[इस्लाम की उदारता और मुस्लिमों की कट्टरता।]
1. दलील
वही मानेगा जिसे माननी होगी। पहले से ही दिल मे ख्याल पक्का करने वाले या तअस्सुब
वाले या कसम खा कर बैठने वाले दलीलें नहीं नहीं मानते और अपनी ही ज़िद पर अड़े रहते
हैं जबकि मौकिफ दलीलों का मोहताज है।
2. दुनिया
का रिवाज रहा है कि लोग शुरवात में कोई नयी चीज़ जल्दी से कुबूल नहीं करते, दीन
की चली रही पुरानी रिवायतों के खिलाफ कुछ करने से घबराते हैं। वो न तो इतने दूरंदेशीथे होते हैं और न ही इतने
सहनशील। नबी के वक़्त में भी मक्की दौर के साहबी बहुत ही कम थे और मदीना में और फतह
मक्का के बाद बहूत ज़्यादा। ये अव्वलीन
कहलाए जाते हैं और उनका रुतबा भी ज़्यादा है। बाद के दौर में इस्लाम में आए साहबी
ही पहले इन अव्वलीन को भला बुरा और अपने बाप दादाओं के दीन से फिर जाना वाला कहते
थे पर कुछ वक़्त बाद यही लोग खुद ईमान लाये। आज भी बहुत ही कम लोग पैगाम देने का काम
करते हैं या दीन के लिए कुछ करने बाहर निकाल पाते है। इसलिए हमें चीज़ें वक्त से
पहले ही समझनी पड़ेंगी और दूरंदेशी बनाना पड़ेगा।
3. मुस्लिम
हमेश से ही मजहब को लेके शिद्दत इख्तियार करते चले आयें है। कुफ़र, शिर्क
और गुमराही के फतवे चुटकियों मे देते रहे है।
किसी मुस्लिम के दिल मे सच मे खिदमत का भाव हो तो ये मुस्लिम सदियों से ही
उसके दिल मे खुद के बनाए हुए बनावटी दीन के वसवसे डालके उसका हौंसल पस्त करते हुए
आए हैं, जैस गैर मुस्लिमों से दोस्ती न रखो, उनके साथ खाना न खाओ, सलाम न करो, उनके जैसे कपड़े न पहनो, उनकी भाषा न सीखों, उनके ग्रंथ न पढ़ो, उन पर भरोसा न करो आदि।
राष्ट्रगान हराम है, भारत माँ कि जय कहना हराम है, काफिरों के निज़ाम मे वोट देना हराम है इत्यादि। जबकि ये सारे अमल जायज़ है। असल मे हमारे लोगों
कि बत्ती बहुत देर से जलती है पर तब तक गाड़ी छूट चुकी होती है। कल तक ग़ैर शरीयती हुकूमत या डेमोक्रेसी या उनका झण्डा तक नाजायज था पर आज सब जगह इसके लिए रैलियां निकाली जाती है। इसी तरह एक वक्त आयेगा जब गैर मुस्लिम त्योहारों पर सेवा बजी जायज़ हो जायेगी। दूसरी कौम की
मुशाबीहत वाली हदीस को गलत कांटेक्स्ट में कोट किया जाता है, वो
बात जंग के माहौल में बयान की गयी है।
4. सबसे
पहले अपने मकसद,
नियत को ध्यान मे रखते हुए आप अपने दिल से पूछिए की हुए क्या इस
माहौल मे गैर मुस्लिमों के शिरकिया त्योहारों में जा कर मुहब्बत और भाईचारे का पैगाम देते हुए उनकी खिदमत करना गलत है? अगर दिल कहेगा कि सही है तो यकीन
मानिए इस्लाम इसकी इजाजत ज़ुरूर देता होगा और देगा। इस्लाम दीने फितरत है। अगर ऐसे
माहौल मे आपको अपने इस्लामिक त्योहारों पर गैर मुस्लिमों द्वारा कि गयी खिदमत या प्रेम या भाईचारे का
संदेश अच्छा लगता है तो यकीन मानिए उन्हे भी अच्छा लगता होगा। परेशानी सिर्फ
उन्हें हैं जो कट्टरवादी हैं, चाहे इधर हो या उधर। मुल्क में चल रहे आज के माहौल में ऐसी खिदमत किसी पैगाम देने से कम नहीं है और जमीनी स्तर पर इनसे मिलने वाले रिज़ल्ट या इनसे होने वाले बदलाव आसानी से
महसूस किए जा सकते हैं।
5. दीन
को उसकी जड़ो और बुनियादों से पढ़ो और समझो। आम मौलवियों से इस्लाम सीखने से
सेकंड हैंड इन्फॉर्मेशन ही मिलेगी। आने वाला मुशिकल वक्त, इस बुनियाद के
सहारे ही निकल पाओगे। वरना ये वक्त काटना मुशिकल पड़ जायेगा।
6. दूसरे
मुल्कों मे और हमारे मुल्क में मुस्लिम और गैर मुस्लिम आबादी मे बहुत अंतर
है। हमारे तरीके हमारी आबादी और देश मे चल रहे माहौल के मुताबिक होगी।
जैसे नबी के वक़्त मे उनके स्थान और काल के अनुसार होती थी। तब इस्लाम को
उन्हीं मे एक शक्स ले कर आया था और यंहा इस्लाम को बाहरी या थोपा हुआ धर्म
माना जाता है। ऐसे बहुत से अंतर पाये जाते हैं जिनके कारण नीति अलग होना
लाज़मी है।
[अब ख़िदमत ही हमारा पैगाम है।]
1. सीरत से साबित है कि हिंसा के माहौल में नबी और सहाबा ने हिजरत फरमाई थी। यानी उस जगह पैगाम को बंद करके दूसरी जगह चले गए थे। इसीलिए मौलाना वाहिद्दुदीन खान साहब ने फरमाया है कि नफरत के माहौल में दवात नहीं हो सकती। यही वजह है जो अब हिंदुस्तान में खुल के पैगाम देने के लिए वक़्त बदल चुका है।
2. हमारे देश में अब इस्लाम और मुस्लिमों के लिए माहौल हिंसक, नफरती और कट्टरतावादी हो चुका है। अब वो वक्त भी नहीं है जब एक देश से जाके दूसरे देश में जा कर पूरी की पूरी क़ौम बस जाती थी। मुस्लिमों को यंही रहना है। पर भारत एक हिन्दू अक्सरियत मुल्क है। इसलिए अब यंहा खुल के या सीधा पैगाम आम तौर पर नहीं दिया जा सकता। ऐसी पैगाम का वक़्त जा चुका है। मौका और महल के मुताबिक कहीं कंही कर ऐसा कर सकते है पर हर जगह और हर वक़्त नहीं। अगर किया तो आप जेल में होंगे या अस्पताल में। सड़को पर या मीडिया में बवाल मचेगा सो अलग। फिर अब इस आज़ाब से बचने के लिए पैगाम कैसे दें?
3. ऐसे माहौल में अब इस्लाम का पैगाम खिदमत है। आने वाले चंद सालों तक अब अक्सर कंपेशन ही इंडायरेक्ट पैगाम होगा। आपका नाम या पहचान मुस्लिम है, बस अब यह पहचान ही आपकी अच्छे कंपेशन कार्य करते हुए पैगाम है। आज मुस्लिम नाम ही इस्लाम की पहचान माना जाता है और अब एक हद तक उनके लिए ये नाम ही काफी हो चुका है इस्लाम को सही या गलत साबित करने के लिए। अच्छा मुस्लिम तो इस्लाम अच्छा है और बुरा मुस्लिम तो इस्लाम बुरा है, ऐसा वो दिल से मानते हैं। उन्हें अगर इस्लाम से नफरत मुस्लिमों के गलत कामों को देख कर है तो यह नफ़रत भी मुस्लिमों के अच्छे कामों को देख कर ही ठीक होगी।
4. पहले पैगाम या इस्लाम की बात करने के लिए माहौल बनाया जाएगा फिर बात शूरू होगी। पहले उनके दिल नरम किये जायँगे तभी तो हमारी बात सुनेंगे। पहले उनके सामने अच्छे इंसान और मानवतावादी बनके दिखाना होगा तभी तो हम उन्हें कट्टरवादी नहीं लगेंगे और वो हमारी बात को ध्यान से सुनने को तैयार होंगे। पहले अपनी इमेज साफ बनानी होगी। खुद को उदारवादी बनाना पड़ेगा जो भारतीय संस्कृति और सभ्यता की असल पहचान है, जिससे हमारे देशवासी बहुत लगाव रखते है और उस पर फक्र करते हैं। सर्वधर्म समभाव की भावना जागृत करनी पड़ेगी। वरना अभी तो वो लोग मुस्लिम की शक्ल देखने को और इस्लाम का नाम सुनने तक को तैयार नहीं है। इसलिए उन्हें रोकने के लिए कुछ खाने पीने का इंतज़ाम करना चाहिए ताकि उनकी खिदमत और भला हो पाए। इससे वो वाकई हमारी बात प्यार से सुनने को तैयार हो जायँगे। हो सकता है यह बातचीत पहली बार में न हो पाए और वो कुछ न सुनना चाहे। हो सकता है इसमें कुछ वक्त और स्टेजेस लगे। पर बार बार ऐसी खिदमत देख कर एक दिन वाकई उनका दिल पिघलेगा और वो आप से बातचीत करने को तैयार हो जायँगे।
[शिरकिया त्योहारों में ख़िदमत करना।]
1.
ख़िदमत का काम उनके धार्मिक जलसों, त्योहारों, उत्सवों, तीर्थ यात्राओं या कांवड़ पर भी किया जा सकता है। आखिर उन्हें इसी बात की तो शिकायत है कि मुस्लिम हमारे त्योहारों पर बधाई नहीं देते, हमारी धार्मिक क्रियाओं को तुच्छ मानते है, हिन्दु धर्म को हीन मानते हैं, हमें काफिर मानते है, शदीद नफरत में मूर्तियों को तोड़ने को तैयार रहते हैं, मंदिरों को तोड़ते है, देवी देवताओं का मज़ाक बनाते है आदि इत्यादि। इन्ही आधार पर प्रोपगेंडा द्वारा तो मुस्लिमों के खिलाफ माहौल बनाया गया है। इसलिए ऐसे में यह ज़रूरी हो जाता है कि उनके त्यौहार या धार्मिक यात्राओं पर खिदमत, इंसानियत, एकता, समानता, प्रेम, भाईचारे आदि का संदेश दिया जाय। उनके साथ खड़े हो कर ये बताया जाए कि मुस्लिम हिन्दुओ और उनके धर्म की किसी बात से नफरत नहीं करता। हम में मतभेद हो सकते हैं पर मनभेद नहीं।
2. यंहा इसका मतलब यह नहीं है कि हम शिर्क से समझौता कर लें या खुद शिर्क करने लगे। हमारी ऐसी कोई नियत नहीं हैं। इस्लाम मे शिर्क करना मना है न की शिर्क करने वालों की खिदमत करना। पैगाम पहुंचाने के मक़सद से की गयी खिदमत तो वैसे भी बिलकुल जायज़ है। हदीस में आता है कि अमल का दामोदर नियत पर है। उनका अमल व नियत उनके साथ है और हमारा हमारे साथ। हमारी नियत सिर्फ समाज और माहौल को अच्छा और खुशमिजाज़ बनाने की है ताकि कट्टरता कम हो सके और सहअस्तित्व की फ़िज़ा बन सके। ये शिर्क करने में मदद नहीं मानी जायेगी क्योंकि आपकी नियत तो कुछ और थी। आप तो उदारता, सद्भाव और खुद के कट्टर न होने का संदेश देना चाहते थे। उन्हें कट्टर होने दीजिए, आप क्यों कट्टर बन रहे हैं। किसी यात्रा में या मंदिर के बाहर, अपने बैनर या स्टैन्डी पर हमारा पूज्य एक परमेश्वर या अन्य लिखी हुई बाते या संदेश भी पैगाम ही है जो उनके ही द्वार पर खड़े हो कर दी जा रही है, ये क्या कीं बात है।
3.
शिर्क करने वाला हो या कोई और आदमी, प्यासा प्यासा होता है और भूखा भूखा होता है। इसलिए शिर्क करने जा रहे लोगों कि ख़िदमत करने में कोई हर्ज नहीं जब तक आपकी नियत साफ है और मक़सद खैर का है।
4.
सबसे
पहले खिदमत या सेवा का उसूल समझिए। आपदाओं में, परेशानियों में, मजबूरियों में, दुखों में, बीमारियों में और त्योहारों
पे, खुशियों के मौके पे, धार्मिक
स्थलों पर कि गयी खिदमत सबसे ज़्यादा ज़रूरी और असरदार होती है। इसीलिए सभी लोग ऐसी जगह
खिदमत देने कि ज़्यादा से ज़्यादा कोशिश करते हैं। सेवा के जो स्थान है, जो लोग हकदार
है, जो वक़्त कि ज़रूरत है, सबसे अधिक सेवा
वंही दी जाती है। कोई भी संस्था ठेकों, जुवेखानों, चकलों पर जाकर वंहा ग्राहकों के लिए
खिदमत का काम नहीं करती। हम भी इन्हीं सिद्धांतों के अनुसार ऐसे मौकों पर सेवा देने की कोशिश करते हैं।
[क़ुरान, सुन्नत, हदीस, सीरत आदि से दलाईल]
1.
क़ुरान के मुताबिक ज़कात खर्च करने के लिए एक मद मुसाफिर के लिए बताई गई है। इसके साथ ही मुसाफिर के गैर मुस्लिम न होने की शर्त भी नहीं लगाई गई है । क्योंकि मुसाफिर तो किसी भी मज़हब का हो, मुसाफिर है। कांवड़िए या तीरथ पर जा रहे लोग भी मुसाफिर ही है। सफर सफर होता है चाहे धार्मिक हो या व्यवसायिक या अन्य। इसलिए इनकी सेवा पर पैसा कर्च करना भी जायज़ है।
2.
सुन्नत से यह बिलकुल साबित है कि शिर्क में शामिल या
शिर्क करने जा जा रहे मुशरीकों को पैगाम दिया जा सकता है। क्युंकी मुहम्मद सल्ल. मक्की दौर में हज पे आने वाले मुशरिक लोगों (काफिलों, कबीलों आदि) से भेंट करते थे और उन्हें दीन का पैगाम देते थे। उनके खेमों में भी मुलाकात करने जाते थे। जबकि ये मुसाफिर शिर्क करने के लिए ही आते थे। सीरत के मुताबिक पैगाम देने के एतबार से मुशरीकों से
उनके शिरकिया अमल के दौरान जाकर मिलना जायज़ है तो उनकी खिदमत करना भी जायज़
है क्यूंकी पैगाम देने के मक़सद के लिए खिदमत एक साबित सुन्नत है। इसलिए सीरत और तारीख का जायजा
लेने से इसके पूरे इमकान है कि इस पैगाम के साथ साथ आप उन हाजियों की खिदमत भी करते होंगे। क्यूंकी दुनिया भर में पहले ज़माने में भेंट करने से पहले कुछ नज़राना या तोहफा वगेरह पेश करने का रिवाज था। इसके अलावा दौरे जाहिलिया के ये हाजी मक्का के मेहमान थे और आप मुक़ामी और मेज़बान कबीले वाले, इसलिए मक्कावासी उनकी खिदमत में कोई कमी भी नहीं छोड़ते थे।
इस लिहाज़ से कांवड़ियों या तीर्थ यात्रियों की सेवा करते हुए उन्हें क़ुरान का पैगाम देने या इस्लाम की तरफ उनका दिल माइल करने या मुस्लिमों की तरह उनका रैवया नर्म करने के वास्ते, ऐसा खिदमत स्टाल लगाने में कोई हर्ज नहीं।
3.
नबी के पैगाम और हमारे पैगाम में फ़र्क़ हैं। आप पैगाम के मामले में बहुत बोल्ड थे और शिर्क से बहुत दूरी बनाके रखते थे पर इसका मतलब ये नहीं था कि शिर्क करने वालो से नफरत करते थे। आप डायरेक्ट पैगाम देते थे और ज़ुरूरत पढ़ने पर इनडायरेक्ट भी। इस्लाम का पैगाम देने से पहले आप लोगों की मदद, सेवा भी करते थे और लोगों को खाने पर भी बुलाते थे, जैसे एक बार आपने मक्का में कुरेश कबीले के रसूखदारों और रिश्तेदारों को घर पर खाने की दावत देके, इस्लाम का संदेश दिया था जिसे उन्होने ठुकरा दिया था। मक्का के आस पास लगने वाले मेलों में जो हज के मौके पर भी लगते थे और मुख्यता व्यापार के लिए होते थे, आप उनमें जा कर लोगों से बात करते थे। इस्लाम लाने से पहले हज़रत अबु गिफ्फरी जब मक्का आये थे तो हज़रत अली ने बिना जान पहचान के, अजनबी होने के बावजूद उनकी ख़िदमत करी थी और उनके खाने, पानी, सोने का इंतेजाम किया था।
4.
सुन्नत और सीरत से हमें उसूल मिलते हैं, न कि वाक़ियात को ज्यों का त्यों लेना चाहिए। ज्यों का त्यों लेने से ही तो आज दीन और उम्मत में इतनी शिद्दत आ चुकी है। इसकिये उसूल लेके उन्हें अपने आज के मौके और महल के अनुसार लागू करते हुए, इस्लाम का संदेश आगे बढ़ाने के रास्ते खोलने चाहिए। इस्लाम तंग नज़री को पसंद नहीं करता। इस्लाम के पास हर सवाल और समस्या का जवाब है। जररूत के मुताबिक खुद को ढालने की कला और गुंजाइश हमेशा से इस्लाम की बुनियादों में रही है। बस हम चली आ रही रिवायतों के मद्देनजर बहुत सी चीजों को एकदम से शिर्क, कुफ्र, गुमराही कह देते हैं, जो गलत है। हुजूर ने जिसे मना फरमाया है, सिर्फ वही चीज़ें मना है और जिसे मना नहीं किया, वो सब जायज़ अमल है। इसलिए मुखालफत करने वाले लोगों को सबसे पहले दलील देनी चाहिए कि शिर्क करने वालों की सेवा करना हराम कैसे है? शिर्क करना हराम है, न कि मुशरिकों की सेवा और वो भी तब जब असल मक़सद पैगाम हो।
5.
हदीसों में नॉन मुस्लिम से ताल्लुकात पर बहुत कम लिखा हुआ मिलता है जबकि आप रहमतुलिल आलमीन थे। आप यहूदियों और ईसाइयों के बीच रहें हैं, उनसे मामलात पेश आएं हैं, उनके सुख दुख में साथ दिया है। ऐसे वाक्यात सेकड़ों की संख्या में होने चाहिए। पर हदीसों में ऐसे वकायत या मामलात चंद हैं, जबकि मुस्लिमों के साथ किये गए व्यवहार के विवरण हज़ारों में हैं। ज़ाहिर है इस तरह के वाक़ियात या रिश्ते बहुत ही कम रिपोर्ट करे गए हैं जिसके कारण ये हो सकता है की ऐसे वकायत को बयान करने की ज़रूरत ही न आई हो या गैर मुस्लिमों को कमतर समझने की भावना के चलते इन वाकयात को आम न होने देने के लिए नज़रअंदाज़ किया गया हो।
6.
जमीयत उलेमा हिंद, तब्लीगी जमात वाले और उनके मरकज़ पर, मौलाना कलीम सिद्दीकी के साथी और बहुत सी मुस्लिम सिविल सोसाइटी कांवड़ियों को शर्बत, पानी बांट चुकी है, पैगाम के साथ भी और बिना पैगाम के भी।
[ऐसी ख़िदमत से हासिल होने वाले मक़सद और बदलाव]
1.
आइए अब ऐसे अवसरों पर ख़िदमत के ज़रिए आने वाले रिज़ल्ट देखते हैं। कांवड़ में तीन तरह की ऑडियंस होती है, एक कांवड़िए, दूसरे रोड पर चलने वाले, तीसरे अरेजमेंट करने वाले। अपने तजुर्बे से बोल रहा हूँ कि कांवड़िये हमसे खुद गले मिलते हैं, एक मालिक ईश्वर की बात करते हैं, भाईचारे की बात करते हैं, फ़ोटो खींच के ले जाते हैं आदि। रोड पर चलने वाले देख कर तारीफ करते हैं और खुद वीडियो बनाके सोशल मीडिया पर डालते है। एक बार तो किसी ऐसे ही गैर मुस्लिम भाई के डाले गए वीडियो पर 5 लाख व्यूज आये थे। ज़रा सोचो कि मुस्लिम के ऐसे सॉशल वर्क और उदारता आदि के द्वारा कितनी दूर तक संदेश गया। प्रबंधन में लगे एरिया के लोग, संघ के कार्यकर्ता, सिविल डिफेन्स वाले, एमसीडी वाले, पुलिस वाले आदि सभी तारीफ करते हैं, हाथ मिलाते हैं और गले मिलते है, वीडियो बनाते है। वो इन्हें अपने भाजपा और कट्टर ग्रुपों में जान भुझकर वीडयो भेजते हैं। कहतें है कि राजनीति ने माहौल खराब कर दिया और आप बहुत अच्छा भाईचारा बनाने का काम कर रहे हैं। वो लोग, मुस्लिमों के साथ मिलकर आगे बढ़कर सेवा करवाते हैं। खुद हमें टोपी दाड़ी दिखाने को बोलते हैं ताकि लोग देख सकें कि मुस्लिम यंहा सेवा दे रहे हैं। एक बार एक एसएचओ बहुत तारीफ करके और हाथ मिलाकर धन्यवाद बोलकर गया था। मीडीया वाले रुक कर तारीफ करते हैं और न्यूज़ में दिखाते हैं, हमारी स्टोरी भी दिखाई थी। ये सब जो हासिल हुआ क्या कम बात है। ऐसे कई धार्मिक अवसरों आदि पर किया जा सकता है। रामनवमी तक पर ऐसे ही रिज़ल्ट आये थे।
2.
हम हिन्दू धर्म का नहीं सनातन धर्म का प्रचार करते हैं। सनातन धर्म ही इस्लाम धर्म है क्योंकि इस्लाम ही सदा से इंसानों को दिया जाता रहा है। जब वो प्राचीन काल में सबसे पहली बार दिया गया तो सनातन (अर्थात सबसे शुरवात से सीधा चला आ रहा हो) कहलाया और जब आखिरी बार क़यामत तक के लिए दिया गया तो इस्लाम या दीने क़य्यिम (अर्थात जो सदा से क़ायम हो) कहलाया। यही वजह है वेद में एकेश्वरवाद है और मूर्तिपूजा के खिलाफ है। उन्ही के ग्रंथों में से निकालकर क़ुरान का संदेश उन्हें समझाना है ताकि वो इस्लाम या क़ुरान का नाम सुनकर आग बबूला न हो जैसे आजकल अक्सर हो जाता है।
3.
हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि हमें अपनी संस्था की एक पहचान बनानी है और जो बन भी रही है। अब ये कहा जाने लगा है कि ये लोग कट्टर नहीं है, ये दूसरे मुस्लिमों की तरह नहीं है, ये अच्छे लोग है, ये सेवा करने वाले लोग हैं। इसलिए ये इमेज ही आने वाले वक़्त और इस आज़ाब के समय में हमारी रक्षा करेगी और हमें खुल के काम करने के मौके देगी। ये इमेज ही गैर मुस्लिमों के सामने ये साबित करेगी कि ये तो फायदेमंद लोग हैं। क़ुरान कहता है कि ज़मीन पर वही ठहरता है जो फायदेमंद होता है। वैसे भी हम अच्छी तरह देख चुके हैं कि खुले पैगाम देने वाले बहुत से लोगों को किस तरह जेल में डाला गया है।
4.
मैं खुद अक्सर हिन्दू धर्म के शिरकिया अक़ाइद के बारे में स्टेटस लगाता हूँ। पर पर बीच बीच में हिन्दू धर्म को लुभाने वाली पोस्ट भी लगाता रहता हूँ ताकि बैलेंस बना रहे और कोई कॉन्ट्रवर्सी न बनने पाये। बिल्कुल यही तरीका कांवड़ आदि में सेवा कर के अपना संदेश पहुचाने का है।
[ऐसी खिदमत पर तनक़ीद करने वाले लोगों का हाल]
1.
ऐसी खिदमत करने वाले लोगों की फ़िज़ूल में आलोचना करने वाले सबसे बड़े काहिल लोग हैं। ये खुद कुछ नहीं करते। न मुस्लिमों में और न ही गैर मुस्लिमों में। और जो करता है, ये उनकी भर भर के बुराई करते हैं, उसमें कमियां निकालते हैं और उन्हें बुरा बोलते हैं। इन्हें पहले खुद ख़िदमत में आना चाहिए, भले ही मुस्लिमों में करें, पर कुछ ख़िदमत शुरू तो करें। उसके बाद दूसरे में कमियां निकाले। तब आटे डाल का भाव पता लगेगा। घर बैठ कर कोई भी जज बन सकता है।
2.
ऐसे लोगों को फील्ड में आके ऐसे कामों के रिजल्ट खुद चेक करन चाहिए। पर ये लोग खुद घर में बैठे रहते हैं, जो बाहर मेहनत कर रहा है, उसकी कमियां निकालते हैं जबकि इनको बाहर बदल रहे माहौल की भनक तक नही होती। उन्हें काफिर, मुशरिक, गुमराह और डरपोक कहते हैं। जबकि खुद डर के मारे किसी को इस्लाम का एक छोटा संदेश तक नहीं पहुचाते और डरते हैं कंही रिश्ते खराब न हो जाय, व्यापार खराब न हो जाये आदि।
3.
फूलों से स्वागत करने वाले मुस्लिमों की नीयत देखनी चाहिए। उनकी नियत अक्सर मुस्लिमो की छवि साफ करना होती है। भले ही उनसे इस में कोई अति या दिखावा हो जाये क्योंकि शायद उन्हें तजुर्बा न हो या गलती हो जाये या सही सलाह देने वाले लोग आसपास न हो। आखिर गलती से ही इंसान सीखता है। कभी कभी अच्छा काम करने के लिए जाते हैं और बुरा हो जाता है। फूल से स्वागत भले ही आपको ज़्यादा या चापलूसी लगे, पर शायद ऐसा करने वालों को यही ठीक लगा हो अपनी अकल के मुताबिक। इसलिए ऐसे केसेस में लोगों को माफ कर देना चाहिए।
4.
कट्टर लोग दोनो तरफ है जो बढ़ते ही जा रहे हैं। ऐसे नफरती लोग दोनो धर्मो में इस वक़्त अकलियत में पाए जाने वाले सेकुलरों को गरियाते हैं। (सेक्युलर शब्द का मतलब कानून की इस्तेलाह या मॉडर्न यूसेज में धर्मरहित नहीं होता बल्कि धर्म के आधार पर भेदभाव न करने से है)।
[इस मुद्दे पर कुछ सवाल - जवाब]
1. मुस्लिमों को उनके धार्मिक त्योहार ही मिले है, खिदमत के लिए?
जब
ये साबित है कि नबी ने शिर्क से भरे अवसर पर पैगाम, तबलीग़ और इसलाह का और
रिश्ते बनाने का काम किया है। नबी को इस दिन कुछ तो खास या फाइदा लगा होगा जो आपने
इसी दिन को चुना। वजह ये थी की हज के समय मुशरीक दूर दराज से आते थे, एक
ही जगह आसानी से मिल जाते थे, उनको दिया गया पैगाम दूर इलाकों
तक आसानी से फैलाया जा सकता था आदि। तो हम भी ऐसे ही फ़ायदों के मद्देनजर ऐसे दिनों चुन सकते और अपना काम कर सकते हैं।
हम
कोई मौसमी दायी या खिदमत वाले नहीं हैं।
हम हर हफ्ते कुछ खिदमत या पैगाम देने का काम करते हैं। इसलिए पूरे साल और त्योहारों पर भी यही काम
करते हैं। साल मे एक बार खिदमत के लिए खड़े होने वालों पर उनके द्वारा फिक्स किए गए
खिदमत के दिन पर तो आप एक बार को सवाल उठा सकते हैं पर 365 दिन यही काम करने वालों पर नही। पैगाम देने का उसूल है कि देने वाले के लिए बहुत सी
चीज़ें करने कि छूट मिल सकती है अगर उससे मदु के ज़ेहन और दिल पर असर होता और
इसलाम कि तरफ लाने में आसानी होती है।
अगर
आप हिन्दू या उनके त्योहारो को छोड़ देंगे तो फिर ये तबलीग़ या इसलाह का काम अधूरा ही
रह जाएगा। हम पर कट्टर और खुदगर्ज होने के झूठे इल्ज़ाम लगाए जाते है। कट्टरता धर्म
और संप्रदाय के आधार पर होती है और ख़ुगर्ज़ी पैसे, सहूलतें आदि को
लेकर। इसलिए धार्मिक कट्टरता का इल्जाम, उन की खुशियों या त्योहारों पर सेवा करने से ही
कम होगा और खुदगर्ज होने का इल्ज़ाम उनकी परेशानियों या जरूरतों के दौरान सेवा करने से।
इन दोनो वक्तों मे की जाने वाली खिदमत का असर गहरा होता है जिसका कोई दूसरा सानी
नहीं है। आम सेवा तो आम इल्ज़ामों को दूर करने के लिए और आम हालातों के लिए होती है। जबकि हमारा मुल्क पहले कभी इतने धार्मिक कट्टरवादी हालातों से नहीं कभी नहीं गुज़रा। विभाजन के वक्त भी चारों तरफ इतनी नफरत नहीं थी और न ही सरकार
द्वारा संरक्षण।
हिंदुत्वादियों
की मुख्य दलील ही यही है कि मुस्लिम जिस देश मे रहता है वंहा के धर्म और संस्कृति
को खा जाता है और सबको इस्लामी बना देते हैं। तो जाहिर है हमें सहअस्तित्व सिद्ध
करना पड़ेगा। सहअस्तित्व के लिए त्योहार पर मेलजोल सबसे आवश्यक है। जब तक धर्म को
लेकर मेलजोल न होगा, धर्मिक कट्टरता कम न होगी और तब तक वो इस्लाम का संदेश आसानी से नहीं सुनेंगे।
2. काँवड़ को छोड़ के दूसरे त्योहारों
पर खिदमत करिए।
आज
ये लोग कह रहे हैं कि कांवड़ मे सेवा छोड़ दिजीये बल्कि दूसरे त्योहारो पर सेवा
करिए। क्यों,
क्या उनमें मामूली सा भी शिर्क मौजूद नहीं है? शिर्क तो गैर मुस्लिमों के हर त्योहार मे होता है, कम
या ज़्यादा। कल तक तो यही मुस्लिम कहते थे कि सारे त्योहार गलत और शिर्क है पर आज
ये लोग बदल गए हैं। ये लोग यकीनन कल फिर बदल जायँगे और हर त्योहार को जायज़
कहंगे। पहले भी उलेमा बहुत सी चीजों को हराम कहते आए हैं और फिर उन्हे जायज़ा कहना शुरू कर दिया। एक वक्त आने वाला है जब लगभग हर
ऐसी चीज़ जायज़ हो जाएगी। ये वक़्त और अज़ाब भी इसी कट्टर सोच और अमल के कारण हम पर
आया हुआ है क्यूंकी हम अपने देशवासियों को इस्लाम कि असल हकीकत बता न सके और
उनको मुस्लिमों का असल चरित्र दिखा न सके।
3. हिन्दु त्योहार छोड़ कर, सिक्ख,
ईसाई के त्योहार पर खिदमत करिए।
हम
से ईसाई,
सिख आदि नफरत और दुश्मनी नही कर रहे है, हिन्दू
कर रहे हैं। इसलिए पूरा एक्शन प्लान
हिन्दू के साथ और उनके बीच और उनके लिए होगा, न कि दूसरे
धर्म वालो के लिये। अगर दूसरे धर्म वाले ऐसी नफरत करेंगे तो उनके लिए भी ऐसे ही काम किया
जाएगा और ज़रूरत के मुताबिक बाज़ वक्त हम करते भी हैं। जंहा अधिक कट्टरता वंहा अधिक काम करना है।
वैसे भी दूसरी जगहों के मुक़ाबले हिन्दुओ मे काम करने वाले मुस्लिम बहुत ही कम है ।
4. सिर्फ अपने इस्लामिक त्योहारों पर खिदमत करिए।
इससे
तो उनमें नफरत और बढ़ेगी। क्योंकि वो तो कहते हैं कि मुस्लिम इतने कट्टर कि अपने
त्योहारों पर ही खिदमत करते हैं, हमारे त्योहारों पर न तो खुश होते हैं
और न ही बधाई देते हैं बल्कि हमारे धर्म और रिवाजो से तो नफरत करते हैं। हम जानते
हैं कि इन्हीं झूठे इलज़ामों को आधार बना कर ही आज हमारे खिलाफ माहौल बनाया गया है।
इसलिए जब हम आज किसी धार्मिक अवसर पर ऐसी सेवा करते हैं तो वो कहते हैं कि हम
दिखावा या अल तकिया कर रहे हैं और धोखा दे रहे है। यानी उनके दिलों मे हमारे खिलाफ
इतनी नफरत भर दी गयी है कि उन्हे लगता है कि हम नहीं सुधरेगे। वैसे देखा जाए तो ऐसी सेवा पर उनके पास कोई ठोस जवाब नही होता जिसके आधार पर वो हमारी सेवा की काट कर सके। इसलिए झूठा इल्ज़ाम लगा कर इस
सेवा को बंद करवाना चाहते हैं क्यूंकी उन्हे भी पता है कि मुस्लिमों की ऐसी खिदमत
के काम वाकई हिन्दू कौम के ऊपर असर डालते है।
5. मज़ारों और मुहर्रम पर भी ऐसी खिदमत करिए।
हम
तो हर समुदाय कि खिदमत करने की कोशिश करते हैं, आप लोग भी किसी की खिदमत में कुछ तो करिए। मज़ारों पर जाने वाले या मुहर्रम पर झुलस निकालने वाले क्या हिन्दू
है? नहीं, वो मुस्लिम है। क्या इस देश में
ये मुस्लिम आपको, आपके मज़हब को, आपके
बच्चो को, आपकी जायदातों को, आपके
धंधों को, आपकी नौकरियों को बर्बाद करने या हड़पने के लिए
लड़ने मारने पर ऐसे आतुर हो गए हैं जैसे आज धर्म के नाम पर हिंदुतवादी ये सब करने
को तैयार हैं? नहीं। अगर मज़ार या मुहर्रम वाले भी ऐसा करने लगे तो उनके लिए भी उसी
नियत और मकसद से, मौके और महल के मुताबिक कंपेशन या इस्लाह जैसा कुछ न कुछ उचित जरूर किया जाएगा, न कि घर बैठ कर सड़क पर काम करने वालों पर छींटाकशी करी जाएगी।
6. क्या यह शिर्क को बढ़ाना देना और कांवड़ियों के हौंसले बढ़ाना है।
यह
उनकी हौंसला अफजाई नही है बल्कि इस्लाह और तबलीग के मौके हैं। अगर यह वाकई हौंसला
अफजाई होती तो हमारी सेवा से कांवड़ लाने वालों की संख्या और ज़्यादा बढ़ जानी चाहिये, पर ऐसा नहीं होता। हम इस सेवा को न करें तो उन पर क्या फर्क पड़ेगा? क्या
वो काँवड़ बंद कर देंगे? नही करँगे। बल्कि जब उन्हें ये समझ
आयेगा की यह गलत है, वो तब इसे बंद करेंगे। और उन्हें यह गलत तब महसूस होगा जब वो हम से बात करँगे। और हम से
बात करने के लिए हमे मौके बनाने होंगे, उन्हे रोकना पड़ेगा, उनकी खिदमत करनी पड़ेगी। अगर हमारी इमेज साफ बन गयी तो वो अपने इलाको में
भी हमसे बात करेंगे और काँवड़ आदि यात्राओं में भी। यात्रा में जो लोग हमें उनसे बात करते हुए देखेंगे,
उनके ज़ेहन और दिल पर भी असर पड़ेगा।
अगर
शिरकिया त्योहार पर मिठाई लेना और मुबारकबाद देना शिर्क को बढ़ावा नही है तो
कांवड़ मे सेवा भी शिर्क को बढ़वा देना नहीं है। हम शिर्क नहीं कर रहे, वो
कर रहे हैं। हमारी नियत और मकसद उनसे अलग है।
7. ऐसी सेवा से आप उनका मन नहीं लुभा सकते।
पहली
बात हमे सिर्फ अपना काम ईमानदारी से करना है और अल्लाह पर छोड़ देना है। कुरान के
बताए नियम के अनुसार बुराई का बदला भलाई से देना है। अगर किसी को पानी, शर्बत,
जूस पिलाने के बाद उससे तौहीद वगेरह की बात करी जा सकती है तो यह कोई
महंगा सौदा नहीं है। वैसे भी हम रोज़ अपने
गैर कानूनी काम निकालने के लिए पुलिस, नगर निगम, सरकारी कर्मचारीयों आदि को रिश्वत या सेवा नहीं देते क्या? फिर
इस्लाम के पैगाम कि तरफ लाने के लिए किसी कि सेवा करने मे क्या बुराई है।
हज़रत
उमर ने एक ईसाई कर्जदार औरत की मदद की थी और फिर इस्लाम की दवात दी थी। उसने
ज़्यादा उम्र होने के कारण इनकार कर दिया तो हज़रत उमर ने पछताते हुए कहा कि कंही उस
औरत को यह न लगा हो कि यह मदद के जरिये उस पार इस्लाम थोपने की कोशिश थी। तो आपसे
किसी ने कहा कि नहीं,
आपकी नियत तो साफ और सिर्फ मदद करने की थी।
इससे यह पता लगा कि बिना इस्लाम अपनाने के मक़सद से भी लोगों की मदद करी जा सकती है।
8. कांवड़िए शराबी और नशेड़ी होते
हैं इसलिए उनकी ख़िदमत सही नहीं है।
ये कोई तर्क नहीं हुआ। हर
कांवड़िया गलत नहीं होता, बल्कि कुछ अच्छे लोग और सच्ची श्रद्धा वाले भी
होते हैं जो वाकई कांवड़ लाने जाते हैं, न कि नशेबाजी करने। दूसरी बात, देश
में आज मुस्लिम, पहले से ही बहुत से गलत लोगों पर माल खर्च करके उनका
स्वागत आदि करते हैं तब कोई नहीं कहता कि शराबियों या नशेड़ियों की सेवा
क्यों कर रहे हो। नेताओं का, बॉलीवुड स्टार, दबंगाइयों का और हराम कमाने
वालों का स्वागत करते हैं, उनके लिए जलसे, फंक्शन, इफ्तार पार्टियां या दावतें करते
हैं। ये सभी नशा, भ्रष्टाचार और हरामखोरी करते हैं। तब तो कोई नही कहता कि
इनकी सेवा करके आपका पैसा हराम के मुंह में चला गया। इसीलिए कांवड़ में सेवा
का मक़सद और नियत को समझें फिर क्रिटिसाइज कीजिये।
पहले
के ज़माने में ज़कात के पैसे सराय बना दी जाती थी और उससे मुसाफिर फायदा
उठाते थे। इस तरह अगर आज कोई मुस्लिम पानी का पियाऊ लगा दे तो उससे आम लोग
और कांवड़िए पानी पीने लगे। तो आपके तर्क से चलें तो होना यह चाहिए कि इससे बचने
के लिए इंतज़ाम किया जाए जैसे कि बोर्ड लगा देना कि कांवड़िए यंहा पानी न
पिए। पर कोई भी ऐसा बोर्ड नही लगायेगा। इसी तरह हमारी कांवड़ में सेवा के दौरान
हम भी यह बोर्ड नहीं लगा सकते कि यंहा नशा करने वाले सेवा न लें। यानी हमारी
नियत अच्छे लोगों की सेवा है, भले ही सेवा लेने बुरे लोग भी आ जाए। ऐसी जगह
किसी को रोका तो नहीं जा सकता।
9. ठेकों पर जा कर शराबियों की सेवा करना भी क्यों नहीं शुरू कर देते।
क्या
हिंदुओं और मुस्लिमों के द्वारा शराब खानो और कांवड़ को एक ही माना जाता है।
नहीं। दोनो अलग अलग बातें हैं। शराब के
ठेकों या जुवेखानों पर बुनियादी तौर पर लोगों द्वारा कोई सेवा, सेवा नहीं मानी
जाती और न ही कोई भी धर्म वाला वंहा सेवा करता है।
ऐसी जगह पर मुस्लिमों की खिदमत को देख कर न तो किसी कट्टरता कम होती है,
न लोग सच्ची तारीफ करते है और न ही इससे हालातो पर असर पड़ता है।
लोगों के मां बाप तक खुद अपने बच्चों को शराबखानों और जुवेखानों आदि पर जाना पसंद
नहीं करते पर यही माँ बाप और समाज,
बच्चों का कांवड़, तीर्थ पर जाना पसंद करते हैं। बल्कि लोग खुद उनकी सेवा के लिए
अपने पैसो से जगह जगह इंतेजाम करते है।
इसलिए शराबियों और कांवड़ियों कि सेवा मे अंतर है।
वैसे
शराब के ठेकों पर जूस ले जाकर उन्हें समझाने से आपको किसने रोका है कि शराब गलत चीज़ है।
जाइए और समझाइए। सारे काम हम ही करेंगे क्या, आप कुछ नहीं करोगे?
समाज सुधारने के लिए हमें जो सही लगा हम कर रहें है, आपको जो सही लग रहा है, आप भी करिए। बहुत सी सरकारी
और गैर सरकारी संस्थाएं, शराबखानों, जुवेखानों,
नशेखानो, चकलों पर सुधार अभियान चलाते है,
आप भी चलाये। हम तो मौका मिलने पर ये भी करते
है।
वैसे काँवड़ यात्रा में जा कर लोगों को समझाना, शराबखानो पर जाकर समझाने से ज़्यादा मुश्किल काम है क्योंकि एक बार को शराबी तो खुले आम यह सुन लेंगे की शराब छोड़ दो पर आज के माहौल मे
कांवड़ में खुले आम मूर्तिपूजा छोड़ने के लिए कहने पर बवाल हो सकता है। इसलिय ढके
छुपे अंदाज़ मे या मौके की नजाकत के हिसाब से यह समझाना होगा कि मूर्तिपूजा गलत है। सो आप लोग शराबियों को समझाने का कम कर लो, हम
कांवड़ियों को समझने की कोशिश कर लेते है। बोलो तैयार हो?
10. शिर्क से नफरत करी जाये, न कि शिर्क करने
वालों से।
मुस्लिमों
मे एक ऐसा व्यवहार पैदा कर दिया गया है कि शिर्क करने वालों को नफरत, हिकारत
से देखा जाता है जबकि नफरत अमल से होनी चाहिए, न कि इंसान
से। इसलिए उनके शिर्क का इलाज करने के लिए उससे राब्ता बनाना चाहिए, न कि उनसे दूर न भागना चाहिए। रिवायतों के जरिये कुत्ते को एक अनछुवा
जानवर बना दिया गया है। इसलिए अक्सर मुस्लिम
कुत्तों से बच कर निकलते जैसे कोई कोई बहुत ही गंदी चीज़ हो। इसलिए कुत्ते का इलाज
करते हुए या शराबियों, नशेड़ियों को सुधारते हुए मुस्लिम बहुत ही
कम दिखाई देंगे। क्यूंकी मुस्लिमों मे ऐसी मानसिकता बना दी गयी है कि इन्हें देखते
ही हम मुंह सिकोड़ लेते है। यह रवैया ठीक नहीं है। चाहे जुर्म या गुनाह कोई भी हो,
उनके कर्म से हिकारत होनी चाहिए न कि उनसे, चाहे
कांवड़िए हो या मुशरीक। इसी नजरिये से देखने पर आप उनमे सुधार ला सकते है।
11. अगर कोई चन्दा मांगने आए तो क्या मंदिर निर्माण आदि में दान दिया जा सकता है या इसके बदले बाहर प्याऊ बनवा दिया जाये।
खिदमत 2 वजह से की जा सकती है, एक अल्लाह के लिए और दूसरी इन्सानों या दुनिया के लिए। जिस नियत से काम होता है उसका सिला अल्लाह उसी तरह दे देता है दुनिया का दुनिया में और आखिरात का आखिरात मे। इसलिए दुनिया के लिए किया गया ऐसा दान भेल ही आखिरात मे कोई अजर न दें मगर दुनिया में इसके आप अपनी सुरक्षा आदि कर सकते हो। इसलिए कुछ लोग मंदिर निर्माण की बजाए मंदिर के बाहर प्याऊ लगवा देते है। कुरान कहता है की शिर्क के पास भी न जाओ। मंदिर निर्माण मे दिया गया दान शिर्क तो नहीं हुआ मगर शिर्क के पास जाने जैसा ही है क्योंकि नियत आपकी शिर्क करना नहीं थी। इसलिए अगर ऐसी कोई मजबूरी या ज़रूरत आ जाये तो आप मंदिर निर्माण मे दान (उचित रकम) किया जा सकता है जैसे की आपके घर पर या रास्ते मे हिंदुतवादी दान लेने की ज़बरदस्ती करने लगे, या आपके मुहल्ले वाले आप से दान लेके यह देखना चाहते हो कि आप उनके धर्म या उनसे नफरत नहीं करते या उन्हें इसका बुरा लगता हो कि आप उनके धर्म को हिकारत से देखते हो या आपके दोस्तों मे चंदा हो रहा हो और आप उनको मदु करने के एतबार से दान देना सही समझें तो दान कर सकते है। जैसे अभी अयोध्या राम मंदिर के के लिए स्थानीए कट्टरवादियों ने ज़ोर ज़बरदस्ती, डरा धमका के भी चंद्द इक्कट्ठा किया है। मगर आप उन्हें प्यार से और बिना नाराज़ किये या बिना उन्हे कट्टर बनाए हुये समझा सको कि ऐसा दान इस्लाम के अनुसार ठीक नहीं, तो ये तो सबसे बहतर है।
[अंतिम बात और उदाहरण]
एक
नशेड़ी पहाड़ से कूदने जा रहा है क्यूंकी उसके घरवाले उसे गांजा नही देते । सब
चिल्ला रहे है मत कूद क्योंकि गांजा तो बुरी बात है। वो नहीं मानता। आप ने भी इसी
तरह समझाया। वो फिर भी नहीं मानता। फिर आप ने सोचा की क्यों न इसको पहले गांजा
दिखाया जाए ताकि यह रुक जाये और बात सुने।
बहुत मुमकिन है वो गांजे के लालच में रुक जाए और आपकी बात सुन ले। फिर आप उसे
समझाये तो शायद दिल से मान ले की यह बुरी आदत है (भले ही छोड़े न, पर
हुज्जत पूरी हो गयी, ज़िम्मेदारी पूरी हो गयी और आपक आज़ाब टल
गया)। कुछ वक्त बाद शायद वो आपकी बातें बार
बार सुन कर, मान भी जाए और बुराई छोड़ दे। पर ज़रा सोचिए कि अगर आप उसे अपनी बात
सुनने के लिये रोक ही नहीं पाते तो क्या वो आपकी बात कभी मानता? कभी नहीं।