संस्कृत
यह बात सत्य है कि संस्कृत भाषा के सभी प्राचीनतम आर्कियोलॉजिकल एविडेन्स और इंस्क्रिप्शन, ईसा (1 cent. AD) के आसपास के हैं और बुद्ध (6 cent. BC) के काफी समय बाद के। पर जो लोग यह भ्रम फैलाते हैं कि संस्कृत प्राचीनतम भाषा नहीं है, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि संस्कृत एक प्रचिनतम भाषा है, भले ही इसके बेहद पुरातात्विक प्रमाण अभी न मिल रहे हो। क्योंकि इराक, सीरिया, टर्की में 1500 BC काल में मितन्नी जैसे कई वंश हुए हैं जिनके राजाओं के नाम इसी भाषा में मिलते हैं जैसे पुरुष, सुबंधु आदि। अब यंहा से संस्कृत भाषा वंहा गयी या वंहा से यंहा आयी, ये एक भिन्न प्रश्न है।
ऋग्वेद की संस्कृत और पारसीयों की जेंद अवेस्ता की अवेस्तन भाषा में समानता के कारण, दोनों का काल ईसा से 1500 से 2000 साल पूर्व कहा जाता है। भाषाविद्व कहते हैं कि अवेस्ता से 400 से अधिक शब्द ऋग्वेद में लिए गए हैं। इसका काल, इनकी भाषा और घटनाओं के आधार पर फिक्स किया गया है। संस्कृत ऋग्वेद से होती हुई अन्य तीन वेदों में सरल होती गयी है और इस तरह से वैदिक संस्कृत और आधुनिक संस्कृत में बहुत अंतर आ चुका है। हर पुरानी भाषा के साथ ऐसा ही होता है।
संस्कृत के पुरातात्विक सबूत इसलिय कम मिलते हैं क्योंकि उत्तरवैदिक काल से, इस पर एक विशेष वर्ग अर्थात ब्राह्मणों ने नियंत्रण रखना शुरू कर दिया जिससे यह खत्म होती चली गई। क्योंकि संस्कृत में धर्मग्रन्थ होने पर इसका महत्व अधिक धार्मिक होता गया और अन्य वर्गों विशेषतः शूद्रों द्वारा इसके मंत्र उच्चारण, पाठ, सीखने पर पाबंदी और दण्ड लगाते चले गए।
संस्कृत भाषा एक आम भाषा से होते हुए समय के साथ साथ उच्च वर्ग की भाषा हो गई या यूं कह सकते है कि संस्कृत बोलने वाले, वर्चस्ववादी वर्ग के हो गए। फ़ारसी ज़ुबान के साथ भी बाद में यही हुआ था। जब फ़ारसी बोलने वाले, हुक्मरान बने तो सरकारी ज़ुबान फ़ारसी हो गयी। पर लोगों की ज़ुबान स्थानीय ही रही और इसलिए वो भाषाएं बाकी रही। बाद में फ़ारसी और देवनागरी की मिलावट से उर्दू की पैदाइश हुई और फ़ारसी यंहा से खत्म होती चली गयी।
रामायण
सबसे पहले असल में राम शब्द, ईश्वर का एक नाम था जिसका अर्थ होता है सबसे सुंदर। पर बाद में ये विष्णु के नाम के लिए भी प्रयोग होने लगा क्योंकि विष्णु को भी ईश्वर की एक विशेषता की बजाए एक अलग अस्तित्व और ईश्वर के समतुल्य माना जाने लगा था। इसी तरह राम को विष्णु का अवतार भी माना जाने लगा। फिर आम लोग भी यही नाम या इस पर आधारित नाम रखने लग गए थे जैसे आज भी लोग रखते है। श्रीराम का असली नाम रामचंद्र था यानी राम का चन्द्र हैं। असल मे उनका नाम ईश्वर के एक भक्त के रूप में रखा गया था।
वेदो में राम शब्द दो बार आया है जो किसी अन्य व्यक्ति और राजा के नाम है। वेदों में सीता शब्द भी आया है पर वंहा इसका अर्थ खेती है, न कि एक स्त्री का नाम है। वेदो में इक्षवाकु (रामचन्द्र के पूर्वज) शब्द आया है पर उन अर्थो में नहीं जो रामायण में है। वाल्मिकी का भी उपनिषदों और पुराणों में कंही उल्लेख नही है।
सबसे पहले श्रीराम का उल्लेख साहित्यिक तौर पर बुद्ध की दंतकथाओं यानी जातक कथाओं (4 cent. BC or older) की दशरथ कथा में आता है। जिसने श्री राम की कहानी बेहद सादे अंदाज़ में बताई गई है जिसमे वह सिर्फ एक साधारण मानव हैं और पिता के कारण वनवास काटकर आते हैं और फिर एक अच्छे राजा बनकर राजपाट चलाते है। इस कथा में राम, लक्ष्मण और सीता तीनों भाई-बहन हैं और रावण का पात्र नहीं है। कहानी के अंत में बुद्ध इस राम को अपना पूर्व जन्म बताते है। इस कहानी को बाद में भरहूत स्तूप पर (2 cent. BC) और दूसरी जगह (नागार्जुन कोंडा और सांची आदि) भी उकेरा गया। स्पष्ठ है कि वाल्मीकि की रामायण से पहले यही राम कथा अधिक प्रचलित थी और संभवतः इसी की प्रेणना से रामायण लिखी गई। इस पर विद्वानों की दोनों राय मिलती है यानी पहली कि दशरथ कथा से प्रेरणा लेके रामायण लिखी गयी और दूसरी कि रामायण का ही एक संक्षिप्त संस्करण दशरथ कथा है। मूलतः रामायण एक बायोग्राफी ही है।
असल में प्राचीन काल से ही रामचंद्र की कथा अलग अलग वर्ज़न में बहती चली आ रही थी और आगे भी जारी रही इसकिये आज भारत और साउथ ईस्ट एशिया में ऐसी कथाओं की भरमार है। आज ऐसे लगभग 300 से अधिक रामायण के संस्करण है और 1000 से अधिक रामकथा के। किसी में लक्षमण रावण का वध करता है तो किसी मे लक्षमण हीरो है। किसी मे रावण हीरो है तो किसी में सीता रावण के बेटी है। जैनियों की भी रामायण पौमचरित के नाम से (1 cent. AD) में लिखी गयी जिसे बाद में 7वीं सदी में पदमपुराण या पदमचरित के नाम रिवाइज्ड किया गया और बाद में भी कई वर्ज़न आये। इन सभी मे अंतर पाया जाता है। जैनियों की अपनी महाभरत भी है जिसका नाम है पांडव पुराण। सबसे बड़ा प्रमाण ये है कि रामायण के जितने भी प्रकरण विश्व भर में मिलते है, सभी के सभी ईसा काल के बाद है। अगर रमायण हज़ारों वर्षों पुरानी होती तो इसके विभिन्न भाषाओं में प्रकरण हज़ारों साल पुराने भी मिलते।
यानी राम बुद्ध से बहुत पहले हुए थे और विभिन्न प्रकार की रामकथा भी बुद्ध से पहले ही दंतकथाओं में भी चली आ रही थी जिनमें सिर्फ बुद्धिस्ट वर्ज़न के ठोस प्रमाण उपलब्ध है। वाल्मीकि की रामायण, बुद्ध के बाद लिखी गई जिसमे काल्पनिक इवेंट्स और अतिशयोक्ति की भरमार है। वाल्मीकि रामायण में ही बुद्ध और उनके अनुयायियों के ज़िक्र आता है:-
● यथा हि चोरः स, तथा ही बुद्ध स्तथागतं। नास्तिक मंत्र विद्धि तस्माद्धि यः शक्यतमः प्रजानाम् स नास्तिकेनाभिमुखो बुद्धः स्यातम् ।।
(वाल्मीकी रामायण: अयोध्याकांड, सर्ग -109, श्लोक: 34)
अर्थात जैसे चोर दंडनीय होता है, इसी प्रकार बुद्ध और उनके नास्तिक अनुयायी भी दंडनीय है।
यास्क मुनि (6 cent. BC) द्वारा रचित प्राचीन शब्दकोश और व्याकरण ग्रन्थ जैसे निघण्टु और निरुक्त में रामायण या उसकी ग्रामर के बारे में एक शब्द नही है। संस्कृत ग्रामर पर आज तक कि सबसे प्रमाणिक किताब पाणिनि द्वारा लिखित अष्टाध्यायी (4 cent. BC) में महाभारत, वासुदेव, अर्जुन जैसे शब्दों पर तो टिप्पणियां मिलती है पर रामायण पर कुछ नहीं मिलता। पंतजलि (2nd cent. BC) ने पाणिनि पर एक कमेंटरी, महाभाष्य (संस्कृत ग्रामर विषय पर) लिखा और वो भी रामायण और उसके शब्दो के ज़िक्र से खाली है। हालांकि वाल्मीकि रामायण में श्री कृष्ण शब्द उल्लेख मिल जाता है जो इस बात का प्रमाण है कि महाभारत काल के बाद रामायण लिखी गयी।
● हे
रामचन्द्र, आप अंतर्यामी पुरुष और पुरुषोत्तम हो, आप ही विष्णु
और आप ही महाबली कृष्ण हो।
(वाल्मीकि रामायण 6.117.15)
इसी तरह रामायण में चैत्य शब्द भी कई स्थानों पर आता है और बौद्ध मंदिरों को चैत्य कहते हैं। एक समय में सनातन धर्म बौद्ध और जैन धर्म का घोर विरोधी रहा है और इन धर्म से संबंधित चीजों को नीचा दिखाने के लिए हिन्दू ग्रंथो में काफी कुछ लिखा गया है।
● भूमिगृहांशचैत्यगृहान उत्पतन निपतंश्चापि।
( सुंदर कांड , सर्ग 12, श्लोक 15 )
अर्थात हनुमान भूमिगृहों और चैत्यों पर उछलते कूदते हुए जाते हैं।
इसके अलावा लंका में रावण की बनाई अशोक वाटिका को सभी जानते हैं, जिसका उल्लेख रामायण में है। बौद्ध होने के बाद सम्राट अशोक (3सरी सदी ई.पु.) ने लंका में अपने पुत्र और पुत्री को भेजकर बुद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करवाया था और लंका को बुद्धमय कर दिया था। इसी कारण यंहा किसी स्थान का नाम अशोक के नाप पड़ा होगा या फिर अशोक के नाम से लंका वासियों ने जोड़ा होगा। और अगर इस नाम की कोई जगह नहीं थी और ये केवल वाल्मीकि की कल्पना मात्र थी तो वाल्मीकि द्वारा सनातन धर्म के किसी नाम की बजाय अशोक के नाम पर वाटिका का नाम रखना यही संकेत करता है कि उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रतीकों के वके प्रति दुर्भावना से यह नाम रखा हो क्योंको सनातन और बौद्ध धर्मों की आपस प्रतिस्पर्धा इस काल में सामान्य बात थी।
● तत्र लङ्कां समासाद्य पुरीं रावणपालिताम् ।
ददर्श सीतां ध्यायन्तीमशोकवनिकां गताम् ॥ ७३ ॥
वहाँ रावणपालित लङ्कापुरी में पहुँचकर, उन्होंने अशोक वाटिका में सीता को चिन्तामग्न देखा।
(बालकांड प्रथम सर्ग)
रामकथा का स्रोत लोकजीवन ही है। वाल्मीकि ने अपनी महाकाव्य रचना, रामायण, लोक में प्रचलित रामकथा को आधार बनाकर ही रची। राम की कथा लोकगाथाओं, वाचिक परंपराओं और लोकमानस में पहले से ही विद्यमान थी। वाल्मीकि ने इन कथाओं को संगठित और काव्यात्मक रूप देकर रामायण की रचना की। इसका संदर्भ रामायण बालकांड में भी मौजूद है:-
● आदिकवि वाल्मीकि ने नारद से प्रश्न किया - कोsन्वस्मिन्सांप्रतं लोके बलवान्कश्च वीर्यवान्? नारद ने उत्तर दिया - इक्ष्वाकुवंश प्रभवो रामो नाम जनै: श्रुत:।
वाल्मीकि ने जब नारद से पूछा कि इस संसार में सबसे श्रेष्ठ और आदर्श पुरुष कौन है, तब नारद ने राम के गुणों का वर्णन किया और कहा कि राम का नाम लोक में पहले से प्रचलित है। नारद के शब्द "रामो नाम जनैः श्रुतः" का अर्थ यही है कि रामकथा पहले से लोक में अनुश्रुति (श्रुति परंपरा) के माध्यम से सुनाई और गाई जाती थी।
हालांकि आम तौर पर यही माना जाता है कि रामायण हज़ारों वर्ष पूर्व लिखी गयी जबकि बहुत से निष्पक्ष विद्वान मानते हैं कि रामयण में समय के साथ साथ श्लोकों में बढ़ोतरी होती गयी।
वाल्मीकि की रामायण का डिक्शन, स्टाइल और अश्वघोष (1 cent. AD) की बुद्धचरित की शैली एक जैसी ही है। बुद्धचरित में अश्वघोष, रामायण की ग्रामर और वोकेबलरी पर बात करता है और वाल्मीकि की समकालीन लेखकों से तुलना भी करता है। यानी या तो वाल्मीकि अश्वघोष के समकालीन रहे है या कुछ ही वर्ष पहले। असल मे रामायण की प्रसिद्धता देख कर ही बुद्धचरित लिखी गयी थी। सनातम धर्म के रामचरित के सामने बौद्धधर्म का बुद्धचरित लिखा गया, संस्कृत में और टक्कर देने के लिए, बुद्धचरित में भी बहुत काल्पनिक इवेंट्स और अतिशयोक्तियां बुद्ध के जीवन से जोड़े गए, जिसके खिलाफ स्वयं बुद्ध उपदेश देके गए थे।
यंहा तक कि सुंदर कांड, सर्ग 9 से 13 तक में रावण के अंतःपुर के रात्रिकालीन दृश्य का चित्रण है जो अश्वघोष रचित बुद्धचरितम ( 5/57-61) के गोतम के अंत पुर के दृश्य का अनुकरण है जो की बुद्ध आख्यान का आवश्यक अंग है जबकि वाल्मीकि रामायण का अनावश्यक।
श्री अरबिंदो ने राम और रामायण पर कहा है कि "राम को ऐतिहासिक मानने का कोई आधार उपलब्ध नहीं है। वानरों की सेना जैसी बात विश्वसनीय नहीं है। वाल्मीकि ने ये सब या तो पम्परा लिया होगा या कल्पनाशीलता से या किसी दैविक संसार से। और ऐसी पत्रों को गढ़ा होगा। कुछ का ये मानना है कि वाल्मीकि से पूर्व भी रामायण रही है।"
देवदत्त पटनायक ने वाल्मीकि रामायण को पौराणिक यूनानी महाकाव्य से प्रेरित हो सकने की आशंका ये कहके जताई है की "कुछ विद्वानों ने महाकाव्य इल्लियाड और महाकाव्य रामायण में बहुत सी समानताएं पाई है। दोनों ही महाकाव्यों का अंत दुःखद है क्योंकि इनके विजेता अन्ततः प्रसन्न नही थे। ट्रोजन युध्द और लंका युध्द के पीछे का कारण भी समान है (यानी दोनो युद्दों के केंद्र में स्त्री है)। भारतीय पौराणिक कथाओं में सुखद अंत होना एक अनिवार्य गुण होता था जैसा की पांचवी सदी ईसा पूर्व में भारतमुनि द्वारा लिखे गया ग्रन्थ नाट्यशास्त्र से भी विदित है जो भारतीय उपमहाद्वीप की रंगकलाओं से संबंधित एक महाग्रंथ है। हालांकि रामायण का अंत सुखद न होकर दुखद होना यही दर्शाता है की यूनानी महाकाव्य रामायण का प्रेरणा स्रोत हो सकता है।"
रोड्स (Rhodes) में बनी 610 ईसापूर्व के काल की एक प्लेट पाई गई है जिस पर इल्लियाड का चित्र अंकित है। जबकि रामायण कथा के साक्ष्य इसके उपरांत के है। रामायण पर सबसे पुरानी इंस्क्रिप्शन गिरनार (2 cent. AD) अभिलेख पर मिली है। और रामायण की सबसे पुरानी मैनुस्क्रिप्ट 11 वी सदी की है। इससे यही बात स्पष्ट होती है कि सदियों से परम्परा में चली आ रही रामकथा के इर्दगिर्द यूनानी काव्य से प्रभावित होकर रामायण लिखी गयी।
राम, रामयण और यूनानी पौराणिक कथाओं में और भी कई अन्य समानता मिलती हैं। अब्राहम और राम कथा में भी अनेकों समानता है जिस पर डॉक्टर भारत झुनझुनवाला कैसे कुछ विद्वान काफी कुछ लिख चुके हैं।
निष्कर्ष ये है कि समकालीन साक्ष्यों, वाल्मीकि रामायण कि भाषा शैली, कंटेंट व इतिहास आदि से यह पता लगता है कि उसे बुद्ध (6 cent. BC) के बाद लिखा गया। इसीलिए बड़े हिस्टोरियनस का यही मानना है कि वाल्मीकि रामायण 3 cent. BC के बाद लिखा गया है।
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दर्शन
के ग्रंथों (न्याय दर्शन, मीमांसा दर्शन आदि) में रामायण और महाभारत के
चरित्रों का उल्लेख है जैसे ब्रह्मसूत्र में राम, हनुमान और योग दर्शन में
कृष्ण का।
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हालाँकि मितानी साम्राज्य के लोगों की संस्कृति और भाषा हिटाइट या हुर्रित (Hurrian) भाषा से जुड़ी थी, न कि संस्कृत से। मितानी साम्राज्य में संस्कृत या वैदिक संस्कृति के प्रभाव हैं. ऐसा माना जाता है कि आर्य-वंशीय लोग जिन्होंने सिंधु-सप्त सिंधु (Indus Valley) क्षेत्र और उत्तर भारत में संस्कृत भाषा और संस्कृति को स्थापित किया, उनके साथ संपर्क के कारण संस्कृत या संस्कृत जैसी भाषाएँ मध्य एशिया में पनपीं। हालांकि, हुर्रित संस्कृति और भाषा में भारतीय प्रभाव का पता नहीं चला है, लेकिन यह संभव है कि आर्य प्रवासी संस्कृत भाषा या उनके धार्मिक प्रभाव से परिचित थे, और इसलिए उनके नामों में संस्कृत के तत्व थे।
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Adam’s Bridge is made mainly of coral reefs, limestone shoals, calcareous sandstone and shell fragments — all marine carbonate materials arranged in layers, formed between about 18,000 and 3,500 years ago from the oldest to the youngest parts.
Treta Yuga lasted 12,96,000 years (Arya Samaj also believed this to be hid period). However, generally, Shri Ram's life is traditionally placed around 5000-7000 years ago by some scholars/historians. Moreover, Shri Krishna is also believed to be lived in the same period by many Hindu scholars. It clearly seems that all the assumptions and no concrete evidence can be presented to prove it with authenticity.
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