कुरान (9:29): उन लोगों से युद्ध करो जिन्हें किताब दी गई है, जो अल्लाह पर और आख़िरत पर ईमान नहीं रखते, और जो अल्लाह और उसके रसूल द्वारा मना की गई चीज़ों से नहीं रोकते, और जो सच्चा धर्म नहीं मानते, जब तक कि वे जज़ीया अदा न करें और अधीन न हो जाएँ।
आम
तौर पर यही माना जाता है कि जिजिया फौज में भागीदारी न होने वाले अहले
किताब या गैर मुस्लिम कौम से वसूला जाता था. इन्हें जिम्मी कहा जाता था.
हजरत उमर के वक़्त में Jarajimah कौम से इसे हटा लिया गया था जब उन्होंने
फ़ौज में शामिल होने पर हामी भर दी थी.
जबकि असल में जिज़िया कोई टैक्स नहीं है। जिज़िया का मतलब है कंपनसेशन या मुआवजा। जब किसी गैर क़ौम में जंग चालू हो या होने वाली हो तो जंग से पहले उन्हें और उनके सहयोगियों को अपने अधीन आने का, जिज़िया देने की पेशकश दी जा सकती है। अपने मुल्क के गैर मुसलमानों पर जिजिया नहीं लगाया जा सकता. नबी ने अपनी हुकूमत में किसी गैर मुसलमान से जिजिया नहीं लिया. अबू बकर ने नहीं लिया. उमर ने भी नहीं लिया. उनसे लिया गया जो इनकी स्टेट से बाहर थे. उन्हें सब-ऑर्डिनेट बनाना था.
नबी अपने आखिरी सालो में 9 हिजरी में बड़ी बाईजेंटाईन एम्पयार से जंग के लिए तबूक पहुचें पर जंग नहीं हुई मगर फिर फिर भी आस पास के इलाकों में धाक जम गयी कि मुसलमान ताकतवर हो गए हैं. इसके कारण आस पास के कबीलों (Aylah-3K Dinars p.a., Jarba, Adhria/ आईला, जरबा, अध्रिया) ने स्वयं से हिफाज़त मांगी और बदले में जजिया देना कुबूल किया. इस वाकये से पहले ये मुसलमानों के दुशमनों के साथ मिले हुए थे. ऐसा ही एक और काबिले ने भी किया था. हिफाज़त न कर पाने की स्तिथि में जिजिया वापिस देना होता था. इसीलिए यरमुक में बाईजेंटाईन के खिलाफ हार के बाद उमर ने साल भर का जिजिया वापिस किया था.
इसके उलट भारत में मुस्लिम शासकों ने राजस्व बढाने के लिए जिजिया लागू कर. जिजिया जंहा भी लिया गया, 2% से ज्यादा नहीं लिया गया. गरीबों, महिलाओं, ब्राहमणों, साधूओं, भिक्षुकों, को इससे माफ़ किया गया.
इस्लाम अनुसार जंग सिर्फ 3 स्तिथियों में की जा सकती है जैसे आत्मरक्षा में, करार तोड़ दिए जाने पर, कंही बड़े स्तर पर ज़ुल्म होता पाए जाने पर.
इसलिए ये उससे ही लिया जायेगा जो मुसलमानों पर हमला करे या अपने राज्य में बड़े स्तर पर दमन करे या फिर मुसल्मानो के साथ कोई करार तोड़ दे. ये एक प्रकार का दंड या पेनल्टी है. बदले में
--------------------------------------------------------------
नबी के बाद लगभग 11 लोग बड़े स्तर पर मुनकिर, मुर्तद हो गए थे जिनके साथ कबीलाई लोग भी थे. जैसे मुसैलमा जिसके साथ जंगे यमामा हुई. इसने इस्लाम कुबूल किया था. फिर खुद को रसूल घोषित करने की कोशिश करी. सज्जा नामक औरत ने इससे मुबाहिसे के बाद शादी कर ली थी, उसने भी खुद को रसूल घोषित कर रखा था. मुसैलमा ने नबी के अम्बैसडर को बेरहमी से टॉर्चर करके मार दिया गया था. ये आम परम्परा के खिलाफ था और आज भी है. इसके बाद अबू बकर ने इनसे जंग करी और खालिद बिन वालिद ने इसे हराया. ऐसे ही एक यमन का अस्वद अल अंसी था. नबी के फ़ौरन बाद इन्होने मुस्लिम इलाकों पर हमला किया और मुसलामानों का क़त्ल किया. ये लोग मुसलामानों के दुश्मन हो गए थे. इन्होने दीन को मानने से मना कर दिया था और ज़कात देने से से भी मना कर दिया था. इनके साथ जंगे हुई. इनकी ज़कात से मदद करी जा रही थी. इनके कतल के पीछे खाली ज़कात से इनकार करने की बात नहीं, फसाद की बात थी. 5.33-34. कुरान के मुताबिक फसादीयों के लिए क़त्ल की सज़ा है. माफ़ी भी अगर मां जाए तो.
--------------------------------------------------------------
No comments:
Post a Comment