Saturday, 6 November 2021

गैर मुस्लिम त्योहारो पर मुबारकबाद न देने के हक़ में दी जाने वाली दलीलों का जायज़ा।


गैर मुस्लिम को उनके त्योहारो पर मुबारकबाद न देने के हक़ में दी जाने वाली दलीलें।

एक मेसज है जिसमे दलीलों (हदीसों, तारीख़, फतवो) का अंबार लगाकर ये साबित करने की कोशिश की गयी है कि गैर मुस्लिमों को उनके त्योहारों पर मुबारकबाद देना नाजायज़ या हराम है। आइए इन दलीलों का जायज़ा लेते है। सबसे पहली बात ये है कि गैर मुस्लिमों को मुबारकबाद देना और त्यौहार मानना दो अलग बातें है। हम मुबारकबाद देने के कायल है और उसी के तहत इस मसले को समझेंगे।  हमेशा से होता ये आया है की कोई भी आलिम ऐसी कोई आयात या हदीस पेश नहीं कर पाता है जिसमें गैर मुस्लिमों को उनके त्यौहारों पर मुबारकबाद देना सीधा सीधा मना किया गया हो। सब अलग अलग तरह से ये अखज़ करते है। जबकि दीन की दावत देने के लिए मदुऊ से अच्छे रिश्ते बनाने के ऐतबार से ऐसी मुबारकबाद देने के बाज़ वक़्त मौके आते है।  असल मे ऐसी कोई हदीस पाई ही नहीं जाती जहाँ ऐसी मुमानियत साफ लफ़्ज़ों में बयान की गई हो। जो हदीसे पेश जी जाती है उनसे अपने अक़ीदों के तहत रिजल्ट निकाला गया है, न कि इंडिपेंडेंटली। तारीख में जो रिवायतें मिलती है वो भी सीधा मुबारकबाद की मनाही नहीं करती बल्कि वो तो सियासी फैसलों के मुताल्लिक़ है। उलेमाओं के दिये फतवों में इन्ही बातों को  बुनियाद बनाया गया है सो इन बुनियाद को ही जांचना ज़ुरूरी है। इमाम इब्ने तय्मिया, इमाम इब्न क़य्यिम जैसे बहुत से बड़े उलेमाओं की जिन्होंने मुबारकबाद को नाजायज़ या हराम करार दिया है, इस सिलसिले में ये बात समझ लेनी चाहिए कि ज़्यादातर आलिम फतवे अपने वक़्त, देश, काल, परिस्थितियों वैरगह के मद्देनजर देते है, आने वाले वक़्त, ज़रूरतों, माहौल वैगरह में मसलों को नई तरह से क़ुरान और सुन्नत की रोशनी में जांचा जाएगा और सुलझाया जायगा। आइए अब वो दलीले देखें:

1.
When the Messenger of Allah ‌came to Madina, the people had two days on which they engaged in games. He asked: What are these two days (what is the significance)? They said: We used to engage ourselves on them in the pre-Islamic period. The Messenger of Allah said: Allah has substituted for them something better than them, the day of sacrifice and the day of the breaking of the fast. (Abu Dawood 1134)

इस हदीस में सबसे पहली बात ये नोट करने की है कि इसमें जाहिलियत के दौर के त्योहार को मनाने की बात हो रही है (वो भी कुछ खेल तमाशे आदि की) , न कि उस पर किसी को मुबारबाद देने की। दूसरी बात इस हदीस में लोगों को त्योहार मनाने को डायरेक्टली मना नही किया जा रहा है। क्योंकि वजह साफ है की ये कोई शिरकीया त्योहार नहीं था अगर होता तो नबी ऐसी कोई हिदायत देते कि ये हरगीज़ न किया करो। पर यंहा उन्होंने ये कहा है कि अल्लाह ने इससे बेहतर तुम्हें 2 त्यौहार दिए है, उन्हें मनाओ। यंहा लफ्ज़ 'बेहतर' पर गौर करें। यानी कोई चीज़ ठीक और सही पर उससे बेहतर भी हमारे पर कुछ मौजूद है तो वो इस्तेमाल करे। ये वैसे ही है जैसे सुन्नत के तहत मुश्किल से बेहतर है आसान रास्ते या तरीके इस्तेमाल करने। आखिरी बात ये है कि मदीने के लगभग तमाम मुसलमान इस्लाम ला चुके थे और अपने जाहिलियत के दौर के सारे रीति रिवाज तौर तरीके आदि छोड़कर इस्लामी तरीके अपना चुके थे, इसलीये उन्हें ऐसा करने से रोकने में कोई हर्ज नहीं था क्योंकि वो इस्लाम को सबसे बरतर मान चुके थे। पर अगर मदीने के यही लोग गैर मुस्लिम होते तो वो इस्लाम की 2 ईदों को अपने त्योहारो पर तरजीह देने की बात मानना तो दूर सुनते भी नहीं। 

लोगो के अपना कल्चर अपनी जानों से बढकर होता है, इतिहास गवाह है कि जब कंही किसी के कल्चर पर दूसरे समुदायों या बाहरी लोगों ने हमला किया है तबाही ही तबाह हुई है, ऐसा आज भी होता है। यही वजह है की इस्लाम ने कभी मुसलमानों को किसी का कल्चर, बूत, धर्म, इबादतगाह खत्म करने का हुक्म नहीं दिया। बल्कि इस बात को तरजीह दी कि लोग खुद चाहे तो अपना धर्म बदल लें, या अपने बुतों को तोड़ दें या अपनी गेरुल्लाह के लिये बनाई इबदतगाहें ढहा दे पर ये काम वो क़ौम खुद करें तभी जायज़ है वरना मुस्लिम ऐसा किसी दूसरी क़ौम या मज़हब वालों के साथ हरगिज़ न करे। इसी वजह से इस हदीस में नबी ने एक समुदाय को ऐसा कहा जिसके यही मायने है कि तुम खुद अपने पुराने त्योहार पर अब नए त्योहार को तरजीह क्यों नहीं देते जबकि तुम असल दीन में लौट आये हो।

2.
In the time of the Prophet a man took a vow to slaughter a camel at Buwanah. So he came to the Prophet and said: I have taken a vow to sacrifice a camel at Buwanah. The Prophet asked: Did the place contain any idol worshipped in pre-Islamic times? They (the people) said: No. He asked: Was any pre-Islamic festival observed there? They replied: No. The Prophet said: Fulfil your vow, for a vow to do an act of disobedience to Allah must not be fulfilled, neither must one do something over which a human being has no control. (Abu Dawood 3313)

इस हदीस में भी वो सहाबी किसी गैर मुस्लिम को मुबारकबाद देने नहीं जा रहे थे। बल्कि एक खास अमल करने जा रहे थे। ये किसी गैर इस्लामी रीति रिवाज में शामिल होने के जैसा तो नहीं है इसीलिए नबी ने ये जानने की कोशिश की वंहा इस्लाम से पहले कंही कोई शिरकीया या गैर अख़लाक़ी त्यौहार या अमल तो नहीं होता है। क्योंकि सहाबी ने बता दिया कि कोई इस्लाम से पूर्व वंहा कोई त्योहार नहीं मनाया जाता था तो आगे ये पूछने की ज़रूरत ही नहीं थी कि वो किस तरह का त्योहार था या कैसे मनाया जाता था वैगरह। बल्कि आपने सीधा ही उन्हें ये अमल करने का हुक्म दे दिया।

3.
Narrated Aisha: Abu Bakr came to my house while two small Ansari girls were singing beside me the stories of the Ansar concerning the Day of Buath. And they were not singers. Abu Bakr said protestingly,   Musical instruments of Satan in the house of Allah's Apostle !   It happened on the `Id day and Allah's Apostle said,   O Abu Bakr! There is an `Id for every nation and this is our `Id. (Bukhari 952)

Abu Bakr came to see me and I had two girls with me from among the girls of the Ansar and they were singing what the Ansar recited to one another at the Battle of Bu'ath. They were not, however, singing girls. Upon this Abu Bakr said: What I (the playing of) this wind instrument of Satan in the house of the Messenger of Allah and this too on 'Id day? Upon this the Messenger of Allah said: Abu Bakr, every people have a festival and it is our festival (so let them play on). (Muslim 892)

इन हदीस में कंहा से गैर मुस्लिमो के त्योहारों पर मुबारबाद देने की मनाही आयी है। बल्कि इसमें तो नबी ने ये साफ कर दिया कि हर क़ौम का एक त्योहार ज़रूर होता है और हर क़ौम उसे मानती है। जब मक्का और मदीना इस्लाम की आगोश में नहीं आया था, बुआत की जंग उससे पहले का वाक़या था।

फिर इस दिन हब्शी लोग ढाल और भालों के साथ करतब दिखाने का खेल करते थे, नबी सल्ल० ने हज़रत आयशा को उनकी इच्छा पर ये करतब भी उनका दिल भर जाने तक दिखाए और करतब दिखाने वालों का उत्साह भी ये कह कहकर बढ़ाते रहे "ओ बनी अफरीदा, लगे रहो" (सही बुख़ारी, किताब-15 हदीस नम्बर-70). इससे ये साफ है कि यंहा संगीत, गीत, खेल, तमाशों वगैरह का ताल्लुक आनन्द लेने से था,न कि शिर्क और कुफ्र से।

4.
The Prophet said: The day of Arafah, the day of sacrifice, the days of tashriq are (the days of) our festival, O people of Islam. These are the days of eating and drinking. 

इससे कोई मुबारकबाद की मुमानियत साबित नहीं होती।

5.
Hazrat Umar (R) used to say, "Keep away from the enemies of Allah on their festivals."
 [اجتنبوا اعداء اللہ فی عیدہم](سنن کبری، بیہقیؒ:۹/۳۳۴/۱۸۶۴۱)

इसमें तो अल्लाह के दुश्मनों की बात हो रही है (जैसे काफ़िरों की, न कि गैर मुस्लिमों की) और उनके त्यौहार से बचने को कहा गया है यानी उसमें शरीक होने से बचने के लिए। इसमें भी मुबारकबाद देने की कोई मनाही नहीं दिखाई देती है।

6.
On the contrary, the legal treaty known as the "Shuroot e Umriya" (Conditions of Umar) which Hazrat Umar (R) applied to the Dhimmis during his caliphate also includes the clause that they will not celebrate their festivals in public in Dar-ul-Islam. At that time, the festivals of the Iranian Magus Dhimmis were "Ba'uth" and "Sha'anin". Therefore, it is stated in the condition of Umar : “We will not show Ba'ath and Sha'anin.  In Ba'uth, these people used to gather in the same way as Muslims gather on Eid al fitr and Eid Al adha.
[وألا نخرج باعوثا- قال والباعوث یجتمعون کما یخرج المسلمون یوم الأضحیٰ والفطر- ولا شعانین] (احکام اہل الذمۃ، ابن القیمؒ،تحقیق: یوسف البکری وشاکر العارودی:۳/۱۱۵۹)

ये तो सियासी फैसला मालूम पड़ता है और जिसमें त्यौहार के खुले में मनाने पर रोक है। इसमें मुबारकबाद का ज़िक्र कंहा है। दूसरी बात यंहा सब्जेक्ट दारुल इस्लाम और ज़िम्मि है, न कि यंहा किसी डेमोक्रेटिक राज्य की बात हो रही है जिनमे आज अधिकतर विश्व की जनसंख्या रहती है और जंहा गैर मुस्लिम की बहुतायत है।

7.
Rather, as it is in the books of Tafsir Bal-Mathur that Hazrat Abdullah bin Abbas and five glorious commentators with him gave instructions that ''والذین لا یشہدون الزور''  [And they do not testify falsehood] (Surah Furqan:72) It has been inferred from this that the servants of the Most Gracious Allah do not attend the festivals of the infidels because their festivals and ceremonies are also included in the "Zur / falsehood"
(تفسیر ابن کثیرؒ:۶/۱۳۰۔ الدر المنثور، سیوطیؒ:۱۱/۲۲۵-۲۲۶۔ تفسیر البغوی:۶/۹۸)

यहाँ भी मुबारकबाद की नहीं बल्कि जूठे अक़ीदों (या त्यौहार भी इसमें मान ले) को हक़ तस्लीम करने की बात हो रही है। कोई मुस्लिम गैर मुस्लिम को उनके त्योहार पर मुबारकबाद देते हुए उनके अक़ीदों को सही नहीं मानता है।

■ यहाँ एक हदीस का ज़िक्र ज़रूरी है जिससे दूसरे मज़हब के त्योहार पर उन्ही की तरह का जायज़ अमल करने की बात सामने आती है। बुख़ारी, किताब-55, हदीस-609 बताती है कि जब नबी सल्ल० मदीना आये तो यहां यहूदियों को दसवीं मुहर्रम का रोज़ा इस ख़ुशी में रखते देखा कि उस दिन हज़रत मूसा को फ़िरऔन से बचाया गया था और इस दिन इसलिए हज़रत मूसा रोज़ रखते थे खुदा की शुक्रगुज़ारी में। तो आप सल्ल० भी इस दिन रोज़ा रखने लगे कि ये कहकर की हम तो मूसा अलैहिस्सलाम के ज़्यादा क़रीब हैं। ये रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ होने से पहले की बात है। क़ुरआन में अल्लाह की तरफ से इस मुहर्रम के रोज़े का हुक्म नही दिया गया था। ये एक ऐच्छिक रोज़ा है। वैसे ये तो इस्लाम में एक धार्मिक रिवाज़ पैदा करने की मिसाल है जिसका अधिकार सिर्फ़ नबी सल्ल० को था।

तो इस तरह यही बात सामने आयी कि ये सब दलीलें मुबारकबाद देने से नहीं रोकती है और ये आउट ऑफ कॉन्टेक्स्ट कोट की जा रही है।

दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...