Question: According to Qur'an, the keeping and breaking of a fast are related to times of sunrise and sunset. As we get closer to the North or South Pole, the day or night might extend for up to several months each. Islam did not take into consideration Muslim astronauts and Muslims living near the Poles? But an omniscient being should have known better. Islamic scholars have tried to fix this issue in many ways, like match Mecca time, match the nearest inhabitants with normal hours, travel away from these areas during Ramadan etc. But they go directly against the Quran and are not backed by any hadith.
● अगर किसी बड़ी मजूबरी की वजह से किस फर्द या क़ौम के लिये रमज़ान में रोज़े रखना शदीद मुश्किल हो जाये तो रोज़ो या रमज़ान को मुअखखर किया जा सकता है जैसा क़ुरान में बीमारी, सफर और हदीसों में हेज़ के वक़्त के लिए अपवाद स्वरूप हुकुम है।
● क़ुरान का फरमान है कि जो कोई रमज़ान का माहिना पाए तो रोज़े रखे। ऐसे इलाके जंहा महीनों तक दिन या रात रहते हैं, वंहा चांद उस तरह नहीं देखेगी और इसलिए उनके लिए रमज़ान का महीना टेक्निकली आएगा भी नहीं यानी उन्हें रमज़ान मिलेगा ही नहीं। ऐसे में इश्तिहाद करके ही इबादतें होगी।
ऐसे इश्तिहाद का नबी ने खुद हुकुम दिया है। एक हदीस (मुस्लिम 2937a) में नबी ने दज्जाल के बारे में फरमाया कि जब वो आएगा तो उसका एक दिन एक साल (साथ ही कई महीनों और हफ्ते भी) के बराबर होगा। तो सहाबा ने पूछा कि क्या एक दिन की नमाज़े पूरे साल के लिए काफी होंगी (नमाज़ के अवकात कैसे ठहरायँगे)। नबी ने फरमाया वक़्त की उसी हिसाब से गणना कर लेना और नमाज़े पढ़ लेना।
● क़ुरान में कहा गया है कि अल्लाह किसी पर उसकी इसतीतात से ज़्यादा बोझ नहीं डालता। यानी जब भी एक्स्ट्रा आर्डिनरी मौके आएंगे, हर इंसान को इंफ्रादी या इश्तेमाई तौर पर मुनासिब हल निकाल सकता है। अगर क़ुरान, सुन्नत, हदीस, सीरह, तारीख वगैरह से कोई रहनुमाई मिले तो इसी तरतीब में इनकी रोशनी में फैसले लें। कुछ न मिले तो अपने इल्म और अक़्ल की रोशनी में फ़ैसले ले।
यही सब वजह हैं कि इस्लाम में क़ुरान, रिसालात वगैरह में कोई हकूम न मिलने की सूरत में इश्तिहाद, कियास को मसाइल हल करने के लिए सबसे ज़्यादा एहमियत दी गयी है जो कि अल्लाह की तरफ से ही एक हिदायत है। जिस मसले का हल क़ुरान में नहीं होगा, उसका हल रिसालत से लिया जायेगा, वंहा भी नहीं हुआ तो इज्तिहाद होगा जैसा नबी ने फरमाया एक हदीस में।
इस मसले का हल क़ुरान या हदीस में क्यों नहीं है?
ऊपर बताया गया हल हदीस से ही है। अगर हदीस न होती तो इसे इज्तिहाद की बुनियाद पर भी हल किया जा सकता था, यही इस्लाम की तालीम है।
नार्थ या साउथ पोल पर रोज़े रखने के लिए वक्त का निर्धारण कैसे करे, इस पर क़ुरान में कुछ क्यों नहीं बताया गया है?
क़ुरान हिदायत की किताब है और उस लिहाज से मुकम्मल है। अगर हर क़ौम, हर देश, हर समय के मसाइल पर ये हिदायतें देने आता तो दुनिया की सबसे लंबी चौड़ी किताब हो जाता। फिर इसे कौन पढ़ता, समझता और मानता? दुनिया का सबसे बड़ा संविधान भारत का माना जाता है मगर क्या उसमें भी हर चीज़ मौजूद है, नहीं है। उसमें मूलभूत ढांचा और आधारभूत नियम मौजूद हैं।
क़ुरान जब नाज़िल हुआ तो वो असल में उस वक़्त मौजूद लोगों से मुख़ातिब था। उस वक़्त पेश आये वाक़्यात, मसाइल की पृष्ठभूमि में क़ुरान थोड़ा थोड़ा अलग अलग लोगों को खिताब करता हुआ नाज़िल हुआ। अगर इसमें ऐसी बातें भी आ जाती जो उनसे मुताल्लिक थी ही नहीं तो लोग इस कलाम से कट जाते, बेज़ार हो जाते। इसे नआज़ुबिल्लाहहवा हवा हवाई, बिना रीढ़ का, अतार्किक, इररेलेवेंट वगैरह मान लेते। इसलिए इसमें जो कुछ है वो वंहा के लोगों से संबंधित है, उनसे जुड़ा है। इसीलिए बहुत सी क़ुरानी हिदायतें संदर्भ के साथ देखी जाती है। बिना संदर्भ या प्रसंग के वो बाज़ लोगों के समझ में नही आती है। नाज़िल होने के बाद क़ुरान फिर हिदायत के तौर पर क़यामत तक के लिए तमाम इंसानियत को मुखातिब हो गया।
● नार्थ पोल, साउथ पोल में महीनों तक दिन या रात रहती है। यंहा कोई परमानेंट पॉपुलेशन नहीं रहती है, महज़ कुछ हज़ार लोग हैं जो रीसेच करने आते हैं। कुछ और जगह भी जंहा दिन या रात हफ़्तों तक की होती हैं। वंहा परमानेंट पॉपुलेशन है मगर कम। जितना अधिक लम्बा दिन य रात होगी, वंहा आबादी उतनी ही कम होगी। दुनिया मे जितनी आबादी है उसका 0.01 भी ऐसे इलाको में आज नहीं रहता है. बल्कि ऐसी जगह आज से हज़ारों साल पहले (क़ुरान के समय, 1500 साल पहले भी) सुनसान थी और यंहा लोग निवास नहीं करते थे क्योंकि तब आधुनिक सहुलतें नहीं थी।
इसलिए ऐसी जगहों के बारे में क़ुरान कैसे हिदायत दे सकता है, जो रेयर ही नहीं बल्कि रेयरेस्ट इन्हेबिटेड हैं। क़ुरान ऐसी एक्सट्रीम जगह के लिये या हर एक्स्ट्रा आर्डिनरी, केटास्ट्रोफिकल कंडीशन में पेश आने मसाइल का हल बताता चलता तो क़ुरान एक लिमिटलेस किताब होती। अल्लाह को ऐसी जगह बेशक मालूम होती है मगर अल्लाह ने सामान्य हालातों के लिए सामान्य नियम क़ुरान में दिए हैं और बाकी इंसानों को खुद फैसले लेने के लिए छोड़ दिया है.
क्या इसके लिए किया गया इज्तिहाद क़ुरान की वाज़ेह हुकुम के खिलाफ नहीं है?
मुश्किल हालतों के लिए निकाले गए हल सामान्य नियमों के खिलाफ नहीं माने जा सकते क्योंकि दोनो हालात अलग हैं तो कानून भी अलग होंगे। जब भी असामान्य स्तिथियाँ आएगी, सामान्य नियम बाध्य नहीं होता जिसकी क़ुरान,हदीस में ही कई मिसालें मौजूद है।
इस्लाम में क़ुरान के हुकुमो को नबी ने रिसालत में एक्सप्लेन किया है और उनकी इम्प्लीमेंटेशन भी बताई है. कुरान ने नमाज़, ज़कात, रोज़े जैसे अनेको अहकाम को अदा करने को कहा और साथी ही खुद पर दीन के अह्कामो का अनावश्यक बोझ डालने को भी मना किया. इसका मतलब बाज़ सखत हालतों में अमल अपने हालातों के मद्देनज़र बदली शक्ल में होंगे जैसे:-.
क़ुरान ने नमाज़ों को उनके वक़्त पर फिक्स्ड बताया है मगर रिसालत में हमे ज़रूरत पर एक नमाज़ को आगे पीछे खिसका कर अदा करने का हल मिलता है। यह क़ुरान के सामान्य नियम के खिलाफ नहीं है। इसके अलावा क़ुरान ने बार बार यही कहा कि ईमान लाओ और ज़कात दो। मगर रिसालत में हुकुम मिलता है की हर ईमान वाले को ज़कात नहीं देनी है, ख़ास निसाब वाले को देनी है। यह भी क़ुरान के सामान्य नियम के खिलाफ नहीं है। इसी तरह रोजों के लिए औरतों के मख़सूस वक़्त में रियायत भी क़ुरान में सीधी नहीं लिखी मगर रिसालत में जारी सुन्नत के तहत फॉलो करी जाती है। क़ुरान कहता है अपनी
निगाहें नीची रखो और शर्मगाहो की हिफाज़त करो। ये सामान्य नियम है। मगर जब
मजबूरी होती है मेडिकल कारणों से हम दूसरों का शरीर भी बिना कपड़ों के देखते
हैं और अपना भी दिखाते हैं। जबकि मेडिकल रीजन से प्राइवेट पार्ट्स देखने दिखाने की न तो क़ुरान में आज्ञा दी गई है और न ही हदीस में। असल में उलेमा ने इसे इज्तिहाद
के ज़रिए इसे जायज़ कर लिया है जबकि क़ुरान में इसके उलट बयान हुआ है। इसकी बुनियाद
क़ुरान की दी वो रियायत है कि मजबूरी या जान बचाने के लिए हराम खाना भी जायज़
है। फ़िक़्ह का भी उसूल है कि मजबूरी में ममनू चीज़ जायज़ हो जाती है। यही इस्लाम का उसूल है और यही अक़्लमंदी की बात भी है।
ये सभी अमल क़ुरान के हुक्म की खिलाफवर्जी नहीं करते हैं क्योंकि ये सामान्य जीवन से हटकर पेश आये मसाइल के हल हैं। ये हल क़ुरान में कंट्राडिक्शन नहीं बल्कि कोरीलेशन समझाते हैं। मुस्लिम भी अच्छी तरह समझते है कि ये अमल क़ुरान के खिलाफ नही है बल्कि कुरानी कानूनों और हिदायतें का प्रक्टिकल एप्पलीकेशन है।
क़ुरान में आम लोगों, आम स्थानों, आम एक्ससेप्शन बयान हो गयी है। नार्थ, साउथ पोल वाला कोई आम मसला नहीं है बल्कि एक बेहद बाद आपवाद है। इसके अलावा यंहा तो सूरज की चाल से रोज़े का मसला कोई हलाल- हराम की नॉइय्यत का भी नहीं है जैसा कि ऊपर बताए मसाइल में है।
रोज़े की अवधि को सूरज से मापने के नियम असामान्य स्थानों पर लगाना।
क़ुरान ने जो बात बयान करी है सामान्य स्थानों के बारे में है। अगर इसको हर जगह लागू कर दिया जाए तो 6 महीने दिन रहने वाली जगह में लोग 6 महीने का लगातार रोज़ा पूरा होने से पहले ही मर जायँगे, ऐसे में यह न रोजा होगा, और न ही क़ुरान की ताईद जो कहता है अपनी जानो पर जुल्म न करो, खुदकुशी न करो।
ज़ाहिर है सूरज के चाल से रोज़े रखने और अपनी जान भी न जाये, इसके लिए उपाय किया जायेगा क्योंकि दोनों क़ुरान के हकूम है। इसलिए इस तरह के इश्तिहादी हल क़ुरान के खिलाफ नहीं बल्कि क़ुरान के ही अनुसार है, ताकि लोग अपने फ़राइज़ अदा कर सके।