● क़ुरान (18:50) वाज़ेह करता है कि इब्लीस कोई फरिश्ता नहीं था बल्कि एक जिन्न था।
इब्लीस अपनी बंदगी के कारण फरिश्तों की मांनिद अल्लाह के नज़दीक बहुत ऊँचें मुक़ाम तक पहुँच गया था। यहूद-ईसाई रिवायतों और मुस्लिम तफ़ासीर के मुताबिक इब्लीस अज़ाज़ील का लक़ब है। क़ुरान के मुताबिक इब्लीस आदम से पहले से है। जब अल्लाह ने फरिश्तों के नाम का ज़िक्र करते हुए उन्हें (वंहा मौजूद जिन्न, इब्लीस को भी) आदम के ताबेय (सजदे से मुराद) आने को कहा था तो इब्लीस ने अपने आतिशी वजूद की बुनियाद पर अकड़ दिखाई और सरकशी करके शैतान हो गया। इब्लीस से पहले भी जिन्नात सरकश होते रहे हैं, मगर इंसानों की शुरवात में इंसानों के ताल्लुक से सरकश हुए इब्लीस की दास्तान जारी कर दी गयी है।
शैतान किसी मखलूक का नाम नहीं है बल्कि एक बुरी सिफत का नाम है। हर बुराई एक शैतानियत है। जो भी अल्लाह के मुक़ाबिल खड़ा हो जाये वो शैतान है।
● क़ुरान (6:112, 114:6) ने बताया कि शैतान जिन्नात और इंसानों दोनों में हो सकते हैं ।
इस सरकशी के बाद इब्लीस ने इंसानों को बहकाने के लिए वक़्त मांगा तब तक के लिए जब तक कि दुबारा उठाये जाने वाले दिन न आ जाये। अल्लाह ने कहा तुझे मख़सूस दिन तक की मोहलत है। यंहा लफ़्ज़ों पर गौर करने पर मालूम पड़ता है कि उसकी मांग क़यामत और हश्र के बीच के अरसे में भी मोहलत लेने की थी। इंसानी इल्म और तजुर्बे से हम जानते हैं कि क़यामत के दिन के एक लंबे अरसे के बाद हश्र का दिन होगा, क्योंकि विज्ञान अनुसार बिगबैंग धमाके के बाद क़ायनात को फैलने में एक बहुत ज़्यादा लंबा अरसा लगा था और वापिस सिकुड़ने में भी एक लंबा अरसा लगेगा। इसलिए अल्लाह ने उसे उस खास दिन तक की मोहलत दी जब क़यामत बरपा होगी। यानी उसकी मांग को संकुचित कर दिया गया।
पहले मौकिफ़ के मुताबिक जिन्नात की औसत उम्र कितनी होती है, इंसानों को इसका वाज़ेह इल्म नहीं है। इसलिए इससे आम तौर पर यही माना जाता है कि आम जिन्नो की जो भी उम्र होती हो मगर इब्लीस तब तक जिंदा रहेगा जब तक क़यामत नहीं आ जाती।
दूसरे मौकिफ़ के मुताबिक यह ज़रूरी नही है कि यह मोहलत उस को ज़ाती तौर पर मिली हो, बढ़े हुए जीवन काल के रूप। हो सकता है यह मोहलत क़यामत तक आने वाली उस की पूरी जमात को मिली हो यानी जिन्नात में से उन बुरे जिन्नात को जो इब्लीस की राह पर चलते हुए इंसानों के लिए शैतानी वसवसे खड़े करते हैं। जैसे इन्सानों में नेक इंसान अपने बाप आदम की राह पर चलती हैं और इस तरह आदम का मक़सद अपनी औलादों के ज़रिए आगे बढ़ रहा है, वैसे ही ये माना जाता है कि इब्लीस भी अपनी औलादें के ज़रिए अपने मक़सद को आगे बढ़ा रहा है। यानी इब्लीस ने अल्लाह से तमाम इंसानों को (अल्लाह के चुने हुए नेक बंदों के अलावा) बहकाने यानी बुराई की तरफ ले जाने के लिए क़यामत तक ये प्रोविज़न बनाने रखने की मांग करी थी (संभवतः नेकी बदी का इख़्तियार, फ्री विल के ज़रिए)।
[इससे यह महसूस होता है कि इब्लीस को नहीं बल्कि शैतानियत को क़ायमत तक जिंदा रखा जायेगा। ज़ाहिर है इब्लीस भी जिन्नात की उम्र के मुताबिक ही जिया या जियेगा।]
● क़ुरान (6:130) ने बताया कि जिन्नात में भी रसूल भेजे गए हैं।
इसकी बुनियाद पर कहा जाता है कि जब जिन्नात में रसूल आते रहे हैं तो काफ़िर जिन्नात तबाह होते रहे हैं और इसलिए इब्लीस भी न जाने कब का फना कर दिया गया होता मगर उसे क़यामत तक मोहलत हासिल है इसलिए उसे ज़िंदा रखा गया। जैसे मूसा के वक़्त में गाय बनवाने वाले सामरी को मोहलत दी गयी थी जबकी बनी इस्राईल की क़ौम को तबाह कर दिया गया था (20:97)।
आदम के वक़्त में इब्लीस और जिन्नात मौजूद थे। जिन्नों को इंसान से पहले से ही बहुत सी आसमानी सलाहियते और ताकतें दी गयी थी जिन पर बाद में कुछ रोक भी लगी जैसा क़ुरान बताता है। तमाम इंसान और जिन्नात दुनिया के इम्तिहान में हैं। इन्सानों और जिन्नात दोनों को अल्लाह के मुताबिक चलना है। जो बरक्स राह पर चलता है वो शैतान कहलाता है।
मगर यंहा गौर करने वाली बात यह है कि इब्लीस अल्लाह का चूना हुआ जिन्न था और अल्लाह से राब्ते में था। इस मुकाम के लिए उसने ज़रूर इम्तिहान दिए होंगे और वो भी इसी दुनिया में। इब्लीस तो इस दुनिया के जिन्नो के इम्तिहान में है ही नहीं, वो तो पहले से ही अल्लाह के करीब था। वो इस वाकये के बाद कैसे किसी बाद में आने वाली जिन्नो के क़ौम का हिस्सा हो सकता है? वो कैसे भविष्य में किसी जिन्नो के रसूल के ज़रिए आये आज़ाब में मारा जा सकता था? इसलिए ऐसा कहना दुरुस्त नहीं होगा कि इब्लीस अज़ाब में पहले ही मर चुका होता मगर मोहलत के कारण ज़िंदा है। ऐसा माना जाता है कि वो निकाले जाने के बाद शायद खुद अपनी एक क़ौम खड़ी कर चुका है। आखिर दूसरों शैतानियत की तरफ बहकाना ही उसका काम है (उसने आदम- हव्वा तक को नहीं छोड़ा था) और दूसरों को अपनी जमात में शामिल करना भी। वो ज़िंदा हो सकता है मगर जिन्नात के लिए मुक़र्रर उम्र तक ही, यही बात तार्किक लगती है।
[अब इससे यह महसूस होता है कि इब्लीस की जिन्नात की शक्ल में जितनी ज़िन्दगी होनी चाहिए थी, उतनी ही होगी। उसके बाद उसका शुरू किया गया मिशन ज़ुरूर मोहलत के तहत जारी रह सकता है।]
● क़ुरान (34:20) ने हज़रत सुलैमान के वक़्त में क़ौमे सबा के बारे में कहा कि इबलीस ने उनके विषय में अपना गुमान सत्य पाया और ईमानवालों के एक गरोह के सिवा उन्होंने उसी का अनुसरण किया।
यंहा ये नहीं कहा गया है कि उन्होंने इब्लीस के गुमान को सत्य पाया या सत्य कर दिया। इसका मतलब है कम से कम इब्लीस इस वक़्त तक जिंदा था। क़ुरान में आदम के किस्से के बाद सिर्फ मलका सबा के किस्से में ही इब्लीस का ज़िक्र आया है। इस से यह साफ महसूस होता है कि जिन्नात की ज़िंदगी आदम से लेके सुलैमान तक गुज़रे अरसे या उससे ज़्यादा वक़्त तक की होती है क्योंकि इसके बाद भी इब्लीस का क्या हुआ, हमें बताया नहीं गया।
[इस्लामी, ईसाई, यहूदी तारीखों के मुताबिक आदम से लेके सुलैमान के दरम्यान 35-50 नस्लें गुज़री हैं। इन तरह जिन्नात की औसत उम्र, कम से कम इतने इंसानों के बराबर मानने में कोई खास हर्ज नहीं लगता हैं।]
● क़ुरान (46:29-30): ऐ नबी, जब हमने कुछ जिन्नों को तुम्हारी ओर फेर दिया जो क़ुरआन
सुनने लगे थे, तो जब वे वहाँ पहुँचे तो कहने लगे, चुप हो जाओ! फिर जब क़ुरआन का पाठ पूरा हुआ तो वे अपनी क़ौम की ओर सावधान करने वाले होकर
लौटे। उन्होंने कहा, हमने एक किताब सुनी है, जो मूसा के
पश्चात अवतरित की गई है। उसकी पुष्टि में है जो उससे पहले से मौजूद है।
● क़ुरान (72:1-9): कह दो, मेरी ओर प्रकाशना की गई है कि जिन्नों के एक गरोह ने सुना, फिर उन्होंने कहा कि हमने एक मनभाता क़ुरआन सुना ....और यह कि हमने समझ रखा था कि मनुष्य और जिन्न अल्लाह के विषय में कभी झूठ नहीं बोलते। ....और यह कि मनुष्यों में से कितने ही पुरुष ऐसे थे, जो जिन्नों में से कितने
ही पुरूषों की शरण माँगा करते थे। इस प्रकार उन्होंने उन (जिन्नों को)
और चढ़ा दिया। और यह कि हमने आकाश को टटोला तो उसे सख़्त पहरेदारों और उल्काओं से भरा हुआ पाया। और यह कि हम उसमें बैठने के स्थानों में सुनने के लिए बैठा करते थे, किन्तु
अब कोई सुनना चाहे तो वह अपने लिए घात में लगा एक उल्का पाएगा।
इन दोनों आयातों की बुनियाद पर कुछ उलेमा का ये भी मानना है कि जिन्नों के लिए भी इंसान ही रसूल बनके आते हैं या जिन्न भी इंसानी पैगम्बरों से रहनुमाई लेते हैं, जैसे जिन्नात ने खासतौर पर मुहम्मद सल्ल. से यंहा रहनुमाई ली.
इन आयत में मूसा अलैह. के बाद सीधा मुहम्मद सल्ल. का नाम लिया गया है। इसका मतलब या तो इन जिन्नो को मूसा और मुहम्मद सल्ल. के बीच आई किताबों का इल्म नहीं था जिसकी वजह उनका अपना एक विशेष वास सीमा हो सकती है या फिर वो सिर्फ मूसा और मुहम्मद सल्ल. के संदर्भ में बात को दूसरों को समझाना चाह रहे थे।
[इससे भी यही महसूस होता है कि जिन्नात का जीवन काल कम से कम, मूसा और मुहम्मद सल्ल. के दरम्यान बीते अरसे के बराबर तक का हो सकता है, हालांकि इससे ज़्यादा का भी हो सकता है।]
निष्कर्ष यही है कि हक़मी तौर पर इब्लीस या जिन्नात की उम्र तय करना मुमकिन नहीं है। ज़्यादा इमकान यही है कि आदम से ले कर मलिका सबा तक (और शायद मूसा से मुहम्मद सल्ल. तक भी) जितना अरसा दरमियान में गुज़रा है, कम से कम उतनी उम्र जिन्नात की (इब्लीस की भी) हो सकती है।
जिन्नात किस तरह इंसानों से सम्पर्क करते हैं, हमें नहीं मालूम.
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जिन्नों की उत्पत्ति
जिन्न के मायने होते हैं, पोशीदा, नजर से छिपा हुआ.
क़ुरान 55:15: जिन्न को आग की मिली जुली लपट से पैदा किया।
क़ुरान 15: 27: उससे पहले जिन्नों को तेज़ आग की झुलसाने वाली आंच से पैदा कर चुके थे।
The toppest shaky part of a flame of fire is called non-luminous veil, which is often the hottest part of a flame and may not always be visible. Fire is primarily energy but also matter, more accurately it's a process that releases energy in the form of heat and light. Fire requires carbon, oxygen, heat (spark). They are the components of fire. So Jinn are a creation who is energy primarily and matter also. That's is why they are often not visible but sometimes may be seen. Some flames have more matter than energy. That's why Jinn may also have same features.
There are certain fungi, bacteria, plants that germinate, thrive or are triggered in heat or due to fire. Similarly, there are a few algae, coral that are triggered by light or lightening.
Creation of Human from mud or earth
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