Friday, 28 June 2024

मानव प्रजाति की उत्पत्ति (भाग 3-आदम, हव्वा, इब्लीस)



जन्नत में आदम और हव्वा ने कौन सा फल खाया था, कुरान ने नहीं बताया है। क़ुरान ने यह भी नहीं बताया है कि यह कौन सा दरख़्त था। बस इसे शजर (हमेशगी का शजर) कहा है। आमतौर पर इस्लामिक साहित्य में इसे एक प्राकृतिक दरख़्त या शजर ही माना जाता है। बाइबल और तलमुड ने इसे Fig का पेड़ माना है क्योंकि इसके पत्तों से दोनों ने अपना शरीर ढका था। ईसाइयत में इस पेड़ को Tree of knowledge of good and evil भी कहा गया है क्योंकि इसके बाद ही आदम-हव्वा को खूद के निवस्त्र होने का एहसास हुआ और फिर उन्होंने खूद को ढाँपा। यह एक मेटाफोरिकल अर्थ है।

लगुवी मायनों में शजर उसे कहते हैं, जब हर चीज़ एक साथ इकट्ठा हो फिर अलग अलग हो कर फैल जाए (ताजुल ऊरुस अरेबिक लेक्सिगन)। कुरान में इसीलिए आपसी लड़ाई के संदर्भ में भी शजर लफ़्ज़ आया है। पेड़ को भी इसलिए शजर कहते हैं।  

मगर असल में हमेशगी का शजर लफ़्ज़ के सिम्बालिक और मेटाफोरिक मायने हैं। कुरान में इस दरख़्त का असली नाम नहीं दिया गया है बल्कि कुरान (7:120) में इसे हमेशगी का शजर कहा गया है। इसलिए यह असल दरख़्त नहीं है। शजर या ट्री को हमेशा से ही नस्ल, खानदान, वंशावली से जोड़के देखा जाता रहा है यानि आगे बढ़ती जा रही ज़िंदगी से। आज भी Family Tree या खानदानी शजरा जैसी टर्म इस्तेमाल होती है।

आसमानी कताबों में जिंसी बातें खुले लफ़्ज़ों में बयान नहीं की जाती। आज जो पिछली आसमानी किताबों में बेहयाई मिलती है, वो सब इंसानी दखलंदाज़ी है। इसलिए आखिरी किताब क़ुरान में भी इसका लिहाज़ रखा गया और कुरान ने कई जगह इशारों में ऐसी गुप्त बातें करी गई हैं। 

असलन यह पेड़ sexual relations or organs की तरफ इशारा है, क्योंकि इसके बाद ही उनके सामने उनके private parts खुल गए जिन्हें फिर वो पत्तों से ढकने लगे। यंहा शजर से मुराद, उस शजर से है जिससे इंसानी नस्ल आगे बढ़ती है यानी जिंसी ताल्लुक से। शजरे से मतलब नस्ल चलाने से है। जैसे कुरान में औरतों को खेती कहा गया है, साथ ही खेती में जैसे चाहो जाने को भी कहा गया है। असल में खेती में जाना और नस्ल बढ़ने का आपस में ताल्लुक है। 

आदम और हव्वा को ऐसे जिंसी ताल्लुक से मना किया गया था। किसी जोड़े के आपसी जिंसी ताल्लुक अपने आप में नाजायज चीज़ नहीं है मगर क्योंकि खुदा ने इसे मना कर रखा था, इसलिए आदम- हव्वा को इससे हर हाल में दूर ही रहना चाहिए था। जैसे अराज़ी तौर पर अल्लाह की तरफ से रोज़े या हज में जिंसी ताल्लुक बनाने की पाबंदी होती है।

यह Tree of eternity आदम को eternity की तरफ ले जाता अगर वो खुदा के कहे अनुसार इसकी तरफ नहीं जाते। यानि वो खूद को इस impermissible sexual relations  से दूर रखते तो हमेशा की ज़िंदगी पाते। 

ख़ैर, उन्होंने गलती करी और फिर माफी मांग ली। इसके बाद भी उन्हें और उनकी नस्लों के लिए हमेशा की ज़िंदगी रखी गई है मगर दुनिया के इम्तिहान के बाद जंहा फिर से उन्हें खूद को नाजायज़ जिंसी ताल्लुकों से दूर रखना है। यानि हमेशगी के शजर का नाम बिल्कुल सही है क्योंकि दोनों ही शक्लों में इंसान को आखिर में अमरता मिलनी है।

क़ुरान कहता है कि दोनों ने पेड़ से खाया या चखा। यंहा आमतौर पर इससे मुराद पेड़ के फल खाने से ली जाती है। मगर पेड़ों का कोई जायका नहीं होता और पेड़ों को कोई नहीं खाता या चखता। इसलिए इसके असल मायने sexual relations में indulge होने या उससे लुत्फ लेने के हैं। जैसे एक हदीस से मालूम पड़ता है कि तलाक का मसले लेके आये एक जोड़े को नबी ने हुक्म दिया था कि तुम एक दूसरे की मिठास चखो यानि genuinely sexual relations बनाओ। इस शजर को चखने के बाद ही आदम-हव्वा के सत्र खुल गए और जब शर्मिंदगी हुई तो दोनों ने अपने शरीर ढके। यानी जब वो इससे फारिग हुए तो उन्हें अपनी खुली हुई शर्मगाहों का एहसास हुआ।

इस पेड़ की ओर जाने के बाद इंसान का दुनिया में इम्तिहान शुरू हुआ, जो आखिर में उसे हमेशा की ज़िंदगी देगा। इस पेड़ की ओर जाने की मनाही इसलिए थी क्योंकि यह इंसान को जिंसी ताल्लुक की ओर ध्यान दिलवाने के लिए था कि यही दुनिया में सबसे बड़ा इम्तिहान होगा। उन्हें इसकी तालीम, ट्रैनिंग दी गई कि तुम्हारे साथ दुनिया में क्या होने वाला है। इसे इम्तिहान बताया गया है। यह इम्तिहान अनानीयत का (egotism, self-conceit), जिंस (gender) का होगा। इसलिए अंत में क़ुरान ने कहा कि असली लिबास तो तकवा है।

शैतान ने इंसान को बहकाया और दुनिया के इम्तिहान में डलवा दिया। यानि उसने इंसान की जिंसी कमजोरी का सहारा लिया। शैतान ने कोई अपनी ज़ात में गलत चीज की तरफ आदम की तवज्जो नहीं करवाई थी, बल्कि उसी अमरता के लिए उकसाया, जिसकी इंसान को सबसे ज्यादा चाह है या जो उसे बाद में मिलनी है। शैतान के कहने पर आदम हव्वा को वह चीज वाज़ेह हो गई जिससे उनकी आगे नस्ल चलनी है। आज भी इसी जिंसी ताल्लुकात की वजह से इंसानी नस्ल बाकी रह पाती है यानि कयामत तक वो अमर है और जारी रहेगी।

इंसानी नस्ल के लिए यह sexual relation बनने ही थे। यह बात भी पहले से ही डिक्लेर थी कि इंसान को दुनिया के इम्तिहान में जाना है। यह काम शैतान नहीं तो कोई और करता या किसी और तरीक़े से हो जाता। शैतान ने अल्लाह की स्कीम में दखलंदाजी ज़रूर करी मगर यही अल्लाह की पूरी स्कीम थी और अल्लाह ने इसे होने दिया क्योंकि यंहा इख्तियार का मामला था। यानी अगर शैतान नहीं बहकाता तो किसी दुसरे तरीके से इंसानियत शुरू हो जाती। खुदा किसी दूसरे रास्ते से आदम को दुनिया में भेज देता। इससे नस्ले आदम को यह सबक मिला कि ख़ता की सच्ची माफी मांगने के बाद अल्लाह वाकई दरगुजर कर सकता है।  

अल्लाह ने आदम से वाकई बहुत कुछ फरमाया मगर आदम ने वापिस अल्लाह से कलाम किया, ये कुरान से वाज़ेह नहीं होता है। किसी भी पैगंबर, इंसान ने अल्लाह को नहीं देखा है। हव्वा का नाम कुरान में नहीं है। मगर उनका वजूद का जिक्र है। इस्लाम अनुसार आदम को पैगंबर बनाया गया था (हालांकि ईसाइयत में उन्हें पैग़म्बर नहीं माना जाता है)। इसके अलावा कुरान ने यह कंहीं नहीं कहा कि आदम और हव्वा को उनके गुनाह की सजा दुनिया में भेज कर दी गई है जबकि ईसाइयत ऐसा मानती है। कुरान के अनुसार आदम, हव्वा दोनों को शैतान ने बरगलाया था जबकि बाइबल के अनुसार आदम को खता करने के लिए हव्वा ने बहकाया था और जिसके बदले दुनिया में औरतों को लेबर पैन सहन होगा। यानी ईसाइयत में औरत गुनाह का स्रोत और कारण बना दिया गया है। ऐसे ही कहानी एक यूनानी कथाओं में पंडोरा बॉक्स की है.

वैसे यह बात सही है कि एक इंसान कोई गलती करता है तो सजा उसकी नसलें भी भुगतती है। आप अपने आस-पास इस हकीकत तो देख सकते हैं। जैसे हुक्मरानों के फ़ैसलें पूरा मुल्क झेलता है। मगर इसका मतलब यह नहीं है कि आदम के किये गए गुनाह के परिणाम सारी इंसानियत झेल रही है।


[Repeated from previous Blog]

 Quran (20:115-123):

And indeed, We once made a covenant with Adam, but he forgot, and so We did not find determination in him. And remember when We said to the angels, Prostrate before Adam, so they all did but not Iblis, who refused arrogantly. So We cautioned, O Adam! This is surely an enemy to you and to your wife. So do not let him drive you both out of Paradise (l-janati), for you O Adam would then suffer hardship. Here it is guaranteed that you will never go hungry or unclothed, nor will you ever suffer from thirst or the sun’s heat. But Satan whispered to him, saying, O Adam! Shall I show you the Tree of Immortality (shajarati-l-khul'di) and a kingdom that does not fade away? So they both ate from the tree and then their nakedness was exposed to them, prompting them to cover themselves with leaves from Paradise (l-janati). So Adam disobeyed his Lord, and so lost his way. Then his Lord chose him for His grace, accepted his repentance, and guided him rightly. Allah said, Descend (ih'biṭā), both of you, from here together with Satan as enemies to each other. Then when guidance comes to you from Me, whoever follows My guidance will neither go astray in this life nor suffer in the next. 

... इसपर हमने कहा, ऐ आदम! निश्चय ही यह तुम्हारा और तुम्हारी पत्नी का शत्रु है। ऐसा न हो कि यह तुम दोनों को जन्नत से निकलवा दे और तुम तकलीफ़ में पड़ जाओ। तुम्हारे लिए तो ऐसा है कि न तुम यहाँ भूखे रहोगे और न नंगे। और यह कि न यहाँ प्यासे रहोगे और न धूप की तकलीफ़ उठाओगे। फिर शैतान ने उसे उकसाया। कहने लगा, ऐ आदम! क्या मैं तुझे शाश्वत जीवन के वृक्ष का पता दूँ और ऐसे राज्य का जो कभी जीर्ण न हो? अन्ततः उन दोनों ने उसमें से खा लिया, जिसके परिणामस्वरूप उनकी छिपाने की चीज़ें उनके आगे खुल गईं और वे दोनों अपने ऊपर जन्नत के पत्ते जोड़-जोड़कर रखने लगे। ....कहा, तुम दोनों के दोनों यहाँ से उतरो! तुम्हारे कुछ लोग कुछ के शत्रु होंगे।... 
 
इस आयात के बारे में अमूमन यही माना जाता है कि यह वाकया असल जन्नत में हुआ जंहा
आदम और हव्वा की परीक्षा ली गई और फिर उन्हें इस दुनिया में उतारा गया। एक हद तक यह मत भी ठीक है। मगर शैतान को तो अल्लाह ने पहले ही बाहर कर रखा था तो फिर वो जन्नत में कैसे बहका रहा था? यह भी कहा जाता है कि जन्नत में शैतान घुस गया था या उसने सांप का रूप धारण कर लिया था। असल में यह सब गलत है क्योंकि शैतान वंहा नहीं घुस सकता जंहा से अल्लाह ने उसे निकाल दिया हो (इस्लाम में देवमालाएं नहीं हैं)। इसलिए या तो शैतान ने आदम हव्वा के दिमागों में वसवसों के जरिए हमले किया होगा और या फिर वो जन्नत दुनिया का ही कोई बाग होगा।

क्योंकि कुरान में कई आयतें हैं, जैसे इंसान का मिट्टी से बनाना, ज़मीन से उगना और ज़मीन से वापिस उठना, जो ये बताती हैं कि इंसान जन्नत में नहीं बना बल्कि इसी जमीन पर बना है। बाइबिल ने भी बताया कि आदम की रचना ज़मीन की मिट्टी (dust of ground) से हुई थी (Genesis 2:7)
 
आदम-हव्वा भी इसी ज़मीन की किसी जन्नत (मायने बाग़) में ट्रेन हुए थे. क़ुरान में आख़िरत वाली जन्नत के लिए क़ुरान कई लफ्ज़ इस्तेमाल करता है जैसे जन्नत, फिरदौस, दारल आख़िरह और जन्नत अदन आदि इत्यादि (दारल, जन्नत आदि शब्द जोड़कर अन्य शब्द भी हैं)। यानि आयत के कांटेक्स्ट में समझा जाएगा कि जिस बाग की बात हो रही है, वह दुनिया का है या स्वर्ग का। कुरान में कई जगह जन्नत लफ़्ज़ का इस्तेमाल बाग के लिए हुआ है (जैसे कुरान 71:12, 2:265, 18:32)। जिस जगह आदम हव्वा थे, ऐसी जगह इसी दुनिया में ही हो सकती है जंहा ये सब चीजें मयस्सर हैं जैसे खान-पान, पेड़-पत्ते, फल, कपड़े, सूरज की तपिश (इन चीजों का ज़िक्र क़ुरान में आदम-हव्वा के किस्से में आया है जो वंहा उपलब्ध थीं।) [वंहा प्यास से नहीं तड़पोगे क्योंकि पीने को उपलब्ध होगा। वंहा तपिश से नहीं तड़पोगे क्योंकि कपड़े, छाया, पीने को होगा]। कुरान में कई मुकाम पर इस जगह को जन्नत की बजाय 'जिसमें वो थे' लफ़ज से भी ताबीर किया गया है मगर उन आयात में पहले ही जन्नत लफ्ज़ आ चूका है. शैतान ने आदम को हमेशगी का लालच दिया था, इसका मतलब है कि आदम मौत से वाकिफ थे और इससे बचने के ख्वाहिशमंद भी। आखिर अपने इर्द गिर्द इस दुनयावी जन्नत में वो दर्दनाक मौत होती हुई भी देख रहे होंगे। इसलिए साफ है कि दुनिया के इस बाग में तब फरिशतें, जिन्न (इब्लीस), आदम-हव्वा आदि एक साथ मौजूद थे। बाइबल के अनुसार भी आदम हव्वा का यह स्थान (Garden of/in Eden) इसी धरती पर खास स्थान था। उन्हें ज़मीन पर ईडन स्थान में रखा गया था जो ईस्ट में था (उन्हें ईडन में ईस्ट में रखा गया था, ये भी मायने किये जाते हैं) और यंहा Tigris, Euphrates आदि चार नदियां थी और इसके बनने से पहले धरती उजाड़ थी (Genesis 2-3, etc). इसी तरह मेसोपोटामिया (शाब्दिक अर्थ है नदियों के बीच की भूमि, यानी उन्हीं मेसापोटामियन नदियों टिगरिस और फरात  के बीच, जैसा बाइबिल में भी है। आज का इराक और ईरान, सीरिया, तुर्की के कुछ हिस्से) की पौराणिक कथा गिलगमेश महाकाव्य (लेखन 2100 BC और पृष्ठभूमि 2700 BC) में, ईडन जैसे एक (अनाम) दिव्य और पवित्र गार्डन का उल्लेख है जंहा देवता निवास करते हैं और जो उन्हीं के क्षेत्र, भूमि पर स्थित माना गया है। Eden (हिब्रू) शब्द अक्कादियन शब्द Edinu से आया है जो स्वयं सुमेरियन शब्द Edin से आया है, जिसका अर्थ है steppe, plain, uncultivated or open land, wilderness outside the city. कुछ लोग कहते हैं कि सुमेरियन शब्द Edin में E का अर्थ home और Din का अर्थ life है। गार्डन शब्द पैराडाइज़ का पर्याय था, जो ग्रीक शब्द Paradeisos (garden or park) से लिया गया है, जो उससे भी पुराने फ़ारसी शब्द Pairidaeza (walled garden or enclosure) से आया है। क़ुरान (14:48) के मुताबिक जन्नत तो अभी बनना बाकी है, जो आखिरी दिन तब बनके अल्लाह के सामने आ जायगी जब ज़मीन- ज़मीन नहीं रहेगी और जब सूरज बुझ जायेगा, तारे टूट जायँगे, पहाड़ उड़ जायँगे, आसमान फट जाएगा (क़ुरान 81:1-3, 84:1)। जन्नत, जहन्नुम आखिर में वजूद में आएंगे जो इसी कायनात के मलबे से ही बनने हैं, यानी जब सब उलट पलट दिया जाएगा।
 
The word ‘leaves of Jannat’ has been translated as ‘leaves of the garden’ by many famous English translators of Quran like Yusuf Ali, Pickthall, Arberry, Muhammad Sarwar, Shakir in the Quran (20:115-123) & (7:10-28). 

 
रही बात कुरान में आये, जन्नत से आदम-हव्वा के उतरने के बदले इस्तेमाल हुए लफ्ज़ की तो यह लफ़्ज़ सिर्फ उतरने के लिये नहीं बल्कि निकलने या जाने के कांटेक्स्ट में भी आता है। कुरान (2:61) में इसी लफ्ज़ के इस्तेमाल के ज़रिए, बनी इसराइल को एक बस्ती में (मिस्र) में उतरने (जाने) के लिए कहा गया है। ज़ाहिर है बनी इस्राइल कंही बुलंदी से नहीं उतरे बल्कि वंहा आए या गए। ये जुबान को समझने के उसूल हैं। इसलिए आदम-हव्वा को भी बाग से उतरने के लिए कहने का मायने है, वंहा से निकल जाने के हैं। हालाँकि इसके लिटरल मायने लेने ही है तो ये मानना ही पड़ेगा कि आदम हव्वा इस दुनिया के किसी ऐसे बाग़ में ठहरे हुए थे जो कंहीं उंचाई पर था क्योंकि खुबसूरत जगह धरती पर पहाड़-हिल स्टेशन वगैरह पर होती हैं। तो ऐसे में उन्हें वंहा से उतरने को ही कहा जायगा, ताकि वो नीचे जंगल-बियाबानों में मुश्किलात में ज़िंदगी बसर करें। वैसे भी आसमानी जन्नत से पृथ्वी पर उतरना किसी इंसान के बस की बात नहीं है तो फिर अल्लाह ने आदम हव्वा से क्यों कहा कि उतरो, अल्लाह को तो उन्हें खुद उतारना चाहिए था क्योंकि इंसान एक दुनिया से दूसरी दुनिया या लाइट इयर्स की आसमानी दूरियां खुद जिस्मानी तौर पर तय करने में सक्षम नहीं है। इसलिए ये उतरना दुनिया में किसी ऊँचें मुकाम से किसी निचले मुकाम तक हो सकता है जो बेशक इंसान की कुव्वत में है। इस तरह इस लफ्ज़ के सभी मायने (जैसे उतरना, निकलना, चले जाना) दुनिया के बाग वाले मैकिफ़ को पूरी तरह जस्टिफाई करते हैं।
 
आदम के सामने फरिश्तों को सजदा करवा कर, आदम को यह दिखाया गया कि सबसे बरतर मखलूक फरिश्तों के सजदा करने के बावजूद, फरिश्तों से एक कमतर मखलूक जिन्न ने सजदा करने से मना कर दिया। वजह थी घमंड। वैसे वंहा मौजूद सभी जिन्नों ने सरकशी नहीं करी, सिर्फ एक ने करी, बाकी तो आदम के सामने झुक गए थे। वंहा अकसरियत में फरिशतें मौजूद थे मगर कुछ जिन्न भी थे जिन्हें आला मुकाम हासिल हो चुका था। क्योंकि जुबान के उसूल के मुताबिक बाज वक़्त अकसरियत का ही नाम लेके सभी वर्गों को मुखातिब किया जाता है (जैसे किसी पार्टी में कपल्स की मेजोरिटी है मगर कुछ बैचलर भी है, तो क्राउड को कोई भी वक्ता कपल्स कह कर ही मुखातिब होगा)। इसलिए कुरान ने वंहा सिर्फ फरिश्तों के नाम का जिक्र किया है, जिन्न का नहीं। मगर कुरान की दूसरी आयतों से इब्लीस के जिन्न होने की वजाहत हो जाती है।

[Repeated from previous Blog]

Quran (2:28 -38)

How can you deny Allah? You were lifeless (amwātan) and He gave you life, then He will cause you to die and again bring you to life, and then to Him you will all be returned. He is the One Who created for you what all is in the earth . Then He turned towards the heaven, formed/fashioned (fasawwāhunna) it into seven heavens. And He has perfect knowledge of all things. Remember when your Lord said to the angels, I am going to place a successive (khalīfatan) in the earth. They asked Allah, Will You place in it someone who will spread corruption (yuf'sidu) there and shed blood (l-dimāa) while we glorify Your praises and proclaim Your holiness? Allah responded, I know what you do not know. He taught Adam the names (l-asmāa) of all of them, then He presented them to the angels and said, Tell Me the names of these (hāulāi), if what you say is true? They replied, Glory be to You! We have no knowledge except what You have taught us. You are truly the All-Knowing, All-Wise. Allah said, O Adam! Inform them of their names (bi-asmāi). Then when Adam informed their names (bi-asmāihim), Allah said, Did I not tell you that I know the secrets of the heavens and the earth, and I know what you reveal and what you conceal?  And remember when We said to the angels, Prostrate before Adam, so they all did but not Iblis, who refused and acted arrogantly, becoming unfaithful. We cautioned, O Adam! Live with your wife in Paradise (l-janata and eat as freely as you please, but do not approach this tree (l-shajarata), or else you will be wrongdoers. But Satan made them slip (fa-azallahumā) from it (anhā) and he got them out (fa-akhrajahumā) from what they were in (mimmā- kānā- fīhi). We said, Go down (all of you) (ih'biṭū), some of you (baʿḍukum) to others (libaʿḍin) (as) enemy (aduwwun), and for you in the earth a dwelling place and a provision for a period. Then Adam was inspired with words of prayer by his Lord, so He accepted his repentance. Surely He is the Accepter of Repentance, Most Merciful. We said, God down (ih'biṭū) from it all (of you when) (jamīʿan) and when comes to you my guidance, the forever follow my guidance, there will be no fear for them, nor will they grieve. 

जबकि तुम निर्जीव थे तो उसने तुम्हें जीवित किया.. वही तो है जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन की सारी चीज़ें पैदा कीं.. और याद करो जब तुम्हारे रब ने फ़रिश्तों से कहा कि मैं धरती में (मनुष्य को) ख़लीफ़ा (सत्ताधारी) बनानेवाला हूँ। उन्होंने कहा, क्या उसमें उसको रखोगे जो उसमें बिगाड़ पैदा करे और रक्तपात करे जबकि हम तेरा गुणगान करते हैं.. उसने कहा, मैं जानता हूँ जो तुम नहीं जानते। अल्लाह ने आदम को सारे नाम सिखाए, फिर उन्हें फ़रिश्तों के सामने पेश किया और कहा, अगर तुम सच्चे हो तो मुझे इनके नाम बताओ।  वे बोले, पाक और महिमावान है तू! तूने जो कुछ हमें बताया उसके सिवा हमें कोई ज्ञान नहीं। अल्लाह ने कहा, ऐ आदम! उन्हें उन लोगों के नाम बताओ। फिर उसने उन्हें उनके नाम बता दिए।... और हमने कहा, ऐ आदम! तुम और तुम्हारी पत्नी जन्नत में रहो और वहाँ जी भर बेरोक-टोक जहाँ से तुम दोनों का जी चाहे खाओ, लेकिन इस वृक्ष के पास न जाना, अन्यथा तुम ज़ालिम ठहरोगे। अन्ततः शैतान ने उन्हें वहाँ से फिसला दिया, फिर उन दोनों को वहाँ से निकलवाकर छोड़ा, जहाँ वे थे। हमने कहा कि उतरो, तुम एक-दूसरे के शत्रु होगे और तुम्हें एक समय तक धरती में ठहरना और बिलसना है।... हमने कहा, तुम सब यहाँ से उतरो।

इसी आयत में आगे कहा गया है कि अल्लाह ने आदम को वो सारे नाम सीखा दिए। आदम को क्या, किसके और कितने नाम सीखाए गए थे, इस पर उलेमा में इखतलाफ़े राय है। एक मत यह कहता है कि आदम को दुनिया की सभी चीजों के नाम और सभी शयों की खुसुसियात बता दी गई थी। दूसरा मत यह है कि आदम को सिर्फ वही नाम सिखाये गए जो आदम को फरिश्तों को जवाब के तौर पर बताने थे। यानि इंसान के द्वारा होने वाले फसाद के सवाल पर आदम को अम्बिया, बड़े साहबा या अल्लाह वालों के नाम सिखाये गए और कहलवाए गए जो इस दुनिया में क़यामत तक आने थे। क्योंकि ये लोग जमीन में फसाद की बजाए अमन फैलाएंगे और इस वजह से सभी लोग खून खराबा नहीं करंगे जैसा फरिश्तों को गुमान हुआ था। इस आयात में अल्लाह ने आदम को 'उनके' (जो भी हों) नाम सीखाये और फिर उनको फरिश्तों के सामने 'उनको' (या उनकी झलकें/जीविनियों) पेश करके कहा कि 'इनके' नाम बताओ और अंत में आदम से कहा कि 'इनके' नाम बाताओ और आदम ने 'उनके' नाम बता दिए. हालांकि एक तीसरा मत यह कहता है कि यंहा आदम को नाम सीखाने से मतलब मुकम्मल जुबान सीखाना या देना है जिससे इंसान आपस में कलाम कर पाया। यंहा इससे मतलब इंसान को नाम, भाषा या डेटा प्रोसेस करने की सलाहियत देना भी लिया जाता है जो फरिशतें नहीं कर पाते और इसीलिए फरिश्तों ने खलीफा बनाए जाने की बात पर अपनी खूबी बयान करी थी और बाद में अल्लाह को नाम न बता पाने पर अपनी कमी जाहीर करी थी।

आदम से कहा गया कि फरिश्तों के सामने फला फला नामों को पेश करो यानि जिनका ताररूफ़ तुम्हें पेश किया जा चुका है। संभवतः आदम से पहले अहदे अलस्त के मौके पर जब तमाम रूहों को इकट्ठा किया गया था तो उस इस्तेमा में फरिश्तों को उन अच्छे लोगों का ताररूफ़ करवाया गया था जो बाद में शानदार इंसान या रोल मोडल आइंदा साबित होंगे। यह मौका फरिश्तों को कायल करने का था। इसलिए क़ुरान में इसके आगे सभी नाम जानदारो यानि जिंदा लोगों या हस्तियों के आए हैं? यंहा आए लफ़्ज़ अस्मा कुल्ला में अस्मा मतलब तमाम नाम नहीं है बल्कि यंहा मलतब खास नामों से है। इसमें अलिफ़ लाम मलफब अल आया है, यानि ये कुछ खास नाम थे। कुल का लफज कई सियाक सबाक में आता है। (वैसे क़ुरान में नूह की कश्ती में भरे गए जानवरो को भी तमाम जानवर कहा गया है जबकि वो असल में कुछ खास जरूरी जानवर ही थे)। 

ऐसा लगता है कि यंहा आदम ने कुछ ऐसा किया, जिससे फरिश्तों को एहसास हो गया कि वो जमीन पर खलीफा बनने के उतने हकदार नहीं हैं, जितना कि आदम हैं। अल्लाह ने वो नाम आदम को सिखाएं मगर अल्लाह वो नाम फरिश्तों के सिर्फ सामने भर लेके आयें। फिर जब इन नामों को बताने को कहा तो सिर्फ आदम ही इन नामों को बता पाएं। जाहीर है वही शख्स बता पायगा जिसे इसका इल्म सीखाया गया है। इसलिए यंहा ऐसा लग रहा है जैसे आदम ने कोई इंसानी गुण की मदद से उन नामों इस तरह बयान किया या उनके बारे में कुछ ऐसा इल्म दिया जो फरिश्तों के पास बिल्कुल नहीं था। यानि अगर फरिश्तों को ये नाम सीखा भी दिए जाते तो भी वो आदम की तरह इस इल्म को इस तरह प्रोसेस नहीं नहीं कर पाते।

कुछ का यह भी मानना है कि आदम को शक्सियात के नाम बताये गए थे, चीज़ों के नाम नहीं क्योंकि वंहा जो प्रोनाउन इस्तेमाल किया गया है वो अक़ल वाली मख्लूकात के लिए आता है. फिर आगे वाक्या बताता है कि उन लोगों को पेश किया गया और कहा कि इनके नाम बताओ.

यंहा एक अहम बात गौर करने वाली है कि अल्लाह ने फरिश्तों को कहा कि वो जमीन असमान के रहस्य जानता है और जो कुछ वो 'बताते-छिपाते' हैं, वो भी. क्या ऐसा कुछ था जो फरिश्तें वंहा कह नहीं पाए थे मगर अल्लाह ने नोटिस करके हायलाईट कर दिया था? 


खलीफा का मतलब होता है बाद में या बदले में आने वाला या किसी की जिम्मदारी संभालने वाला।

दुनिया में किसी को खलीफा बनाने पर फ़रिश्ते क्यों फिक्रमंद हुए? फरिश्तों ने ये सुनकर क्यों कहा कि हम तेरी हम्द करते हैं जबकि वो खूंरेजी करेगा। ऐसा क्यों लग रहा है उस खलीफा और फरिश्तों में कोई कंपेरिजन या कॉम्पिटिशन है? शायद उसे खलीफा बनाने पर दुनिया में फरिश्तों के इख्तियारात, निज़ाम पर असर पड़ना था? इसीलिए अल्लाह ने फरिश्तों से कहा वो बेहतर जानता है (यानी खलीफा बनाने के बाद दुनिया में क्या होने वाला है, वो खूंरेजी करंगे या बंदगी)।

फिर अल्लाह ने आदम को 'सारे नाम' सिखाये और फरिश्तों को कहा कि वो ये नाम बताएं। ये नाम तमाम पैगम्बरों, उनके संगियों और अल्लह वालों के नाम थे जो ज़मीन पर आने थे और खूंरेजी की बजाए बडे नेक अमल करने वाले होने थे। इस पर फरिश्तों ने कहा कि उन्हें सिर्फ वही मालूम है जो अल्लाह ने उन्हें बताया है। फिर आदम से कहा और आदम ने वो नाम बता दिए।

इन 'तमाम नाम' से कुछ अलग मुराद हो सकती हैं। क्योंकि फरिश्तों ने अल्लाह से कहा वो वही जानते हैं जो अल्लाह ने सीख़या, फ़रिश्तो ने ये नहीं कहा कि आपने इन नामों को आदम को सिखाया, इसलिए आदम ये बता दिए, इसमें खास बात क्या, ये आप हमें सिखाते तो हम भी बेशक बता देते। इसका मतलब शायद बात सिर्फ नाम की नहीं थी, शायद आदम में कोई ख़ासियत या गुण भी था जिसके मुज़ाहरे के बाद फरिश्तों ने मान लिया कि आदम एक गैर मामूली मख़लूक होने जा रही है और इसलिए उसे खलीफा बनाया जा रहा है।

फिर अल्लाह ने कहा कि वो जमीम-आसमानों (ard-samawat) के राज जानता है और फ़रिश्तें क्या बताते और क्या छिपाते हैं, वो तक भी। ज़ाहिर है उन नाम वालों दुनिया की बुनियाद पर ही जनन्नते मिलनी हैं इसलिए ये राज़ वाली बात कही।

मगर फिर ये क्यों कहा कि फ़रिश्तें जो बताने के साथ साथ छिपा रहे हैं, अल्लाह वो भी जानता है? क्या कंही फ़रिश्तें दुनिया में आने वाले खलीफा और अपने इख्तियारत को लेके फिक्रमंद थे? यानी ज़मीन पर पहले से कोई ऐसी मख़लूक नहीं थी जिनके अस्तित्व से फरिश्तों के इख़्तियार पर कोई असर नहीं पड़ता है।नइसलिए ऐसा लगता है कि यंहा फरिश्तों के इख्तियार को लेके कोई फैसला हुआ था और इसलिए फरिश्तों को आदम को सजदे (यानी दुनिया में ताबये आने) के लिए कहा गया था। हम जानते हैं कि इंसान दुनिया में कुछ कुदरती ताकतों पर काफी हद तक और कुछ पर या सीमित हद तक काबू पाने में कामयाब रहा है।

 

[Repeated from previous Blog]

Quran (4:1):

O humanity! Be mindful of your Lord Who created (khalaqakum) you from a single (idatin) soul (nafsin) and created from (min'hā) its mate (zawjahā), and dispersed from both of them many (kathīran) men (rijālan) and women (wanisāan).

ऐ लोगो! अपने रब का डर रखो, जिसने तुमको एक नफ़स (नफसे वहीदा) से पैदा किया और उसी से उसके लिए जोड़ा पैदा किया और उन दोनों से बहुत-से पुरुष और स्त्रियाँ फैला दीं।

नफसे वाहिदा - इसके मायनों पर अलग अलग मत हैं: (1) नफसे वहीदा आदम थे, जिनकी प्रजाति से उनकी जोज़ा हव्वा निकली (इस पर पहले बात हो चुकी है)। (2) नफसे वहीदा को first/last common ancestor भी माना जाता है और हम जानते हैं कि जानवरों और micro-organisms तक में नफ़स होती। वैसे इसे रूहे अव्वल भी कहा जाता है। (2) इससे मुराद single origin of consciousness या single species या unicellular life से भी हो सकता है। यानि यह आदम भी हो सकती है या आदम-हव्वा दोनों का मिलाजुला रूप भी (आदम और हव्वा जुड़वा हों या दोनों जुड़वा की तरह पैदा हुए हों)। इसका मतलब है कि नफ़्स वाहिद वह एकल कोशिका हो सकती है जिससे जीवन की उत्पत्ति हुई और जिसमें एक साथ पुरुष/महिला विशेषताएं थीं और फिर उसी कोशिका के विकसित होने के बाद वह अपने जैसी और अधिक कोशिकाओं में विभाजित हो गई। ऐसी विशेषताओं वाली प्रजातियाँ आज भी मौजूद हैं और आज के किन्नर शायद उसी युग की निरंतरता या अवशेष हैं। (3) नफसे वहीदा सिर्फ आदम भी हो सकते हैं, जिनसे हव्वा पैदा हुई। मगर जब आदम को रूह मिल गई तो उन्होंने हव्वा को अपनी जोज़ा बना लिया। जैसे हिन्दू धर्म में ब्रह्मा और उनकी पुत्री की कहानी कही जाती है (यह मत इस्लाम के मुताबिक बिल्कुल नहीं लगता)। (4) यह भी हो सकता है जो शायद आइंदा होने वाली नई रीसर्च में सामने आए कि रूह मिलने से पहले आदम की कई संतानें या नसलें हुई हो और इनमें से किसी में हव्वा थी, जिनसे आदम को मिलवा कर जोड़ा बनाया गया, रूह देने के बाद। जाहीर है रूहानी इंसान की हुरमतें हैवानी इंसान से अलग ही होंगी। (वैसे यह मत भी इस्लाम के मुताबिक बिल्कुल नहीं लगता) {जरूरी नहीं हव्वा भी रूहानी इंसान हो, इस पर आगे बात होगी।} (5) नफसे वहीदा आदम की पिछली पीढ़ी भी हो सकती है जिससे आदम और हव्वा दोनों पैदा हुए और फिर बाद में दोनों या एक को रूह दे दी गई हो। (6) यह सबसे पहला प्रारम्भिक मानव भी हो सकता है या सबसे पहला जीव भी।

इस आयात के बाद पैदा होने वाले हालातों पर अक्सर यह सवाल किया जाता है कि आदम के बच्चों की किसके साथ शादियाँ या मिलन हुआ था? इस पर आम मत यह है कि उनकी आपस में ही भाई- बहनों की शादियाँ हुई थी। क्योंकि मां की हुरमत तो हमेशा से ही थी मगर वक्त के साथ बहनों की हुरमत बाद में कायम हुई क्योंकि इंसानी नस्ल को आगे बढ़ाना था (नूह की बीवी?)। यानि कुछ बुनियादी हुरमते पहले से होती हैं और कुछ वक़्त के साथ कायम होती हैं। असल में वक्त के साथ साथ रिश्तों की हुरमत बाद में वसी होती गई। बुनियादी अखलाकियात, शुरुवात से ही एकसां शुरुवात है। इन अखलाकियात में जो कानून दिए गए हैं, वही शरीयत है।  हमेशा से ही शरीयत में तबदीली होती रही है। इस पर एक अन्य मत यह भी है कि आदम की औलादों की शादी या मिलन दूसरी नस्ल वालों से हुई हों।

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[New Ayat]

 Quran (7:172): 

And when was taken by your Lord from the children (banī) of Adam from their loins/back (ẓuhūrihim) their descendants (dhurriyyatahum) (when your Lord brought forth from the loins of the children of Adam their descendants) and made them testify over themselves, Am I not your Lord? They said, Yes, we have testified. Lest you say on the day of resurrection, Indeed we were not aware about this.

और याद करो जब तुम्हारे रब ने आदम की सन्तान से उनकी पीठों से (सन्तान की पीठों से) उनकी संतानें निकाली और उन्हें स्वयं उनके ऊपर गवाह बनाया कि क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ? बोले, क्यों नहीं, हम गवाह हैं। ऐसा इसलिए किया कि तुम क़ियामत के दिन कहीं यह न कहने लगो कि हमें तो इसकी ख़बर ही न थी।

इस पर पेश करी जानी वाली हदीस का मफ़हूम यह है कि अल्लाह ने आदम का मसह किया, उनकी पीठ से उनकी औलादों को निकाला, उनसे वादा लिया और फिर भुला दिया गया। इस हदीस को शुरवात से ही तफ़ासीर में इस आयत के साथ जोड़ा गया है।  इस आयात की तशरीह पर कई उलेमा का इखलतिलाफ़ रहा है। इसे इंसानी पैदाइश के वक़्त का जादुई मामला माना गया है, आलमे अर्वाह का भी और नस्लों का भी मगर आज के दौर में इसे DNA से जोड़कर भी समझा जाता है. 

जबसे शेख इब्ने तय्मिया ने इसे एक बनी इस्राइली मौकिफ़ बताया है और इसे क़ुरान के बयान के खिलाफ बताया तब से इसे तफ़ासीर में शामिल करना लगभग रुक गया। मगर सूफियों में जारी रहा और उन्होंने इसे आलमे अरवाह की बात मानी क्योंकि उनका मानना है कि इस दुनिया से पहले रूहों की दुनिया थी। इब्ने आशूर (Ibne Ashur) ने माना है कि ये चला आ रहा मौकिफ़ इस आयत की क़ुरानी ग्रामर पर फिट नहीं बैठता है। 

एक मत अनुसार क़ुरान में यंहा ऐसा कुछ भी बयान नहीं हुआ है कि अचानक एक ही बार में सभी इंसानों को पीठ से निकाला गया। इस मत के अनुसार आदम के बाद बनी आदम में नस्ल दर नस्ल जो लोगों पैदा होते गए, उनसे अल्लाह ने पूछा कि क्या मैं तुम्हारा रब नहीं, सबने कहा, हाँ। अरबी ज़ुबान के मूताबिक बनी आदम के बाद यंहा 'ज़ुहुरुहिम और ज़ूररियातुहूम' लफ्ज़ जमा में आये है इसलिये यह 'नसलों' का ज़िक्र है।  

हदिसों में आता है कि अहदे अलस्त के मौके पर आदम की पीठों से नफसो या रूहों (असल लफ्ज़ 'ज़ुर्रियात') को निकाला गया, जो चींटीयों या ज़र्रों के मानिंद थे। मगर यह अहद तो किसी को याद ही नहीं है फिर ऐसा क्यों कहा गया। ऐसा इसलिए कहा गया क्योंकि इंसान को बनाए जाने पर आदम के डीएनए से आइंदा निकलने वाले सभी डीएनए से यह सवाल किया गया था। तौहीद को डीएनए में रिकार्ड कर दिया। इंसानी डीएनए में तरह-तरह के रुझान, टेंडेंसी मौजूद होती है। यह तौहीद उसके अंदर तभी से मौजूद है। आदम से नस्ल दर नस्ल यह तौहीद आगे बढ़ती जा रही है। मगर परवरिश उस पर परतें चढ़ा देती है। इसलिए जब याद दिलाया जाता है उसे यह तौहीद फौरन रीकॉल हो जाती है। यही वजह है कि अक्सर इंसान तौहीद को फोरन जुबानी मान लेता है, सिवाये हठधर्मियों के। 

रही बात कि हमें यह वाक़या याद क्यों नहीं है तो उसकी वजह है कि अगर हमें यह याद होता तो फिर इस ज़िंदगी और इस दुनिया में हमारा कोई इम्तिहान ही नहीं हो पाता बल्कि एक फॉर्मेलिटी सी रह जाती। इसलिए इसकी याद को हमारे ज़हन से मिटा दिया गया है मगर हमारे अस्तित्व में यह डीएनए की मैमोरी में हमेशा से कायम है। यह ऐसा ही जैसे हमें हमारी शुरवाती ज़िंदगी यानी मां के पेट में रहे नौ महीने और शिशु अवस्था के कुछ सालों के बारे में कुछ भी याद नहीं है, मगर वो हुआ था, यह मालूम है। वैसे अगर अपनी ओर देखें तो हम अपनी औलादों को पैदा करने से पहले उनसे पूछते तक नहीं और उनसे दुनिया भर की उम्मीद भी करते हैं।

{क्या डीएनए का कोई विशेष संबंध पीठ से होता है? यह अध्ययन का विषय है।}

अहदे अलस्त: हर नफ़्स से अहदे अलस्त के मौके पर इस इम्तिहान में दाखिल होने की हामी ली गई थी। सभी ने हामी दी थी। क्योंकि इम्तिहान लेवल के सामने जन्नत के नेमतें का लेवल कई गुना ज़्यादा ऊंचा था। ये हामी हमें वैसे ही याद नहीं है जैसे बचपन के कुछ साल याद नहीं है। आख़िरत में ये वाकया फिर से प्ले कर दिया जायेग कि उसे दुनिया में खुदा उसकी मर्ज़ी से भेजा था। यक़ीनन जिसने अहदे अलस्त के मौके पर एग्जाम नहीं देना चाहा या अनिच्छा दिखाई, वो एग्जाम के लिए या तो यंहा है ही नहीं या वैसे नहीं है जैसे बाकी हैं। कियास है कि जिन लोगों ने अहदे अलस्त के मौके पर इस इम्तिहान के लिए हां नहीं करी थी या असमंजस दिखाई थी, ये वही लोग हैं जो यंहा शिशु अवस्था में ही मर जाते हैं या फिर मेंटली रिटायर्ड पैदा होते हैं।एक मतानुसार अहदे अल्स्त पर ही हमें सारी चॉइस दे दी गयी थी और हमने ही उन्हें चुनने का फैसला लिया, उनके बदले मिलने वाले अजर के मद्देनजर जैसे  मुश्किल या आसान हालत की ज़िन्दगी चाहिए, कब-कंहा-कैसे पैदाइश चाहिय  ज़िंदगी के दूसरे मयार क्या चाहिए वगैरह. 


[New Ayat]

कुरान (3:33): 

अल्लाह ने आदम, नूह, इब्राहीम की संतान और इमरान की संतान को संसार की अपेक्षा प्राथमिकता देकर चुना।

आदम के समय में इंसान थे ही नहीं और नूह के समय में चुनिंदा मोमिन को छोड़कर बाकी इंसान जिंदा बचे ही नहीं थे जबकि इब्राहीम और इमरान (ईसा के नाना) की संतानों के समय में इंसान थे। इसके दो मतलब निकलते हैं, पहला कि आदम और नूह के वक़्त में उन्हें दूसरी इंसानी-हैवान प्रजातियाँ थी जिन पर उन्हें ग़लबा दिया गया। दूसरा कि यंहा सिर्फ संसार में इन सभी लोगों को बरतरी देने की बात हो रही है। मगर ध्यान देने वाली बात है कि यंहा दो को व्यकिगत तौर पर और दो को वंशावली के तौर पर यह बात कही जा रही है, इसलिए पहले दो के और बाद वाले दो के ग्रुप बन रहे हैं और इससे वाज़ेह हो रहा है कि दोनों ग्रुप में कुछ तो अंतर होगा।

 

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[All Repeated Ayah]

Quran (15:26-41) & (38:72-83): इब्लीस ने सजदे से इंकार किया. उसने ऐतराज़ किया. अल्लाह ने कहा इससे (जन्नत नहीं कहा इसलिए ये कोई और जगह भी हो सकती है मगर यकीनन ये दुनियावी जन्नती बाग था) बाहर (उतरना नहीं कहा यानी निकाला दे दिया) होजा. उसने मोहलत मांगी. उसने कहा की सभी को ज़मीन पर भटकाएगा {यंहा ज़मीन का ज़िक्र है यानी उसने ज़मीन पर ही उन्हें भटकाया होगा, ना कि आसमानी जन्नत में} (यंहा ज़मीन लफ्ज़ मुहवारतन कहा गया लगता है यानी यकीनन वो इस दुनियावी जन्नती बाग़ से बाहर रहकर, अंदर और नीचे मुख्य ज़मीन पर बहकायेगा), सिवाए चुनिन्दा के (हर एक नबी/रसूल को को नहीं बहकाया जा सकता). [ये दोनों भटकाने से पहले के एकसा वाक्यात हैं].

Quran (20:115-123): इब्लीस ने सजदे से इंकार किया. अल्लाह ने आदम से कहा कि यह तुम्हारा और तुम्हारी ज़ौजा का दुशमन है, तुम दोनों को जन्नत (दुनियावी जन्नती बाग़) से बाहर (उतरना नहीं कहा) न करवा दे (यंहा ये नहीं कहा कि इब्लीस बहकायेगा बल्कि ये कहा कि वो बाहर करवाएगा यानी इब्लीस खुद जाती तौर पर बहका भी सकता है और शैतानी वसवसे के ज़रिये भी). शैतान ने उन्हें बहकाया. उन्होंने जन्नत के पत्तों (दुनियावी जन्नती बाग़) बाग़ से खुद को ढका. अल्लाह ने सभी को इससे (यंहा इब्लीस या शैतान भी था मगर इब्लीस आसमानी जन्नत में नहीं हो सकता क्योंकि उसे तो पहले ही निकाला दिया जा चूका था यानी यह जगह दुनियावी जन्नती बाग़ ही है जिसके अंदर तो नहीं मगर आसपास इब्लीस खुद भी हो सकता था और बाग़ में शैतान/शैतानी वसवसा भी हो सकता था) उतरने {या निकलना/जाना} (सभी इस ऊँची दुनियावी जन्नती बाग़ से नीचे उतर जाएँ, मुख्य ज़मीन पर) को कहा और कहा कि तुमसे से कुछ, दूसरों के दुशमन हो. [ये भटकाने का वाकया है].

Quran (7:10-28): इब्लीस ने सजदे से इंकार किया. अल्लाह ने कहा इससे बाहर होजा, इसमें अहंकार नहीं करना. सो बाहर होजा. उसने मोहलत मांगी. अल्लाह ने कहा इससे बाहर होजा, तू निष्काषित है, मैं तुम सब (इब्लीस जैसे शैतानो से) से जहन्नम भरूँगा. फिर कहा कि ऐ आदम, अपनी जौजा के साथ जन्नत में रहो. शैतान ने उन्हें बहकाया. शैतान दुश्मन है. अल्लाह ने कहा उतरो तुममें से कुछ, कुछ दूसरों के दुश्मन हैं और तुम्हारे लिए ज़मीन में एक रेहाइशी जगह और आजीविका है, एक समय के लिए. तुम इसी में जियोगे, इसी में मरोगे और इसी से उठाए जाओगे (ये बात आदम-हव्वा और उनकी औलादों से कही गयी. क्योंकि इब्लीस/जिन्न तो पहले से आबाद थे). ऐ आदम औलाद, हमने तुम्हारे लिए लिबास नाज़िल किये हैं (ये तमाम इंसानों से कहा गया). शैतान को तुम्हें बहकाने ने देना जैसे उसने तुम्हारे अबवा को जन्नत से बाहर करवा दिया था. वह तुम्हे देखता है – वह और उसकी ज़ात वाले -  जंहा से तुम उन्हें नहीं देखते. हमने शैतान को उनका दोस्त बना दिया है जो ईमान नहीं लाते.

Quran (2:28 -38): तुम बेजान थे, उसने तुम्हे जान दी. अल्लाह ने फरिश्तों से कहा वो ज़मीन में एक खलीफा बनाने जा रहा है. अल्लाह ने आदम को उन सबके नाम सीखा दिए. इब्लीस ने सजदे से इंकार किया. आदम से कहा कि अपनी जौजा के साथ जन्नत में रहो.  शैतान ने उन्हें इससे फिसला दिया और उससे बाहर करवा दिया जिसमें वो थे. कहा उतरो, तुमसे से कुछ, दूसरों के दुशमन हो, तुम्हारे लिए ज़मीन में एक रेहाइशी जगह और आजीविका है, एक समय के लिए. यंहा से सब उतरो और जब मेरी ओर से हिदायत आये तो हमेशा मानना (ये बात आदम-हव्वा और उनकी औलादों से कही गयी. क्योंकि इब्लीस/जिन्न तो पहले से आबाद थे).

 

इब्लीस भी एक शैतान ही है

इब्लीस ने सजदे से इंकार किया. इब्लीस को निकाला गया. इब्लीस ने मुहलत मांगी. इब्लीस ने ज़मीन पर भटकाने को कहा. इब्लीस दोनों का दुश्मन था. इब्लीस द्वारा दोनों को जन्नत से बाहर (बहकाने की नहीं) करवाने की चेतावानी थी.

शैतान ने दोनों को बहकाया. शैतान को दुश्मन कहा. शैतान ने दोनों को जन्नत से बाहर करवाया. शैतान और उसकी ज़ात वाले देखते हैं. शैतान गैर मोमिनों का दोस्त है. 

यानि इब्लीस और शैतान एक ही हैं.

   

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हव्वा कौन थी?

हव्वा नाम का ज़िक्र कुरान में नहीं है। उनका जिक्र अदाम की जौज़ा के तौर पर मौजूद है। जहा जहा भी हव्वा का जिक्र है, वो बेहद महत्वहीन और सेकन्डेरी विषय के तौर पर बहुत ही कम है। अल्लाह और हव्वा के बीच कोई बातचीत हमें नहीं मिलती है, सिवाए कुरान (7:10-28) में दोनों का साथ में अपनी खता और माफ़ी मानने के। कुरान में शैतान और आदम का संवाद तो मिलता है, अगर हव्वा के साथ नहीं। फरिश्तों और आदम का वाक़या भी मिलता है मगर हव्वा के साथ ऐसा कुछ नहीं मिलता। हव्वा के बारे में आदम जैसी तफ़सीलात कुरान हदीस में मौजूद नहीं हैं। उन्हें, कब, कैसे, क्यों बनाया गया जैसी बातें भी वाजेह तौर पर नहीं मिलती है। आदम को पैगंबर बनाया जाना तो मालूम पड़ता है मगर उनकी साथी हव्वा को भी पैगंबर बनाया गया था या नहीं या क्यों नहीं बनाया गया था जबकि दोनों समान ही थे, ऐसी जवाबत भी इस्लामिक साहित्य से नहीं मिल पाते हैं। इसके अलावा आदम और हव्वा की औलादों के निकाह किस से हुए (शायद दूसरी प्रजातियों से), यह भी मालूम नहीं पड़ता है। अल्लाह द्वारा आदम को शजर (शायद हव्वा के  अंग विशेष) की ओर जाने से भी मना किया गया था। जहा ये दोनों रहे, वो भी इस जमीन का एक ही बाग था जहा से इन्हें निकाल दिया गया था। इन सभी बातों के मद्देनजर ऐसा महसूस होता है कि हव्वा उस इंसानी प्रजाति से थी जो पहले से चली या रही थी और उनमें इंसानी शकसीयत नहीं फूंकी गई थी। फिर इसी तरह से ही आदम और हव्वा की औलादों के संबंध भी दूसरों प्रजातियों की औरतों से बनाए गए हों। 

कुरान (7:10-28/20:115-123) ने इस वाकये में कहा है कि तुममें से कुछ, कुछ/दूसरों के दुश्मन हैं। इस आयत के मायने यही है तुम एक दूसरे के दुश्मन होंगे। ज़ाहिर है, एक पार्टी आदम-हव्वा दोनों मिलकर हैं और दूसरी पार्टी इब्लीस (शैतान-जिन्न) है। कुरान (20:115-123) से वाज़ेह है कि अल्लाह ने आदम से पहले ही कह दिया था कि इब्लीस/शैतान तुम्हारा और तुम्हारी ज़ौजा का दुश्मन है. इन्हीं आयतों में शैतान को गैर मोमिनों का दोस्त भी कहा गया है. इन आयतों के संदर्भ में जिन नामंज़ूर जिंसी मामलात की बात चल रही है, उनमें आदम-हव्वा एक दूसरे के लिए दुश्मन साबित हुए (अल्लाह की नाराज़गी झेली) और दुनिया में वैसे ही नाजायज़ जिंसी मामलात में मर्द -औरत भी एक दूसरे के लिए दुश्मन ही साबित होंगे। वैसे आम तौर पर इससे मफ़हूम यही लिया जाता है कि आदम-हव्वा की औलादें और इब्लीस जिन्न की औलादें आपस में दुनिया में एक दूसरे के दुश्मन ही हैं क्योंकि शैतान इंसानों को भटकाना चाहता है। इसलिए आम तौर पर ऐसा ही माना जाता है कि वंहा ये सिर्फ 3 ही थे। हालांकि कादियानी मानते हैं कि वंहा आदम और हव्वा के साथ साथ कुछ कई और इंसान भी थे। दूसरी तरफ, इसाई आदम को पहला इंसान तो मानते हैं मगर पैगम्बर नहीं.

यंहा यही बात वैवस्वत मनु और उनके बचे हद लोगों के बारे में भी हो सकती है। हिन्दू ग्रंथो में बताया गया है कि मनु और सप्तऋषि नौका पार बचे थे (सप्तऋषि के नाम विभिन्न ग्रंथों में नाम मे अंतर मिलता है। सप्तऋषि का कांसेप्ट बेहद प्राचीन है और केवल इसी कथा से नहीं जुड़ा हुआ)। ज़ाहिर है बिना स्त्रियों के मानवता आगे नहीं बढ़ेगी इसलिए शायद इन्होंने भी दूसरी प्रजातियों की स्त्रियों से संतानें बढ़ाई हो जैसा आदम के समय हुआ होगा। हालांकि क़ुरान कहता है नूह की फैमिली को बचाया गया था। इसलिए काफी मुमकिन है कि इसमें स्त्रियाँ रही होंगी। पर अगर यह सिर्फ उनके भाइयों को कहा जा रहा है तो बात अलग भी हो सकती है।


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इब्लीस, जिन्न, मलाइका, क़ुदरती ताकतें और आदम की उत्पत्ति।


इन दुनिया में (क़ुरान में जन्नत, बाग को भी कहा गया है) आदम, हव्वा की तरबियत हुई। मगर इससे पहले इसी दुनिया में आदम में रूह फूंकते हुए, अक्सरियत में मौजूद फरिश्तों और अकलियत में मौजूद जिन्नात (शायद इन दोनों के अलावा भी कोई और मखलूक वंहा कम तादात में मौजूद हो) को (इस दुनिया में) आदम के ताबे, अंतर्गत, अंडर यानी आदम की इताअत में आ जाने को कहा गया था (सजदे का मतलब है जिस्मानी सजदा करना, ताबे आना, इताअत कुबूल करना। यानी इन सभी अर्थों का जुज़ एक ही है)। ये इन्सान को क़ुदरती ताकतों का मनचाहा इस्तेमाल करने की कुव्वत फरहाम करना था। यानी क़ुदरती ताकतों को इंसान के साथ कॉऑपरेट करने का हुक्म दिया गया, चाहे वप सही इस्तेमाल करे या गलत (अल्लाह के हुकुमों के मुताबिक या खिलाफ, दोनों सूरतों में)। इनमें से सिर्फ एक ने सरेंडर करने से मना किया और वो जिन्न (इब्लीस) था। 

आदम से लेके आज दुनिया की बेशुमार क़ुदरती ताकतें और एनर्जीयां काफी या एक हद तक इंसान के काबू में आ चुकी हैं। शुरवात से चले तो आग, हवा (नौका बहाव में प्रयोग), पानी (दरिया, तलाब, कुंवे के ज़रिए प्रयोग), बारिश और मौसमों से फायदा उठाते हुए खेतीबाड़ी (पेड़, पौधों, फसलें , फल, सब्जियां उगाना), पशुपालन, पहाड़ (पत्थर), मिट्टियाँ, धातुएं, खनिज, प्राकृतिक संसाधन वगैरह वगैरह सब इंसान इस्तेमाल करना सीख गया है। इसकी सबसे बड़ी शुरुआत 3 लाख साल पहले होमो सेपियन्स की शुरवात से ही आरम्भ हो गयी थी। इंसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण खोज आग का प्रयोग थी। आग द्वारा पकाए गए खाने के बाद ही इंसानी दिमाग विकसित होता गया। लगभग 10-15 लाख साल पहले प्राचीन इंसानी नस्लों द्वारा आग के ईस्तमाल के सबूत मिलते हैं मगर वो कंट्रोल्ड थी या क्रिएटेड, इसे ज्ञात नहीं किया जा सकता है। जलती हुई पाई गई आग के कंट्रोल्ड वेय में प्रयोग के सबूत 4 लाख साल पुराने हैं। सबूतों के आधार पर अक्सर ऐसा माना जाता है कि स्वयं से आग जलाने की क्षमता होमो सेपियन्स ने सिर्फ 1 लाख साल पहले ही उत्पन्न करी। हम जानते हैं कि अपनी लगातार हासिल हुई ऐसी विभिन्न क्षमताओं (प्राकृतिक भी) के कारण ही अनेकों इंसानी प्रजातियों (इनमें आपस में बड़े स्तर पर मारकाट भी हुई है) में केवल होमो सेपियन्स ही सर्वाइव कर पाए जो इन सभी क्षेत्र में महारत हासिल कर पाए थे।

हम जानते हैं कि फरिश्तों को प्राकृतिक शक्तियों से जोड़ कर भी देखा जाता है और उन्हें उनका कंमाडर भी माना जाता है। इस्लामिक रिवायतो मे आग का कोई फरिश्ता मालूम नहीं पड़ता है। क़ुरान (43:77) में जहन्नुम की आग पर मुसल्लत एक फ़रिश्तें मालिक का ज़िक्र तो किया गया है पर वो पूरी क़ायनात की आग का जिम्मेदार है या नहीं, हमें नहीं बताया गया है। जहन्नुम पर कई फरिश्ते तैनात ज़ुरूर हैं। फ़रिशतों को नूर (लाइट) से पैदा किया गया है। क़ुरान (55:15) के मुताबिक जिन्नो को आग (धुंआ रहित लपट) से बनाया गया है, हदीस में भी यही बात कही गई है। 

आग अपने आप में शुद्ध एनर्जी नहीं बल्कि एक प्रोसेस है जिससे हीट और लाइट के रूप में एनर्जी निकलती हैं और ये दोनों एनर्जीयां है। साउंड, लाइट, ग्रेविटी, मोशन जैसी अनेकों एनर्जीयां हैं क़ायनात में मौजूद है। 

यक़ीनन इब्लीस के पास कोई प्राकृतिक ताकत या एनर्जी की ज़िम्मेदारी नहीं थी जैसी फ़रिशतों के पास होती हैं। पर शायद इतने ऊंचे मुकाम तक पहुचें हुए इब्लीस के पास आग से संबंधित कोई ज़िम्मेदारी हो (शायद आग के प्रोसेस की) या जिन्नात (जिन्नात का सरदार इब्लीस) दुनियावी आग से किसी तरह सम्बंधित हो। आखिर इब्लीस फ़रिशतों जैसा ही मुक़ाम हासिल किए हुए था। आदम की उत्पत्ति के समय फ़रिशतों या जिन्नात से हुई बातचीत साफ इशारा करती है कि इन दोनों मखलूकात का इस पृथ्वी और मानव से कोई गहरा संबंध ज़ुरूर था या है। इब्लीस के इनकार के बाद शायस इन प्रोसेस की जिम्मेदारी किसी दूसरे जिन्न या मखलूक को दे दी गई हो या इब्लीस के इनकार बाद, दुनियावी आग को आदम (अव्वल बशऊर होमो सेपियन्स) आदम के कंट्रोल में कर दिया गया हो (जैसा इब्लीस करना नहीं चाहता मगर अल्लाह को यही मंज़ूर था)। यह सिर्फ एक अनुमान है, इसमें गलतियां ही सकती हैं, सुधार का स्वागत है।

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हदीस: आदम को अल्लाह ने अपनी सूरत पर पैदा किया  

आदम को रहमान (अल्लाह का नाम) की सूरत पर पैदा किया, इस रिवायत को अल्बानी ने सनदन कमज़ोर होने पर नहीं कुबूला है, इसलिए इस पर कोई जिरह करना ही फ़िज़ूल है। दूसरी रिवायत में कहा गया है कि अल्लाह की सूरत पर पैदा किया है। ये रिवायत क़ुरान के वाज़ेह बयानात (अल्लाह की ज़ात) के खिलाफ है क्योंकि अल्लाह की कोई सूरत ही नहीं है, इसलिए इसकी तावील होगी और सूरत के मायने गुणात्मक और रूपक लिए जायँगे जैसे नबी ने भी फरमाया है कि जन्नती की सूरतें चमकदार होंगी जैसे चांद की सूरत होती है यानी उनकी सूरत चांद सी नहीं होगी बल्कि जैसे चांद चमकता है, वैसे वो भी चमचमाते हुए होंगे।


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ऋग्वेद: 10.129.3-4 (नासदीय सूक्त): 

सृष्टि रचना से पूर्व अंधकार था। सब अज्ञात था। वह पूर्व व्याप्त एक ब्रह्म ही अविधमान पदार्थ से ढका था..। उस ब्रह्म ने सर्वप्रथम सृष्टि रचना की इच्छा की, उससे सर्वप्रथम बीज का प्राकट्य हुआ।

ऋग्वेद: 10.71.1: 

बृहस्पति ने सर्वप्रथम सभी पदार्थों का नामकरण किया। वह उनकी शिक्षा की प्रथम सीढ़ी थी।

ऋग्वेद: 10.19.15: 

प्राण रूप देवताओं ने पुरुष को मानसिक यज्ञ (रूहानी) के प्रारम्भिक काल में वरण (चयन) किया। 

मनुस्मृति (1:8-21):

परमात्मा ने सबसे पहले जल को प्रकट किया (जल सृष्टि करी)। जल को इसलिए नार कहते हैं क्योंकि यह नर से उत्पन्न हुआ। यही जल उसका प्रथम स्थान है (जल में ही परमात्मा की ब्रह्मरूप से पहले की स्तिथि है)। इसलिए उस परमात्मा को नारायण कहा गया। परमात्मा ने फिर उस जल में शक्तिरूप बीज डाला। वह बीज फिर सुवर्ण सा (सूर्य जैसा) अंडा बन गया और उसमें एक वर्ष रहकर सब लोकों के कर्ता ब्रह्मा उत्पन्न हुए। वह नर ब्रह्मा नाम से पूरे विश्व में विख्यात है। उस भगवान ने उस अंडे के दो भाग कर दिए। उनसे स्वर्ग और पृथ्वी को बनाया और बीच में आकाश और जल को स्थिर करके समुद्र और आठों दीक्षाएं। ब्रह्मा ने उस परमात्मा (प्रकृति) से मन.... सत्व, रज, तमो,.... और शब्द, स्पर्श रूप आदि....  को अपनी मात्राओं में अर्थात शब्द, स्पर्श आदि में मिलाकर समस्त चल अचल रूप विश्व की रचना करी।.. जैसे आकाश में एक गुण शब्द है और वायु में दो गुण , शब्द और स्पर्श हैं। परमात्मा ने ही वेदनुसार सबके नाम और कर्म बाँट दिए। 

[तैततिरीय आरण्यक में जल से प्रजापति की उत्पत्ति का वर्णन है। इसके प्रथम भाग में सृष्टि वर्णन विस्तारपूर्वक किया गया है। शतपथ ब्राह्मण 10.1.6 व 6.7.1.17 भी देखिए] 

इस्लाम धर्म की तरह (जैसे अल्लाह का तख्त पानी पर था) ही हिन्दू धर्म में भी पृथ्वी पर आरंभ में जल ही जल होने की बात कही जाती है। हिन्दू धर्मग्रंथों में प्रथम जीव के बीज पानी में डालने के, फिर उसके अंडा बन जाने के और फिर उसके दो टुकड़े हो जाने का उल्लेख है जैसे कुरान ने भी बताया है। इस्लाम और इसाईयत के साथ साथ हिन्दू धर्म में भी मिट्टी आदि (पंचतत्व: पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश) से समस्त प्राणियों की उत्पत्ति मानी जाती है (ब्रह्मवैवर्त पुराण:24:30-31)। साथ ही, पदार्थों का नामकरण और देवों को पुरुष का वरण करने का उल्लेख भी है। इसके अतिरिक्त यंहा पर 'शब्द' से विश्व की रचना की ओर भी इशारा किया गया है जैसा योगसूत्र 1:27 में, बाइबल जॉन 1:1 में और कुरान 2:117 में भी है। 

जब वैज्ञानिक मानव विकासवाद के लिए Anatomy, DNA similarities को सबूत के तौर पर स्वीकार करते हैं तो फिर इन ग्रंथों की समानताओं के आधार पर उन्हें धर्म प्रतिपादित मानव विकासवाद को भी स्वीकार करना चाहिए।

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जो हमें कायनात दिख रही है, यह सिर्फ एक है, बाकी 6 ऐसी और हैं। हर सभी में एक ग्रह पर ज़िंदगी आबाद है। इसलिए इसमें हमें और जगह ज़िंदगी नजर नहीं आती, सिवाय पृथ्वी पर। इस सिस्टम या मलबे से ही बाद में नया सीस्टम बना दिया जायगा।

अज़ाज़ील का लकब इबलीस है। इबलीस के लिए शैतान लफ़्ज़ भी इस्तेमाल हुआ है। हर सरकश शय शैतान है, जो इंसानों और जिन्न दोनों में हो सकते हैं। इबलीस मर गया या जिंदा है, हमें नहीं मालूम। मगर उसके साथी उसके काम में लगे हुए हैं। उसके पैरोंकार इंसान और जिन्न दोनों में हैं। शैतान लफ़्ज़ सिफ़त या adjective है।

जिन्न का तसव्वुर मुहम्मद साहब से पहले से ही अरब में था। अरबी साहित्य और काव्यों में इसका जिक्र है। मुहम्मद साहब पर जिन्न संबंधित इल्ज़ाम लगाए गए थे। बाइबिल बताती है कि ईसा पर कई जगहों पर इलज़ाम लगाया गया है कि यह तो भूतों के सरदार की मदद से लोगों को शिफ़ा देता है। 

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In almost all the ancient civilizations, there are stories where humanity is created from clay, mud, earth (somewhere mentioned from wood, and even somewhere with the divine breath also and by hands as well by local Gods):- Zoroastrian mythology, Sumerian mythology, Norse mytholog of Europe (with wood only), Māori folklore of New Zealand, Greek mythology (God Prometheus), Egyptian mythology (God Khnum), Chinese mythology (Goddess Nuwa), Laotian traditions (story of Phaya Kuan and Phaya Nang), Hawaiian mythology, Korean mythology (Shamanistic, Seon-gut), Incans and Mayans of Mexico (Popol Vuh, a text of Kiche, Guatemala), Mesoamerican (Mexico), Aztec, Mongolian mythology, Ainu mythology (Hokkaido, Japan), Ijaw people of Nigeria, Malagasy people of Madagascar, Congo (Central Africa), West African mythology, Aymara of Bolivia and Peru, the Dogon of Mali, the people of Borneo (Indonesia) and the Natives of Alaska.

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Quran (49:13): O mankind (l-nāsu), indeed We have created you from male and female and made you peoples and tribes that you may know one another. 

■  Ahmad 311; Dawud 4703; Tirmidhi 3075; Muwatta:  Allah created Adam and passed/wiped His right hand over his loins/back and brought forth from him his offspring and said: I have created these for Paradise and they will do the deeds of the people of Paradise. Then He passed/wiped His hand over his loins/back and brought forth from him his offspring and said: I have created these for Hell and they will do the deeds of the people of Hell. A man said: If so, then why should we strive? The Messenger said: When Allah creates a person for Paradise, He causes him to do the deeds of the people of Paradise until he dies doing one of the deeds of the people of Paradise and is admitted to Paradise thereby. And when He creates a person for Hell, He causes him to do the deeds of the people of Hell until he dies doing one of the deeds of the people of Hell and is admitted to Hell thereby.

Masabih 119:  When God created Adam then struck his right shoulder and brought forth his offspring white like small ants. And he struck his left shoulder and brought forth his offspring black as though they were charcoal.

Muwatta: When your Lord took their progeny from the Banu Adam from their backs and made them testify against themselves. Am I not your Lord? They said, Yes.

Tirmidhi 3076; Mishkat 118: When God created Adam He wiped his back and every soul of his offspring He was to create up to the day of resurrection fell from his back. He put on the forehead of everyone of them a flash of light, then presented them to Adam. God said to him, They are your offspring. On seeing one of them and being charmed by the flash on his forehead, and being asked, God said, This is David and his age is 60 years. Adam said, Give him an extra 40 years out of my term of life. When angel of death came to Adam, he said, Are there not 40 years of my life remaining? He replied, Did you not give them to your son David? Adam denied it and his offspring denied, Adam forgot and ate of the tree and his offspring forgot, and Adam sinned and his offspring sinned.

Muslim 2652; Tirmidhi 2134; Dawud 4702: There was an argument between Adam and Moses in the presence of their Lord. Moses said: Are you that Adam whom Allah created with His Hand and breathed into him His sprit/taught you all the names and commanded angels to fall in prostration before him and He made you live in Paradise with comfort and ease. Then you caused us/the people to get down to the earth from Paradise because of your lapse/sin. Adam said: Are you that Moses whom Allah selected for His Messengership and for His conversation with him and conferred upon you the tablets, in which everything was clearly explained and granted you the audience in order to have confidential talk with you. What is your opinion, how long Torah would haye been written before I was created? Moses said: 40 years before. Adam said: Did you not see these words: Adam committed an error and he was enticed to do so. Moses said: Yes. Adam said: Do you then blame me for an act which Allah had ordained for me 40 years before He created me (already written in my fate before my creation)? The Messenger said: This is how Adam came the better of Moses.

Bukhari 7516: The Messenger said, The believers will be assembled on the Day of Resurrection and will say to Adam, You are the father of mankind, and Allah created you with His Own Hands and ordered the Angels to prostrate before you, and He taught you the names of all things so please intercede for us with our Lord so that He may relieve us. Adam will say, to them, I am not fit for that, and then he will mention to them his mistake which he has committed.

Tirmidhi 3077: When Hawwa became pregnant, Iblis came to her and her children would not live (after birth) so he said: Name him Abdul Harith. So she named him Abdul Harith and he lived. So that is among the inspirations of Ash-Shaitan and his commands.

Sahih Muslim 81a: Woe unto me, the son of Adam was commanded to prostrate, and he prostrated and Paradise was entitled to him and I was commanded to prostrate, but I refused and am doomed to Hell.

Bible: Genesis: 2:7-8: The God formed a man from the dust of the ground and breathed into his nostrils the breath of life and the man became a living being. Now the God had planted a garden in the east, in Eden and there he put the man he had formed.

Quran 41:9-12: Who created the earth in two Days... Placed on the earth firm mountains.. totaling four Days exactly...  So He formed the heaven into seven heavens in two Days.

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दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...