Friday, 8 April 2022

क्या कुरान के लफ़्ज़ों में फर्क है?



क्या कुरान के लफ़्ज़ों में फर्क है? क्या क़ुरान के कई वैरिएंट मौजूद है?

 

क़ुरान एस्टेब्लिशड हिस्ट्री की तरह ही आगे बढ़ा है। भाषा भी इसी तरह आगे बढ़ती है। सिकन्दर और यीशु को इसी तरह लोग मानते है पर फिर भी हिस्टोरिकल और मायथोलॉजीकल लोगों पर हमेशा बहस होती रही है। इस्लामिक साहित्य से बिदअत का इतिहास मिल जाता है जैसे फल बिदत कब शुरू हुई है। जबकि सुनन्ह नबी तक पहुँच जाती है।  लगभग 25 के करीब पिछली सुन्नत नबी ने आगे जारी की। अरब में याद करने का रिवाज था जैसा बहुत सी जगह होता है। ह. अबु बकर को अपने खानदानी शजरा और आशार याद थें। लोग कुरान, किरात, हदीसें वगरेह आसानी से याद कर लेते थे.

 

क़ुरान में अल्लाह ने कहा हैं कि हम ही इसे सुरक्षित रखेंगे और पढ़के सुनाएंगे। यानी मुसन्निफ़ ने ही अपनी किताब को खुद तरतीब दी है. क़ुरान ने कहा कि हम खुद क़ुरान को जमा (लफ्ज़ जमाहु आया है) करंगे और पढंगे। अल्लाह ने कहा कि जब हम इसे पढ़ेंगे तो इसकी पैरवी करना। पूरा क़ुरान कोई गुफा में बैठ कर नाज़िल नही हुआ था बल्कि वो लाइव चल रही परिस्थितियों में आया था। इसमें उस समय के लिए आदेश दिए गए थे  जो बाद में आने वाले समय के लिए भी हिदायत बनने थे। असल में कुरान की तरतीब मुख़ातिबों के लिए अलग थी और आने वाली उम्मत या दुनिया के लिए अलग। जैसे आज भी बुक्स एडिट होके प्रिंट होती है। पहली वो आयतें और किरात थी जो वक्तन ब वक्तन मसलिहत के तहत नाजिल होती रही लगभग २३ साल तक. इसके बाद नबी की वफात से पहले कुरान को वर्तमान उपलब्ध तरतीब और किरात दे दी गयी.  कुछ लफ्ज़ भी बदल दिए गए जो बेहद मामूली बदलाव थे और जिनसे मायनों में कोई फर्क नहीं पड़ा. ये छोटे मोटे बदलाव थे क्यूंकि अगर कोई बड़े बदलाव होते तो मायने बदल जाते.  इन बदलावों को देख के पता लगता है कि सिर्फ थोड़ा सा अपडेट हुआ है, ज़ाहिर है ये बदलाव नए लोगों के लिए हुआ लगता है। आखिरी दौर में जिब्राईल अलैह ने 2 बार पूरा कुरान को दोहरवाया. एक बार नबी को सुनाया गया और फिर नबी ने उन्हें सुनाया. इस वक़्त खुदा ने कुरान की तरतीब और पिछली किरात के चंद लफ्ज़ बदल दिए ताकि बाद में आने वालों को सुनते और पढ़ते हुए अजनबियत न महसूस हो. जैसे कि ‘तुम जानते हो’ को बदला गया ‘वो जानते है’ से क्योंकि अब पूरी उम्मत कुरान की मुखातिब है, न की सिर्फ उस वक़्त के अरब। इस किरात के वक़्त नबी के साथ बाज़ सहाबा भी शामिल हुए थे।

 

क़ुरान पहले वाले नुज़ूल या किरात को अर्ज़ा ए उला कहा गया और बाद वाले को अर्ज़ा ए आख़िरा। अर्ज़ा ए आख़िरा कि किरात को किरात ए उम्मा भी कहा गया। अब इस कुरान के शाने नुज़ूल या पुरानी तरतीब की ज़रूरत नही है। वो महज़ एक इतिहास है। यानी नया वाला आखिरी क़ुरान होगा जिसे अर्ज़ा ए अखिरा कहा गया। क्यूंकि आखिर में नई तरतीब और किरात दी गयी. इसलिए अब अर्ज़ा ए आख़िरा को ही पढ़ा जाना चाहिए और  हम आज भी वही पढ़ रहे है। हम जिसे आज पढ़ रहे है, वही मुतवातिर है। यही क़ुरान हर जगह गया जैसे इंडिया, इंडोनेशिया वगेरह। सिर्फ कुछ जगह है जहाँ क़ुरान कुछ इख़्तेलाफ़ के साथ चलन में है जिसमें एक अफ्रीका के कुछ हिस्सा है, ज़ाहिर है वंहा कुरान का पुराना अर्ज़ा ए उला वाला कुछ हिस्सा पढ़ा जा रहा है. वंहा तीसरी सदी हिजरी में एक क़ाज़ी ने फतवा देके इस कुरान के अर्ज़ा ए उला वाले कुछ हिस्से को नाफिस कर दिया जो आगे चलता गया और आज तक वंहा चल रहा है। जैसे यंहा हदीसे नाफीस है जो असल चली आ रही अमली सुन्नत से अलग एक सुन्नतों का रिकॉर्ड है।

 

बाज किरात नबी से सीखी लोगों ने सीखी थी पर आखिरी वाली किरात ने पिछली सभी किरात को सुपरसीड कर दिया। पर लोगों ने पुरानी वाली किरात भी रिकॉर्ड कर रखा था। लोगों ने इसे याद कर रखा था और लिख रखा था. इसलिए इस क़ुरान की अखाबरे अहद से दूसरी किरात भी मुंतकिल हुई। अखबारे अहद से मुराद उन रिवायतों से है जो सुन्नत के साथ आगे बढ़ायी गयी पर उतनी तादात में नहीं जितनी की आम सुन्नत लोगों ने जारी रखी.  हदीसों को भी इल्म की दुनिया में अखबारे अहद कहते हैं क्यूंकि वो हदीसों के तौर पर कुछ सहाबा ने आगे बयान की पर आम उम्मत ने आपकी आम सुन्नतों को अमल से जारी रखा. यानी क़ुरान में हुए बदलाव जो शुरवाती और आखिरी किरात के दरमियाँ में है, वो भी महफूज़ हुए रिवायतों के ज़रिये। पर असल क़ुरान तो हर जगह महफूज़ रहा और वही चलन में भी रहा. पुरानी परमपरा के आधार पर उम्मत, अखबारे अहद स्वीकार करती है। क़ुरान मीज़ान और हक़ है इसलिये उसे ही मुतवातिर होना चाहिए न कि अखबारे अहद को। क़ुरान की अखाबरे अहद को समान्यता स्वीकार किया गया जैसे हदीसों को किया गया। पर मुतवातिर कुरान ही सही है क्योंक ये क़ुरान की आखिरी किरात पर आधारित है। किरात के नियम भी हदीस के समान है। किरात के उलेमा ने भी हदीस जैसे नियम बनाये। किरात को भी सनद के साथ महफूज़ किया गया। मुसहफ ने इसे स्वीकार किया। ये किरात मुतवातिर नहीँ बल्कि अखाबरे अहद है। जबरी ने अख़बारे अहद को किरात में स्वीकार किया है जैसे हदीसों में भी ली गयी है। हदीस भी ऐसे बयान हुई है। बोलने और सुनने वाले तैयार थे कि ये किरात की रिवायतें आगे बढ़ाई जाए तो बढ़ी। ये भी हदीसों की तरह तारीखी रिकॉर्ड है  

 

ह. अब्दुल्लाह मसूद और ह. काब ने ऐसी इख्तिलाफ वाली चीज़ें बयान की है। बाज़ दुसरे लोगों ने भी की है. दोनों ने अपना सख्त रवैया दिखाया, दोनो ऊला की किरात प्रचार करते थे। हज़रत उमर और उस्मान ने इसे रोकना चाहा जिनके पास पुरानी किरात व मसाहिफ़ थी,  उन्हें बयान करने से मना कर दिया बल्कि उन्होंने ऐसे अलग किरातों के नुस्खें भी जलाए। ह. उमर ने कहा कि ऐसी बातों को संजोओ मत। पर क्यूंकि राय की आज़ादी थी तो फिर भी लोगों ने इन्हें आगे बढ़ाया। अब्दुल्लाह इब्ने मसूद ने अपनी मुसहफ देने से मना कर दिया कि मैंने ये नबी से सुने है और कूफ़ा में उन्होंने लोगों से कहा कि ऐसी मुसहफे छिपा लें, जब इन्हें जलने के लिए माँगा जा रहा था।  पुरानी किरात पढने से जब ह. उबय बिन काब को ह. उमर ने रोका तो उन्होंने कहा कि मैंने जो रसुल से सुना है, मैं तो बयान करूंगा (बुख़ारी हदीस)। बाज़ लोगों के रवैये ऐसे थे क्योंकि उन्हें नबी की हर चीज़ से मोहब्बत थी क्यूंकि हर तरह के इंसान होते है। वो इन्हें हिस्टोरिकल रिकॉर्ड की तरह रखना चाहते थे। उन्होंने नई किरात का इनकार नहीं किया और न ये कहा कि सिर्फ मेरी मुसहफ हक पर है। उनका ये इनकार आखिरी किरात पर नहीं था की वो आखिरी किरात को नहीं मानते थे बल्कि रसूल से मुहब्बत में उनसे सुनी कोई भी बात को छोड़ना या भूलना नहीं चाहते थे। उन्होंने ये नहीं कहा कि ये हमारा क़ुरान ही असल है। बल्कि आखिरी किरात पर उनका भी ईमान था. पर अपने बनाए गए ऐसी नुस्खों को वो बचाना चाहते थे जो असल में ये अखाबरे अहद थे। दुसरे लोगों ने भी इनको महफूज़ किया। आज भी हम अपनी किताबों में नोट्स बनाते और संजोतें है।

 

जैसे मौज़ू हदीसें गढ़ी गयी वैसा ही किरात के साथ हुआ और वो भी गढ़ी गयीं क्योंकी मुनाफ़िक़ नबी के बाद भी थे। ऐसी मतभेदी थोड़ी सी चीज़ें थी जो इज़ाफ़ा होते होते एक बड़ा जखीरा हो गई वैसे ही जैसे लाखों हदीसें हो गई। in दोनों किरातों के अलावा भी बाद में लोगों ने अपने आप कुछ समान शब्द आगे पीछे कर दिए। ये बिना ज़ेर ज़बर के बदलाव आये थे. ऐसे बदलावों के दूसरे कारण भी थे। छुटे हुए शब्दों को अधिकतर रिकॉर्ड किया गया । कहा जाता है कि आज 6000-7000 जगह ऐसा फर्क है जो की गलत है. तबरी की किताब उल किरात जो आज खो चुकी है में तबरी ने कहा है कि ये बदलाव बहुत ही कम है। यानी वक़्त के साथ भी किरात के बदलाव बढ़ते गए. सूरह फातिहा में आये मालिक लफ्ज़ तावतुर से आया है जबकि मलिक लफ्ज़ हो सकता है ऊला की किरात से आया हो या किसी बनावटी किरात से आया हो या गलती से आया हो। पर अब मालिक ही पढ़ा जाएगा। मीरास का कानून किरात पर आधारित है जो तफसिरों में आ गई है सो सियासत में इस्तेमाल हुआ।

 

 

इसके बाद ऐसे लोग आए जिन्होंने इसे फन बनाया। इस पर तहक़ीक़ की। हदीस की तरह किरात के उसूल बने। ये हदीस, किरात जैसी ही है। शाने नुज़ूल में दिलचस्पी जागी तो वो भी लिखा गया। इल्म की दुनिया मे पुरानी किरातें और गढ़ी हुई किरातें सीखना शुरू हुई। आम आदमी तो वही क़ुरान पढ़ रहा था। ये तावतुर इन कारियों से शुरू हुआ जो आगे चला, उससे पहले तो ये अख़बारे अहद थी। ऐसा ही हदीसों के साथ हुआ। इमाम जज़री ने इन किरातों को मुतवातिर मानने की बात को रद्द किया है। जैसे हदीसों के लिए 5 मयार हैं, किरात के लिए 3 मयार हैं। सही सनद हो, अरबी दुरुस्त हो और उसमानी मुसहफ़ से मिलती हो। इन 3 में मुतवातिर होना शामिल नहीं है।  दलीलें दी जाती हैं कि क़ुरान का जितना स्केलेटल टेक्स्ट मुतवातिर है, तलफ़्फ़ुज़ मुतवातिर है, जितने क़ुरान पर 7 कारी मुत्तफ़िक़ हैं, उतना मुतवातिर हैं। मयारात - सनद, अरबी, मुसाहिफ़ से नहीं हो। इन्हें मुतवातिर कह दिया जाता है।

 

नबी ने कुरान अलग अलग तरह से नहीं पढ़ा बल्कि क़ुरैश की तरह पढ़ा। अल किरात उल खास्सा जिनसे वजूद में आई। क़ुरान की लिखवाट, किरात और लहज़ा तीनों मुंतक़ील हुए है। कोई अंतर होने पे बाद वाली किरात ही मान्य है।  अरब लहज़े में पढ़ना सीखाने वाले पैदा हुए। अलग अलग लहज़े थे।  हफ़्स, वर्श, नाफ़े ने लहज़े ही सिखाये है। हफ़्स की किरात से मतलब है जो उन्होंने अर्ज़ा आखिरा को पढ़ाया। इसमें उन्होंने पिछली कोई स्टाइल नहीं पढ़ायी, मतन भी नही बदला। हफ़्स, आसिम के शागिर्द है। आसिम अबू अब्दुर रहमान सुलमी के शागिर्द है। सूलमी ने ये मदरसा शुरू किया। इस मदरसे ने फैसला किया कि वो लहज़ा पढ़ाएंगे पर किरात अर्ज़ा वाली ही होगी। सुलमी अर्ज़ा वाली किरात पढ़ाते थे और दूसरों से कहते थे कि जैसी किरात तुमने पढ़ना शुरू की है वो न तो अबु बकर,  उमर,  उस्मान,  अली,  ताबित, किसी ने नहीं पढ़ा। अर्ज़ा की किरात में किसी किरात वाले को कोई इख्तियार नहीं था, अपना स्टाइल शामिल करने का.  ये इख्तियार हफ़्स में नहीं था इसलिए सुलमी दूसरी किरात नहीं मानते थे। अब जो तजवीद सिखाते है, ये वही किरात और लहज़ा है जो हफ़्स की है यानी अर्ज़ा कि किरात है। यही इख्तियार शामिल करना हदीस, फ़िक़ह, किरात में भी हुआ था। लोग इसमें इख्तियार पसंद करने लगे। लोग इख्तियार पढ़ाने लगे. इमाम मालिक ने नाफ़े के इख्तियार को पसंद करते थे, क्योंकि उन देशों में फ़िक़ह में मालिक को अनुसरण करते थे तो उन्ही की कीरत ले ली, जिसे बाद में मालिकी फिकह मानने वालों ने अफ्रीका के हिस्से में फतवे के ज़रिये नाफिस कर दिया. अफ्रीका में मालिकी फ़िक़ह था, वंहा नाफ़े की किरात फतवे से लागू हो गया। मलिक के उस्ताद थे नाफ़े। वो मालिकी थे। क्यूंकि काज़ी राजा के बराबर होता था तो यही नाफिस की हुई किरात चल पड़ी.  नाफ़े को कई वेरिशियन मिली एक आयात पे, उन्होंने एक को तरजीह दे दी, दूसरी आयतों के साथ भी ऐसा ही किया। इससे उनकी किरात सामने आई। दूसरे कारियों ने भी यही तरीका इस्तेमाल किया। यह कहा जाता है कि खिलाफत की वजह से ही हफ़्स की किरात को मक़बूलियत मिली जबकि सबसे पहले किराते आइम्मा ही मुस्लिम के ज़रिए सब जगह अरब से बाहर गई थी। असल में बाद में आइम्मा को ही हफ़्स कि किरात कहा गया। हफ़्स से पहले इसे किराते आइम्मा ही कहा जाता था। इन्होंने कुरैशी इख्तियार किया और ग्रामेटिकली वैगरह के तौर पर इन्हें जो अपनी पसंद से पढ़ना सही लगा, उसे तरजीह दी। सभी किरात वालों ने अपने कुर्रा बनाये। हफ़्स और नाफ़े ने अपना इख़्तियार नही लिया, सिर्फ लहज़ा लिया और आइम्मा किरात को ही आगे बढ़ाया। इसलिए आइम्मा को किरात को ही हफ़्स कहा गया। नाफ़े की किरात की सनद उनके उस्तादों से होती हुई नबी तक जाती है। इसमें किरात की सनद है। न कि ये कि उन्होंने मालिक को मलिक सुना यानी लफ़्ज़ों का ज़िक्र नहीं है। हफ़्स ने क़ुरान के लहजें को इस्तेमाल किया है पर अपना इख़्तियार इस्तेमाल नहीं किया है। सबसे प्रचलित हफ़्स है जो कूफ़ा के आसिम की किरात है। वरश की किरात नाफ़े की किरात है।

 

7 कारियों की सनदें नबी तक नहीं जाती बल्कि उनके उस्ताद तक जाती हैं यानी कारियों तक जाती है। वो भी लफ्ज़ ब लफ्ज़ की बात नहीं आती सिर्फ पूरी किरात का ज़िक्र आता है। जबकि ऐसी हदीसें मुंकतिए है, सनदें कमज़ोर हैं।  अबू बक्र मुजाहिद ने बहुत सी किरात से 7 चुन ली। एक एक ली मक्का, मदीना, श्याम, दमिश्क/बसरा से और 3 ली कूफ़ा से।  हर किरात के 2 कारी मशहूर हो गए। 2 अलग अलग इलाक़ों से थे। कुल 14 किरात हो गई। लगभग 25 के करीब पिछली सुन्नत नबी ने आगे जारी की। जिनकी भी किराते मशहूर हैं, इनको 200 साल बाद ये नाम मिले जबकि 150 साल तक इन्हें किराते आइम्मा कहा जाता था। 

 

स्क्रिप्ट के प्रकार और लफ़्ज़ों की बनावट में फ़र्क़ है पर लफ्ज़ वही रहते हैं। इब्ने खल्दून ने इस तरह की मुसहफ और स्कराईबल गलतियों को हटाने को कहा था। उनकी बात रद्द कर दी गई ये कहकर की ये सब सहाबा की लिखावट है। मवारदी और फराही ने कहा कि क़ुरान की किरात नई आयी है और पिछली खत्म। क़ुरान खुद अपनी तारीख बयान करता है। ज़हबी, राज़ी, दानी, अबूबक्र बिन मुजाहिद, इन कारियों को कभी नहीं कहा कि ये मुतवातिर हैं। इमाम जज़री ने बाद में मौकिफ़ बदल के कहा कि ये मुतवातिर नहीं है। पहेले की मसाहिफ़ में डैक्रिटिकल मार्क्स नहीं होते थे क्योंकि इनकी ईजाद ही 688 ई. में हुई है, अद दौली द्वारा। यंहा तक कि स्केलेटल डॉट्स भी बाद में डाले गए हालांकि वे 267 ई. से प्रयोग में थे। ये माना जाता है की हज़रत उस्मान ने इन निशानों को इसलिए अपनी मुसहफ में शामिल नहीं किया था क्योंकि वो चाहते है लोगो सिर्फ लिखावट पर निर्भर न हो जाये बल्कि क़ुरान को ज़ुबानी याद रखके उसकी किरात लहज़ा आदि मुंतकिल भी करे। अबू बकर, उमर, उस्मान, अली और इब्न हजाज के ज़रिए क़ुरान को रिकॉर्ड और इकठ्ठा करने का ज़िक्र आता है जबकि इन्होंने सिर्फ कॉपी बनवाई थी। रिवायतों में गड़बड़ियां है। आज कोई भी उस्मानी मुसहफ असली नहीं है। ये जो मिलती हैं ये सभी 100 साल बाद कि है जो कूफ़ी क़ुरान हैं। नबी के वक़्त में हिजाज़ी क़ुरान होते थे। उनके वक़्त में एक भी कूफ़ी क़ुरान नहीं था। बरमिंघम में रखी मैनुस्क्रिप्ट हिजाज़ी स्क्रिप्ट की है जो लगभग नबी के 30 साल बाद कि है और अबतक की सबसे पुरानी है। यह स्क्रिप्ट आइम्मा है। ये सना वैगरह की मैनुस्क्रिप्ट उन्हीं वैरिएंट्स की मिलती है। ये बिल्कुल मिलेंगी। इल्म अल खास्सा और इल्म अल आइम्मा में फर्क करना ज़रूरी है।

 

लहज़ा या तजवीद एक साइंस बन चुका है। हिंदुस्तानी लहज़ा में पढ़ना भी जायज़ है पर अरबी लहज़ा सबसे बेहतर है। हिंदुस्तान में तफ़्सीर करने वालों ने इन किरातों को नहीं लिया।

 

अबु हनीफ़ा के यंहा मान्यता है की जो रिवायत चली आ रही है रोज़े नमाज़ की, उसी पर आगे चलेंगे, जंहा इश्तिहाद की जरूरत होगी वंहा इश्तिहाद कर लेंगे। ये उनके बुनियादी उसूल है। बाकी आइम्मा के यंहा अखबारे अहद की रिवायतें आ गई तो उन्हें कुबल करते है और उनके मुताबिक तब्दीली कर चुके है। हालांकि इस वक़्त के हनाफ़ हंबली हो चुके है पर पहले नहीं थे शुरुआत में। हनफ़ी इख्तियार के कायल नहीं थे। जैसे अब हदीस की बुनियाद पर हाथ ऊपर बांधने लगे है, यही तो इख़्तियार है।

 

 



नासिख़ और मंसूख।

मदिना में मुनाफ़िक़ नबी से अकेले में मिलने की गुजारिश करते थे। क्योंकि नबी एक निहायत ही शरीफ इंसान थे तो उनसे भी मिलते थे जबकि उन्हें मायूस लौट भी सकते थे। बाद में वे लोग नबी से की गई बातचीत का बतंगड़ बनाके बाहर जाके विवाद पैदा करते है। इसलिए अल्लाह ने लोगों से मुलाक़ात करने पर कुछ चार्ज करने की शर्त लगा दी। बाद में इस शर्त की वजह से कुछ गरीब लोगों की नबी से मुलाक़ात नहीं हो पाती थी। इसके बाद अल्लाह ने इस शर्त को खत्म कर दिया क्योंकि उन लोगों को मुलाक़ात की एहमियत दिलायी जा चुकी थी और ये भी बताया जा चूका था कि मामले हमारे हिसाब से चलेंगे। रोज़े और जिहाद की आयतों को भी नसख किया गया। जैसे कि पहले कहा गया कि रोज़े को छोड़ सकते हो तकलीफ या सफर की वजह से, बाद में पूरा कर लें, सदक़ा दे दें अगर बाद में भी न रख पाए तो। जब लोगों को रोज़े का अभ्यास हो गया तो कहा गया कि अब रोज़ा ही रखा करो। आम मुस्लिम पांच मक़ामात में सरकमस्टेंशल नासिख़ और मंसूख मामले मानते है। जिनमें से कुछ इस तरह है। पहले वसीयत को लाज़िम करार दिया गया, फिर अहकाम आये। पहले एक मुस्लिम को दस पर भारी कहा फिर मुस्लिम के ईमान वैगरह की कमज़ोरी को देख के दो पर भारी कहा गया। जानी को घर मे उम्र कैद की सज़ा हुई या फिर कोई अहकाम आ जाये कहा गया। फिर सौ कोड़े की सज़ा आ गई।

 

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कुरान ने कहा है कलम के ज़रीय इल्म सीखाया यानि कुरान. कुरान ने कहा जो तुम लिक रहे हो यानि कुरान. किसी भी किताब का हाफिज तभी हो सकता है जब वो तरतीब से हो. नबी के वक़्त में ही कुरान तरतीब साथ साथ दिया जा रहा था, लिखा हुआ भी था और हाफिज भी मौजूद थे.  कुरान के हाफिज जब जंगों में मरे और जब इस्लाम अजम में फैला और अजमी गलत अरबी पढ़ रहे थे, तब हजरत उस्मान ने कुछ फैसले लिए. 

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उलेमा ने लोगों को बहकाया की क़ुरान नबी ने जमा नहीं किया। क़ुरान अल्लाह ने तरतीब दिया और अल्लाह ने उसकी किरात करवाई। क़ुरान ने खुद ये बात बताई है। नबी के वक़्त में ही क़ुरान एक किताब को शक्ल में मौजूद था। ऐसा कैसे हो सकता है कि दुनिया के आखिरी नबी दुनिया मे आए और हपहले की किताबो को तब्दील होने की बात बार बार कहें और फिर अपनी आखिरी किताब को महफूज़ न करके जाए। ये बात गले से हमारे तो उतर नहीं सकती। उलेमा ऐसा माने तो माने। हदीसों ने ही ये ग़लत बात फैलाई है।  बाकी ईसा की वापसी पर सब ठीक हो जाएगा, ऐसा कुछ नहीं होगा। अल्लाह ने सब ठीक करने की ज़िम्मेदारी उम्मत को दी है, जो करना है हमें करना है।
 

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कुरान नबी के वक़्त में ही किताब के तौर पर महफूज़ हो चूका था. लोगों ने अलग चीज़ों पर भी लिख रखा था. शायद इसिलिए इन्हें ही इकठ्ठा करने को ज़ैद बिन साबित ने बहुत मुश्किल काम बताया था.


रसूल ने कुरान लेकर दुश्मन की धरती पर जाने से मना किया है, कहीं ऐसा न हो कि वह दुश्मन के हाथ लग जाए। (बुखारी, मुस्लिम 1869, माजा 2879, दाऊद 2610)

अनस ने कहा, "कुरान को पैगंबर के जीवनकाल में चार पुरुषों द्वारा एकत्र किया गया था, जो सभी अंसार से थे: उबई, मुआज़ बिन जबल, अबू ज़ैद और ज़ैद बिन साबित। (बुखारी 3810, 5003)

जैद बिन साबित ने कहा कि वह पैगंबर के समय में चर्मपत्र आदि पर लिखे गए कुरान को एकत्र करते थे.

जंगे ख़ैबर के बाद अपने कबीले के साथ साक़ीफ क्षेत्र के उस्मान इब्न अल आस ने नबी के पास आये. उनकी ज़हानत देख कर नबी ने उन्हें साक़िफ़ (ताइफ़) का गवर्नर बना दिया. उन्होंने नबी से वहीँ रखी हुई एक कुरान (की एक प्रति) मांगी कि क्या वो उसे रख ले, नबी ने उन्हें दे दी.


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Quran was one and its recitation or dialect revealed was also 1, and not 7

 

Some scholars differe on this and say that the Quran as a single piece was secured by the Prophet himself.  Each year, the Quran would be read out to the Prophet once, however, the year he died, it was read out to him twice.  The qiraat of Abu Bakr, Umar, Uthman and Zayd ibn Thabit and that of all the Muhajirun and the Anṣar was the same. They would read the Quran according to al qiraat al ammah. This is the same qiraat done twice by the Prophet to Gabriel in the year of his death. Zayd ibn Thabit was also present in this qiraat called al arḍah al akhirah. Till his death, it was this qiraat according to which Prophet taught the Quran to people.  Consequently, only this qirat is transmitted through continuous mass transmission from the time of the Companions to date. Our scholars generally call it the qirat of Hafs (d. 180 AH) whereas it is actually al qirat al ammah.  The qiraat according to which the Quran was read out to the Prophet in the year of his death is the same conforming to which people are reading the Quran today. This is evident from:-

 

1.  On 7 Dialect hadith, Imam Al Suyuti had finally confessed that it should be regarded among mutashabihat, the matters whose reality is only known to God (Al Suyuṭi, Tanwir al ḥawalik ila al Muatta Imam Malik, 2nd ed. (Beirut, Dar al jil, 1993), 199.

2. The word aḥruf connotes various pronunciations and accents the Arabs were accustomed to. However, the text of the ḥadith itself negates this interpretation as Umar and Hisham belonged to the Quraysh and people of the same tribe could not have had such differences.

3. Even if the difference of pronunciation and accent were among the individuals from various tribes, the verb unzila (was revealed) in this narrative still remains inexplicable. That is because the Quran has specified that it is revealed in the language of the Quraysh. After this, it can be accepted that the various tribes were allowed to read the Qur’ān according to their particular dialects and accents, but how can this be accepted that the Almighty Himself revealed the Quran in various dialects.

4. it is known that Hisham had accepted Islam on the day Makkah was conquered. If this hadith is accepted, it would mean that even after the conquest of Makkah, the senior Companions and even a close associate like Umar were unaware of the fact that the Prophet furtively taught the Quran in some other form from the one they publicly heard from him and, according to his instruction, preserved in their memory and writing.

5. In the six canonical books of the Hadith, the narratives of seven ahruf and the collection of the Quran are primarily recorded on the authority of Ibn Shihab al Zuhri (d. 124 AH). Authorities of the Rijal regard him to be guilty of tadlis and idraj. Besides that, if some other facets of his personality are kept in consideration, which Imam Layth ibn Sad (d. 175 AH) mentioned in a letter to Imam Malik (d. 179 AH), none of his narratives can be accepted in such important matters.

Therefore, this is certain that the Quran has one qirat only, which is found in our codices. Besides that, various qirat found in commentaries, read and taught or in certain areas, are the remnants of those artifices from which, unfortunately, no religious discipline of the Muslims has remained safe. These qirat may have indeed arisen due to insistence of some on the qirat before al arḍah al akhirah and due to oversight and negligence of the narrators, but later on, owing to the same motives that led to the fabrication of the Ḥadith, they became so rampant that at the end of the Umayyid dynasty, several of them had come into prominence. It is said that Abu Ubayd Qasim ibn Sallam (d. 224 AH) selected 25 of them in his book. The seven qirat famous in current times were selected by Abu Bakr ibn Mujahid (d. 324 AH) at the end of the third century hijrah. Thus, it is generally accepted that their number cannot be specified, rather, every qirat is the Quran that has been reported through a correct chain of narration, is somewhat compatible with the codex of Uthman  and, in some way, is in agreement with the language of the Quran. Some of these qirat are regarded mutawatir (mass transmitted).  However, a look at their chains of narration leaves no doubt that they are passed down through individual narrators (ahad), where the narrators of most are suspected as unreliable (majruh) by the Rijal authorities. Consequently, let alone the mutawatir Quran, any man of insight would be hesitant to even accept these qirat as hadith.


 

 

Wednesday, 6 April 2022

पैगम्बर मुहम्मद साहब की हदीसें और जीवनी

 

 


ईश्वर ने प्रकृति में एक नियम रखा है जिसके अंतर्गत जब कोई चीज़ बिना किसी देखभाल या देखरेख के यूं ही छोड़ दी जाती है तो वह चीज़ बहुत ही जल्दी बिगड़ जाती है या अव्यवस्थित हो जाती है। उदाहरण के लिए अगर किसी बग़ीचे को यूँ ही छोड़ दिया जाए तो वो जल्द ही जंगल के समान बन जायगा। इसीलिए बग़ीचे में एक माली रखा जाता है जिससे बगीचा (उसके फूल, पौधें, क्यारियां, सुदंरता आदि) भली भाँति सुरक्षित रहे। इसी नियम अनुसार अगर ये धरती भी यूँ ही छोड़ दी जाती तो यंहा भी मानव समाज और मानवीय मूल्य आदि पूरी तरह बिखर कर समाप्त हो जाते। पर ईश्वर ने प्रत्येक काल व प्रत्येक स्थान में इन सिद्धांतों को स्थापित रखने के लिए अपने संदेशवाहकों को भेजने का प्रबन्ध किया जिन्हें ईशदूत या संदेष्टा कहते है। क्योंकि ईश्वर न तो दिखाई देता है और न हम से बात करता है इसलिए वह हम में से ही कुछ सर्वोत्तम मनुष्यों को चुनाव करके उनके माध्यम से हमारा मार्गदर्शन करता है। ये मार्गदर्शक हम साधारण मानवों को ईश्वर की आज्ञानुसार जीवन जी कर दिखाते है कि सत्य के मार्ग पर चलना किसी भी मनुष्य के लिए कठिन काम नहीं है। ये सभी महापुरुष हमें धर्म का पाठ पढ़ाते है कि मनुष्य के लिए क्या सही है और क्या बुरा, किन कार्यों से मुक्ति, निर्वाण, मोक्ष, कल्याण या उद्धार है और किन से नहीं। इन ईश्वर के दूतों में से है एक थे पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल.। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके कल्याणकारी कथनों का तात्पर्य कुछ इस प्रकार है:-
 
 
■■■■■ सामाजिक संदेश ■■■■■
 
● मज़दूर का पसीना सूखने से पहले ही उसकी मज़दूरी दे दो।
[माजह 2443]
● लोगों के लिए आसानी पैदा करो। उनके लिए मुश्किलें खड़ी न करो।
[बुख़ारी 6125]
● वह व्यक्ति पापी है जो सामग्री जमा करके भाव के बढ़ने की प्रतीक्षा करता है।
[दावूद 3447]
● स्वच्छता आधी धर्मनिष्ठा के बराबर है और दान-दक्षिणा धर्मनिष्ठा का प्रमाण।
[मुस्लिम 223]
● दो वरदान ऐसे हैं जिन्हें बहुत से लोग धोखे (अनजाने) में खो देते हैं, वो है स्वास्थ्य और खाली समय।
[बुख़ारी 6412]
● कोई तब तक ईश्वर का सच्चा उपासक नहीं हो सकता जब तक कि वह दूसरों के लिए वही पसंद न करने लगे जो वह अपने लिए पसंद करता है।
[रियाज़ुस्सालिहीन 183]
● जब तुम तीन लोग हों तो दो लोग आपस में खुसर फुसर न करो क्योंकि इससे तीसरे को कष्ट हो सकता है।
[बुख़ारी 6290]
● इस दुनिया में ऐसे रहो जैसे कोई अजनबी या यात्री रहता है।
[बुख़ारी 6416]
खाने में कमी न निकालो।
[बुख़ारी 5409]
हमेशा मुस्कुराते रहिए।
[तिर्मिज़ी 3641]
 
 
■■■■■ सद्गुण अपनाने पर ज़ोर ■■■■■
 

क्रोधित और उग्र न हों।
[बुख़ारी 6116]
● सत्य बोलो, भले ही कड़वा हो; अच्छी बात करो वर्ना चुप रहो। ज़्यादा बोलना अच्छी बात नहीं।
[बुलूगुल मराम 132; रियाज़ुस्सालिहीन 1511, 1518]
● किसी व्यक्ति के झूठा होने के लिए यही प्रमाण पर्याप्त है कि वह हर सुनी सुनाई बात को फैला देता है।
[मिश्कात 156]
● सादगी और लज्जा (लाज, शर्म) ईश्वर से श्रद्धा (निष्ठा) का भाग है।
[माजह 4118, नसाई 5033]
● अच्छे चरित्र और शिष्टाचार से बढ़कर कुछ नहीं है।
[तिर्मिज़ी 2002]
चुगली करने वाला स्वर्ग में प्रवेश नहीं पा सकेगा।
[बुलूगुल मराम 16:59/1505/1548]
● दूसरों में दोष मत ढूँढ़ो। एक दुसरे से रिश्ता तोड़ के उन्हें अकेला न छोड़ो लोगों से दुश्मनी, ईर्ष्या, घृणा न करो। दूसरों की जासूसी (चुगली) न करो और न ही उन्हें धोखा दो
[बुख़ारी 6064, रियाज़ुस्सालिहीन 1570]
● जो लोगों का आभारी (कृतज्ञ) नहीं हो सकता वह ईश्वर का भी आभारी नहीं हो सकता।
[दावूद 4811]
● जिसके दिल में राई के दाने के बराबर भी अहंकार है, वह स्वर्ग में प्रवेश नहीं पा सकता।
[मुस्लिम 91c]
 
 
■■■■■ अन्याय, दमन, अभद्रता से बचो ■■■■■
 
● अन्याय करने से बचो; पीड़ितों की हाय से डरो क्योंकि उनकी बद्दुआ और ईश्वर के बीच कोई रुकावट नहीं होती।
[अलअदब अलमुफ़र्द 488, बुख़ारी 2448]
● शोषित की मदद करो और शोषकों को अत्याचार करने से रोको।
[बुख़ारी 2444]
● अगर कोई व्यक्ति किसी साथी के साथ गलत करता है या उसका अधिकार छीनता है या उसकी क्षमता से अधिक काम करवाता है या उससे कुछ हड़प लेता है तो मैं ईश्वर से उसकी शिकायत करूंगा।
[दावूद 3052]
● जब भी तुम कोई बुराई देखो तो उसे अपने हाथों से रोकने की कोशिश करो। अगर ऐसा नहीं कर सकते तो अपनी ज़ुबान से रोकने की कोशिश करो। अगर ये भी नहीं कर सकते तो कम से कम अपने दिल में ही उसकी निंदा करो।
[नसाई 5008]
● अपशब्द या अभद्र भाषा बोलने वालों को ईश्वर पसंद नहीं करता है। सच्चा ईश्वर भक्त किसी को ताना, शाप या गाली नहीं देता है और न ही किसी से असभ्य बात कहता है।
[रियाज़ुस्सालिहीन 625, 1734]
● सदैव झगड़ा करने वाला व्यक्ति ईश्वर को कतई पसंद नहीं है।
[बुख़ारी 2457]
● ईश्वर का आस्तिक वो है जिसकी ज़ुबान और हाथ से दूसरे लोग और उनकी संपत्ति सुरक्षित हैं।
[नसाई 4995]
● शक्तिशाली व्यक्ति वह नहीं है जो पहलवान है बल्कि वह है जो क्रोधित होने पर अपने क्रोध को नियंत्रित कर लेता है।।
[बुलूगुल मराम 1524]
 
 
■■■■■ सत्कर्म, दया, उपकार, दान करो ■■■■■
 
● अच्छे (विन्रम) शब्द बोलना; प्रत्येक दया का कार्य; दान/उपकार (के समान) है 
[बुख़ारी 2891, मिश्कात 1893, रियाज़ुस्सालिहीन 248]
● मुस्कुराना एक दान (पुण्य) है। भलाई का आदेश देना और बुराई को रोकना दान हैभटके हुए को राह दिखाना भी एक दान है
[तिर्मिज़ी 1956]
● अपने परिवार पर खर्च करना एक दान (परोपकार) है।
[बुख़ारी 4006]
लोगों को रास्ते में परेशान करने वाली पेड़ की एक टहनी को हटाना स्वर्ग में प्रवेश पाने में सहायता करती है।
[माजह 3682] 

● सड़क पर पड़े हुए पत्थर को हटाना; किसी को रास्ता बताना भी एक दान/पुण्य है
[बुख़ारी 2989, 2891]
● दो लोगों के बीच न्यायपूर्ण फैसला करवाना भी दान (पुण्य) है
[बुख़ारी 2989]
● जो दूसरों पर दया नहीं करता, उस पर भी दया नहीं की जाएगी; ईश्वर उन पर दया नहीं करेगा जो इंसानों पर दया नहीं करते।
[बुख़ारी 6013; 7376]
जो दया से वंचित है वह वास्तव में अच्छाई से वंचित है (जिसमें दया नहीं है, उसमें कोई अच्छाई नहीं है)।
[मुस्लिम 2592]
आधे खजूर (फल) का दान भी नरक की अग्नि से बचाने में सहायता करता है।
[बुख़ारी 1417]
● बिना देर किए दान देते रहें क्योंकि दान से संकट भी टल जाते हैं; दान देने में इतनी भी देर न करें कि आप मृत्यु शैया तक पहुँच जाए।
[मिश्कात 1887; बुख़ारी 2748]
● देने वाला हाथ, लेने वाले हाथ से हमेशा बेहतर है; ऐसा व्यक्ति ईश्वर की छत्रछाया में रहेगा जिसका बायां हाथ नहीं जानता कि उसके दायें हाथ ने क्या दान दक्षिणा दी है।
[रियाज़ुस्सालिहीन 296; बुख़ारी 1423]
 
 
■■■■■ अच्छा व्यहार और सहायता करें। ■■■■■

लोगों के प्रति अच्छा व्यवहार करें।
[हदीस नवावी 18]
किसी को नुकसान न पहुंचाएं ताकि आपको भी नुकसान न पहुंचे।
[हदीस नवावी 32]
जो दूसरों को क्षमा नहीं करता, उसे भी क्षमा नहीं किया जाएगा और न ही संरक्षित किया जायगा।
[अलअदब अलमुफ़र्द 371]
जो व्यक्ति किसी की एक कठिनाई भी दूर करता है, ईश्वर उसकी कठिनाइयाँ दूर करेगा।  जो व्यक्ति किसी परेशान इंसान को थोड़ी सी भी राहत प्रदान करता है, ईश्वर उसके लिए आसानी पैदा करेगा।  जो दुसरो की मदद करता है, ईश्वर उसकी मदद करता है।
[रियाज़ुस्सालिहीन 245]
जो ईश्वर की छत्रछाया में रहना चाहता है, उसे चाहिए कि वह सकंट में पड़े हुए व्यक्ति की सहायता करे या उसका कर्ज़ माफ कर दे।
[माजह 2419]
जो दूसरों की गलतियों और बुराइयों को ढकता है, उसकी कमियाँ भी छिपा ली जाती हैं।
[रियाज़ुस्सालिहीन 245] 
 


■■■■■ पर्यावरण और पशुओं के लिए कहा ■■■■■
 
● (आपके द्वारा) लगया गया पेड़ या बोया गया बीज (निरंतर चलने वाला) दान है। चाहे उससे मनुष्य, पशु, पक्षी या कोई भी (खाए) फायदा उठाए।
[मुस्लिम 1552, बुख़ारी 2320]
यदि महाप्रलय आने वाली हो (संसार का अंत होने वाला हो) और आपके हाथों में एक पौधा है तो भी इसे लगाना चाहिए।
[अलअदब अलमुफ़र्द 1:4/5, 27:479/480, मुसनद 12902]
● पानी बर्बाद न करें भले ही आप नदी के किनारे पर क्यों न हो।
[माजह 425]
● प्रत्येक जीव जंतु की सेवा करने (उन पर दया करने) के बदले प्रतिफल मिलता है।
[बुख़ारी 2466]
● जानवरों को भूखा न रखो और न ही उनसे अधिक मेहनत करवाओ।
[रियाज़ुस्सालिहीन 967]
 
 
■■■■■ अनाथ, विधवा, गरीबों का सहारा बनो ■■■■■
 
● सबसे अच्छा घर वो है जिसमें एक अनाथ के साथ अच्छा व्यवहार किया जाता है; जो व्यक्ति एक अनाथ की देखभाल और परवरिश करता है, वो और मैं स्वर्ग में एक साथ होंगे।
[माजह 3679; बुख़ारी 6005]
● विधवाओं और गरीबों की मदद करने की कोशिश करना ईश्वर के मार्ग पर संघर्षरत रहने के समान है।
[रियाज़ुस्सालिहीन 265]
● सबसे बुरा वह भोज (विवाह भोज) है जिसमें अमीरों को बुलाया जाता है और गरीबों को छोड़ दिया जाता है।
[मिश्कात 3218]
● लोगों को खाना खिलाओभूखों और गरीबों को खाना खिलाएं; पानी पिलाना सबसे बड़ा दान (उपकार) है।
[बुख़ारी 6236, 5649,3046, 12, माजह 3251; नसाई 3664]
● जिसे जानते हो उसे सलाम करो और जिसे नहीं जानते उसे भी सलाम करो; सलाम को आम करो (सभी को अभिवादन में सलामती की दुआ दें)
[बुख़ारी 12, 6236; माजह 3251]
बीमारों से मिलने जाया करो; कैदियों को आज़ाद करवाओ
[बुख़ारी 5649, 3046]
 
 
■■■■■ पड़ोसी व स्त्रियों के अधिकार ■■■■■
 
● वह व्यक्ति आस्तिक नहीं है जो खुद पेट भर कर खाए पर उसका पड़ोसी भूखा रहे।
[अलअदब अलमुफ़र्द 112]
● जब भी घर में शोरबा (तरी) बनाओ तो भले ही उसमें पानी बढ़ाओ पर पड़ोसियों को अवश्य दो।
[मुस्लिम 2625c]
● वह व्यक्ति आस्थावान नहीं है जिसके पड़ोसी उससे (उसकी बदी से) सुरक्षित महसूस नहीं करते।
[बुख़ारी 6016]
● ईश्वर की दृष्टि में सबसे अच्छा पड़ोसी वह है जो अपने पड़ोसी के लिए सबसे अच्छा है।
[रियाज़ुस्सालिहीन 311]
● जिसका द्वार आपके निकट हो उसे उपहार दें।
[बुख़ारी 2259]
● पड़ोसियों के साथ इतना विनम्र व दयालु व्यवहार करने का आदेश दिया गया है कि जैसे वे आपके उत्तराधिकारी हों।
[बुख़ारी 6014]
● महिलाओं के साथ अच्छा व्यवहार करें; किसी महिला की शादी उसकी अनुमति के बिना नहीं करनी चाहिए।
[बुख़ारी 3331; दावूद 2092]
किसी के घर के अंदर जाने से पहले दरवाज़ा खटखटा कर और अभिवादन कर के अनुमति मांगें।
[बुख़ारी 94]
 
■■■■■ परिवार के प्रति कर्तव्य ■■■■■
 
● माँ के चरणों में स्वर्ग है; आपका सर्वश्रेष्ठ व्यवहार पाने के सबसे योग्य आपकी माँ है।
[नसाई 3104; मुस्लिम 2548b]
● पिता स्वर्ग का दरवाज़ा है। तुम और तुम्हारी धन-संपत्ति, सब कुछ तुम्हारे पिता की है।
[दावूद 3663, माजह 2291]
● अपने माता-पिता के प्रति आज्ञाकारी और कर्तव्यनिष्ठ होना ईश्वर को बहुत प्रिय है; उस व्यक्ति का सर्वनाश तय है जो अपने माता-पिता की उनके बुढ़ापे में सेवा नहीं करता।
[बुख़ारी 5970; मुस्लिम 2551]
● एक पिता के पास अपने पुत्र को देने के लिए अच्छे संस्कारों से बेहतर कोई उपहार नहीं।
[तिर्मिज़ी 1952]
● अपने बच्चों के बीच कोई भेदभाव न करो। अपने बेटों के बीच बराबरी से पेश आओ।
[दावूद 3544]
● जिस व्यक्ति की दो पुत्रियां है और वह उनकी भली प्रकार से परवरिश करता है तो उसके लिए स्वर्ग की घोषणा है।
[माजह 3670, रियाज़ुस्सालिहीन 267]
●  जिसकी तीन या दो, बेटियां या बहनें हैं और वह उनके साथ अच्छा व्यवहार करता है और उनके बारे में अल्लाह से डरता है, तो उसके लिए जन्नत है।
[जामे तिरमिज़ी 1916]
● तुम में सबसे अच्छा व्यक्ति वह है जो अपनी पत्नी के लिए सबसे अच्छा है।
[माजह 1977]
घर में अपने परिवार के सदस्यों (पत्नी आदि) की मदद करने में खुद को व्यस्त रखें।
[बुख़ारी 676, रियाज़ुस्सालिहीन 605]
रिश्तेदारियां अच्छे ढंग से निभाओ।
[माजह 3251]
वही व्यक्ति पूर्ण विश्वास वाला है, जो आचरण में उत्तम और अपने परिवार के प्रति दयालु है।
[तिर्मिज़ी 2612]
जो बच्चों के साथ दया नहीं दिखाता, उसे भी दया नहीं दी जाएगी।
[मुस्लिम 2318, दावूद 5218]
जो बच्चों पर दया नहीं करता है और न ही हमारे बुजुर्गों के अधिकारों को महत्व देता है, वह हम में से नहीं है।
[अलअदब अलमुफ़र्द 353, 354, 363]
एक साथ खाया-पिया करो, अलग अलग नहीं  क्योंकि एक साथ रहने में ही वरदान है।
[माजह 3287]


 
■■■■■ मानवीय कार्य ■■■■■
 
● जो तुम्हारे साथ बुरा करते हैं, तुम उनके साथ बुरा करने की बजाय, क्षमा और करुणा के साथ व्यवहार करो।
[बुख़ारी 2125]
● क्षमा करना प्रतिशोध लेने से श्रेष्ठ है। तुम लोगों को क्षमा करते रहो, ईश्वर तुम्हे क्षमा देगा।
[क़ुरान - हदीस मुफ़र्द 380]
● आस्तिक एक ही सांप के बिल से दो बार नहीं डसा जाता अर्थात ईश्वर के सच्चे भक्त को एक ही तरह की गलती दो बार नहीं करनी चाहिए।
[बुख़ारी 6133]
● ज्ञान प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है।
[माजह 224 (ज़)]
● फ़िज़ूल खर्ची और दिखावे के बिना जीवन जियें।
[नसाई 2559 (ज़)]
● इस्लाम में स्त्रियों को विरासत में संपत्ति का और विवाह में मेहर की रक़म पाने का अधिकार प्राप्त है।
[क़ुरान, सुन्नत, हदीस]
● ये संपूर्ण सृष्टि (मानवता) ईश्वर का परिवार है।
[मुसनद अल बज़्ज़ार जिल्द 13 वर्क़ 332]
● अपना मकान इतना ऊंचा न बनाओ कि पड़ोसी के घर की हवा रुक जाए।
[तबरानी]
● वतन से मोहब्बत ईमान का हिस्सा है।
[रिवायत]

 
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Subject wise 50 important Hadith i.e. sayings of the Prophet PBUH regarding Compassion Day for sharing on Social Media.

【  Neighbours】
He is not a believer whose stomach is filled while his neighbours goes hungry"
[Al-Adab Al-Mufrad 112]
That person does not believe whose neighbors does not feel safe from his evil.
[Bukhari 6016]
The best of neighbours to Allah is the one who is the best of them to his neighbour.
[Riyad as Salihin 311]
Give presents to the one whose door is nearer to you.
[Bukhari 2259]
Whenever you prepare a broth, add water to it,  give it to neighbours.
[Muslim 2625c]
It was recommend to treat the neighbors kindly and politely so much so that if as they would be your heirs.
[Bukhari 6014]

【Women Right】
Treat women nicely,
[Bukhari 3331]
A woman should not be married without her permission.
[Dawud 2092]

【  Food and Water】
Feed the hungry and poor, visit the sick and greet all.
[Bukhari 5649, 12; Majah 3251]
Providing drinking water is the best charity.
[Nasa'i 3664]

【 Plantation, Saving Water】
Planting tree or sowing seeds or cultivating has the reward of charity, what is eaten, what is stolen, what the beasts and birds or else eat out of that is charity on his behalf.
[Bukhari 2320, Muslim 1552, 1552c]
Do not waste water even if you are on the bank of a river
[Majah 425]

【  Mercy, Pity, Kindness】
He who is not merciful to others, will not be treated mercifully/ Allah will not be merciful to those who are not merciful to mankind.
[Bukhari 6013; 7376]
He who is deprived of Kindness is in fact deprived of goodness.
[Muslim 2592]
There is a reward for serving any animate/ for kindness for every living thing.
[Bukhari 2466]
Do you not fear? This camel is complaining to me that you starve it and put it to toil.
[Riyad as-Salihin 967]

【What are considered Charity】
Every act of kindness is charity."
[Mishkat 1893]
A good/kind word is a charity.
[Bukhari 2891]
Removing a harmful object from the road is a charity.”
[Bukhari 2989]
A man's spending on his family is a deed of charity."
[Bukhari 4006]
Your smiling in the face of your brother is charity, commanding good and forbidding evil is charity, your giving directions to a man lost in the land is charity for you, your removal of a rock, a thorn or a bone from the road is charity for you."
[Tirmidhi 1956]

【   Monetary Sadqa】
Give the sadaqa without delay, for it stands in the way of calamity
[Masabih 1887]
Don't delay giving in charity till the time when you are on the death bed.
[Bukhari 2748]
The upper hand is better than the lower one"
[Riyad as Salihin 296]
the person who practices charity so secretly that his left hand does not know what his right hand has given, will be shaded by Allah.
[Bukhari 1423]

【Orphan, widows, poor】
I and the person who looks after an orphan and provides for him, will be this close (together) in Paradise,"
[Bukhari 6005]
The best house is a house in which there is an orphan who is treated well.
[Majah 3679]
One who strives to help the widows and the poor is like the one who fights in the way of Allah.
[Riyad as Salihin 265]
The worst kind of food is that at a wedding-feast to which the rich are invited and from which the poor are left out.
[Masabih 3218]

【  Injustice, Oppression】
Beware of injustice.
[Al Adab Al Mufrad 488]
Be afraid, from the curse of the oppressed as there is no screen between his invocation and Allah."
[Bukhari 2448]
Help the oppressed and Prevent the oppressor from oppressing people"
[Bukhari 2444]
Beware, if anyone wrongs a contracting man, or diminishes his right, or forces him to work beyond his capacity, or takes from him anything without his consent, I shall plead for him on the Day of Judgment.
[Dawood 3052]
Whoever among you sees an evil, let him change it with his hand; if he cannot, then with his tongue; if he cannot, then with his heart and that is the weakest of Faith.'
[Nasa'i 5008]

【 Family, Children, Wife,】
There is no gift that a father gives his son more virtuous than good manners."
[Tirmidhi 1952]
Act equally between your children; Act equally between your sons.
[Dawud 3544]
The man has two daughters and he brings them up nicely, he will be granted Paradise.
[Majah 3670]
The best of you is the one who is best to his wife.
[Majah 1977]

【 Mother, Father, Parents】
Paradise is beneath the feet of the mother.
[Nasa'i 3104]
The prophet said three times that the Most deserving of your good behaviour is your mother, your mother, your mother.
[Muslim 2548b]
The father is the middle door of Paradise.
[Dawood 3663]
You and your wealth belong to your father.
[Majah 2291]
To be good and dutiful to one's parents is loved most by Allah.
[Bukhari 5970]
Let him be humbled into dust. He who sees either or both of his parents but he does not enter Paradise (not serve them)
[Muslim 2551]
No one of you becomes a true believer until he likes for his brother what he likes for himself".
[Riyad as Salihin 183]
He who does not thank the people is not thankful to Allah.
[Dawud 4811]
He who has in his heart the weight of a mustard seed of pride shall not enter Paradise.
[Muslim 91c]
There are two blesings that many people are deceived into losing: health and free time."
[Bukhari 6412]
Be in this world as if you were a stranger or a traveler."
[Bukhari 6416]

【Qualities, Character, Manners, good Habits】
Simplicity & Modesty is part of faith.’
[Majah 4118 & Nasa'i 5033]
Nothing is heavier on the believer's scale than good character/manners.
[Tirmidhi 2002]
Do not look for the others' faults and do not spy, and do not be jealous of one another, and do not desert (cut your relation with) one another, and do not hate one another.
[Bukhari 6064]
Do not feel envy against one another; do not nurse enmity; do not spy on one another and do not cheat one another.
[Riyad as Salihin 1570]

【  Bad words, Fight, Anger】
Allah hates one who utters foul or coarse language.
[Riyad as-Salihin 625]
A true believer does not taunt or curse or abuse or talk indecently."
[Riyad as-Salihin 1734]
The most hated person in the sight of Allah is the most quarrelsome person."
[Bukhari 2457]
The Muslim or Believer is the one from whose tongue and hand the people and their wealth are safe.
[Nasa'i 4995]
The strong man is not the good wrestler; but is he who controls himself when he is angry.
[Bulugh al Maram  1524]

 【Speaking good, Truth, Lie】
Say the truth even though it is bitter.
[Bulugul Maram 132]
It is enough falsehood for a man to relate everything he hears.”
[Mishkat al-Masabih 156]
Speak good or remain silent. Do not indulge in excessive talk
[Riyad as Salihin 1511 & 1518]

【Social Mesages】
Cleanliness is half of faith and charity is proof (of one's faith)
[Muslim 223]
Seeking knowledge is a duty upon every Muslim
[Da'if-Majah 224]
Eat, give charity and clothe yourselves, without being extravagant, and without showing off.
[Daeef-Nasa'i 2559]
Give the worker his wages before his sweat dries.
[Majah 2443]
No one withholds/hoards goods/food till their price rises but a sinner.
[Dawud 3447]
Make things easy for the people, and do not make it difficult for them
[Bukhari 6125]
The prophet once said that the entire creation (humanity) is the family of God.
[Musnad Al Bazzar, Vol.13, Page 332] 

【New】
Save yourself from Hell-fire even by giving half a date-fruit in charity.
[Bukhari 1417]
Whenever the Prophet asked permission to enter, he knocked the door thrice with greeting and whenever he spoke a sentence (said a thing) he used to repeat it thrice.
[Bukhari 94]
The Prophet never criticized any food (he was invited to) but he used to eat if he liked the food, and leave it if he disliked it.
[Bukhari 5409]
I have not seen anyone who smiled more than the Messenger of Allah.
[Tirmidhi 3641]
What did Messenger of Allah used to do inside his house? She answered, He used to keep himself busy helping members of his family, and when it was the time for Salat, he would get up for prayer.
[Bukhari 676, Riyadas Salihin 605]
There was a branch of a tree that annoyed the people. A man removed it, so he was admitted to Paradise.
[Majah 3682]
Uphold the ties of kinship.
[Majah 3251]
Whoever would like Allah to shade him with His shade, let him give respite to one in difficulty, or waive repayment of the loan.
[Majah 2419]
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 मुहम्मद सल्ल. की जीवनी 

 

लगभग 1450 वर्ष पूर्व अरब के मक्का नगर में एक बच्चे का जन्म होता है। बच्चा बचपन में ही अनाथ हो जाता है। पर बच्चे को आरम्भ से ही बहुत विशेष माना जाता है। बच्चा बहुत नेक था और इसलिए यौवन तक पहुँचते पहुँचते वह हर भलाई के काम में आगे रहने लगा। अपने उत्कृष्ट चरित्र के आधार पर शीघ्र ही वह अलसादिक़ (सच्चा) और अलअमीन (अमानतदार, ईमानदार) कहलाने लगा। उस समाज में हर प्रकार की बुराई प्रचलित थी जैसे अन्याय, अत्याचार, लूटपाट, मारकाट, नग्नता, शराब, जुआ, ब्याज, खानदानी दुश्मनीयां, औरतों को भोग विलास की वस्तु समझना, बच्चियों को जीवित दफनाना आदि। लोगों ने प्रत्येक दिन का अपनी इच्छानुसार एक पूज्य बना रखा था जिन्हें रूढ़िवादी कर्मकांडों द्वारा पूजा जाता था। 
 
समाज की इस दशा को देख कर दुखी होने के बाद, वह महात्मा गुफा में ध्यान अवस्था में लीन रहने लगे। एक रात उनके पास ईश्वर का फ़रिश्ता (देवता दूत) ईश्वर की तरह से संदेश लेकर आया कि ईश्वर ने तुम्हें लोगों के उद्धार के लिए चुना है और अब तुम लोगों का मार्गदर्शन करोगे। ईश्वर की छत्रछाया में वह लोगों तक सत्य और ईश्वर का संदेश पहुँचाने लगे। उन्होंने लोगों को समझाना शुरू किया कि हम सबको बनाने वाले ईश्वर की आज्ञा अनुसार जीवन जीयो, सभी मनुष्य एक जोड़े की संतान है, अमीर ग़रीब सब इंसान है, गोरे और काले सब समान है, ऊंच नीच अन्याय है, औरत और मर्द बराबर है, सबको सम्मान से जीने का अधिकार है और सत्कर्मों के आधार पर मनुष्य बढ़ा बनता है आदि।
 
ये सब शिक्षाएं, उन लोगों के वर्चस्व के विरुद्ध थी जो पीढ़ियों से वंहा स्वार्थी व्यवस्था चला रहे थे और कमज़ोरों का खून चूस रहे थे। ये लोग उस महात्मा और उनके अनुयायियों के पीछे हाथ धो कर पड़ गए। उनको यातनाएं दी गई, षड्यंत्र रचे गए, जानलेवा हमले किये गए। यहाँ तक कि उन पर कई बार युद्ध भी थोप दिया गया। मजबूरन उनके अनुयायियों को हथियार उठा कर आत्मरक्षा करनी पड़ी। पर फिर भी वह महामानव अपना काम करते रहे और अगले 23 साल में उनके लगभग सवा लाख सत्संगी (सहयोगी) और लाखों लोग अनुयायी बन गए। अंत में पूरे अरब के लोग उनके अनुयायी बन चुके थे। दुनिया में आज ये संख्या लगभग दो अरब है। अमीर अपनी बचत का 2.5% अनिवार्य दान गरीबों को देने लगे। औरतों को वसीयत और मेहर जैसे अधिकार मिले। कमज़ोरों को वज़ीफ़े मिलने लगे। देखते ही देखते शांति का प्रसार होने लगा और अंततः सभी बुराइयों का अंत हो गया। लोग ईश्वर के दिये सिद्धान्तों पर जीवन व्यापन करने लगे। 
 
इतनी सफलता के बाद भी उस व्यक्ति ने अपना जीवन बड़े ही साधारण ढंग से जीया। उन्होंने कभी किसी दिन दो वक्त का खाना पेट भर कर नहीं खाया। अपने अंतिम समय में उनके कपड़ो पर अनगिनत जोड़ (पैबंद) लगे हुए थे। मृत्यु के समय उनके घर के दीये में तेल तक नहीं था और यंहा तक कि उन पर कुछ ऋण भी बकाया था।
उस महान व्यक्ति का नाम हज़रत मुहम्मद सल्ल. था। उन्होंने यही शिक्षा दी कि हमारा मालिक केवल एक निराकार ईश्वर है और अच्छे कर्मों के आधार पर मृत्यु पश्चात हमारे लिए स्वर्ग और नर्क का जीवन प्रतीक्षा कर रहा है। उन्होंने बताया कि ईश्वर के भेजे गए सभी मार्गदर्शक (संदेशवाहक, ईशदूत, संदेष्टा) सच्चे थे और उनकी शिक्षाएं मानव जाति के लिए कल्याणकारी थी। उन्होंने ये भी बताया कि वह कोई नया धर्म लेकर नहीं आये है बल्कि वही सनातन धर्म (दीने कय्यिम) लेके आये है जिसे दुनिया के आरंभ में दिया गया था और जिसे संसार के प्रथम मनुष्य ले कर आये थे। उनके बाद मानव जाति के मार्गदर्शन के लिए प्रत्येक काल व प्रत्येक स्थान में ऐसे ही बहुत से संदेशवाहक लगातार आते रहे जो वंही की स्थानीय भाषा में ईश्वर की वाणी लाते थे ताकि लोग संदेश को आसानी से समझ सकें। ईश्वर के मूल संदेश में बिगाड़ या मिलावट आने पर ऐसे संदेशवाहक उसको पुनर्स्थापित करने के लिए आते थे। उन सभी का संदेश सैदव एक समान ही होता था जिसे धर्म (दीन) कहा जाता है। 
 
सबसे पहले ईश्वर ने भारत की धरती पर ही सत (सत्य) का संदेश दिया और मानवता यंहा से शुरू हुई। इसीलिए भारत की धरती सभी मनुष्यों के लिए पूण्य (पवित्र) भूमि है। हज़रत आदम (स्वयम्भू मनु) को प्रथम ईश्वदूत बनाकर भारत की धरती पर भेजा गया था जिन्होंने बाद में मक्का में जाकर ईश्वर की उपासना के लिए क़ाबा का निमार्ण किया। फिर भारत में ही हज़रत नूह (वैवस्वत मनु) को ईशदूत बनाकर भेजा गया। ऐसे ही अन्य ईश्वदूत जैसे अब्राहम, मोज़ेज़, जीसस आदि दुनिया भर में कोने कोने में समय समय पर आते रहे जो अपने समुदाय व क्षेत्र के लिए वही समान सदेंश लाते थे। अंतिम ईशदूत मुहम्मद साहब अरब में आये जो पूरे विश्व के लिए संदेश लाये थे। हम सभी ईश्वदूतों का आदर और अनुसरण करते है। हम विभिन्न धर्मों के महापुरुषों का भी सम्मान करते है और उनकी कल्याणकारी शिक्षाओं पर भी चलने का प्रत्यन करते है जैसे श्रीराम, श्रीकृष्ण, ज़रथुरष्ट, गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी और गुरु नानक साहब आदि। सभी समाजसुधारक हमारें लिए प्रेणना और आदर्श है।
 
पैग़म्बर मुहम्मद साहब को क़ुरान में ईश्वर ने रहमतुलिल आलीमीन कहा है अर्थात सम्पूर्ण सृष्टि के लिए करुणा। इसलिए पैगम्बर मुहम्मद साहब के जन्मदिन (जयंती) 12 रबीउलअव्वल को यौमे रहमत या करुणा दिवस या Compassion Day कहा जाता है। पूरे वर्ष के साथ साथ, इस दिन (19th October, 2021) विशेष रूप से करुणा का कोई भी एक कार्य करने का अवश्य प्रयास करें।
 
~ अल्लामा सय्यद अब्दुल्लाह तारिक़ साहब।
 
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अरब में बच्चा पैदा हुआ. चारों ओर जहालत. बच्ची और स्त्रियों की हालत. बाप दादओं के ज़माने से दुश्मनियाँ. माँ बाप की मृत्यु, चाचा की भी मृत्यु. सादिक और अमीन लकब. खानदानो में होती हुई लड़ाई संगे/हजरे अस्वद का विवाद का हल आपके हाथों में दे दिया. हल्फुल/हिल्फुल (दोनों नाम सही) फजूल में भागी जिसका मक़सद किसी पर अत्याचार नहीं होने देंगे, हक़ नहीं मारने देंगे. कहा था दुबारा बने तो शामिल होंगा, मुस्लिम तो खुद एक तंजीम थे, यह गैर मुस्लिम की तंजीम की ओर ईशारा था. एकांत में बैठना शुरु हुआ. वाणी आई तो नमाज़, हज, रोज़ा बाद में आदेश आया. अत्याचार, अनाथों, बच्चियों के लिए आदेश आये. उसे दौलत, औरत, शोहरत, बादशाही सभी प्रलोभन दिए गए, मगर उसने नहीं माने. ऐसी शिक्षाएं दी जो वंहा की सारी समस्याओं को हल कर सके. आज की सरकारों से ज़्यादा गरीबी रेखा निर्धारित करी. बेटी की परवरिश पर जन्नत की बात कही. एक आदमी मक्का के बाहर बैठ कर आने जाने वालो को कहता था की फला मेरी बेटी उठा लाया है, नबी को टकराया, नबी ने उसके घर जा कर सिर्फ यही कहा कि इसकी बेटी वापिस करो और उसने डर के कर दी. महापुरूषों की बात में रौब होता है और हिल्फुल फ़िज़ूल के मेम्बेर भी थे.

पडोसी को खाना दो, ईमान जाता रहा, उनसे बड़ा किसका फतवा, 40 घरों को पड़ोस करार दिया. इसमें मुस्लिम, गैर मुस्लिम की शर्त नहीं लगाई. वो खुद क्यों मांगे, उसकी self respect क्यों hurt हो, आपको ध्यान रखना था.

दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...