Thursday, 24 February 2022

चारों युग, धर्मराज व विश्वगुरु की अवधारणा।



 युगकाल विवरण 


 4 युग होते हैं सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग. इन चारों युगों का मिलाकर चतुर्यग कहा जाता है। युगकालों का उल्लेख विभिन्न ग्रंथों जैसे पुराणों, मनुस्मृति और महाभारत में आता है। सतयुग को कृतयुग भी कहते है और कलियुग को साधारण भाषा में कलयुग कहते हैं. प्रत्येक युग में मान्य नियम, कर्तव्य, मार्ग आदि को युगधर्म कहा जाता हैं (शरियत के समानांतर समझ सकते हैं).

सतयुग उसे कहते है जिस युग के चारों भागों में सत्य हो यानी 100%. सतयुग में अच्छाई ही अच्छाई होती है,  बुराई नहीं। सबसे पहले इस संसार में सतयुग ही था, लोगों में बुराई पैदा हुई और त्रेतायुग आया। त्रेतायुग उसे कहते है जंहा 3/4 भाग में अच्छाई होती है पर उस युग में थोड़ी बुराई भी होती है। जब बुराई और अधिक बढ़ने लगी तो द्वापरयुग आया। द्वापरयुग उसे कहते है जिस काल में आधी अच्छाई और आधी बुराई, यानी दो दो भाग में। अंत में जब बुराई ने सारी सीमाएं लांघ दी तो कलियुग आरम्भ हुआ। कलियुग कहते है उस काल को जब समाज में इतना बिगाड़ आ चुका हो कि चारो ओर बुराई ही बुराई हो, अच्छाई नाममात्र की रह जाए अर्थात एक 1/4 अच्छाई रह जाए।

इन युगों में अवतार भी होते है। सतयुग में 4 अवतार हुए है, मत्स्य, कर्म, वराह व नरसिंह। सतयुग में पुष्कर प्रमुख स्थान था। इसमें हिरण्यकश्यप जैसे दैत्यों के संहार हुआ था। सतयुग में राजा हरिश्चन्द्र जैसे महापुरुष हुए है जिन्होंने बड़े बड़े बलिदान दिए पर सत्य को नहीं छोड़ा। सतययुग में आयु लाखों वर्ष की और मानव की लंबाई 32 फ़ीट तक होती थी। त्रेतायुग में 3 अवतार हुए है, वामन, परशुराम और श्रीराम। बलि व रावण जैसे राक्षसो का संहार हुआ है।  द्वापरयुग 2 अवतार हुए है, श्रीकृष्ण और बलराम। इसमें कंस का वध हुआ है। सतयुग में केवल 1 ही अवतार आने है, कल्कि अवतार। कल्कि के आने के बाद कलयुग का अंत होना है।  कलियुग में एक चौथाई तक अच्छाई व नैतिकता कम हो जाती है। मानव आयु घटते हुए 20 तक आ जाती है। पांच साल की बालिका गर्भवती होने लगती है। कलियुग को डार्क ऐज भी कह सकते है। जैसे डार्क ऐज के बाद रैनेसां काल आया था, वैसे ही इसके बाद सतयुग आना है। आर्यभट्ट और सूर्यसिद्धांत ग्रंथ के अनुसार कलियुग 3102 ईसापूर्व आरम्भ हुआ था। श्रीकृष्ण के मृत्यु के बाद ही इसका आरंभ माना जाता है।

कल्प का अर्थ हैं सृष्टि रचना से पुनः संरचना तक का काल, इसके बाद ही प्रलय होती है। 1 कल्प में 4.32 बिलियन वर्ष होते है। प्रत्येक कल्प में 14 मन्वंतर होते है। 1 मन्वंतर में लगभग 30 करोड़ वर्ष होते है। युगों की दृष्टि से वर्ष दो प्रकार के होते हैं:- दिव्य वर्ष (या देव वर्ष) यानी देवताओं के वर्ष और मानव वर्ष (मानवीय वर्ष) यानि मनुष्यों के वर्ष.

देवताओं के 12000 वर्ष के 4 युग होते है। इनमे चार युग 4800, 3600, 2400, 1200 देव वर्ष के होते है। एक कल्प में 1000 चतुर्यग होते है।  महाभारत (शांति पर्व/12: अध्याय 231: 17), मनुमृति (1:67), मत्स्यपुराण (अध्याय 142), गरुड़पुराण (खंड 1, अध्याय 223), विष्णुपुराण (1:3), सूर्यसिद्धांत (1:13) में इसका उल्लेख है। महाभारत (वनपर्व/3: 190:88-91) में सतयुग आगमन के नक्षत्रों का उल्लेख है। 

मनुष्य का 1 वर्ष देवताओं के 1 दिन के बराबर होता है. जब दिव्य वर्षों के युगों को 360 से गुणा करते हैं तो मानव वर्षो के युग वर्षों की संख्या निकल कर आती है. यानी सत्ययुग 17.28 लाख वर्ष का, त्रेतायुग 12.96 लाख वर्ष का, द्वापरयुग 8.64 लाख वर्ष का और कलियुग 4.32 लाख वर्ष का होता है।

प्रश्न यह है कि अगर लाखों वर्षोँ के युगकाल होते हैं तो इतनी जल्दी युग परिवर्तन कैसे हो सकता है? ये सत्य है कि अब तक युगकाल एक अनसुलझी पहेली रही है। ग्रंथों व शास्त्रों से युग के भिन्न भिन्न काल और समय भी सिद्ध होते हैं जैसे क्षण भर से लेके 5, 10, 50 वर्ष, हज़ारो वर्ष और लाखों वर्ष भी। कुछ विद्वानों ने चतुर्यग के प्रत्येक युग को 1250 वर्ष या 3000 वर्ष का भी माना है। अन्य भी बहुत से मत या संख्याएँ हैं. इसके अलावा कुछ विद्वानों ने इन युगों का क्रम ढलते और चढते (आरोही और अवरोही) हुए क्रम में यानी सतयुग से त्रेता फिर द्वापर फिर कलयुग और फिर कलयुग से वापिस द्वापर फिर त्रेता और फिर सतयुग माना है जो फिर इसी तरह बार बार चलते रहते हैं।

सामान्यतः पुराणों के आधार पर युगों को लाखों वर्षों की अवधि माना जाता है। जबकि तर्कशील विद्वानगण पुराणों में आये इस प्रकार के युगों की कालावधि सम्बंधित सन्दर्भों को अलंकारिक वर्णन व कल्पित व्याख्यान मानते है। दूसरी ओर बहुत से ज्योतिषों का मत है कि ये युगकाल गणनाएं मात्र पृथ्वी की चाल पर नहीं बल्कि सम्पूर्ण सौरमंडल के ग्रहों आदि की चाल पर आधारित है इसलिए मानवजाति के लिए युगकाल हज़ारों वर्षो का होता है।

कुछ विद्वानों का मानना है कि महाभारत और मनुस्मृति में आये युगकाल हज़ारो वर्षो के होते हैं जिन्हें बाद में पुराणों में अपनी अलग गणनाओं के आधार पर लाखों वर्षों का सिद्ध किया जाने लगा। इन दोनों ग्रंथो में मनुष्य के लिए कुल 12000 वर्षों का चतुर्यग कहा गया है जिसमें सतयुग 4800, त्रेता 3600, द्वापर 2400 और कलियुग 1200 वर्षो का होता है। हालांकि अधिकतर व्याख्याकारों ने इन्हें देवताओं के या देवों के दिव्य वर्ष लिखा है जबकि श्लोकों की मूल संस्कृत से ये मानवीय ही सिद्ध होते हैं, न कि दिव्य।

 


युगकालिक पौराणिक आदि गणनाएँ। 

 
● (1)   नेमीचंद्र शास्त्री: ज्योतिष धारणा के अनुसार सूर्य उदय से लेकर अगले दिन के सूर्य उदय तक के समय को अहोरात्र अर्थात 1 पूर्ण दिन माना गया है। इस अहोरात्र में 30 मुहूर्त और 8 प्रहर होते हैं। 15 दिन का 1 पक्ष होता है। 2 पक्षों का 1 अयन होता है। 2 अयनों का 1 वर्ष होता है। वर्ष को 'संवत्सर' कहते हैं। इस तरह 60 संवत्सर होते हैं। धरती को राशि मंडल की पूरी परिक्रमा करने या चक्कर लगाने में कुल 25,920 साल का समय लगता है। 5 वर्ष का 1 युग होता है। संवत्सर, परिवत्सर, इद्वत्सर, अनुवत्सर और युगवत्सर ये युगात्मक 5 वर्ष कहे जाते हैं।  ऋग्वेद में काल मान का द्योतक युग शब्द कई स्थानों में आया है, लेकिन कल्प शब्द का प्रयोग इस अर्थ में कहीं पर भी दिखलाई नहीं पड़ता है। ऋग्वेद में युग के संबंध में कहा गया है- तदूचुषे मानुषेमा युगानि कीर्तेन्यं मधवा नाम विभ्रत्। उपप्रमंदस्युहत्याय वज्री युद्ध सूनु: श्रवसे नाम दधे।। (ऋग्वेद संहिता 1.103-4). इस मंत्र की व्याख्या करते हुए सायणाचार्य ने लिखा है- मनुष्याणां सम्बन्धीनि इमानि दृश्यमानानि युगानि अहोरात्रसंघनिष्पाद्यानि कृतत्रेतादीति सूर्यात्मना निष्पादयतीती शेष:। अर्थात सतयुग, त्रेतादि युग शब्द से ग्रहण किए गए हैं। इससे स्पष्ट है कि वेदों के निर्माण काल में सतयुग, त्रेतादि का प्रचार था। ऋग्वेद के निम्न मंत्र से युग के संबंध में संबंध में एक नया प्रकाश मिलता है।  दीर्घतमा मामेतयो जुजुर्वान् दशमे युगे। अपामर्थं यतीनां ब्रह्मा भवति सारथि।। (ऋग्वेद संहिता 1.158.6) अर्थात इस मंत्र में एक आख्यायिका आई है तथा उसमें कहा गया है कि ममता के पुत्र दीर्घतम नाम के महर्षि अश्विन के प्रभाव से अपने दुखों से छुटकर स्त्री-पुत्रादि कुटुम्बियों के साथ 10 युगपर्यंत सुख से जीवित रहे। यहां 10 युग शब्द विचारणीय है। यदि 5 वर्ष का युग माना जाए, जैसा कि आदिकाल में प्रचलित था तो ऋषि की आयु 50 वर्ष की आती है, जो बहुत-थोड़ी प्रतीत होती है और यदि 10 वर्ष का 1 युग माना जाए तो 100 वर्ष की आयु आती है। वैदिक काल के अनुसार यह आयु भी संभव नहीं जंचती। दूसरी ओर 10 वर्ष ग्रहण करना उचित नहीं।   सायणाचार्य ने युग की इस समस्या को सुलझाने के लिए 'दशयुगपर्यन्तं जीवन् उक्तरूपेण पुरुषार्थसाधकोस्भवत्' अथवा 'जीवन् उत्तररूपेण पुरुषार्थसाधकोस्भवत्' इस प्रकार की व्याख्‍या की है। इस व्याख्या से युग प्रमाण की समस्या सरलता से सुलझ जाती है अर्थात दीर्घतमा ने अश्‍विन के प्रभाव से दुख से छुटकारा पाकर जीवन के अवशेष 10 युग अर्थात 50 वर्ष सुख से बिताए थे। अतएव इस आख्यायिका से स्पष्ट है कि उदयकाल में युग का मान 5 वर्ष से लिया जाता था।  ऋग्वेद के अन्य 2 मंत्रों से 'युग' शब्द का अर्थ काल और अहोरात्र भी सिद्ध होता है। 5वें मंडल के 76वें सूक्त के तीसरे मंत्र में 'नहुषा युगा मन्हारजांसि दीयथ:' पद में युग शब्द का अर्थ 'युगोपलक्षितान् कालान् प्रसरादिसवनान् अहोरात्रादिकालान् वा' किया गया है। इससे स्पष्ट है कि उदय काल में युग शब्द का अन्य अर्थ अहोरात्र विशिष्ट काल भी लिया जाता था। ऋग्वेद के छठे मंडल के नौवें सूक्त के चौथे मंत्र में 'युगे-युगे विदध्यं' पद में युगे-युगे शब्द का अर्थ 'काले-काले' किया गया है।  वाजसनेयी संहिता के 12वें अध्याय की 11वीं कंडिका में 'दैव्यं मानुषा युगा' ऐसा पद आया है। इससे सिद्ध होता है कि उस काल में देव युग और मनुष्‍य युग ये 2 युग प्रचलित थे। तैतिरीय संहिता के 'या जाता ओ वधयो देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा' मंत्र से देव युग की सिद्धि होती है। ठाणांग में 5 वर्ष का 1 युग बताया गया है। इसमें ज्योतिष की दृष्टि से युग की अच्‍छी मीमांसा की गई है। एक स्थान पर बताया गया है कि: पंच संवच्छरा पं.तं. णक्खत्तसंवच्छरे, जुगसंवच्छरे, पमाणसंवच्‍छरे, लखखणसंवच्छरे, सणिचरसंवच्छरे। जुगसंवच्छरे, पंचविहे पं.तं. चंदे चंदे, अभिवड्ढिए चंदे अभिवडइढिए चेव। पमाणसंवच्छरे पंचविहे पं.तं. णक्खत्ते, चंदे, उऊ, अइच्चे, अभिवडढिए। -ठा. 5, उ. 3., सू. 10  अर्थात पंचसंवत्सरात्मक युग-युग के 5 भेद हैं- नक्षत्र, युग, प्रमाण, लक्ष और शनि। युग के भी 5 भेद बताए गए हैं- चन्द्र, चन्द्र, अभिवर्द्धित, चन्द्र और अभिवर्द्धित।   समवायांग में युग के संबंध बहुत स्पष्ट और सुंदर ढंग से बताया गया है- पंच संवच्छरियस्सणं जुगस्य रिउमासेणं मिज्जमाणस्य एगसट्ठिं उऊमासा प.। -स. 61, सू. 1  अर्थात पंचववर्षात्मक 1 युग होता है। इस युग के 5 वर्षों के नाम चन्द्र, चन्द्र, अभिवर्द्धित, चन्द्र और अभि‍वर्द्धित बताए गए हैं। पंचवर्षात्मक युग में 61 ऋतु मास होते हैं।  प्रश्न व्याकरणांग में भी युग प्रक्रिया का विवेचन किया गया है। इसमें 1 युग के दिन और पक्षों का निरुपण किया गया है। उदय काल में 'युग' शब्द विभिन्न अर्थों में प्रयुक्त होता था। उस काल में 5 वर्ष का ही 1 युग माना जाता था। पंचवर्षात्मक युग के संवत्सर, परिवत्सर, इद्वत्सर, अनुवत्सर एवं युग्वत्सर ये 5 पृथक-पृथक वर्ष माने जाते थे।
(संदर्भ : भारतीय ज्योतिष, लेखक : नेमीचंद्र शास्त्री, प्रकाशन : ज्ञानपीठ प्रकाशन)



●(2)  गीत प्रेस: एक पौराणिक मान्यता के अनुसार प्रत्येक युग का समय 1250 वर्ष का माना गया है। इस मान से चारों युग की एक चक्र 5 हजार वर्षों में पूर्ण हो जाता है।  दरअसल, युग को दो अर्थों में लिया जाता है, एक मानव वर्षों के हिसाब से युग का मान और दूसरा देवताओं के वर्षों.  ब्रह्म वर्ष का एक पूर्ण चक्र पांच हजार वर्षों का होता है। यह ब्रह्म वर्ष और ब्रह्म रात्रि के रूप में ढाई-ढाई हजार वर्षों के दो भागों में बंटा होता है। ब्रह्म वर्ष और ब्रह्म रात्रि भी एक बार फिर 1250 वर्षों के दो खंडों में बंटे हुए हैं। इन चार खंडों से ही चार युगों- सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग का निर्माण हुआ है। चार वर्ष की जो कल्पना की गई है वह देवताओं के दिन और वर्षों की गणना के आधार पर है। लेकिन प्रचलन में इसका गलत अर्थ निकाला जाकर श्रीराम और कृष्ण के काल में लाखों वर्ष का अंतर पैदा कर दिया गया। हालांकि युग की गुत्थी को सुलझाना अभी भी बाकी है और यह शोध का विषय है। लेकिन यदि हम भारतीय ज्योतिष की धारणा का अध्ययन करके इस समस्या को समझते हैं तो जिस तरह धरती के दिन और रात उसके द्वारा अपनी धूरी पर घूमने और उसके सूर्य की परिक्रमा पर आधारित है उसी तरह संपूर्ण ब्रह्मांड के ग्रह, नक्षत्रों के दिन रात भी अलग अलग समय के होते हैं और सभी का जब एक चक्र पूरा हो जाता है तो फिर उसे एक लंबी काल अवधि पूर्ण मान लिया जाता है। इसी तरह सप्तऋषियों अर्थात आकाश में दिखाई देने वाले सात तारों का चक्र अभी बाकी है। कहने का तात्पर्य यह कि हिन्दू धर्म ने प्रत्येक ग्रह, नक्षत्रों और तारों के घूमने के चक्र के आधार पर संपूर्ण ब्रह्मांण का समय निकाला है। इसके आधार पर ही महायुगों और कल्पों की धारणा को प्रतिपादिन किया गया जो कि पूर्णत: वैज्ञानिक है। लेकिन चूंकि इसे समझना आसान नहीं इसीलिए फिलहाल इसे एक मानसिक व्याख्‍या माना जाता है।  360 वर्ष = 1 दिव्य वर्ष अर्थात देवताओं का 1 वर्ष।  देवताओं का एक वर्ष पूरा होने पर सप्तर्षियों का एक दिन माना गया है। 12,000 दिव्य वर्ष = एक महायुग (चारों युगों को मिलाकर एक महायुग). 71 महायुग = 1 मन्वंतर (लगभग 30,84,48,000 मानव वर्ष बाद प्रलय काल).   चौदह मन्वंतर = एक कल्प।  एक कल्प = ब्रह्मा का एक दिन। (ब्रह्मा का एक दिन बीतने के बाद महाप्रलय होती है और फिर इतनी ही लंबी रात्रि होती है)। इस दिन और रात्रि के आकलन से उनकी आयु 100 वर्ष होती है। उनकी आधी आयु निकल चुकी है और शेष में से यह प्रथम कल्प है। ब्रह्मा का वर्ष यानी 31 खरब 10 अरब 40 करोड़ वर्ष। ब्रह्मा की 100 वर्ष की आयु अथवा ब्रह्मांड की आयु- 31 नील 10 अरब 40 अरब वर्ष (31,10,40,00,00,00,000 वर्ष).  इस कल्प में 6 मन्वंतर अपनी संध्याओं समेत निकल चुके, अब 7वां मन्वंतर काल चल रहा है जिसे वैवस्वत: मनु की संतानों का काल माना जाता है। 27वां चतुर्युगी बीत चुका है। वर्तमान में यह 28वें चतुर्युगी का कृतयुग बीत चुका है और यह कलियुग चल रहा है। यह कलियुग ब्रह्मा के द्वितीय परार्ध में श्‍वेतवराह नाम के कल्प में और वैवस्वत मनु के मन्वंतर में चल रहा है। इसका प्रथम चरण ही चल रहा है।
(संदर्भ : पुराण और कल्याण का ज्योतिषतत्त्वांक)


● (3)   गुणाकर मुळे लिखते हैं :-   मनुस्मृति और सूर्य-सिद्धांत की युग-पद्धति, इसमें 14 मनु, एक मनु में 71 युग (चतुर्युग) और एक युग में 4320000 वर्ष होते हैं। साथ ही, मनुसंधियों की कल्पना करके एक कल्प (ब्रह्मा का एक दिन) में 1000 युग माने गए हैं। आगे युग या महायुग को चार छोटे युगों - कृत, त्रेता, द्वापर और कलि - में विभाजित कर के इन की कालावधियों को 4 : 3 : 2 : 1 के अनुपात में रखा गया, यानी इन्हें क्रमशः 17 2 8 0 0 0 , 1 2 9 6 0 0 0 , 864000 और 432000 वर्षों के बराबर माना गया है।  परन्तु आर्यभट ने इस कृत्रिम युग-पद्धति को स्वीकार नहीं किया। उनके अनुसार : 1 कल्प = 14 मनु या 1008 युग (महायुग) या 4354560000 वर्ष,  1 मनु = 72 युग, 1 युग = 4320000 वर्ष.  आर्यभट की इस युग-पद्धति में मनुसंधि के लिए कोई स्थान नहीं है। ब्रह्मांड के सृष्टि काल को उन्होंने स्वीकार नहीं किया। सृष्टि और प्रलय की मान्यताओं में उनकी आस्था नहीं थी। वे काल को अनादि और अनंत मानते थे (कालोऽयमनाद्यन्त:)। आर्यभट ब्रह्मा की आयु की भी बात नहीं करते। आर्यभट ने भी युग (महायुग) को चार छोटे युगों (युगपादों) में विभक्त किया है। मगर ये युगपाद समान कालावधि के हैं, यानी प्रत्येक युगपाद 1080000 (0 वर्षों का है। स्पष्ट है। कि आर्यभट की यह युग पद्धति अधिक तर्क संगत है। उन्होंने कल्प और युग के आरंभ को किसी पार्थिव घटना के साथ नहीं जोड़ा है। उनके मतानुसार ये आकाश में ग्रहों की स्थितियों से संबंधित विशुद्ध गणित ज्योतिषीय घटनाएं है.  नाक्षत्र वर्ष का मान वेदांग ज्योतिष में 366 दिन, वराहमिहिर द्वारा उल्लेखित पुराने सूर्य सिद्धांत में 365,25875 दिन, रोमक सिद्धांत में 365.2467 दिन और पैतामह सिद्धांत में 365.3569 दिन दिया गया है। नए सूर्य सिद्धांत में वर्ष का मान 365.258756 दिन है। तालेमी (15) ई.) ने नाक्षत्र वर्ष 365.24 666 दिनों का और चांद्र मास 27.32167 दिनों का दिया है।  आर्यभट ने भूभ्रमण का प्रतिपादन किया, इसलिए पृथ्वी-भगणों की संख्या दी। साथ ही, गीतिकापाद में ही उन्होंने यह भी लिख दिया कि पृथ्वी एक प्राण या उछ्वासकाल में एक कला घूमती है (प्राणेनैति कलां भूः)।   आर्यभटीय का तीसरा अध्याय है - कालक्रिया, कुल 25 श्लोकों के इस अध्याय का प्रयोजन है, इसी अध्याय के एक श्लोक में आर्यभट अपने जन्म वर्ष (476 ई.) की स्पष्ट जानकारी देते हैं और बताते हैं कि कलियुग के 3600 वर्ष बीत जाने पर यानी 499 ई. में उनकी आयु 23 साल की थी। आर्यभट ने स्पष्ट शब्दों में यह नहीं कहा है कि उन्होंने 23 साल की आयु में आर्यभटीय की रचना की है। आर्यभट के भूभ्रमणवाद पर कठोर प्रहार करने वाले दूसरे गणितज्ञ-ज्योतिषी ब्रह्मगुप्त हैं। उन्होंने आर्यभट के दोष दिखाने के लिए अपने ‘ब्राह्मस्फुट-सिद्धांत' में तंत्र परीक्षा नामक एक स्वतंत्र अध्याय ही लिखा। ब्रह्मगुप्त ने आर्यभट के, न केवल भूभ्रमणवाद का बल्कि उनकी युग पद्धति और ग्रहणों संबंधी सही मान्यताओं का भी खंडन किया। उन्होंने और भी दोष गिनाए और अंत में यह भी लिख दिया कि आर्यभट के दोषों की संख्या बताना संभव नहीं है - आर्यभट दूषणानां संख्या वक्तुं न शक्यते!



युग संबंधित मनुस्मृति, महाभारत आदि से संदर्भ
 

● मानवीय और दिव्य वर्ष में अंतर:  यंहा मनुस्मृति और महाभारत से वो श्लोक दिए हुए हैं जिनमें मनुष्यों के लिए युगकाल हज़ारो वर्षो के सिद्ध होते है हालाँकि अनुवादकों ने इनका अर्थ देवो के युगकाल कर दिया है जबकि मूल संस्कृत में या तो दिव्यवर्ष लिए कोई शब्द ही नहीं है (जैसे महाभारत) या वंहा पर मानवीय वर्षों की गणना बताकर फिर देवताओं के युगों का उल्लेख किया गया है (जैसे मनुस्मृति)। 



 
 
 
 
●  मनुष्य आयु में मतभेद व अंतर:   मनुस्मृति, महाभारत, रामायण, पुराणों आदि में बहुत से मनुष्यों और पात्रों  की बताई गयी आयु में लाखों, हजारो वर्षों का अंतर है।  इसका अर्थ यही है कि ग्रन्थों में ही युगकाल की धारणाओं में स्पष्ट मतभेद हैं।
 
महाभारत के सभापर्व में लिखा है कि दुर्योधन का चाचा विदुर दुर्योधन को बोलता है कि जैसे कुंवारी कन्या को साठ वर्ष का बूढ़ा पसंद नहीं आता, वैसे ही तुझे मेरी बात पसंद नहीं आती। (यानी इस काल में 60 साल का व्यक्ति बूढ़ा माना जाता था और महाभारत का काल द्वापरयुग माना जाता है, इसलिए द्वापर में लोगों की आयु वही होती थी जो कलियुग में होती है)

मनुस्मृति में लिखा है कि मनुष्य की आयु सतयुग में 400, त्रेता में 300, द्वापर में 200 और कलयुग में 100 वर्ष होती है।  जबकि ऋग्वेद में मनुष्य की दीर्घ आयु 100 वर्ष ही लिखी है। वंही महाभारत और रामायण में बताया है कि राम ने 11000 वर्ष तक राज्य किया ।  हिरण्यकश्यप ने इस धरती पर राज्य किया 5 करोड़ 60 लाख 61 हजार वर्ष राज्य किया ऐसा महाभारत में लिखा है और मत्स्य महापुराण में लिखा है कि हिरण्यकश्यप ने 1 अरब 72 करोड़ 80 हजार वर्ष तक राज्य किया। रामायण में लिखा है कि दशरथ को जब राम की प्राप्ति तब हुई जब दशरथ की आयु 60000 वर्ष थी। रामायण में एक और पात्र है जो खुद को दशरथ का मित्र बताता है और उसकी आयु भी 60000 वर्ष लिखी हुई है।

 
 











 
  
 
 
पौराणिक युग आयु से प्रसिद्द विद्वानों के मतभेद

 
■ बाल गंगाधर तिलक:

स्वतंत्रता सैनानी, हिन्दू धर्म के ज्ञाता, विद्वान और ज्योतिष, बाल गंगाधर तिलक ने भी समान्य युगकालिक मान्यताओं के विरुद्ध, विपरीत मत को स्वीकार किया है। अपनी पुस्तक आर्कटिक होम इन वेदास में वह लिखते हैं की मनुस्मृति और महाभारत में आये 12000 वर्ष कालिक चतुर्युयुग मनुष्यों के हैं जिन्हें पुराणों ने अलग गणनाओं के आधार पर देवताओं का सिद्ध कर दिया है। वह यह भी लिखते हैं आर्यभट्ट ने चतुर्युग को समान वर्षो का माना है।





 

■  युक्तेश्वर गिरी और परमहंस योगानंद:

It is possible that Yukteswar may have been influenced by the belief system of the ancient Jains; or he may have based his ideas on ancient oral traditions that are not a part of the mainstream documented knowledge.  The idea of an ascending and descending Cycle of Ages was also prevalent in Greek myths. The Greek poet Hesiod (c. 750 BC – 650 BC) had given an account of the World Ages in the Works and Days, in which he had inserted a fifth age called the “Age of Heroes”, between the Bronze Age and the Iron Age.  

According to Yukteshwar Giri, the teacher of  Yoganand Paramhans  every Yuga cycle has 12000 years of age and there is an ascending and a descending cycle of these Yugas. Thus, he had given 24000 years ascending and descending Yuga model in which the Yugas are of 4800, 3600, 2400, 1200 years, 10% time for Sandhi at the start and the end.

His theory is well enunciated in his famous book, 'The Holy Science', his land mark work in the field, according to which we are currently in the beginning stages of Dwapara Yuga, which began around 1699 A.D., moving closer to the grand center, and will pass into Treta Yuga around the year 4099 A.D.

http://www.dwapara-yuga.org/


 

 

 


 ■ धार्मिक संस्थान, धार्मिक गुर, धार्मिक ग्रंथ
 
अनेकों धार्मिक संस्थान, गुरु और ग्रंथ भी युगकालों को लाखों वर्षों का नहीं मानते हैं बल्कि शीघ्र युग परिवर्तन में विश्वास करते हैं। इनके बारे में दुसरे ब्लॉग में विस्तार से विवरण दिया है.
 
 
 
विद्वान, विचारक आदि
 
अनेकों साधक, योगी, ज्योतिष, आध्यात्मिक गुरु आदि ने भी इन्हें लाखों वर्षों का का स्वीकार न कर के, शीघ्र सतयुग आगमन या कलियुग अंत को स्वीकार किया है. इनके बारे में भी दुसरे ब्लॉग में विस्तार से विवरण दिया है. 
 
इनके अलावा बहुत से ज्योतिषों, गणितज्ञों आदि ने युगकाल के हज़ारो वर्षो के होने के मत को स्वीकारा और सिद्ध किया है जैसे.....



 


 
 
 शीघ्र युग परिवर्तन या बड़ा बदलाव, भीषण तबाही आदि में विश्वास।
 

अनेकों प्रसिद्द गुरुओं, विद्वान, ज्योतिष आदि शीघ्र होने जा रहे युग परिवर्तन या बड़े बदलाव, भीषण तबाही, नए विश्व नेतृत्व, अखंड भारत निर्माण, नया समाज और चेतना निर्माण आदि का दावा कर रहे हैं।  इनके बारे में भी दुसरे ब्लॉग में विस्तार से विवरण दिया है.

 
 
 
 आरोही और अवरोही युग काल मान्यता।
 
कई प्रसिद्द विद्वान युग कालों का आरोही और अवरोही क्रम में चलना स्वीकार करते हैं।  इनके बारे में ऊपर इसी ब्लॉग में और दूसरे ब्लॉग में विस्तार से विवरण दिया है.



 
 
 
 
 सतयुग से व्यक्तिपरक आशय और युग धारणा से असहमति


■  श्री अरबिंदो घोष:

 
श्री अरबिंदो घोष ने लिखा है कि कलियुग जा चुका है और सतयुग कुछ ही वर्षों में आने वाला है। उन्होंने सतयुग को भारत की स्वाधीनता और स्वराज से संबंधित माना था। ऐसा कहा गया है कि उनका मानना था कि युग बस विकास के रूप में निरंतर आने वाले काल हैं.





स्वामी विवेकानंद:

 

स्वामी विवेकानंद ने माना है कि युगों को 4 काल में बांटना वेदों से सिद्ध नहीं होता है बल्कि ये तो पौरणिक समय में किया गया मनमाना अनुमान है। हालांकि एक जगह उन्होंने लिखा है कि यह कलिययुग चल रहा है। इसके अलावा उन्होंने कहा है कि उनके गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस के जन्म लेने से ही सतयुग का आरंभ हो गया था। हमें यह समझना चाहिए कि ऐसा लिखने के पीछे उनकी सच्ची गुरुभक्ति है क्यूंकि शिष्केयों के लिए गुरु देवता समान ही होता है।

 


 
 

 




■  डॉ. सर्पल्ली राधाकृष्णन:


डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने भी युगों के 4 भागों में विभाजन के तार्किक होने पर शंका जताई है।





देवदत्त पटनायक।

 

Devdutt Pattanaik:- Talking about the concepts of kalyug and satyug, he says that we don’t look at them objectively. The concept that the present time is worse than the past is ridiculous and life was never like that. The stories in Indian scriptures are poetry and not literal, it helps to explain the problems of life such as jealousy, greed, anger etc. He says that it is a very childish way of explaining that there was a time when everything was fine.

 
   


आचार्य प्रशांत 

यह भी कलियुग सतयुग आदि कालों को नहीं मानते। 


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युगों पर अन्य धर्ममत व महत्वपूर्ण बातें।

 

सिख धर्म भी इन्हीं चार युगों को मानता है। 

गुरबानी में 36 तो युगों का उल्लेख है.  For thirty-six ages, there was utter darkness. Then, the Lord revealed Himself (sggs 949).

गुरुग्रंथ (1185) में लिखा है कि अंधमय काल आ गया है, एक मालिक के नाम का रोपण करें.  In the Sri Guru Granth Sahib, Guru Ji tell us that these Yugs have no bearing on the stars, moon or the sun thus: "The same moon rises, and the same stars; the same sun shines in the sky. The earth is the same, and the same wind blows. The age in which we dwell affects living beings, but not these bodies and natural phenomena. " (SGGS p. 902).

जैन धर्म भी काल चक्र को मानता है. जैन धर्म अनुसार सृष्टि एक निरंतर चलने वाले चक्र काल में है, एक बढ़ते क्रम (Utsarpini) और दूसरा घटते क्रम में (Avasarpini). ये दोनों दिशाएं 6 काल या युग में विभाजित हैं यानि कुल 12 में. इन युग को आरा/अरा/आरो कहा जाता है जो हज़ारों वर्षों के होते हैं.

बोद्ध धर्म में भी सृष्टि के काल चक्र होते हैं. कल्प को बोद्ध भी मानते है जो कई होते हैं और एक कल्प 4,320,000 वर्ष का होता है.

●  यहूदी धर्म में वर्ष अनुसार समय को माना अच्छे बुरे काल में जाता है (7 year Sabbatical cycle).  

इसाई धर्म में भी इस प्रकार समय को माना अच्छे बुरे काल में जाता है (Sabbatical year - every seventh year & Jubilee year - seven cycles of seven years and  every fiftieth year). 

पारसी धर्म में भी 4 कालों या युगों की मान्यता है और जो 3000 वर्ष का एक होता है.

प्राचीन यूनान और मेक्सिकन सभ्यता में भी काल या युग संबधित मान्यताएं देखी जा सकती हैं.   

जैन, बोद्ध यूनानियों में भी आरोही और अवरोही युगकाल की धारणा माने जाने की बात कही जाती है. 

●  इस्लाम में कलयुग को दौरे जाहिलिया से और सतयुग को दौरे हक़ से मिलाकर देखा जा सकता है। क़ुरान बताता है कि यह दौरे हक़ हज़ार साल में आता है जब अल्लाह का अम्र नाज़िल होता है। ये पूरी दुनिया में नहीं आता है पर एक अहम बड़े इलाके में आता है, हालंकि आता पूरी दुनिया के लिए है या यूं कहें कि पूरी दुनिया पर इसका असर पड़ता है और पूरी दुनिया के लिए एक बदलाव या सीख होता है। अक्सर लोगों को लगता है की ऐसा कुछ नहीं आएगा पर ये धीरे धीरे लोगो की नफसियात को बदलते हुए आ जाता है जैसे अरब में आया था लगभग डेढ़ हज़ार साल पहले। कलियुग के बाद सतयुग वैसे ही आयेगा जैसे दौरे जाहिलिया के बाद दौरे हक़ आया था।

●  इनको धातु युगों आदि (मेटल ऐजेस - कॉपर, ब्रोंज़, आयरन ऐज़, क्लाइमेट शिफ्ट, Holocene Period, Neolithic Sub-Pluvial) से जोड़ कर देखा जाता रहा है। सतयुग को पुनर्जागरण काल (Renaissance) या स्वर्गयुग (Golden Age) और कलयुग को अंधमय/अंध काल (Dark Age) जैसे शब्दों से भी समझा जा सकता है।




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धर्मराज की स्थापना व भारत के विश्व में शीर्ष स्थान विराजमान होने से संबंधित मत

 

●  इसे ही सिक्ख धर्म में खालसा का राज कहा गया है और ईसाइयत में किंगडम ऑफ गॉड  इसे ही इस्लाम में हुकूमते इलाही, खिलाफत, रियासते मदीना कहते है। 

●  उर्दू में कहंगे कि हिंदुस्तानी इमामते आलम के पद पर स्थापित होगा और इमामे आलम बनेगा.  गैर मुन्क़सिम हिंदुस्तान ही अखंड भारत है.

●  भावी देवासुर संग्राम ही गज़वा-ए-हिन्द जैसा है। यानी बुराई और अच्छाई की लड़ाई। ये संग्राम अलंकारिक है।

●  स्वामी विवेकानंदरबिन्द्रनाथ टैगोर, श्री अरबिंदो, बाबा जयगुरुदेव, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, महर्षि महेश योगी जैसे विद्वानों ने भारत के लिए विश्वगुरु शब्द का प्रयोग किया है।

●  बाल गंगाधर तिलक, विनोदा भावे, स्वामी दयानन्द सरस्वती जैसे विद्वान भी भारत को वापिस विश्वगुरु बनाने के प्रबल समर्थक थे।

●  ऐसा माना जाता है कि विश्व नरेश और जगतगुरु जैस शब्द ग्रन्थों से ही लिए गए हैं। 

 ● भारतीय गुनी गणों को गुरु बनानामनुस्मृति में भारतवासी ब्राहमण (कर्म से – गुणी गण) से चरित्र और आचरण सीखने की बात कही गयी है।

 




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*ज्योतिष हिमांशु के युग सम्बन्धी सन्दर्भ (अभी इनकी प्रमाणिकता जांची नहीं गई है।):-

Manusmriti, 1, 67, 29

Rigveda 2, 164, 46 ( Divaya – Surya Saman, not devata)

दैवत काण्ड, 7, 18 (Divaya – Surya Saman, not devata)

Bhagwat Puran, 12, 34 (Manushuya ka ek varsh, devata ka ek din)

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दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...