Tuesday, 4 March 2025

पृथ्वी के ध्रुवों पर रोज़ों के समय पर इज्तिहाद क्या क़ुरान के खिलाफ है?



Question: According to Qur'an, the keeping and breaking of a fast are related to times of sunrise and sunset. As we get closer to the North or South Pole, the day or night might extend for up to several months each. Islam did not take into consideration Muslim astronauts and Muslims living near the Poles? But an omniscient being should have known better.  Islamic scholars have tried to fix this issue in many ways, like match Mecca time, match the nearest inhabitants with normal hours, travel away from these areas during Ramadan etc. But they go directly against the Quran and are not backed by any hadith.


● अगर किसी बड़ी मजूबरी की वजह से किस फर्द या क़ौम के लिये रमज़ान में रोज़े रखना शदीद मुश्किल हो जाये तो रोज़ो या रमज़ान को मुअखखर किया जा सकता है जैसा क़ुरान में बीमारी, सफर और हदीसों में हेज़ के वक़्त के लिए अपवाद स्वरूप हुकुम है।

● क़ुरान का फरमान है कि जो कोई रमज़ान का माहिना पाए तो रोज़े रखे। ऐसे इलाके जंहा महीनों तक दिन या रात रहते हैं, वंहा चांद उस तरह नहीं देखेगी और इसलिए उनके लिए रमज़ान का महीना टेक्निकली आएगा भी नहीं यानी उन्हें रमज़ान मिलेगा ही नहीं। ऐसे में इश्तिहाद करके ही इबादतें होगी।

ऐसे इश्तिहाद का नबी ने खुद हुकुम दिया है। एक हदीस (मुस्लिम 2937a) में नबी ने दज्जाल के बारे में फरमाया कि जब वो आएगा तो उसका एक दिन एक साल (साथ ही कई महीनों और हफ्ते भी) के बराबर होगा। तो सहाबा ने पूछा कि क्या एक दिन की नमाज़े पूरे साल के लिए काफी होंगी (नमाज़ के अवकात कैसे ठहरायँगे)। नबी ने फरमाया वक़्त की उसी हिसाब से गणना कर लेना और नमाज़े पढ़ लेना। 

● क़ुरान में कहा गया है कि अल्लाह किसी पर उसकी इसतीतात से ज़्यादा बोझ नहीं डालता। यानी जब भी एक्स्ट्रा आर्डिनरी मौके आएंगे, हर इंसान को इंफ्रादी या इश्तेमाई तौर पर मुनासिब हल निकाल सकता है। अगर क़ुरान, सुन्नत, हदीस, सीरह, तारीख वगैरह से कोई रहनुमाई मिले तो इसी तरतीब में इनकी रोशनी में फैसले लें। कुछ न मिले तो अपने इल्म और अक़्ल की रोशनी में फ़ैसले ले। 

यही सब वजह हैं कि इस्लाम में क़ुरान, रिसालात वगैरह में कोई हकूम न मिलने की सूरत में इश्तिहाद, कियास को मसाइल हल करने के लिए सबसे ज़्यादा एहमियत दी गयी है जो कि अल्लाह की तरफ से ही एक हिदायत है। जिस मसले का हल क़ुरान में नहीं होगा, उसका हल रिसालत से लिया जायेगा, वंहा भी नहीं हुआ तो इज्तिहाद होगा जैसा नबी ने फरमाया एक हदीस में।
 

इस मसले का हल क़ुरान या हदीस में क्यों नहीं है?

ऊपर बताया गया हल हदीस से ही है। अगर हदीस न होती तो इसे इज्तिहाद की बुनियाद पर भी हल किया जा सकता था, यही इस्लाम की तालीम है।
 

नार्थ या साउथ पोल पर रोज़े रखने के लिए वक्त का निर्धारण कैसे करे, इस पर क़ुरान में कुछ क्यों नहीं बताया गया है?

क़ुरान हिदायत की किताब है और उस लिहाज से मुकम्मल है। अगर हर क़ौम, हर देश, हर समय के मसाइल पर ये हिदायतें देने आता तो दुनिया की सबसे लंबी चौड़ी किताब हो जाता। फिर इसे कौन पढ़ता, समझता और मानता?  दुनिया का सबसे बड़ा संविधान भारत का माना जाता है मगर क्या उसमें भी हर चीज़ मौजूद है, नहीं है। उसमें मूलभूत ढांचा और आधारभूत नियम मौजूद हैं। 

क़ुरान जब नाज़िल हुआ तो वो असल में उस वक़्त मौजूद लोगों से मुख़ातिब था। उस वक़्त पेश आये वाक़्यात, मसाइल की पृष्ठभूमि में क़ुरान थोड़ा थोड़ा अलग अलग लोगों को खिताब करता हुआ नाज़िल हुआ। अगर इसमें ऐसी बातें भी आ जाती जो उनसे मुताल्लिक थी ही नहीं तो लोग इस कलाम से कट जाते, बेज़ार हो जाते। इसे नआज़ुबिल्लाहहवा हवा हवाई, बिना रीढ़ का, अतार्किक, इररेलेवेंट वगैरह मान लेते। इसलिए इसमें जो कुछ है वो वंहा के लोगों से संबंधित है, उनसे जुड़ा है। इसीलिए बहुत सी क़ुरानी हिदायतें संदर्भ के साथ देखी जाती है। बिना संदर्भ या प्रसंग के वो बाज़ लोगों के समझ में नही आती है। नाज़िल होने के बाद क़ुरान फिर हिदायत के तौर पर क़यामत तक के लिए तमाम इंसानियत को मुखातिब हो गया। 


● नार्थ पोल, साउथ पोल में महीनों तक दिन या रात रहती है। यंहा कोई परमानेंट पॉपुलेशन नहीं रहती है, महज़ कुछ हज़ार लोग हैं जो रीसेच करने आते हैं। कुछ और जगह भी जंहा दिन या रात हफ़्तों तक की होती हैं। वंहा परमानेंट पॉपुलेशन है मगर कम। जितना अधिक लम्बा दिन य रात होगी, वंहा आबादी उतनी ही कम होगी। दुनिया मे जितनी आबादी है उसका 0.01 भी ऐसे इलाको में आज नहीं रहता है. बल्कि ऐसी जगह आज से हज़ारों साल पहले (क़ुरान के समय, 1500 साल पहले भी) सुनसान थी और यंहा लोग निवास नहीं करते थे क्योंकि तब आधुनिक सहुलतें नहीं थी। 
 
इसलिए ऐसी जगहों के बारे में क़ुरान कैसे हिदायत दे सकता है, जो रेयर ही नहीं बल्कि रेयरेस्ट इन्हेबिटेड हैं। क़ुरान ऐसी एक्सट्रीम जगह के लिये या हर एक्स्ट्रा आर्डिनरी, केटास्ट्रोफिकल कंडीशन में पेश आने मसाइल का हल बताता चलता तो क़ुरान एक लिमिटलेस किताब होती। अल्लाह को ऐसी जगह बेशक मालूम होती है मगर अल्लाह ने सामान्य हालातों के लिए सामान्य नियम क़ुरान में दिए हैं और बाकी इंसानों को खुद फैसले लेने के लिए छोड़ दिया है. 
 


क्या इसके लिए किया गया इज्तिहाद क़ुरान की वाज़ेह हुकुम के खिलाफ नहीं है?

मुश्किल हालतों के लिए निकाले गए हल सामान्य नियमों के खिलाफ नहीं माने जा सकते क्योंकि दोनो हालात अलग हैं तो कानून भी अलग होंगे। जब भी असामान्य स्तिथियाँ आएगी, सामान्य नियम बाध्य नहीं होता जिसकी क़ुरान,हदीस में ही कई मिसालें मौजूद है।

इस्लाम में क़ुरान के हुकुमो को नबी ने रिसालत में एक्सप्लेन किया है और उनकी इम्प्लीमेंटेशन भी बताई है. कुरान ने नमाज़, ज़कात, रोज़े जैसे अनेको अहकाम को अदा करने को कहा और साथी ही खुद पर दीन के अह्कामो का अनावश्यक बोझ डालने को भी मना किया. इसका मतलब बाज़ सखत हालतों में अमल अपने हालातों के मद्देनज़र बदली शक्ल में होंगे जैसे:-. 
 
क़ुरान ने नमाज़ों को उनके वक़्त पर फिक्स्ड बताया है मगर रिसालत में हमे ज़रूरत पर एक नमाज़ को आगे पीछे खिसका कर अदा करने का हल मिलता है। यह क़ुरान के सामान्य नियम के खिलाफ नहीं है। इसके अलावा क़ुरान ने बार बार यही कहा कि ईमान लाओ और ज़कात दो। मगर रिसालत में हुकुम मिलता है की हर ईमान वाले को ज़कात नहीं देनी है, ख़ास निसाब वाले को देनी है। यह भी क़ुरान के सामान्य नियम के खिलाफ नहीं है। इसी तरह रोजों के लिए औरतों के मख़सूस वक़्त में रियायत भी क़ुरान में सीधी नहीं लिखी मगर रिसालत में जारी सुन्नत के तहत फॉलो करी जाती है। क़ुरान कहता है अपनी निगाहें नीची रखो और शर्मगाहो की हिफाज़त करो। ये सामान्य नियम है। मगर जब मजबूरी होती है मेडिकल कारणों से हम दूसरों का शरीर भी बिना कपड़ों के देखते हैं और अपना भी दिखाते हैं। जबकि मेडिकल रीजन से प्राइवेट पार्ट्स देखने दिखाने की न तो क़ुरान में आज्ञा दी गई है और न ही हदीस में। असल में उलेमा ने इसे इज्तिहाद के ज़रिए इसे जायज़ कर लिया है जबकि क़ुरान में इसके उलट बयान हुआ है। इसकी बुनियाद क़ुरान की दी वो रियायत है कि मजबूरी या जान बचाने के लिए हराम खाना भी जायज़ है। फ़िक़्ह का भी उसूल है कि मजबूरी में ममनू चीज़ जायज़ हो जाती है। यही इस्लाम का उसूल है और यही अक़्लमंदी की बात भी है।
 
ये सभी अमल क़ुरान के हुक्म की खिलाफवर्जी नहीं करते हैं क्योंकि ये सामान्य जीवन से हटकर पेश आये मसाइल के हल हैं। ये हल क़ुरान में कंट्राडिक्शन नहीं बल्कि कोरीलेशन समझाते हैं। मुस्लिम भी अच्छी तरह समझते है कि ये अमल क़ुरान के खिलाफ नही है बल्कि कुरानी कानूनों और हिदायतें का प्रक्टिकल एप्पलीकेशन है। 

क़ुरान में आम लोगों, आम स्थानों, आम एक्ससेप्शन बयान हो गयी है। नार्थ, साउथ पोल वाला कोई आम मसला नहीं है बल्कि एक बेहद बाद आपवाद है। इसके अलावा यंहा तो सूरज की चाल से रोज़े का मसला कोई हलाल- हराम की नॉइय्यत का भी नहीं है जैसा कि ऊपर बताए मसाइल में है।
 

रोज़े की अवधि को सूरज से मापने के नियम असामान्य स्थानों पर लगाना।

क़ुरान ने जो बात बयान करी है सामान्य स्थानों के बारे में है। अगर इसको हर जगह लागू कर दिया जाए तो 6 महीने दिन रहने वाली जगह में लोग 6 महीने का लगातार रोज़ा पूरा होने से पहले ही मर जायँगे, ऐसे में यह न रोजा होगा, और न ही क़ुरान की ताईद जो कहता है अपनी जानो पर जुल्म न करो, खुदकुशी न करो।

ज़ाहिर है सूरज के चाल से रोज़े रखने और अपनी जान भी न जाये, इसके लिए उपाय किया जायेगा क्योंकि दोनों क़ुरान के हकूम है। इसलिए इस तरह के इश्तिहादी हल क़ुरान के खिलाफ नहीं बल्कि क़ुरान के ही अनुसार है, ताकि लोग अपने फ़राइज़ अदा कर सके।



Saturday, 1 March 2025

क्या इब्लीस (शैतान) ज़िंदा है और जिन्नात की पैदाइश?



इब्लीस कौन है? क्या वो ज़िंदा है? शैतान कौन है? जिन्नात की उम्र कितनी होती है?



क़ुरान (18:50) वाज़ेह करता है कि इब्लीस कोई फरिश्ता नहीं था बल्कि एक जिन्न था।

इब्लीस अपनी बंदगी के कारण फरिश्तों की मांनिद अल्लाह के नज़दीक बहुत ऊँचें मुक़ाम तक पहुँच गया था। यहूद-ईसाई रिवायतों और मुस्लिम तफ़ासीर के मुताबिक इब्लीस अज़ाज़ील का लक़ब है। क़ुरान के मुताबिक इब्लीस आदम से पहले से है। जब अल्लाह ने फरिश्तों के नाम का ज़िक्र करते हुए उन्हें (वंहा मौजूद जिन्न, इब्लीस को भी) आदम के ताबेय (सजदे से मुराद) आने को कहा था तो इब्लीस ने अपने आतिशी वजूद की बुनियाद पर अकड़ दिखाई और सरकशी करके शैतान हो गया। इब्लीस से पहले भी जिन्नात सरकश होते रहे हैं, मगर इंसानों की शुरवात में इंसानों के ताल्लुक से सरकश हुए इब्लीस की दास्तान जारी कर दी गयी है।
 
शैतान किसी मखलूक का नाम नहीं है बल्कि एक बुरी सिफत का नाम है। हर बुराई एक शैतानियत है। जो भी अल्लाह के मुक़ाबिल खड़ा हो जाये वो शैतान है।

क़ुरान (6:112, 114:6) ने बताया कि शैतान जिन्नात और इंसानों दोनों में हो सकते हैं ।

इस सरकशी के बाद इब्लीस ने इंसानों को बहकाने के लिए वक़्त मांगा तब तक के लिए जब तक कि दुबारा उठाये जाने वाले दिन न आ जाये। अल्लाह ने कहा तुझे मख़सूस दिन तक की मोहलत है। यंहा लफ़्ज़ों पर गौर करने पर मालूम पड़ता है कि उसकी मांग क़यामत और हश्र के बीच के अरसे में भी मोहलत लेने की थी। इंसानी इल्म और तजुर्बे से हम जानते हैं कि क़यामत के दिन के एक लंबे अरसे के बाद हश्र का दिन होगा, क्योंकि विज्ञान अनुसार बिगबैंग धमाके के बाद क़ायनात को फैलने में एक बहुत ज़्यादा लंबा अरसा लगा था और वापिस सिकुड़ने में भी एक लंबा अरसा लगेगा। इसलिए अल्लाह ने उसे उस खास दिन तक की मोहलत दी जब क़यामत बरपा होगी। यानी उसकी मांग को संकुचित कर दिया गया। 

पहले मौकिफ़ के मुताबिक जिन्नात की औसत उम्र कितनी होती है, इंसानों को इसका वाज़ेह इल्म नहीं है। इसलिए इससे आम तौर पर यही माना जाता है कि आम जिन्नो की जो भी उम्र होती हो मगर इब्लीस तब तक जिंदा रहेगा जब तक क़यामत नहीं आ जाती। 

दूसरे मौकिफ़ के मुताबिक यह ज़रूरी नही है कि यह मोहलत उस को ज़ाती तौर पर मिली हो, बढ़े हुए जीवन काल के रूप। हो सकता है यह मोहलत क़यामत तक आने वाली उस की पूरी जमात को मिली हो यानी जिन्नात में से उन बुरे जिन्नात को जो इब्लीस की राह पर चलते हुए इंसानों के लिए शैतानी वसवसे खड़े करते हैं। जैसे इन्सानों में नेक इंसान अपने बाप आदम की राह पर चलती हैं और इस तरह आदम का मक़सद अपनी औलादों के ज़रिए आगे बढ़ रहा है, वैसे ही ये माना जाता है कि इब्लीस भी अपनी औलादें के ज़रिए अपने मक़सद को आगे बढ़ा रहा है। यानी इब्लीस ने अल्लाह से तमाम इंसानों को (अल्लाह के चुने हुए नेक बंदों के अलावा) बहकाने यानी बुराई की तरफ ले जाने के लिए क़यामत तक ये प्रोविज़न बनाने रखने की मांग करी थी (संभवतः नेकी बदी का इख़्तियार, फ्री विल के ज़रिए)।

[इससे यह महसूस होता है कि इब्लीस को नहीं बल्कि शैतानियत को क़ायमत तक जिंदा रखा जायेगा। ज़ाहिर है इब्लीस भी जिन्नात की उम्र के मुताबिक ही जिया या जियेगा।]


क़ुरान (6:130) ने बताया कि जिन्नात में भी रसूल भेजे गए हैं। 

इसकी बुनियाद पर कहा जाता है कि जब जिन्नात में रसूल आते रहे हैं तो काफ़िर जिन्नात तबाह होते रहे हैं और इसलिए इब्लीस भी न जाने कब का फना कर दिया गया होता मगर उसे क़यामत तक मोहलत हासिल है इसलिए उसे ज़िंदा रखा गया। जैसे मूसा के वक़्त में गाय बनवाने वाले सामरी को मोहलत दी गयी थी जबकी बनी इस्राईल की क़ौम को तबाह कर दिया गया था (20:97)।

आदम के वक़्त में इब्लीस और जिन्नात मौजूद थे। जिन्नों को इंसान से पहले से ही बहुत सी आसमानी सलाहियते और ताकतें दी गयी थी जिन पर बाद में कुछ रोक भी लगी जैसा क़ुरान बताता है। तमाम इंसान और जिन्नात दुनिया के इम्तिहान में हैं। इन्सानों और जिन्नात दोनों को अल्लाह के मुताबिक चलना है। जो बरक्स राह पर चलता है वो शैतान कहलाता है।

मगर यंहा गौर करने वाली बात यह है कि इब्लीस अल्लाह का चूना हुआ जिन्न था और अल्लाह से राब्ते में था। इस मुकाम के लिए उसने ज़रूर इम्तिहान दिए होंगे और वो भी इसी दुनिया में। इब्लीस तो इस दुनिया के जिन्नो के इम्तिहान में है ही नहीं, वो तो पहले से ही अल्लाह के करीब था। वो इस वाकये के बाद कैसे किसी बाद में आने वाली जिन्नो के क़ौम का हिस्सा हो सकता है? वो कैसे भविष्य में किसी जिन्नो के रसूल के ज़रिए आये आज़ाब में मारा जा सकता था? इसलिए ऐसा कहना दुरुस्त नहीं होगा कि इब्लीस अज़ाब में पहले ही मर चुका होता मगर मोहलत के कारण ज़िंदा है। ऐसा माना जाता है कि वो निकाले जाने के बाद शायद खुद अपनी एक क़ौम खड़ी कर चुका है। आखिर दूसरों शैतानियत की तरफ बहकाना ही उसका काम है (उसने आदम- हव्वा तक को नहीं छोड़ा था) और दूसरों को अपनी जमात में शामिल करना भी। वो ज़िंदा हो सकता है मगर जिन्नात के लिए मुक़र्रर उम्र तक ही, यही बात तार्किक लगती है। 

[अब इससे यह महसूस होता है कि इब्लीस की जिन्नात की शक्ल में जितनी ज़िन्दगी होनी चाहिए थी, उतनी ही होगी। उसके बाद उसका शुरू किया गया मिशन ज़ुरूर मोहलत के तहत जारी रह सकता है।]


क़ुरान (34:20) ने हज़रत सुलैमान के वक़्त में क़ौमे सबा के बारे में कहा कि इबलीस ने उनके विषय में अपना गुमान सत्य पाया और ईमानवालों के एक गरोह के सिवा उन्होंने उसी का अनुसरण किया। 

यंहा ये नहीं कहा गया है कि उन्होंने इब्लीस के गुमान को सत्य पाया या सत्य कर दिया। इसका मतलब है कम से कम इब्लीस इस वक़्त तक जिंदा था। क़ुरान में आदम के किस्से के बाद सिर्फ मलका सबा के किस्से में ही इब्लीस का ज़िक्र आया है। इस से यह साफ महसूस होता है कि जिन्नात की ज़िंदगी आदम से लेके सुलैमान तक गुज़रे अरसे या उससे ज़्यादा वक़्त तक की होती है क्योंकि इसके बाद भी इब्लीस का क्या हुआ, हमें बताया नहीं गया।

[इस्लामी, ईसाई, यहूदी तारीखों के मुताबिक आदम से लेके सुलैमान के दरम्यान 35-50 नस्लें गुज़री हैं। इन तरह जिन्नात की औसत उम्र, कम से कम इतने इंसानों के बराबर मानने में कोई खास हर्ज नहीं लगता हैं।]
 

● क़ुरान (46:29-30): ऐ नबी, जब हमने कुछ जिन्नों को तुम्हारी ओर फेर दिया जो क़ुरआन सुनने लगे थे, तो जब वे वहाँ पहुँचे तो कहने लगे, चुप हो जाओ! फिर जब क़ुरआन का पाठ पूरा हुआ तो वे अपनी क़ौम की ओर सावधान करने वाले होकर लौटे। उन्होंने कहा, हमने एक किताब सुनी है, जो मूसा के पश्चात अवतरित की गई है। उसकी पुष्टि में है जो उससे पहले से मौजूद है। 
 
● क़ुरान (72:1-9): कह दो, मेरी ओर प्रकाशना की गई है कि जिन्नों के एक गरोह ने सुना, फिर उन्होंने कहा कि हमने एक मनभाता क़ुरआन सुना ....और यह कि हमने समझ रखा था कि मनुष्य और जिन्न अल्लाह के विषय में कभी झूठ नहीं बोलते। ....और यह कि मनुष्यों में से कितने ही पुरुष ऐसे थे, जो जिन्नों में से कितने ही पुरूषों की शरण माँगा करते थे। इस प्रकार उन्होंने उन (जिन्नों को) और चढ़ा दिया। और यह कि हमने आकाश को टटोला तो उसे सख़्त पहरेदारों और उल्काओं से भरा हुआ पाया। और यह कि हम उसमें बैठने के स्थानों में सुनने के लिए बैठा करते थे, किन्तु अब कोई सुनना चाहे तो वह अपने लिए घात में लगा एक उल्का पाएगा।

इन दोनों आयातों की बुनियाद पर कुछ उलेमा का ये भी मानना है कि जिन्नों के लिए भी इंसान ही रसूल बनके आते हैं या जिन्न भी इंसानी पैगम्बरों से रहनुमाई लेते हैं, जैसे जिन्नात ने खासतौर पर मुहम्मद सल्ल. से यंहा रहनुमाई ली.
 
इन आयत में मूसा अलैह. के बाद सीधा मुहम्मद सल्ल. का नाम लिया गया है। इसका मतलब या तो इन जिन्नो को मूसा और मुहम्मद सल्ल. के बीच आई किताबों का इल्म नहीं था जिसकी वजह उनका अपना एक विशेष वास सीमा हो सकती है या फिर वो सिर्फ मूसा और मुहम्मद सल्ल. के संदर्भ में बात को दूसरों को समझाना चाह रहे थे। 

[इससे भी यही महसूस होता है कि जिन्नात का जीवन काल कम से कम, मूसा और मुहम्मद सल्ल. के दरम्यान बीते अरसे के बराबर तक का हो सकता है, हालांकि इससे ज़्यादा का भी हो सकता है।]

निष्कर्ष यही है कि हक़मी तौर पर इब्लीस या जिन्नात की उम्र तय करना मुमकिन नहीं है। ज़्यादा इमकान यही है कि आदम से ले कर मलिका सबा तक (और शायद मूसा से मुहम्मद सल्ल. तक भी) जितना अरसा दरमियान में गुज़रा है, कम से कम उतनी उम्र जिन्नात की (इब्लीस की भी) हो सकती है।
 
जिन्नात किस तरह इंसानों से सम्पर्क करते हैं, हमें नहीं मालूम. 

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जिन्नों की उत्पत्ति


जिन्न के मायने होते हैं, पोशीदा, नजर से छिपा हुआ. 

क़ुरान 55:15:  जिन्न को आग की मिली जुली लपट से पैदा किया।

क़ुरान 15: 27: उससे पहले जिन्नों को तेज़ आग की झुलसाने वाली आंच से पैदा कर चुके थे।

The toppest shaky part of a flame of fire is called non-luminous veil, which is often the hottest part of a flame and may not always be visible. Fire is primarily energy but also matter, more accurately it's a process that releases energy in the form of heat and light. Fire requires carbon, oxygen, heat (spark). They are the components of fire. So Jinn are a creation who is energy primarily and matter also. That's is why they are often not visible but sometimes may be seen. Some flames have more matter than energy. That's why Jinn may also have same features.

There are certain fungi, bacteria, plants that germinate, thrive or are triggered in heat or due to fire. Similarly, there are a few algae, coral that are triggered by light or lightening. 


Creation of Human from mud or earth





दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...