Tuesday, 1 October 2024

उम्मी नबी और क़ुरान की ग्रामर। नबी का व्यवसाय त्यागना।

 
क्या क़ुरान की अरबी ग्रामर में गलतियां हैं? उम्मी के मायने क्या हैं? क्या नबी सल्ल. पढ़े लिखे नहीं थे?


भाषा विज्ञान और भाषाओं का इतिहास।

कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी। पहले के ज़माने में भाषाएं उतनी एकरूप नहीं होती थी, आज भी अक्सर नहीं होती। हालांकि पहले के मुक़ाबले आज हर भाषा में काफी एकरूपता देखने को मिल जाती क्योंकि ग्लोबलाइज़ेशन और इन्फॉर्मेशन का दौर है। पहले ज़माने में एक ही भाषा के व्याकरण, लेखन आदि में भी अंतर हो जाता था। भाषाओं की डिक्शनरी आदि भी नहीं हुआ करती थी। किसी भाषा की डिक्शनरी या लेक्सिगन तो बनाई ही इसलिए जाती रही हैं ताकि गैर लोग उस भाषा के शब्दों को समझ सके। इसलिए ये शब्दकोश आदि अक्सर बेहद बाद की रचनाएं हैं। आरंभ में भाषाएं इतनी समृद्ध नहीं थी बल्कि आज की अधिकतर भाषाएं तो मध्यकाल में आके अपना पूर्ण रूप ले पायीं।

भाषा पहले बोली जाती है और फिर लिखी जाती है, यह भाषा उत्पत्ति की प्रक्रिया है। प्राचीन काल में भाषाओं को बोला जाता था, उनको लिखा नहीं जाता था क्योंकि स्क्रिप्ट, लिपि नहीं हुआ करती थी। लेखन आरंभ होने के बाद भी लिखना आसान कार्य नहीं था क्योंकि पूर्ण या शुद्ध रूप में या उच्च स्तरीय लिपियाँ नहीं होती थी। इसके अलावा लिखने और लिखावट को सँजोने के लिए उपयुक्त सामग्री जैसे कलम, कागज आदि नहीं होते थे। इसके साथ ही पहले के ज़मानों में समाज, सत्ताएँ और लाइब्रेरी आदि उतनी स्थायी नहीं होती थी कि सारा का सारा लेखन अधिक समय तक सरवाइव कर पाए। पहले पत्थर, छालें, खालें, कपड़ो, लकड़ियों आदि पर लिखा जाता था। क्योंकि इन सब पर अधिक नहीं लिखा जा सकता था तो इसलिए बेहद महत्वपूर्ण चीजें ही इन पर लिखी जाती थी। इसलिए लिखने से अधिक याद करके चीजें पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाई जाती थी। यही कारण है कि ऐतिहासिक कथाओं, लोकोक्ति आदि लय, ताल में बनाये जाते थे ताकि इस तरह काव्य शैली में लोग इन्हें आसानी से याद रख सके। साधारण वाक्यों की बजाय काव्य याद रखना अधिक आसान है जैसे फिल्मी डायलॉग से ज़्यादा गाने याद करना आसान होता है। यही वजह है कि धार्मिक सामग्री, संदेश, मंत्र आदि गायन शैली में बनाये जाते थे। 

वेदों की ऋचाओं या मंत्रो को भी उनकी रचना के बाद मौखिक याद करके आगे बढ़ाया गया और फिर बाद में लिपि के जन्म के बाद उन्हें लिपिबद्ध किया गया यानी लिखा गया। वेदों की रचना के समय में संस्कृत लेखन था ही नहीं और अगर एक बार को मान भी लिया कि कंहीं लिखा गया था तो वो आज उपलब्ध नहीं है। इसी तरह कुरान को भी लय, तुक में नाज़िल किया गया और इसे लिखने से अधिक याद करके नस्ल दर नस्ल आगे बढ़ाया गया।

मुहम्मद सहाब के समय में अरबी ज़ुबान का व्याकरण, लिपि आदि इतने जटिल नहीं थी जितने बाद में समय के साथ साथ आज हो चुकी हैं। क़ुरान आने के बाद अरबी भाषा और अधिक समृद्ध हो गयी। ये एक आम चलन है कि किसी विशेष भाषा में कोई महाग्रंथ या महाकाव्य रचयित होने के बाद वो भाषा समृद्ध हो जाती है। संस्कृत भी वेदों के बाद ही अधिक समृद्ध हो गई थी। कुरान ने अरबी जुबान को सही रंग-रूप दिया, न कि इसके उलट हुआ। कुरान की ग्रामर से अरबी ग्रामर परखी जाएगी, न कि इसका उलट होगा। कुरान ने मूल अरबी ग्रामर को जन्म दिया है। क़ुरानी अरबी से ही आधुनिक अरबी के उसूल बने हैं। हर भाषा का मूल स्वरूप उसके प्राचीनतम ग्रंथों में रिकॉर्डिड होता है। 

अहले जुबान के लिए ग्रामर की जरूरत नहीं होती, ग्रामर उनके शऊर का हिस्सा होती है। ग्रामर तो बाहरी लोगों के लिए होती है। अहले जुबान के बोलते हुए ग्रामर उसूल टूटते रहते हैं और नए बनते रहते हैं। इस लिहाज से भी अरबियों के लिए कुरान की ग्रामर बिल्कुल सही है।

क़ुरान के अनुसार सभी अल्लाह की किताबें नबी की कौमो की ज़ुबान में आई। इसलिए क़ुरान भी कुरेश कबीले के द्वारा बोली जानी अरबी ज़ुबान में आया, न कि बाकी अन्य स्थानीय अरबी बोलियों में। क़ुरान को अरबी में वैसा ही लिखा गया जैसी अरबी क़ुरैश लिखा करते थे।


क्या कुरान लेखन में (ग्रामर वगैरह की) गलती हुई है?

तहकीक के मुताबिक 8 हिजरी तक कुरान के नुस्खे तैयार हो चुके थे। तकरीबन 40 के करीब अलग अलग वक़्त में कातिब हुए हैं। नबी सहाबा को कुरान लिखवा दिया करते थे और फिर उनसे सुन लिया करते थे। सहाबा का लिखा हुआ वही कुरान ही हम आगे बढ़ाते जा रहे हैं। अगर उसमें उस वक़्त कोई लफ़्ज़ किसी एक खास शक्लों-सूरत में कुरान में लिखा गया है तो उसे आज तक बदला नहीं गया है और उसे वैसे ही महफुज किया गया है। यह लिखने की कोई गलती नहीं है बल्कि उस समय का लिखने या रिकार्ड करने का तरीका या नक्श है। यह इमला का तरीका है। 

उस वक़्त जैसे अरबी लिखी जाती और आज जैसे अरबी लिखी जाती है, उसमें या ग्रामर में फ़र्क़ आ चुका है। जैसे बाज लफ़्ज़ बाज कई तरीकों से लिखा जाता है या जैसे कहीं कोई चिन्ह बढ़ा देना या कहीं कम कर देना। अहले ज़ुबान या अहले इल्म इस चीज़ को सबसे बेहतर समझते हैं। इसलिए यंहा हम उन आयतों की डिटेल में नहीं जा रहे जंहा आज की अरबी के मुताबिक फर्क बताया जाता है बल्कि सतही तौर पर बस यह समझ लेते हैं कि ऐसे मुकामों पर क़ुरान की ग्रामर में गलती नहीं है बल्कि ऐसा उस वक्त की मूल ग्रामर की बुनियाद पर ही लिखा गया है। साथ ही जंहा जंहा भी आज इस तरह फर्क वाजेह हो रहा है, वंहा ख़ुसूसन हैरतअंगेज तौर पर कलाम की खूबसूरती ज़्यादा निखर जाती है और वंहा मज़ाख़ेज़ या लुत्फ़नदोज़ तजुर्बा हासिल होता है। ऐसे मुकामों को पढ़ते हुए हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि मूल अरबी में ज़ेर ज़बर पेश नहीं होते हैं। ये तो बाद में क़ुरान में जोड़े गए ताकि गैर अरबी भी क़ुरान को आसानी से पढ़ सकें।


उम्मी का क्या अर्थ है?

सबसे पहली बात कि क़ुरान में आये उम्मी लफ्ज़ से नबी के पढ़े या लिखे न होने की मुराद न ली जाए क्योंकि क़ुरान में उम्मी लफ्ज़ इस मायनो में नहीं आया है।

व्यवहारिक तौर पर बहुत से लफ़्ज़ों के दो तरह के मायने होते हैं, एक लुग्वी और एक इस्तेलाही। जैसे हदीस के मायने बात है और रसूल का कौल भी। अरबी के मायने है अच्छी ज़ुबान बोलने वाले और अजमी के मायने है जो अच्छी ज़ुबान न बोल पाए। हालांकि अजमी के लुग्वी मायने गूंगा भी होता है। इसलिए अरबी-अजमी लफ्ज़ क़ौम की निशानदेही करने के लिए इस्तेमाल हुए। ऐसे ही अरबी में उम्मी के दो मायने है। एक आम मायने है यानी जो पढ़ा लिखा न हो। दूसरे मायने है गैर किताबी जो क़ुरान में इस्तेमाल हुए है। 

अहले किताब, मुशरिकों या अरबियों को उम्मी कहते थे यानी जिनके पास कोई खुदा की किताब न हो। किताब वाले अल्लाह की हिदायत पर माने जाते थे और गैर किताबी अपनी मां की हिदायत पर माने जाते थे। मुहम्मद साहब के पूर्वजों में हज़रत इस्माइल तक किसी किताब का ज़िक्र नहीं मिलता। जंगों में पकड़े जाने वाले मुशरिक पढ़ना लिखना जानते थे और मुसलमानो को यह सिखाते थे, जिससे पता चलता है कि अरबो को उम्मी उनके अनपढ़ होने के आधार पर नहीं कहा जाता था बल्कि उनकी क़ौम को यह इस्तेलाही नाम दिया गया था। कुरान में उम्मी लफ़्ज़ इसी मायनों में इस्तेमाल हुआ है जैसे....

क़ुरान 3:20: किताबी और गैर किताबी का जिक्र। 
क़ुरान 3:75: यहूद, गैर यहूद को उम्मी कह रहे हैं।
क़ुरान 62:2 नबी और उममियों में किताब भेजने का जिक्र। 
क़ुरान 7:157: उम्मी नबी और किताबों का जिक्र। 
क़ुरान 29:48: यंहा उम्मी लफ़्ज़ नहीं आया है। यंहा नबी के किताब न पढ़ने या लिखने का तज़किरा है। यंहा नबी के पढे लिखे होने की बात पर नहीं बल्कि किताब पर जोर दिया गया है। (वैसे यंहा यही बताया गया है कि आप पढ़े-लिखे नहीं थे। आप पढ़ने लिखने, शायरी जैसे फन, हुनर में महारत नहीं रखते थे। नबी को पढ़ा-लिखा मानने वाले उलेमा भी यही मानते हैं कि आपने इस मुकाम के बाद पढ़ना-लिखना सीखा लिया था।)

क्या नबी पढ़े लिखे नहीं थे?

आप पढ़े लिखे थे या नहीं, इसका जायज़ा क़ुरान में आये उम्मी लफ्ज़ से नहीं बल्कि बाकी इस्लामी साहित्य के आधार पर किया जाना चाहिए और इस तरह इस मुद्दे पर 3 मौकिफ़ पाए जाते हैं:

1. नबी पढ़े लिखे थे।
2. क़ुरान के नाज़िल होने के साथ, अल्लाह ने नबी को पढ़ने की सलाहियत अता कर दी थी (वैसे ज़हीन इंसान के लिए कुछ ही वक़्त में अपने आप से भी पढ़ना लिखना सीखना कोई मुश्किल काम नहीं है। एक मौकिफ़ ये भी है कि आप लिखने से बेहतर पढ़ना सीख गए थे)।
3. नबी पढ़े लिखें नहीं थे, हालांकि थोड़ा बहुत पढ़- लिख लेते थे। जैसे आप अपना नाम पढ़- लिख लेते थे (इतना तो आज भी एक आम अनपढ़ इंसान जानता ही है)।

आम तौर पर उम्मी का मतलब अनपढ़ नहीं बल्कि पढ़ा लिखा न होना होता है। पढे लिखे हुए के भी दो मायने है। एक थोड़ा पढ़ा लिखा और एक मुक़म्मल पढ़ा लिखा। जैसे हमारे समाज में 5/8 क्लास पढे लिखे आदमी को भी पढ़ा लिखा न होना कहा जाता है जबकि वो एक हद तक पढ़ लिख लेता है। इसी तरह नबी कोई मदरसे से या किसी आलिम से ऑफीशियली शिक्षित नहीं थे। इस मायने में नबी को उम्मी कहा जाता और ऐसा कहे जाने में भी कोई हर्ज नहीं है। नबी दरअसल अनपढ़ नहीं थे, बल्कि पढ़े लिखे नहीं थे।

जब जंगी कैदी मुसलमानों को पढ़ना लिखना सीखा रहे थे तो नबी ने पढ़ना सीखना इसलिए नहीं सीखा क्योंकि अगर आप पढ़ने लिखने में महारत हासिल कर लेते तो नबूवत की दलील आप के मुख़ालिफ़ों के खिलाफ कमज़ोर पड़ सकती थी जो आप पर कलामे खुदा को गढ़ने के इल्जाम लगाते रहते थे। वैसे नबी को बेसिक पढ़ना लिखना तो पहले से आता ही था मगर फिर भी आप ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे। असल में पैगंबरों को ऐसे दुनियावी इल्म, फन, हुनर से बालातर रखा जाता है जिनसे उनकी कलामे ख़ुदाई हासिल होने की दलील कमजोर पढ़ जाए।

बुखारी 4251: The Muslims wrote: "This is the peace treaty, which Muhammad, Apostle of Allah has concluded".... Then Allah's Messenger took the writing sheet...and he did not know a better writing..and he wrote (or got it the following written), "This is the peace treaty which Muhammad, the son of Abdullah, has concluded".

(इससे पता लगता है कि आप कम से कम अपना नाम पढ़-लिख लेते थे और आपको पढ़ने लिखने में महारत हासिल नहीं थी, इसलिए आपकी हैंड राइटिंग कुछ खास नहीं थी।)

बुखारी 4953: An Angel came to him and asked him to read. He replied, I do not know how to read. Then the Angel held me and pressed me so hard that I felt distressed. Then he released me and again asked and I replied the same. Then he held me again and asked me, but again I replied same. Then he held me for the third time and released me and said, "Read in the name of your lord...".

(ऐसा माना जाता है कि शायद आपको हज़रत जिब्रील ने पहली वहिय किसी तख्ती वगैरह पर लिखी हुई दिखाई थी तभी आपसे कहा था कि पढ़ो। अगर कंही लिखी हुई नहीं होती तो आपसे कहा जाता कि दोहराओ, न कि पढ़ो)।

[इस हदीस के मतन पर इख़्तलाफ़े राय है। इसमें आये इक़रा लफ्ज़ पर भी अलग अलग मौकिफ़ है जैसे कि इक़रा के मायने देख कर पढ़ना ही नहीं बल्कि मन/मेमोरी से कुछ पढ़ना भी होता है। जिब्रील ने कोई तख्ती नहीं दिखाई थी बल्कि नबी को बार बार जकड़ कर, उनसे अंदर से मोज़्ज़ाना तौर पर ये तिलावत निकलवाई थी। इसपे दूसरा मौकिफ़ ये है कि किसी रावी ने इस हदीस में आये इक़रा लफ्ज़ से इस हदीस में गलती से क़ुरान से वो आयात उठा कर जोड़ दी जिसमें इक़रा लफ्ज़ था।]
 
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क्या नबी सब कुछ छोड़ कर तबलीग में लग गए थे और सभी को यही करना चाहिए?

नबी ने नबूवत के बाद बिज़नेस से हट कर दावत को अपना मैन मक़सद और काम बना लिया था। मगर मक्का में रहते हुए फिर भी बिज़नेस पूरी तरह से बंद नहीं किया था। इसके अलावा ह. ख़दीजा और आपका अपना इकट्ठा किया सरमाया भी इस्तेमाल किया जा रहा था। ख़दीजा की मौत के बाद मदीना में आपका पूरा ही वक़्त दीन में लगने लगा और माली हालात काफी तंग हो गए थे, इसलिए अक्सर दोनों वक्त का भर पेट खाना नहीं खाया। इस वक़्त आपके खर्चे माले गनीमत, तोहफे और सदके जो आप आगे बांट देते थे (सदक़ा अहले बयत पर जायज़ है, इस पर फिर कभी) वगैरह से चल रहे थे। 

रसूल पर डाली जाने वाली ज़िम्मेदारीयों का आम मुसलमानों से मुकाबला नहीं किया जा सकता। आम मुसलमान को तो दीन और दुनिया दोनों लेके चलना। बैलेंस बनाये, दुनिया में ही न झुक जाए। बाकी तकवे की बात है कौन कितना दीन के लिए कितना ज़्यादा करे। मगर दीन के चक्कर में अपनों की पूरी तरह अनदेखी करी  और उन्हें इसकी जायज़ शिकायत भी रही तो आख़िरत में पकड़ होगी। अगर आपके अपने भी आपके जैसे मिजाज़ के हैं (जैसे नबी के अपने थे) तो बेशक कोई पकड़ नहीं होगी क्योंकि उन्हें आपके दीन में पूरी तरह चले जाने से कोई शिकवा ही नहीं होगा.

बैलेंस, ब्रेक इवेन पॉइन्ट तो हर इंसान खुद ही तय करेगा, कोई और बेहतर करके नहीं दे सकता। एक तरफ दीन के लिए सब छोड़ देने वाले अबू ज़र और मुसब बिन उमेर जैसे लोग हैं और दूसरी और दीन के साथ दुनिया को लेके चलने वाले अब्दुर रहमान बिन औफ़ और उस्मान इब्न अफ्फान जैसे लोग हैं। सब अपनी जगह दुरुस्त और कामयाब हैं। एक्ज़ाम्पल की कमी नहीं पड़ेगी इन्शाल्लाह। जो चाहे चुने जा सकते हैं। 


दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...