Thursday, 5 January 2023

हिन्दू धर्म के विभिन्न प्रचलित पंथ, संप्रदाय।

 

भारत में हिन्दू धर्म के विभिन्न प्रचलित पंथ, संप्रदाय और विचारधाराएं हैं, जिनके अनुयायी हमें समाज में अक्सर देखने को मिल जाते हैं। आइये इनके बारे में थोड़ी जानकारी प्राप्त कर लें।


संतमत

यह एक बहुत बड़ी और पुरानी विचारधारा है। ये अक्सर कोई शुध्द रूप से समाज में पाया जाने वाला सम्प्रदाय नहीं हैं। मगर इसके बारे में ज्ञान होने से अन्य बहुत से पंथों को समझना आसान हो जायेगा क्योंकि यह उनके लिए मूलस्रोत है। यह 13वीं सदी के बाद शुरू हुई भक्ति की विचारधारा और परम्परा है। इस भक्ति काल में बहुत से गुरुओं के द्वारा ऐसे धार्मिक और संत मत स्थापित हुए जो आगे चलकर बड़े समूह और पंथ बनते चले गए। कुछ ऐसे ज्ञानियों और गुरुओं के नाम हैं; रविदास, नामदेव, कबीर, नानक, सूरदास, मीरा बाई, तुलसीदास, तुकाराम आदि। इनके शिष्यों ने आगे चल कर कबीर पंथ, दादू पंथ, दरिया पंथ, अद्वैत मत, और राधास्वामी जैसे पंथ चलाए। आगे जाकर ऐसे ही एक सूफी संत साईबाबा पर मत बना जो अब शुद्ध हिन्दू मत बन चुका है।

इनका मूल स्रोत तसव्वुफ़, सुफिज़िम था. भारत में सूफी परम्परा में 4 सिलिसिले पाए जाते हैं: चिश्तिया, सुहार्वार्दिया, कादरिया, नस्क्शबंदी.

 



संत निरंकारी मिशन

स्थापना: 1929

स्थान: दिल्ली

गढ़: दिल्ली, पंजाब, विदेश

संस्थापक: बाबा बूटा सिंह

मुख्या: सद्गुरु - माता सुदीक्षा सविंदर हरदेव (दुसरे बाबा शहंशा अवतार सिंह की पड़पोती)

अनुयाई : 1 करोड़ का दावा

 

यह विदेशों में सक्रिय है.  बहुत बड़े स्तर पर इनका वार्षिक संत निरंकारी समागम होता है. ये कहते हैं ईश्वर निराकार है परन्तु सब रूपों में मौजूद है. सब ईश्वर का है, जात मज़हब का अभिमान नहीं करना.  खान पान पहनावे से नफरत नहीं करना. गृहस्त में रहना है, वेशधारी बनकर समाज पर बोझ नहीं बनना है। सद्गुरु द्वारा दिया ज्ञान, उनकी आज्ञा के बिना किसी को नहीं देना है.

Naare: Tu Hi Nirankar, Main Teri Sharan Haan, Mainu Baksh Lo.

Na Hindu, Na Sikh, Na Isai, Na Hum Musalman Hai,

Manavta Hai Dharam Humara, Hum Kevel Insan Hai, Hum Hai Sevaadar.

 



राधास्वामी (Radha Soami)

स्थापना: 1861

स्थान: Agra (स्वामीबाग, आगरा में मुख्य मंदिर)

संस्थापक: सेठ शिव दयाल सिंह जी महाराज (हुज़ूर स्वामी जी महाराज)


अनुयाई : लाखों में


यह एक संतमत है राधास्वामी  मतलब आत्मा का स्वामी। राधा का अर्थ सुरत और स्वामी का अर्थ आदि शब्द या मालिक है यानि सुरत का आदि शब्द या मालिक में मिल जाना. 

स्वामी जी को संस्कृत, उर्दू, फारसी, अरबी का ज्ञान था।  ये हुक्का पीते थे। इन्होने अपने दर्शन का नाम सतनाम अनामी रखा। इनकी सिखायी गई साधना या अभ्यास को सुरत शब्द योगया सिमरन कहते हैं।  सार वचन वार्तिक और सार वचन छंद बंद में इनके सत्संग हैं।

Shiv Dayal Singh referred to the Supreme Being with the names SatNam (True Name) and Anami (Nameless).  He used to consider SatNam, SarNam, SarShabad, SatPurush and SatLok the same thing, which he would call formless.  पहले सतपुरुष निराकार था, फिर आकार में आया तो ऊपर के तीन निर्मलमण्डल (सतलोक, अलखलोक, अगमलोक) बन गए। इन सब लोकों से ऊपर राधास्वामी लोक बताया जाता है। कबीरजी अकाल पुरुष हैं और वह सशरीर विराजमान है, निराकार रूप में नहीं।

 

The followers of Shiv Dayal Singh used to consider him the Living  Master and incarnation of God (Lord Vishnu / Krishna ). ये लोग गुरुओं द्वारा जीवन मुक्ति में मानते हैं. They don’t install the GuruGranth or other scriptures in sanctum.  Instead, the guru sits in the sanctum. They do not believe in orthodox Sikh rituals such as covering head inside the temple or removing shoes, karah prasad (offering). They consider it all ritualistic. The Radha Soami are strict vegetarians. They abstain from meat, drugs, alcohol and sex outside marriage.  Some of these practices vary depending on the branches.

 

Principles: a living Guru, Bhajan (remembering SatNam), Satsang, Seva, Kendra, Bhandara. 

 

After him, it got separated into different branches as Radha Soami Satsang Soami Bagh, Agra/Dayalbagh, Agra/Beas or Byas/Dinod.  He was succeeded by Jaimal  Singh (Dera Baba Jaimal Singh Ji, Beas on his name) and Huzur Maharaj Rai Saligram and they were succeeded by Hazur Maharaj Charan Singh.

 

 



तुलसीदास बाबा जयगुरुदेव

जन्म: Approx. 1896 - 2012

स्थापना: 1953

स्थान व गढ़: मथुरा

संस्थापक: तुलसीदास बाबा जयगुरुदेव

अनुयाई : लाखों में


राधस्वामी का ही एक सेक्ट है। नाम योग साधना मंदिर मथुरा में बनाया। जय गुरुदेव धर्म प्रचारक संस्था, मथुरा, 1977 में बनाया। इनका बहुत बड़ा  जय गुरुदेव मेला मथुरा में लगता है।


बाबा जी ने सत्य की खोज में मंदिर- मस्जिद- चर्च का भ्रमण शुरू किया।  फिर संत घूरेलाल जी शर्मा (दादा गुरु) को गुरु बना लिया। अपने गुरु को जयगुरुदेव कहा करते थे। सो उनके अनुयायियों ने तुलसीदास को ही जयगुरुदेव कहना शुरू कर दिया।  ये कहते थे कि एक दिन ज़रूर धरती पर सतयुग आयेगा। इनका नारा था सतयुग आएगा, सतयुगा आएगा। सो इनके भक्तों ने इसे नारा बनाया: जयगुरुदेव, सतयुग आयेगा वो भारत को जल्द ही विश्व के शीर्ष पर स्थापित होने की भी भविष्यवाणी करते थे। शाकाहारी जीवन और वस्त्र त्याग के टाट में गुजारा करने का संदेश दिया। इन पर ज़मीन हड़पने के बहुत से आरोप रहे हैं। आपातकाल में जेल में भी रहे है। अपनी पार्टी बनाई थी और खुद चुनाव भी हारे थे। एक बार जय गुरुदेव ने दावा किया था कि उनकी अगली रैली में खुद नेताजी सुभाषचंद्र बोस आ रहे हैं.  फिर मंच पर आकार बाबा ने कहा कि वो ही सुभाष चंद्र बोस है, मंच पर चप्पल, पत्थर बरस पड़े, रोकने के लिए पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा।

He specifically said that Jai Guru Dev was neither his name nor that of anything. His followers believe Jai Guru Dev to be a representation of Anami Purush just as Kabir used the name Sahib, Goswami Tulsidas used Ram and Nanak used Wahe Guru and use it when greeting each other. They maintain that a soul sent from Satya Lok can designate the name for Anami Purush. Devotees proclaim that Jai Guru Dev name can liberate the soul.

इनके वारिस होने के लिए कई लोग लड़ते रहे हैं  जैसे रामवृक्ष यादव (ज़मीन खाली कराने के लिए संघर्ष), पंकज कुमार यादव, फूल सिंह, उमाकांत (उमेश) तिवारी।

 



जगतगुरु संत रामपाल दास

स्थापना: 1994 में वारिस

स्थान व गढ़: सतलोक आश्रम, हरियाणा (1999)

अनुयाई: लाखों

यह कबीरपंथी गुरु हैं।  इन्हें सतसाहेब भी बोलते हैं। ये ज्ञान के लिए भटक रहे थे फिर कबीरपंथी गुरू स्वामी रामदेवानंद से मिले। आश्रम बनने से पहले रामपाल भक्तों के घर जाकर सत्संग किया करते थे। ये जाप भी किया करते थे। रामपाल ने ज्ञान गंगा, जीने की राह, गीता तेरा ज्ञान अमृत, गरीमा गीता की, गहरी नज़र गीता में आदि पुस्तकें लिखी है। रामपाल ने सत्यार्थ प्रकाश पर आपत्ति जताई थी। आर्य समाजीयों ने सतलोक आश्रम पर हमला किया और लड़ाई हुई। हत्याओं और हिंसा के दोष में रामपाल जीवन भर की जेल में है। कबीर साहेब जी को भगवान- परमात्मा बताते हैं। इनके लिए परमात्मा साकार है जो पाप नष्ट कर सकता है। पूर्ण परमात्मा का वास्तविक नाम कविर्देव है तथा उपमात्मक नाम सतपुरुष, परम अक्षर ब्रह्म, पूर्ण ब्रह्म आदि हैं। यही कविर्देव नामान्तरण करके चारों युगों में आए है। परमात्मा सतलोक में रहते हैं और सिंहासन पर विराजमन है।  कुरान में आए लफ्ज कबीर (सबसे महान) और वेदों में आए शब्द कविर (कविरत्यो/कवि) को संत कबीर (जो इनके लिए परमात्मा सशरीर है) बताते हैं। 

Rampal was a devotee of Hanuman, Krishna and Khatushyam.  Ramdevanand told that he could not attain salvation through the prevalent religious practices, it’s a false web spread by the trinity of Brahma, Vishnu and Mahesh with their parents Brahm (Kaal Niranjan) and Durga (Ashtangi Aadi Maya).  Rampal studied  Bhagavad Gita, Kabir Sagar, Sad Granth Saheb by Garib Das, and  Puranas.  Sant Garibdas Ji Maharaj (born 1717) was the founder of the Garibdasi Panth.  Garib Das met with Kabir Sahib.  God Kabir took Garibdas' soul to Satlok wherein he saw God Kabir sitting on the throne. He also showed him Brahma, Vishnu, Shiva, Indralok. God Kabir entered the soul of  Garibdas' body. Thereafter, he created Satgranth and other books. Kabir (Jinda Mahatama, a type of Sant) was the Guru of  Garibdas.  Kabir also met Prophet Muhammad in a different form. Sant Garibdas wrote about  Prophet Mohammad and Rabia Basri.

रामपाल के गुरु ने रामपाल को बताया था कि भक्ति की विधि धर्मग्रंथों से मेल नहीं खाती। इसलिए ये कहते हैं कि गीता (16:23) अनुसार जो शास्त्र विधि को छोड़ मनमाना आचरण करता है, उसे कुछ भी प्राप्त नहीं होता। गीता (4:34) में सन्त की शरण मे जाने के लिए कहा गया है। ये कहते हैं कि ज्ञान को सद्ग्रंथों में मिलाया, तब धार्मिक ग्रंथों में पाया। इनके अनुयाई सर्वधर्मो के ग्रंथों के अनुकूल होने का दावा करते हैं।

कई भविष्यवकताओं की भविष्यवाणियाँ रामपाल पर बैठाते हैं जैसे जयगुरुदेव पंथ के तुलसी साहेब, नासत्रेदमस (२००६ में एक संत अचानक प्रकाश में आएगा जो पहले उपेक्षा का पात्र बनेगा लेकिन बाद में दुनिया सर आंखों पर बिठाएगी) और कुछ अन्य विदेशी भविष्यवक्ता।

नशीली वस्तु जैसे बीड़ी, तम्बाकू, गांजा, शराब, मांस का सेवन तो दूर किसी को लाकर भी नहीं देना।  बुरे कर्म जैसे जुआ, ताश, चोरी, ठगी नहीं करना। व्यभिचार, अश्लील गाने, नाचना, वर्जित हैं। पांखड जैसे मंदिर जाना, मृत्युभोज, दहेज, मुंडन, समाधि पूजन, पित्रपूजा, मूर्तिपूजा नहीं करना। एक कबीर परमात्मा के अलावा किसी देवी-देवताओं की पूजा नहीं करना मगर सम्मान सबका करना। 

ये अपने मत, धर्म के प्रचार प्रसार में लगे रहेते हैं जिसे हम आसान भाषा मिशनरी कहते हैं। मुख्यता 3 ही ऐसे हिन्दू मत हैं जो प्राकृतिक तौर खुलेआम, जमीनी स्तर पर मिशनरी हैं, संत रामपाल वाले, इस्कॉन वाले और आर्य समाजी।



गायत्री परिवार

स्थान: शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार

संस्थापक: पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य (1911-90)

मुख्या:  डॉ॰ प्रणव पंड्या (शिष्य एवं दामाद)

अनुयाई : करोड़ों का दावा

पंडित जी ने चारों वेद, 108 उपनिषद, षडदर्शन, स्मृति, पुराण के हिंदी अनुवाद किए हैं। हजारों पुस्तकें लिखी हैं

इनका उद्देश्य  है - युग परिवर्तन। युग निर्माण के लिएइनके 18  सत्संकल्प हैं। नारा है - हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा, हम बदलेंगे, युग बदलेगा। इनकी अखंड ज्योति नामक पत्रिका है।

इस संगठन का कार्य गायत्री मंत्र की मूल भावना के अनुसार है गायत्री देवी एक देवी है। इसका संशोधन महर्षि विश्वामित्र द्वारा किया गया है। अपितु यह ब्रह्म देव की निर्मिती और पत्नी है। इसका मूल रूप सावित्री देवी है। गायत्री महामंत्र वेदों का एक महत्त्वपूर्ण मंत्र है जिसकी महत्ता ॐ के लगभग बराबर मानी जाती है। यह यजुर्वेद के मंत्र  'ॐ भूर्भुवः स्वः' और ऋग्वेद  के छन्द 3.62.10 के मेल से बना है। इस मंत्र में सवितृदेव की उपासना है इसलिए इसे सावित्री भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस मंत्र के उच्चारण और इसे समझने से ईश्वर की प्राप्ति होती है। इसे श्री गायत्री देवी के स्त्री रूप में भी पूजा जाता है। पंडित जी ने लिखा है कि सृष्टि के आरंभ में परमात्मा कि पराशक्ति ही देवी शक्ति थी जिसे ब्रहमा, विष्णु, रुद्र उपजे।

भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। अर्थात उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पाप नाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तः करण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।




ब्रह्माकुमारी समाज

स्थापना: 1930

स्थान: सिंध

मुख्यालय: माउंट आबू, राजस्थान

संस्थापक: बाबा लेखराज कृपलानी (प्रजापति ब्रह्मा/ब्रह्मा बाबा/ओम बाबा),1880 -1969  

मुख्या: Dadi Ratan Mohini, Brahma Kumari Mohini Panjabi, Jayanti Kirpalani

अनुयाई : 8 Lacs

1936 में इन्हें शिव या शिव बाबा या ईश्वर के साक्षात दर्शन होने शुरू हुए। ये ईश्वर को शिव बाबा कहते है। जो इनके सिद्धान्तों पर चलता है ब्रह्माकुमार व ब्रह्माकुमारी कहलाता है। इनके यंहा स्त्रियां बहुत आगे रहती है। ये पूजा को मुरली कहते है। इनकी संस्था है प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय.

They have distinguished itself from Hindu roots and sees itself as spiritual teaching rather than religion. The original discourses were connected to the Gita, however, they do not believe in current Gita. It teaches a form of meditation. They believe every action performed by a soul will create a return accordingly.  They believe in Ages as Golden Age (Satya Yuga), the Silver Age (Treta Yuga), the Copper Age (Dwapar Yuga), the Iron Age (Kali Yuga).  They believe that modern civilization will be destroyed by global nuclear conflict, coupled with natural calamities. 

The Brahma Kumaris use the term "Supreme Soul" to refer to God. Prajapita Brahma became Avyakt (left the body) and hence Shiv baba (God) along with Brahma's soul will now enter in one corporeal medium to speak Murli or knowledge. Murli is the recorded teachings spoken by the incorporeal supreme soul through his corporeal medium. Sakar Murlis are original versions of Shiv Baba  our Supreme Teacher, as initially and actually spoken by Him through his corporeal medium Prajapita Brahma.  Avyakt Murlis are divine versions spoken by Bap Dada i.e. both Shiv Baba and Brahma Baba through their medium Dadi Gulzaar.

Raj Yoga means- to recognize and experience your-self as a Soul (a tiny point of divine light), and in this soul-conscious stage, remember the supreme soul (our spiritual father).  Trimurti Shiv Jayanti signifies that Shiva, the incorporeal Supreme Father, is the Creator of three deities - Brahma, Vishnu, and Shankar - through whom he carries out his three supreme acts.  These are Shiva's three divine children. These deities are in fact a subtle formation of light (Devta) and not a physical form (they are not human beings). Shivling symbolizes the light form of God Shiva. God Shiva is Trimurti.

 


स्वाध्याय परिवार (Movement)

स्थापना: 1954

गढ़: मुख्यत महाराष्ट्र और गुजरात, कुछ हरयाणा में भी।

संस्थापक: दादा जी पांडुरंग शास्त्री आठवले

मुख्या: दीदी जयश्री तलवलकर (बेटी)

अनुयाई : 3.5 लाख Active

Svadhyayah means study by oneself.  It treats all men and women in the organization as a Parivaar.  They mainly focus on Geeta. It believe in Lord Krishna very much.  They believe that God dwells within, God exists within me and within everyone else, all are children of the Divine. Prayers are performed in the Smarta tradition's Panchayatana PujaIt has a large number of followers abroad.

स्वाध्याय मण्डल, गुजरात (श्रीपद सातवलेकर, वेद भाष्यकार की स्मृति मे बना) इस स्वाध्याय परिवार से अलग है।

 

 



ISKCON(इस्कॉन)

स्थापना: 1966

स्थान: New York City

मुख्यालय: मायापूर, नदिया, वेस्ट बंगाल (ISKCON Temple, Delhi)

संस्थापक: Bhaktivedanta Swami Prabhupada

अनुयाई : 10 Lacs

The full name is International Society for Krishna Consciousness (ISKCON) or Hare Krishna movement.  They preach a lot (Geeta etc) and have base in many countries. Prabhupada established it in America while living with Hippies.

It’s a Gaudiya (a region in Bengal) Vaishnava (worship of Vishnu) or Chaitanya Vaishnavism sect which was inspired & founded by Chaitanya Mahaprabhu (1486–1534, a Bengali spiritual teacher, believed by his devotees to be Krishan himself who appeared in the form of His own devotee). Its theological basis is primarily Bhagavat Gita and Bhagavata Purana They worship Radha and Krishna and sing hare Krishna Matra (a Kirtan/Bhajan) and dance. Krishna as Supreme Lord is worshiped specifically as the source of all Avataric  incarnations of God. It’s called Bhakti Yoga means devotion towards a deity as Gyan and Karma Yoga. They follow vegetarian diet.

इस्कॉन अनुसार धर्म के चार स्तम्भ है -  तप : नशा, चाय, कॉफ़ी नहीं। शौच : अवैध स्त्री/पुरुष गमन नहीं। दया : माँसाहार, लहसुन, प्याज़ भी नहीं. सत्य : जुआ, शेयर बाज़ारी नहीं.   तामसिक भोजन के तहत उन्हें प्याज़, लहूसन, मानस, मदिरा आदि से दूर रहना होगा. जुआ, पब, वेश्यालय जैसे स्थानों पर जाना वर्जित है. एक घंटा शास्त्राध्ययन करना है. हरे कृष्णा-हरे कृष्णा नाम की माला करना होती है।  स्वामी प्रभूपाद ने बहुत से पुस्तकें लिखी है और बहुतो का अनुवाद किया जैसे Geeta as it is (गीत यथास्वरूप).





Rama Krishan Math or Mission

स्थापना: 1897

स्थान: Calcutta

मुख्यालय: Belur Math, West Bengal.  

संस्थापक: Swami Vivekanand

अनुयाई : 10 Lacs

इसकी स्थापना स्वामी विवेकानंद अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के नाम पर की। परमहंस ने पहले राम भक्ति की, कृष्ण भक्ति, शाक्त भक्ति की और तंत्र की भी शिक्षा ली मगर संतुष्टि नहीं मिली और फिर ईस्लाम और ईसाइयत की भी साधना की। रामकृष्ण मिशन दूसरों की सेवा और परोपकार को कर्म योग मानता है.  वेदान्त दर्शन (उपनिषदों का अंत) के अद्वैत वेदान्त का प्रचार करता है.

The organisation also propagates four yogic ideals – Jnana, Bhakti, Karma and Raja Yoga.  The Motto is आत्मनॊ मोक्षार्थम् जगद्धिताय च:  it means For one's own salvation, and for the good of the world. Ramakrishna Mission teaches that God-Realization is the ultimate goal. Brahman is immanent in all beings as the Atman which is man's true self and source of all happiness. They say personification of Brahman, we get Ishvara or God of Religion (Like Vishnu, Shiva, Shakti, Allah, Jesus/Yahweh/Jehovah, Waheguru etc).  They do satsang, arati and meditation. Arati involves the ceremonial waving of lights before the images of a deity of holy person. They observe major Hindu festivals including Maha Shivarathri, Rama Navami, Krishan Asthami and Durga Puja. First January is celebrated as Kalpataru Day (as Ramakrishna revealed himself to be an Avatar, or God incarnate on earth).



           

आर्य समाज

स्थापना: 1875

संस्थापक: महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती

मुख्यालय: दिल्ली

अनुयाई: लाखों

There are three eternal entities: The God, the individual souls or Jivatmas (vast in number but not infinite) and the Nature. They believe in Monotheism and OM to be the personal name of God. They think that Agni, Shiva, Vishnu, Brahma, Prajapati, Vishva, Vayu, etc names in Vedas are the different characteristics of the God.  They accept only Vedas, Upanishads, Brahaman, Aranyaka, Nirkuta, Mahabhasya, Ashtadhyayi, Darshanas etc. and not Puranas.  They believe Rama and Krishna to be humans. They believe in Rebirth, Paralok in this world itself and that God doesn’t forgive. They are vegetarians, knowledgeable and arguing and oppos Casteism, Sati, Idol Worships, Child Marriage, Superstitions, Animal Killings etc. They carry Yagopavit/ Jeneu/ Upnayan. They don’t believe in Adam or Eve to be the first humans and Heaven, Hell. They add name Arya instead of surname to their names.

आर्य समाज दो धडों में बंट गया है, पुराने और नए हिन्दुत्वादी कब्जाखोर लोगों में. इन्होने ZN को देख कर आयातों अरबी रटटे लगाना शुरू किया और इन्हें देखके गैर आर्य समाजियों ने भी शूरू कर दिया। अब ये के पुराने Scholarly सवालों के अलावा अब राजनैतिक प्रोपगंडा और इस्लामोफोबिया से लिए गए सवाल भी उठाते हैं. सनातनी विद्वानों के अलावा पिछली सदी में लिखी गयी किताबों के अलावा, इनकी रद्द में, हकप्रकाश, मुक़द्दस रसूल, दयानन्द ने क्या खोया क्या पाया, सत्यार्थ प्रकाश की समीक्षा की समीक्षा, चु. प्रकाश जैसे कई किताबें लिखी जा चूकी हैं. कहते हैं स्वामी दयानंद ने आर्य समाज (हिन्दुधर्म में एकेश्वरवाद) की स्थापना ईसाइयत और इस्लाम के प्रभाव से हिन्दुओं को बचाने के लिए करी थी. 

इनके अनुसार अनादी और नित्य चीज़ें हैं, ईश्वर, जीवात्मा (जीवों की आत्मा) और प्रक्रति. 
इनके अनुसार ईश्वर का मुख्य नाम ओम है और राम कृष्ण कोई अवतार नहीं बल्कि महापुरुष हैं.  ये पुनर्जन्म और परलोक (इसी पृथ्वी जीवन को) को मानते हैं मगर अवतार को नहीं.  इनके अनुसार ब्रहमा, विष्णु, महेश, शिव, गणपति, महादेव, सरसवती, अग्नि, प्रजापति, वायु, नाम ईश्वर के हैं. . ये वेद/ ब्राहमण, अरण्यक, 
मुख्य 11 उपनिषद (अर्थ भिन्न)/मनुस्मृति, रामायण, महाभारत (मिलवाट भरी) को मानते हैं और उपवेद, वेदांग, उपांग/महाभाष्य, अष्टअध्यायी को भी मगर पुराणों को बिलकुल नहीं. इनके अनुसार ईश्वर क्षमाशील नहीं है और उसका कोई तीर्थ भी नहीं है. 



इनके Slogans: वेदों की ओर लौटो, विश्व को आर्य (श्रेष्ठ, गुणी) बनाते चलो।

Their different organisations are Sarvadeshik Arya Pratinidhi Sabha and Paropkarini Sabha.

Mahrishi Dayand translated Vedas (partially) and wrote two famous books: Satyarth Prakash and Rigvedadi Bhashya Bhoomika.

 

        

ब्रह्म/ब्रहमो समाज    

स्थापना:1828

गढ़: बंगाल

संस्थापक: मुख्यत राजा राममोहन राय, आदि

अनुयाई : नगण्य 


ब्राह्मो समाजी एक खास तरह के एकेश्वरवादी हैं जो पर्सनल गॉड (मानवीय खूबियाँ जैसे इच्छा, भावना सहित, ध्यान जोड़ने योग्यसृष्टि चलन में हस्तक्षेप करने वाला ), ईश्वरीय धर्म, इल्हामी किताब, पैगम्बर, अवतारवाद, बहुदेववाद में विश्वास नहीं रखते मगर कर्म, पुनर्जन्म पर खुले विचार रखते है जैसे राजा राममोहन, ईश्वरचंद विद्यासागर, केशवचन्द्र सेन, देवेन्द्रनाथ ठाकुर-रबिन्द्रनाथ टैगोर, सत्यजीत रे आदि. यह अब यह प्रभावशाली या व्यापक नहीं रहा मगर ऐतिहसिक रूप से इसका बेहद महत्व है विशेषकर एकेश्वरवाद के संदर्भ में.
 
 


Neo-Vedanta 

स्थापना:19वी सदी का अंत

गढ़: मुख्यत बंगाल

संस्थापक: कोई नहीं (विवेकानंद को अक्सर श्रेय)

अनुयाई : विद्वान वर्ग

वैसे ये कोई विशेष वर्ग नहीं है. मगर ज्ञान के लिए इसे एक वर्ग की तरह समझना आवश्यक है. ईसाइयत और इस्लाम के प्रभाव के विरुद्ध Neo-Vedanta खड़ा हुआ. ये एक तरह से भारतीय पुनर्जागरण भी था. ये वेदांत की एक नयी आधुनिक व्याख्या थी जिसमें वेदांत के मूल तत्त्वों को विज्ञान, बौद्धिकता, मानवतावाद, सार्वधर्मिक समन्वय के साथ प्रस्तुत करना शुरू किया गया। इसमें भारतीय स्वतंत्रता, उपनिवेशवाद, पश्चिमी दर्शन, ईसाईत, इस्लाम के रंग भी दिखाई देते हैं. इसमें सबसे पहले ब्राह्मो समाज हुआ जो ईसाइयत-हिन्दुइज्म का एक छोटा सा मिक्सचर था। इसमें रामकृष्ण परमहंस हुए और फिर उनके शिष्य विवेकानंद। अरबिंदो घोष, सर्वपल्ली राधाकृष्ण भी इसी का अंग थे. ऐसे ही युक्तेश्वर गिरी और उनके शिष्य परमहंस योगानंद को भी इसमें माना जा सकता है. आचार्य विनोबा भावे और रमण महर्षि को भी. इन्हीं कारणों से एक हद तक दयानंद सरस्वती भी हुए। 

 

 

लिंगायत मत

स्थापना: 12वीं शती

गढ़: कर्नाटक

संस्थापक: महात्मा बसवेश्वर

अनुयाई : 2 करोड़ का दावा

हिन्दू धर्म का एक हिस्सा है मगर लिंगायत खुद को हिन्दी धर्म से अलग मानते हैं। दक्षिण भारत में हैं यह मत भगवान शिव की स्तुति आराधना पर आधारित है। शैव लोग अपना उद्गम वेदों तथा शैवागमों  (तंत्रशास्त्र ग्रन्थ हैं। इनके वक्ता प्रायः शिवजी होते हैं।) इनके सबसे प्रसिद्ध महात्मा बसवेश्वर हैं जो कल्याण (कर्नाटक) के जैन राजा विज्जल (12वीं शती) के प्रधान मंत्री थे। इन्होने हिन्दू धर्म में जाती व्यवस्था और अनुष्ठान के विरुद्ध संघर्ष किया। लिंगायत अपने मृतकों को जलाने की बजाए दफनाते और पुनर्जन्म में विश्वास नहीं रखते हैं क्योंकि इनका मत है कि मरने के बाद शिव में लीन हो जाते हैं।

Lingayat worship is centered on the Hindu god Shiva as the universal Supreme Being in the iconographic form of Ishtalinga (symbolism for Shiva).



आध्यात्मिक या दर्शन आधारित गुरु

इनका मुख्य आधार वेदांत दर्शन होता है. इनमें बहुत से गुरु अच्छे ज्ञानी और बुद्धिजीवी होते हैं। इनके अनुयायियों का स्तर भी ऐसा ही होता है। विदेशों में लोकप्रिय होते हैं। कुछ नाम है: ओशो (रजनीश), जिड्डु कृष्णमूर्ति, जग्गी वासुदेव, आचार्य प्रशांत व अन्य।

जड्डू कृष्णमूर्ति सर्वप्रथम ऐसे लोकप्रिय व्यक्ति थे। यह इंग्लैड की विचारधारा थियोसोफिकल सोसाइटी की भारतीय चालक ऐनी बसेन्ट के गोद लिए पुत्र थे।

सूफीइज़्म में पीरी मुरदी इसलिये लोग यूँही मान लेते हैं क्योंकि इंसान में खुदा के आगोश में जाने की मांग है. इसे वो रसूल में भी पाते हैं। और फिर गुरुओं, पीरों, नेताओं, वगैरह में भी ढूंढते हैं।

 

 


योग गुरु


पौराणिक

 

आदि शंकराचार्य (8वीं शताब्दी ईo - केरल) ने चारों दिशाओं में 4 मठों की स्थापना करी थी और साथ ही उनके मठाधीशों (अपने शिष्यों) की भी नियुक्ति कई थी, जो बाद में शंकराचार्य ही पुकारे गये. जो व्यक्ति किसी भी मठ के अंतर्गत संन्यास लेता हैं वह दसनामी संप्रदाय में से किसी एक सम्प्रदाय पद्धति की साधना करता है। ये चार मठ निम्न हैं:-

1. ज्योतिर्मठ उत्तरांचल के बद्रीनाथ में स्थित है। इनके नाम के बाद 'गिरि', 'पर्वत' एवं ‘सागर’ विशेषण लगाया जाता है। इस मठ का महावाक्य 'अयमात्मा ब्रह्म' है। इस मठ के अंतर्गत अथर्ववेद को रखा गया है। ज्योतिर्मठ के प्रथम मठाधीश त्रोटकाचार्य बनाए गए थे। वर्तमान में जगद्गुरु शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती '1008' इसके मठाधीश हैं (108 या 1008 ब्रह्म के लक्ष्ण-गुण की संख्या अनुसार सम्मानिय उपाधी, इसके अन्यअर्थ भी लिए जाते हैं).

2. शारदा (कालिका) मठ गुजरात में द्वारकाधाम में स्थित है। इनमें  'तीर्थ' और 'आश्रम' नाम विशेषण लगाया जाता है। इस मठ का महावाक्य है 'तत्त्वमसि' तथा इसके अंतर्गत 'सामवेद' को रखा गया है। शारदा मठ के प्रथम मठाधीश हस्तामलक (पृथ्वीधर) थे। वर्तमान में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानन्द सरस्वती जी इसके मठाधीश हैं।

3. गोवर्धन मठ ओडिशा के जगन्नाथ पुरी में स्थित है। इनमें 'वन' व 'आरण्य' विशेषण लगाया जाता है. इस मठ का महावाक्य है 'प्रज्ञानं ब्रह्म' तथा इस मठ के अंतर्गत 'ऋग्वेद' को रखा गया है। इस मठ के प्रथम मठाधीश पद्मपाद चार्य हुए। वर्तमान में निश्चलानन्द सरस्वती इस मठ के मठाधीश हैं।

4. शृंगेरी शारदा पीठमश्रृंगेरी मठ कर्नाटक के चिकमंगलुर में स्थित है। इनमें सरस्वती, भारती तथा पुरी विशेषण लगाया जाता है. इस मठ का महावाक्य 'अहं ब्रह्मास्मि' है तथा मठ के अन्तर्गत 'यजुर्वेद' को रखा गया है। इस मठ के प्रथम मठाधीश आचार्य सुरेश्वरजी (मण्डन मिश्र) था। वर्तमान में स्वामी भारती कृष्णतीर्थ इसके मठाधीश हैं। 

इन चारों सम्प्रदायों में सभी ग्रंथों-शास्त्रों को बेहद महत्व प्राप्त है. ये किसी भी ग्रन्थ में मिलावट नहीं मानते हैं (सिवाए भविष्यपुराण आदि जैसे). जो ग्रन्थ या श्लोक, सूत्र सामन्यता वेदों के विरोधभासी प्रतीत होते हैं, ये उनकी भी भिन्न व्याख्या करके उन्हें वेदादि के अनुरूप सिद्ध करते हैं. इनमें विशुद्ध परम्परावादी सम्प्रदाय है. 


कथावाचक

इनका विश्वास पुराणों, पौराणिक कथाओ में होता, ये कथा वाचन (भागवत से) करते हैं। इनमे गुरु शिष्य नाता बहुत गहरा होता है।  इनके बड़े साम्राज्य हैं। इनमें कुछ सर्वधर्म संभाव और इस्लाम के प्रति भी नर्म नज़रिया रखते हैं अन्यथा तो बहुत ही संकीर्ण मानसिकता रखते हैं। इस प्रकार के कुछ गुरु सूफी मत से प्रभावित होते हैं और अपने संदेशों में सूफीयत का भी भरपूर प्रयोग करते हैं, ऐसे सूफी गुरु अधिकतर पंजाब क्षेत्र से होते हैं।


अन्य गुरु 

 



सामान्य दलित, अमेडकरवादी, बोद्ध

यह कोई धार्मिक मत नहीं हैं मगर इस वर्ग के बारे में जानकारी होना आवश्यक है। सामान्य दलित लोग हिन्दू धर्म, देवी देवताओं, पाखंड के समर्थक होते हैं।  अंबेडकर के व्यक्तित्व और योगदान में विश्वास रखते हैं मगर धर्म की ओर अधिक रुझान होता है। इनके घरों में दोनों के चित्र मिल जाते हैं। दलितों में अनेकों जातियाँ हैं और प्रत्येक जाती का एक कुल देवता या देवी होता है जिन्हें वो गोद ले लेते हैं और उनके विशेष दिनों पर बड़े आयोजन करते हैं।  जैसे चमा_ जाति रविदास को पूजती है। धान_ जाति कबीर को पूजती है, भं_ जाति वाल्मीकि को पूजती हैं, नाय_ जाति रामदेव को पूजती है। अमेडकरवादी नास्तिक और अमेडकरवादी बोद्ध लोग ईश्वर, धर्म, हिन्दू, ब्राह्मण आदि के घोर विरोधी होते हैं।  इनका नाम सुन कर ही आग बबूला हो जाते हैं। काउंटर अटैक करने वाले होते है।  इनकी एक बड़ी संस्था का नाम है बामसेफ (Backward And Minority Communities Employee Federation) और एक युवाओ की संस्था है भीम आर्मी। जय भीम का मतलब है बाबा साहब भीमराओ अंबेडकर की जय हो।



संघ परिवार।  

यह भी कोई धार्मिक मत नहीं हैं मगर इस विचारधारा के बारे में भी जानकारी होना आवश्यक है।संघ परिवार से जुड़े हुए लोग हिन्दू धर्म और संस्कृति के भारी प्रशंसक होते हैं। RSS के अलावा इनसे जुड़ी हुई अन्य छोटी और स्थानीय संस्थाए हैं विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, हिन्दू महासभा, दुर्गा वाहिनी, श्रीराम सेना, हिन्दू राष्ट्र सेना। ये गैर भारतीय मज़हब से नफरत करते हैं। हालांकि भारतियों के डीएनए के एक होने के प्रचारक होते हैं। इनके सीनियर इतने नफरती नहीं होते जीतने नीचे वाले होते हैं। इनके लिए कुछ उपाय मौजूद है। RSS की अल्पसंखयक विंग का नाम मुस्लिम राष्ट्रीय मंच है। लोग अक्सर लिबरल मुस्लिम को गलतफहमी से MRM से समझ लेते हैं।



 
 
 
ग्रंथ आधारित परंपरावादी पंथ और संप्रदाय।



आरम्भ में 
वैदिक काल (1500–600 BC) में प्रकृति शक्तियों जैसे इंद्र, अग्नि, वरुण, रूद्र, विष्णु आदि देवता और उषा, अदिति जैसी देवियों की पूजा होती थी. उपनिषद् काल (800–600 BC) में ब्रह्म की सपष्ट अवधारणा को बल मिला. इस समय में ही वैदिक मुख्य देवता रुद्र, शिव के रूप में  और विष्णुनारायण के रूप में स्थापित हुए. इतिहास एंव पुराण काल (400 BC–400 AD) में त्रिदेव, देवी (त्रिदेव जननी), अवतारवाद का समय रहा और इसी समय में ये 3 सम्प्रदाय उभरना शुरू हुए. फिर (400–1000 AD) में शैव, वैष्णव, शाक्त सम्प्रदायों को पूर्णतय विकास हुआ और साथ ही दार्शनिक मत बने जैसे अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत आदि (800 AD पश्चात).  
 
शंकराचार्य ने सभी सम्प्रादायों को कहा कि अपने मुख्य देवता को बीच में रख कर, चारों और अन्य देवताओं को रख कर पूजा करो. इसके कारण सभी निकट आये और इसलिए उन्हें जगत गुरु कहा गया. हालांकि फिर भी वैष्णव और शैव संप्रदायों में इतिहास में बहुत कटुता और प्रतिस्पर्धा रही है (600-1400 AD, विशेषकर 800-1000 AD). 1690 में नासिक में हुए कुंभ के दौरान शैव और वैष्णव संप्रदाय के बीच खूनी संघर्ष हुआ और अनुमानित 60000 साधु-संत मारे गए। ऐसे ही 1760 में हरिद्वार में हुए हरिद्वार कुंभ मेले में भी लगभग 1800 लोग मारे गए थे। 

इस तरह उत्पन हुए 5 तरह के संप्रदायों माने जा सकते हैं:-

वैष्णव - जो विष्णु को ही परमेश्वर मानते हैं. इनके संप्रदाय हैं- जैसे बैरागी, दास, रामानंद, वल्लभ, निम्बार्क, माध्व, राधावल्लभ, सखी, गौड़ीय आदि। रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी इनके मुख्य त्यौहार हैं। बद्रीधाम, मथुरा, अयोध्या, तिरुपति बालाजी, श्रीनाथ, द्वारकाधीश इनके तीर्थ हैं। वैष्णव साधुओं को आचार्य, संत, स्वामी आदि कहा जाता है। इसके संन्यासी सिर मुंडाकर चोटी रखते हैं। यह चंदन का तिलक खड़ा लगाते हैं। 

शास्त्रों में विष्णु के 24 अवतार बताए हैं, लेकिन प्रमुख 10 अवतार माने जाते हैं. 10 अवतार इस प्रकार हैं: मत्स्य, कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बु‍द्ध और कल्कि। बाकी 14 अवतार इस प्रकार हैं: आदि परषु, चार सनतकुमार, नारद, नर-नारायण, कपिल, दत्तात्रेय, याज्ञ, ऋषभ, पृथु, धन्वंतरि, मोहिनी, हयग्रीव, व्यास, बलराम,

शैव - जो शिव को परमेश्वर ही मानते हैं। इसमें शाक्त, नाथ, दसनामी, नाग आदि उप संप्रदाय हैं। महाभारत में माहेश्वरों (शैव) के 4 संप्रदाय बतलाए गए हैं- शैव, पाशुपत, कालदमन और कापालिक। शैव मत का मूल रूप ॠग्वेद में रुद्र की आराधना में है। 12 रुद्रों में प्रमुख रुद्र ही आगे चलकर शिव, शंकर, भोलेनाथ और महादेव कहलाए। इनकी पत्नी का नाम है पार्वती जिन्हें दुर्गा भी कहा जाता है। शिव का निवास कैलाश पर्वत पर माना गया है। शिव के भी 10 से 11 बल्कि कंही कंही तो इससे भी ज़्यादा अवतार माने जाते हैं। शिवरा‍त्रि, भैरव जयंती इनके मुख्य पर्व हैं। इनके तीर्थ हैं, 12 ज्योतिर्लिंगों में खास काशी, बनारस, केदारनाथ, सोमनाथ, रामेश्वरम, चिदम्बरम, अमरनाथ और कैलाश मानसरोवर।

इनके जुड़ाव तंत्र विद्या से बेहद अधिक है।  शैव साधुओं को नाथ, अघोरी, अवधूत, बाबा, ओघड़,  सिद्ध आदि कहा जाता है। इसके संन्यासी जटा रखते हैं। इसमें सिर तो मुंडाते हैं, लेकिन चोटी नहीं रखते। इनके अनुष्ठान रात्रि में होते हैं। ये निर्वस्त्र भी रहते हैं, हाथ में कमंडल, चिमटा रखकर धूनी भी रमाते हैं। इनमें साधुओं को समाधि देने की परंपरा है। शैव मंदिर को शिवालय कहते हैं, जहां सिर्फ शिवलिंग होता है। ये भभूति तिलक आड़ा लगाते हैं। ये स्वयं को सिन्धु सभ्यता से भी जोड़ते हैं. 

शाक्त - जो देवी को ही परमशक्ति मानते हैं। पार्वती को शक्ति भी कहते हैं। शक्ति को प्रकृति यानी सृजन की शक्ति वाली कहा गया है। शाक्त संप्रदाय को शैव संप्रदाय के अंतर्गत माना जाता है। ये देवी दुर्गा को ही ईश्वर रूप में पूजते हैं। मां पार्वती का मूल नाम सती है। ये 'सती' शब्द बिगड़कर शक्ति हो गया। पुराणों के अनुसार सती के पिता का नाम दक्ष प्रजा‍पति और माता का नाम मेनका है। पति का नाम शिव और पुत्र कार्तिकेय तथा गणेश हैं। यज्ञ में स्वाहा होने के बाद सती ने ही पार्वती के रूप में हिमालय के यहां जन्म लिया था। दुर्गा ने महिषासुर, शुम्भ, निशुम्भ आदि का वध करके भक्तों को उनसे छुटकारा दिलवाया था। दुर्गापूजा, नवरात्र इनके उत्सव हैं। 
ये भी स्वयं को सिन्धु सभ्यता से भी जोड़ते हैं. 
 
स्मार्त - जो परमेश्वर के विभिन्न रूपों को एक ही समान मानते हैं। आमतौर पर इनका नाम शंकराचार्य से जोड़ते हैं। शंकराचार्य ने तो दसनामी संप्रदाय की स्थापना की थी, जो सभी शिव के उपासक शैव पंथ से हैं। ये वेदों से कई अधिक स्मृति ग्रंथों यानी मनु स्मृति सहित सभी स्मृतियां और पुराण आदि पर आधारित जीवन-यापन करते हैं। जैसे जो विष्णु को भी माने और शिव को भी, दुर्गा को भी, गणेश को भी और अन्य देवी-देवताओं का भी पूजन करें, वे सभी स्मार्त संप्रदाय के हैं। अधिकतर हिन्दू स्मार्त संप्रदाय या परंपरा के ही हैं।

वैदिक - जो ब्रह्म को निराकार रूप जानकर उसे ही सर्वोपरि मानते हैं। जैसे ब्राह्मो समाज, आर्य समाज आदि।
  

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