी धार्मिक स्थल सऊदी, जोर्डन, फिलिसतीन, अमेरिका, इस्राइल के मिश्रित कंट्रोल में रहेगा और 1967 तक वाली कुछ जगहों को छोड़कर बाकी सभी जगह फिलिसतीन वापिस ले ले। फिलिस्तीन ने इसे नहीं माना जबकि इसे स्वीकार कर लेना चाहिए था. ऐसी ही एक बहुत ही बैलेन्स्ड पेशकश बाबरी मस्जिद की जमीन के बटवारें के संबंध में हिन्दू पक्ष की तरफ से आई थी जिसे मुस्लिम पक्ष ने नहीं माना जबकि मान लिया जाना चाहिए था। नतीजतन आखिर में पूरी मस्जिद ही हाथ से चली गयी। बल्कि इस मुद्दे कि वजह से वक्त के साथ एक पार्टी इतनी बड़ी हो गई कि उसने मुस्लिम वजूद ही अछूत बना दिया।
मुस्लिम की कमीयां
हमास का हालिया हमला भी बिलकुल गलत है. मगर मुस्लिम इसे गलत नहीं बोल रहे. हमास के हमले से ही ये तबाही सारी शुरू हुई. इस पर मुस्लिम कुछ नहीं बोल रहे.
ऐसे विवाद या मार काट दुनिया में और भी जगह हुए हैं और हो रहे हैं. इनमें ताकतवर जो चाहता हैं वही होता है. नहीं करोंगे तो उससे लड़ाई होगी. लड़ाई में अक्सर मजलूम से भी ज़ुल्म हो जाता है. कट्टर लोग आतंक के सहारे से मसले को हल करने की कोशिश करते हैं. इनकी करतूतों का असर दुनिया में दूसरी जगह दिखाई देता हैं. सभी जगह मुस्लिम को आतंकी मान लिया जाता हैं.
मासूमों को मारना गलत है. इस्लाम में इसकी इजाज़त नहीं. चाहे आज़ादी की कोई जंग ही क्यों न हो. हमास को आज़ादी क्रन्तिकारी कहा जाता है. संघर्ष और आतंकमें अंतर होता है. हमास ने कई मासूम इजराईलियों को मारा है. इन्हें इस्लाम के नाम पर हक़ पर नहीं ठहराया जा सकता. हमास को मेजोरिटी फिलीस्तीनी और अन्य मुस्लिम से समर्थन मिलने की वजह से सारे मुस्लिम पर ऊँगली उठती है. हमास को सपोर्ट करने वाले इस्लाम को बदनाम कर रहे हैं.
हमारे डबल स्टैन्डर्डस
जैसे इज्राएली द्वारा फिलिस्तीनी मासूमो का कतल भी जायज़ नहीं है. वैसे ही हमास द्वारा इस्राइली मासूमों का कतल भी जायज नहीं है।
कोई मुस्लिम आदमी या देश मुस्लिमों पर ही कितना भी अत्याचार करे जैसे शिया, हाजरा, बंगाली मुस्लिम,उसे कुछ खास नहीं कोसा जाता मगर जैसे ही उस आदमी या देश पर कोई गैर मुस्लिम द्वारा अत्याचार हो जाये तो पूरी दुनिया के मुस्लिम आंसू बहाने लगते हैं जैसे सद्दाम, गद्दाफी आदि. सऊदी अरब - यमन में जारी युद्द में 2021 तक 377000 लोग और 11000 बच्चे मारे जा चुके थे, इस पर मुस्लिम उफ्फ़ तक नहीं करते। ये हमें अक्सर नहीं दिखाया जाता क्योंकि दिखाने वालों को जिससे फायदा होगा, वही दिखाया जाएगा।
इसके अलावा दुनिया में बहुत सी जगह मुस्लिम गैर मुस्लिमों पर अत्याचार करता है जैसे पाक, बंगलादेशी हिन्दू, इसाई पर तब लोग उतने आंसूं नहीं बहाते. कश्मीर में भी ऐसा ही सुरत रही है. दूसरी कौमों के मजलूमों कल लिए मुस्लिम के दिलों में उतना दर्द क्यूं नहीं उठता? क्या मुस्लमान को ऐसा होना चाहिए? क्या इसीलिए हमारी अल्लाह मदद नहीं कर रहा?
हालिया रशिया और यूक्रेन युद्द में भी आम लोग मरे, मगर मुस्लिम हो या कोई अन्य धर्म वाले, उन्होंने इसकी उतनी निन्दा नहीं करी जितनी करनी चाहिए। लोग अपने धर्म वालों के लिए ज़्यादा चिल्लाते है या रोते हैं। जबकि इंसानियत का कतल हर जगह हो रहा है।
उम्मत का रद्दे अमल
ऐड, दुवा, बोयकोट, सियासी प्रेशेर सब अच्छी बातें हैं और करनी चाहिए. मगर इनसे क्या मसला हल हो जाएगा? नहीं.आवाज़ उठाना, सोशल मीडिया यूज़ करना, प्रोटेस्ट करना इनसे भी बात नहीं बनेगी.
जोश, जज़्बात, गुस्सा:
फिलिस्तीनी कह रहे हैं हमें लड़ाका भेजिए. बहुत से देशों के नौजवान जाना चाह रहे हैं. सब जानते हैं कि जा नहीं सकते. शायद एक-आध चला जाए किसी तरह (जैसे कुछ लोग आतंकी बनने जाते हैं). मगर बॉर्डर खोल दिए तो कोई जाने वाला दिखाई नहीं देगा. ये अपनी हुकूमतों से बॉर्डर खुलवाने के लिए कुछ नहीं कर रहे. सिर्फ दिखावा है. मगर यंहा और वंहा वाले ज्यादातर आर पार की जंग की बात कर रहे हैं. जंग कर भी लो तो उससे हल नहीं निकलेगा, फिलिस्तीन ही बर्बाद होगा. फिलिस्तीन मुद्दे को पूरी तरह महज़ब का इतर लगा दिया गया है यानी मज़हबी रंग में रंग दिया गया है, तो फिलिस्तीनी भी ख़ुशी से मरने मारने को तैयार हैं।. वैसे वो लोग भी इस जंग से परेशान है. जिस पर बीतती है वही हाल जानता है.
इस हमले के बाद आग बबूला होने वाले ज्यादातर जोशीले मुस्लिम नौजवान, इसके फोरन बाद शुरू हुए क्रिकेट वर्ल्ड कप में बिजी हो गए थे।
बॉयकॉट:
ये घीसा पिटा तरीका हो चुका है। सिर्फ बॉयकॉट का मतलब है आपके पास कोई दूसरा बेहतर हल नहीं है। ये टेम्पररी, कमसमझी, अटेंशन सीकर की निशानी है। दूसरी बात, किस किस का बॉयकॉट करंगे? और यह बॉयकॉट कितने दिन चलेगा?बाद में सब इस्तेमाल करने लगते हैं। क्या ये बॉयकॉट जंग रुकवा देगा? इज़राइल सुधर जाएगा। नहीं। ये नाकाफी है।
वैसे फेसबुक, इंस्टा, यूटूयूब, गूगल, व्हाट्सप्प वगैरह में किसी ने किसी यहूदी या इसराईली का शेयर है। इनका इस्तेमाल करने वाले बॉयकोट की बात न ही करे तो बेहतर है।
बोयकोट का डेटा कितना सटीक है, हम नहीं जानते। युध्द के माहौल में वर्ल्ड बिज़नेस पर भी प्रभाव पड़ता है। न कि सिर्फ बॉयकॉट मुहिम का। कई मिडिल ईस्ट, गल्फ देशों में ये बॉयकॉट सभी का नहीं बल्कि कुछ कंपनी का हो रहा है जिहोंने इज़राइली फौज को खाना या मदद मुहैया करवाई है। इनमें से कई कंपनियां है जिनके पूरा या ज़्यादातर या कम, अलग अलग केसेस हैं, स्टेक कई मुस्लिम देशों के लोकल मुस्लिम ही होल्ड करते हैं।
दुवा:
मुस्लिमों को सोचना चाहिये की पिछले 75 सालों से अक्सा के लिए दुवा हो रही है. दुवा कुबूल नहीं हो रही है. क्यों? क्या अल्लाह की नज़र में इस काबिल नहीं? क्या हमारे ईमान में कमजोर है?
अल्लाह की मदद क्यों नहीं आ रही है? ये कोई अजाब तो नहीं? क्या कश्मीर मुस्लिम की तरह वो भी कोई गलती तो नहीं कर रहे? क्या इंडियन मुस्लिम की तरह वो भी अल्लाह का पैगाम देने से तो नहीं चुके हुए हैं?
यही मुस्लिम सुबह शाम अपने आस पास वालो के साथ काम, धंधों, नोकरीयों, ज़िन्दगी,उनके हको में ज़ुल्म, ज्यादती, गुनाह कर रहे हैं? रोज़ इस्लाम, कुरान, नबी के साथ अन्याय कर रहे हैं. वो कैसे इनकी पुकार सुनेगा.
दुवा के साथ कुछ करना था, जैसे सलाउद्दीन या उमर ने किया था। उन्होंने कुछ किया। उस वक़्त जंग से अक्सर हल होते थे. आज के वक़्त में सियासी तौर पर होते हैं। तो दुवा के साथ वक्ती या जरूरी काम करने पड़ेंगे.
ईसा, मेहदी, गज़वा:
इनके आने न आने पर इख़्तेलाफ़ है। जब आयंगे तब आयंगे। नबी को भी यहूद ने ठुकरा दिया था कि हममें से नहीं है। मुस्लिम के हालात बताते हैं कि इन्हें भी न ठुकरा दे। आज जो भी करना है हमें करना है।
विवाद का हल
सियासी हल:
ये विवाद कोई धर्म की नहीं सियासी लड़ाई है। भले ही इस ज़मीन को पसंद करने की बुनियाद धर्म के आधार पर पड़ी हो. ये एक जिओ पोलिटिकल इश्यु है. सो उसे ऐसे ही लें. जमीन के मुद्दे असल में सियासी होते हैं. भले ही उनकी बुनियाद में मज़हबी पहलु छुपे हों. सियासी मुद्दे हक़-नाहक की बुनियाद पर हल नहीं होते. इनमें झुकना-झुकाना, दबना-दबाना दोनों होता है. जिस के पास ताकत होती है अक्सर उसी की चलती है. ऐसे जमीनी विवाद शुरुवात में सुलटा लिए जाए तो नासूर बनने से रह जाते हैं. जैसे बाबरी मस्जिद विवाद बढ़ा बनता गया जबकि शूरवात में ही बाबरी जमीन के बंटवारे की एक अच्छी पेशकश मान ली जाती तो विवाद सुलझ जाता और मुस्लिमो पक्ष के पास एक बड़ी जमीन भी रह जाती। इसलिए ऐसे विवाद का हल ट्रीटीज, सीजफायर, स्टेटस कौ है. शुरू में ही इजराईल को एक्सेप्ट कर लेना चाहिए था. हमले-जंग से इसका हल हमने हक़ में निकालना नामुकिन है. जब हमारे पास ताकत थी हमने उन्हें कई बार शिकस्त दी और हथिया लिया. आज उनके पास ताकत है तो जब भी जंग होती हैं वो और एरिया हथिया लेते हैं. लड़ाई उससे कड़ी जाए जिससे जीत जा सकता हो।
मजहबी हल:
उमर या खिलाफत के वक़्त तक एक स्टेट थी। सो मुस्लिम के पास यह जमीन थी। अंग्रजों ने पुरे अरब को किरचें कर के छोड़ा. आज ये कोई भी अरबी मुल्क साथ जुड़ना नहीं चाहता, सबके अपने मफाद हैं। फिर कैसे अक़्सा को हासिल करोगे? पहले खुद एक हो तो जाओ।
एक बार एक मुस्लिम से एक यहूदी ने अपनी कौन में चली आ रही है एक पौराणिक बात के आधार पर कहा था कि जब अक़्सा में फजर के नमाज़ी बाहर तक आ जायँगे तभी तुम्हे यह मिल पायेगा। यह एक बार नमाज़ पढने से नहीं होगा. इसका मतलब है सच में अल्लाह के एह्कामों को मानने वाले बन जाओगे यह तब होगा.
कुछ दूसरी जगह भी ऐसी लड़ाई हैं। वंहा भी ज़ुल्म हो रहा है। यक़ीनन वंहा भी ऐसा ही कुछ हल होगा। जैसे हमें पता है कि हिंदुस्तान के हालातों का हल कंहा हैं। वैसे ही हमें फिलिस्तीन का भी हल पता होना चाहिए. मुस्लिम कुछ करना चाह रहे हैं मगर उसकी बुनियाद इस्लाम को बना कर करना नहीं चाह रहे. अगर अल्लाह ही साथ न हो तो कुछ कर पाओगे। अगर वो नाराज़ है तो कुछ काम न आयगा. हल तो उसके तरीके पर चलकर ही होगा. यही तरीका नबी से चलता आ रहा है. इस्लाम में ही दीनी और दुनियावी दोनों हल छुपे हुए हैं. माना आपके हौंसले बुलन्द हैं मगर अल्लाह की मदद उसके एहल को ही मिलती हैं. जैसे सहाबा को मिली. क्या हम भी वैसे ही हैं? अभी तक को अल्लाह की कोई मदद नहीं मिली. तो हममें कुछ तो कमी होगी. इसलिए इस्लाम को पूरी तरह अपनाने और उस पर मुकम्मल तौर पर चलने के लिए जोश, जुनून दिखाएँ। पहले सच्चे मुसलमान बनिये, ईमान पुख्ता करिए औऱ दुवा करिए। फिर मुनासिब वक्त आने का इंतज़ार करिए। यक़ीनन तब ये सूरत बदलेगी।
कुरान और सीरत से उसूल
क़ुरान के दिये उसूल है कि जंहा जंग लड़नी है, वंहा जंग ही होगी, वंहा अवॉयड करना, शांति, हिजरत, मुवायदे जैसी चीज़ें नहीं चलेंगी और जंहा जंग से बचना है वंहा जंग नहीं चलेगी, वंहा ये उपाय ही अपनाने होंगे। हमने ये उसुल नहीं समझा है और न ही लागू कर पाते हैं।
जैसे सुलह हुदेबिया भी ज़मीन और वर्चस्व की लड़ाई थी. मुस्लिम ताकतवर थे फिर भी दब कर सुलह करी गयी. लोगों को नागँवार भी गुजरी. मगर नतीजतन इस्लाम का बहुत फैलाव हुआ.
इसी तरह मुस्लिम के पास ताकत नहीं थी तो उन्होंने और नबी ने हिजरत करी. फिर जब सही वक़्त आया तो अपने होमलैंड वापिस आये.
कुछ लोग ये शर्त लगाते हैं कि पहले इंसाफ हो जाए तो अमन आ जाएगा. ये बात गलत है. पहले अमन कायम होता है और फिर माहौल सही बन जाने पर इंसाफ भी मिलता है. सीरत से साबित है की सुलह के ज़रिये मुशरिकों के साथ अमन कायम किया गया और फिर सही वक़्त आने पर इंसाफ भी मिला. अंग्रेजों के साथ भी नर्म दल वाले सुलह और सियासत के ज़रिये कोशिश करते रहे है और अंग्रेजों के कमज़ोर होने पर आज़ादी भी मिली.
कुरान (5:21) के मुताबिक ये जमीन बनी इसराईल का होमलेंड है।
कुरान (5:21-26) ये जमीन तुम्हारे (बनी इस्राइल) लिए अल्लाह ने लिख दी है, जाके ले लो। इन्होंने इनकार किया। मूसा से कहा तुम लड़ कर ले लो। सो मूसा अलग हो गए। अब ये 40 साल तक भटकेंगे।
कुरान (3:113-115) ये सब एक से नहीं हैं, इनमें वो भी जो रातों को सजदे करते हैं, अल्लाह की आयतें पढ़ते हैं। जो अल्लाह, आखिरात मे यकीन रखते हैं, भलाई का हुकूम और बुराई से रोकते हैं, नेक अमल में एक दूसरे से आगे बढ़ते हैं, बेशक वो नेक लोगों में से हैं। उन्हें अच्छे कामों का बदल मिलेगा, अल्लाह उनके बारे में सब जानता है।
कुरान (5:82) तुम यहूद को ईमान वालो की दुश्मनी में आगे पाओगे और ईसाइयों को सबसे करीब।
कुरान (2:120) यह यहूद और नसार तुम से मुतमइन नहीं होंगे जब तक तुम उनके मजहब को मानने लगो।
कुरान (5:8) इनसाफ़ की निगरानी करनेवाले बनो और ऐसा न हो कि किसी गिरोह की शत्रुता तुम्हें इस बात पर उभार दे कि तुम इनसाफ़ करना छोड़ दो।
कुरान (4:97-100) जो लोग अपने-आप पर अत्याचार करते हैं, जब फ़रिश्ते उनके प्राण ग्रस्त कर लेते हैं, तो रिश्ते कहते हैं, तुम किस दशा में पड़े रहे? वे कहते हैं, हम धरती में निर्बल और बेबस थे। फ़रिश्ते कहते हैं, क्या अल्लाह की धरती विस्तृत न थी कि तुम हिजरत कर जाते? ये वही लोग हैं जिनका ठिकाना जहन्नम है सिवाय उन बेबस पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों के जिनके बस में कोई उपाय नही,अ अल्लाह माफ करने वाला है; जो कोई अल्लाह के मार्ग में घरबार छोड़कर निकलेगा, वह धरती में शरण लेने की बहुत जगह और समाई पाएगा, और जो कोई निकले और उसकी मृत्यु हो जाए, तो उसका प्रतिदान अल्लाह के ज़िम्मे है।
अंत में मुस्लिम के लिए सबसे ज़्यादा ज़ुरूरी यह है कि ये उलटी सीधी मुहिम की बजाय लोगों समझाए कि इस इशू का असली हल क्या है, कंहा है.
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क्या वाकई अब इज़राइली प्रोडक्ट्स हराम हो गए हैं और जहद अब वाजिब हो गया है?
चीजों का बॉयकॉट करना हराम इंसान खुद नहीं कर सकते। हराम करार देने का हक सिर्फ अल्लाह को है. मुस्लिम चाहे तो इन्हें ममनू कर सकते हैं मगर इस मुमानियत की बुनियाद पर वो दूसरों के सवाब-गुनाह का फैसला नहीं कर सकते। अगर कोई हरम फतवा देता है तो वो अनिवार्य नहीं है। आज फतवा एक राय है बस. कोई चाहे तो अपनी ज़िम्मेदारी समझ कर इन्हें बेशक बॉयकॉट करे मगर दूसरों को इसके लिए मजबूर न करे। क्योंकि इस कॉन्फ्लिक्ट को सॉल्व करने के लिये बहुत से और काम करने की ज़रूरत है, जो उम्मत नहीं करती है। वैसे भी ऐसे बॉयकॉट को एनालिसिस के बाद फॉलो करने में बेहतरी है कि इनसे कितना फायदा है। वैसे इस मुद्दे को हल करने के लिए बहिष्कार से ज्यादा कई और काम करने को उम्मत को ज़रूरत है, जो वो नहीं कर रहे हैं. बॉयकॉट करना एक जज़्बाती रिएक्शन है। ये शायद कुछ कुछ वैसा ही जैसे अंधभक्त अरब देशों का तेल इस्तमाल करते हैं और साथ ही मुसलमानों का बॉयकॉट करने की भी मुहिम चलाते हैं। बॉयकॉट सिर्फ खुद को मुस्लमान को साबित करने का एक और आसान तरीका। नाखून कटवा कर शहीदों में नाम गिनवाने जैसा। जो करना चाहिए, उसकी ओर निगाह तक नहीं है। असल मुमकिन हल की बात करने वालों को तो ये लोग यहूदी एजेंट, डरपोक, जाहिल वगैरह कहते हैं।
जहद करने का हुकुम क़ुरान ने मुस्लिम को दिया है. जंग के मामले में ये इन्फ्रादी हुकुम नहीं हो सकता और इश्तेमाई हुकुम के लिए मुस्लिम मुत्तहिदा होने चाहिए. तो क्या पहले उम्मत एक खलीफा या लीडर के मातहत है? पहले सबको एक छत के नीचे तो लाओ। अगर फिलिस्तीन पर कोई आलिम जहद का कोई फतव देता है तो वो फतवा, यानी राय है, उसे मानना लाज़मी नही है। वो नबी नही हैं और न ही इस्लाम पर सही अमल करने वाली कोई मुसलिम हुकूमत है। इन्हें ही इस तरह के जहद का हुकुम देने का हक़ है। आज की मुस्लिम हुकूमतों के ऐसा फैसलें भी सिर्फ उनकी हुकूमतों पर लाज़मी हो होंगे, बाकी देशों या लोगों पर नही। साथ ही ऐसे जहद को आतक न मिलाएं। वैसे ऐसे किसी भी फैसले के पीछे उन हुकूमतों की नीयत, मंशा, नतायज वगैरह देखने की भी ज़ुरूरत है क्योंकि कोई दूध का धुला नहीं है।
ये सच है कि क़ुरान में दिया जहद की हिदायत इंफ्रादी की बजाए एक इश्तेमाई हुकुम है। मगर इसका अहराहूम शूरा बयनहुम की बुनियाद पर होना चाहिये। साथ ही इस्लाम की जंग के लिए दी गई हिदायतें भी मानना जरुरी होगा जैसे सिर्फ जंगी लोगों को मारा जायेगा, माफी मांगने वाले को बख्शा जायेगा वगैरह। क़ुरान (8:60) ने जहद के लिए खुद को तैयार होने को भी कहा है (हम तो वेस्ट से हथियार खरीदने वालों में से है)। क़ुरान (8:65-66) कमज़ोरी के बाद उस वक़्त के एक मुस्लिम को दो के बराबर कहा है (क्या आज हम एक के भी बराबर हैं?)।
जिन कंपनियों का ये बॉयकॉट करते हैं, उनमें वाक़ई किन किन में इज़राईलीयों या इज़राईली कंपनियों की इन्वेस्टमेंट है और लिमिटेड है या एक्सटेंडेड? अगर इज़राइल से ज़्यादा अमेरिका की इन्वेस्टमेंट हैं तो इंडियन सबकॉन्टिनेंट के तमाम मुसलमान आज भी अनगिनत अमेरिकी प्रोडक्ट और कंपनियां के कंज़ुयमर हैं जिनमें उनके सोशल मिडिया प्लेटफार्मस सरे फेहरिस्त हैं। आज के ग्लोबलाइजेशन, इकॉनमिक इंटर डेपडेंस और कॉम्प्लेक्सड बिज़निस मॉडल के दौर में बॉयकॉट करने से वाक़ई कोई फायदा है, मुझे इसमें भी शक है।
इज़राईली ऑक्यूपेशन, स्टेट्स कौ एक्सेप्ट करना, पीस ट्रीटी करना, जितना पॉसिबल है उतना माइग्रेशन करना जैसे ही रास्ते फिलहाल हल दिखाई देते हैं। अगर वाकई कुछ करना है तो मुसलमानों को इस चीज़ को रीलाइज़, अवेयर करवाया जाए।
कोई भी ग्लोबल पावर 100-150 साल से ज़्यादा अपनी स्तिथि मॉडर्न हिसट्री में क़ायम नहीं रख पाया है। इज़राईली भी नहीं कर पाएगा। सही वक्त में सब सही हो जाएगा।
सबसे पहले तो इसे इस्लामिक लड़ाई मानना बंद करें। अगर वाकई मानना है तो फिर इसके हल के लिए इस्लाम की ओर ही लौटे जो क़ुरान और रिसालत में वाज़ेह है। मगर इन्हें तो दुनिया के हिसाब से एफर्ट करने है, इस्लाम के मुताबिक नहीं।
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बॉयकॉट वाला आज के दौर में इंप्रैक्टिकल है। इज़राइली प्रोडक्ट्स की एक लिस्ट ऑथेंटिक बना दीजिए (कंपनी होल्डिंग्स, इज़राइल को रेवेन्यू, ओनर्स वगैरह जैसी डिटेल्स के साथ), सोशल मीडिया साइट्स, अप्प्स पर किसका कितना (इज़राएली/अमेरिकी) शेयर है, ये भी बताया जाए. इन्हें तो सभी मुस्लिम इस्तेमाल करते हैं। फिर हम भी बॉयकॉट करेंगे, उससे पहले नहीं।
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Lights Off campaign for Palestine
लाइट्स स्विच ऑफ कैंपेन विरोध में एक सिंबॉलिक मैसेज है। ऐसी मुहिम कितनी सफल होती है, ऐसी कोई रिसर्च या जानकारी मुझे नहीं है. लेकिन कुछ न करने से, कुछ करना बेहतर है। यह प्रोडक्ट्स का बॉयकॉट करने से ज़्यादा आसान और सुविधाजनक लगता है। सबको एक प्लेटफॉर्म पर लाना एक हद तक मुमकिन लगता है। वर्क ने शुरू किया है तो अच्छा ही किया होगा, वैसे भी अभी तक इस ने इस इमोशनल इशू पर कोई खास मुहिम नहीं चलाई थी। ऊपर से आज कल इनका सोशल मीडिया पर काम ज़्यादा करने का प्लान चल रहा है। ऑनलाइन पहल में उतने रिसोर्स नहीं लगते हैं। गैर मुस्लिम देशों के लोग भी कुछ न कुछ कर रहे हैं इस इशू पर। बाकी इससे कितना फायदा वकई फिलिस्तीन को होगा, इजराईल के सामने, उस पर कुछ कहना जल्दी होगा अभी. कुछ आइडियाज़ वक़्त के साथ दिमाग में आते हैं, ये भी शायद बाद में दिमाग आया हो । ज़रूरी नहीं किसी प्लान से सिर्फ़ एक ही मकसद हासिल करना मकसद हो। कई मकसद साथ होते हैं। जैसे पिटीशन साइन करवाना सिर्फ़ अकेला मकसद नहीं है। साइन के साथ-साथ वो साइन करने वाला लोकल आदमी आपके टच ने आ जाता है जो एक लीड बन जाती है आगे काम करने के लिए। इसी तरह क्विज़ का मकसद लोगों को टच में लाना, उन्हें काम की आइडियोलॉजी समझाना भी होता है। अपने लोकल टाइम के हिसाब से करें, 3 दिन तक, जो आगे बढ़िया भी जा सकता है। ज़हिर है एरिया वाइज भी इम्पैक्ट पड़ेगा एलगोरिदम पर। यह एक ट्रायल है, उसके बाद वर्ल्ड लेवल पर भी एक साथ हो सकता है। बाकी मकसद क्या हो सकते हैं इस कैंपेन के। वैसे भी सिर्फ एक बार करके, कोई असर नहीं पड़ना। अगर यह सफल हुआ तो बड़े लेवल पर किया जा सकता है।
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Ashkenazi Jews
Ashkenazi शब्द अश्केनाज़ Ashkenaz से निकला है, जो Gomer का बेटा, जो Japhet का बेटा और Noah का बेटा था। अश्केनाज़ी यहूदी डायस्पोरा का ही एक अलग उपसमूह है, जो ईसाई धर्म के आने के बाद यूरोप में उभरा। वे Yiddish भाषा बोलते हैं, जो बाद में उत्पन्न हुई भाषा है। वे अन्य यहूदी आबादी के साथ अपने वंश (ancestry) का हिस्सा साझा करते हैं। ये एक अलग समुदाय के रूप में कैसे अस्तित्व में आए, यह ज्ञात नहीं है और अलग अलग अनुमान हैं। नाज़ीयों द्वारा इनकी बड़ी आबादी का कत्ले आम कर दिया गया था। हिटलर द्वारा नरसंहार के बाद, यूरोप से अश्केनाज़ी बड़ी संख्या में इज़राइल में आकर बसे थे. अब ये इज़राइल और दुनिया भर में यहूदी आबादी का लगभग एक तिहाई हिस्सा हैं।
3 प्रमुख डायस्पोरा हैं: Assyrian Exile (8th cent. BC), Babylonian Exile (6th cent. BC) and Roman Exile (1st cent. AD).
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येरूशलेम पर 2 बड़े हमले: एक हमला बाबिल के बादशाह ने किया जिसके बाद Cyrus इन्हें वापिस लाया और दूसरा हमला Titus रूमी ने किया.
इसे कुरान, दावत, दुनियावी तीनो नजरिये से देखा जा सकता है। कुरान कहता है कि यहुद के नाम वो जगह लिख दी गई है। दावत कहती है कि ज़िम्मेदारी नहीं निभायी तो अजाब आएगा। दुनिया के हिसाब देखें तो दो कौमे, एक ताकतवर और एक कमज़ोर लड़ रहे हैं, दोनों धर्म के आधार पर, तो यही सब होगा।
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