क्या कुरान के लफ़्ज़ों में फर्क है? क्या क़ुरान के कई वैरिएंट मौजूद है?
क़ुरान एस्टेब्लिशड हिस्ट्री की तरह ही आगे बढ़ा है। भाषा भी इसी तरह आगे बढ़ती है। सिकन्दर और यीशु को इसी तरह लोग मानते है पर फिर भी हिस्टोरिकल और मायथोलॉजीकल लोगों पर हमेशा बहस होती रही है। इस्लामिक साहित्य से बिदअत का इतिहास मिल जाता है जैसे फल बिदत कब शुरू हुई है। जबकि सुनन्ह नबी तक पहुँच जाती है। लगभग 25 के करीब पिछली सुन्नत नबी ने आगे जारी की। अरब में याद करने का रिवाज था जैसा बहुत सी जगह होता है। ह. अबु बकर को अपने खानदानी शजरा और आशार याद थें। लोग कुरान, किरात, हदीसें वगरेह आसानी से याद कर लेते थे.
क़ुरान में अल्लाह ने कहा हैं कि हम ही इसे सुरक्षित रखेंगे और पढ़के सुनाएंगे। यानी मुसन्निफ़ ने ही अपनी किताब को खुद तरतीब दी है. क़ुरान ने कहा कि हम खुद क़ुरान को जमा (लफ्ज़ जमाहु आया है) करंगे और पढंगे। अल्लाह ने कहा कि जब हम इसे पढ़ेंगे तो इसकी पैरवी करना। पूरा क़ुरान कोई गुफा में बैठ कर नाज़िल नही हुआ था बल्कि वो लाइव चल रही परिस्थितियों में आया था। इसमें उस समय के लिए आदेश दिए गए थे जो बाद में आने वाले समय के लिए भी हिदायत बनने थे। असल में कुरान की तरतीब मुख़ातिबों के लिए अलग थी और आने वाली उम्मत या दुनिया के लिए अलग। जैसे आज भी बुक्स एडिट होके प्रिंट होती है। पहली वो आयतें और किरात थी जो वक्तन ब वक्तन मसलिहत के तहत नाजिल होती रही लगभग २३ साल तक. इसके बाद नबी की वफात से पहले कुरान को वर्तमान उपलब्ध तरतीब और किरात दे दी गयी. कुछ लफ्ज़ भी बदल दिए गए जो बेहद मामूली बदलाव थे और जिनसे मायनों में कोई फर्क नहीं पड़ा. ये छोटे मोटे बदलाव थे क्यूंकि अगर कोई बड़े बदलाव होते तो मायने बदल जाते. इन बदलावों को देख के पता लगता है कि सिर्फ थोड़ा सा अपडेट हुआ है, ज़ाहिर है ये बदलाव नए लोगों के लिए हुआ लगता है। आखिरी दौर में जिब्राईल अलैह ने 2 बार पूरा कुरान को दोहरवाया. एक बार नबी को सुनाया गया और फिर नबी ने उन्हें सुनाया. इस वक़्त खुदा ने कुरान की तरतीब और पिछली किरात के चंद लफ्ज़ बदल दिए ताकि बाद में आने वालों को सुनते और पढ़ते हुए अजनबियत न महसूस हो. जैसे कि ‘तुम जानते हो’ को बदला गया ‘वो जानते है’ से क्योंकि अब पूरी उम्मत कुरान की मुखातिब है, न की सिर्फ उस वक़्त के अरब। इस किरात के वक़्त नबी के साथ बाज़ सहाबा भी शामिल हुए थे।
क़ुरान पहले वाले नुज़ूल या किरात को अर्ज़ा ए उला कहा गया और बाद वाले को अर्ज़ा ए आख़िरा। अर्ज़ा ए आख़िरा कि किरात को किरात ए उम्मा भी कहा गया। अब इस कुरान के शाने नुज़ूल या पुरानी तरतीब की ज़रूरत नही है। वो महज़ एक इतिहास है। यानी नया वाला आखिरी क़ुरान होगा जिसे अर्ज़ा ए अखिरा कहा गया। क्यूंकि आखिर में नई तरतीब और किरात दी गयी. इसलिए अब अर्ज़ा ए आख़िरा को ही पढ़ा जाना चाहिए और हम आज भी वही पढ़ रहे है। हम जिसे आज पढ़ रहे है, वही मुतवातिर है। यही क़ुरान हर जगह गया जैसे इंडिया, इंडोनेशिया वगेरह। सिर्फ कुछ जगह है जहाँ क़ुरान कुछ इख़्तेलाफ़ के साथ चलन में है जिसमें एक अफ्रीका के कुछ हिस्सा है, ज़ाहिर है वंहा कुरान का पुराना अर्ज़ा ए उला वाला कुछ हिस्सा पढ़ा जा रहा है. वंहा तीसरी सदी हिजरी में एक क़ाज़ी ने फतवा देके इस कुरान के अर्ज़ा ए उला वाले कुछ हिस्से को नाफिस कर दिया जो आगे चलता गया और आज तक वंहा चल रहा है। जैसे यंहा हदीसे नाफीस है जो असल चली आ रही अमली सुन्नत से अलग एक सुन्नतों का रिकॉर्ड है।
बाज किरात नबी से सीखी लोगों ने सीखी थी पर आखिरी वाली किरात ने पिछली सभी किरात को सुपरसीड कर दिया। पर लोगों ने पुरानी वाली किरात भी रिकॉर्ड कर रखा था। लोगों ने इसे याद कर रखा था और लिख रखा था. इसलिए इस क़ुरान की अखाबरे अहद से दूसरी किरात भी मुंतकिल हुई। अखबारे अहद से मुराद उन रिवायतों से है जो सुन्नत के साथ आगे बढ़ायी गयी पर उतनी तादात में नहीं जितनी की आम सुन्नत लोगों ने जारी रखी. हदीसों को भी इल्म की दुनिया में अखबारे अहद कहते हैं क्यूंकि वो हदीसों के तौर पर कुछ सहाबा ने आगे बयान की पर आम उम्मत ने आपकी आम सुन्नतों को अमल से जारी रखा. यानी क़ुरान में हुए बदलाव जो शुरवाती और आखिरी किरात के दरमियाँ में है, वो भी महफूज़ हुए रिवायतों के ज़रिये। पर असल क़ुरान तो हर जगह महफूज़ रहा और वही चलन में भी रहा. पुरानी परमपरा के आधार पर उम्मत, अखबारे अहद स्वीकार करती है। क़ुरान मीज़ान और हक़ है इसलिये उसे ही मुतवातिर होना चाहिए न कि अखबारे अहद को। क़ुरान की अखाबरे अहद को समान्यता स्वीकार किया गया जैसे हदीसों को किया गया। पर मुतवातिर कुरान ही सही है क्योंक ये क़ुरान की आखिरी किरात पर आधारित है। किरात के नियम भी हदीस के समान है। किरात के उलेमा ने भी हदीस जैसे नियम बनाये। किरात को भी सनद के साथ महफूज़ किया गया। मुसहफ ने इसे स्वीकार किया। ये किरात मुतवातिर नहीँ बल्कि अखाबरे अहद है। जबरी ने अख़बारे अहद को किरात में स्वीकार किया है जैसे हदीसों में भी ली गयी है। हदीस भी ऐसे बयान हुई है। बोलने और सुनने वाले तैयार थे कि ये किरात की रिवायतें आगे बढ़ाई जाए तो बढ़ी। ये भी हदीसों की तरह तारीखी रिकॉर्ड है
ह. अब्दुल्लाह मसूद और ह. काब ने ऐसी इख्तिलाफ वाली चीज़ें बयान की है। बाज़ दुसरे लोगों ने भी की है. दोनों ने अपना सख्त रवैया दिखाया, दोनो ऊला की किरात प्रचार करते थे। हज़रत उमर और उस्मान ने इसे रोकना चाहा जिनके पास पुरानी किरात व मसाहिफ़ थी, उन्हें बयान करने से मना कर दिया बल्कि उन्होंने ऐसे अलग किरातों के नुस्खें भी जलाए। ह. उमर ने कहा कि ऐसी बातों को संजोओ मत। पर क्यूंकि राय की आज़ादी थी तो फिर भी लोगों ने इन्हें आगे बढ़ाया। अब्दुल्लाह इब्ने मसूद ने अपनी मुसहफ देने से मना कर दिया कि मैंने ये नबी से सुने है और कूफ़ा में उन्होंने लोगों से कहा कि ऐसी मुसहफे छिपा लें, जब इन्हें जलने के लिए माँगा जा रहा था। पुरानी किरात पढने से जब ह. उबय बिन काब को ह. उमर ने रोका तो उन्होंने कहा कि मैंने जो रसुल से सुना है, मैं तो बयान करूंगा (बुख़ारी हदीस)। बाज़ लोगों के रवैये ऐसे थे क्योंकि उन्हें नबी की हर चीज़ से मोहब्बत थी क्यूंकि हर तरह के इंसान होते है। वो इन्हें हिस्टोरिकल रिकॉर्ड की तरह रखना चाहते थे। उन्होंने नई किरात का इनकार नहीं किया और न ये कहा कि सिर्फ मेरी मुसहफ हक पर है। उनका ये इनकार आखिरी किरात पर नहीं था की वो आखिरी किरात को नहीं मानते थे बल्कि रसूल से मुहब्बत में उनसे सुनी कोई भी बात को छोड़ना या भूलना नहीं चाहते थे। उन्होंने ये नहीं कहा कि ये हमारा क़ुरान ही असल है। बल्कि आखिरी किरात पर उनका भी ईमान था. पर अपने बनाए गए ऐसी नुस्खों को वो बचाना चाहते थे जो असल में ये अखाबरे अहद थे। दुसरे लोगों ने भी इनको महफूज़ किया। आज भी हम अपनी किताबों में नोट्स बनाते और संजोतें है।
जैसे मौज़ू हदीसें गढ़ी गयी वैसा ही किरात के साथ हुआ और वो भी गढ़ी गयीं क्योंकी मुनाफ़िक़ नबी के बाद भी थे। ऐसी मतभेदी थोड़ी सी चीज़ें थी जो इज़ाफ़ा होते होते एक बड़ा जखीरा हो गई वैसे ही जैसे लाखों हदीसें हो गई। in दोनों किरातों के अलावा भी बाद में लोगों ने अपने आप कुछ समान शब्द आगे पीछे कर दिए। ये बिना ज़ेर ज़बर के बदलाव आये थे. ऐसे बदलावों के दूसरे कारण भी थे। छुटे हुए शब्दों को अधिकतर रिकॉर्ड किया गया । कहा जाता है कि आज 6000-7000 जगह ऐसा फर्क है जो की गलत है. तबरी की किताब उल किरात जो आज खो चुकी है में तबरी ने कहा है कि ये बदलाव बहुत ही कम है। यानी वक़्त के साथ भी किरात के बदलाव बढ़ते गए. सूरह फातिहा में आये मालिक लफ्ज़ तावतुर से आया है जबकि मलिक लफ्ज़ हो सकता है ऊला की किरात से आया हो या किसी बनावटी किरात से आया हो या गलती से आया हो। पर अब मालिक ही पढ़ा जाएगा। मीरास का कानून किरात पर आधारित है जो तफसिरों में आ गई है सो सियासत में इस्तेमाल हुआ।
इसके बाद ऐसे लोग आए जिन्होंने इसे फन बनाया। इस पर तहक़ीक़ की। हदीस की तरह किरात के उसूल बने। ये हदीस, किरात जैसी ही है। शाने नुज़ूल में दिलचस्पी जागी तो वो भी लिखा गया। इल्म की दुनिया मे पुरानी किरातें और गढ़ी हुई किरातें सीखना शुरू हुई। आम आदमी तो वही क़ुरान पढ़ रहा था। ये तावतुर इन कारियों से शुरू हुआ जो आगे चला, उससे पहले तो ये अख़बारे अहद थी। ऐसा ही हदीसों के साथ हुआ। इमाम जज़री ने इन किरातों को मुतवातिर मानने की बात को रद्द किया है। जैसे हदीसों के लिए 5 मयार हैं, किरात के लिए 3 मयार हैं। सही सनद हो, अरबी दुरुस्त हो और उसमानी मुसहफ़ से मिलती हो। इन 3 में मुतवातिर होना शामिल नहीं है। दलीलें दी जाती हैं कि क़ुरान का जितना स्केलेटल टेक्स्ट मुतवातिर है, तलफ़्फ़ुज़ मुतवातिर है, जितने क़ुरान पर 7 कारी मुत्तफ़िक़ हैं, उतना मुतवातिर हैं। मयारात - सनद, अरबी, मुसाहिफ़ से नहीं हो। इन्हें मुतवातिर कह दिया जाता है।
नबी ने कुरान अलग अलग तरह से नहीं पढ़ा बल्कि क़ुरैश की तरह पढ़ा। अल किरात उल खास्सा जिनसे वजूद में आई। क़ुरान की लिखवाट, किरात और लहज़ा तीनों मुंतक़ील हुए है। कोई अंतर होने पे बाद वाली किरात ही मान्य है। अरब लहज़े में पढ़ना सीखाने वाले पैदा हुए। अलग अलग लहज़े थे। हफ़्स, वर्श, नाफ़े ने लहज़े ही सिखाये है। हफ़्स की किरात से मतलब है जो उन्होंने अर्ज़ा आखिरा को पढ़ाया। इसमें उन्होंने पिछली कोई स्टाइल नहीं पढ़ायी, मतन भी नही बदला। हफ़्स, आसिम के शागिर्द है। आसिम अबू अब्दुर रहमान सुलमी के शागिर्द है। सूलमी ने ये मदरसा शुरू किया। इस मदरसे ने फैसला किया कि वो लहज़ा पढ़ाएंगे पर किरात अर्ज़ा वाली ही होगी। सुलमी अर्ज़ा वाली किरात पढ़ाते थे और दूसरों से कहते थे कि जैसी किरात तुमने पढ़ना शुरू की है वो न तो अबु बकर, उमर, उस्मान, अली, ताबित, किसी ने नहीं पढ़ा। अर्ज़ा की किरात में किसी किरात वाले को कोई इख्तियार नहीं था, अपना स्टाइल शामिल करने का. ये इख्तियार हफ़्स में नहीं था इसलिए सुलमी दूसरी किरात नहीं मानते थे। अब जो तजवीद सिखाते है, ये वही किरात और लहज़ा है जो हफ़्स की है यानी अर्ज़ा कि किरात है। यही इख्तियार शामिल करना हदीस, फ़िक़ह, किरात में भी हुआ था। लोग इसमें इख्तियार पसंद करने लगे। लोग इख्तियार पढ़ाने लगे. इमाम मालिक ने नाफ़े के इख्तियार को पसंद करते थे, क्योंकि उन देशों में फ़िक़ह में मालिक को अनुसरण करते थे तो उन्ही की कीरत ले ली, जिसे बाद में मालिकी फिकह मानने वालों ने अफ्रीका के हिस्से में फतवे के ज़रिये नाफिस कर दिया. अफ्रीका में मालिकी फ़िक़ह था, वंहा नाफ़े की किरात फतवे से लागू हो गया। मलिक के उस्ताद थे नाफ़े। वो मालिकी थे। क्यूंकि काज़ी राजा के बराबर होता था तो यही नाफिस की हुई किरात चल पड़ी. नाफ़े को कई वेरिशियन मिली एक आयात पे, उन्होंने एक को तरजीह दे दी, दूसरी आयतों के साथ भी ऐसा ही किया। इससे उनकी किरात सामने आई। दूसरे कारियों ने भी यही तरीका इस्तेमाल किया। यह कहा जाता है कि खिलाफत की वजह से ही हफ़्स की किरात को मक़बूलियत मिली जबकि सबसे पहले किराते आइम्मा ही मुस्लिम के ज़रिए सब जगह अरब से बाहर गई थी। असल में बाद में आइम्मा को ही हफ़्स कि किरात कहा गया। हफ़्स से पहले इसे किराते आइम्मा ही कहा जाता था। इन्होंने कुरैशी इख्तियार किया और ग्रामेटिकली वैगरह के तौर पर इन्हें जो अपनी पसंद से पढ़ना सही लगा, उसे तरजीह दी। सभी किरात वालों ने अपने कुर्रा बनाये। हफ़्स और नाफ़े ने अपना इख़्तियार नही लिया, सिर्फ लहज़ा लिया और आइम्मा किरात को ही आगे बढ़ाया। इसलिए आइम्मा को किरात को ही हफ़्स कहा गया। नाफ़े की किरात की सनद उनके उस्तादों से होती हुई नबी तक जाती है। इसमें किरात की सनद है। न कि ये कि उन्होंने मालिक को मलिक सुना यानी लफ़्ज़ों का ज़िक्र नहीं है। हफ़्स ने क़ुरान के लहजें को इस्तेमाल किया है पर अपना इख़्तियार इस्तेमाल नहीं किया है। सबसे प्रचलित हफ़्स है जो कूफ़ा के आसिम की किरात है। वरश की किरात नाफ़े की किरात है।
7 कारियों की सनदें नबी तक नहीं जाती बल्कि उनके उस्ताद तक जाती हैं यानी कारियों तक जाती है। वो भी लफ्ज़ ब लफ्ज़ की बात नहीं आती सिर्फ पूरी किरात का ज़िक्र आता है। जबकि ऐसी हदीसें मुंकतिए है, सनदें कमज़ोर हैं। अबू बक्र मुजाहिद ने बहुत सी किरात से 7 चुन ली। एक एक ली मक्का, मदीना, श्याम, दमिश्क/बसरा से और 3 ली कूफ़ा से। हर किरात के 2 कारी मशहूर हो गए। 2 अलग अलग इलाक़ों से थे। कुल 14 किरात हो गई। लगभग 25 के करीब पिछली सुन्नत नबी ने आगे जारी की। जिनकी भी किराते मशहूर हैं, इनको 200 साल बाद ये नाम मिले जबकि 150 साल तक इन्हें किराते आइम्मा कहा जाता था।
स्क्रिप्ट के प्रकार और लफ़्ज़ों की बनावट में फ़र्क़ है पर लफ्ज़ वही रहते हैं। इब्ने खल्दून ने इस तरह की मुसहफ और स्कराईबल गलतियों को हटाने को कहा था। उनकी बात रद्द कर दी गई ये कहकर की ये सब सहाबा की लिखावट है। मवारदी और फराही ने कहा कि क़ुरान की किरात नई आयी है और पिछली खत्म। क़ुरान खुद अपनी तारीख बयान करता है। ज़हबी, राज़ी, दानी, अबूबक्र बिन मुजाहिद, इन कारियों को कभी नहीं कहा कि ये मुतवातिर हैं। इमाम जज़री ने बाद में मौकिफ़ बदल के कहा कि ये मुतवातिर नहीं है। पहेले की मसाहिफ़ में डैक्रिटिकल मार्क्स नहीं होते थे क्योंकि इनकी ईजाद ही 688 ई. में हुई है, अद दौली द्वारा। यंहा तक कि स्केलेटल डॉट्स भी बाद में डाले गए हालांकि वे 267 ई. से प्रयोग में थे। ये माना जाता है की हज़रत उस्मान ने इन निशानों को इसलिए अपनी मुसहफ में शामिल नहीं किया था क्योंकि वो चाहते है लोगो सिर्फ लिखावट पर निर्भर न हो जाये बल्कि क़ुरान को ज़ुबानी याद रखके उसकी किरात लहज़ा आदि मुंतकिल भी करे। अबू बकर, उमर, उस्मान, अली और इब्न हजाज के ज़रिए क़ुरान को रिकॉर्ड और इकठ्ठा करने का ज़िक्र आता है जबकि इन्होंने सिर्फ कॉपी बनवाई थी। रिवायतों में गड़बड़ियां है। आज कोई भी उस्मानी मुसहफ असली नहीं है। ये जो मिलती हैं ये सभी 100 साल बाद कि है जो कूफ़ी क़ुरान हैं। नबी के वक़्त में हिजाज़ी क़ुरान होते थे। उनके वक़्त में एक भी कूफ़ी क़ुरान नहीं था। बरमिंघम में रखी मैनुस्क्रिप्ट हिजाज़ी स्क्रिप्ट की है जो लगभग नबी के 30 साल बाद कि है और अबतक की सबसे पुरानी है। यह स्क्रिप्ट आइम्मा है। ये सना वैगरह की मैनुस्क्रिप्ट उन्हीं वैरिएंट्स की मिलती है। ये बिल्कुल मिलेंगी। इल्म अल खास्सा और इल्म अल आइम्मा में फर्क करना ज़रूरी है।
लहज़ा या तजवीद एक साइंस बन चुका है। हिंदुस्तानी लहज़ा में पढ़ना भी जायज़ है पर अरबी लहज़ा सबसे बेहतर है। हिंदुस्तान में तफ़्सीर करने वालों ने इन किरातों को नहीं लिया।
अबु हनीफ़ा के यंहा मान्यता है की जो रिवायत चली आ रही है रोज़े नमाज़ की, उसी पर आगे चलेंगे, जंहा इश्तिहाद की जरूरत होगी वंहा इश्तिहाद कर लेंगे। ये उनके बुनियादी उसूल है। बाकी आइम्मा के यंहा अखबारे अहद की रिवायतें आ गई तो उन्हें कुबल करते है और उनके मुताबिक तब्दीली कर चुके है। हालांकि इस वक़्त के हनाफ़ हंबली हो चुके है पर पहले नहीं थे शुरुआत में। हनफ़ी इख्तियार के कायल नहीं थे। जैसे अब हदीस की बुनियाद पर हाथ ऊपर बांधने लगे है, यही तो इख़्तियार है।
नासिख़ और मंसूख।
मदिना में मुनाफ़िक़ नबी से अकेले में मिलने की गुजारिश करते थे। क्योंकि नबी एक निहायत ही शरीफ इंसान थे तो उनसे भी मिलते थे जबकि उन्हें मायूस लौट भी सकते थे। बाद में वे लोग नबी से की गई बातचीत का बतंगड़ बनाके बाहर जाके विवाद पैदा करते है। इसलिए अल्लाह ने लोगों से मुलाक़ात करने पर कुछ चार्ज करने की शर्त लगा दी। बाद में इस शर्त की वजह से कुछ गरीब लोगों की नबी से मुलाक़ात नहीं हो पाती थी। इसके बाद अल्लाह ने इस शर्त को खत्म कर दिया क्योंकि उन लोगों को मुलाक़ात की एहमियत दिलायी जा चुकी थी और ये भी बताया जा चूका था कि मामले हमारे हिसाब से चलेंगे। रोज़े और जिहाद की आयतों को भी नसख किया गया। जैसे कि पहले कहा गया कि रोज़े को छोड़ सकते हो तकलीफ या सफर की वजह से, बाद में पूरा कर लें, सदक़ा दे दें अगर बाद में भी न रख पाए तो। जब लोगों को रोज़े का अभ्यास हो गया तो कहा गया कि अब रोज़ा ही रखा करो। आम मुस्लिम पांच मक़ामात में सरकमस्टेंशल नासिख़ और मंसूख मामले मानते है। जिनमें से कुछ इस तरह है। पहले वसीयत को लाज़िम करार दिया गया, फिर अहकाम आये। पहले एक मुस्लिम को दस पर भारी कहा फिर मुस्लिम के ईमान वैगरह की कमज़ोरी को देख के दो पर भारी कहा गया। जानी को घर मे उम्र कैद की सज़ा हुई या फिर कोई अहकाम आ जाये कहा गया। फिर सौ कोड़े की सज़ा आ गई।
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कुरान ने कहा है कलम के ज़रीय इल्म सीखाया यानि कुरान. कुरान ने कहा जो तुम लिक रहे हो यानि कुरान. किसी भी किताब का हाफिज तभी हो सकता है जब वो तरतीब से हो. नबी के वक़्त में ही कुरान तरतीब साथ साथ दिया जा रहा था, लिखा हुआ भी था और हाफिज भी मौजूद थे. कुरान के हाफिज जब जंगों में मरे और जब इस्लाम अजम में फैला और अजमी गलत अरबी पढ़ रहे थे, तब हजरत उस्मान ने कुछ फैसले लिए.
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उलेमा ने लोगों को बहकाया की क़ुरान नबी ने जमा नहीं किया। क़ुरान अल्लाह ने तरतीब दिया और अल्लाह ने उसकी किरात करवाई। क़ुरान ने खुद ये बात बताई है। नबी के वक़्त में ही क़ुरान एक किताब को शक्ल में मौजूद था। ऐसा कैसे हो सकता है कि दुनिया के आखिरी नबी दुनिया मे आए और हपहले की किताबो को तब्दील होने की बात बार बार कहें और फिर अपनी आखिरी किताब को महफूज़ न करके जाए। ये बात गले से हमारे तो उतर नहीं सकती। उलेमा ऐसा माने तो माने। हदीसों ने ही ये ग़लत बात फैलाई है। बाकी ईसा की वापसी पर सब ठीक हो जाएगा, ऐसा कुछ नहीं होगा। अल्लाह ने सब ठीक करने की ज़िम्मेदारी उम्मत को दी है, जो करना है हमें करना है।
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कुरान नबी के वक़्त में ही किताब के तौर पर महफूज़ हो चूका था. लोगों ने अलग चीज़ों पर भी लिख रखा था. शायद इसिलिए इन्हें ही इकठ्ठा करने को ज़ैद बिन साबित ने बहुत मुश्किल काम बताया था.
रसूल ने कुरान लेकर दुश्मन की धरती पर जाने से मना किया है, कहीं ऐसा न हो कि वह दुश्मन के हाथ लग जाए। (बुखारी, मुस्लिम 1869, माजा 2879, दाऊद 2610)
अनस ने कहा, "कुरान को पैगंबर के जीवनकाल में चार पुरुषों द्वारा एकत्र किया गया था, जो सभी अंसार से थे: उबई, मुआज़ बिन जबल, अबू ज़ैद और ज़ैद बिन साबित। (बुखारी 3810, 5003)
जैद बिन साबित ने कहा कि वह पैगंबर के समय में चर्मपत्र आदि पर लिखे गए कुरान को एकत्र करते थे.
जंगे ख़ैबर के बाद अपने कबीले के साथ साक़ीफ क्षेत्र के उस्मान इब्न अल आस ने नबी के पास आये. उनकी ज़हानत देख कर नबी ने उन्हें साक़िफ़ (ताइफ़) का गवर्नर बना दिया. उन्होंने नबी से वहीँ रखी हुई एक कुरान (की एक प्रति) मांगी कि क्या वो उसे रख ले, नबी ने उन्हें दे दी.
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Quran was one and its recitation or dialect revealed was also 1, and not 7
Some scholars differe on this and say that the Quran as a single piece was secured by the Prophet himself. Each year, the Quran would be read out to the Prophet once, however, the year he died, it was read out to him twice. The qiraat of Abu Bakr, Umar, Uthman and Zayd ibn Thabit and that of all the Muhajirun and the Anṣar was the same. They would read the Quran according to al qiraat al ammah. This is the same qiraat done twice by the Prophet to Gabriel in the year of his death. Zayd ibn Thabit was also present in this qiraat called al arḍah al akhirah. Till his death, it was this qiraat according to which Prophet taught the Quran to people. Consequently, only this qirat is transmitted through continuous mass transmission from the time of the Companions to date. Our scholars generally call it the qirat of Hafs (d. 180 AH) whereas it is actually al qirat al ammah. The qiraat according to which the Quran was read out to the Prophet in the year of his death is the same conforming to which people are reading the Quran today. This is evident from:-
1. On 7 Dialect hadith, Imam Al Suyuti had finally confessed that it should be regarded among mutashabihat, the matters whose reality is only known to God (Al Suyuṭi, Tanwir al ḥawalik ila al Muatta Imam Malik, 2nd ed. (Beirut, Dar al jil, 1993), 199.
2. The word aḥruf connotes various pronunciations and accents the Arabs were accustomed to. However, the text of the ḥadith itself negates this interpretation as Umar and Hisham belonged to the Quraysh and people of the same tribe could not have had such differences.
3. Even if the difference of pronunciation and accent were among the individuals from various tribes, the verb unzila (was revealed) in this narrative still remains inexplicable. That is because the Quran has specified that it is revealed in the language of the Quraysh. After this, it can be accepted that the various tribes were allowed to read the Qur’ān according to their particular dialects and accents, but how can this be accepted that the Almighty Himself revealed the Quran in various dialects.
4. it is known that Hisham had accepted Islam on the day Makkah was conquered. If this hadith is accepted, it would mean that even after the conquest of Makkah, the senior Companions and even a close associate like Umar were unaware of the fact that the Prophet furtively taught the Quran in some other form from the one they publicly heard from him and, according to his instruction, preserved in their memory and writing.
5. In the six canonical books of the Hadith, the narratives of seven ahruf and the collection of the Quran are primarily recorded on the authority of Ibn Shihab al Zuhri (d. 124 AH). Authorities of the Rijal regard him to be guilty of tadlis and idraj. Besides that, if some other facets of his personality are kept in consideration, which Imam Layth ibn Sad (d. 175 AH) mentioned in a letter to Imam Malik (d. 179 AH), none of his narratives can be accepted in such important matters.
Therefore, this is certain that the Quran has one qirat only, which is found in our codices. Besides that, various qirat found in commentaries, read and taught or in certain areas, are the remnants of those artifices from which, unfortunately, no religious discipline of the Muslims has remained safe. These qirat may have indeed arisen due to insistence of some on the qirat before al arḍah al akhirah and due to oversight and negligence of the narrators, but later on, owing to the same motives that led to the fabrication of the Ḥadith, they became so rampant that at the end of the Umayyid dynasty, several of them had come into prominence. It is said that Abu Ubayd Qasim ibn Sallam (d. 224 AH) selected 25 of them in his book. The seven qirat famous in current times were selected by Abu Bakr ibn Mujahid (d. 324 AH) at the end of the third century hijrah. Thus, it is generally accepted that their number cannot be specified, rather, every qirat is the Quran that has been reported through a correct chain of narration, is somewhat compatible with the codex of Uthman and, in some way, is in agreement with the language of the Quran. Some of these qirat are regarded mutawatir (mass transmitted). However, a look at their chains of narration leaves no doubt that they are passed down through individual narrators (ahad), where the narrators of most are suspected as unreliable (majruh) by the Rijal authorities. Consequently, let alone the mutawatir Quran, any man of insight would be hesitant to even accept these qirat as hadith.

