प्रश्न: मैला ढोने की प्रथा मुग़लों ने शुरू की क्योंकि उनके यंहा पर्दा प्रथा थी जिसके कारण उनकी औरतें बाहर नहीं जा पाती थी। हड़प्पा संस्कृति से ही भारत में घरों में शौचालय थे जो मुसलमानों के लिए अनजान थे। मुग़लों ने भंगी जाती बनाई वरना वाल्मीकि तो स्वयं दलित थे।
मैला ढोने की प्रथा या कार्य से तात्पर्य मनुष्य के शौच गंदगी यानी मल मूत्र को उठाने वाले काम से है। इसे सर पर टोकरी आदि में उठाकर भी ले जाया जाता था और आज भी किया जाता है। इसके खिलाफ कानून बनाये जा चुके है पर फिर भी कुछ जगह बदस्तूर चालू है।
मुग़लों से बहुत पहले से ही मैला ढोने के प्रथा और कार्य हज़ारों सालों से चला आ रहा था। जो बुद्ध और मौर्य काल में भी था। बोद्ध ग्रंथो में और गुप्त काल में दासों का वर्णन आता है जो कुल 15 प्रकार के दास थे। मनु ने 7 प्रकार के और चाणक्य ने 9 प्रकार के दासों का उल्लेख कर के गए है। नारद स्मृति या नारद संहिता में दासों की 15 कर्तव्य या कार्यो में मैला ढोना भी बताया गया है। नारद पुराण के 32वें अध्याय में ही दासों को मैला ढोने का काम करने वाला बताया गया है। अर्थात ऐसा दास जो घर गृहस्ती कि गंदगी को घर से बाहर उठाकर ले जाए और उसे समाप्त या ठिकाने लगा दे।
हड़प्पा सभ्यता वैदिक या सनातनी या हिन्दू सभ्यता नहीं थी। अभी तक उनके धर्म का पता नही चल पाया है। बोद्ध लोग तो उन्हें पूर्व में हुए बुद्ध के अनुयायी मानते है। उन्हें श्रमण परंपरा की सभ्यता भी माना जाता है यानी जो वैदिक सभ्यता के विरोधी थी। खुदाई में मिले एक गोल पत्थर, विशेष मुद्रा में खड़ी स्त्री की मूर्ति और पशुओं के चित्र वाली सील को हिंदुत्वादी ने हिन्दू धर्म से जोड़कर उन्हें, शिवलिंग, पार्वती और पशुपतिनाथ से जोड़ दिया है जबकि इनकी पुष्टि बिल्कुल भी नहीं हो पाई है। हड़प्पा नगरीय प्रणाली का हमे पिछली सदी में जाकर ज्ञान हुआ है जब खुदाई में हमें वो मिली। लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व इसका अंत या विनाश कैसे हुआ था हमें नहीं पता लग पाया है। अगल अलग थियोरी इसके अलग अलग कारण बताती है जैसे आर्य आक्रमण या बाढ़। पर जो भी इतना तय है कि इसकी सम्पूर्ण प्रणाली इसके बाद भारत मे नहीं थी, न ही ऐसे शौचालय थे और न ही ऐसे नालियां आदि। हड़प्पा काल में शौचालय और नालियां ज़रूर थी पर क्योंकि उनका अंत की आकस्मिक कारण से हुआ था इसलिए शायद ऐसी प्रणाली सब जगह फैल न पाई। ऐसी प्रणाली भारत में कंही और नही पाई गई, किसी भी काल में। पिछली कुछ सदी तक घर का मल मूत्र बाहर ही इकट्ठा करके ले जाया जाता था। इसलिए ये कहना बिल्कुल गलत है कि भारत में मुग़लों से पहले हड़प्पा सभ्यता जैसे शौचालय प्रणाली थी।
संघ द्वारा दलितों को लुभाने के लिए ये दावा किया की वाल्मीकि एक शुद्र थे। वाल्मीकि समाज भी इसी मत को मानता है। जबकि वाल्मीकि एक ब्राह्मण थे। पहले समय में शूद्रों को संस्कृत पढ़ना मना था और यंहा तक कि वेद मंत्र सुनने तक पर रोक और दंड था। ऐसे में ये असम्भव है कि कोई शुद्र संस्कृत का इतना बड़ा ज्ञानी हो जाए और रामायण जैसा महा ग्रन्थ लिख दे। दलित साहित्य पढ़ कर मैला प्रथा, वाल्मीकि समाज और जातियों के इतिहास को समझा जा सकता है। वेद और स्मृतियां ग्रन्थ पढ़ कर पता चल जाता है कि वर्ण व्यवस्था वैदिक काल से है, न कि मुग़ल काल से। दास प्रथा भी हिन्दू संस्कृति का अभिन्न अंग रही है।
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