Saturday, 22 October 2022

क़ुरान, किताब, ज़ुबान, उलेमा को सही समझने के उसूल, विज्ञान और कुरान

 

 

दीन ने फर्द और माशरे से मुतालिक हुकुम दिये है। दीन का मुख्य स्रोत मुहम्मद सल्ल. हैं.  उन्होंने कुरान से दीन नहीं सिखाया बल्कि अपनी ज़ात से दीन से सिखाया है. यानी कुरान और सुन्नत में दीन रिकॉर्ड है. नबी ही दीन करार दे सकते हैं, कोई दुसरा नहीं।  पहले की क़ौमों ने उलेमाओं को नबी का मुकाम दे दिया था।  नबी की इतात का मतलब अल्लाह की इतात है। इसका मतलब नबी के अलावा किसी को उन से ऊपर नहीं रखेंगे। पैगम्बर को दीन में अपनी तरफ से कुछ मिलाने की इजाज़त नहीं है क्योंकि कुरान इसके बदले, रग ए जान काटने की बात करता है। नबी के अलावा सबसे इख्तेलाफ़ किया जा सकता है।  हालांकि कुरान तो उलेमाओं की बात मानने को कहता है।  यानि नबी और उलेमाओं की इतात में सामंजस्य बनाना चाहिए।  इसलिए या तो खुद दीन में तहकीक करें या उलेमाओं पर एयतमद करते हुए उनकी ताईद करें। जब दीन को इलम के तौर पर पढ़ोगे तो दीन का हक है कि उसकी तहकीक करी जाए और जब दीन को फलाह के तौर लोगे तो  दीन बुनियादी बातें मानते रहें, बस यही काफी है. जो लोग सिर्फ उलेमा को आखिरी हक़ बना लेते हैं, यही लोग नबी का इंकार करते हैं. यहूद कहते थे कि हमारे उलेमा का इस पर इज्मा है.  मगर उस वक़्त उनका इज्मा का फैसला निर्णायक नहीं था तो बाद के उम्मत के इज्मा का फैसला निर्णायक कैसे हो जाएगा.  जिस हदीस में नबी ने फरमाया है कि मेरी उम्मत को अल्लाह कभी गुमराही पर जमा नहीं करेगा, इसके गलत पसमंज़र में समझा जाता है.  इसका  मतलब है कि  कुछ न कुछ लोग हक़ पर ज़रुर रहेंगे, सभी के सभी बिगाड़ पर इक्कट्ठा नहीं हो जायँगे. जैसे कुरान में बताए विरासत के एक कानून पर उलेमाओं का इज्मा हैं कि यह ऐसे ही है मगर इस तरफ विरासत तकसीम नहीं हो सकती.  

 

मुताशाबिहत आयतें

 
मुतशाबिह से मुराद मुस्तकबिल में होने वाली चीजों को समझाने के लिए दी जाने वाली मिसालों से है. इसमें तमसील दी जाती है. जैसे 1800s में बरतानिया में एक  हिन्दुस्तानी मुअर्रिख ने ट्राम के बारे में लिखा है कि जमीन में दो लोहे की सलाखें गढ़ी हुई हैं जिन पर एक डिब्बा घोड़े के तरह गलियों में दौड़ता रहता है.  अगर उस वक़्त किसी को हवाई जहाज़ के बारे में बयान करना हो तो वो यही कहेगा कि एक लोहे का परिंदा है जिस पर सवार होकर लोग उड़ते हुए सफ़र करते हैं.  इसी तरह पहले वक़्त में बल्ब को देख कर लोग यही कहते कि ये तो बिना तेल का दीया है.  ऐसे ही 200 साल पहले टीवी या इन्टरनेट को समझाया जाता.  

 


किताब या जुबान को सही समझने के उसूल.


चाहे अल्लाह की किताब हो या कोई और, किसी भी किताब को उसके हक़ के मुताबिक समझने के लिए, कुछ कानून इस्तेमाल में लाये जाने चाहिए.  

1.   पहला कानून है कि जुबान नुत्क़ हैं, मंतिक नहीं है. यानी जुबान बोली और समझी जाती है और उन्ही हुदूद में जुबान को लेना चाहिए.  असल में कलाम अपने कॉन्टेक्स्ट और सब्जेक्ट वगैरह से खुद बताता है कि क्या मायने लेने चाहिए.  जुबान को खुद के बनाए हुए मायने देना बिलकूल गलत है. जैसे किसी को दुसरो को समझाना है कि शोरबा क्या है, तो वो यह नहीं कह सकता कि शोर का मतलब नमक होता है और बा का मतलब पानी, इसलिए शोरबा का मतलब हुआ नमक का पानी.  नहीं ऐसा कहना बिल्कुल गलत होगा और ऐसा कहने वाला कोई जुबान से नवाकफियत वाला इंसान ही हो सकता है.  क्योंकि आम ज़िन्दगी में शोरबा, खाने के सालन या तरी को कहते है और लोग इस लफ्ज़ से यही मुराद लेते है और इसी मायने में बोलते है. इसी तरफ टेलीविजन के मायने टीवी बॉक्स से है.  कोई टेली (ट्रान्सफर) और विज़न (देखना) को मिलाकर, यह नहीं कह सकता कि इसके मायने दूर के दर्शन दिखाने के है. इसी तरफ जुबान के मुहावरे, कहावतें वगैरह भी उसके बोले और समझे जाने वाले मायनों में ली जायगी जैसे कान के नीचे दो लगाने का मतलब 2 थप्पड़ से लिए जाएगा, न कि 2 बालियाँ टांग देने से.  

 

2.   दूसरा कानून है कि तारीख, अक़ल और इल्म के मुसलमात को किताब यानि कुरान में नहीं ढूँढा जायगा.  जैसे मरयम कौन हैं, काबा कंहा है, इसके जवाब किताब नहीं देगी क्योंकि यह तो पहले से ही मालूम चीज़ें हैं.  अगर किताब बता दे तो यह जायद इन्फोर्मेशन है बस जिसक खास ज़रूरत नहीं थी.  इससे भी आगे बढ़कर, कुरान ने हज के महीने नहीं बताएं हैं, नमाज़ के वक़्त और रुकून भी नहीं समझाए हैं.  

वैसे अहले कुरान से पूछा जाना चाहिए कि कुरान में हज के महीने कंहा है? कुरान ने कहा है हज के महीने सबको मालूम है. 


3.   तीसरा कानून है, असल और फराह.  यानि असल के रौशनी में कॉपी को या अप्लिकेशन को समझा जायगा.  यानी सुन्नत को कुरान के मद्देनज़र समझा जायगा. यही चीज़ सुन्नत को कुरान के बाद रखती है.  कुरान कहता है कि जंग में, खौफ में, नमाज़ कसर करने का हुकुम है.  यानी जब नमाज़ छूटने का अंदेशा हो अफरा तफरी का माहौल हो.  इस बुनियाद पर मुहम्मद सल्ल. ने इसका एप्लीकेशन या प्रेक्टिकल दिखाया और नमाज़ को आधा और जमा किया.  हमने उस पर ऐतमाद किया और मान लिया.  आज तक उस पर अमल कर रहे हैं.


उलेमाओं को समझने के लिए उसूल. 


आजकल अलग - अलग आलिम दीन को नए नए तरीके से पेश करने की कोशिश कर रहे हैं.  उनकी दीनी फिक्र को जांचने के लिए 5 उसूल लागू किये जाने चाहिए.  ये उसूल अक़ल, इल्म और तजुर्बे की बुनियाद पर सही फैसला करने में परफेक्ट हैं. अगर वो फिक्र, इन उसूलों पर खरे पर नहीं उतरती तो वो फिक्र गुमराही पर हैं.

1.   दीन में मोहकम और मुत्शाबिहात दोनों मान्यताएं हैं. इसीलिए इस्लाम में तशबीह और कुरान में मिसालों का तरीका इस्तेमाल हुआ है. मिसालें 100% सही नहीं बता सकती कि वो चीज़ ऐसी ही होगी, ये तो सिर्फ अंदाज़न एहसास करवाने के लिए दी जाती है.  एक आदमी दुसरे को केले/मांस का स्वाद 100% सही नहीं समझा सकता जब तक कि दूसरा आदमी खुद खा कर न देख ले. इसलिए कुरान जन्नत और जहन्नुम का बयान उन चीज़ों की तरह करता या ऐसे उदाहरण देता है जिसके बारे में हमारी जानकारी हैं या जिनकी हमें समझ है.  हम नहीं जानते कि जन्नत असल में कैसी है इसलिए कुरान कहता हैं कि तुम अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि वंहा क्या क्या होगा. इसी तरह हम नहीं जानते कि अल्लाह कैसा और इसीलिए कुरान कहता है की अल्लाह के जैसा कोई नहीं है.  सो अगर कोई दीनी फिक्र मोहकम को छोड़ कर मुत्शाबिहात के पीछे पड़ी रहती है और उन्हीं के इर्दगिर्द चलती हैं, इन्हीं का प्रचार-प्रसार आदि करती है तो वो गुमराही के करीबतर होगी. बाज़ सूफी गिरोह ये काम करते हैं. 



2.  कुरान एक जुबान में  है, इसलिए कुरान को उसकी जुबान के दायरे के बाहर नहीं समझना चाहिए और जुबान को जुबान के तरीके पर ही समझा जायगा, न कि मन मर्ज़ी से.  इसलिए अगर कोई कुरान को अरबी जुबान के बुनियादी उसूलों या उनके असल मायनो या 1400 साल पुरानी अरबी जुबान, या उस माहौल, या उस तारीख के तयशुदा हिस्सों को उन्हीं मायनों में लेने की बजाय किन्ही और मायनों में लेगा तो उसे गुमराही के सिवा कुछ न मिलेगा. अगर कोई इन उसूलों को छोड़कर अपने बनाए उसूल किसी के कलाम पर चाहे होमर हो, व्यास हो, कालिदास हो, शेक्सपीयर, ग़ालिब या इकबाल पर फिट करने की कोशिश करेगा तो उसकी शैली की भी आलोचना होगी. यानि अपने घर में बैठ कर बनायीं गयी जुबान को कुरान पर लागू करना बदतरीन गुमराही है.  बाज़ अहले कुरान ये काम करते हैं.

3.  कोई भी ज़िंदा या एक चैन की कड़ी की शक्ल में नाज़िल हुआ कलाम (कोई नॉन फिक्शन किताब भी क्यों न हो), पहले से ही स्थापित इल्म, अक़ल और तारीख के नामों/फिक्स्ड स्टैंडर्ड्स की व्याख्या करते हुए नहीं चलता बल्कि वो पहले से ही इन्हें मानकर चलता है.  अगर कोई कलाम मक्का, तोरेत, बनी इस्माइल के बारे में कुछ कहता है तो वो यह नहीं बताएगा ये क्या, कंहा आदि  हैं क्यूंकि कलाम जिनसे मुखातिब हैं वो जानते है किस की बात हो रही है.  कलाम में इनकी परिभाषा नहीं होगी.  बाज़ अहले कुरान ये काम करते हैं. 



4.  असल को नकल (असल की नकल) के नीचे नहीं रखा जायगा यानी नकल की रौशनी में असल को नहीं परखा जायगा. बल्कि असल की रौशनी में नकल जाँची जायगी.  यह तरतीब नहीं उलटनी है. इसलिए कुरान को किसी और की रौशनी में नहीं बल्कि, हदीस या रिवायतों या तारीख को कुरान की रौशनी में परखा जायगा. बाज़ फिकही गिरोह ये काम करते हैं.

 

5. दीन में बिदत (इब्तेदा) करना यानी किसी चीज़ को खुद दीन न बना देना जो दीन है  ही नहीं.  दीन के उसूलों में बिदत नहीं पैदा करनी है. उसूल मानने या उन पर चलने में नए जायज़ और बेहतर रास्ते (बिदत) बनाए जा सकते हैं.  जैसे कहा जाता है कि दीन के 4 माखाज़ (सौर्स) - कुरान, हदीस, इज्मा, क़ियास (इज्तीहाद) हैं. जबकि दीन ऐसा न कहता हो तो इसे बिदत माना जाएगा.  बाज़ मज़हबी फिक्र वाले ये काम करते हैं.

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विज्ञान और कुरान 

विज्ञान, वैज्ञानिकों को उलेमा, मुसलमानों से मत तोलिये भाई, ज़मीन आसमान का फर्क है। एक तहक़ीक़ शुदा ग्रुप है और दूसरा गैर साइंसी मिजाज़ का जाहिल तबका। वैज्ञानिक वैसी अंधभक्ति नहीं करते जैसी उम्मत करती है, हदीसों, इजमा, इज्तिहाद वगैरह के नाम पर। ऐसे ही मुस्लिम लोग कारण है, जो आज इस्लाम को एक गैर साइंसी मज़हब साबित करवा चुके हैं, पूरी दुनिया में। तहक़ीक़, रैशनलेटी, साइंसी मिजाज़ तो है ही नहीं इनमें। रिवायती मज़हब को ढो रहें हैं, बाप दादाओं की पैरवी कर रहे हैं। जिन यहूद, नसारा से शिद्दत से नफरत करते हैं, उन्हीं के इस्लाम मे घुसाए हुए अक़ाइद पर ज़िंदगी बसर कर रहे हैं। क्योंकी पुराने लोग कैसे गलत हो सकते हैं, ऐसा मानना इन्हें कुफ्र लगता है। और दूसरे यही बात कर दे जैसे हिन्दू वगैरह तो कहते हैं, बाप दादा के अक़ाइद से बाहर आइए। कमाल का रवैय्या है इनका। क़ुराम को अंधभक्ति की तरह फॉलो करने का हकूम अल्लाह ने नहीं दिया। क़ुरान दुनिया का वाहिद मज़हबी किताब है जिसमे सबसे ज़्यादा कहा गया कि अक़्ल का इस्तमाल करो। हमारी आयतों पर ग़ौरो फिक्र करो। मगर उलेमा ये चाहते हैं कि मुस्लिम अँधेभक्त ही बने रहे। ज़ाहिर है क़ुरान में जो बातें वैज्ञानिक साइंस के खिलाफ बताते हैं, उनको भी इल्म और अक़्ल के मयार में समझना और समझाना पड़ेग। क़ुरान की ग़ैब, भविष्य और साइंसी बातें समझन और समझाने का एक तरीका है जो अंधभक्ति के रास्ते पर नहीं ले जाता। चाहने वालों को मिल जाता है, क़ुरान से ही। न चाहने वालों को नहीं मिलेगा क्योंकी वो अपने पुराने अक़ीदों को बदलना ही नहीं चाहते, भले ही क़ुरान और साइंस मिलकर उसे बदलने को कह रहे हों। इस सब्जेक्ट पर भी फिर कभी। बाकी हम तो बुनियादी उसूलों की ही दावत देते हैं। आपके उलेमा ही है  जो फिरको में बंटे हैं और हर फिरका अपने की दावत दी रहा है, लोगों पर कुफ्र के फतवे लगा रहा हैं। गैर ज़रूरी चीजों पर उम्मत को टुकड़ों में बांट रखा है और जिसके पास जो उसी में खुश है और उसी को हक़ मान कर अपने लोगों को उसी में डूबा कर दुसरो को गुमहार बताते फिर रहे हैं। अपने अक़ाइद में रद्दो बदल के लिए, दुरुस्त करने के लिए, नई तहक़ीक़ के लिए उलेमा और उनकी रीसर्च की कोई कमी नहीं है। बस रीसर्च करना आना चाहिए, दिल बड़ा और दिमाग खुला होना चहिए और सबसे ज़रूरी है अपने फिरके के उलेमा को छोड़कर हक़ की तलाश में दुसरो की ओर जाना चाहिए। बस यही चीज़ लोग, आम मुस्लिम नहीं कर पाते और वंही के वंही जमे रहते हैं और फिर उसके लिए दलाइल भी देते हैं। अल्लाह ने हक़ की सच्ची तलाश करने वालों के लिए हर दौरे में इंतज़ाम किया है। हम इल्म के साथ ज़ेहन बदलने वाले लोगों में से। कोई नई चीज साबित होने पर फोरन मौकिफ़ बदलने की हिम्मत और सलाहियत रखते हैं, सिर्फ इसलिए नहीं अड़ जाते की वो पहले से मानते आ रहे हैं। इस्लाम फ्लेक्सिबल है और ये तकीद करता है कि इल्म और अक़्ल की रोशनी में बदलना ही अल्लाह की दी सलाहियतों के साथ जस्टिस करना है। अगर सभी विचारधाराओं ने ऐसे मुद्दों पर अपनी राय क़ुरान और हदीस से ली है, तो मुसलमान ख़ुद जाकर इन स्रोतों की जाँच क्यों नहीं करते, या कम से कम वे क़ुरान से दिए गए प्रमाणों की जाँच क्यों नहीं कर सकते? अंततः, हमें और सभी विचारधाराओं को क़ुरान को अंतिम प्रमाण बनाना होगा। दूसरी बात, क़ुरान मूलतः ऐसी किताब नहीं है जिसे हिदायत पाने के लिए समझा न जा सके। यह मानवजाति की हिदायत के लिए अवतरित हुई थी। क़ुरान ऐसा कहता है और यह भी कहता है कि हमने इसे समझना आसान बना दिया है। 


इस कायनात मे अल्लाह का फेअल (work of God) साईन्सी दुनिया मे पैमाना है, इसे तमाम दुनिया मानती है! और अख़लाक़ी दुनिया मे अल्लाह का कलाम (word of God) यानी क़ुरान पैमाना है! लेकिन उसको ग़ैर-मुस्लिम क्या मुसलमानो की अक्सरीयत पैमाना मानने को तय्यार नही है!

दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...