होली के त्यौहार का इतिहास
प्राचीन समय में लगभग पूरे विश्व में सर्दी के अंत और ऋतु परिवर्तन या नई फसल आगमन पर ख़ुशी, त्योहार मनाने का प्रचलन था। इसमें बची फसलों, सूखे पत्तों, लकड़ियों आदि को आग (bonfire) लगा कर खुशी मनाना शामिल था। भारत में भी पिछले 2 हज़ार साल से अधिक से बसन्त ऋतू के आने पर बसन्त का त्योहार, महोत्सव मनाया जा रहा है। इसमें फूलों, प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता था। कालांतर में जाकर ये दोनों चीज़ें मिलकर होली का त्यौहार हो गई। कालिदास जैसे कवियों ने भी इस रंगों का त्यौहार का उल्लेख किया।
बाद में इस त्यौहार से कई दंत और पौराणिक कथाएं जुड़ गई या बन गयी जैसे होलिका दहन, कृष्ण रंगलीला आदि। इस तरह होली एक मौसमी त्योहार से धार्मिक त्योहार बना गया। आर्य समाजी मानते हैं कि इस दिन अग्नि दहन यज्ञ के रूप में करा जाता था। यधपि सामान्य हिन्दुओ के अनुसार होली का त्यौहार होलिका दहन के रूप में मनाया जाता है, जो होली से एक दिन पहले होता है। जबकि नव बौद्ध (अम्बेडकरवादी) मानते हैं कि हिरण्यकश्यप एक नागवंशी (गौर आर्य) राजा था और उसकी बहन होलिका को विष्णु ने चल और षडयंत्र के तहत आग लगा कर मार दिया था।
होली की कथा
होलिका दहन की कथा अनुसार एक शक्तिशाली असुर राजा हिरणकश्यप (हिरण्यकशिपु) था. उसने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया था कि वह न दिन में मरेगा, न रात में; न घर में, न बाहर; न मनुष्य से, न जानवर से; न अस्त्र-शस्त्र से। इस कारण वह बेहद अहंकारी हो गया था। उसने विष्णु के अस्तित्व को नकारते हुए खुद को अजेय और सर्वोच्च मान लिया था। वह स्वयं को भगवान मानने लगा था और अपनी पूजा करवाने लगा था. उसके पुत्र का नाम प्रहलाद (प्रह्लाद) था. प्रहलाद एक सच्चा विष्णु भक्त था जो बचपन से ही विष्णु की पूजा करता था क्योंकि गर्भ में रहते हुए उसने नारद मुनि से विष्णु की भक्ति के बारे में सुन लिया था. हिरण्यकश्यप ने अपने बेटे को विष्णु की पूजा से रोकने की हर संभव कोशिश की, लेकिन प्रहलाद अपने विश्वास से पीछे नहीं हटा। हिरण्यकश्यप ने कई बार प्रहलाद को मारने की कोशिश कर जैसे पर्वत से गिरवा कर, विषैला दूध पिला कर, नागों से डसवा कर, हाथियों से कुचलवा कर लेकिन हर बार विष्णु ने उसकी रक्षा की। हिरणकश्यप की एक बहन थी होलिका जिसे अग्नि से न जलने के वरदान प्राप्त था। हिरणकश्यप ने होलिका से प्रहलाद को अग्नि में डालकर मारने की योजना बनाई, यह देखने के लिए कि क्या विष्णु उसे बचा सकता है। उसने प्रहलाद को गोद में बैठाकर अग्नि में प्रवेश किया ताकि वह जलकर मर जाए। लेकिन प्रहलाद को विष्णु की कृपा से अग्नि से कोई नुकसान नहीं हुआ क्योंकि उसने श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान का नाम लिया था जबकि होलिका खुद जलकर भस्म हो गई. इसके बाद हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद से पूछा कि उसका भगवान कहां है तो उसने उत्तर दिया कि भगवान हर जगह हैं। उसने प्रहलाद से भगवान को स्तंभ में दिखाने को कहा. प्रहलाद ने जब उसमें विष्णु को दिखाया तो हिरण्यकश्यप स्तम्भ तोड़ दिया. तभी विष्णु नृसिंह रूप (अर्धमनुष्य-अर्धसिंह) में अवतार लेके प्रकट हुए और हिरणकश्यप को गोद में उठा कर असमंजसपूर्ण तरीके से मार दिया (उसे मिले वरदान का उल्लंघन न करते हुए)। इसके बाद प्रहलाद ने भगवान से अपने पिता की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करी. नृसिंह ने प्रहलाद से वरदान मांगने को कहा तो उसने कोई भौतिक सुख या राज्य नहीं माँगा केवल सभी प्राणियों का कल्याण और भक्ति भावना मांगी. इस कथा के अंश भागवत, विष्णु, हरिवंश, अग्नि, गरुड़ पुराण व महाभारत में मिलते हैं. जबकि प्रहलाद को लिंग पुराण में शिव की और ब्रह्मवैवर्त पुराण में राधा-कृष्ण की भक्ति से जोड़ा गया है।
ह. इब्राहिम की कथा
इस प्रकार हज़रत इब्राहीम ने लड़कपन की उम्र में अपने समुदाय में की जा रही झूठे भगवानों की इबादत का विरोध किया था और सच्चे ईश्वर की भक्ति करने की बात कही। हज़रत इब्राहीम का अपने बाप आज़र (सौतेला बाप क्योंकि कुरान ने उसे आपका वालिद नहीं कहा बल्कि abihi कहा - 6:74, 19:42) के साथ भी ईश्वर की अवधारणा को लेकर मतभेद था। उनके पिता भी उनके सख़्त दुश्मन बन गए थे और उन पर बड़े अत्याचार किये थे. इब्रहिम अपने बाप को छोड़कर अलग जगह रहने लगे थे मगर उनके लिए दुवा भी करते थे. इब्रहिम के दौर में भी एक ताकतवर बादशाह था जो खुद को ही खुदा मनवाने लग गया था। कुछ इस्लामी ताफासीर और सीरह की किताबों में नमरूद को इब्राहीम का अंकल बताया गया है. शायद यह बात इज्राएली रिवायतों से आई हो क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि प्राचीन यहूदी साहित्य अनुसार नमरूद और इब्राहीम के पूर्वज रिश्तेदार थे. हज़रात इब्राहीम के इस विरोध के कारण नमरूद उनक दुशमन हो गया था. कुछ तफसीर और सीरह की रिवायतों के अनुसार नमरूद ने हज़रत इब्राहीम को मार डालने के लिए उनको भूखे शेरों के पिंजड़े में डाल दिया था, लेकिन शेर बजाय बालक इब्राहीम को खाने के, उन्हें दुलार से चाटने लगे। इब्राहीम और नमरूद में ईश्वर के जन्म-मृत्यु-सूरज के मालिक होने पर बहस हुई थी. फिर बादशाह नमरूद ने हज़रत इब्राहीम को आग (आतिशए नमरूद या नमरूद की आग) में डाल दिया था पर वो ही ईश्वर की कृपा से बचा लिए गये. इसके बाद नमरूद का अंत ईश्वर के दंड के परिणामस्वरुप हुआ. नबियों की कथाओं अनुसार उसके दिमाग में एक कीड़ा कान या नाक के रस्ते से घुस गया था और इसके कारण वो अपना दिमाग दिन-रात दबवाता था.
समानताएं
दोनों कथाओं में ऊपर बताई गयी समानताओं के अलावा, पारंपरिक वर्णनों में कहा जाता है कि आग का उनके शरीर पर तो क्या बल्कि कपड़ों तक पर कोई प्रभाव नहीं हुआ और इस चमत्कारिक घटना को देखने के बावजूद दोनों के समुदाय में उनका विरोध खत्म न हुआ।
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महाभारत की एक कहानी खिद्र और मूसा की कहानी के समान लगती है जिसमें खिद्र, मूसा से कहते हैं कि वह उसके साथ धैर्य नहीं रख पायंगे और उनके किसी भी काम के बारे में उनसे सवाल न किया जाए। महाभारत की इस कहानी के अनुसार, आठ वसु - जो आकाश के प्रकाश, अग्नि, वायु और जल के प्रतीक हैं - एक दिन ऋषि वशिष्ठ की गाय (नंदिनी) को चुरा ले गए। क्रोधित होकर ऋषि वशिष्ठ ने उन्हें श्राप दिया कि वे मानव रूप धारण करेंगे और सांसारिक जीवन के कष्ट भोगेंगे। इस शाप की तीव्रता से व्यथित होकर वसुओं ने वशिष्ठ से क्षमा याचना की। ऋषि ने कहा कि सात वसु तो अल्प मानव जीवन ही जीएंगे, लेकिन आठवां वसु - जो चोरी के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार था - उसे लंबे मानव जीवन का कष्ट सहना पड़ेगा। इसलिए, उन्होंने गंगा नदी (देवी गंगा) से प्रार्थना की कि वे मानव माता का रूप लें और उन्हें मानव जन्म दें। इसी बीच, जब हस्तिनापुर के राजा शांतनु नदी तट पर गए, तो उन्होंने सुंदर देवी गंगा को देखा। जब शांतनु गंगा से विवाह करना चाहते थे, तो गंगा ने एक शर्त रखी:तुम मुझसे कभी नहीं पूछोगे कि मैं क्या कर रही हूँ या क्यों कर रहा हूँ - वरना जब वह दिन आएगा, तो मैं तुम्हें छोड़ दूंगी। शांतनु ने यह शर्त स्वीकार कर ली और विवाह कर लिया। इसके बाद गंगा ने लगातार सात बच्चों को जन्म दिया और उनके जन्म के बाद उन्हें नदी में बलिदान कर दिया गया। अपने दिल के दर्द के बावजूद शांतनु कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं कर सका। लेकिन जब आठवें बच्चे की बारी आई, तो शांतनु इसे और सहन नहीं कर सके और गंगा से बोले: कृपया! हमारे बच्चे के जीवन को बचा लीजिए। उनके अनुरोध का उल्लंघन होने की स्थिति में, गंगा ने अपना वचन तोड़ दिया और घोषणा की कि वह शांतनु को छोड़ देंगी - लेकिन वह अपने साथ अपने आठवें पुत्र को भी ले गईं। यह आठवां पुत्र भीष्म कहलाया, जो महाभारत युद्ध में एक महान पात्र बना। भीष्म ने प्रतिज्ञा की थी कि वे कभी विवाह नहीं करेंगे और सिंहासन का दावा नहीं करेंगे - वे केवल राज्य की रक्षा करेंगे - यही वह प्रतिज्ञा थी जिसने भीष्म के जीवन की दिशा निर्धारित की। महाभारत आदि पर्व अध्याय 91-100. विभिन्न धर्मों में मनुष्य की परीक्षा लेने वाली ऐसी कहानिया मिल जाती हैं.