Thursday, 4 July 2024

रूह और नफ़्स में फ़र्क़?

 

 

कुरान में अल्लाह ने इंसान में अपनी रूह फूंकने की बात करी है। उसकी रूह क्या और कैसी है, किसी को यकीन से नहीं मालूम। मगर आम तौर पर यही माना जाता है कि यह रूह वो खूद नहीं है बल्कि उसकी क्रिएशन में से कोई शय है जिससे ये सारे कनेक्शन चल रहे हैं। हिन्दू दर्शन के सूत्र या महावाक्य जैसे अहं ब्रह्मास्मि (मैं ब्रह्म हूँ), तत्वमसि (तू वही है), ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या/जगतमिथ्या (ब्रह्म सत्य है, जगत भ्रम है), सर्वं खल्विदं ब्रह्म (यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म ही है), नेति नेति (न यह, न वह) आदि शायद ऐसे ही किसी आधार पर यह मत प्रतिपादित करते हैं (कि ब्रह्म सत्य है बाकी माया है, ब्रह्म से सब निकला है और सब वापिस उसी में लीन होने हैं)। कुरान में रूह और नफ़स दोनों लफ़्ज़ आए हैं। मगर इन दोनों के मायनों पर इख़्तेलाफे राय है। मुसलमानों में इस मुद्दे पर 3 मोकिफ़ पाए जाते हैं। 


पहला मोकिफ:

■  आम तौर पर नफ़स और रूह को एक ही मान लिया जाता है, जिसे आत्मा, प्राण या जान पुकार जाता है। 

[यह मत इल्म और अक्ल के मयार पर सही नहीं उतरता।]

 

दूसरा मोकिफ:

■  रूह लफ़्ज़ का प्लुरल अरवाह होता है। कुरान में 19 जगह रूह लफ़्ज़ यानी सिंगुलर के मायनों में आया है और कहीं भी रूह प्लुरल मायनों में नहीं आया है। यानी रूह लफ्ज़ की जमा क़ुरान में नहीं है। रूहें बहुत से नहीं होती हैं। पूरी कायनात में रूह एक है। रूह न अच्छी होती है और न बुरी बल्कि न्यूट्रल होती है। रूह बिजली के करंट की तरह होती है। जैसे करंट अलग अलग गेजेट्स को अलग अलग फंक्शन करवाता है। रूह एक पावरहाउस से या एक ही सोर्स से सबको मिलती है। रूह मोबाईल के नेटवर्क की तरह एक ऐक्टिवेशन है। यह ऐक्टिवेशन सब जगह जा रहा है। ऐक्टिवेशन के बिना मोबाईल किसी काम का नहीं होता।

[यंहा तक बात दुरुस्त है। क्योंकि लतीफ फूंक को रूह कहा जाता है। फूंक का प्लुरल शब्द इस्तेमाल हमारी किसी भी ज़ुबान जैसे अरबी, उर्दू , हिंदी वगैरह में नहीं होता है। क़ुरान के मुताबिक इंसान में यह रूह या फूंक अल्लाह ने डाली और यह एक रब्बे अमरी है। यह फूंक जब इंसान में जाती है तो वो इंसान सा, जिन्नों में जाती है तो वो जिन्नों सा, जब फरिश्तों में जाती है तो वो फरिश्तों सा बर्ताव करती है और जब मरियम के पेट में गई तो वो भ्रूण या ईसा हो जाती है। रूह असल में अल्लाह का अम्र है यानी उसका एक्ज़ीक्यूशन।

■  नफ़स का प्लुरल अनफुस कुरान में आया है। नफ़स अनेकों हैं। कुछ मशहूर जुमले हैं, हर नफ़स को मौत चखनी है, हर नफ़स को किये का बदला मिल जायगा, रूह नहीं बल्कि नफ़स अच्छा-बुरा (कर्म) करता है। यह समझ लीजिए कि मोबाईल का सिम नफ़स की तरह है, जो असलन सब काम करता है। इसी तरह मोबाईल, जिस्म की तरह होता है। 

इंसान नींद में जिंदा तो रहता है बस उसे शऊर, चेतना, कॉनशसनेस नहीं होता है। नींद में जिस्म जिंदा रहता है और हर अंग काम कर रहे होते हैं। कुरान के मुताबिक नींद में अल्लाह की तरफ से नफ़स वापिस ले ली जाती है यानि वफ़ात हो जाती है। जब नफ़स वंही रोक ली जाती है तो मौत हो जाती है। 

प्राण या नफ़स को सुख-दुख शरीर के माध्यम से होता है क्योंकि मौत के बाद जिस्म को सुख-दुख महसूस नहीं होता। जमीन के अनासिर (एलीमेंट्स) से इंसान को पैदा किया गया है। यंहा खेत की मिट्टी की बात नहीं हो रही। इंसान में रूह होती है। क्योंकि इंसान इस जमीन से बना है इसलिए मौत का ताल्लुक सिर्फ इसी जमीन और इस माददी जिस्म से है। हम जानते हैं कि पूरी ज़िंदगी में लगभग 4 बार इंसान के जिस्म के सारे cells recreate हो जाते हैं।

[यंहा तक भी सब बातें दुरुस्त हैं।]


★ फिर इस मत में आगे कहा गया है कि सनातन धर्म में इस बारे में थोड़ी अधिक स्पष्ट धारणा पाई जाती है क्योंकि वो एक तरह से नफ़स के लिए प्राण और रूह के लिए आत्मा प्रयोग करते हैं।

[मगर इस तरह नफ़्स का मतलब प्राण या जान नहीं हो सकता क्योंकि नींद के दौरान हर जीवित प्राणी यानि जानवर, पेड़ पौधों में नींद के दौरान जान, प्राण बाकी रहते हैं मगर शऊर, चेतना, कॉनशसनेस नहीं इसलिए नफ़्स का मतलब सेल्फ या होश या शऊर वगैरह ही हो सकता है।]

★ आगे यह मत कहता है कि नींद के दौरान जिस्म में रूह बाकी रहती है और जब नफ़स व रूह दोनों को वापिस ले लिया जाता है तो वो मौत हो जाती है। 

[जब नफ़्स वापिस चली जाती है और वंही रोक ली जाती है तो फिर रूह भी वापिस जायगी क्योंकि यंहा पड़ा जिस्म किसी काम के लायक ही नहीं बचता इसलिए उसमें रूह बाकी हो ही नहीं सकती। इसका मतलब रूह इंसान का कोई फंक्शन है जो मरने पर गायब या खत्म हो जाता है। अब सवाल यह उठता है कि क्या नफ़्स से पहले भी रूह वापिस जा सकती है? अगर नहीं, तो फिर ठीक है क्योंकी यही क़ुरान सम्मत है। पर अगर हां, तो फिर उसके बाद क्या नफ़स को भी जाना पड़ेगा और नफ़्स को कब जाना होगा? गर जाना होगा और ये फ़ौरन गयी तो यही मौत है और अगर फ़ौरन नहीं गई तो यह स्तिथि पागलपन जैसी बीमारी पैदा करेगा क्योंकि पागलों में जान तो रहती हैं मगर समझ नहीं रहती।]

★ यही मत कहता है कि सभी सजीव अलग-अलग नफ़स या सेल्फ हैं। पेड़-पौधे जानदार होते हैं। स्पर्म, एग्ग में भी जान होती है। भ्रूण भी शूरवात से जानदार है और उसमें नफ़्स और जिस्म दोनों होता है। मगर जब रूह आ जाती है तो फिर वो इंसान हो जाता है। इसके बाद उसे कतल नहीं कर सकते। ऐसे ही जानवरों को भी बिना अल्लाह की अनुमति से ज़िबह नहीं कर सकते।

[इसलिए यंहा सवाल यह उठता है कि क्या जानवरों में भी एक उम्र के बाद रूह डाली जाती है? नींद के दौरान उन्हें भी होश नहीं रहता मगर उनमें जान और रूह रहती है। ]


{मेंटली रीटार्डेड, मानसिक बीमार लोगों मां के पेट में जानदार होते हैं, एक नफ़्स होते हैं, उनके पास रूह भी होती है। पैदाइश के बाद उनके पास लिमिटेड शऊर, चेतना, कांशसनेस भी होती है। मगर जो नहीं होता, उसे हम आसान भाषा में शायद 'समझ' कहंगे। इसी तरह जब इंसान बेहोश होता है तो उसमें शऊर, चेतना, कांशसनेस नहीं रहता। बेहोशी, नींद से अधिक चेतना रहित होती है। क्योंकि नींद में जिस्म को हुए हल्के से एहसास जैसे चुभन, दर्द से भी नफ़स फोरन वापिस आ जाती है। इसी तरह अक्सर इंसान मौत के आखिरी पलों में सब देख, समझ रहा होता है बस उसके जिस्म में हरकत करने की ताकत नहीं बचती।}


● Quran (39:42): अल्लाह सब नफसों (anfusa) को वफ़ात देता (या तलब करता) है, उनकी मृत्यु के समय और नींद में भी। फिर उसे रोक लेता है जिस पर मृत्यु का फैसला हो चुका हो और अन्य को निश्चित समय तक के लिए वापिस कर देता है। ।

● Quran (4 :56): जब उनकी खालें पक (या जल) जाएंगी तो हम उन्हें नई खालें दे देंगे ताकि वो यातना चखते रहें (यानि परलोक में जिस्म के जरिए ही सुख-दुख महसूस होगा)।

● Quran (6 :60): वही है जो तुम्हें रात को वफ़ात (yattwaffakum) देता है और जो कुछ तुमने दिन में किया, वह जानता है। फिर वह इसमें तुम्हें उठाता है ताकि निश्चित अवधि पूरी हो जाए।... फिर उसी की ओर तुम्हें लौटना है।

● Quran (17:85): वो तुमसे रूह (ruhi) के बारे में पूछते हैं। कह दो कि रूह तो मेरे रब की ओर से एक योजना (amri, rabbi) है जिसका इल्म तुम्हें कम ही मिला है (या कम ही लोगों को दिया गया है)।

● बुखारी 444, मुस्लिम 2794):  रूह के बारे में नबी ने ईसाई डेलिगेशन को बताया कि यह तो एक अमले रब्बी है जिसका इल्म इंसान को कम दिया गया है 

 

तीसरा मोकिफ:

अरबी में शक्सियत को नफस कहा जाता है. इंसान का नफस ही असल शक्सियत है, उसी का इम्तिहान है, जिस्म तो जरिया है. नफ़स से ही इन्सान है खुद के मर्द या औरत होने का एहसास करता है. नफस जनाना है तो मर्दाना जिस्म उसे बदल नहीं सकता. सिर्फ जिस्म से एहसासात पैदा नहीं होते.  

नफसे अममारा, नफसे मुतमइनना, नफसे लववामा, ये सब अलग अलग नफ़स नहीं हैं बल्कि इंसान की शख्सियत के अलग अलग पहलुओं को टर्म्स में बयान किया गया है।

नफ़स के मायने ज़िंदगी या जान नहीं है क्योंकि ज़िंदगी तो जानवरों और पेड़-पौधों के पास भी है। 

कुरान हमारे अंदर की शख्सियत को नफ़स से ताबीर करता है क्योंकि कुरान (6:61) बताता है कि मौत के वक़्त नफ़स हवाले कर दी जाती है। नफ़स इंसान की शख्सियत है और यह शख्सियत रूहानी है। नफ़स या शख्सियत आसमान से आई है जो दिखती नहीं है और अबदी है। शख्सियत हमेशा रहेगी भले ही जिस्म जीतने मर्जी बदलते रहे। तीनों मखलूक़ यानि इंसान, फ़रिश्ते, जिन्न को ऐसे ही शख्सियत दी गयी हैं। 

कुरान ने कहा कि इंसान का जिंदा कालिब या जिस्म मिट्टी से तैयार हुआ और फिर अल्लाह ने उसमें अपनी रूह फूंकी जैसे कोई "फूँक" फूँक देते हैं।

(यंहा इसके मायने नफ़्स, रूह, फूंक या यूं कहें कि अल्लाह की एक मुतशाबिह चीज़ से हैं यानी जो अल्लाह चाहता है वो असल शक्ल में जाहीर हो जाता है। क़ुरान ने बताया भी है कि रूह तो अमले रब्बी है जिसका इल्म कम दिया गया है।)

क़ुरान में रूह लफ़्ज़ यूनानी मफहूम में इस्तेमाल नहीं हुआ है। रूह लफ़्ज़ का आम रायज मफ़हूम यूनानी तसव्वुर से आया है जो क़ुरान से पहले ही दुनिया में रायज था। यूनानी तसव्वुर में रूह को एक अलग ही अस्तित्व माना जाता है जो इसी माद्दी दुनिया में ही तैयार होता है। इसलिए मुसलमानों रूह लफ़्ज़ को सोल या आत्मा के मायने में इस्तेमाल करना शूरू कर दिया। जबकि रूह लफ़्ज़ कुरान में हर जगह सोल से भिन्न मायनो में आया है। 

असलन जब हम फूंकते हैं तो उसे अरबी में नफ्फ़/nafaka (32:9: wanafakha/ 66:12 - fanafakhna) कहते हैं और यही लफ्ज़ क़ुरान में रूह फूंकने के लिए 5 बार आया है। जब यह फूँक बेहद लतीफ़ (delicate, pure, , thin, lean, gentle, kind etc) हो जाए तो इसे रूह कहते हैं। 

क़ुरान में रूह (रूहे कुद्दुस) लफ्ज़ 4 बार जिबरील के लिए इस्तेमाल हुआ है, हालांकि कुछ आलिम इसे जिब्राईल का नाम नहीं मानते। फ़रिश्ते भी अलरूह है क्योंकि उनके लिए कोई माददी कालिब या जिस्म नहीं होता (जो दुनिया में ही बनता है) जैसा इंसानों या जिन्न के पास है (यानी आग या एनर्जी से तैयार कालिब)।

क़ुरान (4:171) में रूह लफ्ज़ ईसा के लिए भी इस्तेमाल हुआ है। ईसा को रूह इसलिए कहा है क्योंकि उनका एक हिस्सा तो माँ का था मगर दूसरा बाप का नहीं था। इसलिए दूसरा हिस्सा अल्लाह के इज़न या हुकम से तैयार हुआ जब अल्लाह ने मरयम के जिस्म में अपनी रुह फूंकी। 

 
एक मत यह कहता है कि क्योंकि जानवरों में शऊर, जज़्बात और समझ होती है, इसलिये उनमें उनके ही तरह की (इंसानों जैसी नहीं क्योंकि इंसान में इंसान जैसी होती है) रूह होनी चाहिए. कुरान में बताया गया कि ज़मीन और आसमान से कहा कि आओ  मेरे पास, मज़बूरन या ख़ुशी से जिस पर उन्होंने कहा कि हम ख़ुशी से आते हैं. मतलब इन शय के पास शख्सियत और शऊर है, मगर हमारे जैसे नहीं है. ये अल्ल्लाह से कम्यूनिकेट कर सकते हैं जैसे हम कंप्यूटर से कर सकते हैं. कंप्यूटर (जैसे उसे कमांड देते हैं), रोबोट या AI में भी शऊर है मगर वो भी उनकी अपनी ही तरह का है, इंसानो जैसा नहीं। इन सभी के शऊर वगैरह की एक हद होती है। अल्लाह और पूरी कायनात का राब्ता शूअरी है। कुरान (17:44) में कहा गया है कि उसकी तसबीह सातों आसमान, ज़मीन और जो कुछ इनमें है, सब करते हैं मगर तुम उनकी तसबीह को नहीं समझते।
इसी तरह कुरान (16:49) में कहा गया है आसमान से ज़मीन में जो भी प्राणी हैं, सब अल्लाह को सजदा (ताबेय आना) करते हैं.


● Quran (3:185): Every soul (Nafsin) is bound to taste death.

● Quran (91:6-9): The earth and the One Who spread it! And by the soul (wanafsin) and the One Who fashioned it, then with the knowledge of right and wrong inspired it! Successful indeed is the one who purifies it (soul).

● Quran (32:11): The angel of death, who is set over you, will take (yatawaffākum) you, then you shall be brought to your Lord.

कुरान 16:49: आकाशों में और धरती में जितने भी जीवित प्राणी हैं, अल्लाह ही के आगे झुकते हैं, फ़रिश्ते भी.

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रूह ए अव्वल क़ुरान में नहीं है, किसी हदीस में भी शायद नहीं है, सुफिज़िम की ताबीर लगती है। हालांकि रूह उल कुदुस या अमीन क़ुरान में ज़रूर आएं हैं। इन तीनो लक़ब में इस्तेमाल हुए इस लफ्ज़ से यही लगता है कि ये बहुवचन से ज़्यादा अल्लाह के अमर से रिलेटेड ज़्यादा है। जैसा अल्लाह ने रूह की हक़ीक़त को गहरा इल्म बताया है और क़ुरान में इसका जगह जगह इस्तेमाल भी यही इशारे देता है।

वेदों में परमात्मा शब्द नहीं है। यह भी बाद की उत्पत्ति है। वेदों में आत्मा शब्द आया है और वो भी एकवचन में। वंहा भी आत्मा को अक्सर ब्रह्म से संबंधित बताया गया है।

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कुरान में आई उन आयतों का जिक्र करते हैं जिनमें रूह लफ़्ज़ इस्तेमाल हुआ है:-

 

क़ुरान में रूह लफ्ज़ मरियम के पेट में रूह फूंकने लिए इस्तेमाल हुआ है।

कुरान 66:12: और इमरान की बेटी मरयम की मिसाल पेश की है जिसने अपने सतीत्व की रक्षा की थी, फिर हमने उस स्त्री के भीतर अपनी रूह फूँक दी।  (fanafakhna/ breathed, min/of, ruhina/our spirit, fihi/ into it)

कुरान 21:91: और वह नारी जिसने अपने सतीत्व की रक्षा की थी, हमने उसके भीतर अपनी रूह फूँकी और उसे और उसके बेटे को सारे संसार के लिए एक निशानी बना दिया। 

 

क़ुरान में रूह लफ्ज़ ईसा के लिए भी इस्तेमाल हुआ है।

कुरान 4:171: मरयम का बेटा मसीह-ईसा इसके अतिरिक्त कुछ नहीं कि अल्लाह का रसूल है और उसका एक कलिमा है, जिसे उसने मरयम की ओर भेजा था। और उसकी ओर से एक रूह (waruhun) है। 


■  क़ुरान में रूहल कुद्दुस (the holy spirit) लफ्ज़ जिबरील के लिए 4 बार इस्तेमाल हुआ है।

कुरान 2:87, 2:253, 5:110, 16:102: पहले तीन हवालों में इसके जरिए ईसा अलैह. को सशक्त करने की और आखीरी हवालें में मुहम्मद सल्ल. तक हक पहुंचाने की बात कही गई है।  

कुरान 19:17:  फिर उसने उनसे परदा कर लिया। तब हमने मरीयम के पास अपनी रूह (फरिशते) को भेजा और वह उसके सामने एक पूर्ण मनुष्य के रूप में प्रकट हुआ। [यंहा रुहल कुद्दूस या रुहल अमीन लफ़्ज़ नहीं आए हैं, बल्कि सिर्फ रूह लफ़्ज़ आया है जिससे बेशक मुराद जिबरील ही है।]

 

■  क़ुरान में रूहल अमीन (the trustworthy/faithful spirit) लफ्ज़ भी जिबरील के लिए इस्तेमाल हुआ है

कुरान 26:193: इसको स्पष्ट अरबी भाषा में लेकर तुम्हारे हृदय पर एक विश्वसनीय आत्मा (रुहल अमीन) उतरी है। 

 

बहुत से उलेमा कुरान में जगह जगह आए रूह लफ़्ज़ को सिर्फ जिब्राईल का नाम नहीं मानते हैं। कुरान में रूह लफ़्ज़ अन्य फरिश्तों के लिए भी आया है। साथी ही यह लफ़्ज़ कुरान के लिए भी आया है। इसके आलवा जगह जगह फरिश्तों और रूह का जिक्र एक साथ भी किया गया है।

क़ुरान 58:22: जिनके दिलों में अल्लाह ने ईमान को रख कर दिया है और अपनी ओर से एक रूह के द्वारा उन्हें ताकत दी है।

क़ुरान 97:2: (शबे कद्र में) फरिशतें और रूह अपने अपने रब के इज़न से हुक्म लेके उतरते हैं।

क़ुरान 70:4: उस दिन जिसकी अवधि पचास हज़ार वर्ष है, फ़रिश्ते और रूह उसकी ओर चढ़ते हैं।

कुरान 78:38: जिस दिन रूह और फ़रिश्ते पंक्तिबद्ध खड़े होंगे, वे बोलेंगे नहीं, सिवाय उस व्यक्ति के जिसे रहमान अनुमति दे और जो ठीक बात कहे। 

कुरान 40:15: वह ऊँचे दर्जोंवाला, सिंहासनवाला है, अपने बन्दों में से जिसपर चाहता है, अपने हुक्म से रूह उतारता है, ताकि वह मुलाक़ात के दिन से सावधान कर दे।  

कुरान 42:52: और इसी प्रकार हमने अपने आदेश से एक रूह (यानि क़ुरआन) की प्रकाशना तुम्हारी ओर की है। तुम नहीं जानते थे कि किताब क्या होती है और न ईमान को जानते थे, किन्तु हमने इस प्रकाशना को एक प्रकाश बनाया, जिसके द्वारा हम अपने बन्दों में से जिसे चाहते हैं मार्ग दिखाते हैं।

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God is believed to endow humans with Ruh and Nafs i.e. Ego or Psyche (totality of the human mind, conscious and unconscious).

In psychoanalytic theory, the id (which wants), ego (which thinks) and superego (which judges) are three distinct, interacting agents in the human psyche as described by Sigmund Freud.

The Id (Wants): the unconscious source of bodily needs, wants, desires
The Ego (Thinks): the thinking part of mind who balances wants with the reality and make rational decisions.
The Superego (Judges): the Judgement part of mind like parents who sets moral standards and make us feel guilty if we don't meet these standards.

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रूह कितनी बार फूंकी जाती है या गयी?

अब सवाल यह उठता है कि जब पहली बार आदम में रूह फूंकी गई थी क्या वह रूह सभी इंसानों के लिए पहली और आखिरी थी? यानि वो रूह नस्ल दर नस्ल उसी तरह आगे बढ़ती गई जिस तरह प्राण, जान या लिविंगनेस इंसान के स्पर्म और एग्ग से आगे बढ़ती है। या फिर माँ के पेट में हर इंसान में रूह फूंकी जाती है? अगर हाँ तो क्या इसकी वाज़हत कुरान में क्या कहीं पर है?

अगर सभी इंसानों से अहदे अलस्त के मौके पर यह सवाल करके (क्या मैं तुम्हारा रब नहीं?) अहद लिया गया था तो इसका मतलब उनमें उस वक़्त शऊर मौजूद था यानि उनमें उस वक़्त भी यह रूह, फूँक या नफ़स मौजूद थी। तो क्या इंसान में दो बार रूह आती है? यानि एक बार इंसानियत की शूरवात में आई थी और दूसरी बार माँ के पेट में आती है?

कुरान में हज़रत मरीयम के पेट में रूह फूंकने की बात आती है। तो क्या इसका मतलब हज़रत ईसा में यह फूँक 3 बार फूंकी गई थी? एक बार अहद के वक़्त, दूसरी बात माँ के पेट में भ्रूण बनने के समय और तीसरी बार जब वो भ्रूण 4 महीने का बच्चा बन गया था।

कुरान ने कंहीं नहीं बताया कि माँ के पेट में बच्चे को रूह कब मिलती है. मगर हदीसों में बताया गया है कि रूह फरिश्ते के ज़रिये 120 दिन बाद मिलती है (बुखारी 3208, 3332,6594, दावूद 4708). जबकि इसी हदीस के बाज़ तुर्कों में 120 दिन पर रूह मिलने का नहीं बल्कि 4 चीज़ें मिलने या उसके लिए लिखने का ज़िक्र है जो हैं, उसका रिज्क/रोज़ी, मौत/जिंदगी का अरसा, आमाल, अच्छी बुरी तकदीर/उस पर तबाही होगी या रहमत (मुस्लिम 2643, माजह 76). यानी हकमी तौर पर कुछ कहना मुश्किल है. 

इसलिए इससे 2 मतलब निकलते हैं:- पहला कि 120 दिन वाली बात माने तो अहदे अलस्त के मौके पर जिनसे सवाल हुआ, वो शक्सियात अपने असल वजूद में नहीं और इसलिए उनमें वो रूह भी नहीं थी, जो पैदा होने पर मिलती हैं बल्कि वो सब तो सिर्फ हमारी माइक्रो फॉर्म्स थी जिन्हें उसी तरह का खास शऊर भी था. ह. ईसा के लिए डाली गयी फूंक, उनकी क्रीएशन के लिए थी (जिस तरह भी भ्रूण बना हो) और इंसानों को मां के पेट में पहली बार रूह मिलती है.दूसरा कि अगर 120 दिन वाली बात दुरुस्त नहीं है तो फिर इसका मतलब है कि इंसान में सिर्फ एक बार ही रूह फूंकी गई जो नस्ल दर नस्ल जान की तरह ही आगे बढ़ती जा रही है। 

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रूह पर हमेशा से ही बहसे मौजूद है. कुरान ने कहा कि जब मौत आती है तो नफ्ज़ कब्ज़ कर ली जाती है. इसके बाद वो किस हालत में होती हैं, हमें नहीं पता. जैसे एहदे अलस्त के मौके पर हमारी शक्सियत बन चुकी थी. मगर हमें याद नहीं है. कुरान ने ही कहा कि तुम मुर्दा हो. मौत सोये रहने की या बेहिस्स रहने की हालत का नाम है. मौत के बाद नफस किस हालत में रहती है, हमें नहीं मालूम. कुरान ने कहा कि जब उठेंगे तो कहेंगे जैसे अभी की ही बात है.

एहदे अलस्त से पहले हम नहीं थे, इसके बाद हम मौत की हालत में थे और मरने के बाद भी हम मौत की हालात में वापिस चले जायँगे। यानी जिस्म और रूह इकट्ठा हो तो ज़िंदा होते हैं। एहदे अलस्त में और क़यामत में, ये दोनों इकट्ठे हैं।

sperm और egg में प्राण है जैसे वनस्पति में होता है। मिलकर जीव बनता है। एक stage पर जा कर आत्मा से संपर्क होती है। यंहा वो जीव इंसान माना जाता है। जैसे current devices को activate कर देता है जो पूरे इलाके का एक ही होता है। नफ़स ही जान है, प्राण है। इसी को afterlife results मिलेंगे। artificial pacifier से दुबारा heart की pumping start कर दो. जिंदा रहने पर दर्द पता लगता है। आत्मा निकलने के बाद काटने पर दुख नहीं होगा। ये स्वयं किसी और शरीर में चली जाए फिर से दर्द महसूस होगा।

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According to Shah Waliullah Dehlvi (18th cent. ), there are two types of Divine Creative activity viz; Al Aalam Khalq & Al Aalam Amr. The Al Aalam Khalq, the world of Allah’s ordinary creatures, in which every thing that happens takes times. But there is Al Aalam Amr, or the domain of Divine Creative Energy, that is a direct manifestation of His Word or Logos that is His command of Be! There is absolutely no time factor involved in this realm and things happens instantaneously. He says: Be! and it becomes. The initial act of the creation of matter out of nothing (creation ex Nihilo) represents a direct command or Amr of Almighty Allah. According to the Holy Quran Ruh (soul) is an Amri Rabb. 


अल्लाह का अम्र अल्लाह का हुकुम है और अल्लाह का तल्ख़ या तखलीक, उसका वजूद में आ जाना. 

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[Total 21 times in 20 Ayats word Rooh has been used in the Quran with diffrent meaning, no where used to describe the spirits of humans as we take generally.]


2:87, 2:253, 5:110, 16:102 (Roohul Qudus - Jibreel)

26:193 (Roohul Amin - Jibreel)

19:17 (Fooh - Jibreel in human form)


15:29, 32: 9, 38: 72 (Rooh - in Adam)

21:91, 66:12 (Rooh - in Maryam)


4:171 (Rooh - as Jesus)


42:52 (Rooh - divine revelation/book to Prophet)

16:2, 40:15,  (Rooh: angels came down with Allah's Rooh -  inspiration of His command/book of God)

58:22 (Rooh - proofs, light, guidance from Allah in true believers heart ) 


17:85, 17:85 (Rooh used twice - his Amr)

70:4 (Rooh: angels and rooh ascend to him in fifty thousand years)

78:38 (Rooh: Rooh and angels will stand in a row on the last day and they will speak)

97:4 (Rooh: Rooh and angels descend for every Amr)

Bible: Matthew 3:16: As soon as Jesus was baptized, he went up out of the water. At that moment heaven was opened, and he saw the Spirit of God descending like a dove and alighting on him.  

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