दीन का माखज।
दीन का मुख्य स्रोत मुहम्मद सल्ल. हैं. उन्होंने कुरान से दीन नहीं सिखाया बल्कि अपनी ज़ात से दीन से सिखाया है. यानी कुरान और सुन्नत में दीन रिकॉर्ड है. नबी ही दीन करार दे सकते हैं, कोई दुसरा नहीं। दीन वही होगा जो अल्लाह मुहम्मद सलल. के जरिये जारी करेगा। दीन के सिर्फ दो स्रोत है, क़ुरान (अल्लाह के कलाम) और सुन्नत (नबियों के दीनी अहकाम पर अमल के तरिकेकार)।
दीन के तमाम एहकाम कुरान में बता दिये गए है। इनमें से कुछ अहकमों की
एक्स्प्लनेशन या एप्लीकेशन कुरान ने खुद वाजेह कर दिया है और कुछ अहकमों की
एक्स्प्लनेशन या एप्लीकेशन नबी ने अपनी सुन्नत के जरिये वाजेह और जारी कर दी है।
कुरान इस्लाम के बुनियादी अहकाम जैसे नमाज़, हज, रोज़े और ज़कात की बहुत सी बातों को वाजेह करता है और बहुत सी बातों को
वाज़ेह नहीं करता है। इसलिए ऐसी बहुत सी न वाज़ेह बातों और पहलुओं को, उनके तरीकेकार वगैरह को नबी ने सुन्नत के जरिये स्थापित कर दिये और जारी कर दिए। नमाज़
के अवकात-तरीका आदि, ज़कात की दर, हज के बहुत से अहकामों की तफ्सीलात हमें चली आ रही सुन्नत से मालूम पड़ती हैं, न की सीधे कुरान से। यंहा तक कि कुरान हज के महीनें भी नहीं बताता और बस
ये कह देता है (कुरान 2:197) कि हज के महीने जो पहले से ही
मुकरर हैं, क्योंकि लोग पहले से ही इन महीनों को जानते थे। जैसे कुरान ईमान लाने और ज़कात देने को कहता है मगर ज़कात किसे निसाब
वालों को देनी हैं, ये रसूल ने बताया। ऐसे ही नमाज़े जमा का अमल भी नबी ने जारी किया।
अगर कोई हुकुम नबी की सुन्नत में या हदीस में मिलता है तो उसकी असल को कुरान मे तलाशा जायगा। अगर कुरान में उसकी असल मौजूद है तो उसे अल्लाह का यूनिवरसल हुकुम माना जाएगा और अगर कुरान में माजूद नहीं है तो उसे नबी का वक्ती हुकुम (जरूरत और हालत के तहत दिया गया) माना जायगा। नबी की इताअत लाज़मी है तो साहबा उनके हर हुकुम पर बिना किसी सवाल के पूरा अमल करते थे और करे भी क्यों नहीं आखिर उनके बीच आखिरी नबी मौजूद थे। ये एक फितरी अमल था. क्योंकि कोई भी आम इंसान किसी महापुरुष या अपने गुरु के कहने भर पर भी उनका आदेश ज्यों का त्यों अमल में लाने लगता है।
हालांकि नबी के ऐसे वक्ती हुकुम के पीछे की वजह, जरूरत, मजबूरी, मक़सद, हिकमत वगैरह का जायजा लेते हुए, आज भी इन्हे अमल में लाया जा सकता है और नहीं भी। जैसे की नबी ने फरमाया कि सोने से पहले चिरागों को बूझा दिया करो, दरवाजा बंद कर लिया करो, खाने पीने के बरतन ढक दिया करो और बिस्तर को झाड लिया करो। उस वक़्त चिराग से आग लगने का खतरा, खुले दरवाजे से जानवरों के आने का खतरा, बर्तन और बिस्तर मे कीड़े मकोड़े छिपे होने का खतरा खुआ करता तो इसलिए आपने ऐसे हुकुम दिये और लोगों ने इन्हें ज्यों का त्यों माना भी। हालांकि अगर उस वक़्त ऐसे खतरे किसी के घर में नहीं थे, तो वो इस हुकुम का पाबंद नहीं था। आज अगर ऐसे खतरे मौजूद नहीं है तो इस हुकुम पर अमल करना ज़रूरी नहीं है। अक्सर नबी ने लोगों को बहुत सी चीजों को करने से मना कर दिया जबकि असलन वो हराम या नाजायज नहीं थी हालांकि लोगों को लगा कि ये हराम है। जैसे कुरान बताता है कि अल्लाह को तक्ब्बुर करने वाले पसंद नहीं है इसलिए नबी ने लटकते हुए कपड़े पहनना मना फरमा दिया क्योंकि उस वक़्त लटके हुए या ज़मीन से रगड़ खाते हुए कपड़े तक्ब्बुर करने वालों का तरीका और दिखावा था। हालांकि लटकते हुए कपड़े अपनी ज़ात में हराम या नाजायज़ नहीं है। यही वजह रेशम और सोने के मना होने के पीछे है। बाज़ वक़्त नबी ने लोगों को ऐसी बहुत सी बातों से भी रोका है जो असलन हराम या नाजायज नहीं थी मगर उनके अमल में आने से ममनू किए गए कामों की तरफ किसी मुस्लिम का रुझान हो सकता था। जैसे कि आप ने फरमाया कि कोई मर्द किसी औरत से उसके महरम की गैर हाजरी में न मिले। इसका मतलब ये नहीं है कि मर्द और औरत किसी भी हालत में मिल नहीं सकते, या ज़रूरी बात नहीं कर सकते, बिलकुल कर सकते है। ये हुक्म मर्द और औरत के अकेले मिलने पर जाने - अनजाने कोई गलत बात न हो जाये, सिर्फ इसके इमकान खतम या कम करने के लिए दिया गया है। दाढ़ी का हुकुम भी कुछ ऐसा ही है।
क्या कुरान, हदीस, सुन्नत, इजमा और इश्तिहाद या क़ियास दीन के माखज हैं?
कुरान में अल्लाह ने कहा है कि दीन मुककम्मल कर दिया गया है। अगर दीन मुककम्मल हो चुका है तो फिर हदीस (जिनकी सेहत तहकीक के साथ बदलती रहती हैं), इजमा (जो नबियों के बीच में ऐतिहासिक तौर पर जाना या साबित नहीं किया जा सकता और आज उम्मत किसी गलत नतीजे के बदले गलत इजमा भी कायम कर सकती है) और इज्तेहाद (जो इल्म, अकल, मौक़ा, महल वगैरह का मोहताज है) कैसे किसी चीज़ को दीन साबित कर सकते हैं। अब एक - एक कर के इन 5 बुनियाद पर बात करते हैं।
कुरान के 100% हक़ होने पर अल्लाह, खुद कुरान, नबी और तमाम उम्मत खड़ी है। इसके मखाज होने पर किसी को मामूली सा भी शक नहीं है।
सुन्नत और हदीस में फ़र्क़ है। पहले सुन्नत को समझ लेते है। सुन्नत मतलब है तरीका। अल्लाह के तरीके को सुन्नतुल्लाह कहा गया है। देखा जाए तो नबियो की सुन्नत, हूज़र की सुन्नत, सहाबा कि सुन्नत, सबके तरीक़े उनकी सुन्नत होते है। मगर दीन में सुन्नत से मुराद, नबी के जरिये दीन के तौर पर सैंक्शनड या जारी की गयी सुन्नत से है। दीन की सुन्नत आदम से चली आ रही थी और इब्राहिम के वक़्त में भी थी। इन सुन्नतों में जंहा इजाफे, कमी या सुधार की ज़रूरत थी वो, हुज़ूर ने करके आगे जारी कर दी। आम मुस्लिम का मौकिफ ये है कि दीन से जो मुतल्लिक़ हो या न हो, नबी ने जो भी काम किए या जिस तरह किए, वो सभी सुन्नत हैं इसलिए इस बुनियाद पर दो तरह की सुन्नतें हैं। पहली वाज़िब सुन्नत हैं जिन्हें तर्क करने पर इन्सान लानत का हकदार है जैसे दाढ़ी रखना, सीधे हाथ खाना, बैठ कर पानी पीना वगैरह. दूसरी आम सुन्नत हैं जिन्हें तर्क किया जा सकता है जैसे तहमद पहनना, ऊंट की सवारी वगैरह। मगर असल मुद्दा ये है कि नबी ने जो काम किए या जिस तरह किए, वो अगर से दीन के दिए अहकामों की अदायगी और तरीकेकार से मुत्तलिक हैं तो वही असली सुन्नत हैं यानि दीन की सुन्नत और उन्हें तर्क करना गुनाह और नाजायज़ है जैसे नमाज़, वुजू, रोज़े, हज का तरीका वगैरह। जबकि नबी के किये ऐसे काम और तरीके जो आपके उसवा ए हँसना या किसी बेहतरी से मुतल्लिक़ हैं, उन्हें करने पर अजर मिलेगा मगर किसी वजह से उन्हें छोड़ देने पर गुनाह नहीं हैं. बाकी जो अरबी संस्कृति, माशरे, उस वक़्त, माहौल वगैरह से मुतल्लिक़ नबी के काम और तरीके थे, उन्हे नबी से मोहब्बत या अक़ीदत के एतबार से अपनाने में न तो कोई खास सवाब है और न ही उन्हें छोड़ने में कोई हर्ज है.
इजमा के मायने किसी मुद्दे पर लोगों का जमा हो जाना है और इज्तेहाद या क़ियास अपनी अकल और इल्म की बुनियाद पर फैसला लेना है। अगर इजमा और इज्तिहाद भी दीन का स्रोत है तो कोई ऐसा दीन का एहकाम या अरकान बताएं जो आपको क़ुरान और सुन्नत में नहीं मिला और आपने इजमा और इज्तिहाद करके उसे दीन साबित कर दिया हो। ऐसा कुछ नहीं मिलेगा। जिस हदीस में नबी ने फरमाया है कि मेरी उम्मत को अल्लाह कभी गुमराही पर जमा नहीं करेगा, इसके गलत पसमंज़र और मायनों में समझा जाता है. इसका मतलब है कि कुछ न कुछ लोग हक़ पर ज़रुर रहेंगे, सभी के सभी बिगाड़ पर इक्कट्ठा नहीं हो जायँगे. जैसे कुरान में बताए विरासत के एक कानून पर उलेमाओं का इज्मा हैं कि यह ऐसे ही है मगर इस तरफ विरासत मुक़म्मल तकसीम हो ही नहीं सकती. पूरे दीन को बताने, समझाने का ज़िम्मा रसूलों पर होता है और जो उन्ही के ज़रिए मुक़म्मल किया जाता है, न की उनके सहाबा या उम्मत के द्वारा। दीन के सारे एहकाम बताए जा चुके है, उन्ही दो स्रोत के ज़रिए यानि कुरान और सुन्नत के जरिये। इन एहकाम पर यानी दीन पर अमल करते हुए जो मसले पेश आते है वो दीन के (नए) एहकाम नही होते बल्कि दीन के पहले तयशुदा एहकामों पर होने वाले अमल से वाबस्ता होते हैं। वो मसाइल का हिस्सा है, न कि नय अहकाम या अरकान। दीन की बुनियाद मुक़म्मल हो चुकी हैं, मसाइल आते रंहेगे। अमल के मसाइल और एहकाम- अरकान में फ़र्क़ है। मसाइल को हल करने के स्रोत क़ुरान, सुननह, हदीस, इज्मा, इज्तिहाद या क़यास वैगरह हो सकते हैं। क्योंकि दीन मुक़म्मल हो चुका है इसलिये अब कुछ नया उसमे दाखिल न होगा। मसाइल पैदा होते रहंगे जिन्हें हल भी किया जाता रहेगा।
हदिसो की तारीख
मुहम्मद साहब कहा करते थे की मेरी बातें न लिखा करो पर कभी कभी लिखने भी देते थे. वजह यह थी कि कुरान को सही सलामत याद या रिकॉर्ड करने का अमल जारी था. उस वक़्त कुरान नाजिल हो रहा था और आप यह चाहते थे की आपकी केवल वही बाते रिकॉर्ड हो पाएं जो अल्लाह कुरान के रूप में महफूज़ करना चाहता है और उनमें अल्लाह के कलाम के अलावा मुहम्मद साहब की बात शामिल न हो जाए. कुरान की हिफाज़त तय होने के बाद आपने अपने बातें लिखने की इजाज़त दी.
अरब में पहले से ही याद करने का रिवाज था जैसा बहुत सी जगह होता है और कुरान के बाद इस पर अमल बहुत ज़्यादा बढ़ गया। इसलिए नबी कथनों को भी मुंह ज़ुबानी याद किया जाने लगा क्योंकि लोग आप से मुहब्बत करते थे और पढ़ी दर पीढ़ी आगे बढाया जाने लगा. जो लोग बात आगे बढ़ाते थे उनके नाम कथन के साथ चस्पा होते थे यानी यह बताया जाता था कि यह बात फला ने फला (रावी या चैन) से सुनी है क्यूंकि यह बातें नबी की थी.
लगभग 2 सदी तक ये कौल यूँही चलती रहें. इनमें मिलावट हो गयी और लाखों हदिसो को जखीरा बन गया। इन्हें नबी के 200 वर्ष बाद लिखा गया। हालाँकि कुछ हदीसों के सहिफे पहले के भी लिखे हुए थे. जब यह महसूस हुआ की इन असल और झूठी फैली हुई हदीसों को अलग- अलग करना ही पड़ेगा तो इस पर तेहकीक का काम शुरू हुआ और बहुत से हदीसों के आलिम या इमाम दुनिया के सामने आये. इन इमामों ने हदीसो को कुछ उसूलों की बुनियाद पर छांट कर अलग कर लिया. यह उसूल खुद के ही बनाए हुए और बाज़ वक़्त इमामों के उसूलों में फर्क भी होता था. इनको बयान करने वालो के चरित्र, याददाश्त आदि की पड़ताल हुई जो सही पायी गयी उन्हें सहीह हदीसों के तौर पर मान्यता मिल गयी. तारीख भी इसी तरह सँजोयी जाती है। किरात भी इसी तरह आगे बढ़ाई गयी। सीरत भी ऐसे ही लिखी गयी। मगर इनमे सबसे ज्यादा तहकीकात हदीसों पर ही करी गयी.
हदीसों को इल्म की दुनिया में अखबारे अहद कहते हैं क्यूंकि वो हदीसों के तौर पर कुछ सहाबा ने आगे बयान की पर पूरी उम्मत ने आपकी सुन्नतों को अमल से हमेशा और हर जगह जारी रखा. इसलिए सुन्नत हदीस की मोहताज नहीं। पहले तीनों खलीफा और कुछ बड़े साहबा ने चंद रिवायतें ही बयान करी है वो भी ज़रूरत के तहत क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि नबी के बात बयान होने में ज़रा सी भी चूक हो और उसका जिम्मा उनके सिर पर आए। जबकि दूसरे सहाबा ने इन बातों को खुल कर बयान करना अच्छा समझा। उमर टीवी सीरीज़ में दिखाया गया है कि ह. उमर. एक सहाबी ह. अबु हुरैरा (जो सबसे ज़्यादा हदीसों के रावी है गालिबन शायद 5 हज़ार से भी ज़्यादा और इन्हें उमर र. ने हदीसें बयान करने से मना भी किया था।) से कहते हैं कि आपकी कई हदीसें हमने खारिज की है ताकि लोग क़ुरान पर जमा हो सके और इख़्तलाफ़ न हो सके। इसी तरह ह. उमर ने किरात पर भी कहा था कि ऐसी बातों को संजोओ मत. इससे मालूम पड़ता है कि चीज़ें बयान करने में सहाबा से भी गलतियां हो जाती थी. मगर क्यूंकि राय की आज़ादी थी इसलिए साहबा ने इन्हें आगे बढ़ाया। इमाम जज़री ने इन किरातों को मुतवातिर मानने की बात को रद्द किया है। तबरी की किताब उल किरात जो आज खो चुकी है में तबरी ने कहा है कि ये किरात के बदलाव बहुत ही कम है यानी वक़्त के साथ भी किरात के बदलाव बढ़ते गए। इसी तरह बाद में जब कुरान के शाने नुज़ूल में दिलचस्पी जागी तो वो भी लिखा गया।
अल्लाह की बात या कुरान पर ऐतराज नहीं करा जा सकता। इसलिए कुरान को खोलते हुए यह इत्मीनान होता है कि यह अल्लाह की बात है। ऐसे ही सुन्नत मिली है। मगर अहादीस सीधी नहीं मिली। हमने रसूल से रिसालत में कुछ सुना होता तो उस पर ऐतराज करने की जुर्रत करना, उन्हें वाकई रसूल न मानने के जैसा ही होता। मगर हम उनसे सीधा नहीं सुन रहे है. हदीसों में रसूल और उनकी बात के बीच आम इंसानों के जैसे ही रावी होते हैं। इसीलिए ही तो मुहददिसों ने in पर तहकीक करी और उन्हें भी ऐतराज रसूल के मुबारक मुंह से निकली बात पर नहीं था बल्कि उन तक जो और जैसे रसूल की बात पहुंची, उस पर होता था।
इलमे हदीस
हदीस एक तारीख़ी रेकॉर्ड है जिसमें नबी के कौल, वाकयात, साहबा के वाकयात और दूसरी बहुत सी चीज़ नोट हैं। सुन्नत और हदीस में फ़र्क़ है। हदीस नकारने वाले अगर सभी मुंकरे हदीस होते हैं तो तमाम आइम्मा ने लाखो हदीसे जमा करके, उनमे से सिर्फ कुछ हज़ार को ही आगे बढ़ाया और लिखा जबकि बाकी को कुछ उसूलों की बुनियाद पर रद्द कर दिया। है। जैसे इमाम बुखारी ने लगभग हज़ारो हदीसो में से लगभग सिर्फ 6 हज़ार हदीसे ली। बहुत से इमामों के उसूल भी एक दुसरे से अलग होते थे।
हदीसों को संजोने का मकसद उनसे अपनी मुकदमो के हल निकालना भी होता था। इसीलिए उनको विषय के आधार पर बाब जैसे सेक्शन में बांट कर हदीसों की किताब में रखा जाता है। हदीस नबी की एक घटना या वक्तव्य का, उनके साथियों के लफ़्ज़ों में चित्रण होती है। उनमें बेशक असल अल्फ़ाज़ ही रिकॉर्ड करवाए जाते थे। मगर बाज़ वक़्त असल अल्फ़ाज़ की बजाए बात कहने वाला अपने लफ़्ज़ों का प्रयोग भी अपनी याददाश्त के हिसाब से करते थे, हालाँकि ऐसा करने की जानबूझ कर नियत नही होती थी, बाकी इनमें मुद्दा (जो ज़ेरे बहस है) पूरा बयान होता था। इसलीए हर हदीस में पूरी बात यानी एक एक शब्द क्या कहे गए थे, ये रिकॉर्ड नहीं होता। वाकये की बात करे तो किसी हदीस में एक वाक्य पूरा बयान हुआ होता है, किसी मे आधा, किसी मे इससे भी कम। अक्सर हदीसों में केवल मूल बात या वाक्य ही बयान कर दिए गए हैं। इसका कारण भी वही है कि रावी या बयान करने वाले को कितनी बात याद है, किसी उद्देश्य के तहत पूरा वाकया याद है या केवल कुछ शब्द याद रह गए है जैसी बातों पर निर्भर करता था। इसीलिए बेहतर यही है कि कॉमन आने वाले लफ्जो को सबसे अधिक तरजीह दी जानी चाहिए। हालांकि एक हदीस के सारे तुर्क (संस्करण) एक साथ रख के देखने पर पूरा मुद्दा या बात स्पष्ट हो जाती है। पर फिर भी वो हमें हर हदीस के समय, स्तिथि, माहौल, लफ़्ज़ों तक 100% तक नहीं पहुँचा सकते। ये असंभव है। ऐसा बाज़ हदीसों में संभव हो सकता है पर हर हदीस में नहीं। आखीर हदीस कोई टाइम मशीन नही हैं।
आम किताबो और वेबसाइट पर हदीसों के बैकग्राउंड आदि लिखे नही होते। जबकि हदीसों की मूल किताबो में उनसे संबंधित बैकग्राउंड, अन्य हदीसे, नोट्स आदि मिल जाते हैं जिससे बात काफी हद तक साफ हो जाती है। इसलिए हदीस की उचित व्याख्या हदीसों की मूल किताब और उनके माहिर विद्वानों (तार्किक और गहरे इल्म वाले) से ही ली जा सकती है अन्यथा रिज़ल्ट और फ़हम गलत निकलने लगते है।
किसी ग्रंथ करीब से क़रीबतर समझने के लिए ये जानना बहुत ज़ुरूरी है कि उस समय के लोग उसके बारे में क्या राय रखते थे या उससे क्या मतलब या आशय लेते थे। इसे जाने बिना उस ग्रंथ या लेखन या बात को समझना अनुमानों के समुंदर में अधिक ले जाता है। धर्म की मूल रूपरेखा को उसी परिपेक्ष में समझना चाइए जो नबी ने, उनके साहबा ने और उनके बाद कि कुछ नस्लो (ताबइन, तबे ताबाइन) ने समझा। इसमे कुछ गलत अवधारणाऐं हो सकती है पर ये पूरी की पूरी समझ गलत नहीं हो सकती। इसमें कंही कंही समझ में कोई कमी या गलती या अधूरापन हो सकता है पर हर जगह नहीं। यह भी सच है कि हर हदीस काबिले एतबार नहीं है। कुछ हदीसों में गड़बड़ी है पर सब में नही। इसलिए उनका संदर्भ और दूसरी चीज़ें जानना बहुत जरूरी है।
हदिसो का जायजा।
जब हदीसों को इकट्ठा किया गया उसस ज़माने में रिकार्ड्स इतने आसानी से उपलब्ध नहीं थे जैसे आज एक उंगली के इशारे पर मिल जाते है। एक ही जगह पूरा इल्म मौजूद नहीं होता था। कंही से कुछ मिलता था और कंही से कुछ। ये ज़ुरूरी नहीं था कि हर आलिम या इमाम के सामने सारा इल्म या सारे रिकार्ड्स या सारे पहलू आ जाये। मुख्य हदीसों के इमामो के वक़्त में अस्मा - रिजाल (रावियों का जानकारियाँ) का इल्म इतना गहन और विस्तृत नहीं था जितना इनके बाद हुआ। इसलिय बाद में हदीसों और रावियों के बारे में बहुत सी जानकरी हासिल की गयी। इसलिए बाद में बहुत से आइम्मा ने कुछ हदिसो की सेहत सही साबित करी है।
मुहद्दिस को ये हक़ नहीं था कि वो कई सहाबा द्वारा बतायी गयी बात में कुछ लफ्ज़ कम या अधिक कर दे। अगर उसकी सनद सही पाई गई तो मतन को 100% दुरुस्त मानने का चलन आम है (अक्सर मतन को भी टटोलने की बात करी जाती है मगर व्यवहारिक रूप से ऐसा अक़सर होता नहीं है)। नतिजतन ये चलन बाज़ हदीसों से खतरनाक बातें साबित करवाता है. इबने खलदून ने वाकयात को इल्म और अकल पर परखने पर ज़ोर दिया है और फिर रिवायत को देखने पर। इसलिए आम उसूलों के अलावा और क़ुरान के खिलाफ होने के अलावा हदीसों को क़ाबिले एतबार मानने के लिए तीन और बातों को बुनियाद बनाते हुए खास तवज्जो देनी चाहिए।
1. उसका मत्न दीन की रूह के खिलाफ न हो (ये पहले से ही एक उसूल है मगर मतन पर सनद को एहमियत देने की रिवायत ज़्यादा है)।
2. उसका मत्न नबी के किरदार के खिलाफ न हो।
3. उसका मत्न इल्म और अकल के आम मुसल्मात या मयार के खिलाफ न हो।
साथ ही जब क़ुरान को समझने के लिए आयातों का पसमंज़र (कांटेक्स्ट, बैकग्राउंड) देखा जाता है तो फिर हदीसों को समझने के लिए पसमंज़र भी देखा जाना चाहिए। मौज़ू रिवायत को तो हिक़ारत से देखना समझ आता है पर सिर्फ कमज़ोर सनद की बुनियाद पर सारी की साड़ी ज़ईफ़ हदीसों को हिक़ारत से क्यों देखा जाए? सनदें बाद की तेहक़ीकात में दुरुस्त हो सकती है पर मत्न नहीं। क़ुरान को डिफेंड करना जितना आसान है, उतना ही मुश्किल कई हदीसों को डिफेंड करना है।
नबी का रुतबा
नबी के अलावा सबसे इख्तेलाफ़ किया जा सकता है। कुरान उलेमाओं की बात मानने को कहता है। यानि नबी और उलेमाओं की इतात में सामंजस्य बनाना चाहिए। इसलिए या तो खुद दीन में तहकीक करें या उलेमाओं पर एयतमद करते हुए उनकी ताईद करें। जब दीन को इलम के तौर पर पढ़ोगे तो दीन का हक है कि उसकी तहकीक करी जाए और जब दीन को फलाह के तौर लोगे तो दीन बुनियादी बातें मानते रहें, बस यही काफी है.
जो लोग सिर्फ उलेमा को आखिरी हक़ बना लेते हैं, यही लोग नबी का इंकार करते हैं. पहले की क़ौमों ने उलेमाओं को नबी का मुकाम दे दिया था। यहूद कहते थे कि हमारे उलेमा का इस पर इज्मा है. मगर उस वक़्त उनका इज्मा का फैसला निर्णायक नहीं था तो बाद के उम्मत के इज्मा का फैसला निर्णायक कैसे हो जाएगा.
नबी की बात का इंकार गुमराही और कुफ़र है। मगर हदीस नबी की बात नहीं है बल्कि उनकी तरफ मनसूब की गयी बात है। यही उलेमा का भी असल मौकिफ है। इन दोनों में फर्क हैं। हम नबी के वक़्त में नहीं है और न ही हमने ये उनके मुंह से सीधी सुनी है। इन बातों को सही समझने के लिए हमने कुछ उसूल बनाए हैं जो बेहतरीन हैं मगर वो फ़ाइनल अथॉरिटी फिर भी नहीं है। हदीस कुरान भी नहीं है। दुनिया में सिर्फ कुरान ही पूरा हक़ है। इसलिए कुछ हदिसो पर शक करना, असल में नबी की बात पर शक नहीं, बल्कि उनकी तरफ मनसूब की जा रही बात पर शक है और ये जायज़ है बस इसकी बुनियाद सही होनी चाहिए।
हराम, ममनू, मकरूह, मुबाह (ओप्शनल)/ हलाल, जायज़, मुस्तहब, वाजिब, फर्ज़/ सुन्नत, नफ़ील।
इनमें से रसूल ने दीन के तौर पर सिर्फ हराम, हलाल, फर्ज़ और नफ़ील जैसे लफ्ज इस्तेमाल किए हैं। बाकी सब बाद में दीन की टर्मिनोलोजी बने। फर्ज़ का मतलब है जो करना लाज़मी है, न करने पर पकड़ और गुनाह है। जो अमल रसूल ने अक्सर किए या जिन के करने पर बहुत ज़ोर दिया, उन्हे वाजिब कहा जाने लगा। ये टर्म हनाफ ने ईजाद की जैसे उन्होंने वितर, कुर्बानी, ईद की नमाज़ को वाजिब करार दिया। मुस्तहब मतलब जो करना बड़ी अच्छी बात है। जायज़ और हलाल के एक ही मायने हैं यानि जिनके करने पर मामूली सा भी गुनाह नहीं है। हराम जिसे कुरान में अल्लाह ने हराम करार दिया है। अल्लाह ने कुरान मे (सूरह आराफ 7:33) साफ साफ बता दिया है कि क्या क्या चीज़ें हराम है। क़ुरान जिनको हराम कहता है सिर्फ वही चीज़ हराम है, उसके अलावा किसी चीज़ को हराम कहना, खुद अपने आप में एक हराम अमल है। अल्लाह के सिवा कोई भी किसी चीज़ को हराम या हलाल घोषित नहीं कर सकता, पैगंबर तक नहीं। इसलिए अल्लाह ने कुरान (69: 44-46) मे फरमाया कि अगर मुहम्मद सल्ल. कोई ऐसी बात कह देते जो हमने न कही हो तो उनकी रगे जान काट दी गयी होती। यानि अल्लाह के नबी भी दीन के तौर पर सिर्फ वही बात कहने के लिए बाध्य हैं जो अल्लाह उनसे कहलवाना चाहता है। हराम के अलावा, ममनू अमल वो हैं जिन्हें करने पर पकड़ और गुनाह है। मगर बाज़ वक़्त ये वो अमल भी हैं किस ज़रूरत, मजबूरी, हिकमत वगैरह के तहत करने से रोक दिये जाते हैं, इन हालातों और वजहों के न होने पर, इन्हे किया भी जा सकता है और तब यह गुनाह नहीं माने जायेंगे जैसे बिना तक्कबूर के पाँयचें नीचे रखना या रेशम या सोना पहनना (सोना सबके लिए मना किया था क्योंकि सोना उस वक़्त आम नहीं था, अमीरों के पास होता था, करेंसी में इस्तेमाल होता था मगर जब औरतों ने कहा कि ये तो उनकी ज़ैनब का हिस्सा है तो औरतों को इसकी इजाज़त दे दी)। मकरूह अमल वो हैं जिन्हें करना पसंद नहीं किया गया और न करने पर सवाब हैं मगर कोई कर ले तो गुनाह भी नहीं हैं। मुबाह अमल वो हैं जो करो या न करो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। दीन में इबादतों के मद्देनजर सिर्फ दो ही टर्म नबी ने इस्तेमाल की हैं, एक फर्ज़ और दूसरी नफ़ील। नफ़ील यानि जो फर्ज़ नहीं हैं। नफ़ील का मतलब ही इज़ाफ़ा है।
शरीयत
दीन में अखलकियात और कानून है। माशरे में अखलकियात पर अमल करते हुए आखिरी सिरे पर कानून होते हैं। कानून यानि शरीयत अल्लाह का हुकुम है। जिस जिस मामले में अल्लाह ने हुकुम दिया है वो शरीयात है जैसे निकाह या सूद के बारे में। शरीयत को नाफीज नहीं करना, उस पर अमल करना हैं। जाति ज़िंदगी में आम इंसान को और हुकूमत में, हुक्मरानों को इस अमल करना है, न कि नाफीज करना है। शरीयत में हुकूमतों को 3 हुक्म हैं, अगर मुस्लिम है तो जुम्मे का एहतमाम और हुक्मरान का खुतबा, जुर्म करने पर मुस्लिम को (जो आखिरी दर्जे में जुर्म हो, किसी रियायत का हकदार न हो, जानबूझ कर जुर्म किया गया हो, मुरजीम पर कोई उज़र न हो, वगैरह ) अल्लाह की करार दी गयी सज़ा देने का और तीसरा कानून है कि मुस्लिम के किसी आपसी मसले में फैसला उनकी शरीयत के मुताबिक़ देने का। मगर शरियत के तहत लोगों को जबरन रोज़ा नहीं रखवा सकते, खास लिबास नहीं पहनवा सकता, जंग के लिए मजबूर नहीं कर सकते। शरीअत में सजाएँ जुर्म के लिए नहीं बल्कि, खुदा का अहद करने के बाद जुर्म करने वालों के लिए है यानि मुस्लिम के लिए, न कि गैर मुस्लिम के लिए।
इस्लाम के तमाम हलाल और हराम क़ानून केवल और केवल क़ुरान में है। उन क़ानूनो का व्यवहारिक रूप या किर्यान्वन मुहम्मद साहब ने अपने समय में आने वाले मुकद्दमों में कर के दिखाया। इन मुकद्दमों में आप ने हर पहलू की जांच परख के बाद अपने फैसले दिए, क़ुरान के अनुसार। जैसे चोर की सज़ा हाथ काटना है परंतु ये अंतिम और कठोरतम सज़ा है। नबी और मुख्य खलीफाओं ने चोरों को उनकी स्तिथि, नियत, चुराए समान का मूल्य आदि जैसी ढेरों बातों को मद्देनजर रखते हुए, कभी हाथ काटने की सज़ा दी और अक्सर नहीं काटने की भी दी। यहाँ तक कि बाज़ वक़्त माफ भी किया गया। ज़ाहिर है चोरी की गंभीरता और घटना की स्तिथि आदि के आधार पर ये फैसले होते है जिनमें मिनिमम से मैक्सिमम तक सज़ा दी जा सकती है, माफी के अलावा।
इस्लाम या अल्लाह के दिए कानूनों को शरिया कहते हैं। अल्लाह ने हर चीज़ के लिये व्यवस्था या कानून नहीं बनाए हैं। जो बेहद ज़रूरी चीज़ें और मामलात हैं सिर्फ उनके लिए कुछ बुनियादी कानून या व्यवस्था बना कर इंसानों को दे दी हैं। ये कानून आम मुसलमानों और मुस्लिम हकूमतों को दिए गए है। ये कानून आम इंसानों को दूसरों पर लागू नहीं करने हैं बल्कि खुद अमल में लाने हैं। ये सिर्फ मुसलमानों और उनकी हुकूमतों को अमल में लाना लाज़मी हैं। इन्हें गैर मुस्लिम चाहे तो खुद पर लागू कर सकते हैं। मगर वो तभी करेंगे जब मुस्लिम उन्हें खुद अपने अमल से फ़ायदेमनंद साबित करके दिखा देंगे। सिर्फ ज़ुबानी फायदे गिनाने से कुछ नहीं होगा। क़ुरान अहले किताब से कहता है कि अपनी किताबो की सच्ची शिक्षाओं को लागू करो। अन्य लोग जो दुनिया में इस्लाम को नहीं मानते वो जाहिर है अपने कानून बनाएंगे। ऐसे में उनके बनाये आज बहुत से कानून और व्यवस्थाऐं सही हैं और इस्लाम के दिये उसूलों पर ही आधारित हैं, जैसे डेमोक्रेटिक हुकूमत हर इंसान की राय लेके बनती हैं। बहुत से कानून या व्यवस्थाएं इस्लाम के खिलाफ भी बनी हुई हैं। बाकि जिन मामलात में इस्लाम ने कोई हिदायत नहीं दी है, उनमें इंसान जो उचित हो, वो कर सकता है। ईश्वर ने इंसानों को इरादा, इख़्तियार, चॉइस देके भेजा है। इस लिहाज़ से ईश्वर का कानून सभी अमल में नहीं लाएंगे जब तक वो ईश्वर में पूरी तरह आस्था नहीं रखंगे।
सुन्नत
अमलन तरीका ए ज़िंदगी, सुन्नत है। इसलिए सुन्नत किसी और चीज़ के लिए इस्तेमाल नही हुआ। उसवा ए हसना, नबी का बेतरीन तरीका है. दीन का यानी जो क़ुरान ने करने को कहा, उस पर रसूल ने खुद कैसे अमल किया, यही उसवा ए हसना है। मुस्तक़िल बिल ज़ात, नबी की दीनी सुनन्त ही है। ये स्वतंत्र है। इसका जिक्र क़ुरान में है पर डिटेल में नहीं है। इसकी डिटेल तो रसूल ने जारी की।
इमाम शाफ़ई अपनी किताब अल रिसाला में लिखते है कि इल्म (इस्लामी) दो तरह से महफूज़ हुआ है। एक कितबुल्लाह और दूसरा मुसलमानों की नकल में जैसे नमाज़, रोज़े, हज, ज़कात, जिससे कोई बालिग आक़िल मुस्लिम अनजान हो ही नहीं सकता। इब्न अब्दुल बर कहते है इल्म क़ुरान सुन्नत से मिल गया।
सुन्नत इज्मा और तावतुर से जारी है जो हमें सीधी इसी से मिल गयी है। बहुत सी सुन्नत का ज़िक्र अखबार ए अहद में भी मौजूद है, वो हदीसों के ज़रिये हम को मिला है क्योंकि वो कुछ लोगों ने बयान भी किया जबकि उन्हें अमलन आगे बढ़ाने का काम सभी ने किया है. इस तरह ये इल्म दो तरह महफूज़ हुआ हैं, एक जारियात मे और दूसरा हदीसों में। मगर इसकी असल जारी सुन्नत ही है. इल्म की दुनिया मे हदीसो को अखबार के अहद कहते है और जारी सुन्नत को अखबार ए मुतवातिर कहते हैं।
यानी सुनन्त असल हिस्सा जारियात में है और उसी का एक हिस्सा हदीसों में। अब अखबारें अहद के हिस्से को सुनन्त बोला जा रहा जबकि ये हिस्सा मुस्तकिल बिल जात को बयान ही नही कर रहा, क्योंकि ये कोई भी इंडिपेंडेंट बात नहीं करता बल्कि किसी सुन्नत के जारी हकुम पर या दीन की किसी बात की ही वजाहत करता है। इसलिए सुनन्त को सिर्फ पहले हिस्से यानी जारी सुनन्त तक को ही कहना चाहिए। लगभग 25 के करीब पिछली सुन्नत नबी ने आगे जारी की।
पैदाइश पर बच्चों के कान में अज़ान देने की सुन्नत हदीसों और उम्मत में मौजूद हैं मगर वो तारीखी तौर पर नबी तक नहीं पहुँचती हैं. इसी तरह अकीका भी तारीखी तौर पर सुन्नत नहीं हैं.
बिदत
बिदत के लफ़ज़न मायने नई चीज़ से या नई चीज़ पैदा करने से है। रसूलुल्लाह से पहले से ही अरब में यह लफ्ज़ इन्ही मायनो में इस्तेमाल होता आ रहा था। बिदत यानी नई ईजाद जो अच्छी भी हो सकती है और बुरी भी। दुनिया के मामलों में अच्छी बिदत बड़ी अहम और फायदेमंद चीज़ है। जैसे मॉडर्न साइंस या एलोपैथी इलाज की ईजाद करना। दुनिया के मामलों में की गयी बुरी बिदत जैसे कंप्यूटर वायरस की ईजाद एक बुरी चीज़ है।
दीन मानने और दीन पर चलने के तरीको में अच्छी बिदत यानी अच्छी नई चीजों का इस्तेमाल शुरू करना भी असल में दीन में बिदत नहीं है। जैसे की अज़ान देने के लिए लाउडस्पीकर, नमाज़ टाइम देखने के लिए घड़ी, वुज़ू के लिए नल इस्तेमाल करना अच्छी बिदत है और फायदेमंद है। ऐसे ही हज के किये जहाज़, सायरन की आवाज़ से रोज़ा खोलना, क़ुरान पढ़ने के लिए मोबाइल अप्प, ज़कात के लिए कैलकुलेटर का इस्तेमाल करना भी बिदत की फेहरिस्त में नहीं आएंगी। पर दीन मानने और दीन पर चलने के तरीकों में बुरी बिदत भी हो सकती है जिनकी कंही से कंही तक गुंजाइश नहीं। जैसे कि सड़कों पर आकर नमाज़ पढ़ना और आवाजाही रोक देना या अज़ान के लाउडस्पीकर पर नाते नज़्में, लगा के शोर मचाना।
असल दिक्कत है दीन में बिदत करने की। यानी दीन के किसी एहकाम, फ़राइज़, बुनियाद में कोई नई चीज़ पैदा करना। इसे दीन में बिदत क़रार दिया गया है और इसे से दूरी इख्तियार करने को बार बार कहा गया है। यानी दीन में कुछ नई बात जोड़ना बिदत है और दीन मानने के तरीकों में नई चीज़ लाना बिदत नहीं है। जिसे नबी ने दीन या दीन का हिस्सा क़रार नही दिया, उसे दीन बना के पेश करना बिदत है। नबी की तालीमात में भी कुछ दाखिल नही किया जा सकता है। जैसे दीन में कुछ जोड़ा नही जा सकता वैसे ही सुन्नत में भी कुछ जोड़ा नही जा सकता, इनमें कुछ जोड़ना ही बिदत है। दीन के मामलात में ये देखा जाएगा कि क्या नबी ने ऐसा किया और दुनिया के मामले में ये देखा जायगा की मुमानियत तो नहीं है। यानी दुनिया के काम मे मुमानियत देखी जाएगी और दीन के काम में नबी का अमल। जैसे हज के अरकान वही रहेंगे पर मक्का आएं - जाएँ जैसे मर्ज़ी यानी सवारी कोई भी हो सकती है। नमाज़ के अरकान वही रहंगे पर मस्जीद में जैसी मर्ज़ी सहूलतें रखवाएं। इबादत में कोई नई इबादत अब जोड़ी या घटाई नही जा सकती।
आम तौर पर बिदत को दो हिस्सों में बांटा जाता है बिदत ए हसना (अच्छी बिदत) और बिदत ए सय्या (बुरी बिदत). ये डिवीजन वो आलिम करते है जो दीन के मानने और दीन पर चलने के तरीकों की ईजाद को 'दीन में बिदत' मानते है। जबकि गहराई से झांकें तो यह साफ है कि दीन में बिदत अच्छी हो ही नही सकती, सिर्फ बुरी होती है। इसलिए अच्छी और बुरी बिदत का कांसेप्ट दरअसल तरिकों में बिदत है जो पूरी तरह जायज़ है।
इसलिए दुनिया और दीन को फॉलो करने में इस्तेमाल होने वाले तरिकों में बिदत भी जायज़ है। बस दीन में बिदत या नई चीज़ की ईजाद मना है यानी दीन के अहकामों - अरकानों में कोई बदलाव नही किया जा सकता। दीन अल्लाह का दिया हुआ है जो मुकम्मल हो चुका है इसलिए इसमे कुछ जोड़ना, घटाना या बदलाव करना, अल्लाह की तरफ ऐसी बात को जोड़ने जैसा ही है जिसका हमें इल्म नहीं या जो अल्लाह ने कही ही नही।
हुज़ूर सल्ल. की हदीस है कि आपने फरमाया की इस्लाम मे कोई अच्छी प्रैक्टिस (सुन्नतन हसनतन यानी अच्छा तरीका) लाया तो इस पर अमल करने वालो की तरह उसको भी सवाब मिलता रहेगा। और कोई बुरी प्रैक्टिस लाया तो इस पर जो लोग चलेंगे उनकी तरह उसको भी गुनाह मिलता रहेगा।
इसलिए दीन पर चलने के रास्तों या दीन को मानने के लिए इस्तेमाल होने वाले तरीकों में नई या अच्छी चीजें लाना या पैदा करना हराम कामों की फेहरिस्त में नही आता। ऐसी अच्छे नए तरिकों की ईजाद बिदत नहीं है पर सिर्फ इस सुरत में ये बिदत मानी जाएगी जब इन अच्छे तरिकों को फ़र्ज़ क़रार दे दिया जाए। क्योंकी हलाल को हराम, हराम को हलाल, फ़र्ज़ को मुबाह, मुबाह को फ़र्ज़ बना लेना आदि दीन में बिदत है।
इस्लामिक साहित्य से बिदअत का इतिहास मिल जाता है जैसे फल बिदत कब शुरू हुई है। जबकि सुनन्ह नबी तक पहुँच जाती है।
हराम, शिर्क, कुफ़्र।
सूरह अराफ (7:33) में खाने पीने की चीज़ों के अलावा सिर्फ 5 बातें हराम क़रार दी गई है। इसके अलावा कोई बात हराम नहीं है। हर बात के हलाल और हराम होने का जायज़ा इस आयत के मद्देनजर लिया जाएगा। वो पांच हराम काम है:- बदकारी, हक़तल्फ़ी, ज़ुल्म (किसी की जान माल आबरू के ख़िलाफ़), शिर्क, अल्लाह से ऐसी बात जोड़ना या अल्लाह के बारे में ऐसी बात कहना, जिसका हमें इल्म नही (यानी अपनी मर्ज़ी से हलाल हराम मुक़र्रर करना भी)। ह. सलमान फ़ारसी की हदीस है कि नबी ने फरमाया की हलाल और हराम सिर्फ वही है, जो अल्लाह ने क़ुरान में हलाल और हराम क़रार दिये है। जिस पर अल्लाह खामोश है वो सब बख्शने के क़ाबिल है। यानी खाने पीने की चीज़ों के आलवा और इन 5 काम के अलावा बाकी तमाम चीज़े हलाल है।
अल्लाह की ज़ात में किसी को शामिल करना शिर्क है। ये अमल और अकाईद दोनों से ज़ाहिर हो सकता है, मगर आकाईद बड़ा मुद्दा है। मगर इसका बहुत ख्याल रखा जाना चाहिए। इसलिए कब्र परस्तों को यूंही शिर्क करने वाला नहीं कह देना चाहिए क्योंकि वो अल्लाह का शरीक नहीं मानते। आम तौर पर इस्लाम की बुनियादों को इंकार करने वाले अमल कुफ़रिया अमल है ।
हलाल-हराम की वज़ाहत
जिन
चीजों के हलाल-हराम होने पर आम तौर पर किसी को शुबा नहीं है वो तो
मुसलमानों को वैसे ही मानने हैं। मगर इनमें या इनके बीच कुछ ऐसी चीज़ें भी आ
जाती है जिन पर इख़्तलाफ़े राय हो जाता है, ऐसे
मामलात में हर इंसान को सभी के राय-मशवरे को सुनने के बाद अपने इल्म और अक़्ल की रोशनी
में फैसला लेना है। अगर इंसान को इत्मिनान हो चुका है तो उन्हें किया जाए और अगर दिल गंवारा नहीं कर रहा है तो नहीं किया जाए। अगर इसमें किसी को मामला समझने में
वाकई गलती लगी (जानबूझकर नहीं) जो बड़े से बड़े इंसान को भी लग सकती है तो अल्लाह
इसी के मद्देनज़े उसका हिसाब लेगा। जितनी मुमकिन है किसी चीज़ के बारे में उतनी
तहक़ीक़ करनी चाहिए फिर अल्लाह पर छोड़ देना चाहिए। जैसे
हलाल और हराम खाने की चीज़ों में कोई मुतशाबिह चीज़ हो तो उस पर रिसालत से यही पता
लगता है कि उसे ममनू मान के छोड़ना ही बेहतर है पर अगर कोई अपने इश्तिहाद पर उस जायज मान कर ले तो
उसे यह रियायत इस्लाम में हासिल है। इसमें खाने-पीने की चीजें भी आती हैं और सूद-बैंक के मामलात भी।
फिकह
फ़िक़्ह उस क़ानून और न्यायशास्त्र का ज्ञान है.
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क्या पहले किसी ने दीन को सही तरह समझा जो अब नया दीन सिखाया जा रहा है?
पहले भी क़ुरान, सुन्नत, बाकी इस्लामी लिटरेचर से दीन लोगों ने अपनी अक़्ल और इल्म की रोशनी में दीन समझा है। मगर अक्सरियत में यह बात देखने को नहीं मिलती है। लोगों को फ़हम में बड़ी गलतियां हुई हैं, जैसे क़ुरान को हदीसों की रोशनी में समझना, हदीस और सुन्नत को एक मान लेना, लिटेरचर में आई किसी बात को अक़्ल से ज़्यादा तवज्जो देना, रिवायती चली आ रही चीजों को ज्यों का त्यों मानना, अपने ज़ाती महदूद इल्म की रोशनी में गलत मौकिफ़ पर कायम हो जाना, अकलियत में या जा रही मज़बूत दलील को महज़ इसलिए छोड़ देना क्योंकि वो अक्सरियत की नहीं है, फ़िक़्ह को हर चीज़ में बरतरी देना। ऐसी तमाम गलतियां हमारे उलेमा, मसालीक करते आ रहे हैं। आज के दौर में यह गलतियां दूर की जा रही है। अब वो दौर नहीं जब किसी की कही बात की हक़ीक़त को जानने के उतने वसाइल मौजूद नहीं होते थे। आज इन्फॉर्मेशन का दौर है, अक्सरियत से लेके अकलियत सभी की तहक़ीक़, मौकिफ़, दलीलें आसानी से मौजूद है। इन पर इल्म और अक़्ल में आम मुसल्लमात के तहत फैसला करना चाहिए। अनेकों उलेमा यही सीखा रहे है। मसलकों और फिरको में तो वही लकीरे पीटी जा रही हैं जिनकी वजह से लोग आज या तो इस्लाम को सिर्फ एक पहचान की तरह ढो रहे हैं या एक्स मुस्लिम होते जा रहे है। आज भी लोग अक्सर रिवायतों या खबरों से दीन समझ रहे हैं जबकि असल दीन के सौर्स क़ुरान और सुन्नत है, हदीसे और तारीख नहीं। हदीसे तारीखी रेकॉर्ड है। मुद्दों पर सहाबा का नज़रिया देखा जाएगा, मगर आखरी फैसला रसूल और क़ुरान से होगा। बाज़ वक़्त उनमें इल्मी इख़्तेलाफ़ भी होता है, और सभी से इल्मी गलतियां भी हो सकती हैं। कोई भी सहाबी हमसे सीधे या सामने अपनी बात नहीं कह रहे हैं, हमारे और उनके बीच कुछ रावी हैं, कुछ लिखित रिकॉर्ड हैं जंहा गड़बड़ी के बहुत गुंजाइश है। यही वजह है कि लाखों हदीसों में छनकर हम तक कुछ हजार ही पहुची हैं और उनमें भी आज भी तहक़ीक़ होती रहती हैं। हदीसे कोई फाइनल अथॉरिटी नहीं है, मगर फिर भी वाकई बहुत एहम हैं। आज तक दावत को खास तवज्जो नहीं दी गयी है। जिसकी एक मिसाल है कि फ़िक़्ह और हदीसों में दावत का कोई बाब नहीं है। इसका मलतब यह नही है कि इनमें दावत के बारे में एक बात तक नहीं है। मतलब है कसरत से नहीं है। मुस्लिम या उलेमाजिस हलात में आज तक इस्लाम ले गए हैं, वंहा से ज़्यादातर इल्म और अक़्ल वालो के लिए रास्ता इल्हाद की ओर मुड़ रहा है। इस्तेलाही तौर पर दावत गैर मुसलमानों के लिए हैं और इस्लाह मुसलमानों के लिए। दीन का लिटेरचर अपने आप मे दावत नहीं है। मुस्लिम जिसे इस्लाम का लिटेरचर समझते हैं, उनमें ऊपरी तौर पर झांकने के बाद आज के दौर में गुमराही की ओर भी इंसान निकलना तय है और गैरो के सवाल उठना भी जायज़ है। इनमें इतनी गड़बड़ियां हैं। गहराई से गैरो के पास झांकने का वक़्त नहीं है और खुद मुसलमानों तक के पास नही है। मुसलमान खुद रिवायती मज़हब ढो रहे हैं। जो किसी आलिम ने कहा दिया, उसे पत्थर की लकीर मान लेते हैं। सामने वाले कि दलील तक नहीं सुनते। क़ुरान में अहसन तरीके से बात पहुचांने का जो हुक्म है. इस्लाम दीन पूरी तरह से क़ुरान, सुन्नत में महफूज़ है। अगर मुहद्दिस, फुकह नहीं होते तो भी इस्लाम क़ुरान और सुन्नत के ज़रिए मुंतकिल हुआ होता जैसा कि नबूवत से लेके हदीसों के दर्ज किए जाने तक चल रहा था, जब मुहद्दिस, फुकह नहीं थे, तब भी इस्लाम ही था। इन्होंने इस्लाम की खिदमत करी है और बहुत से मसलों में इनकी इसी ख़िदमत से रहनुमाई मिलती है। मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन्हीं हदीसों, फ़िक़्ह में बहुत सी ऐसी बातें लिखी हैं जिनकी बजह से आज इस्लाम पर कीचड़ उछाली जाती है या मुस्लिम आपस में फिरको के शिकार हो गये हैं जैसे हज़रत आएशा की उम्र, हलाला, जहद, गज़वा और न जाने क्या क्या।
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ना तो कंहीं क़ुरान ने और न ही कभी मुहम्मद सल्ल. ने फरमाया कि फ़िक़्ह इस्लाम या मुसलमनों के लिए लाज़मी है। इंसान की फलाह के लिये क़ुरान और सुन्नत काफी है। इसी में पूरा का पूरा दीन बयान हो चुका है। सभी बुनियादी रूल्स क़ुरान, सुन्नत में मौजूद हैं। वंहा से रूल्स लाएंगे, जैसे फ़क़ीह, उनके पैरोकार लाते हैं। हर चीज़ क़ुरान और सुन्नत से तय होगी जिनका वास्ता दीन से है, चाहे फ़िक़्ह करें या आम इंसान। क़ुरान या दीन को समझने के लिए या के लिए किसी हदीस की ज़रूरत नहीं है। अगर कोई इसके उलट मानता है तो इसका मतलब है कि वो ये मानता है कि क़ुरान और सुनन्त में पूरा दीन नहीं है, बल्कि हदीसों ने दीन मुक़म्मल किया। तो फिर क़ुरान और नबी किसलिये आये थे? फिर क़ुरान ने क्यों कहा कि आज दीन मुक़म्मल कर दिया गया है? कुरान और नबी दीन जारी करने आये थे, न कि हदीस, या फ़िक़्ह। जो सुन्नत और दीन से जारी हुआ। यही वो गलती है जो फ़िक़्ह के पैरोकार करते हैं। किसी फ़क़ीह ने ऐसा नहीं कहा। मगर पैरोकार बिना गहरी समझ के ऐसा बोलते हैं। हदीस सिर्फ तारीखी रिकॉर्ड हैं। जिसमे सही, गलत सभी तरह की बातें हैं। रोज़ा, नमाज़, हज की आम अदायगी लिए क़ुरान और जारी सुन्नत में झांका जायेगा, हदीस या फ़िक़्ह में नहीं। नबी के 200 साल पैदा हुई हदीस, इस्लाम का सौर्स कभी नहीं हो सकती है। अगर ऐसा होता तो कुरान में इसकी दलील होती हैं, जो क़ुरान में नहीं है। नबी ने भी ये कहा होता, जो नहीं कहा। मुझे समझ में नही आता जो काम अल्लाह, क़ुरान, रसूल ने नहीं किया, मुसलमान क्यों उसे करने पर इतने आमादा है? मुसलमान क्यों खुद दीन के सौर्स बना रहे हैं? इस्लाम के सौर्स अल्लाह के तयशुदा हैं, इंसानों के नहीं। जारी सुनन्त के बुनियादी अमल में कोई बदलाव नहीं हो सकता क्योंको उसके रावी चंद नहीं करोड़ो हैं। आज भी कोई नही कर कर सकता। पहले ही रोक दिया जाता कोई करना भी चाहे तो। जबकी हदीसों के चंद रावी के बयान में न जाने कितने ही बदलाब मुमकिन है और हुए भी हैं और हदीसों का इल्म रखने वाले ये मानते भी है। इसलिए जारी सुनन्त को हदीसों से मिलाया ही नहीं जा सकता। जारी सुनन्त, अल्लाह का हकूम और निज़ाम है, हदीसे इन्सानों का।
हज़रत आएशा अकेली रावी होने का मतलब है उन्होंने सीधे रसूल से सुनी और आगे बयान करी। यानी ह. आयशा ने सीधे मुहददीसों को हदीस बयान नहीं करी है। उनसे उनके शागिर्दों, साहाबा, तबैयन ने सुनी है और उन्होंने आगे रेकॉर्ड करवाई। नबी के वक़्त में हदीसों का काम पहले ही शुर हो गया था, ठीक बात है मगर वो व्यक्तिगत और छोटे स्तर पर था। इसे देख कर नबी ने अपने वक़्त में ही हदीसों यानी अपनी बातों को लिखने के लिए मना कर दिया था ताकि क़ुरान को बिना किसी मिलावट की गुंजाइश के महफूज़ किया जा सके। क्यों? हदीसों को दीन का सौर्स मानने वाले उलेमा ने कभी इस पर सोचा है? कि अगर क़ुरान की तरह हदीस भी सौर्स होता तो नबी क्यों मना करते? बल्कि नबी तो ज़ोर देकर कहते कि लिखो लिखो। बल्कि खुद लिखवाने का निज़ाम, इदारा, ग्रुप क़ायम करते। मगर क़ुरान और रिसालत दोनो इस हकूम से पूरी तरह खाली है। आपने इसकी अपनी बातों को लिखने की इजाज़त आखिरी मरहले में जा कर दी जब क़ुरान के महफूज़ होने के ज़राए पूरी तरह से क़ायम हो गये थे। इस इजाज़त के वक्त भी आपने नहीं कहा कि मेरी हदीसें दीन का सौर्स है या इनसे दीन अखज़ करना। बल्कि सुनन्त के बारे में आपने यही कहा कि मुझे फॉलो करो यानी जो मैं करूँ, उसे देखो और वैसे ही करो। क़ुरान ने भी यही कहा, ये नहीं कहा कि हदीसों को हक़म बनाओ। सो इसी तरह सुनन्त जारी हुई। इसलिए कुछ सहाबा के हदीसो के सहिफें ज़रूर बनाये, जो बाद में हदीसों की बड़ी किताबो में शामिल हुए। अगर ये सौर्स होता तो चंद सहाबा नहीं तमाम सहाबा शुरुवात से ही क़ुरान की तरह हदीसो को भी महफूज़ कर रहे होते है क़ुरान के लिए इस्तमाल हुए तरीको के साथ। बल्कि अल्लाह खुद ऐसे तरीको को जारी करता। जैसे नमाज़ में किरात को करा ताकि नस्ल दर नस्ल कुरान करोड़ो लोग आगे बढ़ाएं और भी कई तरीके थे।
सारी सुन्नतें अमल से जारी है। जो जारी हैं, उनमें से कई का ज़िक्र हदीसों में भी दर्ज हुआ है। सुनन्त वही है जो रसूल ने खुद अमलन जारी करी। इनमें कई का ज़िक्र हदीसों में आ गया बस। बाज़ ऐसी हैं, जो सुनन्त नहीं है मगर उन्हें तथाकथित सुन्नत बना कर हदीसों की बुनियाद पर उम्मत में लागू कर दिया गया है। इसका जिम्मेदार कौन हैं? वही उलेमा, फ़िक़्ह, इजमा वाले और कौन। चली आ रही रिवायत, कमज़ोर हदीसों, इजमा, इज्तिहाद के नाम पर ये लोग अब पलट कर देखने को भी तैयार नहीं है। कोई दिखाए तो उसे गुमराह कहते हैं। सुन्नत के रावी हदीसों की तरह चंद नहीं है बल्कि लाखों - करोड़ों हैं। हदीसें वाकई नबी से डायरेक्ट नहीं मिली हैं। बीच में रावी होते है। इसलिए इन्हें नबी की ओर मंसूब बात कहा जाता है। इसके लिए यही लफ्ज़ इस्तेमाल किये हैं तमाम आइम्मा ने, इल्म की दुनिया में। आम मुस्लिम ये नहीं समझ पाते हैं और न ही समझना चाहते हैं।
नमाज़ की बुनियाद में कोई इखतलाफ़ नहीं है। जो नमाज़ के फ़राइज़ हैं वो पूरी दुनिया में एक जैसे हैं, जैसे रसूल ने जारी किए थे रिसालत में। जो गैर फ़राइज़ चीज़ हैं, उनमें फर्क हैं। वो इसलिए क्योंकि रसूल ने ही उन्हें भी जारी किया कि गैर फ़र्ज़ चीजों ऐसे भी कर सकते हो और वैसे भी। जैसे हाथ कंहा बांधना है, रफ़ायादेन वगैरह। इसलिए ईमाम अबु हनीफा ने रफ़ायादेन के मामले में हदीसों की बजाय चली आ रही सुनन्त यानी रफ़ायादेन न करने को तस्लीम किया था।
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मेरी समझ है कि गामिदी साहब सुन्नत पर अभी भी थोडा सा इर्तिका दौर में है. नबी ने दीन को आगे बढ़ाने के लिए कहा कि मेरी इब्तेदा करो, मेरे रास्ते (सुन्नत) पर चलो, जैसा मैं करू, करते जाओ, दीन पर अमल होता जाएगा। इससे पहले कहा कि कुरान को आगे बढ़ाओ, उसमें दीन है। यानि नबी ने कुरान की तफ़सीलत करके दिखाई. नबी ने ये नहीं कहा कि मैं भी तुम्हें अल्लाह की तरह अपने कौल लिखवा देता हूं। या मेरे क़ौल लिखो, उन्हें आगे बढ़ाते जाओ, वो दीन है, दीन पर अमल होता चला जाएगा. सुन्नत (trodden way) का मतलब है जो दीनी अमल शुरूवात से इज्मा तवातुर से बढ़या जा रहा है, नस्ल दर नस्ल (नबी तक पहुंच रहा हो पीछे) यानि नबी ने आगे बढ्या हमें जोड़ घटा करके। अगर नबी तक नहीं पहुंच रहा है, या तारीख में ये बात आई कि फला चीज़ नबी के वक्त में नहीं थी या दीन के तौर पर नहीं थी, तो वो सुन्नत नहीं मानी जाएगी, जैसा हकीका और वलिमा (तारीख से दीनी अमल नहीं साबित होता, जबकी प्रैक्टिकली लगातार चालू है) और बच्चों के काम में अज़ान (व्यावहारिक रूप से नबी से चालू नहीं है, तारीख बताती है नबी के बाद शुरू हुआ), सुन्नत नहीं है। इसलिए सामान्य उसूल के मुताबिक़ इज्मा तवातुर से जारी हर दीनी अमल सुन्नत है. (हर केस में ऐसा नहीं है.) परदा (चेहरा ढकना), नबी के वक्त में हर कोई नहीं कर रहा था, तारीख से बिल्कुल साबित है। जाहिर है सुन्नत नहीं है ये फिर। भले ही प्रैक्टिकली किया जा रहा है, सुन्नत का टैग देते हुए. कोई चीज नबी से नहीं चलती आ रही तो इसका पता हमें तारीख (हदीस, फिकह, ताफासीर और दीगर किताबों) से लग सकता है या समकालीन लोगो से. ये सिर्फ ज़रायें हैं ये बताने के लिए सुन्नत नबी की ज़ात से निकली है. हर सुन्नत का तारीख़ में दीनी अमल होना ज़िक्र होना ही चाहिए, ऐसा, ज़रूरी नहीं है। बल्की उसका जिक्र ना भी हो तो कोई अमल सुन्नत हो सकता है, बस वो नबी से जारी हुआ हो। अगर किसी सुन्नत के खिलाफ कुछ तारीख में मिल रहा (वो नबी तक नहीं पहुंच रहा) तो वो असल में नबी से निकला ही नहीं है। क्योंकि सोर्स नबी है, उन्हें निकलने का सबुत इज्मा तवातुर है। जबकि हदीस या तारीख़ कोई दीनी अमल जारी नहीं कर रही है. नबी कर रहे हैं. नबी स्रोत हैं. हदीस, तारीख़ एक औज़ार है। कोई खिलाफ में सबूत पाने के लिए. हदीस में दीन का इल्म मौजुद है जैसे चली आ रही सुन्नत में है, मगर हदीस स्रोत नहीं है. दीनी अमल तो ये सुन्नत से मिले हैं। हदीस नबी की कही बातें हैं, जो उनको दीन और दुनिया के बारे में बताई है यानी लोगों ने उनसे जो कुछ भी सुना, दीन, दुनिया के बारे में. सुन्नत और हदीस की नेचर और फीचर में फर्क हैं.
कुरान और सुन्नत लाखों लोगों के माध्यम से जारी हुए हैं, जबकि हदीसें केवल कुछ ही लोगों के माध्यम से। सुन्नत एक खुला अभ्यास था जिसे अगर कोई गलत करता था तो उसे फ़ौरन टोका जाता था। लेकिन हदीस कोई खुला कार्य नहीं था, एक रावी उसे बदल करके आगे बढ़ा सकता था। हदीस स्वयं किसी एक भी इंडिपेडेन्ट धार्मिक कार्य की शुरुआत नहीं करता। वे केवल उन धार्मिक कार्यों की बात करते हैं जिनकी शुरुआत पैगंबर ने व्यावहारिक रूप से की थी।
बच्चे के कान में अज़ान देने को सुन्नत बनाया ही हदीसों ने है. वो हदीस नहीं होती तो ये सुन्नत की तरह रायज भी नहीं होता यानि ये बाद में जब शुरू हुआ उसके बाद, इजमा तवातुर से बढ़ा ही नहीं होता. अकीका और वालिमा तो सभी रिवायतों को इकठ्ठा देखने से ही पता लग जाता है कि सुन्नत नहीं है, माशरी चलन था. ये भी आम हदीसों की बुनियाद पर रायज हुआ. अगर सभी हदीसे इस पर हक़ बता रही होती तो ये भी जब शुरू हुआ, उसके बाद दीन के अमल की शक्ल में आगे बढ़ा ही नहीं होता. यानी ये गड़बड़ियाँ नबी से शुरू हुए इज्मा तवातुर से नहीं बल्कि हदीसों के बाद शुरू हुए अमल (इख्तेलाफ के साथ) से पैदा हुई हैं. हदीसें नहीं होती तो ये सुन्नत के नाम पर चल रही गड़बड़ियाँ भी नहीं होती. ये हदीसे चंद लोगों ने बयान करी इसलिए गड़बड़ियाँ हुई. सुन्नत लाखों लोगों ने आगे बढाई, इसलिए वंहा असल सुन्नत ज्यों की त्यों आज भी जारी है बिना गडबडी के.
मान लीजिये डॉन ब्रेडमेन दुनिया को क्रिकेट सीखाने के लिए सचिन तेन्दुलर को चुनते हैं और उसे क्रिकेट सीखाते हैं. ब्रेडमेन के थ्योरोटिकल निर्देश सचिन याद कर लेते हैं. ब्रेडमेन कहते हैं कि फला बाल पर फला शॉट खेलना. सचिन प्रक्टिअल खेल कर दिखाते हैं. जो कमी होती है ब्रेडमेन पूरी करवा देते हैं. अब सचिन आ कर लोगों को क्रिकेट सीखाते हैं कि ये थ्योरी है, याद कर लो. फिर कहते हैं प्रैक्टिकल में वैसे ही करना जैसे मुझे खेलते हुए देख रहे हो. थियोरी किताब में लिख भी ली जाती है. तो खेल का पहला स्रोत हुए ब्रेडमेन. लोगों के लिए थ्योरी का सौर्स हुई सचिन के निर्देश जो किताब में लिख लिए गए. प्रक्टिकल का सोर्स हुए सचिन के तरीके यानि जैसा उन्होंने खेला या सिखाया. इसी बीच सचिन ने जैसे खेला, देखने वालों ने बयान करना शुरू किया कि मैंने उन्हें फला शॉट ऐसे खेलते हुए देखा. जब किसी ने कोई सवाल किया सचिन ने उस पर जवाब दिया, लोगों ने वो बयान करना शुरू किया. किसी ने कोई चीज़ समझना चाही तो सचिन ने उसकी तफसील, वजाहत दी, लोगों ने इसे भी बयान करना शुरू कर दिया. ये सभी अक्सर अपने लाफ्जों में किया गया और इसमें बड़े लेवल पर गड़बड़ियां हुई.
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हदीसों पर तवातुर, इज्मा और उनका जायज़ा
किसी हदीस को 20-40-60 रावी से रिवायत होने पर होने पर उस हदीस को तवातुर माना गया है, अलग अलग मत अनुसार। हदीस तो इतने कम लोग (लगभग 2-10) बढ़ाते हैं कि उनके किरादर, मुलाकात, हाफ्ज़े की तहकीक होगी ही। जईफ हदीस का मतलब है कि इन 3 शरतों में से किसी 1 का ना पाया जाना। इस तहकीक के बाद रिवायत को सही उल इसनाद कहते हैं, पर वो अभी भी काबिले कुबुल नहीं हुई। अब इसका मतन देखेंगे, कि उसमें कोई इल्लत तो नहीं है यानी कोई दूसरी ज़्यादा सिकह रिवायत के खिलाफ तो नहीं है, सुन्नत और कुरान (सबसे बड़े सिकह) के खिलाफ या से इल्म - अक्ल के मुसल्लमात से तो नहीं टकरा रही है। इसके बाद ही उसे एक आलिम के लिए कुबिलियत का दर्जा मिलता है, मगर इसके बाद भी वो किसी दूसरे आलिम पर हुज्जत के दर्जे पर नहीं पहुंच जाती है। इसलिए इमाम बुखारी की बाज़ हदीसें इमाम मुस्लिम ने नहीं कुबुली हैं। जो इन्सान किसी हदीस पर हुई तहकीक पर मुतमइन है, उसके लिए वो हदीस हुज्जत होगी। उलेमा के तहकीक के तरिके, अस्मा रिजाल के तरिके अलग हो सकते हैं। एक आलिम के मुताबिक कोई रावी सही है, दूसरे आलिम के मुताबिक वो झूठा, भूलक्कड़, नॉन कंटेम्परेरी हो सकता है क्योंकि दूसरे के सामने ये बात आ गई है। इमाम बुखारी ने अपने मुक़द्दमे में लिखा है कि दो रावी का ज़माना एक होना काफ़ी नहीं है, उनके मिलने का सबुत भी मिलना चाहिए। इमाम बुखारी, मुस्लिम ने अपनी किताबो को अल जामी अल सहीह, इसलिए कहा क्योंकि उनके मुताबिक वो सनदन सही थी. इसलिए हदीसो पर तवातुर का लकब लगाना सही नहीं है जैसा कुरान और सुन्नत पर लगता है। तवातुर, अख़बारे अहद दीन की नहीं, इल्म की इस्तेलाह है। तवातुर यानी इतने लोग द्वार बढ़ाना कि उनका एक चीज पर गलत होना मुमकिन हो ना। क़ुरान और सुन्नत यानी पूरा दीन, इज्मा और तवातुर से मुंतक़िल हुए हैं। इस तवातुर में रावियों की तहकीक की ज़रुरत ही नहीं होती है. ये लोग लाखों और करोड़ों हुए हुए हैं और आज अरब है। इसे हर जगह देखा जा सकता है और लिखा भी मिल जाता है। हमारा सभी सहाबा पर ऐतमाद है। मगर उनके बाद हुए ताबेईन की तहकीक होगी। इनके बारे में पहली सदी में अस्मा रिजाल शुरू हुआ और आज अगर कोई सनद पर बहस होती है तो अस्मा रिजाल के रिकॉर्ड पर ही होती है। रावियो के किरदार पर भी इख्तलाफ मिलते हैं तो हदीस की सेहत पर भी इख्तलाफ मिलते हैं। रावियों ने अपनी ज़िम्मेदारी पर हदीसों को बढ़ाया है. हमें हदीसों के साथ साथ उन पर मुहद्दिसों की करी गयी तनकीद, बहसों को भी देखना चाहिए हदीसों से सही नतीजे बरामद करने के लिए. आमतौर पर हदीसे ताबीईन के बाद पहली सदी हिजरी में लिखना शुरू हो गयी थी. इमाम मालिक मदीना में रहते थे. इमाम बुखारी और इमाम मुस्लिम के वक़्त तक हदीसों के फन में बहुत बेहतरी आ चुकी थी. हदीस की 3 अहम किताबे मुवत्ता, बुखारी, मुस्लिम हैं। ये सबसे पहले दर्जे करी गयी किताबे हैं। इन 3 के बाद फिर दूसरे, तीसरे, चौथे दर्जे की हदीस की किताबे हैं। ये दरजात, मुहद्दिसो के उसूलों की सख्ती की बुनियाद पर बने हैं। इनमें मायर कम होते चले जाते हैं, मगर इन पर दुसरे इमामों के ऐतराज़ बाकी रह सकते हैं.
बाज़ हदीसों को तवातुर का लकब देना सही नहीं है. हदीसों को कुरान-सुन्नत जैसे तवातुर के बराबर नहीं माना जा सकता और ना ही हदीसों को तवातुर का लकब देना चाहिए. ये लकब कुरान के लिए है. फला हदीसों पर इज्मा है, ऐसा भी नहीं कहना चाहिए, बल्कि ये कहना चाहिए कि इन्हें शोहरत हासिल है. क्योंकि हदीसों पर इख्तिलाफ तो हमेशा से मौजूद रहे हैं.
शैख़ अल्बानी और शैख़ अर्नौत दौरे हाल में बुखारी, मुस्लिम किताबों पर तनक़ीद करते रहे हैं. इमाम अल हाकिम ने अपनी हदीस की किताब में वो हदीसे ली जो इमाम बुखारी और इमाम मुस्लिम की शर्तो पर खरी उतरने के बाद उन दोनों ने सहीयेन (बुखारी, मुस्लिम किताबें) में नहीं ली थी (क्यों, इस पर कभी और बात करेंगे). इसलिए इनकी किताब का नाम है, अल मुस्तदरक अला अल सहियेन.
दीन के हकाईक नबी ने बेहद खास, यकीनी, मुकरर और फिक्रमंद तरीके से जारी करे जैसे कुरान को लिख कर, पढ़ कर, किरात करवा कर, याद करके, सुन कर, नस्लों के ज़रिये आगे बढाया. इसी तरह सुन्नत को करके, दिखाके, नकल करवाके, उस पर अमल करवा के नस्लों के ज़रिये आगे बढाया. नमाज़, रोज़े, हज, उमरा, क़ुरबानीयां वगैरह करवाई.
नबी ने कभी किसी को पाबंद नहीं किया उनकी बातें आगे बढाने को जैसे सुन्नत और कुरान को करा. मना भी और फिर इजाज़त भी दी. सौ साल तक ऐसे ही सच्ची, झूटी, मिलावटी आगे बढती गयी. पहली सदी के बाद ही इनको मुहद्दिसों ने चैलेंज कर दिया क्योंकि गड़बड़ियाँ दिखाई दी. यानि सिर्फ मुस्लिम होने के नाते बयान करी जा रही बातों को सच्चा नहीं माना गया और इस ज़खीरे को ज़ाया भी नहीं होने दिया और इसे परखा गया.
किसी हदीस के मुद्दे के जायजे के लिए पहला और सबसे बेहतर तरीका है कि सारे तुर्क में से पहले सिर्फ काबिले कुबूल रिवायतें ले, यानी सहीह या ज़्यादा से ज़्यादा हसन रिवायतें लेंगे, इससे नीचे की नहीं लेंगे. कुरान और सुन्नत के सामने रखंगे. दूसरा तरीका यह है कि जो कुछ मवाद (मिलावट, मनघडंत चीज़ों के बाद) एक मुद्दे पर हदीसों में मौजूद है, उसकी बुनियादी या कॉमन बात जो सब हदीसों में मौजूद है, उसे कुबूल कर लिए जाए. मगर कोई कहे की बुनियादी या कॉमन बात के साथ बाकी तफ्सीलात या तसव्वुरात भी माने में कोई हर्ज़ नहीं है तो इसका मतलब है कि उसने आइम्मा के काम और इस फन पर पूरी तरह से पानी फेर दिया है. क्योंकि पूरी बात माननी ही थी, जो आईम्मा के दौर में बात चली आ रही थी, उसे वो ऐसे ही मान लेते, उन्होंने तहकीक करी ही क्यों? असल में यही तरीका चलन में आ गया है.
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बाज़ वक़्त नई अप्रोच को समझने के लिए पुरानी अप्रोच में खामियाँ होने की वजह से उसकी आलोचना करना ज़रूरी हो जाता है। आलोचना ज्ञान को उत्कृष्ट करती है। आलोचना करने वाला अदब के साथ पॉजिटिव तन्कीद करे और जिसकी हो रही है वो हम पर न्यूट्रल गौर फ़िक्र के बाद,जंहा जरूरी है, वंहा बदलाव करे. इसका सबसे बड़ा सबूत है कि कुरान ने पिछली किताबों में जारी गड़बड़ियां और जारी रवायतों को रद्द किया है। दीगर दीनी उलेमा ने भी अपने मौकिफ में बदलाव किये हैं.
https://islamqa.org/shafii/shafiifiqh/30061/imam-shafiis-qawl-jadid-and-qadim/?utm_source=chatgpt.com
https://en.tohed.com/threads/twelve-cases-of-conflicting-rulings-by-imam-abu-hanifa-on-the-same-issue.7446/
Imam Abu Yousaf and Imam Abu Muhammad (Al-Shaybani) has differed with their teacher, Imam Abu Hanifah on many juristic issues.
Our religion is divine but our history is human - Dr. Yasir Qadhi
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