स्वामी जी से पहले किसी का भी वेद भाष्य स्वामी जी जैसा एकेश्वरवादी नहीं है यानि एकेश्वरवाद था मगर दयानंदी जी जैसा नहीं. क्योंकि इन्होने वेदों को सृष्टि के आरंभ (1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 53 हज़ार वर्ष पूर्व) में माना है सो उनमें इतिहास होना नहीं माना है इसलिए इन्होने वेदों में आये सूर्य, चन्द्र, पुरुष, दादा जैसे नामों को ईश्वर का नाम बताया है. वैसे पृथ्वी 4 अरब साल फर्स्टस सिंपल लाइफ हुई थी और 23 करोड़ साल पहले डायनासौर और महज़ 25 लाख साल पहले पहली इंसानी प्रजाति और 3 लाख साल पहले होमोसेपीयंस.
इनके मुताबिक वेदों का अवतरण सृष्टि के आरंभ में अग्नि, वायु, आदित्य, और अंगिरा (जो पता नहीं कंहा आये और ईश्वर के माध्यम बन गए) नामक चार ऋषियों (सभी पुरुष, कोई स्त्री नहीं।) के माध्यम से हुआ, समाधिस्थ अवस्था में आत्मा में प्रेरणा से (इनके समय में अन्य अमैथूनी जन्मे मनुष्य भी थे).
■ ब्रह्मा एक निराकर अखंड सत्ता है जिसका अर्थ है बड़ा। इसके जिस 4th भाग में प्रकृति समाई है उसे या उसके शासनकार को ईश्वर कहते है और शेष जगह वह ब्रह्म होता हैं। वेदों में जहां तत शब्द आया है वह ब्रह्म के लिए है क्योंकि ब्रह्म शब्द नपुंसक लिंग है और जंहा जंहा स: शब्द आया है वो ईश्वर के लिए है क्योंकि ईश्वर का पुल्लिंग होता है। ब्रह्मा की उपासना नहीं हो सकती क्योंकि वो प्रकरीबसे बाहर है और जीवात्मा की सीमा प्रकृति तक है यानी ईश्वर तक।
■ ईश्वर निर्गुण नहीं बल्कि सगुण होता है। प्रकृति के 3 तत्व सत्व, रज, तम में से ईश्वर केवल सत्त्व को धारण करता है जिससे उसमे दयालुता, न्यायकारिता, सर्वशक्तिमत्तता आदि पैदा होते है। ब्रह्मा गुण रहित यानी निर्गुण है जिसमे 3 तत्त्व नहीं होते इसलिय उसकी उपासना नही हो सकती क्योंकि वह उसका उत्तर नहीं देता। ब्रह्म सगुण निर्गुण व निराकर है और इसलिए ईश्वर भी निराकर है।
■ प्रकृति के 3 तत्व या गुण है , सत्व, रज, तम जिन्हें इलेक्ट्रान, प्रोटोन, न्यूट्रॉन कहा जाता है।
3 अनादि तत्व है, ईश्वर, जीव (दोनों चेतन-ज्ञान सहित), प्रकृति (जड़-ज्ञान रहित). या यूं कहें कि परमात्म, आत्मा, प्रकृति 3 अनादि तत्व है। आत्मा और परमात्मा चेतन और नित्य है। यानी ब्रह्म, जीव और प्रकृति 3 अनादि तत्व है और तीनों अलग है। परमात्मा, जीव, आत्मा भी अलग है।
ईश्वर सत या चत (सत्य), चित्त (चेतन), आनन्दस्वरूप (हमेशा आनंदित) है और इसलिए सच्चिदानंदस्वरूप है।
जीव और ईश्वर दोनों पुरुष है। कोई बंधन न होने के कारण ईश्वर, पुरूष विशेष है। सबकी आत्मा होने से परमात्मा कहलाया।
सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु उसके सगुण है। इनकी उपासना सगुण उपासना है। निराकार, अजन्मा अन्नत, अनादि उसके निर्गुण है। इनकी उपासना निर्गुण उपासना है। ईश्वर निर्गुण सगुण दोनों है पर इन अर्थों में।
उसके गुणों की प्रशंसा सगुण स्तुति है और जिन गुणों से वह रहित है उसकी प्रशंसा निर्गुण स्तुति है।
मत खण्डन
■ एक तरफ आर्य समाजी कहते है कि ईश्वर सर्वव्यापक होने से वह मूर्ति के भीतर भी विद्यमान है परन्तु मूर्तिपूजा में नहीं है।
दूसरी तरफ वो कहते है कि आत्मा परमात्मा का अंश नहीं है वरना उसमे भी परमात्मा के गुण होने चाहिए थे पर वह हमेशा आनंदित नही होती है। हम परमात्मा के अंश नहीं है वरना प्रत्येक कर्म का फल अच्छा होता। यदि हम ईश्वर के अंश है तो फिर उपासना किस की करते।
प्रकृति का सृजन आरम्भ होने पर उसका प्रथन तत्व महत्त्व के रूप में प्रकट होता है जिसे बुद्धि कहा जाता है। इसी से अहंकार यानी अपने अस्तित्व का ज्ञान (मैं और मेरा अस्तिव है) होता है। इसे जब परमात्मा धारण करता है तब ईश्वर कहलाया जाता है। वह कहता है कि मैं अकेला हूँ और बहुतों में बदल जाऊं। तब सृष्टि रचना आरम्भ होती है। महतत्व के अंश से ही प्राणियों के चित्तो (बुद्धियों) की रचना होती है।
सवाल यंहा यह है कि वो सर्व्यापक है तो आत्मा और जीव में क्यों नहीं है।
■ आम हिन्दू वेद को परमात्मा की वाणी मानते है पर गीता को भी ईश्ववानी मानते है। पुराणों को भी ईश्वज्ञान मानते है। आम हिन्दू या सनातनी तो वेदो में एकेश्वरवाद भी नहीं मानता। देवताओं को मानता है। क्या ये सब मत धर्म संगत है? उवट, सायण, महीधर और श्रीराम शर्मा आदि के भाष्य या यूं कहें कि लगभग सभी नॉन आर्य समाजी भाष्यों और स्वामी दयानंद सरस्वती के वेद भाष्यों में सबसे बड़ा अंतर बहुदेववाद या देवतावाद और एकेश्वरवाद का है। स्वामी जी से पहले किसी का भी वेद भाष्य एकेश्वरवाद पर नहीं है। तो फिर इसका अर्थ यही हो सकता है कि बाकी सभी के भाष्य सही है, केवल स्वामी जी का गलत है जबकि वो निघण्टु और निरुक्त पर आधारित है।
■ It is said that Arya Samaj was launched to prevent Hindus from accepting Islam/Christianity. Swami Dayanand is still called as Christian agent due to his involvement with Christian organisations and forcing doctrine of one God on Hindus. Raja Ram Mohan and Brahmo Samaj were all inclined towards tauheed. However their concept of God was different. Brhamo Samaj did not believe in Personal God. Before Dayanad Sarswati, all the hindu scholars used to take all the attributes of GOD as diffrent figures. Then he came with the idea that they are the names of different qualities of God. People didn't like it and they still do not accept it that is why Arya Samajis is still a very small sect compared to others.
He has translated many names such as Sun, Moon, Purush, Dada and many more as God's name. These names may be interpolation which we as a Muslim can easily discard because we know that vedas have got polluted. We as Muslim can belive that names like Brahamma Vishnu Mahesh may be of God but not every name.
There is history in Vedas but Swami Dyayand had not agree to it. That why such names had been misinterpreted as he liked. Since Dayanand did not believe in interpolation in Vedas so he declared those figures as God's name which is not correct. Their translations of these mantras denote different individuals which is not right.
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