पहले कुछ महत्वुर्ण बातें।
कई हदीसों
में आया है की हज़रत आयशा रज़ी. की निकाह के वक्त उम्र 6 साल थी और रुखसती के वक़्त 9
साल। हालांकि ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध है कि हज़रत आएशा की शादी
16-19 और विदाई 19-22 साल में हुई थी। इस
प्रकार, इस संबंध मे 2 मत पाए जाते हैं,
पहला की हदीस के अनुसार उनकी उम्र कम थी। दूसरा कि ऐतिहासिक तथ्यों
के अनुसार उनकी उम्र बालिग़ थी जो हदीस मे किसी कारणवश गलत लिखी गयी या कम बयान
हुई। हालांकि अधिकतर मुस्लिम हदिसों के आधार पर पहले मत को सही मानते है। पर बहुत
से तार्किक मुस्लिम ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर दूसरे मत को सही मानते है क्योंकि
हदिसों को रेकॉर्ड करने या बयान करने में गलती होने की संभवना से इंकार नहीं किया
जा सकता।
पहले
समय में आम लोग पढे लिखे नहीं होते थे और इसीलिए हिसाब किताब में भी कमजोर होते
थे। पहले उम्र और सालों को याद करने का चलन भी नहीं था। लोग अंदाज़ों से अपनी
उम्रें या तिथियाँ बताते थे। यही वजह है
कि हदिसों में भी बताए गय उम्र या साल में बाज़ वक़्त अंतर पाया जात है। जैसे कुछ
हदिसो में ह. आएशा कि उम्र 6 और कुछ में 7 बताई गयी है जिससे ये भी अंदाज़ा लगाया
जाता है कि उन्होने लोगों को अपनी उम्र के बारे मे 6 साल वाली बात शुरवाती महीनों
के समय बोली गयी होगी और 7 वर्ष वाली बात आखिरी महीनों के दौरान.
पूरे
विश्व में हजारों सालों से लेके पिछली सदीतक बाल विवाह या नाबालिग उम्र में शादी
एक आम बात थी। भारत में भी इसका खूब चलन
रहा है और आज भी है। पहले विवाह करना और फिर कुछ समय बाद विदाई करने का रिवाज़ भी
रहा है। भारत में तो शिशु के जन्म लेते ही उसका रिश्ता तय कर देना और फिर कुछ वर्ष
बाद विवाह करना भी आम बात रही है। इसके
आलवा बहुत से कारणवश भारत में बड़ी उम्र के पुरुषों के साथ कम उम्र की कन्याओं के
विवाह भी होते रहे हैं जैसे 19वी सदी के निर्मला आदि उपन्यास में भी दिखाया गया
है. भारत में 1860 से पहले शादी की उम्र
10 से भी कम थी जो अंग्रेजों द्वारा निर्धारति थीजबकि समाज में तो नाबालिग आयु में
ही अधिकतर विवाह होते थे। बाकी वर और वधू की आयु में उम्र का अंतर होना भी कोई नई
बात नहीं थी।
कुछ
दशकों पहले तक मुस्लिम हदीसें नहीं पढ़ते थे बल्कि सिर्फ आलिमों से सुनते थे
क्योंकि आलिमों को ही हदिसो का इल्म होता
था। पिछली सदी में ही हदीसों का अधिकतर अनुवाद हो पाया है. इसलिए आम लोगों को ह. आयशा की शादी के वक़्त की उम्र का पता ही नहीं था और जिन इल्म वालों को
पता था, उनके लिए इस उम्र में शादी कोई
अचंभा नहीं था क्यूंकि पूरी दुनिया में यही रिवाज़ था। इसलिए पिछली सदी तक किसी ने
हदीसों में आई उनकी उम्र पर सवाल ही नहीं उठाया था। यंहा तक कि किसी विरोधी या ओरिएंटलिस्ट आदि तक
ने इसे मुद्दा नहीं बनाया कभी। 100 साल से पहले ये कोई मुद्दा नही था तो इस पर इतनी अधिक रिसर्च भी नही हुई थी। जब
रिसर्च हुई तो उनकी बालिग़ उम्र होने के तथ्य खुल के समाने आये। हालाँकि कुछ पुराने
बड़े विद्वानों को इन ऐतिहासिक तथ्यों की जानकारी थी पर ये तथ्य आम नहीं थे। अधिकतर
क्लासिकल आलिमों का इस संबंध में मत हदीस की बुनियाद पर है जबकि ऐतिहासिक प्रमाण
इसके खिलाफ है। शायद उन आलिमों को अपने समय में इन ऐतिहासिक प्रमाणों की जानकारी न
होया शायद परमपरा अनुसार उन्होंने इतिहास से अधिक हदीस को तरजीह दी।
सबसे
पहले 1400 साल पुराने अरब के समाज और परिवेश को समझ लेते हैं। मुहम्मद साहब, ह. अबु बकर, ह. उमर, ह. उस्मान, ह. अली,
पांचों इस्लाम के सर्वश्रेष्ट और सर्वोत्तम लीडरों में से रहे है।
इन पांचों के आपस मे वैवाहिक सम्बन्ध थे। एक की बेटी की शादी दूसरे व्यक्ति से हुई
थी और दुसरे की तीसरे से। यहाँ तक की मुहम्मद साहब के नबी बनने से पहले से ही उनकी
बेटियों की शादी उनके दुश्मनों के बच्चो से हो रखी थी।
इस तरीके से आपस में रिश्तेदारी और बहू विवाह इत्यादि का अरब में एक आम रिवाज़ था
जिस के पीछे अक्सर कबिलियाई निज़ाम, सांस्कृतिक, पारंपरिक, सामाजिक, राजनैतिक, व्यापारिक
अनेकों कारण होते थे। बल्कि इस्लाम के दुश्मन या गैर मुस्लिम भी ऐसी कम उम्र में
शादी करते थे या कई पत्निया रखते थे। पहले दुसरे समाजों में भी ऐसे ही
रिश्तेदारियां होती थी, भारत में भी। राजे रजवाड़ों और शाही
खानदानों में ये चलन अधिक था। उस समय दुनिया भर में, यंहा तक
की भारत में भी बाल विवाह और बहुपत्नी रिवाज चलन में थे। । हालाँकि कुरान में शादी
की लायक उचित उम्र होने पर शादी करने का आदेश दिया गया है। इसलिए अधिकतर अरबी
मुस्लिम उचित आयू में ही शादियां करते थे पर चंद लोग जल्द भी कर दिया करते थे
क्योंकि समाज में हर तरह के लोग होते है, धर्म का पूर्ण पालन
करने वाले भी और छद्म धार्मिक भी। इसलिए अरब
के उस समय के इतिहास में कम उम्र में शादियों के इक्का दुक्का उदाहरण भी मिलते
हैं।
1. तार्किक विश्लेषण – ह. आएशा नाबालिग़ नहीं हो सकती।
आम तौर पर मुस्लिम यह मानते हैं कि ह. आएशा कि कम उम्र में शादी के पीछे कारण यह था कि ताकि वो लंबे समय तक उम्मत कि सरपरस्ती करती रहें। हालांकि इस मौकिफ में एक खामी है, वो यह कि अल्लाह मियां यही सरपरस्ती का काम ह. आएशा कि शादी बचपन कि बजाए, बालिग उम्र में शादी करवा कर और उन्हें बहुत लंबी जिंदगी दे कर भी तो करवा सकता था? इसके लिए अल्लाह को उनकी शादी 9 साल में करवाने से ऐसा क्या हासिल हुआ जो अल्लाह उन्हें 19 में शादी करवा कर और 10 साल ज़्यादा ज़िंदगी देकर हासिल नहीं कर सकता था। इसलिए कम उम्र वाले मौकिफ को सही ठहराने के लिए दी जाने वाली यह वजह बेबुनियाद है और इससे यही साबित होता है कि उनकी उम्र शादी के समय बालिग ही थी। इसके अलावा इन्हीं लोगों के द्वारा एक वजह और दी जाती है की भोगलिक कारणों से लड़कियां जल्द बालिग हो जाती थी और इसलिए उनकी शादी भी हो जाती थी। पर ज्ञात इतिहास में उस समय इस तरह के कम आयु के विवाह के हजारों उदाहरण मिलने चाहिए थे जो नहीं मिलते हैं। इस हदीस को मानने वाले उलेमा में से कोई एक भी अपनी बेटी का निकाह 6 या 9 साल की उम्र में नहीं करता क्योंकि बेटी नाबालिग़ होना वजह होती है। यंहा तक कि अपने उस्तादों जिनको वो दीनी और अख़लाक़ी तौर पर सबसे बेहतरिन मुस्लिम मानते हैं, उनके साथ भी अपनी बच्चियों की शादी करवाने को तैयार नहीं होते। मगर यही उलेमा नबी की एक बच्ची या नाबालिग लड़की यानी ह. आयेश से शादी होने को बेहतरीन मिसाल बताते हुए नहीं थकते। न जाने इस सुन्नत को ये लोग कैसे तर्क कर देते हैं?
मुहम्मद साहब ने जब पहली बार विवाह किया तो वह 25 वर्ष के थे। इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है की अरब में उस समय शादी के लिए यह उम्र बुरी या अधिक नहीं समझी जाती थी जैसा की आम तौर पर बाल विवाह वाले समाज में बालिग उम्र को विवाह के लिए देर समझा जाता है। मुहम्मद साहब की पुत्रियों में ह. फातिमा का विवाह लगभग 15-22 वर्ष, ह. रुकईया का 16-23 वर्ष और ह. उम्मे कुलसुम का 20 वर्ष की आयु मे हुआ था। इस से यही साबित होता है की उस समय मे विवाह यौवन आरंभ होने के बाद ही होते थे। इसके अलावा, ह. अबु बकर ने अपनी बड़ी बेटी ह. अस्मा की शादी 26 साल की उम्र में करी थी।
2. कुरानिक प्रमाण – ह. आएशा के नाबालिग़ नहीं होने का दावा गलत है।
क़ुरान (4:6) ने कहा कि यतीम विवाह की आयु को पहुँच जाए और देखो उनमें सुझबुझ आ गई है तो उनका माल सौंप दो. इसमें साफ संकेत है कि शादी के लायक उम्र हो जाने पर शादी की जाए यानि की शारिरिक और मानसिक तौर पर परिपक्व होने के बाद। शारीरिक तौर पर सक्षम होने के बाद ही मनुष्य मानसिक तौर पर सक्षम होता है यानि कुरान मानसिक स्तर को भी विवाह के लिए महत्व देता है। इसके अलावा कुरान ने कहा (12:22) कि जवानी में पहुंचा तो उसे निर्णय शक्ति और ज्ञान दिया.
यंहा कुरान (4:6) में जो लफ्ज आया है (हत्ता यबलुग अशुद्दा) जिसके मायने है पुख्तगी यानि जवानी को पहुचें यानि पक्की उम्र के लिए आया है। फिर यही लफ्ज़ कुरान (12:22) में एक और जगह आया है (बलग अशुद्दा) जहा कहा गया है कि वो जवानी को पहुचा तो हमने ‘‘वही’’ की। इससे पता लगता है कि अल्लाह किसी बच्चे को नबी या रसूल नही बनायेगा।
ज़ाहिर है शादी के लिए दोनो व्यक्तियों की सहमती तो आवश्यक है ही। इस शर्त के पूरे होने से पहले शादी करना गलत है। ये मिनिमम ऐज है। इसके बाद जब मर्ज़ी शादी करें। चाहे 18 में, या 21 में, या 40 में या 60 में। हर व्यक्ति का शरीर, पालन पोषण, भौगोलिक क्षेत्र और स्तिथि अलग है। इसलिये इस्लाम ये कहता है कि शादी के लिए परिपक्वता आना आवश्यक है। इस्लाम शादी की उम्र की हदें बताता है कि इससे कम नही करना और इससे अधिक न करना। इसके अलावा सब मुस्लिमों की अपनी अक्ल और इच्छाओं पर बनाय गए कानून है जो सही भी हो सकते हैं और गलत भी। ह. आएशा की शादी भी क़ुरान के इन्ही शर्तो के अंर्तगत हुई थी। मुहम्मद साहब कुरान के खिलाफ एक चीज़ भी नहीं कर सकते। वह किसी शारीरिक और मानसिक रूप से कमतर लड़की से विवाह नहीं कर सकते। असल में अपने फाइनेशल मैटर संभालने लायक जो हो जाए वो बालिग है यानि शादी के लायक। क्योंकि उम्र होने के बाद भी बहुत लोगों में मचोरिटी नहीं आ पाती।
ह. आएशा पर जब बोहतान लगा था। बहुत से सहाबा भी शक के फ़ितने से बच न पाए थे। इसके बाद अल्लाह ने ही फरमाया था कि तुमने सुनते ही ऐसा इल्ज़ाम झुठला क्यों नहीं दिया, तस्दीक का इंतेज़ार क्यों किया। क्या यही काम हम लोगों को नहीं करना चाहिए जब कोई हमारे नबी और ह. आएशा पर ऐसा कम उम्र में शादी का इल्ज़ाम लगाए।
3. परिस्थितियाँ – ह. आएशा बालिग़ ही हो सकती है।
तबकात
इब्ने साद, जो
इस्लामी इतिहास की सबसे पहली किताब है, उसमें आया है (ह.
आयशा के अध्याय में) कि ह. ख़दीजा रज़ी० की मृत्यु के बाद नबी थोड़े मुरझाये से रहने
लगे थे. क्यूंकि बीवी के जाने का दुःख, बच्चों का पालन पोषण, रोज़ी रोटी कमाना, धर्म का प्रचार जैसे
जिम्मेदारियां अकेले निभा रहे थे. इस तरह ह.
खावला नामक एक सहाबिया ने महसूस किया कि मुहम्मद साहब के घर में बच्चे थे जिनको
माँ की ज़रूरत थी और एक जीवन साथी की भी. इसलिए उन्होने एक दिन ने नबी से कहा कि आप
शादी क्यों नही कर लेते जिससे आपको एक साथी
मिल जाए और आपके बच्चों की देखभाल भी हो जाये। इस पर नबी ने पूछा कि कोई रिश्ता है. ह. खावला ने कहा कि दो रिश्ते हैं, एक कुँवारी है और एक बेवा। फिर आगे
बताया कि एक ह. सौदा हैं जो 50 साल की बेवा खातून हैं और दूसरी ह. आयशा जो कुँवारी
है। आप ने कहा रिश्ता भेजकर देख लीजिये,
जहां कुबूल हो जाएगा वहां मैं शादी कर लूंगा।
तो जब ह.
खावला ह. अबूबक्र के रिश्ता लेकर गईं तो उन्होंने बताया कि आयशा का रिश्ता तो (जुबैर
इब्न मुतिम से) कई बरस से तय है, लेकिन जबसे हम मुसलमान हुए हैं, तब से वो लोग शादी में
आनाकानी कर रहें हैं क्यूंकि उन्हें हमारा ईमान लाना पसंद नहीं. तो फिर ह. खावला, ह. सौदा के पास रिश्ता लेकर
गईं और उन्होंने स्वीकार कर लिया। इसी बीच
ह. अबूबक्र ने भावी समधियाने में बात करी कि अब तो हम हिजरत करने जा रहे हैं लिहाजा शादी कर लीजिये परन्तु बात अब भी किसी अंजाम तक न पहुंची
और रिश्ता टूट गया. इसके बाद ह. अबूबक्र ने नबी का शादी के लिए स्वीकृति दे दी.
क्यूंकि बात चल चूकी थी और उससे पलटना सही नहीं होता तो नबी ने दोनों रिश्ते कुबूल
कर लिए. पर नबी ने पहले ह. सौदा की रुखसती करवा कर घर ले आये क्यूंकि उन हालतों के
मद्देनज़र एक उम्र दराज़ औरत घर की जिम्मेदारियों (बच्चों की बेहर देखभाल और घर
संचालन आदि) को बेहतर ढंग से निभा सकती सकती थी और युवा लड़की के आने पर घर में
अन्य महिलाओ के अधिकारों का हनन आदि हो सकता था. इस दौरान मक्का में 3 साल और
मदीना में 2 साल बिताने के बाद और बहुत से दुनियावी और दीनी ज़िम्मेदारीयों को
अंजाम देने के बाद, मुहम्मद साहब से ह. अबू बक्र ने ह. आयशा को घर ले जाने के लिए कई
बार आग्रह किया. मुहम्मद साहब ने विदाई मे
देर का कारण मेहर कि रकम का इंतेजाम न होना पाना बताया और फिर ह. अबूबकर ने ही
मेहर हदिये मे आपको दिया। मुहम्मद साहब ने
ह. सौदा को जब इस बारे में बताया तो
उन्होंने कहा कि मैं एक ऐसी उम्र में पहुंच गयी हूं जहां मुझे अब कोई खवाहिश नहीं
है और नबी की पत्नी के रूप में ही मरना चाहती हूँ इसलिए मैं आपका समय जो मेरे लिए
है, नई दुल्हन को समर्पित करती हूं। यानि उनको आएशा के साथ रहने मे कोई
परेशानी नहीं थी। अंत मे इस तरफ फिर ह.
आयेशा की विदाई हुई.
बुखारी 3896: पैगम्बर के मदीना जाने से 3 साल पहले ख़दीजा का निधन हो गया था। वे लगभग 2 साल तक वहाँ रहे और फिर उन्होंने आयशा से विवाह किया।
■ अब यंहा कुछ सवाल उठते हैं जो यह साफ़ कर दते हैं कि ह. आयशा 6-9 वर्ष की नहीं हो सकती:-
1. क्या ह. खौला जैसी एक शरीफ और अनुभवी औरत, नबी की घर और ज़िन्दगी की ज़रूरतों को देखते हुए, किसी 6 वर्ष कि बच्ची का निकाह का प्रस्ताव रख सकती है। नहीं।
2. क्या वह एक तरफ 6 वर्ष की बच्ची का और दूसरी तरफ 50 वर्ष कि स्त्री का विवाह प्रस्ताव एक साथ रख सकती है। नहीं रख सकती क्योंकि यह बहुत बेढंगा और संतुलन रहित का प्रस्ताव लग रहा है।
3. उस समय नबी खुद 50 वर्ष के हो चुके है और उनकी इज्ज़त सारे संगी साथी दिल से करते थे यंहा तक की उनके सामने बहुत ही नाप तोल के बोलते थे. इसलिए उनके
सामने 6 साल की बच्ची का प्रस्ताव रखान बहुत ही अजीब और हिमाकत भरा काम है. ऐसा
कोई भी साहबी या सहाबिया नहीं कर सकते।
4.
अक्सर एक आदमी मानसिक और शारीरिक आवश्यकताओ के तहत शादी करता है पर वो जरूरतें
तो पूरी हो ही नहीं सकती अगर सामने एक बच्ची हो इसलिए किसी बच्ची से शादी कर के नबी के जीवन में न कुछ बदलने वाला था और न ही कुछ हासिल होने वाला था.
5. इस केस मे बच्चों की देखभाल करना भी संभव नहीं है क्योंकि पैगंबर के बच्चे ह. आयशा से बड़े थे। क्या बालिग़ बच्चो को पालने के लिए एक बच्चा घर में लाया जाता है, नहीं. ये तो ऐसा है जैसे बच्चों वाले घर में एक और 6 साल का बच्चा शामिल करना। यही कारण था की मुहम्मद साहब ह. खौला को पहले ब्याह कर लाये थे। वैसे भी बालिग़ हो चुके बच्चों के सामने कोई कैसे छोटी बच्ची से शादी कर सकता है.
6. ह.
आएशा का रिश्ता कुछ वर्ष पहले से ही हो रखा था। तो अगर उनकी उम्र 6 मानी जाये तो
पहला रिश्ता 1 वर्ष की आयु में हो चुका होगा। इस उम्र में रिश्ता होने की बात गले
से नहीं उतरती। दूसरी बात ह. अबूबकर ने ह.
खौला को कहा था की कई कोशिशों के बाद भी लड़के वाले शादी को तैयार नहीं हो रहे यानि
की अगर वो तैयार होते तो ह. आएशा की रुखसती 6 वर्ष की उम्र मे या उससे पहले ही हो
जाती। कौन पिता 5-6 वर्ष की आयु मे पुत्री को ब्याहता है?
7. ह.अबु
बकर एक सच्चे मुस्लिम थे और इस्लाम पर कोई समझौता नहीं करते थे। इसलिए ह. अबूबकर
ने दूसरी पत्नी को तलाक दे दिया था क्योंकि उन्होने इस्लाम धर्म को अपनाने से
इंकार कर दिया था (आज के कानून भी धर्म के मामले मे मतभेद होने पर तलाक की इजाज़त
देता है)। इससे साबित होता है कि वह अपनी बेटी का रिश्ता किसी गैर ईमान वाले से (जुबैर
इब्न मुतिम) नहीं कर सकते थे। स्पष्ट है
की यह रिश्ता उनके इस्लाम लाने से पहले से
पहले ही हुआ होगा तभी तो उन्होने बाद में इसे रद्द भी कर दिया।
4. ऐतिहासिक तथ्य– ह. आएशा की विवाह के समय 19 वर्ष आयु।
(1) सीरते रसूलल्लाह किताब मे इस्लाम के औपचारिक
घोषणा के पहले साल में इस्लाम स्वीकार करने वालों की एक सूची दी है जिसमें ह. आयशा
का नाम ह. अबु बक्र की छोटी बेटी के तौर पर दिया गया है। 610 AD में इस्लाम आया. ज़ाहिर है इस वक़्त उनकी उम्र 5-7 साल की तो रही
होंगी. उनकी शादी/विदाई मुहम्मद साहब से लगभग 624 AD में हुई.
इसी हिसाब से उनकी उम्र कम से कम 19-21 साल बैठती है (सीरत इब्न इसहाक़, सीरत इब्न हिशाम)। इबने इशाक के अनुसार ह. आएशा इस्लाम आने से पहले जन्मी थी। ह. आएशा को सर्वप्रथम इस्लाम लाने वालों कि
सूची मे 18-22वें स्थान पर रखा जाता है।
इस्लाम आने के पहले वर्ष में केवल 40 लोग मुस्लिम हो पाये थे।
(2) तारीख तबरी के अनुसार, मोहम्मद साहब ने जब इस्लाम का
पैगाम दिया, उससे पहले ह. अबूबक्र ने दो शादियां की थीं।
पहली बीवी का नाम फातिला था, उनसे एक बेटा अब्दुल्लाह व बेटी
अस्मा हुई । जबकि दूसरी बीवी की नाम उम्मे रूमाँ था, इनसे
बेटा अब्दुर्रहमान व बेटी आयशा हुई । तबरी के अनुसार ये चारों इस्लाम आने से पहले
पैदा हो चुके थे। नबी ने इस्लाम का पैगाम जब दिया था तो उनकी उम्र 40 साल थी। जबकि
हिजरत के वक्त उनकी उम्र थी 52 साल। उसके 2 साल बाद उन्होंने ह. आयशा से शादी की।
इस तरह भी इस शादी के वक्त ह. आयशा की उम्र 14 साल से ज़्यादा ही ठहरती है।
(3) तमाम इतिहासकार इसपर सहमत हैं कि ह. आयशा की
बड़ी बहन ह. अस्मा उनसे 10 साल बड़ी थीं और उनकी मृत्यु सन 73 हिजरी में हुई थी और
उस वक़्त वो 100 साल की थी अर्थात हिजरी वर्ष आरम्भ होने के समय उनकी उम्र 27 या 28
साल थी। इस तरह हिजरी वर्ष आरम्भ होने के समय ह. आयशा की उम्र 17 या 18 साल थी
जबकि सन 2 हिजरी में उनकी शादी हुई और अर्थात शादी के समय ह. आयशा की उम्र 19 या
20 साल थी (अल तबकात अल कुबरा,अल बिदाया व अल निहाया,मिशकात अल मसाबीह,सीरत इब्न हिशाम, इमाम इब्ने असीर जजरी की उसदुलगाबा).
(4) ह. आयशा का स्वयं का कथन है जो कि बुखारी (4876)
में इस तरह दर्ज है कि जब सूर: अल क़मर का नुज़ूल हुआ उस समय मैं किशोरावस्था
(जारिया:) में थी। ज्ञात रहे कि सूर: अल क़मर का नुज़ूल हिजरी वर्ष आरम्भ होने के 5/8
साल पहले हुआ था। अब किसी किशोरी की आयु (8+2=10 साल बाद) शादी के समय क्या होगी
इसका सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है। इस हिसाब से उनकी उम्र 17-22 वर्ष बनती है।
(5) ह. आयशा 610 में ईमान लायी थी और हिजरत हुई 623
ईस्वी में. उनका निकाह हिजरी से लगभग 1 वर्ष पूर्व और लगभग 1/2 हिजरी में विदाई
हुई थी। मुहम्मद साहब ने इस्लाम आने के 12-14
वर्ष बाद हिजरत की थी। जब ग़ज़्वा ए उहुद
2/3 हिजरी मे हुआ तो उस वक़्त हदीस अनुसार ह. आयशा की उम्र 10 साल होनी चाहिए।
लेकिन बुखारी (2880) की हदीस बताती है कि वह ग़ज़्वा ए उहुद में शरीक थीं और फ़ौजियों
व ज़ख्मियों को पानी पिलाने के लिए मश्क भर भर कर ला रही थीं। अगर वो बच्ची होती
तो जंग मे मश्क भर भर कर एक जगह से दूसरी जगह कैसे ले जा सकती है? जबकि बुखारी (4097, 2664) में ही मौजूद है कि नबी ने
ग़ज़्वा ए उहुद में 15 साल से कम उम्र बच्चों को जाने के इजाज़त नहीं दी। तो इससे
ये नतीजा निकलता है कि उहुद के वक़्त उनकी उम्र 15 साल से ज़्यादा थी। ये मुहम्मद
साहब ही थे जिन्होंने जंग में जाने वालो की मिनिमम उम्र 15 साल रखी थी जबकि पुरे
यूरोप में यह उम्र काफी कम थी! फिर शादी की 6-9 वर्ष आयु को वह कैसे सही मान सकते
हैं, सोचो ज़रा।
(6) बुख़ारी (476) में ह. आयशा कहती हैं की
यौवनारम्भ की उम्र से उन्होने अपने माँ बाप को इस्लाम पर अमल करते और
हर सुबह - शाम आप सल्ल० को मेरे घर आते देखा है। अबू बकर अपने घर मे बनाई हुई
मस्जिद मे कुरान की तिलावत करते थे और उन्हें ऐसा करते हुए मुशरिक औरतें देखा करती
थी और जिससे कुरेश के सरदार डरते थे कि इससे उनकी औरतें प्रभावित न हो जाए। बुखारी
(2297) में यह उम्र अच्छी तरह
याद रख सकने वाली अवस्था बताई गयी है और बुखारी की एक और हदीस (3905) में कहा है कि उन्हें याद है कि उन्होने कभी भी अपने माँ बाप को किसी और
मजहब को मानते हुए नहीं देखा। इसका मतलब है कि मक्का में ही ह. आएशा बालिग या
समझदार हो चुकी थी। बल्कि हदीस के 9 साल
वाले मत से चले तो यंहा उन्हें यह कहना चाहिए था कि मेरे पैदा होने से पहले ही
मेरे वालिदैन इस्लाम कुबूल कर चुके थे, जबकि वो कह रही है कि
जब से वो बालिग हुई या या होश संभाला है या समझदार हुई है तब से इस्लाम को मानते
हुए ही देखा है।
5. उम्र वाली हदीस में त्रुटि की संभावना।
हज़रत
आयशा की आयु का प्रश्न धर्म का विषय नहीं है, बल्कि इतिहास का विषय है. उनकी उम्र
कम या अधिक मानने से किसी के धर्म पर रत्ती भर फर्क नहीं पड़ता है. उस समय का इतिहास किसी समकालीन इतिहासकार ने
नहीं लिखा है। पैगंबर के समय में या उनके 80 से 90 साल बाद तक भी कोई इतिहासकार
ऐसा नहीं था जो इतिहास लिख सके। इसका अर्थ यह हुआ कि लगभग सौ वर्षों तक इतिहास को
दर्ज करने वाला एक भी इतिहासकार मौजूद नहीं था. इसलिए कथनों को मुंह ज़ुबानी याद
किया जाने लगा और पढ़ी दर पीढ़ी आगे बढाया जाने लगा. जो लोग बात आगे बढ़ाते थे उनके नाम कथन के साथ
चस्पा होते थे यानी यह बताया जाता था कि यह बात फला ने फला (रावी या चैन) से सुनी
है. इन्ही कथनों को नबी के 200 वर्ष बाद लिखा गया और इन्हें हदीस कहा गया. इन हदीसो की और इनको बयान करने वालो के चरित्र, याददाश्त आदि की पड़ताल हुई जो
सही पायी गयी उन्हें सहीह हदीसों के तौर पर मान्यता मिल गयी. बिलकुल इसी तरह घटनाओं का इतिहास, लोगों से
लोगों को, मौखिक कथन के आधार पर ही शुरू हुआ था जिनकी हदिसो के तरह जांच पड़ताल न
हो पाई। ये कहानियाँ विभिन्न पीढ़ियों से गुज़री हैं जिनमें खामियां हो सकती हैं।
जबकि एक समकालीन इतिहासकार जब इतिहास लिखता है, तो वह पूरे
मामले पर ध्यान से शोध करता है और वे भी खामियों से परे नहीं. मुहद्दिस को ये हक़ नहीं था कि वो कई सहाबाओ
द्वारा बतायी गयी बात में कुछ लफ्ज़ कम या अधिक कर दे। अगर उसकी सनद सही पाई गई तो
मतन को 100% दुरुस्त मानने का चलन है। जबकि ये चलन ठीक नहीं बाज़ जगह। इसीलिए किसी
भी विद्वान ने इस उम्र के पीछे सही बात जानने की कोशश नही की। असल में तो हदीसों
में आई कोई भी बात, क़ुरान की बात, इस्लाम
की रूह और नबीयों के किरदार और अक़ल के म्यार के खिलाफ मान्य नही होनी चाहिए. यंहा अकाल के म्यार में वैज्ञानिक और तार्किक
विश्लेषण दोनों शामिल होने चाहिए. पर हदीसों पर नज़र डालते हुए इन उसूलों पर बाज़
वक़्त आखँ बंद कर ली जाती है। इबने खलदून ने वाकयात को इल्म और अकल पर परखने पर ज़ोर
दिया है और फिर रिवायत को देखने पर। हदिसो
में केवल नबी कि कौल नहीं हैं बल्कि साहबी और साहबीयात के भी कथन हैं और भी बहुत
सी बातें हैं। वैसे यह हदीस नबी का कौल
नहीं है।
जब हदीसों को इकट्ठा किया गया उसस ज़माने में रिकार्ड्स इतने आसानी से उपलब्ध नहीं थे जैसे आज एक उंगली के इशारे पर मिल जाते है नेट पर। एक ही जगह पूरा इल्म मौजूद नहीं होता था। कंही से कुछ मिलता था और कंही से कुछ। ये ज़ुरूरी नहीं था कि हर आलिम या इमाम के सामने सारा इल्म या सारे रिकार्ड्स या सारे पहलू आ जाये। जैसे जैसे वक़्त गुज़रता है और तकनीक बढ़ती है इल्म तक एक्सेस भी बढ़ती है और नयी नयी चीज़े सामने आती हैं। मुख्य हदीसों के इमामो के वक़्त में अस्मा रिजाल का इल्म इतना गहन और विस्तृत नहीं था जितना इनके बाद हुआ। इसलिय बाद में हदीसों और रावियों के बारे में बहुत सी जानकरी हासिल की गयी। ये इल्म अगर पुराने लोगों के पास होता तो उनके रिजल्ट भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते।
■ ह. आएशा की उम्र शादी के समय बालिग थी जो
इतिहास से साबित है। हालांकि 6-9 साल वाली हदीस गलत दर्ज हो गई है जिसके पीछे
निम्न कारण हो सकते हैं:-
(I) पहली कारण,इस हदीस में बताने
वाले ने या लिखने वाले ने दहाई (अशरे) के अंक में गड़बड़ी कर दी है। जैसे 16 या 19
लिखने वाला गलती से 6 या 9 लिख देया कहना वाला ऐसा कह दे। अरबी में भी अंग्रेजी के
तरह दो शब्दों से मिलकर दाहाई की संख्या बनती है.
सित्तत छह को और तिस्सह नौ कहते हैं
जबकिअशरह दस या दहाई को कहते है.
इसी तरह सित्तत अशरह (16) और तिस्सह अशरह (19) को कहते है. इसलिए बहुत मुमकिन है कि बयान करने वाला अशरह
भूल गया हो या उससे छुट गया हो और सिर्फ सित्तत या तिस्सह याद या बयान हुआ हो. हम
ये बात जानते है कि उस समय के आम अरबियों को बेसिक गणित या हिसाब किताब भी नहीं
आता था। जैसे की एक सहीह हदीस में है किरमज़ान के महीने के विषय पर सहाबाओ को मुहमद
साहब जब महीने की गिनती समझा रहे थे उन्होंने कहा कि चांद देख के ईद किया करो या
इतने दिन तकमहीना पूरा होने का इंतेज़ार किया करो (दोनो हाथों की 10 उंगलियों को
तीन बार उठा कर ऊपर-नीचे करके 30 तक नम्बर गिनाए) और फिर ईद कर ले करो। यानी वो 30
भी कह सकते थे पर उन्होंने इन्ही कारणों से संख्या नहीं कही बल्कि गिनाई.
(II) दूसरा कारण, उस समय अरब
में गिनती बताने का एक विशेष तरीका भी मौजूद था जिसके तहत केवल इकाई का अंक बोला
जाता था और सुनने वाला उससे पूरी संख्या का अनुमान लगा लेता था। जैसे कि एक हदीस में रमज़ान की लैलतुल कदर की
रात की गिनती बाताने के लिए प्रयोग हुआ था।
लैलतुल कदर कि रात 21 या 23 या 25 या 27 या 29 वाली ताक (ओड) रात होती है। इसमें मुहम्मद साहब
ने कहा की रमज़ान के आखिरी अशरे (अशरा मतलब 10, आखरी अशरा
मतलब यानी 20-30 दिन वाला अशरा) की पहली, तीसरी, पांचवी, सातवीं, नवी रात में लैलतुल
कदर को ढूंढा करो। यानी ऐसा कहने का मतलब की सामने वाला समझ रहा है कि किस संख्या
की बात हो रही है। तो हो सकता है इस हदीस को बयान करने वाला लिखने वाले को इसी तरह
16 -19 को 6-9 बता रहा हो क्योंकि यही उम्र क़ुरान के मुताबिक और उस समय के इस्लामी
समाज के अनुसार चलन में थी।
(III) तीसरी कारण, पहले के लोग
उम्र और सालों को याद नहीं रखते थे। लोग अंदाज़ों से अपनी उम्रें बताते थे। अरब
में भी हिजरी संवत शुरू होने से पहल लोग, आमूल फील वाकये
वाले साल से वर्षों का अंदाज़ा लगते थे। नबी ने एक बार फरमाया कि हम एक अनपढ़ कौम
हैं, हम न किताबत करते हैं और न हिसाब रखते हैं (सही बुखारी:
1913). इसलिए संभव है कि ह. आएशा को अपनी आयु को अंदाज़न बताया हो या गलती लगी
हो। स्वयं ह. आयशा तिर्मिज़ी की एक रिवायत
में बुलूग़त की उम्र नौ साल बताई थी और कहती थीं कि नौ साल के बाद एक लड़की औरत बन
जाती है। उन्होंने शायद इसी हिसाब से अंदाज़ा लगाया हो कि उनकी शादी के समय उम्र
भी 9 ही रही होगी क्योंकि शरीयतन ही उनकी शादी कम से कम इसी उम्र मे हुई होगी।
इस तरह
तीनों में से कोई बात भी सही हो सकती है या पूरी हदीस भी गलत हो सकती है क्यूंकि
उम्र बडी होने के प्रमाण इतिहास में है।
इस
मुद्दे पर कांधलवी साहब की तहक़ीक उम्र ए आयशा और शेख़ सलाह अल-दीन इदलिबी की
तहक़ीक देखी जा सकती है। शेख़ ख़ुद एक मुहद्दिस हैं, उन्होंने इस रिवायत का इंकार नहीं किया,
बल्कि सिर्फ़ ये कहा है कि तारीख़ की रौशनी में ह. आयशा की उम्र नौ
नहीं हो सकती। देवबंद के मौलाना हकीम नियाज अहमद ने इस मुद्दे पर विस्तार से कशफ अल घुमाह
उमरे उम्मू अल उमाह नामक पुस्तक लिखी है. उमर अहमद उस्मानी, हकीम
नियाज़ अहमद और हबीबुर्रहमान कांधलवी जैसे उलमा ने इस पर काफी कुछ लिखा है। अल्लामा
कांधलवी का कहना है कि ह. आयशा की उम्र के बारे में शब्द ‘तिस्सह
अशरह’ कहा गया होगा जबकि रावी ने सिर्फ ‘तिस्सह’ सुना या याद किया होगा. हकीम
नियाज़ अहमद और हबीबुर्रहमान कांधलवी ने कहा कि अरबी ज़ुबान में ऐसा हो जाता कि पूरे जुमले कि बजाय आधा कह दें यानि 19 कि जगह 9 कह दें। जैसे चौदहवीं के चाँद को चौथी का चंद केह दिया जाए। मौलाना वहिदुद्दीन
खान, उस्ताद जावेद अहमद गामिदी,
अल्लामा सईय्यद अब्दुल्लाह तारीक और मौलना क़ाज़ी युनूस ने उनकी उम्र को बालिग ही
माना है।
■ इसे
हदीस को सब से पहले बयान करने वाले शख़्स हैं उर्वा जो हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर
के बेटे और हज़रत आइशा के भांजे हैं. उर्वा से ये रिवायत उनके बेटे हिशाम बिन
उर्वा बयान करते हैं. हिशाम बिन उरवह इस हदीस के खास रावी हैं। उनकी ज़िंदगी दो
दौरों में तकसीम की गयी हैः 131 A.H.
में मदनी मुद्दत समाप्त हुई, और इराकी अवधि
शुरू हुई, उस समय हिशाम की उम्र 70-71 साल थी। इन्होंने अपनी
बेटी की शादी पर कर्ज़ लेकर बहुत खर्चा कर डाला और सोचा कि खलीफा से लेकर चुका
देंगे मगर खिलाफ़त बनी उमैय्या से बनी अब्बास के पास आ गई. यह खलीफा से कुछ माली मदद कि आस में इराक़ गए थे
पर उसने बार बार गुहार के बाद भी ज़्यादा मदद नहीं की। हिशाम बार बार इराक़ आते रहे
लेकिन बात नहीं बनी आख़िरकार इराक़ में ही बस गए और बगदाद में 146 हिजरी में इंतकाल किया. हिशाम शुरूआत में
सिक़ा रावी थे लेकिन बाद में इस वाक़िये की वजह से इनका हाफ़िज़ा ख़राब होने लगा. इमाम याक़ूब बिन शैबा फरमाते हैं की हिशाम की
रिवायत का इनकार नहीं किया गया लेकिन जब ये इराक़ गए तो अपने वालिद (उर्वा ) का नाम लेकर ऐसी रिवायतें बयान करने
लगे जो जो उन्होंने किसी और से सुनी थी. इमाम ज़हबी ने भी हिशाम के हाफ़िज़े के
बारे में ऐसी ही बात लिखी है. हाफ़िज़ ज़हबी ने बाद के समय में हिशाम की याददाश्त
खराब हो जाने के बारे में बात की है। बुखारी के सब से बड़े शारेह हाफ़िज़ इब्ने
हजर असक़लानी फरमाते हैं की अपने वालिद के नाम से ऐसी रिवायत बयान की जो मदीने के
लोगों को नागवार गुज़री. (तहजीब अत तहज़ीब)
मदीना, में हिशाम के तालिबे इल्मों इमाम मालिक और
इमाम अबू हनीफह ने इस हदीस का ज़िक्र नहीं किया है। इमाम मालिक और मदीने के लोगों
ने उन्हें उनकी इराकी हदीसों के लिए तंक़ीद (आलोचना) की है। इनके शागिर्द इमाम
मालिक ने कहा है कि इराक जाकर यह भूलने लगे थे और उसके बाद कि हदीसे इनसे न ली जाए।
इस हदीस के सभी रावी इराकी हैं जिन्होंने हिशाम से इस हदीस को सुना था। ऐसी 18
विरवायतें हैं जिनमें हिशाम रावी है, इनमें से 12 बसरा
(इराक) के औ 6 कुफा (इराक) के ही रहन वाले थे।
यानि सारे रावी इराक़ी हैं और यह रिवायत इराक़ में बयान हुई है। असल में हदीस
की दुनिया में यह एक खबरे वाहिद है और खबरे वाहिद ज़रूरी मसलों हनफ़ियों में काबिले
कुबूल नहीं माने जाती है। आख़िर क्या वजह है जो इस रिवायत को मदीने का एक शख्स भी
बयान नहीं करता और इमाम मालिक अपनी किताब मुअत्ता में दर्ज नहीं करते लेकिन कूफ़े
के दस से ज़्यादा रावी बयान करते हैं.
■ इस हदीस के ज़्यादातर तुर्कों मे 9 वर्ष मे
रुखसती या विदाई या गौना की बात कही गयी है। हालांकि एक तुर्क में ह. आएशा ने 9
वर्ष में जिस्मानी ताल्लुकात होने की बात कही है। इसलिए शारीरिक संबंध किस समय हुए
इस पर 2 मत बन जाते हैं। मुहम्मद साहब का सभ्य चरित्र देखें तो यही बात मान्य है
कि ऐसा सही समय पर ही हुआ होगा, न कि जल्दी, भले ही उम्र 9 माने या 19.
6. जवाब – मुहम्मद साहब और ह. आएशा की आयु में अंतर।
जबकि ह.
खदीजा की मृत्यु के समय मुहम्मद साहब की उम्र 50 वर्ष थी. शादी के समय लगभग 53/54 वर्ष थी। 9 वर्ष आयु वाले मतानुसार तो मुहम्मद साहब और
ह. आएशा की उम्र मे लगभग 45 वर्ष का अंतर बैठता है और 19 वर्ष आयु वाले मतानुसार दोनों
कि आयु मे लगभग 35 वर्ष का अंतर बैठता है। पहले के समय में वर वधू कि आयु मे इतना
अंतर आम था। रानी लक्ष्मीबाई 14 साल की थी जब लगभग 45 साल के गंगाधर राव से ब्याही
गई थीं यानि दोनों कि आयु में लगभग 40 वर्ष से अधिक का अंतर था। स्वतंत्रता सैनानी
महादेव गोविन्द रानाडे ने 11 वर्ष की रामबाई से विवाह किया था और दोनों में 20
वर्ष का अंतर था. इतिहास बताता है की उच्च
वर्ग में जोड़ो की आयु में अंतर होता था और जो आज भी होता है जैसे वैज्ञानिक,
दार्शनिक, राजनीतिज्ञ आदि. आज भी इतनी आयु
अंतर वाले कपल हर देश में लाखों हैं, उच्च वर्ग में तो और
अधिक हैं। आज 40 वर्ष के अंतर वाले बहुत से सेलेब्रिटी कपल
मौजूद हैं। सर्वे बताते हैं की अमेरिका जैसे मोस्ट लिब्रल देश में 1% कपल की आयु
में 20+ वर्षों का अंतर पाया जाता है। यही अंतर हज़ार वर्ष पहले बहुत से जोड़ो मे
पाया जाना कोई अजीब बात नहीं। आज भी 10-15 साल का अंतर हर समाज में आम है। इसलिए 1400 वर्ष पूर्व मुहम्मद साहब के विवाह
में 40 वर्ष या 30 वर्ष का अंतर कौन सा बड़ा हो गया।
दिग्विजय
सिंह और उनकी पत्नी अमृता में 24 वर्ष का अंतर है. मिलिंद सोमन और अंकिता में 26
वर्ष का अंतर है. कबीर बेदी और पत्नी प्रवीण में 29 वर्ष का अंतर है. Mick Jagger's partner, Melanie Hamrick, is 44 years younger. Dick Van Dyke and his wife, Arlene Silver,
have 46 years age gape. Singer Don McLean's partner is 48 years younger.
ये
सोचना गलत होगा की मुहम्मद साहब 53 उम्र तक बुढ्ढे हो चुके थे क्योंकि हदीसों में
आता है कि इस आयु में भी वह बहुत खूबसूरत, जवान दिखते थे, बाल और दाढ़ी में बेहद कम सफेद
बाल थे और झुर्रियां भी नही थीं. सच्चे अध्यात्मिक लोगों के चेहरे पर ऐसा तेज
अक्सर होता है. आज भी ऐसे तजस्वी और गुणी व्यक्ति से हर स्त्री और हर पिता अपनी
पुत्री की शादी करना चाहता है।
7.
ह. आएशा की आयु 9 वर्ष मनाने वालों के
तर्क।
(1) मुहम्मद साहब ने सबसे पहले अपने से 15 वर्ष बड़ी
स्त्री यानि हजरत खदीजा से शादी की थी। मुहम्मद
साहब की उम्र समय 25 वर्ष थी और ह. खदीजा की 40 वर्ष। ह. खदीजा की मृत्यु तक
मुहम्मद साहब की एकलौती पत्नी थी और उनकी मृत्यु के समय मुहम्मद साहब लगभग 54 वर्ष
थे। क्या कोई कामुक व्यक्ति अपने से इतनी बड़ी स्त्री के साथ शादी करना और उसके साथ
इतना अधिक वर्षों तक एकपत्नी व्रत का पालन कर सकता है, नहीं। मुहम्मद साहब की जिस भी
स्त्री से शादी हुई वो या तो बेवा थी या तलाक़शुदा थी, केवेल
ह. आएशा को छोड़ कर। ये विवाह उस समय की
ज़रूरतों और चल रहे माहौल के तहत हुई थी इसलिए शेष 9 निकाह 53 -60 वर्ष की उम्र के
बीच हुए जल्द जल्द हुए। अपनी उम्र के अंतिम तीन वर्षों में जबकि अरब के बड़े भाग
पर आपकी सत्ता स्थापित हो चुकी थी आपने कोई शादी नहीं की जबकि चाहते तो अरब की
सबसे सुन्दर और कुंवारी महिलाओं से विवाह कर सकते थे। क्या कोई कामुकता से भरा
व्यक्ति ऐसी शादियाँ कर सकता हैं, कभी नहीं। इसके अलावा क्या कोई भी कामुक व्यक्ति केवल एक
ही कम उम्र कुँवारी लड़की से विवाह करके कैसे शांत रह सकता है। कभी नहीं, वह तो हर संभव कोशिश करेगा कि उसकी बहुत सी कम उम्र कुँवारी लडकीयों से
किसी न किसी बहाने शादी हो जाये। पर मुहम्मद साहब ने ऐसे कुछ न किया। मुहम्मद साहब
और ह. आएशा दोनों लगभग 12 साल तक विवाहित रहे फिर भी उनकी कोई संतान न हुई। इन सभी तथ्यों के बावजूद मुहम्मद साहब पर
कामुकता का आधारहीन झूठा आरोप लगया जाता है। दरअसल इन शादियों के पीछे कई कारण थे जैसे कि
विभिन्न क़बीलों से रिश्तेदारी करके उनके बीच कि दुश्मनी खतम कराना, विधवाओं व तलाक़शुदाओं को सहारा मिले जिससे उनकी स्थिती बेहतर हो और आने
वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा मिले। इसके
आलवा नबी कि पत्नियाँ दीन कि बातें और औरतों के मसले सीधे नबी से सीखतीं थी और आम औरतों
को सीखाती थी जो हम तक भी पहुंचे हैं। ऐसे
मसलों को एक आम औरत उतने अच्छे से किसी मर्द से नहीं विमर्श नहीं कर सकती जितना
किसी स्त्री से ही कर सकती हैं। इसलिए इन
पत्नियों ने इस काम को अंजाम दिया।
(2) मुहम्मद साहब पर उनके चरित्र को लेके उनके दुश्मनों ने उस समय हर प्रकार के इल्जाम लगाए जैसे झूठा, फरेबी, जालसाज़, जादूगर, दीवाना, पागल आदि। पर एक भी दुश्मन ने ये नही कहा कि ह. मुहम्मद बच्चियों से विवाह करता है या स्त्रियॉं का शोषण करता है या कामुक व्यक्ति हैया दोस्त की बेटी से शादी करता है या कई शादियाँ करता है आदि। एक भी उदाहरण इतिहास में ऐसा नही है। बल्कि किसी ओरिएण्टलिस्ट या विरोधी तक ने ह. आयशा की विवाह आयु या मुहम्मद साहब के अनेकों विवाह पर एक प्रश्न तक नहीं उठाया। कोई भी महापुरुष या धार्मिक महापुरुष एक ही समय मे धर्म और नैतिकता का लीडर बना रहे और साथ ही उसी समय अपनी तीर्व कामुक इच्छा खुले आम पूरी करता रहे, ये असम्भव है। इसलिए ऐसे कम उम्र के विवाह या बहुविवाह के पीछे कामुकता नही बल्कि अन्य कारण होते थे।
(3) जब किसी बच्चे का (हालांकि ह. आयशा की उम्र 6-9
नही थीं) बाल काल मे शोषण होता है या बड़ी उम्र में भी शोषण होता है या बड़ी उम्र के
आदमी से जबरन विवाह होता है तो वह स्त्री एक बोझ तले, दबी दबी पूरी ज़िंदगी गुज़ारती
है। उसकी मानसिक दशा त्रस्त होती है और जीवन एक घुटन। अंदर ही अंदर घुट के उसका जीवन
नरक बन जाता है। जबकि ह. आएशा के केस में
ऐसा कतई न हुआ और वो इस्लाम का सबसे बड़ी स्त्री विद्वान बनके सामने आती है। इतनी
बड़ी की अच्छे अच्छे सहाबा भी उनसे राय मशवरा लेने आते है। उन्होंने स्त्रियों मेंसबसे
अधिक हदीसे (2000 से अधिक) बयान की है। औरतों
के पर्सनल मसले सबसे अधिक उन्होंने सुलझाए है चाहे वो धर्म को लेके हो या दुनिया
को लेके। वह लीडर, फाइटर, आलिम आदि सब
रोले में शीर्ष पर रही है। ऐसा कैसे हो सकता है जो स्त्री किसी के व्यक्ति के
द्वारा यौन उत्पीड़न का शिकार हुआ हो वो स्त्री इतनी सशक्त बुद्धि, स्मरण शक्ति, तर्कशीलता आदि गुणों से भरपूर व्यक्तिव
की मालिक बने और फिर उसी व्यक्ति की लिगेसी को शिखर पर ले जाये जिसने उसका उत्पीडन
किया हो. ऐसा असंभव है।
(4) ये बात इस्लामिक साहित्य में स्पष्ट है कि आएशा
उस समय के सबसे होनहार और गुणवान नौजवानों में से थी। इसलिए मुस्लिम विद्वान ये
मानते है कि अल्लाह ने उनको मुहम्मद साहब की बीवी बनने का हुक्म दिया क्योंकी उनके
गुणोंऔर लंबी उम्र के कारण केवल वही भविष्य में लंबे समय तक उम्मत का सर्वश्रेष्ट
मार्गदर्शन कर सकती थी। उनकी कम उम्र का सबसे अधिक फायदा ये हुआ मुहम्मद साहब के
साथ बिताए समय में पायी शिक्षाओं और उनके अमल को देख कर हासिल किये गए ज्ञान के
आधार पर, मुहम्मद साहब के जाने के बाद
अगले 4 दशकों से भी अधिक समय तक वह तमाम मुस्लिमो काहर क्षेत्र में मार्गर्शन करती
रही। हजरत आयशा से नबी ने निकाह अल्लाह के हुक्म की तामील में किया था (सही बुखारी जिल्द नंबर 5 किताब 58 हदीस 235).अल्लाह की तरफ से शादी या रिश्ता को
सहमती देना कोई नई बात नही थी। ह. अली और ह. फातिमा का रिश्ता भी अल्लाह के हुकुम
पर ही हुआ था और उसके बेहतरीन नतीजे भी सबके सामने है कि वह भी मुस्लिमो के सबसे
बड़ी आलिम और मार्गदर्शक स्त्रियों में से हुई।
(5) हज़रत
आयशा की पिता हज़रत अबू बकर खुद एक बहुत सम्मानित, आमिर, रसूखदार आदमी
थे. वो खुद पैग़म्बर के बहुत खास दोस्त थे और उनको बहुत अच्छी तरह जानते थे. फिर
ऐसा कैसे हो सकता है कि वो अपनी बेटी का शोषण करवाने के लिए उसकी शादी मुहम्मद
साहब से करवाएंगे. आज भी उच्च चरित्र के
व्यक्तियों से हर बाप अपनी बेटी की और हर लड़की शादी करने के लिए तैयार रहते
है.
(6) पहले के स्त्री और पुरुष ज्यादा ताकतवर और हष्टपुष्ट होते थे! गाँव की स्त्रियाँ आज भी शारीरिक तौर पर अधिक मज़बूत होती हैं. अरब मे लडकीय शारीरिक रूप से जल्दी बालिग़ हो जाती है क्योंकि योव्नारम्भ की उम्र वातावरण जलवायु और खान पान पे निर्भर करता है! जेसे भूमध्य रेखा और गर्म स्थानों पे योव्नारम्भ की उम्र सबसे कम होती है! विज्ञान बताता है की महावारी आने या बालिग होने की आयु आपके जींस, खानपान, रहन सहन, परिवेश, क्षेत्र और गर्म जलवायू, आदि पर निर्भर करता है। इनके कारण 7-8 वर्ष की आयु मे भी प्युबर्टी शुरू हो सकती है और पूर्णतया प्युबर्टी 9-15 वर्ष की आयु मे पाई जाती है। अफ्रीकी लड़कियों में 8.8 वर्ष की आयु में ही शरीर में प्युबर्टी, ब्रेस्ट डेवेलपमेंट, केमिकल चेंजेस दिखने लगते है। 50% अश्वेत लड़कियों में 8 वर्ष की आयु में और 15% श्वेत लड़कियों में ऐसी बदलाव होने लगते है। The age of first menstruation, called menarche, declined about 0.3 years per decade from the mid-1800s until the 1960s, attributed to better nutrition. Today the average age of menarche is 12.2 for African Americans and 12.7 for Caucasians (http://www.livescience.com/1824-truth-early-puberty.html ).
(7) पहले पुरे संसार में यही रिवाज था की योवानारम्भ होते ही शादी करके लड़की लड़के के चली जाती थी और उस परिवार का हिस्सा बन जाती थी और सही समय आने पर जिसका शारीरिक मिलाप भी हो जाता था. अरब इतिहास से मालूम पड़ता है कि उस समय कई मुस्लिम और यहूदीयों की शादियाँ 10-12 साल की उम्र में हो गयी थी जैसे Abdul Mutallib, Hafsa ibn Omar, Hulai in Ahtal-the leader of the Jews. पछली सदी तक 30 साल की उम्र में लडकियां नानी और दादी बन जाती थी! रिकार्डेड इतिहास में आपको सेकड़ों लड़कियां मिल जायगी जो 10 वर्ष से पहले ही माँ बन चूकी थी जल्द योवानारम्भ के कारण. कस्तूरबा की गाँधी जी शादी के समय 13 वर्ष की उम्र थी. 100 साल बाद जब शादी की मिनिमम उम्र 40 साल तय हो जाएगी तो तब आप ये कह के इलज़ाम नहीं लगा सकते की देखो 21वीं सदी में में लोग 18 साल में शादी कर लेते थे!
(8)
अक्सर यह इल्ज़ाम भी लगाया जाता है कि मुहम्मद साहब पेडोफाइल या कामवासना वाले
व्यक्ति थे,
जबकि अगर यह सच होता तो मुहम्मद साहब ह. आएशा को 6 वर्ष कि या 16 वर्ष की उम्र मे
ही ब्याह कर घर ले आते परंतु उन्होने तथ्यों के अनुसार 3-5 वर्ष तक प्रतीक्षा कि
जिससे यह इल्ज़ाम झूठा साबित होता है।
8. अन्य धर्मों और देशों में विवाह आयु।
बालिग की उमर मुख्तलिफ तजुर्बात मेडिकल, समाज, हालत, इलाकात, सर्वेस से अमुमन 16 से 22 तक होती है, जिसका जैसा जहन होता है, निकाह की उम्र भी तकरीबन यही है। निकाह भी एक जिम्मेदारी होती है जिसमें रिश्तों की समझ भी होनी चाहिये.
हिन्दू
धर्मनुसार प्राचीन काल से पिछली सदी तक बाल विवाह होते आये हैं। रामायण, मनुस्मृति और विभिन्न ग्रन्थों में इसके प्रमाण उपलब्ध
हैं। रामायण और पदम पुराण बताते है कि सीता जी आयु 6 वर्ष थी जब उनका विवाह श्री
रामचंद्र जी से हुआ था। श्री कृषण से
विवाह के समय रुक्मणी की आयु 8 वर्ष थी। ग्रंथों में 24 साल के आयु अंतर को
सर्वश्रेष्ट बताया गया है। हिन्दू ग्रंथो और स्वामी दयानंद द्वारा 24 वर्ष की
कन्या से 48 वर्ष के पुरुष का विवाह करना बताया गया हैं। स्मृति शास्त्रों में
यौवनारंभ यानी प्यूबर्टी से पहले ही विवाह करने को भी प्राथमिकता दी गयी है और न
करने पर दंड का विधान भी है। इस हिसाब से तो 6 साल की हिन्दू लड़की का विवाह 30
वर्ष वाले से किया जाना धर्म सम्मत हो जाता है।
अपनी उम्र में पहुंचने से पहले ही लड़कियों की
शादी कर देनी होती थी. हिंदू विधि और देश के रिवाज के अनुसार लडकी के पिता पर यह
अनिवार्य था कि वह बालिग होने से पहले उसकी शादी कर दे यधपी विदाई मे अकसर देर की
जाती थी जो लगभग 3 साल होती थी। (The
Oriental, the Ancient, and the Primitive, p.208.)
यहूदी धर्म में तनख पर मशहूर राशि नामक विद्वान
ने जेनेसिस (चैप्टर 25, वर्स 20) में लिखते हैं कि आइज़ेक ने 40 वर्ष की उम्र में 3 वर्ष की
रेबेका से शादी की.
कैथोलिक
एन्साईक्लोपीडिया और ईसाईयो के अनुसार ह. ईसा मसीह की माता मैरी की आयु 12-13 वर्ष थी जब उनका विवाह जोसफ
(बढई) से हुआ था जो 90-99 वर्ष के थे और अब्राहम की आयु 86
वर्ष थी जब उन्होंने हेगर से विवाह किया था. राजा रिचर्ड -II ने 1400 AD में 29 वर्ष की आयु
में जिस लड़की से शादी की उसकी उम्र लगभग 6 साल थी. सेंट आगस्टिन ने 350 AD में जिस लड़की से शादी की उसकी उम्र 10 साल थी. क्रूसेडरस भी लगभग 12 की आयु तक बन
जाते थे.
1929
से पहले तक इंगलेंड में 12 साल की लड़की से शादी की अनुमति
थी। अमेरिका के स्टेट ऑफ डेलेवर में सन 1880 में लड़की की
शादी की जो कम से कम उम्र 8 साल थी और केलिफोर्निया में 10 साल थी. लड़कियों की शादी की उम्र आज भी अमरीका के कुछ स्टेटस जैसे मेसेचोसस
में 12 साल, नियो हेमसफ़र में 13 साल और न्यूयॉर्क में 14 है. वंहा किसी 14 साल की
लड़की को 50 साल की व्यक्ति से शादी करने से कानून नहीं रोक सकता.
9. संबन्धित हदीसें, आयतें व तथ्य।
■ हज़रत आइशा के बारे मेहज़रत बरीरा (उनकी ख़ादिमा ) ने कहा कि मैं कोई ऐसी
चीज़ नहीं जानती जिससे उन पर ऐब लगाया जा सके, इतनी बात ज़रूर है कि वो नौ
उम्र लड़की हैं और आटा गूंधती और फिर जा के सो जाती है और बकरी आकर उसे खा
लेती है (सहीह बुखारी 2637).
इस हदीस
में जो लफ्ज आया है वो नौजवान लड़की आया है, न की नौ उम्र लड़की। इस पर किसी को क्या शक
कि ह. आएशा शादी के समय नौजवान ही थी।
■ मैं नबी (मोहम्मद सल्ल.) के यहां लड़कियों के
साथ खेलती थी, मेरी बहुत सी सहेलियाँ थी जो मेरे साथ खेला करती थी, जब नबी अंदर तशरीफ़ लाते (कमरे में उनका आना होता) तो वे छुप जातीं फिर
नबी उन्हे मेरे साथ भेजते और वह मेरे साथ खेलती। (गुड़ियों और उससे मिलती
जुलती चीजो के साथ खेलना हराम है, लेकिन ह. आयशा के लिए इसकी
अनुमति थी, वह भी ऐसे समय मे जब वह छोटी बच्ची थी यहां तक
उसकी मासिक धर्म की आयु भी न थी।) (Fath-ul-Bari page 143,vol.13) (Sahih Bukhari6130).
ये हदीस
शादी के बाद कि नही बल्कि शादी से पहले की जब हज़रत आएशा छोटी थी। यंहा घर का
ज़िक्र ही नहीं है क्योंकि मतन में ही नही है । इसमें अनुवाद में जो ‘यंहा’का
लफ्ज़ प्रयोग हुआ है, वे मुहम्मद साहब के स्थान के लिए आया है,
न कि दोनों के घर के लिए। इसलिए ये रिवायत बचपन के दौरान खेल कूद की
है। इसमे इमाम अस्कलनी ने सिर्फ ये साफ किया हौ (क्योंकि गुड़िया की बात आई) उनकी
उम्र बचकानी थी सो गुड़िया से खेलती थी और रखती थी (क्योंकि आम मुस्लिम बुत बनाना
यंहा तक कि गुड्डे गुड़िया को भी बनाना या पास रखना हराम मानते हैपर बच्चो के लिए
या खेल के लिए बनाने को हराम नहीं मानते -
ऐसा मत सही है या गलत ये अलग विषय है। दूसरी बात यंहा मौज़ू शादी या हैज़ नहीं है
बल्कि लोगो के साथ अखलाक से पेश आना है । इमाम बुखारी ने इस हदीस को इसी नाम के
बाब ( लोगो के साथ तवज्जो से पेश आना ) में रखा है । इसलिए ये हदीस ये बताने के
लिए नबी दुसरो को अपने रुतबे के कारण दाँट डपट कर भगाते नहीं थे । बल्कि खेलने तक
देते थे जबकि रुबाबदार लोगो के पास कोई बच्चा क्या , आम आदमी
जल्दी से नहीं फटकता फालतू काम के लिए ।
■ ह. आयशा
का बयान है कि (गजवा ए तबूक - 9 हिजरी या गजवा ए खैबर - 7 हिजरी से)
रसूल घर वापस आए तो हवा के कारण पर्दा
हटने मेरी बनाई हुई गुड़ियां नजर आने लगी. यह देख कर नबी ने पूछा कि यह क्या है। ह.
आयशा ने जवाब दिया कि मेरी गुड़िया है।
आप ने गुड़ियों के दरमियान 2 पंख वाले घोड़े को देखकर पूछा कि और यह क्या
है। ह. आयशा ने कहा कि घोड़ा है और इसके
ऊपर दो पंख लगे हुए हैं। आप ने कहा कि क्या घोड़े के भी पंख होते हैं। ह. आयशा ने
जवाब दिया कि क्या आपने सुना नहीं है कि ह. सुलैमान के पास एक घोड़ा था जिसके
पंख थे। यह सुनकर हुजूर जोर से हंस पड़े (अबु दावूद: 4914).
इस पर
लोग दलील देते हैं कि ह. आएशा बच्ची थी और शादी के बाद भी गुड़ियों से खेला करती
थीं क्यूंकि युवतियां गुड़ियों से नही खेलतीं हैं। यंहा यह समझना ज़रूरी है कि पुराने
जमाने में मनोरंजन के साधन बहुत ही कम हुआ करते थे। वक़्त गुजारने के लिए स्त्रियॉं
के पास घरो मे छोटी मोटी चीज़ें ही हुआ करती थी जिनसे काम चलना पड़ता था। पहले जवान लड़कियां और औरतें भी गुड़ियों से खेला
करती थीं और उनका गुड़िया से खेल अबोधता का प्रतीक नही बल्कि एक मनोरंजन का आसानी
से उपलब्ध एक साधन था। बल्कि आज भी बहुत
सी वयस्क स्त्रियाँ गुड़ियों में रुचि रखती है या बच्चों के साथ उनके खेल मे भाग भी
लेती हैं, मौज मस्ती के तौर पर। जैसे कि एक 43 वर्षों तक उत्तर पूर्वी पेरिस की
अपनी दुकान में गुड़ियों की मरम्मत करने वाले हेनरी लॉने (Henri Launay) कहते हैं कि उन्होंने अपने करियर के दौरान 30000 से अधिक गुड़ियों का
सुधारा है और उनके ज्यादातर ग्राहक बच्चे नहीं बल्कि 50-60 साल के बुजुर्ग थे।
वैसे इसी
हदीस के तार्किक विश्लेषण से यह साबित होता है कि उस समय बड़ी उम्र कि लड़कियां भी
गुड़ियों से खेला करती थी क्योंकि ह. आयशा
की रुखसती नबी के घर में 2 हिजरी में हुई थी और जैसा कि आम तौर पर उस वक्त उनकी उम्र
9 साल ही मानी जाए तो खैबर (7 हिजरी) के वक्त वो 14 साल की थीं या तबूक (7 हिजरी) के
वक्त 16 साल की थीं। तो अगर इस युवावस्था में कोई लड़की गुड़ियाओं से खेल सकती है तो
फिर 10 वर्ष बाद भी ऐसा करना कोई अजीब बात नहीं।
इसके
अलावा इस हदीस मेँ सिर्फ यह बताया गया है कि उनके घर में गुड़िया और घोड़े जैसे
खिलौने रूपी चीज़ें रखी थी। यह नहीं कहा गया कि वो इनसे खेलती थी। पुराने जमाने मेँ ऐसे चीज़ें सँजो के रखना (जब
आधुनिक दौर कि तरह खिलौने बनाना और बेचना आदि आम नहीं थे) समान्य चलन था। आज भी
बहुत से लोग अपनी प्यारी या बचपन की या अनोखी चीज़ें बुढ़ापे तक संभाल कर रखते है।
■ “And test the orphans until they reach the age
of nikah (marriage), and if you find in them rushdh (maturity of intellect)
release their property to them.”(4:6). It may be noted
here that the Quran makes intellectual maturity (which always falls beyond the
age of puberty) the basis to arrive at the age of marriage. This is also in
conformity with the Quranic description of marriage as emotional bonding
between two mutually compatible persons through which they seek “to dwell in tranquility”
(see 7:189 and 30:21) in the
companionship of each other which is not possible if either of the spouses is
mentally undeveloped.
■ Narrated 'Aisha: that the Prophet married her
when she was six years old and he consummated his marriage when she was nine
years old, and then she remained with him for nine years (i.e., till his death) (Sahih Bukhari 7:62:64).
■ A'isha (Allah be pleased with her) reported
that Allah's Apostle (may peace be upon him) married her when she was seven
years old, and he was taken to his house as a bride when she was nine, and her
dolls were with her; and when he (the Holy Prophet) died she was eighteen
years old (Sahih Muslim 8:3311).
■ Aisha said, "The Apostle of Allah married
me when I was seven years old." The narrator Sulaiman said: "Or
six years. "He had intercourse with me when I
was 9 years old (Sunan Abu Dawud 2121).
■ Narrated `Aisha: (the wife of the Prophet) I
had seen my parents following Islam since I attained the age of puberty.
Not a day passed but the Prophet (ﷺ)
visited us, both in the mornings and evenings (Sahih
Bukhari 1:8:465).
■ Narrated Aisha: (wife of the Prophet) Since I
reached the age when I could remember things, I have seen my parents
worshipping according to the right faith of Islam. Not a single day passed but
Allah's Messenger (ﷺ) visited us both in the
morning and in the evening (Sahih Bukhari 3:37:494)
■ इमाम जहबी ने 'मीजान उल ऐतेदाल' के जिल्द नं 7 के सफा नंबर 108 पर रावी नं 9241 के हालात में इस रावी (उर्वाह) के बारे यही बात लिखी जिसका फोटो नीचे दिया है:-
ReplyDeleteहज़रत आयशा रज़ि. ने कुन्नियत का इस्तेमाल किया जो हज़रत उम्मे अब्दुल्ला रज़ि. के बेटे और आपके भतीजे और गोद लिए गए बेटे के नाम से लिया गया था। अगर वो छह साल की थीं जब आपका निकाह हुआ था, तो उनसे आठ साल ही बड़ी रहीं होंगी जो उन्हें मुश्किल से ही गोद लेने के क़ाबिल बनाता। इसके अलावा, एक लड़की कभी अपने बच्चे की उम्मीद नहीं छोड़ सकती थी जबकि उन्होंने अपनी कुन्नियत के लिए अपने गोद लिए गए बच्चे के नाम इस्तेमाल किया।
Hazrat Aisha used the kunniat, the title derived from the name of a child, of Umme Abdullah after her nephew and adopted son. If she was six when her Nikah was performed, she would have been only eight years his senior, hardly making him eligible for adoption. Also, a little girl could not have given up on ever having her own child and used an adopted child’s name for her kunniat.
इस रिवायत को बयान करने वाले सभी कूफ़े के हैं और 2 मिस्र के हैं.
हज़रत आयशा रज़ि. का बयान है कि वह जंगे बद्र में लड़ाई के मैदान में थीं (मुस्लिम).