रिबा, ब्याज, सूद या इन्टरेस्ट हमेशा से ही ममनू है। पिछली शरीयतों, बाइबल (तोरह, इंजील), हिन्दू ग्रंथों तक में इसे मना करा गया है। इसलिए क़ुरान सूद क्या है, यह नहीं बताता। मुहम्मद साहब के के वक़्त में भी सोना चांदी करेंसी हुआ करती थी इसलिए सूद भी इन धातुओं में हुआ करता था। यंहा हमारा मकसद सूद को जायज़ करना नही है बल्कि जिसको सूद कहा जा रहा है उस मामले की तहक़ीक़ करना है। सूद से जुड़े हुए, सिम्पल से दिखने वाले बाज सवाल या मुद्दे आज के बैंकिंग निजाम के अंदर बहुत कॉम्प्लिकेटेड हो जाते हैं। इसलिए ऐसे मामलों में तमाम पहलू जानने के बाद इंसान को अपनी अक्ल और हालतों को देखते हुए अपना फैसला खूद करना चाहिए। अल्लाह के सवालों का जवाब बंदे को खूद देना है।
रिबा: अगर कोई इंसान किसी को पैसा उधार या कर्ज देता
है और फिर उस पर नफे या ज़ायद की मांग करता है, तो इसे सूद कहा
जाता है। हालाँकि, उधार या किराए पर दी गई चीजें इसमें नहीं आती है
क्योंकि वो इस्तेमाल (use) होने के बावजूद भी खत्म न नहीं होती है बल्कि बरकरार
या कायम रहती हैं और उन्हें दुबारा पैदा नहीं करना होता। मगर क्योंकि पैसा इस्तेमाल (consume) करने के बाद खर्च हो चुका होता है और फिर इसे दोबारा पैदा करने की जरूरत
होती है इसलिए पैसे उधार या कर्ज देने के बदल मांगी गई बढ़ोतरी की रकम ही असल रिबा है। रिबा एक जुल्म है।
Useable and consumable items on Installments: इस उसूल के मद्देनजर हम सूद के
बारे में काफी कुछ समझ सकते हैं। आसान जुबान में कहें तो जो चीज़ किराए पर नहीं मिलती उन पर सूद होता
है और जो किराये पर मिलती हैं, उन का किराया होता है। असल में दो
तरह की इस्तेमाल की चीजें होती हैं: Consumable और usable.
Consumable चीजें इस्तेमाल करने पर खत्म हो जाती है, जैसे आटे, तेल, सब्जी, खाद्य सामग्री, रुई, कपास वगैरह जिन्हें इस्तेमाल करने के बाद दुबारा पैदा किया जाता है। पैसा भी इसी श्रेणी में आता है क्योंकि पैसा भी इस्तेमाल करने के बाद खत्म हो जाता है और फिर दुबारा कमाना पड़ता है। इस तरह की चीजों को उधार देने के बाद बढ़त या ज्यादा मिक़दार के साथ वापिस लेना सूद होता है। क्योंकि किसी जरुरतमन्द के लिए मुश्किल वक़्त में कोई नई चीज पैदा करना बेहद मुश्किल काम है। इसलिए जब भी सूद लेनदेन का मसला पेश आएगा वो Consumable items में आएगा।
Usable चीजें इस्तेमाल करने के बाद खत्म नहीं होती है क्योंकि उनकी एक लाइफ होती है जैसे घर, गाड़ी, फर्नीचर, कपड़े अप्लाइन्सेज वगैरह जिन्हें इस्तेमाल करने के बाद दुबारा पैदा करने की जरूरत नहीं होती (भले ही कुछ पर डेपरेशियेशन लगे और लंबे वक़्त बाद बेकार हो जाए।)। इस तरह की चीजों को उधार देने के बाद इनके इस्तेमाल के बदले मांग जाने वाला पैसा सूद नहीं होता है बल्कि किराया होता है। यह Money against goods होती है। ऐसी चीजें ही किस्तों पर बेची जाती है।
बैंकिंग सूदी सिस्टम: बैंको पर आज पूरी दुनिया की इकॉनमी खड़ी है। फिलहाल बैंकिंग से अलग होना नामुमकिन है क्योंकि बैंक में सभी के एकाउंट हैं और सभी को बैंक से रोज़मर्रा के काम पड़ते हैं। तनखवाएं, पेमेंट बैंक में ही आती है। बैंक आपके पैसों की हिफाजत और बहुत सी ट्रांज़ेएक्शन करता है। बैंक के बिना आज ज़िंदगी बहुत दूभर हो जाएगी। यह सच है कि आज के बैंकिंग सिस्टम में बैंकों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा ब्याज से मिलता है मगर अन्य सर्विसेज़ के बदले भी उनकी कुछ कमाई होती है। जिस तरह बैंक लोन देते हैं और जिस तरह पुराने जमाने के जागीरदार, जमींदार, साहूकार, महाजन लोन दिया करते थे, उसमें फ़र्क़ हैं। आज का बैंकिंग निजाम पुराने सूदी निजाम से थोड़ा अलग है। पहले सूद का सादा निज़ाम हुआ करता था। अब एक मुखतलीफ़ तरह का सूद का या बैंक निज़ाम बन गया है। इसलिए इसकी नेचर भी पहले वाले से काफी हद तक बदल गयी है।
आज बैंकिंग सिस्टम को एक बार को सुधारना तो असान हो सकता है मगर खत्म करना मुश्किल। यह एकदम से नहीं हो सकता। जब तक मुस्लिम कोई इस्लाम के मुताबिक निज़ाम नहीं बना लेते तब तक इसे गंवारा ही करना पड़ेगा। यह वैसे ही जैसे नबी के वक़्त में गुलामी का निज़ाम था जिसे बर्दास्त भी किया गया और साथ ही उसे खत्म करने की कोशिशें जारी रखी गयी।
सूद के प्रकार: मूलतः सूद दो तरह का होता है। एक वो जो बुनियादी तौर पर ही शोषण की नियत से लोगों को दिये पैसे पर लिया जाता है जैसे लोकल ब्याज़खोर या बट्टेबाज़ द्वारा कर्ज पर सूद। इस सूद की रकम का कोई भी इस्तमाल जायज़ नहीं, भले ही किसी के उद्धार के लिए खर्च किया जाए। क्योंकि इसमें बगावत छुपी है।
दूसरा सूद है जो आम तौर पर बैंक अकाउंट्स में, सेविंग्स पर, डिपॉजिट इत्यादि पर मिलता है। इसे मांगा नहीं जाता बल्कि यह मिल जाता है। इसमें किसी का शोषण नहीं हो रहा होता बल्कि अन्य कारण मौजूद होते हैं। जैसे अकाउंट या किसी फंड में रखे हुए पैसों पर ब्याज मिलेगा ही मिलेगा। इस तरह की जमा पर बैंकों द्वारा दिया जाने ब्याज वाला भी मना है। मगर जाहीर है इसकी वो प्रकृति नहीं होती जो आम लिए जाने वाले ब्याज की होती है। इसलिए एक मुसलमान को इसे तब तक लेने या इस्तेमाल करने से बचना चाहिए जब तक कि कोई मजबूर न हों। क्योंकि यह आपको मिलना ही है इसलिए आप इसे कई तरह के खैर के कामों में इस्तेमाल कर सकते हैं।
जैसे जिस्म बेचने के धंधों में पड़ी लड़कियों के रीसेटलमेंट में, नशाखोरों के नशे छुड़ाने और रेहबलिटीशेन में, बेगुनाहों को जेल से छुड़ाने या कानूनी मदद करने में, बड़ी बीमारियों से जूझ रहे जरूरतमंद लोगों के इलाज में, सूद या लोन में घिर चुके आदमी को कर्ज़ से बाहर निकालने में, बेहद गरीब लोगों के ज़रूरी मामलात में जैसे खाना, रहना, पहनना में (हालांकि इनका हक जकात हैं), रिश्वत की वजह से अटके जायज़ कामों को जो आपका हक़ है, उन्हें पूरा करवाने के लिए। इन सब ज़रूरी कामों को छोड़ कर अगर कोई इस पैसे को मस्जिद के टॉयलेट बनवाने जैसे सेकंडरी काम पर खर्च करना चाहे तो कर सकता है। ऐसे हज़ारों अर्थपूर्ण और ज़रूरी काम हैं जिनमें यह खर्च किया जा सकता है और करना भी चाहिये। जब यह सूद के तौर पर मिला पैसा गरीब को दिया जाता है तो उसके लिए यह सूद नहीं होता बल्कि मदद होता है क्योंकि सूद तो यह आपके लिए था। हालाँकि इसके बदले अल्लाह से किसी भी अजर की उम्मीद न करें क्योंकि यह खैरात नहीं है।
(मुस्लिम की जकात सही जगह जा ही नहीं रही है। असली हकदारों तक ज़कात पहुँच नहीं पाती है। उनका
एक बेबुनियादी तसव्वुर बन चुका है कि सिर्फ फला फला कामों में ही ज़कात
जाती है। एक आम मुसलमान किसी पर चढ़े हुए सूद को ज़कात से उतारना सही नही
मानता तो सूद के पैसे से ही इसे उतार देने में किसी को हर्ज नहीं होना
चाहिए। ऐसे ही नाजयज़ मांगी जा रही रिश्वत के बदले में मुसलमान अपनी गाढ़ी
कमाई की बाजए सूद के पैसे देने में भी किसी मुसलमान को कोई ऐतराज नहीं होना
चाहिए)
वैसे इस पैसे से सरकार द्वारा लगाए गये टैक्स (जो आज हद से ज्यादा होता है) को भी भर सकते हो। देवबंद का फतवा है कि ऐसे मिले ब्याज से टैक्स भरा जा सकता है (मगर यह ध्यान रखना है कि ज़कात बिना किसी चालकी के पूरी की पूरी दी जाए। वैसे सरकार को दिया जाने वाले टैक्स एक तरह से जकात की ही तरह है, इस पर कभी और बात करेंगे)। गालिबन शेख अहमद दीदात ने अरब लोगों से उनके तमाम अकाउंट में मिलने वाले करोड़ों रुपये के ब्याज को अफ्रीका के गरीब मुल्कों के लोगों की मदद करने के लिए मांगा था ताकि उन्हें इस्लाम की ओर लाया जा सके मगर उन्हें यह पैसा नहीं दिया गया था।
बैंक का पर्सनल लोन पर कमाया ब्याज रिबा है, जो आमतौर पर बैंक की लगभग 1/4 कमाई की वजह होता है। जंहा भी बैंक ने पैसे, माल, पेरिशेबल कमोडिटीज लोन/उधार के तौर पर दिए है ब्याज पर, वो सब रिबा कमा कर देते हैं।
लोन के प्रकार: Hire purchase अग्रीमेंट वो होते हैं जिसमें लोन देने वाले के नाम पर ही वो चीज रजिस्टर होती है जिसको खरीदने के लिए लोन दिया गया है। Mortgage में लोन देने वाले के नाम पर रजिसट्रेशन नहीं होता है मगर उसे चीज का अधिग्रहण करने का पूरा अधिकार होता है, किश्त न दिए जाने की सूरत में। ये दोनों लोन secured loans कहलाते हैं। जबकि Personal लोन Unsecured लोन कहलाये जाते हैं। Lease अग्रीमेंट किराये से संबंधित होते है।
बचत योजनाएं: सैविंग स्कीम सामान्य ब्याज लेन देन की तरह नहीं हैं। इनमें सरकार (या कंपनियां) लोन देने वालों से उनकी शर्तों पर नहीं बल्कि अपनी शर्तों पर पैसा उधार लेती है और लाभ की दर भी खूद ही तय करती (बढ़ाती-घटाती भी) है। हालाँकि यह वैसा नहीं है जैसे आम तौर पर लिए गए लोन को ब्याज के साथ लौटाया जाता है क्योंकि इसमें शोषण-उत्पीड़न नहीं होता और साथ ही ये प्लान एक तरह से इन्वेस्टमेंट बिजनेस की तरह काम कर रहे होते है। मगर फिर भी यह एक हद तक उसी के जैसे है। ऐसी करी गई जमा पर ज़ायद सूद होगा। इसलिए तकवेदारों के लिए यही मुनासिब है कि ऐसी योजनाओं से लाभ लें। आम लोगों को फायदा कमाने की नियत से इनमें इन्वेस्ट नहीं करना चाहिए क्योंकि उनके लिए यह नाजयज़ होगा। बेहतर है सोने या प्रॉपर्टी में पैसे लगा दो।
मगर क्योंकि ये आम सूद की तरह नहीं होती है इसलिए बाज़ उलेमा इसे उनके लिए गलत नहीं बताते हैंजो बेहद मजबूर लोग हैं। जैसे अपाहिज, अनाथ, विधवाएँ, बेवाएं, अकेले बुजुर्ग, बेहद गरीब लोग, कन्या विवाह दहेज के लिए अगर इनमें अपना पैसा लगाते हैं और ज़ायद पाते हैं तो उम्मीद है कि अल्लाह उन्हें बक्श देगा क्योंकि उनके पास कोई चारा ही नहीं है। ये लोग भविष्य में पड़ने वाली जरूरत के तहत रकम जमा कर देते है।
इसमें
वो फंड भी आते हैं (जैसे पेंशन, ग्रेच्यूटी, प्रोविडेंट फण्ड) जिनमें
सरकारी और बाज प्राइवेट मुलाजिमों को अपनी कमाई का एक हिस्सा डालना
अनिवार्य होता है। इसी तरह आम लोगो के लिये भी टैक्स बचाने के लिए ऐसी कई फ़िक्सड स्कीम में (FD, PLI) में
पैसा डालना ज़रूरत बन जाता है। इसमें असल नियत सूद खाने की नहीं होती और
स्कीम जब तक चलेगी तब तक पैसों की वैल्यू भी गिरनी तय है। सो उन सभी के लिए ऐसा करना गलत नहीं है। अपने हालातों के मद्देनजर
बढ़ी हुई रकम का क्या, कैसे, कंहा इस्तेमाल करना है, अपने लिए या दूसरों के
लिए, यह हर आप को खुद फैसला करना है क्योंकि इसका संबंध तक़वे से है।
इन्श्योरेन्स: इन्शुरन्स भी मिलकर तय किया गया एक बहुत अच्छा निज़ाम है, जिसमें किस ने कितना दिया, किसको कितना मिला, यह अहम नहीं है। यह काम कौमी तौर पर चंद लोग कर सकते थे या ये स्कीम मुसलमानों की हुकमत चलाती। फर्द या हुकूमत इसके बदले अपना मेहनताना ले सकती है। मगर क्योंकि इसे चलाने के लिए कुछ कंपनिया सामने आ चुकी है जो इसके बदले अपना मेहनताना कमीशन के तौर पर नहीं लेती हैं बल्कि आपकी प्रमियम के पैसे को आगे इन्वेस्ट करके लेती है। उन्होंने सरमाये को इस्तमेल करने का हक़ ले लिया। फिलहाल यह बीमा सूदी कंपनिया कर रही है जो कि वेलफेयर नहीं बल्कि पूरी तरह से बिज़नेस के ऐतबार से हो रहा है, इसलिए इसको सुधारने की ज़रूरत है। जब तक ये कंपनियां सूद से तौबा नहीं कर लेती तब तक इसे गुलामी की तरह ही बुरा जानते हुए चलाते रहें। हमारी जिम्मेदारी उन्हे अपने बीमे के पैसे के इस्तेमाल करने का हक देने तक है। आपके प्रीमियम देने से दूसरे को मिले क्लैम पर आपको अजर नहीं मिलेगा क्योंकि यह कभी दुसरो के और कभी आपके काम आएगा।
इसके खिलाफ कुछ सवाल उठाए जाते हैं जैसे कि इस पैसे का ब्याज-आधारित योजनाओं में आगे निवेश करना और मृत्यु, दुर्घटना या नुकसान के खिलाफ मिला पैसा एक तरह का जुआ होना। मगर ये सवाल गलत हैं क्योंकि किश्तें इस शर्त पर दी जाती हैं कि पैसे देने वाला भी इसका लाभार्थी हो सकता है। यदि कम्पनी इकट्ठे हुए पैसों को आगे ब्याज वाले लेनदेन में निवेश करती हैं तो इसकी पूरी जिम्मेदारी पॉलिसी धारकों पर नहीं डाली जा सकती क्योंकि उनका मकसद तो अपने बुरे वक़्त में अपने दिए हुए पैसों से मदद हासिल करने का है। यह जुआ भी नहीं होता है क्योंकि जुवे में किस्मत पर दांव पर लगाने का मामला होता है जबकि बीमा में लोग ऐसी प्रणाली का हिस्सा बनते हैं जो नुकसान की स्थिति में एक-दूसरे की मदद करती है। जुवे में एक पार्टी को खोना पड़ता है जबकि ऐसी स्कीम की खरीद फरोख्त में दोनों को कुछ हासिल होता है।
बीमा (वेहीकल, हेल्थ, लाइफ
वगैरह) एक तरह से आपसी मदद का करार है जिसमें लोग किस्तों में एक राशि का भुगतान
करते हैं। इसका उद्देश्य है कि किसी को कोई नुकसान होता है, तो
उन्हें जमा किये धन से मुआवजा दिया जाएगा। यानि आपका ही पैसा आपको बुरे वक़्त में
बड़ी रकम के साथ वापिस कर दिया जाता है। इसमें भी शोषण-उत्पीड़न नहीं होता, सब
स्वेच्छिक होता है।
गाड़ियों का बीमा करवाना तो आज कानूनी रूप से मजबूरी है। चोरी या एक्सीडेंट वगैरह में इससे मिलने वाली मदद से लोगों को जायज़ फायदा ही होता है क्योंकि हमारे देश में न तो पुलिस-कानून व्यवस्था सही है, न ही लोगों की ड्राइविंग सेंस सही है और न ही कम्पनि सर्विस सेंटर में उचित रेट चार्ज किया जाता है।
इसी तरह भारत में हेल्थ सेक्टर का इतना बुरा हाल है कि सरकारी अस्पताल में इलाज करवाना एक असंभव काम है और प्राइवेट अस्पताल में इलाज करवाना अपनी जीवन भर की जमा पूंजी बहा देना है। ऐसी स्तिथि में हेलथ इंश्योरेन्स करवाना जरूरी हो जाता है। यंहा ध्यान देने वाली बात यह है कि कंपनी सीधा पैसा अस्पताल को देगी जिससे लालची अस्पताल का खुला हुआ मुंह भरा जाएगा। इस तरह की सरकारी स्कीम जैसे GHS, ESIC वगैरह तो वैसे ही जायज़ है क्योंकि यह पहले से ही सरकार की जिम्मेदारी है।
एक्स्पर्ट्स बताते हैं कि इंश्योरेंस (All types of insurance) लेने वालों के मुकाबले में, क्लैम की डिमांड करने वाले अक्सर 1/4 (कम-बढ़ती के साथ मगर हर हाल में 1/2 से कम on an average) ही रहते हैं। यानी ऐसे बेन्फिशियर को असलम बाकी लोगो से मिलने वालों प्रिमियन का पैसा ही सिर्क्युकेट होकर मिलता रहता है। कंपनी के पास जो पैसा प्रिमियन का बच जाता है और उससे बनाये हुए इन्वेस्टमेंट पर प्रॉफिट, दोनों कंपनी रख लेती है। कुछ बड़े क्लेम में ज़ुरूर कंपनी कंही और से एडजस्ट या कमा कर देती है। इसलिए इन पर कम्पनियों को तरग़ीब दिलवानी चाहिए।
इन्स्टॉल्मेन्ट पर खरीद: इसमें पैसा consumable चीज़ में तब्दील हो जाता है। इसमें आप उस चीज़ का इस्तमाल करंगे और उसके इस्तेमाल के बदले किराया या मुआवजा देंगे और आखिरी क़िस्त के बाद वो चीज़ आपकी हो जाएगी इसलिए इन सबको तीनो पहलुओं को मिलाकर असलन यह खरीद फरोख्त का मामला हो जाता है जो तीन पार्टियों के बीच होता है। हकीकत में आप चीज बैंक से खरीद रहे होते हैं जो बेचने वाले को पूरी पेमेंट तभी तभी के करता है। बैंक ने आपके लिए खरीद कर आपको दे दी है और उसका मुवाज़ा ले लिया है। इसमें बैंक पर्सनल लोन से कम चार्ज करते हैं क्योंकि बैंक खरीदी गई चीज़ पर कब्जे का हक़ रखता है। यानि समान का किराया देते चले जाएं और समान की रकम को किश्त में देते जाएं, यही इसकी हकीकत है। बैंक इसे लोन का नाम दे रहे हैं मगर असरल में में हायर पर्चसे अग्रीमन्ट है। मलेशिया में इस मोर्टगेज को हायर पर्चेस नाम दे दिया गया है जो कि सही है। बाकी जगह बैंक इन दस्तावेज़ और टर्म्स के नाम बदलने को तैयार नहीं है और आम उलेमा इस डील की असल को समझने को तैयार नहीं है इसलिए हमारे यंहा इन पर बहुत कनफूजन है। इसलिए मोर्टगेज अपनी ज़ात में जायज़ है बल्कि बहुत ही अच्छा स्कीम है।
म्यूचल फंड:
यह एक तरह से पैसों को आगे कई तरह के धंधों में लगा कर होने वाले फायदे को
डिविडेन्ड के तौर पर बाँट देते हैं। अगर ये प्लान हराम काम मे मुब्तिला
कंपनियों जैसे शराब, जुवा, पोर्क वगैरह के धंधों में और सूदी धंधे में आगे
इन्वेस्ट नहीं करती है और सिर्फ हलाल धंधों में इन्वेस्ट करती है तो इससे
हुई सारी कमाई जायज़ है। पर अगर यह प्लान पैसे को आगे हराम काम मे मुब्तिला
कंपनियों में इन्वेस्ट कर देती है तो प्लान पूरी तरह से नाजायज़ है। पर अगर
ऐसे प्लान पैसे को आगे किसी हलाल कामों के बिजनेस और सूद के बिज़नेस दोनो
में एक मिक्सचर बना कर इन्वेस्ट कर देती है तो यंहा मामला पेचीदा हो जाता
है। इस मिक्स्चर में जितना भी फायदा हलाल कंपनियों में लगा कर हुआ है, वो
बिल्कुल जायज़ है और जो फायदा हराम कंपनियों मे लगा कर हुआ है, उसे उलेमा
की अक्सरियत ने नाजायज करार दिया है। इसलिए इनसे हुई कमाई के नाजायज पैसों को ऊपर बताए गए मजबूरों को दिया जा सकता है।
शेयर, डिजिटल करेंसी: बाकी शेयर ट्रैडिंग या डिजिटल करेंसी का मामला सूद से बहुत अलग है। ये सभी जायज हैं बस इनमें हराम कामों में मुब्तिला कंपनियों से बचना है। ऐसे किसी भी काम को करने से पहले हमें बस यह खयाल रखना है कि वो अपनी जात में कोई हराम काम, गुनाह, जुर्म न हो और साथ ही उसमें कोई अख़लाक़ी तौर पर बुराई न हो जैसे झूठ धोखा, वगैरह जिनको दिल खुद नगंवार नहीं करता।
फर्दर इनवेस्टमेंट: चाहे कोई स्कीम, फंड, इंश्योरेंस हो (जिनमें डिविडेंट, प्रॉफ़िट, बेनेफिट, क्लैम नामक फायदा मिले, सूद नामक नहीं), इनमें पैसा लगाना सूदी निज़ाम को बढ़ाना नहीं होता है। इसे गैर सूदी भाग का हिस्सा बनना तो कहा जा सकता है। इनमें कंपनिया आपके पैसों को आगे कई तरह की कंपनियों, धंधों, स्कीमों में इन्वेस्ट कर देती है। इनमें सूदी और गैर सूदी धंधों दोनों शामिल होते हैं। इनमें जितना पैसा आपने जमा किया है वो आपका ही पैसा है और वो तो बिल्कुल जायज़ है। जो पैसे बढ़कर गैर सूदी कंपनियों से मिलते हैं, वो भी जायज़ है। जो पैसे बढ़कर सूदी कंपनियों से मिलते हैं, लिए उनमें जरूरत और हालातों के तहत थोड़ी गुंजाइश पैदा हो जाती है जिसका फैसला हर इंसान को खूद लेना है। हालाँकि सरकार ऐसी योजनाओं की कमाई से, असहाय और मजबूर लोगों को पेंशन देती है तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि रेवेन्यू कैसे उत्पन्न हुआ है। तमाम हुकूमते, डिपार्टमेंट, यूनिवर्सिटी, इदारे अपने पैसों को आगे सूदी निज़ाम में लगाते हैं और इससे तनख्वाह, वजीफे वगैरह देते हैं। इसलिए बेहतर यही है कि उन कम्पनियों से बीमा करवाया जाए जो आगे ब्याज आधारित स्कीम में पैसा न लगाती हालाँकि ऐसी कम्पनियाँ बहुत ही कम मिलती हैं। मूल मुद्दा है यह है हर प्लान में पैसा लगाने से पहले देखना चाहिए कि आपकी कंपनी आगे कहा से कमा कर देगी।
बिज़नेस इन्वेस्मन्ट: कर्ज़
और इन्वेस्टमेंट में फर्क है। किसी को पैसों की ज़रूरत है और वो जब किसी से
पैसे उधार लेगा तो यह कर्ज है। किसी का कोई प्लान, व्यवसाय चल रहा है,
उसमें कोई अपने पैसे लगा कर शामिल हो जाता है तो यह इनवेस्टमेंट है।
इनवेस्टमेंट या बिज़नेस में फायदे को चाहे फिक्स या वेरिएबल रेट में लेना
दोनों जायज़ है। इसलिए लेट अदा करने पर मुनासिब जुर्मान जायज़ है जैसे बिजली
के बिल पर होता है।
यानि इन्वेस्टमेंट के तौर पर किसी व्यापारी को पैसे उधार देने पर रज़ामन्दी के साथ ज़्यादा रकम हासिल करना, यह जायज़ है और यह हमेशा से ही होता आ रहा है। इसमें नुकसान होने पर इंसान अपना मूल तो वापिस ले सकता है मगर ज़ायद नहीं क्योंकि वो फिर ज़ुल्म हो जाएगा।
पगड़ी/ सिक्यूरिटी: इन मामलात में अक्सर दोनों पार्टियों की ज़रूरत पूरी होती है और दोनों के काम बनते हैं. इसलिए इसमें एक आम उसूल का ख्याल रखा जाना चाहिए कि किसी की मजबूरी का फ़ायदा नहीं उठाना यानी अपना फ़ायदा है तो उसका भी फ़ायदा होना चाहिए (कम या ज्यादा, ये तकवे की बात है). ये उसूल हमें केस टू केस अप्लाई हमें करके देखना है. दोनों तरफ से बस ये ख्याल रखना चाहिए कि किसी पर ज़ुल्म, ज़्यादाती, धोखा न हो, किसी की मजबूरी से सिर्फ खुद को फ़ायदा न हो। जगह देने वाला, पैसे का बड़ा ज़रूरतमंद या मजबूर न हो और जगह लेने वाला भी पहले से बहुत अमीर या इस डील से बड़ा फायदा/कमाई करने का मंसूबा रखने वाले न हो. अगर ऐसा कुछ नहीं है, तो सब जायज़ है। चाहे पगड़ी/सिक्यूरिटी पर जगह लेना हो (किराए या बिना किराए के साथ) या पगड़ी/सिक्यूरिटी की वजह से उस की कीमते कम हो जाने पर खरीद - फरोख्त हो. ज्यादती के मामले में कुरान (3:130) ने ऐसी ही एक बात रिबा के साथ बयान करी है कि बढ़ा - चढ़ा कर सूद मत खाओ.
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क्या जरूरत और मजबूरी में उठाये गए कर्ज़ पर सूद देना भी हराम है?
उधार-कर्ज जो ज़ुरूरत या मजबूरी में लिया जाता है, जिसे लौटते हुए ज़्यादा पैसे वापिस करने होते है, यह सूद है। मगर ये सूद लेने वाले के लिए गुनाह है, देने वाले के लिए नहीं। ज़रूरत या मजबूरी के तहत उठाये गए उधार या कर्ज (या समान पर लोन) पर ब्याज देना न तो हराम है और न ही गलत।
आज घर खरीदने के लिए (जो आज लगभग नामुमकिन हो गया है), बिजनेस सेट करने के लिए, हायर स्टडी, बेटी की शादि वगैरह जैसे बहुत से मकसद के लिए लोन की जरूरत पड़ ही जाती है और ऐसे में लोन लेने के अलावा कोई चारा ही नहीं बचता। इसलिए ऐसे हालातों में ब्याज पर लोन उठाया जा सकता है।
मगर आम हालातों में हर चीज के लिए पैसा ब्याज पर उठाना गलत होगा क्योंकि यह सूदी निजाम को बिना मजबूरी बढ़ाने में मदद करेगा और लैविश लाइफ (फिजूलखर्ची, दिखावे) की तरफ भी लेके जाएगा। इसके साथ ही यह इंसान को ब्याज के चुंगल में हमेशा के लिए फंसा सकता है या दिवालिए होने की कगार पर भी ला सकता है।
कुरान में ब्याज लेना मना किया गया है मगर देना नहीं। एक हदीस में कहा गया है कि जो ब्याज देता है वह लानाती है।
कुरान
में जितनी भी आयतें रिबा के बारे में आती हैं, उनमें साफ है की सूद लेना
नाजायज़ है, न कि देना। बल्कि कुरान (2:280) तो सूद का ज़िक्र करते हुए
कर्जदारों को ज़्यादा मुहलत देने की वकालत करता है। ऐसे कर्जदारों को तो
मज़लूम ठहराया गया है। आखिर लोग मजबूरी और ज़रूरत मे पहले अपने
रिशतेदारों
और जानकारों से ही कर्ज़ लेने की कोशिश करते हैं क्योंकि अक्सर यह बिना
ब्याज रहित होते हैं। मगर जब ऐसे कर्ज़ नहीं मिल पाते तब लोगों के पास बाहर
से ब्याज पर कर्ज़ उठाने के सिवा उनके पास कोई और रास्ता नहीं रह जाता।
मजबूरी में कर्ज़ उठा कर सूद देने वाला तो पहले ही मज़लूम है, उस पर कैसे
हराम या नाजायज़ के तमगे लगाये जा सकते हैं? इस्लाम ऐसा नहीं कर सकता है। ये
उसी तरह है जैसे रिश्वत देना और लेना गुनाह है, मगर सिर्फ वही रिश्वत
पाप है जो अपने नाजायज काम को निकलवाने के लिए दी जाती है, न की अपने जायज़
काम को करवाने के लिए या हक हासिल करने के लिए मजबूरन दी गयी रिश्वत गुनाह
है।
नबी ने भी साफ साफ किसी हदीस में इस बात पर ज़ोर देके नहीं कहा कि सूद देना हराम है। एक रिवायत (मुस्लिम की) में कहा गया है कि नबी ने ''सूद लेने वाले, देने वाले, लिखने वाले, इसकी गवाही देने वाले’’ पर लानत दी है।
इसमें पहली राय यह यह है कि नबी ने जब मुसलमानों की हुकूमत कायम कर दी तब यह हुकूम दिया गया यानि जब सूद का पूरी तरह से उम्मत में खात्मा हो गया था। इसलिए तब नबी ने सूद में शामिल सभी तरह के अफराद यानि लेने, देने, लिखने, गवाही देने वाले को लानती कहा था। इसलिए सूद देना तभी गलत होगा जब हुकूमत इसे लागू कर दे। यानि आज भी अगर कोई हुकूमत सूद देने को जुर्म करार दे दे तो उसे मानना सबके लिए लाज़मी हो जाएगा।
इसमें दूसरी राय यही है कि यंहा जिस लफ्ज़ का तर्जुमा सूद 'देने वाला' किया जा रहा है, उसके एक मायने सूद 'दिलवाने वाले' के भी है यानी कि वो लोग जो सूद लेन-देन में एजेंट की तरह काम करते हैं और उसके बदले एक रकम भी अक्सर लेते हैं। इस हदीस में ऐसे इंसान के लिए लफ़्ज़ مُوْكِل (Muwakkil) आया है जिसका मतलब ब्याज 'देने वाला' होता है और ब्याज का 'उपभोग करवाने वाला' भी यानि जो पेशेवर ब्याज दाताओं के मुहरे होते हैं और अपने आकाओं के लिए ग्राहकों तलाश करते हैं। ये राय तब और ज्यादा वाजेह हो जाती है जब हम इस बात से जुडी तमाम रिवायतें को एक साथ देखतें हैं. इससे पता लगता है कि ये ऐसे लोगों पर लानत है जो सूद के धंधे से या सूद देके पैसा उठा कर, माल को इधर उधर लगा कर रोज़ी रोटी कमाते है यानि मुख्यता सूद के कारोबार से जुड़ कर, इस निज़ाम के तौर तरीकों से पैसे बनाते है। यह उनके लिए नहीं है जो मजबूरी में कर्ज़ उठाते है। इसके अलावा यंहा भी लफ्ज हराम इस्तेमाल नहीं किया गया है। एक और रिवायात (बुखारी 2086, 5347, 5945) में कहा गया है कि नबी ने सूद लेने और देने वाले व्यवसाय को मना फरमाया है जबकि इसी हदीस के अन्य तुर्क (बुखारी 2238) में कहा गया है कि नबी ने सूद लेने के व्यवसाय को मना फरमाया है। यंहा सूद देने का ज़िक्र नहीं है और न ही हराम लफ्ज का। यंहा भी सूद लेन-देन के धंधे का ज़िक्र है, न कि मजबूरन दिये जाने वाला सूद का। अगर फिर भी कोई इस हदीस को धंधे कि बजाय आम मामलात में लागू करता है तो उसे यह समझना पड़ेगा कि हदीसों में आयें कॉमन लफ्जों पर ही यकीनी तौर प्राथमिकता दी जानी चाहिए, इसलिए सूद लेने वाली बात ही मूल मुद्दा है। पर क्योंकि यंहा दो पहलू सामने आ गए हैं। इसलिए यंहा भी वही उसूल इस्तेमाल किया जाएगा कि कुरान ने सूद लेना हराम करार दिया है, देना नहीं। इसलिए इस हदीस का एक पसमंजर होगा जो कि यही है कि इनमें उन लोगों को सूद देने से मना किया जा रहा है जो खुसूसी तौर पर सूद लेन - देन के धंधे से या सूदी निज़ाम की बदौलत दौलत बनाते हैं।
हदीसों में सूद लिखने वाले पर भी लानत करी गयी है मगर बहुत से उलेमा यही मानते हैं
कि ये वो लोग हैं जो ऐसे बिज़नेस या कंपनियों में सूद संबंधी लिखा पढ़त करते
हैं जिनका मुख्य पेशा ही सूद है या सूद पर पूरी तरह टिका है। इनमें वो
लोग शामिल नहीं हैं जिनकी कंपनी का मुख्य व्यापार सूद सम्बन्धी नहीं बल्कि कुछ
और है, मगर क्योंकि उनकी कम्पनियां बाज़ वक़्त बाज़ार से कर्ज़ उठाती है तो सूद का अकाउंट, लेखा जोखा भी कर्मचारियों को मैनटैन करना पड़ता है। जब ऐसे मामलों में यह हदीस (सूद
लिखने वाला लानती है) लागू नहीं होती तो फिर मजबूरी, ज़रूरत में लिए गए कर्ज़ पर दिया गए सूद पर वो हदीस (सूद देने वाला लानती है) कैसे लागू हो जायगी? सो यह हदीस उन पर लागू नहीं होगी।
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सवाल: क्योंकि पैसे की कीमत वक्त के साथ गिर जाती है तो सोने में उधार दिया जाना कैसा है?
इसमें वैसे कोई हर्ज नहीं है. मगर उधार लेने वाला लेते और देते दोनों वक्त टूटन-बनायी के पैसे ज्यादा भुगेतागा. ऐसे में किसी अमीर (काम-धन्धों के लिए) के साथ तो ये मामला किया जा सकता हैं मगर गरीब के साथ शायद ज्यादती साबित हो सकती है. हालांकि अगर कोई नेक इंसान देर से पैसे वापिस करता है तो अपनी मर्ज़ी से पैसे बढाकर भी दे सकता है (खुद नहीं मांगने हैं), हदीसो से साबित है. उधार लेने वाला बहुत लम्बे वक़्त बाद पैसा उतना ही वापिस करता और तब तक पैसों की कीमत काफी गिर चुकी है तो अखिरत में उसकी नेकियाँ, उधार देने वाले को बदले में दी जा सकती हैं.
सवाल: बीमा वगैरह क्यों करवाना, क्या अल्लाह पर भरोसा नहीं है?
अल्लाह पर तवक्को करने के यह मायने नहीं है कि सेविंग या प्लानिंग नहीं करी जाए। भविष्य के लिए सेविंग करना इस्लाम में जायज़ है और करनी ही चाहिए। सहाबा भी सैविंग करते थे जिसे दीन के लिए ज़रूरत पड़ने पर नबी की झोली में लाके डाल देते थे। इस्लाम ने इसी सैविंग पर तो मामूली सी ज़कात रखी गई है और बाकी के इस्तेमाल को आपका हक दिया गया है। अल्लाह ने हज़रत यूसुफ से भी अनाज की सेविंग करवाई है। अल्लाह की कुदरत में बाज जानवर भी सख्त मौसम के लिए खाना सेव करके रखते हैं। नबी ने फरमाया है कि अल्लाह पर भरोसा करो मगर अपने ऊंट को बांधो। इसलिए क़ुरान की हिफाज़त के लिए अल्लाह पर तवक्को करी गयी मगर साथ ही तदबीर भी करी गयी, क़ुरान को हिफ्ज़ करके।
क्या बैंक
में नौकरी करन जायज़ है?
आम तौर पर एक मुसलमान को बैंकिंग के अलावा अन्य क्षेत्रों में नौकरी की तलाश करनी चाहिए। आम हालत में बैंक में काम नहीं करना ही बेहतर है क्योंकि ब्याज के धंधों वालों का समर्थन करने या ज्यादतीयों (कुरान 5:2) में सहयोग करने की मनाही करी गई है। पर अगर कोई मुस्लिम बेरोजगार मज़बूरी या ज़रूरत में बैंक में काम करता है और बैंक उसे ब्याज वाले लेन - देन से अलग दूसरी अन्य सहायक सेवाओं में लगाता है तो यह बेशक जायज होगा इंशाअल्लाह। हालाँकि अगर किसी को लगता है कि उसके पास बैंक में एक सामान्य नौकरी करने यानि ब्याज लेन देन से संबंधित काम करने के लिए कोई उचित बहाना मौजूद है जैसी कोई मजूबुरी जिसे वह अल्लाह के सामने अखिरत में पेश कर सकता है तो उसका मामला अल्लाह के सुपुर्द कर देना चाहिए।
मैं एक कम्पनी के लिए सॉफ्टवेर बनाता हूँ तो क्या मैं अपनी कंपनी के एक क्लाइंट जो कि एक बैंक है, उसके लिए एक जनरल सॉफ्टवेयर बना कर दे सकता हूँ या जॉब छोड़ दूँ?
सूद खाना या सूद का काम करना हराम है। सूद के निज़ाम या व्यवसाय को चलाने के लिए उसका मुख्य अंग बनकर लिखत - पढ़त या सपोर्ट करना भी ममनू है।
मगर आपका काम एक सॉफ्टवेर बना के देना, जिसका इस्तेमाल आगे कोई भी क्लाइंट जैसे बैंक, शराब कंपनियां कर सकती हैं तो फिर बात अलग हो जाती है। ज़ाहिर है वो बैंक है तो उसके सॉफ्टवेयर में सूद के ऑप्शन्स, फीचर्स भी बनाए जाएंगे। सॉफ्टवेयर फ़ॉर बैंक और सॉफ्टवेयर फ़ॉर हराम काम, में फर्क है। बैंक का काम बड़े स्तर पर सूद से उड़ा है मगर पूरी तरह नहीं। बैंक के और भी काम होते हैं. सॉफ्टवेयर बनाने में आप खुद सूद नहीं खा रहे हैं बल्कि जो खा रहा है, आप उसे फसीलिटेट कर रहे हैं. ऐसा बहुत से लोग करते हैं जो बैंकों को अपनी सर्विस दे रहे हैं जैसे सिक्योरिटी एजेंसी, ऑनलाइन टेनिकल सपोर्ट, ATM बनाने या चलाने वाले वगैरह वगैरह। क्या इन सभी का काम हराम हो गया? नहीं। ये काम ना पसंदीदा हो सकता है, मगर हराम नहीं। क्योंकि ये लोग और आप सिर्फ सर्विस प्रोवाइडर हैं। नबी ने जिस काम को ममनू किया है वो सूद के काम को बढ़ाना या चलाना है जैसे सूद कारोबारी के गल्ले पर बैठा आदमी या मुंशी करता है। यानी अगर किसी का काम अलग नेचर का मगर वो एक सूद कारोबारी क्लाइंट के लिए भी काम कर रहा है तो ये जायज़ काम होगा।
जैसे एक प्रिंटर या प्रिंटिंग प्रेस का कारीगर, कभी किसी क्लाइंट के सूदी बहीखाते भी छाप दे तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। जैसे पब में काम करना और एक ऐसे होटल में काम करना जंहा खाने - रहने के साथ शराब भी सर्व होती है, इन दोनों जगह काम करने में फ़र्क़ है। पहले वाला नाजायज़ है जबकि दूसरे वाले में एक्ससेप्शन बन जाती है।
अगर किसी का सॉफ्टवेयर डेवेलप करने का काम है उसका तो वो जंहा भी जॉब करेगा, वंहा उसे ऐसे प्रोएजेक्ट मिल सकते हैं जिनसे बचना मुश्किल है इसलिए वो वंही जॉब करता रहे। उसका काम बैंक या रिबा को बढ़ाना नहीं, बल्कि बेसिकली सॉफ्टवेर तैयार करना है। क्योंकि उसको मिलने वाले मिलने वाले प्रोएजेक्ट में से एक ये प्रोजेक्ट भी है। अगर आप जॉब छोड़ते हैं तो दूसरी जगह भी यही काम मिल सकता है. इसलिए कंहा कंहा से जॉब छोड़ेंगे। इसलिए हो सके तो सॉफ्टवेर बनाइये और दिल नहीं माने तो जॉब न छोड़े, अपना प्रोजेक्ट बदलवा लें। इसी तरह अगर कोई व्यक्ति किसी सिक्योरिटी कंपनी (जिसका काम दूसरी कंपनियों को सुरक्षा देना है) में गार्ड के तौर पर लगा हुआ है और उसे किसी बैंक की निगरानी पर लगा दिया जाता है तो उसके लिए भी ये यही हल है।
मन में गिल्ट भावना लिए फिर भी जिन लोगों को ऐसे काम या नौकरी मुश्किल हालातों की वजह से करनी पड़ रही हैं, उन्हें चाहिए कि ज़्यादा से ज़्यादा सदका - खैरात करते रहें ताकि उनका मन साफ होता रहे.
उधार लेकर अपनी ख़ुशी से बढ़ी हुई रकम वापिस करी जाए तो सूद होगा?
नहीं होगा अगर वाकई दिल से दिया जा रहा है. बाकी लेने वाले की सहमति भी होनी चाहिए. वैसे खालिस रकम की बजाय गिफ्ट दे कर भी शुक्रिया अदा करा जा सकता है.
रसूलुल्लाह ने एक आदमी से क़र्ज़ लिया था (एक ऊँट), और जब चुकाने का वक़्त आया तो उसी उम्र का ऊँट मौजूद न था — बल्की उस से बेहतर ऊँट था। आप ने उस बेहतर ऊँट से क़र्ज़ चुकाया और फ़रमाया: अफ़दल तुम में वो है जो अपना क़र्ज़ खूब अदा करे (बुखारी 2393).
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यंहा काफी पहलुओं के मद्दनज़र राय रख दी गई है। बाकी वल्लाहु आलम। अगर इसमे कुछ ग़लत है तो अल्लाह उसे आपसे दूर कर दे।



