Sunday, 12 January 2025

कुछ आयत, अहादी पर वज़ाहत

 


कुरान में 2 मौत और 2 ज़िन्दगी का ज़िक्र?

लोगों से लिया गया 'नबियों का अहद' या नबियों से लिया गया अहद'?

खुद को कतल करने का हुकुम.
अल्लाह जिसे चाहे इज़्ज़त दे और जिसे चाहे ज़िल्लत.
महावारी आने से पहले लड़कियों के साथ विवाह करने की बात.
पाक़ मर्दों के पाक औरतें और नापाक़ मर्दों के लिए नापक़ औरतें.
क्या वाकई अल्लाह किसी नफस पर उसकी ताक़त से ज्यादा बोझ नहीं डालता.

ज़कात इकट्ठा करने वालों का तोहफ़े लेना। 
बच्चे और बच्चियों के पेशाब का धोना। 
नबी का एक बच्ची से शादी करने का कहना।
नबी ने एक जंग में पेड़ क्यों कटवाये?
अकेले नमाज़ नहीं पढने पर हदीस
झन्डे तले जंग
अंसार की बीवियों के निकाह मुहजिरिन से

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कुरान में 2 मौत और 2 ज़िन्दगी का ज़िक्र?

सवाल
Quran 40:11: They will say, Our Lord, You made us die twice and *gave* us life twice, and now we confess our sins…

लोग आम तौर पर इसे 2 ज़िंदगी और 2 मौत के तौर पर समझते हैं। दो ज़िन्दगी यानी इस दुनिया में ज़िंदगी और फिर से ज़िंदा होने के बाद की ज़िंदगी और दो मौत यानी जन्म से पहले बेजान होना और दुनियावी ज़िंदगी के बाद मौत। *ग़ामिदी साहब* ने भी अपनी तफ़सीर में इसे ऐसे ही समझाया है। लेकिन अगर जन्म से पहले हमारा वजूद नहीं था — अगर हम कुछ भी नहीं थे — तो उस “न होने” को पहली मौत कैसे माना जा सकता है? कोई जीने/बनने/पैदा होने से पहले “मर” कैसे सकता है? इसमें 2 मौत (देने) की बात क्यों कही गई है? और अगर कोई यह मान ले कि कुरान की आयत धरती से पहले के वादे (अहदे अलस्त) की ओर इशारा करती है, तो इसका मतलब 2 मौतें लेकिन 3 ज़िंदगी होगा जो कुरान में हर एक के 2 ज़िक्र से मेल नहीं खाता? और अगर अगर अहदे अलस्त के समय जन्म को पहला जन्म नहीं माना जाता (जैसा कि वह अम्र था) तो हम उस समय मिली मौत को अपनी पहली मौत क्यों मानते हैं? क्या नियम एक नहीं होना चाहिए? कुरान कहता है कि हमें दो बार मौत दी गई है इसलिए बेजान होने को मौत देना नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि मौत देने या पाने के लिए ज़िंदा होना ज़रूरी है।

जवाब
Quran 2:8: How can you disbelieve in Allah when you were dead (amwātan- lifeless) and He brought you to life then He will cause you to die (yumītukum) then He will bring you back to life and then to Him you will be returned.

Quran 6:122: And is one who was dead and We gave him life and made for him light by which to walk among the people like one who is in darkness, never to emerge therefrom? 

अरबी शब्द मौत का मतलब सिर्फ़ ज़िंदा शरीर की मौत नहीं है, बल्कि इसका मतलब जन्म से पहले बिना जीवन वाली हालत भी होता है (a state without life before birth)। इसलिए अगर कोई जीवन नहीं है, तो उसे भी मौत का ही एक रूप माना जाता है यानी Death also means absence of life and Non existence also means the same.वंहा और यंहा मौत का मतलब है नींद की तरह दो मौतें, जब हमारी चेतना सो जाती है। इसका मतलब अहदे अलस्त पर जब उठाया तो वो जन्म या तखलीक नहीं थी (बल्कि अल्लाह का अम्र था यानी कुन) मगर उसके बाद जब सो गए वो असल में नींद (या मौत भी कह सकते हैं) थी.  असल में अहदे अलस्त की घटना पर हमारे जन्म (पहली बार पैदा होना) को हमारा काउंटेबल जन्म नहीं माना गया है। हमारी जान अहदे अलस्त से पहले non-existence में थी और  इसके बाद lifelessness हो गई।

शायद यही वजह है कि अल्लाह ने कुरान (67:2:) में ज़िंदगी बनाने से पहले मौत बनाने का ज़िक्र किया है और शायद यही वजह है कि कुरान (40:11) में भी अल्लाह ने 2 ज़िन्दगी से पहले 2 मौत का ज़िक्र करा है. 
Quran 67:2:He who created death and life to test you as to which of you is best in conduct...


लोगों से लिया गया 'नबियों का अहद' या नबियों से लिया गया अहद'?

Quran (3:81) [Literal meaning]: And when Allah took the covenant (of) the "Prophets" (nabiyina), certainly, whatever I have given you of the "Book (book) and Wisdom (hikmah)" then comes to you a "Messenger" (rasulun) confirming that which is with you, you must believe in him and you must help (nsurun) him. He said, Do you affirm and take on that (condition) burden (covenant)? They said, we affirm. He said, Then bear witness and I am with you among the witnesses. Then whoever turns away after that, then those they are the defiantly disobedient. 

[Sahih International]: And (recall, O People of the Scripture) when...
[Yusuf Ali & Mohsin Khan]: When Allah took the Covenant (of) the Prophets, saying...
[Shakir]: And when Allah made a covenant (through) the prophets...
[Ghamidi]: when God took a covenant (from them about) the prophets, the Law and Wisdom which I have given to you...

इस आयत की तशरीह में मुफ़स्सिरों को बेहद मुश्किल पेश आयी है। आम तौर पर इससे 'नबियों से लिया गया अहद' नहीं, बल्कि लोगों से लिया गया 'नबियों का अहद' मायने लिए जाते हैं। नबियों के ज़रिए लोगों से लिया गया वादा भी माने लिए जाते हैं।

असल में यंहा अहले किताब का ज़िक्र चल रहा है। इसलिए यंहा इससे मुराद सभी लोगों से संभवतः अहदे अल्स्त के मौके पर लिया गया वादा है कि वो पहले से मिली हुई किताब और हिकमत के तहत आने वाले रसूलों की इब्तेदा करँगे। यही वजह है पिछली आयतों में उन लोगों को आख़िरत में नतीजा भुगतने को कहा गया है जो अल्लाह वचन छोटी कीमतों के बदले बेच देते हैं।
क़ुरान (3:77): Indeed those who have exchange/sell the covenant (of) God and their oaths for a little price have no share in the hereafter...... 

मगर इस आयात के ये भी मायने किये जाते हैं:- 

कुरान (3:81) [Allama]: याद करो जब अल्लाह ने नबियों से वचन लिया था, मैंने तुम्हें जो कुछ किताब और हिकमत प्रदान की, इसके पश्चात तुम्हारे पास कोई रसूल उसकी पुष्टि करता हुआ आए, जो तुम्हारे पास मौजूद है, तो तुम अवश्य उस पर ईमान लाओगे और निश्चय ही उसकी सहायता (नुसरत) करोगे। कहा, क्या तुमने इक़रार किया? इस पर मेरी ओर से डाली हुई ज़िम्मेदारी को बोझ उठाया? उन्होंने कहा, हमने इक़रार किया। कहा, अच्छा तो गवाह रहो और मैं भी तुम्हारे साथ गवाह हूँ।
 
इससे मुराद ये ली जाती है कि हर नबी अपनी कौम का प्रतिनिधी होता है तो हर कौम रसूल की मदद करनी होगी. मगर जब हर नबी से अहद लिया तो फिर उनकी उम्मते भी तो मुहम्मद साहब तक जिंदा रहनी चाहिये थी. इसके अलावा अहदे अलस्त में मौके पर भी अल्लाह को हर इन्सान से नहीं बल्कि उनके प्रतिनिधि नबियों से अहद लेना चाहिए थे.

पर फिर सवाल ये उठता है कि अगर फिर भी कोई इसे यंहा नबियों से रसूलों के बारे में लिया गया वचन माने तो फिर इसे यूं भी समझा जा सकता है कि ये अहदे अलस्त के मौके पर लिया गया वादा है कि बाज़ नबियों के दौर में अगर अल्लाह का फैसला लिए कोई रसूल आता है तो उनकी मदद करनी है जैसे ह. याह्या के वक़्त में ईसा अलैह. और हारुन के वक़्त में मूसा का आगमन हुआ था. हम जानते हैं कि किसी कौम के पास एक ही समय में नबी और रसूल एक साथ हो सकते थे बल्कि कई रसूल भी एक साथ हो सकते थे जैसे ह.नूह के बारे में कुरान इशारा देता है. 

 

क्या कुरान 2:54 खुद को कतल करने की बात कहता है?

Quran 2:54: And remember when Musa said to his people, O my people, Verily, you have wronged yourselves by worshiping the calf. So turn in repentance to your Creator and kill (fauqtulu) yourselves (anfusakum) [meaning kill the wrongdoers among you], that will be better for you with your Lord. Then He accepted your repentance.

यहाँ इस्तेमाल किए गए वाक्यांश का मतलब सिर्फ़ आपस में (पापियों की) हत्या करना ही नहीं है, बल्कि नफ़्स का क़त्ल करना भी है. बाइबिल में इस घटना की व्याख्या इस तरह की गई है कि उन्होंने एक हाथ में तलवार ली और बछड़े को बनाने वाले 3000 मुश्रिकों को मार डाला।

Quran 4:66: If We had ordered them, Kill yourselves (kill yourselves/the innocent ones kill the guilty ones/purify your nafs) or leave your homes, very few of them would have done it but if they had done what they were told, it would have been better for them, and would have strengthened their faith.

ज़्यादातर विद्वानों ने इसे या तो खुद की जान लेने या अपनों में (पापियो को) जान से मारने के रूप में व्याख्या की है। लेकिन इसका एक रूपक अर्थ भी है यानी नफ़्स को पाक करना (आयत का संदर्भ इसकी अनुमति देता है)। ऐसा कहा जाता है कि कुछ महान सूफी विद्वानों ने इस आयत की व्याख्या नफ़्स को मारने और खुद को पाक करने के रूपक अर्थ में की है।

Quran 20:97: Musa said (to Samiri), Go away, verily, your punishment in this life will be that you will say, Touch me not (you will live alone exiled) and verily (for a future torment), you have a promise that will not fail. And look at your ilah (god), to which you have been devoted. We will certainly burn it, and scatter its particles in the sea.

सामीरी सोने का बछड़ा बनाने और लोगों को मूर्ति पूजा में गुमराह करने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार था, जब पैगंबर मूसा सिनाई पर्वत/कोहे तूर पर थे। जब मूसा वापस आए, तो -,सामीरी  को नहीं मारा गया, बल्कि उनके जीवन के बाकी समय के लिए उनका बहिष्कार कर दिया गया, हालाँकि उन्हें अल्लाह के निर्देशानुसार मार दिया जाना चाहिए था क्योंकि वह शिर्क/कुफ्र के मुख्य भड़काने वाले और आरंभकर्ता थे। इस शब्द को शाब्दिक अर्थ में लेने वाले विद्वानों का कहना है कि सामरी को मृत्यु से भी अधिक कठोर दंड बहिष्कार के रूप में मिला और इस तरह उसे सबसे बुरी जिंदगी मिली। लेकिन आमतौर पर इस्लाम में मृत्यु को सबसे बड़ी सजा माना जाता है। यानि शाब्दिक अर्थ लेने वाले उलेमा इस आयत की तावील करते हैं और अलंकारिक अर्थ लेने वाले उलेमा, इस शब्द की तावील करते हैं. 

इस समय तक, उन्हें अल्लाह की कोई किताब नहीं मिली थी, इसलिए इस समय तक, पापी लोगों को क़त्ल करना इतना न्यायसंगत नहीं लगता। हालाँकि, इस घटना से पहले और बाद में, हमेशा इस्राइली अवज्ञाकारी ही रहे थे. जब फिरौन ने उनका पीछा किया, तब उन्होंने अल्लाह की शक्ति पर संदेह किया था, हालाँकि मूसा उनके साथ थे। लाल समुद्र पार करने के बाद, उन्होंने मूसा से अपने लिए एक बुत बनाने के लिए कहा, जिस पर मूसा ने उन्हें डांटा। फिर, उन्होंने रेगिस्तान में पानी की कमी के बारे में शिकायत की, जिस पर अल्लाह ने मूसा को अपने लाठी से चट्टान पर प्रहार करने का आदेश दिया और बारह झरने फूट पड़े। जब वे रेगिस्तान में भटकते रहे और भोजन की कमी हो गई, तो उन्हें मन्ना (एक मीठा भोजन) और सलवा (बटेर जैसा पक्षी) प्रदान किया गया। फिर अल्लाह ने सब्त के दिन मछली पकड़ने से रोककर इस्राइलियों का परीक्षण किया मगर उन्होंने आदेश का उल्लंघन था। फिर वे अपने लिए लिख दी गयी बस्ती में जाने से भी पीछे हट गय जिसके बाद मूसा इस्राइलियों से अलग हो गए और उनकी मृत्यु भी अलग जगह ही हुई. फिर जोशुआ ने इस्राइलियों को उस बस्ती में पहुचांया। जोशुआ का नाम कुरान में नहीं है, लेकिन हदीस में अल्लाह के आज्ञाकारी के रूप में है। विद्वान उन्हें एक इस्लामी पैगम्बर मानते थे।

 

कुरानी आयत: अल्लाह जिसे चाहे इज़्ज़त देता है और जिसे चाहे ज़िल्लत

यह आयत बेसिकली एक दुआ सीखा रही है जिसमें ख़ुदा की बढ़ाई की जा रही है जैसे तू जिसे चाहता है ताकत देता है, जिससे चाहे छीन लेता है, जिसे चाहे इज़्ज़त देता है और जिसे चाहे ज़िल्लत देता है। दुवा के नाते ये एक जनरल बात कही जा रही है। लफ़्ज़ों से भी एहसास हो रहा है कि ये कोई रोज़मर्रा की ज़िंदगी से नहीं बल्कि इंसानी तारीख़ या आलमी सतह पर मिलने या खोने वाली सदियों तक की प्रभुत्वता या रोशनाई से है। ज़ाहिर है हुज़ूर सल्ल.का नाम दुनिया मे सबसे ऊंचे मक़ाम पर पहुँच चुका है। कोई उन पर कीचड़ तो उछाल सकता है मगर कभी पहुँच नहीं सकता। इस आयात के बैकग्राउंड में अहले किताब की बात चल रही है। इसलिए ईसा अलैह. का इनकार करने और उन्हें सूली देने की करी गयी कोशिश के बाद इस इज़्ज़त को ईसाइयों से और ज़िल्लत को यहूदियों से जोड़ कर भी देखा जाता है। 


क्या कुरान 65:4 में महावारी आने से पहले लड़कियों के साथ विवाह करने की बात कही गयी है?

Quran 65:4: Those who no longer expect menstruation among your women - if you doubt, then their period is three months, and [also for] those who have not menstruated. And for those who are pregnant, their term is until they give birth.

इस आयात पर 2 मौकिफ मिलते हैं:-

1.  इस्लाम से पहले अरबी में छोटी लड़कियों की शादी करने का रिवाज़ था. इसलिए ऐसी बहुत सी लकडियाँ इस्लाम में दाखिल हुई जिनके निकाह बालिग होने से पहले ही हो गए थे. क्योंकि कुरान सभी के लिए हिदायत देने आया था, इसलिए इसमें ऐसी लड़कियों की इद्दत के बारे में भी हुकुम है जो कम उम्र में निकाह के कारण माहवारी आने से पहले ही विधवा हो चुकी हो.

इसके अलावा हम ये भी जानते हैं कि पुराने समय में लोग अपने बच्चों को व्यस्क होने से पहले भी ब्याह देते थे और ससुराल भेज देते थे यानी उनका गौना कर देते थे, ये आज भी भारत देश, कई समाजों में होता है. ये बच्चें पूरी तरह व्यस्क न होने के बावजूद शारीरिक सम्बन्ध भी बना लेते थे. कुरान में विवाह के लिए एक उम्र बताई गयी है जो कि समझदारी की उम्र है. मगर ज़मीनी स्तर पर तब अरब और कुछ मुसलमानों में भी यही होता था कि बच्चियों की जल्दी शादियाँ करवा दी जाती थी. हालाँकि अरब में अक्सर यही रिवाज था कि लड़की को तभी ससुराल भेजा जाता था जब उसकी महावारी आना शुरू हो जाती थी या महावारी न भी पर हो शारीरिक रूप से हष्ट पुष्ट हो जाती थी. मगर फिर भी ऐसे लोग भी थे जो बच्चियों को जल्दी ससुराल भेज दिया करते थे. इसलिए ये आयत उन लड़कियों के लिए भी है जो विवाह के बाद मगर व्यस्क होने से पहले ही ससुराल चली जाती थी और वंहा उनकी महावारी आने से पहले ही वो विधवा हो जाती थी.

ये आयात उन वैवाहिक लड़कियों के बारे में नहीं है, जो गौना से पहले अपने पिता के घर पर रहते हुए महावारी आने से पहले ही विधवा हो जाती हैं क्योंकि उनके बारे में तो कुरान (33:49) ने पहले ही कहा है कि जिन्हें तुम हाथ लगाने से पहले तलाक़ दे दो तो उन पर कोई इद्दत नहीं है.

2. इस आयत की एक अच्छी व्याख्या यह भी करी गयी है कि: This is about women {word women is used here} who have left menstruating [due to old age] (but may have physical relations with their husbands) and about those {word women or girl is not used here, so the word women used in the previous sentence will be applicable and be read with this line in poetic sense} who not menstruated [not for being underage but for any other physical problem in early adult age or temporarily in later age as well] (but may have physical relations with their husbands) will have Iddat for three months, if you doubt [about their such issues]. That is why in next sentence, Iddat for women with pregnancy has been discussed.

क़ुरान में औरतों के निकाह करने के बाद और मेहर ठहराने के बाद मगर शारीरिक सम्बंध बनने से पहले आधा मेहर वापिस करने का विधान किया गया है (वो चाहे तो माफ भी कर सकते हैं)। जिनके साथ निकाह तो हुआ मगर मेहर न ठहराया गया और न ही सम्बन्ध बने, उन्हें हैसियत के मुताबिक कुछ तोहफा देने की हिदायत भी दी गयी है।

क़ुरान (4:6) ने कहा कि यतीम का ख्याल रखो जब तक वे विवाह की उम्र तक न पहुँच जाए.  
क़ुरान (12:22) ने कहा कि जवानी में पहुंचा तो हमने उसे निर्णय शक्ति और ज्ञान दिया.  

 

कुरान में आयात: पाक़ मर्दों के पाक औरतें और नापाक़ मर्दों के लिए नापक़ औरतें।

कुरान का बयान कि पाक दामन मर्दों के लिय पाक औरतें हैं, क्या ये दुनिया के बारे में है या अखिरत के बारे में? 


क़ुरान की हर आयत एक प्रसंग, संदर्भ में अवतरित हुई है। प्रंसग, संदर्भ को बगैर  निगाह में रखे हुए बाज़ आयह से आम हिदायत तो ली जा सकती हैं मगर उनकी हक़ीक़त को समझना या उनसे कोई उसूल निकालना मुश्किल हो जाता है। इस आयत के बारे में बेहद इख़्तिलाफ़ हैं। बाज़ मुफ़स्सिरों, उलेमा का मानना है कि ये आख़िरत का क़ायदा है, बाज़ का मानना है कि दुनिया में अक्सर यही उसूल दिखाई देता है (अपवाद सहित), बाज़ का मानना है कि यंहा बताया गया है कि समाजियात के हिसाब से ऐसा होना चाहिए, बाज़ का मानना है दुनिया में यही होता है (इसलिए नबी के लिए पाक दामन औरत ही होंगी), बाज़ का मानना है कि यंहा इसके मायने ये है कि अच्छे लोगों के लिए अच्छे बयान, अच्छे अल्फ़ाज़ हैं। ये सब जवाब अपनी जगह दुरुस्त हैं। ये सच है कि क़ुरान को गहराई से समझने वाले ऐसी बातें मजमुई तौर पर दुरुस्त समझ लेते हैं।

ख़ैर, ये आयतें ह. आएशा पर मुनाफिकों द्वारा लगाए इल्ज़ाम के संदर्भ में अवतरित हुई थी जिनमें लोगों पर सख्त तनक़ीद करी गयी थी, कि यूँही कुछ भी सुन कर, कुछ भी न मान लिया करो, तुमने ऐसा सुनके क्यों नहीं कह दिया कि ये सब झूठ है वगैरह वगैरह। यानी उनके किरदार पर उछाली गयी कीचड़ पर ये बात (24:26) उनकी सफाई में कही गयी थी कि खबाइस औरतों के लिए खबाइस मर्द और खबाइस मर्दों के लिए खबाइस औरतें है और तय्यब औरतों के लिए तय्यब मर्द और तय्यब मर्दों के लिए तय्यब औरतें हैं (यानी तुम्हारे नबी पाक दामन है तो उनकी जौज़ा भी पाक दामन ही होंगी)। इसलिए आयात में आगे कहा गया है कि ऐसे लोग तुम्हारी झूठ बनाई गई बातों से बिल्कुल पाक हैं।

मेरे नज़दीक यंहा ये अल्फ़ाज़ ह. आएशा की पाक दामनी को नबी की पाक दामनी से जोड़ते हुए एक दलील के तौर पर कहे गए हैं। यानी ये जुमला ह. आएशा के सम्मान और नबी के रुतबे के ऐतबार और हक़ में बयान करा गया है। यानी लोगों को ये समझाने के लिए कि आएशा पाक दामन हैं और नबी भी पाक दामन हैं तभी तुम्हारे दरम्यान दोनों अल्लाह के हकूम से एक दूसरे के लिए है और साथ साथ हैं। यानी यंहा ये असलन न तो दुनियावी उसूल के तौर पर कहा गया और न ही जन्नत के निज़ाम के बारे में। 

ये वैसे ही कहा गया है जैसे हर ज़ुबान में कोई चीज़ मजीद समझाने के लिए, कोई बात आम मायनों के साथ कह दी जाती। जैसे अगर कंही का राजा और उसकी प्रजा दोनों भले और नेकदिल हैं और कुछ बाहरी लोगों को इस पर शक़ है तो उन्हें समझाने के लिए ऐसा कहा जायेगा कि वाकई दोनों अच्छे हैं क्योंकि जैसा राजा होता है, वैसी ही प्रजा होती है या जैसी प्रजा होती है वैसा ही राजा होता है। इससे पता लग रहा है कि दोनों का रियासती संबंध है और दोनों का एक दूसरे से जुड़ी अच्छाई का संबंध है। इसी तरह अगर कंही का राजा और प्रजा दोनों ज़ालिम और बेरहम हैं तो इसी जुमले के मायने उनकी रियासत और बुराई के संबंधों को आखरी दलील के तौर पर बयान करंगे। ऐसा ही एक और जुमला है कि जैसा बाप, वैसी औलाद। ऐसे जुमले अपने संदर्भ, प्रसंग के अनुसार अच्छाई और बुराई दोनों बयान करने का माद्दा रखते हैं। ऐसे जुमले दलीलों के बाद अंत में आर्गुमेंट पूरा कर देते हैं।

क़ुरान 24:3: ज़ानी मर्द निकाह नहीं करता सिवाए ज़िनाकार या मुश्रिक अ़ौरत के और मुश्रिक या ज़िनाकार अ़ौरत निकाह नहीं करती सिवाए ज़ानी या मुश्रिक से। यह बात मोमिनों के लिये हराम कर दी गयी है। 

ये आयात भी उसी वाकये से जुड़ी हुई है और ये बात शुरवात में कही गई है। इस पर भी इख़्तिलाफ़े राय है। बाज़ का मानना है कि ये एक शरिया कानून है और ज़िनाकारों के निकाह ऐसे ही करवाने चाहिए। बाज़ कहते हैं कि ये दुनिया का एक आम चलन है। मगर मेरी समझ में यंहा भी वैसे ही बात एक दलील के तौर पर बयान करी जा रही है कि पाक दामन इंसान कभी नहीं चाहता किसी बदकार से निकाह करना और न ही करता है। यानी तुम्हारे नबी पाक है और उन्होंने निकाह भी पाक दामन औरतें से ही किये हैं। इसलिए उन पर इल्ज़ाम न लगाओ।

This is a rhetorical (वाकपुटता) and linguistic expressions used to convey logical association (not always strict legal or metaphysical rule) and is ultimately a correlation based defense of Hazrat Aisha and the Prophet.

 

क्या वाकई अल्लाह किसी नफस पर उसकी ताक़त से ज्यादा बोझ नहीं डालता?

कुरान में कहा गया है कि अल्लाह किसी भी नफस पर उसकी ताक़त से ज्यादा बोझ नहीं डालता. मगर हम देखते हैं बाज़ लोगो को ज़िन्दगी में इतनी ज्यादा तकलीफ मिलती हैं, इतनी बुरी तरह से तड़प तड़प के मौत होती है, ऐसा क्यों?

असल में कुरान में ये बात जिस्मानी या ज़िन्दगी की तकलीफों के बारे में नहीं कही गयी है  बल्कि दीन के द्वारा बन्दों पर डाले गए भोज (दीन के अहकाम) के बारे में कही गयी है. कुरान में इस बात का ज़िक्र 4 जगह किया गया है. हर आयात या आगे पीछे की आयात को मज्मुयी तौर पर देखेंगे तो समझ जायेंगे कि यंहा दीन की  हिदायतों की रौशनी में इंसान के अच्छे बुरे अमाल, उनके नताइज,  उस पर डाली गयी जिम्मेदारियों और उनके इनाम के बारे में बात चल रही है. 

Quran (2:286): Allah does not charge a soul except with that within its capacity. It will have the consequence of what good it has gained, and it will bear the consequence of what evil it has earned. Our Lord, do not impose blame upon us if we have forgotten or erred. Our Lord, and lay not upon us a burden like that which You laid upon those before us. Our Lord, and burden us not with that which we have no ability to bear. And pardon us, and forgive us, and have mercy upon us. You are our protector, so give us victory over the disbelieving people.

Quran (6:152): And do not approach the orphan's property except in a way that is best until he reaches maturity. And give full measure and weight in justice. We do not charge any soul except with that within its capacity. And when you testify, be just, even if it concerns a near relative. And the covenant of Allah fulfill. This has He instructed you that you may remember. 

Quran (7:42): But those who believed and did righteous deeds - We charge no soul except within its capacity. Those are the companions of Paradise, they will abide therein eternally. 

Quran (23:61-63): It is those who hasten to good deeds, and they outstrip others therein. And We charge no soul except with that within its capacity, and with Us is a record which speaks with truth; and they will not be wronged. But their hearts are covered with confusion over this, and they have [evil] deeds besides disbelief which they are doing. 

बाकी हर एक आयत अपने आप में एक कमाल है। मगर उसकी असल समझ उसका बैकग्राउंड से ही मिलती है। अगर हम किसी आयत का बैकग्राउंड किसी अच्छी वजह से ड्रॉप करके के, उसे कोई हिदायत निकालने की कोशिश करना पड़े तो अव्वल तो करना चाहिए और मज़बूरी हो जाये तो ये जरूरी है कि वो हिदायत इस्लाम के बेसिक्स या हिदायत में से पहले ही होनी चाहिए। हम अपने बनाये किसी मौक़िफ़ को क़ुरान की सिंगल आयत से क्वालिफाय कभी नहीं करना चाहिए, जो अक्सर उलेमा करते हैं और  फ़िर उन्हें देख कर आवाम।

 

कुरान का बयान कि पाक दामन मर्दों के लिय पाक औरतें हैं, क्या ये दुनिया के बारे में है या अखिरत के बारे में?

क़ुरान की हर आयत एक प्रसंग, संदर्भ में अवतरित हुई है। प्रंसग, संदर्भ को बगैर  निगाह में रखे हुए बाज़ आयह से आम हिदायत तो ली जा सकती हैं मगर उनकी हक़ीक़त को समझना या उनसे कोई उसूल निकालना मुश्किल हो जाता है। 

इस आयत के बारे में बेहद इख़्तिलाफ़ हैं। बाज़ मुफ़स्सिरों, उलेमा का मानना है कि ये आख़िरत का क़ायदा है, बाज़ का मानना है कि दुनिया में अक्सर यही उसूल दिखाई देता है (अपवाद सहित), बाज़ का मानना है कि यंहा बताया गया है कि समाजियात के हिसाब से ऐसा होना चाहिए, बाज़ का मानना है दुनिया में यही होता है (इसलिए नबी के लिए पाक दामन औरत ही होंगी), बाज़ का मानना है कि यंहा इसके मायने ये है कि अच्छे लोगों के लिए अच्छे बयान, अच्छे अल्फ़ाज़ हैं। ये सब जवाब अपनी जगह दुरुस्त हैं। ये सच है कि क़ुरान को गहराई से समझने वाले ऐसी बातें मजमुई तौर पर दुरुस्त समझ लेते हैं।

ख़ैर, ये आयतें ह. आएशा पर मुनाफिकों द्वारा लगाए इल्ज़ाम के संदर्भ में अवतरित हुई थी जिनमें लोगों पर सख्त तनक़ीद करी गयी थी, कि यूँही कुछ भी सुन कर, कुछ भी न मान लिया करो, तुमने ऐसा सुनके क्यों नहीं कह दिया कि ये सब झूठ है वगैरह वगैरह। यानी उनके किरदार पर उछाली गयी कीचड़ पर ये बात (24:26) उनकी सफाई में कही गयी थी कि खबाइस औरतों के लिए खबाइस मर्द और खबाइस मर्दों के लिए खबाइस औरतें है और तय्यब औरतों के लिए तय्यब मर्द और तय्यब मर्दों के लिए तय्यब औरतें हैं (यानी तुम्हारे नबी पाक दामन है तो उनकी जौज़ा भी पाक दामन ही होंगी)। इसलिए आयात में आगे कहा गया है कि ऐसे लोग तुम्हारी झूठ बनाई गई बातों से बिल्कुल पाक हैं।

मेरे नज़दीक यंहा ये अल्फ़ाज़ ह. आएशा की पाक दामनी को नबी की पाक दामनी से जोड़ते हुए एक दलील के तौर पर कहे गए हैं। यानी ये जुमला ह. आएशा के सम्मान और नबी के रुतबे के ऐतबार और हक़ में बयान करा गया है। यानी लोगों को ये समझाने के लिए कि आएशा पाक दामन हैं और नबी भी पाक दामन हैं तभी तुम्हारे दरम्यान दोनों अल्लाह के हकूम से एक दूसरे के लिए है और साथ साथ हैं। यानी यंहा ये असलन न तो दुनियावी उसूल के तौर पर कहा गया और न ही जन्नत के निज़ाम के बारे में। 

ये वैसे ही कहा गया है जैसे हर ज़ुबान में कोई चीज़ मजीद समझाने के लिए, कोई बात आम मायनों के साथ कह दी जाती। जैसे अगर कंही का राजा और उसकी प्रजा दोनों भले और नेकदिल हैं और कुछ बाहरी लोगों को इस पर शक़ है तो उन्हें समझाने के लिए ऐसा कहा जायेगा कि वाकई दोनों अच्छे हैं क्योंकि जैसा राजा होता है, वैसी ही प्रजा होती है या जैसी प्रजा होती है वैसा ही राजा होता है। इससे पता लग रहा है कि दोनों का रियासती संबंध है और दोनों का एक दूसरे से जुड़ी अच्छाई का संबंध है। इसी तरह अगर कंही का राजा और प्रजा दोनों ज़ालिम और बेरहम हैं तो इसी जुमले के मायने उनकी रियासत और बुराई के संबंधों को आखरी दलील के तौर पर बयान करंगे। ऐसा ही एक और जुमला है कि जैसा बाप, वैसी औलाद। ऐसे जुमले अपने संदर्भ, प्रसंग के अनुसार अच्छाई और बुराई दोनों बयान करने का माद्दा रखते हैं। ऐसे जुमले दलीलों के बाद अंत में आर्गुमेंट पूरा कर देते हैं।

क़ुरान 24:3: ज़ानी मर्द निकाह नहीं करता सिवाए ज़िनाकार या मुश्रिक अ़ौरत के और मुश्रिक या ज़िनाकार अ़ौरत निकाह नहीं करती सिवाए ज़ानी या मुश्रिक से। यह बात मोमिनों के लिये हराम कर दी गयी है। 

ये आयात भी उसी वाकये से जुड़ी हुई है और ये बात शुरवात में कही गई है। इस पर भी इख़्तिलाफ़े राय है। बाज़ का मानना है कि ये एक शरिया कानून है और ज़िनाकारों के निकाह ऐसे ही करवाने चाहिए। बाज़ कहते हैं कि ये दुनिया का एक आम चलन है। मगर मेरी समझ में यंहा भी वैसे ही बात एक दलील के तौर पर बयान करी जा रही है कि पाक दामन इंसान कभी नहीं चाहता किसी बदकार से निकाह करना और न ही करता है। यानी तुम्हारे नबी पाक है और उन्होंने निकाह भी पाक दामन औरतें से ही किये हैं। इसलिए उन पर इल्ज़ाम न लगाओ।

 

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हदीस: ज़कात इकठ्ठा करने वालों को तोहफें लेने की मनाही

यह एक फेमस हदीस है। ये ज़कात (जो कि एक टेक्स ही है) इकट्ठा करने वाले औहदो पर लगाये गए अफसरों को  हिदायत और मनाही है कि टेक्स पेयर से कोई भी गिफ्ट लेना जायज़ नहीं। ज़ाहिर है आज भी ऐसे गिफ्ट से टैक्स कलेक्ट करने वाले से अंडयू एडवांटेज ली जाती है जिसकी बेशुमार शक्लें हो सकती है। ऐसा करना आज भी तमाम सरकारी कर्मचारियों को मना है, क्योंकि खासकर टैक्स या एक्ससाइज कॉलेट करने वाले या ऑडिट करने वालो को ये अक्सर मिलती है, बहुत सी शक्लो में जो सरकार को पता भी नहीं चलता। गिव एंड टेक होता है। बाज़ उलेमा का ये ज़ाती मौकिफ़ है कि उन्होंने ज़कात कलेक्टर्स वाली हिदायत आम उलेमा के गिफ्ट पर भी फिट कर दी है। क्योंकि पाक में उलेमा यह काम नाजयज़ तौर पर कर भी कर रहे हैं जिसकी मिसालें आये दिन हमारे सामने आती रहती है। बाकी बिना किसी नाजयज़ एडवांटेज के बदले में दिया गया गिफ्ट अपनी ज़ात में पूरी तरफ जायज़ है। भले ही उसका मक़सद गिफ्ट पाने वाली की तवज्जो अपनी तरफ हासिल करना हो। ज़ाहिर है तवज्जों खीचनें का मक़सद भी कोई नाजायज़ काम करवाना नहीं होना चाहिए। 

 

हदीस: बच्चे के पेशाब को छिड़काव से और बच्ची के पिशाब को धो कर पाक किया जाने में क्या क्या पक्षपात है?

नबी ने दूध पीनेवाले बच्चों के पेशाब के बारे में फ़रमाया कि बच्चे के पेशाब पर पानी छिड़का जाता है और बच्ची के पेशाब को धोया जाता है। इस पर इमाम शाफ़ई ने फ़रमाया कि उसकी वजह ये है कि लड़के का पेशाब पानी और मिट्टी से है और लड़की का पेशाब गोश्त और ख़ून से है। अल्लाह ने जब आदम को पैदा किया (मिट्टी और पानी से) तो हव्वा उनकी छोटी पसली से पैदा हुई। मानो लड़के का पेशाब पानी और मिट्टी से वुजूद में आया है (जिससे आदम बने थे) और लड़की का पेशाब गोश्त और ख़ून से (जिससे हव्वा बनी थी)। फिर ईमाम शाफ़ई ने फ़रमाया कि अल्लाह इस (इल्म और समझ) से फ़ायदा दे। [माजह 525]

सबसे पहली बात यह हकूम तब तक ही है जब तक बच्चें सिर्फ या मुख्यता दूध पर निर्भर होते हैं। इस उम्र के बाद कपड़ो को पूरी तरह पाक करना ही होता है। पेशाब किसी का भी वो नापाक है मगर क्योंकि छोटे बच्चों के बार बार पिशाब करने के कारण मां-बाप, घरवालों को लिए बार बार इसे पूरी तरह से धोने वगैरह में इतना वक़्त, कोशिशें खर्च होती है कि इस दौरान उनका पूरे दिन खालिस पाक रहना लगभग नामुमकिन है जिसकी वजह से उनकी इबादतों में बड़ी कोताही आ सकती है। इसलिए अल्लाह की तरफ से यह एक रिरायत है।

लड़की और लड़के में इस भेदभाव या अन्तर के पीछे आम तौर जो कारण दिए जाते हैं, जिनमें कुछ कमी महसूस होती है, वो हैं:-

1. अरब में उस समय परिवेश ऐसा था कि लड़कों को ही अधिकतर गोदी में उठाया या लाड करा जाता था इसलिए उनके पेशाब करने के कारण बार बार धोने से बचने के लिए यह हकूम दिया गया था क्योंकि पानी की भी किल्लतें थी  (हालांकि सहाबा बच्चों में ऐसा भेदभाव नही कर सकते थे क्योंकि नबी बेटियों के मामले में बराबर का व्यवहार करने सख्त नसीहत देते थे)।

2. लड़के से अधिक लड़कियों के पेशाब में दुर्गंध होती है जिसकी वजह उनके जिस्मानी केमिकल्स, हार्मोन्स आदि हैं। (हालांकि विज्ञान अनुसार दोनों का छोटी उम्र में पेशाब समान ही होता है)।

3. बच्चे का पेशाब कम फैलता है और बच्ची का ज़्यादा। (हालांकि गोद में या नीचे कपडे पहने हुए दोनो का पेशाब बराबर फैलेगा)।

4. यह एक दुनियावी हुक्म है और उस वक़्त नबी के दुनियवी इल्म की बुनियाद पर दी गयी हिदायत है। (हालांकि यह तहारत का मसला है जो सीधा इबादतों से जुड़ा हुआ है)।

5. हदीस के सेहत में या लफ़्ज़ों में या कोई दूसरी कमी है (बिल्कुल है, मगर ज़्यादातर मुहद्दिस इसे सहीह/हसन मानते हैं)।

इस सबके मद्देनज़र यह बात समझ आती है कि ऊपर दिए गए कारणों से हटकर असल में ये हुक्म उन मौकों की वजह से दिया गया लग रहा है जब कोई बच्चा नंगा लेटे हुए या बैठे हुए या गोद में से सामने की तरफ पिशाब करता है और पूरा पिशाब जिस्म पर नही आता यानी काफी इधर, उधर गिर जाता है क्योंकि यह धारा के साथ होता। जबकि बच्चियों के केस में पेशाब नीचे की तरफ ही बहता है, चाहे वो लेटी हो या बैठी हो या गोद में हो। हम जानते हैं कि पहले के बच्चे आम तौर नंगे ही रहते थे और खासतौर पर गर्म इलाकों में जैसे अरब।

 

हदीस: नबी का एक बच्ची को देख कर उससे जवानी में शादी करने की बात कहना

Prophet Muhammad saw Um Habiba the daughter of Abbas while she was fatim (age of nursing) and he said, "If she grows up while I am still alive, I will marry her (Musnad Ahmad : 26870/ 25636)

ये रिवायत मौजूद है मगर ज़ईफ़ है सनद की बुनियाद पर। शेख अर्नौत ने भी इसे ज़ईफ़ कहा है और इसे मुहद्दिसों भी कुबूल नहीं किया है। हालांकी हदीसों की किताब में ये एक रिकॉर्ड है कि शक्ल में मौजूद है और मुहद्दिसो के नियमों के मुताबिक ज़ईफ़ ज़ीफ़ है (ना कि मौजू/झूठी)। हमारा कहना है ऐसी हदीसों को सीधा मतन की बुनियाद पर झूठा क़रार देना चाहिए था, ना कि सनदान ज़ीफ़। खैर परेशानी ये है कि गैरो और लाइलम लोगो के जैसे ये किताबो में मौजुद है जिसमें नबी और इस्लाम बदनाम होते हैं। 


हदीस: नबी का एक जंग में पेड़ कटवाना

ये एक आम उसूल है कि दरख़्त बिला वजह नहीं जंग में नहीं काटे जायँगे। न ही आम ज़िन्दगी में। पुराने ज़माने में और आज भी जंगों में अक्सर तबाही मचाने के लिए फौजे पेड़, फसलों, घरों में आग लगा देते थे। मगर आज भी सरकारें, फौजें ज़रूरत पड़ने पर पेड़ों की काटने की इजाज़त देते हैं।

बनू नादिर के यहूदियों ने मुसलमानों से धोखबाज़ी करी थी, इसलिए उन पर हमला किया गया था। उनके किले के चारो ओर पेड़ उनकी सहुलतों, नेमतों, शान का हिस्सा थे। वो बाहर नहीं आ रहे थे। मुसलमानों ने घेरवा कर रखा था। इन्हें काटा जाना जरूरी था ताकि उनके दिलों में रौब पैदा हो सके, उन्हें हराया जा सके। जंग होने पर ये पेड़ मुसलमानों के लिए परेशानी बनने वाले थे। मुसलमानों को जंग के लिए खुली जगह भी चाहिए थी।

मगर सहाबा को ये शक था कि अगर उन्हें इन्हें काटा तो उन्हें इसका गुनाह मिलेगा, इसलिए काटे या नहीं। फिर अल्लाह का हुकुम आया जो क़ुरान में मौजूद है।  क़ुरान ( 59 : 5 ) जो खजूर के वृक्ष तुमने काटे या जिनको जड़ों सहित खड़ा छोड़ दिया, वह अल्लाह की अनुमति से तुमने ऐसा किया। ताकि वह अत्याचारियों को अपमानित करे। 

 

अकेले नमाज़ नहीं पढने पर हदीस

ये हदीस कमज़ोर है. बहुत बाद में जाके इसे हसन करार दिया गया है। इसके अलावा, इसकी पृष्ठभूमि के कारण यह व्याख्या का विषय है। आम तौर पर, हर बार अकेले नमाज पढ़ने से शैतान हम पर पर वाकई गालिब आ जाता तो इस्लाम में अकेले नमाज अदायगी मना कर दी गयी होती मगर ऐसा नहीं किया गया है. हदीस में देहात और सेहरा का ज़िक्र आया है, साथ ही भेड़िये के हमले का. शायद किसी सफर की बात हो रही है और इसलिए एक साथ रहना जरूरी है. साथ ही सफर सही से कट जाए, इसके लिए साथ मिलकर काम करना ज़रूरी है, इख्तिलाफ कम करते हुए. ताकी शैतान दिमागों में वसवसे डाल कर मुसाफिर में नइत्तेफाकी न पेदा कर पाए। यानी इसी तरहनैत्तेफ़ाकी या अलाहिदगी पेदा न हो। अगर ऐसा कोई बुराई पैदा नहीं हो रही और अच्छी वजुहांत के चलते नमाज़ अकेले पढ़ी जा सकती है. अगर ये भी मान ले कि कंही 3 लोग ही रह रहे हैं और ये सफर को बात नहीं है तो उनके लिए भी एकजुट हो कर रहना जरूरी है। बाकी अगर ऐसे हालत पैदा हो गए (जरूरत या मजबूरी) कि जमात बनने से नुकसान हो रहा है, नाइत्तेफाकी पैदा हो रही है तो फिर जमात नहीं बनेगी, यही इस्लाम का हुकुम है जैसे ह. हारुन ने गाय की इबादत होने दी थी सिर्फ इसलिए कि वंहा इज्राईलीयों में फिरके बनने जा रहे थे। 

 

झन्डे तले जंग

बेहद ही घटिया और गलत अनुवाद है। गलत रिजल्ट निकल रहा है। ऊपर से हदीस का कॉन्टेक्स्ट वाज़ेह नहीं हो रहा कि किन हालतों में ऐसा कहा गया था। हालांकि अंदेशा यही है कि उन जंगों की बात है जो कबीलों और खानदानों के बीच लड़ी जाती थी जिसके पीछे कोई भी अल्लाह के हुकुमों से सम्बंध नहीं होता था। अल्लाह के हुकुमों में से एक हकूम अमन, इंसाफ और अपना खूद का चूना हुआ निज़ाम कायम करना है। इसलिए जब भी कोई दुसरा मुल्क आपके मुल्क पर लड़ाई छेड़ कर अमन बिगाड़ेगा, या न्याय और रिसोर्सेज खुद के हाथ मे लेने की कोशिश करेगा या अपना चुना हुआ निज़ाम या हुकूमत थोपने की कोशिश करेगा वैगरह तो अपने मुल्क के झंडे के तहत उससे जंग जायज़ होगी और लड़ी जायगी और लड़ने वालों की वही हैसियत और इज़्ज़त होगी जो आज भी दुनिया में आम है। इसलिए इस हदीस को मुल्कों की ऐसी जंगों से जोड़ना गलत है। 

 

अंसार द्वारा अपनी बीवियों को तलाक देके उनके निकाह मुहजिरिन से करवाना

मक्का के मुसलमान जब अपना सब कुछ छोड़ कर हिजरत करके मदीना पहुँचे थे तो नबी ने मुसलमानों को एक क़ौम की तरह खड़ा करने और एक दूसरे पर बोझ न बन जाने के मक़सद से लोगों को एक दूसरे का भाई बना कर बंधन में बांध दिया था। यानी एक अंसार को एक मुहाजिर की ज़िम्मेदारी दे दी गई थी। ये तकरीबन 45 जोड़ीदार थे। अंसार ने अपने भाई मुहाजिरों के लिए सारे इंतज़ाम किये जैसे रहना, खाना वगैरह। अंसार आगे बढ़ बढ़ कर अपनी और से हर तरह की मदद, माल, जायदात मुहजीरिन के सामने पेश करते थे। ये उनके जज़्बात, क़ुरबानीया थी। ऐसा कहा जाता है कि ऐसे अंसार जिनकी कई बीवियां थी, उन्होंने अपनी किसी बीवी को तलाक दे कर उनके निकाह अपने मुहजीरिन भाई से करवाई। हम जानते हैं कि उस वक़्त के अरबी कबिलियायी माहौल में बार बार निकाह-तलाक होना बेहद सामान्य बात थी, हमारे कल्चर, सोच की तरह नहीं था। जैसे भारत में कई राज्यों में चादर डालना प्रथा है जिसमें जेठ की मृत्यु होने पर उसकी विधवा की देवर से शादी करवा दी जाती है या देवर की मृत्यु पर जेठ से शादी। इस प्रथा से अनजान लोगों के लिए ये बेहद अजीब बात है। मगर यंहा एक सामाजिक रीत है। दोनों की सख्त नापसंदगी के बावजूद इसे करना पड़ता है। इसी तरह अरब में कई शादियां - तलाक सामाजिक रीत है. मगर वाकई किसी ने अपनी बीवी को तलाक देकर उसकी दुसरे से शादी करवाई, ये बात कंही से साबित नहीं होती है। किसी भी अंसार ने मुहाजिर से अपनी बीवी का निकाह नहीं करवाया था। सिर्फ एक हदीस में ऐसा ऑफर मिलता है और वो भी जो सिर्फ एक सहाबी द्वारा किया गया था (हदीस के मतन पर चर्चा हो सकती है)। मगर ये सिर्फ ऑफर था, जिसे सामने वाले सहाबी ने रद्द कर दिया था। बुखारी (3780, 3781, 5167) की रिवायत में ह. साद बिन अर-रबी, ह. अब्दुर रहमान बिन औफ़ के सामने ये पेशकश करते हैं कि मैं यंहा सबसे धनी व्यक्ति हूँ, मैं तुम्हें अपनी आधी जायदात दूंगा और मेरी दो बीवियां हैं, तुम जिससे चाहो निकाह कर सकते हो, मैं उसे तलाक दे दूंगा। इस पर ह. औफ़ ने फरमाया कि अल्लाह तुम्हारी, तुम्हारे परिवार, तुम्हारी बीवियों की, तुम्हारी जायदात की हिफाज़त करे, बरकत दे (यानी उन्हें ये सब नहीं चाहिए)। उन्होंने आगे कहा कि बस ये बता दो की यंहा बाजार कंहा है। उन्होंने उन्हें बाज़ार का पता बात दिया। वो उस दिन बाज़ार गए और कुछ सामान कमा कर लाएं (बार्टर सिस्टम से)। फिर वो कई दिन तक तिजारत करने बाज़ार जाते रहे। फिर एक दिन वो नबी के सामने आये तो उन्होंने कलर्ड खुशबू लगा रखी थी। नबी ने पूछा तो बताया कि उन्होंने एक अंसारन से शादी कर ली है (ज़ाहिर है ये औरत ह. साद बिन अर-रबी की बीवी नहीं थी)। नबी ने पूछा कि मेहर कितना दिया तो उन्होंने बताया फला फला चीज़। नबी ने कहा फिर वलीमा भी करो (यानी तब तक उन्होंने काफी माल कमा लिया था जिसकी बुनियाद पर उनका निकाह भी आराम से एक औरत से हो गया था)। 

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दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...