गोमूत्र, गोबर, गोदही, गोदूध, गोघृत (घी) इनको मिला कर तीन दिन स्नान और इन को तीन दिन पीकर वह कीड़ों का काटा हुआ पुरुष शुद्ध होता है ॥
[पराशर स्मृति :6:49]
सेधा (सेंधुश्रार ), गोधा (गोह ), कछुआ शल्लक ( साही ) और खरगोश ये पञ्चनख (पंजे वाले ) जीव भक्षण करने योग्य होते हैं। मछलियों में भी सिंही, रोहित (रोह) पाठीन, राजीव ( पद्म केसमान रंग वाली) और सशल्क (शुक्ति के श्राकार वाली) द्विजातियों के लिये भक्ष्य होती है.
[यागवल्क्य स्मृति : 1:177]
श्राद्ध में, प्रोक्षण नाम के (श्रौत संस्कार ) में देवताओं की आहुति से अवशिष्ट, ब्राह्मण के भोजन या देवता या पितर के लिये बनाये गये मांस को देवता और पितरों की अर्चना करके खाने वाला दोष का भागी नहीं होता है।
[यागवल्क्य स्मृति : 1:179]
कुश, शाक, दूध, मछली, सुगन्धि, फूल, दही, भूमि, मांस, शय्या, आसन, भूने हुए धान, और जल ये सब बिना माँगे ही मिले तो अस्वीकार न करना चाहिए।
[यागवल्क्य स्मृति : 1:214]
पितामह ( अर्थात् पितरगण ) हविष्य अन्न से एक मास तक, और खीर से एक वर्ष तक तृप्त रहते हैं; पाठीन आदि मछली, ताम्रमृग, उरन ( भेड़ा) तित्तिर, बकरा, चित्रमृग, कृष्मृग, रुरु, जंगली सुअर और खरगोस के मांस श्राद्ध में देने पर क्रमशः एक-एक महीने अधिक समय तक तृप्त रहते हैं।
[यागवल्क्य स्मृति : 1:258-259]
जो खड्ग (गैंडा ) का मांस, महाशल्क मछली, मधु, तीनी का चावल, लाल बकरे का मांस, महाशाक, ( कालशाक ), श्वेतवर्ण के वृद्ध बकरे का मांस देता है और गया में ( श्राद्ध करते समय ) ये पदार्थ देता है, भाद्रपद मास की कृष्ण त्रयोदशी और विशेषतः महानक्षत्र होने पर इनका पिण्ड देता है वह सम्पूर्ण अनन्तफल का भोग करता है।
[यागवल्क्य स्मृति : 1:260-261]
मित, संमित, शाल, कटङ्कट, कूष्माण्ड और राजपुत्र के अन्त में स्वाहा जोड़कर हवन के मन्त्र होते हैं ( यथा-ओं मिताय स्वाहा आदि) इन्हीं मन्त्रों से इन्द्र से लेकर ब्रह्मा तक अनन्त देवताओं के नाम से नमस्कार पूर्वक बलि देवे । ( तब बचे हुए अंश को) सूप में कुश बिछाकर चौराहे पर रखे । बनाये गये और न बनाये गये चावल, पीसे हुए तिल से युक्त चावल, पकी-अधपकी मछली, पका और न पका हुआ मांस, अनेक वर्ण के फूल, चन्दन आदि सुगन्धि द्रव्य, (गौडी, माध्वी, पैष्टी) तीन प्रकार की सुरा, कन्द के समान मूल फल, पूरी, पूना, उण्डेरक (छोटे-छोटे रोट ) की माला, दही मिला हुआ अन्न, खीर, गुड से बनाये गये लड्डू-इन सब को लेकर भूमि में शिर लगाकर विनायक की माता अम्बिका को नमस्कार करे । इसके पहले दूब, सरसों और फूल अञ्जलि में लेकर अर्घ्य देवे।
[यागवल्क्य स्मृति : 1: 285-290]
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