Saturday, 28 June 2025

ईमाम मेहदी, हक़ीक़ते अहमदी, मक़ामे महमूद



ऐसा लगता है कि सुन्नी रिवायतों में शियाओ और अहले किताब की बातें बड़े स्तर पर शामिल हो गयी हैं. 
स्य्येद सुलैमान नदवी ने कहा है कि मेहदी पर हदीसों में इस तरह मिलावाट हुई है कि अब इनमें सही और गलत पहचानना नामुमकिन है. इस मुद्दे पर लगभग 80% से ज़्यादा हदीसें जईफ और मौजू हैं. नासिबियों, राफिज़ियों ने हदीसों में बहुत गड़बड़ करेक दीन में फितना फैलाने की कोशिश करी है. तारीख में मेहदी होने के बड़े बड़े फितने फसाद हो चुके हैं. 
हर सौ साल में एक-दो लोग मेहदी होने का दावा करते ही रहे हैं. बड़े-बड़े उलेमा ने इसका रद्द किया है.
 

ऐसा माना जाता है कि महदी ईसा के बाद आएंगे और ईसा उनके पीछे नमाज़ अदा करेंगे. महदी कहाँ प्रकट होंगे, इस बारे में कोई प्रामाणिक विवरण नहीं मिलता है। ईसा ने नुज़ूल पर उनकी मौत का ज़िक्र है, मगर मेहदी की मौत का ज़िक्र कंही नहीं है (शायद इसलिए क्योंकि शुरुवात में यह बस एक आदिल हुक्मरान के होने की पेशंगोयी थी). कुछ बेहद कमज़ोर रिवायतों के मुताबिक़ महदी हकलाने वाले होंगे और यह भी माना जाता है कि वह उम्मत नष्ट नहीं होगी जिसके आरंभ में पैगम्बर मुहम्मद होंगे, अंत में ईसा होंगे और बीच में महदी होंगे। ईसा विवाह करेंगे और उनके बच्चे होंगे और 40 या 45 वर्ष कि उम्र में उनकी मृत्यु हो जाएगी और उन्हें मुहम्मद साहब के बगल में दफनाया जाएगा।
  
महदी और मसीहा की तुलना 2 यहूदी saviors - Mashiach Ben Yosef and Mashiach Ben David की भविष्यवाणी से जोड़ी जा सकती है। इस्लामी रिवायतों में मेहदी नामक शक्सियत के लिए 3 लफ्ज़ पाए जाते हैं, मेहदी (यानी मार्गदर्शित व्यक्ति), हदीद (यानी दलील से ग़ालिब आने वाला) और रजले मोमिन (यानी पक्का मोमिन).
 
 
मुहम्मद अलाउद्दीन हस्कफी की दुर्रे मुख्तार/अल मुख्तार (17th cent.) में लिखा है कि मेहदी हनफी फिकह पर होगा. शायद इसी किताब में ये भी लिखा है कि ह.ईसा भी अपनी दूसरी आमद पर हनफी होंगे. इस किताब में वाकई ऐसा लिखा हुआ है मगर इस बात की रद्द भी करी गयी है. इसलिए इसकी कोई बुनियाद नहीं है.   
 
इब्ने खलदुन ने मुक़दमा में इन पर तनक़ीद करी है। अल्लामा इक़बाल ने इसे मजूसी अकीदा कहा है। अल्लामा तमन्ना इमादी ने इस पर एक किताब लिखी है कि ये बेमानी आइदा है. उबैदुल्ला सिंधी ने इस पर सवाल उठाये हैं. सैय्यद रशीद रिधा ने भी इस पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि ये तो अलवी लोगों की मायूसी हटाने की कोशिश थी (Alawites एक शिया संप्रदाय है.  Alvi or Alawi/Alevi ह. अली इब्न अबी तालिब के वंशज हैं)। सऊदी के शैख़ सलमान बिन फहद, क़तर के अब्दुल्लाह बिन ज़ैद आले महमूद (नुज़ूले मेहदी के खिलाफ किताब लिखी है), मुहक्किक अहमद अमीन, उस्ताद अब्दुल वाहब अब्दुल लतीफ़ (तिरमिज़ी पर तालिख- तोहफा लिखी है) ने इस पर ऐतराज़ उठायें हैं. जावेद गामिदी, मुफ़्ती कामरान शेहजाद, मौलाना वहिद्दुदीन खान को भी इस मुद्दे पर इख्तिलाफ है.  
 
 
 
ईमाम मेहदी पर 4 मौकिफ

1. पहला मौकिफ तो यही है कि एक महान इन्सान अंत में आएगा और ह. ईसा के साथ मिलकर दज्जाल का अंत करेगा.
 
2. दुसरा मत ये है कि ईमाम मेहदी की शक्सियत में मुहम्मद सल्ल. का रूहानी ज़हूर होगा. इसलिए ईसा और मेहदी माद्दी तौर पर आयंगे. मेहदी इंसानों के सरदार होने चाहिए (जैसे दज्जाल शैतानों का है).  इमाम मेहदी का नाम मुहम्मद होगा. नबी का पहला दौर वो था जब दुनिया में माद्दी तौर पर आये थे और उनका दुसरा दौर वो होगा जब रूहानी तौर पर आएंगे. ये दुसरा रूहानी दौर मुहम्मद साहब का मक़ाम-ए-महमूद है यानी नबी का मक़ाम-ए-महमूद ही मेहदी हैं. हदीसों में मेहदी के बारे में बयानात, नबियों से भी बढ़कर हैं. रिवायतों से साफ़ ज़ाहिर होता है कि मेहदी की शक्सियत नबी से भी आगे बढ़ गयी है. जबकि उलेमा द्वारा मुहम्मद सल्ल. को तमाम नबियो का सरदार माना जाता है. आप ही को कायनात की तख्लीक-ए-अव्वल या रूह-ए-अव्वल माना जाता है और इसे नूर-ए-मुहम्मदी भी कहा जाता है. अक्सर इन्हें तसव्वुफ़ की ताबीरे माना जाता है. 
 
3. इमाम मेहदी एक सोच है, अच्छाई का नाम है. मेहदी का मतलब है हिदायत पाया शख्स, ये हक (खो चुके सच को) की खोज करेगा. दज्जाल यानि बुराई और मेहदी यानी अच्छाई, जैसे पारसी धर्म में ये दोनों कुव्वतें होती हैं. इसलिए मेहदी दज्जाल को एक्सपोज़ करेंगे, न कि क़त्ल. इसी तरह यहूदियों के क़त्ल करने की बात, असल में उन्हें एक्सपोज़ करने के मायने हैं. मेहदी को पहचान पाने वाले कम होंगे मगर दज्जाल को पहचाने वाले बहुत ज्यादा होंगे. इसलिए लोगों की ज़िम्मेदारी है मेहदी या हक को पहचाने, वो खुद आके मेहदी होने का ऐलान नहीं करेगा.  जब मुसलमानों की कौम या उम्मत खुद को अल्लाह के रस्ते पर ले आएगी, कोई ना कोई बड़ा इमाम (भले ही मेहदी नाम का) अपने आप पैदा हो जायेगा. 

4. मेहदी की रिवायतें उमर बिन अबुदल अज़ीज़ के बारे में थी जिन्हें अमूमन पांचवा राशिदून खलीफा माना जाता है. आज मेहदी को ह. मुआविया और उनके ज़माने से भी जोड़ा जाता है. 
 
 
 
क्या मेहदी पर यकीन रखना ईमान का हिस्सा है?

अक़ाएद लफ़्ज़ नबी ने कभी इस्तेमाल नहीं किया। दीन के बुनियादी अकायद के लिए क़ुरआन और हदीसों में इमानियत लफ़्ज़ इस्तेमाल हुआ है। ईमान की जगह अक़ाएद लफ्ज़ तो बाद में इस्तेमाल होना शुरू हुआ. बाद में बने मस्लकों ने अपने अतिरिक्त अकाएद बनाए जैसे 5 फ़िक़्ह के अकाएद या शियाओं का इमामत का अकीदा. शुरवाती दौर में ही मुसलमानों में खवारिज नामक अनार्किस्ट पैदा हुए. उन्होंने सुन्नत (सुन्नह) को कुरान जैसी अहमियत नहीं दी और न ही मुस्लिम के नज़्मे इश्तमाई (अल जमा जिसे अल सुल्तान भी कहा जाता है) को। इसलिए इनसे अलग पहचान के लिए बाकी मुसलामानों ने खुद को अहल सुन्नत वल जमात कहा यानी जो अल जमा के साथ है। यंहा से अकाईद की फेहरिस्त बढ़ना शुरू हुई थी।

इस्लाम के अकाएद तो वही हदीसे जिब्रील वाली 5 इमानियात हैं (अल्लाह, फरिश्तों, पैगम्बरों, किताबों/इल्हाम, रोज़े जज़ा पर ईमान). इसमें ह. जिब्रील ने ईमान के बारे में पूछा था, ना कि अकाएद। इनके इमानियत होने की बात रिसालत में सभी को समझा दी गयी थी. इसे वाकये में तो इन्हें बस हाईलाईट किया गया है. इसलिए नबी ने कहा भी था कि जिब्रील तुम्हें दीन सीखाने आये थे. इसमें नबी ने ये भी बताया कि वो नहीं जानते कि क़यामत कब आयेगी मगर पूछे जाने पर उन्होंने कुछ अलामात बताई थी. इन्हें मानने के हम पाबंद हैं. इनमें कमी पेशी नहीं करी जा सकती क्योंकि नबी ने बताएं हैं. इमानियात में शामिल हर चीज़ आदम अलैह. से जारी होनी चाहिए. अब इन इमानियत को ही इस्लाम के अकाईद कहना चाहिए. इसके अलग किसी बात को बुनियादी इमानियात या अकाईद कहना सही नहीं है. 

हदीस जिब्रील के इमानियत ही असल दीन है जिन पर दीन टीका है।  बाकी सब इल्म का हिसा है. हदीसे जिब्रील बाकी हदीसों से हर लिहाज़ से मज़बूत है, मतन से खासतौर पर। इसमें बताई 2 अलामतें पूरी हो चुकी मालूम पड़ती है, तावील करने के बाद, इसलिए उन्हें माना जायेगा. हदीसों में जिन किस्सों पर मुतमईन हो गए हैं, उन्हें माना जायेगा. मगर फिर भी वो ईमान का हिस्सा नहीं है. कयामत ईमानियात का हिस्सा है मगर हदीसों में बताई उसकी निशानियाँ नहीं। निशानियाँ, मुस्तकबिल के अख़बार हैं. 

कुरान में इमान, अख्लाकियात, शरयत या कानून और अख़बार या इल्म हैं.  कुरान और हदीसों में अख़बार बयान हुए हैं यानि इत्तालात या किस्से. हदीसों में माज़ी और मुस्तकबिल दोनों के किस्से बयान हुए हैं. जैसे हदीसों में आये पुराने किस्से जांचे जाते हैं ऐसे ही बाद में होने वाले भी किये जायेंगे, कुरान दोनों के लिए सबसे अहम किरदार निभाएगा. क़ुरान में ज़ुलकरनैन, असहाबे कहफ़, मलिका बिलकिस वगैरह के माजी के किस्से आयें हैं.  इन्हें ईमान का हिस्सा हदीसे जिब्रील में नहीं बताया गया है. इन्हें अकाएद या इमानियात में शामिल करना खुद एक बिदत है.  इन्हें ईमानियात की फेहरिस्त में शामिल भी नहीं किया जाता है और न ही करना चाहिए.  कुरान यकीनी इल्म है। हम कुरान को अल्लाह की तरफ से मानते हैं तो उसके अखबार को भी मानते हैं. मगर इनका सही फ़हम, तावील, ताबीर, तफसीर, शरह फिर से इल्म का हिस्सा है, न की ईमान का। इन किस्सों की तावीलात हदीसों में भी मिल जाती है.

इसलिए मेहदी हदीसों में आया एक मुस्तकबिल का अखबार है. मेहदी पर यकीन ईमान का हिस्सा बिलकुल नहीं है.  
 
 
ज़हूरे मेहदी की रिवायतों का जायज़ा

मेहदी का ज़िक्र क़ुरान में नही है। हदीस की पहली किताब मुवत्ता में भी नही है। हदीसे जीब्रील में भी नहीं है. ये रिवायतें अहले तश्शियु से आ गयी हैं. शिया के हिसाब से 12वें इमाम मरवी आ चुके थे फिर गैब फरमा गया और बाद में आएंगे, वो पहले गयब सुगरा (झूठे गायब) थे फिर गयब कुबरा हो गए. ये रिवायतें कमज़ोर हैं और इल्म अक़ल पर साबित नहीं होती हैं. जिस तरह इन हदीसों दुनिया भर के ज़ुल्म के खात्मे की बात कही गयी है, ऐसा किसी नबी ने नही किया, मुहम्मद सल्ल. तक ने भी नहीं किया। मेहदी की रिवायतें 23 सहाबा से बयान हुई हैं और उनके कुल 500 तुर्क हैं। मुवत्ता में महदी पर एक हदीस भी नहीं है। इसके 2 ही मतलब निकलते हैं कि या तो इन 23 सहाबा ने मेहदी के बारे में इमाम मालिक को कुछ बयान ही नहीं किया (यानी ये रिवायतें उस वक़्त मौजूद ही नहीं थी) और या फिर इमाम मालिक को ये रिवायतें काबिले कुबूल ही नहीं लगी होंगी. हदीस की पहले दर्जे की किताबें मुवत्ता, बुखारी, मुस्लिम में मेहदी के नाम की कोई रिवायत नहीं है। ज़ाहिर हैं वो इनके मयार पर खरी नहीं उतरी होंगी। बाद में इनकी बाज़ हदीसों को मेहदी से ज़रूर जोड़ा गया हैं. इन 3 के बाद  फिर दूसरे, तीसरे, चौथे दर्जे की हदीस की किताबों में मेहदी की हदीसें ज्यादतर या तो मौजू हैं या बेहद जईफ. और जो  रिवायतें सहीह या  हसन हैं, वो सिर्फ 7 वाकयात हैं, जो सिर्फ 4 सहाबा से हैं और जब इन सहाबा ने इन्हें अलग - अलग तरह से बयान करा तो कुल 14 हदीसें बन गई। मदीना के मुहद्दिस जिया आज़मी साहब की अल जामी अल कामिल में यहीं 14 लिखे हुए हैं। इन्हें सभी मुहद्दिसों की कुबूल करी गयी रिवायतें हैं. इनमें भी यही वाक्यात हैं (बस इनमें 2 सहाबी/सहबिया ह. अली और उम्मे सलमा जायद हैं. मगर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता). अगर ये वाकई सच हो गयी तो वाकई नबी की बात थी और नहीं हुई तो ये उनकी तरफ मंसूब करी गयी गलत बात होगी. 

मेहदी की बाज़ हदीसों को तवातुर का लकब देना सही नहीं है. महदी की रिवायतों को कुरान-सुन्नत जैसे तवातुर के बराबर नहीं माना जा सकता और ना ही हदीसों को तवातुर का लकब देना चाहिए. ये लकब कुरान के लिए है. मेहदी की रिवायतों पर इज्मा है, ऐसा भी नहीं कहना चाहिए, बल्कि ये कहना चाहिए कि इस मौकिफ को शोहरत हासिल है. क्योंकि इस मौजू पर इख्तिलाफ तो हमेशा मौजूद रहे हैं. 

मेहदी के मायने है, हिदायत याफ्ता. एक हदीस में खुलफा ए रशीदीन के लिए भी ये लफ्ज़ इस्तेमाल हुआ है (जो मेरे बाद खुलफा अल राशीदीन और अल मेहदीइन होंगे उनकी पैरवी करना). ये सभी खलीफा हिदायत पाए हुए थे. आइन्दा हक पर हुए हुक्मरान भी मेहदी हो सकता है. मेहदी नाम या लकब के कोई 50-60 बड़े हुक्मरान, उलेमा, बड़ी शक्सियात और झूठे दावेदार हो चुके हैं. यंहा तक कि अब्बासियों में एक खलीफा भी मेहदी नाम के हो चुके हैं. बाज़ उलेमा और इब्ने खलदून का रुझान यही है कि ये मेहदी वाली बात इन्ही के दौर में शोहरत पायी थी. बुखारी-मुस्लिम से साबित रिवायतों के मुताबिक सिर्फ यही काबिले कुबूल है कि नबी के बाद एक आदिल और फ़य्याज़ या न्यायप्रिय और दानवीर शासक होगा. ऐसा हुक्मरान अब्दुल्लाह बिन अज़ीज़ थे, वो मानन खलीफा ए मेहदीइन ही थे. उनका नाम मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह होना और उनका अहले बयत में से होना दुरुस्त बयान नहीं है.

हर दौर में मुजद्दिद पैदा होने वाली पेशनगोई का भी मेहदी से कोई वास्ता नहीं है, क्योंकि हर दौर में कोई न कोई बड़ी दीनी शक्सियत पैदा होती ही रहती है. कुरान की बात कि दीन पूरा का पूरा अल्लाह के लिए हो जाएगा, इसका ताल्लुक नबी की हुज्जत और उसके नतीजे से फैले दीन के गलबे से है.
 
1. मुस्लिम 2914 (3 तरीक): अबू सईद खुदरी की रिवायत है कि नबी ने फ़रमाया कि आखिरी ज़माने में/मेरे बाद एक खलीफा (हुक्मरान) होगा जो बिना माल को गिने हुए तकसीम करेगा/तुम्हारे हुक्मरानों में से एक हुक्मरान होगा जो लोगों को बिना शुमार किये भर -भर के माल देगा. 

[यहाँ मेहदी का ज़िक्र नहीं है. ऐसे बहुत से हुक्मरान हुए हैं और आइन्दा किसी भी मुस्लिम देश में  भी हो सकते हैं.]

2. मुस्लिम 2913: जाबिर बिन अब्दुल्लाह से रिवायत है कि नबी ने फ़रमाया कि वो वक़्त करीब है जब अहले इराक के पास कोई माल-दौलत नहीं आएगी क्योंकि अजम की तरफ से इन्हें रोक लिया जायेगा. अनकरीब अहले शाम के पास कोई माल-दौलत नहीं आएगी क्योंकि रोम की और से इन्हें रोक लिया जायेगा. मेरी उम्मत के आखिरी ज़माने में एक हुकुमरान होगा जो लोगों को बिना शुमार किये खूब माल अता करेगा.

[यहाँ भी मेहदी का ज़िक्र नहीं है. पहली हदीस वाली ही बात है जो लोगों ने नबी से शायद एक ही मजलिस में सुनी होगी.]

●Muslim 2913: Jabir bin Abdullah said it may happen that the people of Iraq may not send their Qafiz and Dirhams (their measures of food stuff and their money). The non-Arabs would prevent them. There is the possibility that the people of Syria may not send their Dinars and Mudds. He said this prevention would be made by the Romans. The Messenger said that there would be a caliph in the last (period) of my Ummah who would freely give handfuls of wealth to the people without counting it. I said to Abu Nadra and Abu al Ala: Do you mean Umar bin Abd al Aziz? They said: No (means he would be Imam Mahdi).

3. मुसनद अहमद 15127/मुस्लिम, किताबुल ईमान: जाबिर बिन अब्दुल्लाह की रिवायत है कि नबी ने फ़रमाया कि मेरी उम्मत का एक गिरोह मुसलसल हक पर कितआल करता रहेगा और क़यामत तक गालिब रहेगा और फिर ईसा नाजिल होंगे. फिर उस हक पर चलने वाले गिरोह का अमीर उनसे इमामत की दरखास्त करेगा और वो मना कर देंगे कि तुम इस उम्मत में बाज़ बाज़ के अमीर होंगे. 

[यहाँ भी मेहदी का ज़िक्र नहीं है. इमाम लफ्ज़, अमीर और हुक्मरान के लिए भी इस्तेमाल होता है. ये कोई भी अमीर या इमाम हो सकता है. पैगम्बर से इमामत की दरख्वास्त करना एक आम फितरी बात है.]

{ये हदीस हारिस बिन ओवसामा की मुसनद में भी है, जिसे इब्ने क़य्यिम ने भी नक़ल किया है. इसमें इमाम की जगह मेहदी लफ्ज़ आया है. सो सवाल उठता है कि इमाम मुस्लिम ने मेहदी लफ्ज़ क्यों नहीं कुबूल किया. यानि ये लफ्ज़ रिवातों में दाखिल हुआ है. यानि तफ्सीलात वाली रिवायतें, बुखारी मस्लिम ने नहीं ली, यानि इसमें नाम, खानदान, मुद्दत का ज़िक्र नहीं है. सवाल तफ्सीलात कुबूल करने का नहीं है बल्कि ये है कि बुखारी मुस्लिम ने इन तफ्सीलात को कुबूल क्यों नहीं किया? उन्होंने सिर्फ यही लिया जितनी बात वाक्यतन सही लगती है, जिसका मोटा मोटा मफहूम है नबी के बाद एक आदिल और फ़य्याज़ या न्यायप्रिय और दानवीर शासक होगा.}
 
4. 20841 (2 तरीक): अबू हुरेरा से रिवायत है कि नबी ने फ़रमाया कि जब ईसा आसमान से हकम के तौर पर तुम्हारे बीच नाजिल होंगे, उस वक़्त तुम में से ही कोई इमामत करेगा (ईमाम का मतलब नमाज़ का इमाम और हुकुमरान दोनों होता है)/ईसा तुम्हारे बीच नाजिल होंगे और वो तुम्हारे इमाम होंगे (दोनों मतलब इसमें सही बैठते हैं)

[यंहा भी मेहदी का ज़िक्र नहीं है. ये ऊपर वाली हदीस की ही बात है.] 
 
5. (3 तरीक): अब्दुल्लाह बिन मसूद  से रिवायत है कि नबी ने फ़रमाया कि दुनिया ख़त्म नहीं होगी/कयामत कायम नहीं होगी/ज़माना ख़त्म नहीं होगा कि मेरे अहले बयत में से एक शख्स आयेगा जिसका अपना और वालिद का नाम मेरे जैसा होगा/मेरा हमनाम होगा जो ज़मीन को इंसाफ से भर देगा जैसे पहले ज़ुल्म से भरी हुई थी/मेरे अहले बयत में से मेरा एक हमनाम "अरब का हुक्मरान" बनेगा. 

[यंहा भी मेहदी का ज़िक्र नहीं है. ऐसे बहुत से हुक्मरान हुए हैं और कोई आइन्दा भी हो सकता है.]

6. मुसनद अहमद 11130: अबू सईद खुदरी की रिवायत है कि नबी ने फ़रमाया कि क़यामत तब तक नहीं आएगी जब तक मेरे अहले बयत में से एक कुशादा पेशानी और ऊँची नाक वाला हुक्मरान नहीं बन जायेगा, उसका दौर 7/9 साल होगा. 

[यंहा भी मेहदी का ज़िक्र नहीं है. ये ऊपर वाली हदीस की ही बात है.] 

7. मुसतदरक अलहाकिम 8673: अबू सईद खुदरी की रिवायत है कि नबी ने फ़रमाया कि मेरी उम्मत के आखिरी दौर में मेहदी ज़ाहिर  होगा जिसके दौर में खूब बारिश होगी, ज़मीन खूब उगआएगी, मवेशी बहुत होंगे वगैरह, वो 7/8 साल रहेगा.

[इसमें पहली बार मेहदी का नाम आया है.]

 
 
Other Ahadith
 

 Masabih 5415: The last hour will not come before a man of Qahtan comes forth driving people with his stick.
 Dawood 4290 (Daif): A man called Al Harith, a farmer, will come forth from Ma Wara An Nahr whose army will be led by a man called Mansur (Mansoor) who will establish or consolidate things for Muhammad's family as Quraish consolidated them for Muhammad. Every believer must help him/ respond to his summons. 
 Dawud 4279: The religion will continue to be established till there are 12 Caliphs over you and the whole community will agree on each of them. All of them will belong to Quraysh

 
 Dawud 4282, 4283, 4285: If only one day of this world remained. Allah would lengthen that day, till He raised up in it a man who belongs to me or to my family/stock whose father's name is the same as my father's, who will fill the earth with equity and justice./ The world will not pass away before the Arabs are ruled by a man of my family whose name will be the same as mine.
 Musnad 11313, Mustadrak 8669: The Hour will not begin until the earth is filled with oppression, injustice, transgression and then there will emerge from my family one who will fill it with fairness and justice as it was filled with injustice and transgression.
 Majah 4085 (Hasan), Musnad 645 (Daif): Mahdi is one of us, the people of the Household/ Ahlalbait. Allah will rectify him in a single night.
 Majah 4086 (Daif): Mahdi will be one of the descendants of Fatimah.

 
 Mustadrak 4/557-558; 8673: At the end of the time of my Ummah, Mahdi will emerge. Allah will grant (for) him rain, the earth will bring forth its fruits/ vegetation, cattle/ livestock will increase, wealth will be distributed equally/ he will give a lot of money. The Ummah will become great. That will continue for 7 or 8 years/ He will rule for 7 or 8 years. 
 Tirmidhi 2232 (Daif): There will be a Mahdi who comes in my Ummah living (ruling) for 5 or 7 or 9 years.
 Majah 4083 (Daif): Mahdi will be among my nation. If he lives for a short period it will be 7 and if he lives for a long period, it will be 9, during which my nation will enjoy a time of unprecedented ease. Then the wealth will be piled up.
 Dawud 4286 (Daif): Disagreement will occur at the death of a caliph and a man of the people of Medina will come flying forth to Mecca. Some of the people of Mecca will come to him, bring him out against his will and swear allegiance to him between the Corner and the Maqam. An expeditionary force will then be sent against him from Syria but will be swallowed up in the desert between Mecca and Medina. When the people see that, the eminent saints of Syria and the best people of Iraq will come to him and swear allegiance to him between the Corner and the Maqam. Then there will arise a man of Quraysh whose maternal uncles belong to Kalb and send against them an expeditionary force which will be overcome by them and that is the expedition of Kalb. Disappointed will be the one who does not receive the booty of Kalb. He will divide the property and will govern the people by the Sunnah of their Prophet and establish Islam on Earth. He will remain 7 or 9 years then die and the Muslims will pray over him.
 Tabarani's Al Mujam AlKabir 8/101 (Weak), Musnad Ash Shamiyyin 2/410 (Weak): Between you and the Byzantines there will be 4 truces and the 4th  will be concluded by a man from the family of Heraclius (may be Prophet Haroon) which will last for 7 years. The leader will be a 40 year old man with a face like a shining star, on whose right cheek will be a black mole, and he will be wearing two white velvet Abayahs (may be Qutwani cloaks) as if he is one of the Children of Israel. He will rule for 20 years and bring forth treasures and will conquer the cities of the polytheists.
 Naim ibn Hammad's Al Fitan 1/365 (Weak): Mahdi will appear when he is 40 years old, looking like a man from among the Children of Israel.
 Ad Dani's As Sunan Al Waridah fil Fitan 5/1074 (Weak): Mahdi will be 40 years old and he will do the deeds of the Children of Israel. If it is not Umar then I do not know who it will be.

 Mishkat 546, Musnad, Baihaqi: When you see the black standards have come from the direction of Khurasan go to them, for God's Khalifa the Mahdi will be among them.
 Majah 4088 (Daif): People will come from the East, paving the way for Mahdi (for his rule).

 
Ahadith which presumably refer to Mahdi
 

 Ahadith: Isa will descend and their leader (considered as Mahdi) will say, Come and lead us in prayer but he will say, No, some of you are leaders over others as an honour from Allah to this Ummah.
[Name Mahdi is not named in these 
Ahadith but in other Ahadith such as the one recorded by Abu Naim in his Musnad which is declared Good by Ibn Al Qayyim in his Naqd al-Manqul at page 87]

 Muslim 2913,  Musnad 3/38, 317, 333: Jabir b. Abdullah narrated that Prophet said that there would be a caliph in the last (period) of my Ummah who would freely give handfuls of wealth to the people without counting it. On this, one Sahaba asked: Do you mean Umar b. Abd al Aziz? It was replied: No (because it was considered as Mahdi).

 Ahmad 6/316, Ibn Abi Shaybah's Al Musanaf 14/ 45, 46, At Tabarani's Al Awsat 9613, Al Haithami's Mujma Az Zawaid (7/315) declared it trustworthy: Umm Salamah said that after the death of a Ruler there will be some dispute between the people. So a citizen of Madinah will flee and go to Makkah. While in Makkah, certain people will approach him between Hajral Aswad and Maqaame Ibrahim, and forcefully pledge their allegiance to him. Thereafter, a huge army will proceed from Syria to attack him but when they will be at the Baidah desert, which is between Makkah and Madinah, there they will be swallowed into the ground. On seeing this, the Abdaals of Shaam as well as large numbers of people from Iraq will come to him and pledge their allegiance. Then a person from the Quraish, whose uncle will be from the Bani Kalb tribe, will send an army to attack him, only to be overpowered. This (defeated) army will be that of the Bani Kalb. Unfortunate indeed is he who does not receive a share from the booty of the Kalb. This person (considered as Mahdi) will distribute the spoils of war after the battle. He will lead the people according to the way of the Prophet, and during his reign Islam will spread throughout the world. He will stay for 7 years (from his emergence). He will pass away and the Muslims will perform his Janazah Salaat.
  
 
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उमर इब्न अब्द अल अज़ीज़ इब्न मरवान 
 
उमर इब्न अब्द अल अज़ीज़ इब्न मरवान (680-720 AD) उमय्यद वंश के आठवें और कुल मिलाकर बारहवें ख़लीफ़ा थे, जिन्होंने लगभग 2.25 वर्ष (717-720 AD) तक शासन किया। उमय्यद या बनू उमय्या मक्का के कुरैश कबीले का एक खानदान था, जो उमय्या से शुरू हुआ था। इसी वंश से ह. उस्मान ख़लीफ़ा बने, फिर मुआविया-I, फिर यज़ीद-I, फिर मरवान-I, और उसके बाद वलीद-I आदि ख़लीफ़ा हुए।
 
सुफ़यानी
 
शिया हदीसें सुफ़यानी के बारे में भरी पड़ी हैं। मगर सुन्नी रिवायतों (सेहत पर मुहद्दिसों में इख्तिलाफे राय है) में इसका ना के बराबर ज़िक्र है. ये एक तानाशाह मिलिट्री कमांडर होगा.
 
■ मुस्तद्रक अल हकीम: 8586 या 4/520दमिश्क से एक सुफ़यानी (Sufiyaani) नाम का आदमी निकलेगा। उसके पीछे चलने वालों में ज़्यादातर कल्ब कबीले के होंगे। वह औरतों के पेट फाड़कर क़त्लेआम करेगा और बच्चों को भी मार डालेगा। मेरे (मुहम्मद सल्ल.) ख़ानदान का एक आदमी (महदी) हरम में आएगा, उसके आने की ख़बर सुफ़यानी तक पहुँचेगी और वह अपनी एक फ़ौज उसके पास भेजेगा। वह (महदी) उन्हें हरा देगा। फिर जो बचेगा उसके साथ वे सफ़र करेंगे यहाँ तक कि रेगिस्तान में पहुँच जाएँगे और निगल लिए जाएँगे।

शिया रिवायतों के मुताबिक, जब सूफ़ियानी को महदी के बारे में पता चलेगा, तो वह और उसकी सेना इराक की ओर उस पर हमला करने के लिए जाएगी। जब उसकी सेना बैदा (Bayda), मक्का और मदीना के बीच एक रेगिस्तानी क्षेत्र में प्रवेश करेगी तो खसफ अलबैदा की घटना होगी जिसमे उसकी सेना के साथ धरती बैदा को निगल लेगी।
 
जैसा कंटेंट शिया साहित्य में सुफ़यानी पर है, अगर इसने आके यही सच्ची-झूठी पेशनगोईयां (जो इतनी मशहूर हो चुकी हैं) बिल्कुल कदम दर कदम दोहराई तो इससे बड़ा बेवकूफ कोई इंसान नहीं हो सकता (दज्जाल की तरह ही)। इस तरीक़े से ऐसा इंसान कैसे दुनिया को धोखा देगा?  
 
 
 एक अल्लाह वाले की आमद के बारे में पेशनगोईयां (हजीज/खदिर)

 Muslim 249: The Prophet came to the graveyard and said: The abode of the believing people and we are about to join you. I love to see my brothers (Ikhwan-e-Rasool). People said: Are not we your brothers? He said: You are my companions and our brothers are those who have, so far, not come into the world. People said: How would you recognize those persons of your Ummah who have not yet been born? He said: They would come with white faces and arms and legs owing to ablution, and I would arrive at the Cistern before them. 

[It is said to be about Dayee or Fighters according to different views]

■ Muslim 2937An individual will arise (Hajeej) and will put an end to the menace of Dajjal by using scientific evidence. He will prove the Dajjal's arguments baseless by putting forward superior arguments at the ideological level.

[No such text is found at this number. Hadith on this number talks about a person which is same as talked about in Muslim 2938, also given below]

■ Muslim 2938: A person who would be the best of men or one from amongst the best of men would say to Dajjal: I bear testimony that you are Dajjal. Dajjal would kill this person and then bring him back to life. Then the man would say: I had no better proof that you are a Dajjal. The Dajjal would then make an attempt to kill him again but he would not be able to do that. It was said that person would be Khadir. He would be the most eminent amongst persons in regard to martyrdom in the eye of the Lord of the world.

[In these Ahadith, this man does not seem to be an extra ordinary man like Mehadi or Isaa as believed.]

 

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मक़ाम-ए-महमूद 

  
नबी के लिये मकामे महमूद की बशारत कुरान में दी गयी है. आम तौर पर इसे एक जन्नत में मकाम माना जाता है. इसका मतलब है कि नबी जब कयामत में उठेंगे तो हर तरफ आपकी तारीफ हो रही होगी, यही उनका मकामे महमूद है. इसके अलावा, मकामे महमूद से मुराद, एतिहसिक तौर पर नबी को मिली इतनी बड़ी नबूवत, एकनोलेजेड प्रोफेट, फोलोवरशिप वगैरह से भी ली जाती है जो ता कयामत तक रहेगी, इतना महत्व उनसे पहले इतिहास में किसी को कभी नहीं मिला. उनसे पहले राजा-महाराजों का इतिहास, महत्व होता था. 
 
■ क़ुरआन (17:79): रात के एक हिस्से में उठकर, इस (क़ुरआन) के साथ, तहज्जुद अदा करो, जो तुम्हारे लिए एक ज़ायद (नफ़्ल) है। आशा है कि  तुम्हारा रब तुम्हें मक़ाम-ए-महमूद  पर पहुंचा दे।/ And from the night, arise from sleep for Tahajjud, with it, additional for you, it may be that your lord will raise you to Maqaman Mahmudan (a station/position of glory/highly praiseworthy/highest degree in Paradise/privilege of intercession).
■ बुखारी 1474, 1475: पैगंबर ने कहा, क़यामत के दिन लोग आदम से मदद मांगेंगे, फिर मूसा से और फिर मुहम्मद से। रावी ने आगे कहा "मुहम्मद सल्ल. लोगों के बीच न्याय करने के लिए अल्लाह से सिफ़ारिश करेंगे। वह तब तक आगे बढ़ेंगे जब तक कि वह जन्नत के दरवाज़े की घंटी नहीं पकड़ लेते और फिर अल्लाह उन्हें मक़ाम-ए-महमूद तक पहुँचा देंगे।
■ तिर्मिज़ी 3148 (हसन - दारुस्सलाम): (जब कलोगों ने कुछ महान नबियों से अल्लाह के पास लोगों के लिए सिफ़ारिश करने की दरख्वास्त करी तो) नबी ने कहा: तो मैं जन्नत के दरवाज़े की घंटी बजाऊंगा और वह मेरे लिए खोल दिया जाएगा। वंहा अल्लाह मुझसे कहेंगे: मांगो, तुम्हें दिया जाएगा, सिफ़ारिश करो, तुम्हारी सिफ़ारिश स्वीकार की जाएगी। यह अल-मक़ाम अल-महमूद है जिसके बारे में अल्लाह (कुरान में) ने कहा: हो सकता है कि तुम्हारा रब तुम्हें मक़ाम-ए-महमूद तक उठा ले।
■ हदीस: तमाम इन्सान एक मैदान में एकत्रित किये जाएंगे (इस समय सारी ज़मीन एक मैदान के समान है) नंगे पैर और नंगे शरीर (बहुत ख़्स्ता हाल में) जैसे कि वह पैदा किये गए थे। कोई अल्लाह की इजाज़त के बगैर बोल नहीं सकेगा। आवाज़ आएगी कि ऐ मुहम्मद ! आप स. जवाब देंगे: ''मैं हाज़िर हूँ, हर आदेश के लिये हाज़िर हूँ, भलाई तेरे हाथों में है और बुराई का तुझ तक गुज़र नहीं, और महदी वह है जिसे तू ने हिदायत दी और वह तेरा (यही) बन्दा तेरे सामने है और तुझ पर (आश्रित) और तेरी ओर (केन्द्रित) है। तेरे सिवा कहीं पनाह नहीं और तेरे सिवा कोई नजात देने वाला नहीं। तू बरकत वाला और बलन्द है, दोष रहित, ऐ काबे के रब्ब।'' सो यह मक़ाम-ए-महमूद है (नसाई, हाकिम व अन्यों ने यह हदीस नकल की है और हाकिम ने इसे सही ठहराया है).
 
[ये एक जन्नती मक़ाम मालूम पड़ता है.]


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 हक़ीक़त-ए-अहमदी
 
■ कुरान (61:6): ईसा ने कहा कि मैं तौरात की पुष्टि करता हूँ जो मुझसे पहले से विद्यमान है और एक रसूल की शुभ सूचना देता हूँ जो मेरे बाद आएगा, उसका नाम अहमद होगा।
■ बुखारी (3532), मुस्लिम (2354), मुसनद अहमद: मुहम्मद सल्ल. ने कहा, मेरे नामों में से एक नाम, अहमद है।
 
[कुरान में बयान हुआ है कि ह. ईसा ने अपने बाद आने वाले एक अहमद नामक नबी की भविष्यवाणी करी थी. हदीसों से वाजेह है कि यह मुहम्मद सल्ल. के बारे में थी और उनका नाम अहमद भी है. मगर क्योंकि नबी को किसी ने कभी भी अहमद नाम से नहीं पुकारा. ऐसा माना जाता है कि ईसा ने ये नाम अपनी जुबान के मुताबिक नहीं बल्कि अरबी या मुहम्मद सल्ल. की जुबान के मुताबिक बताया था. असल में ये नाम नहीं बल्कि एक लकब है. जैसे ह. युसूफ का एक और नाम या लकब इस्राईल भी था मगर कभी किसी ने उन्हें इस नाम से नहीं पुकारा. अहमद के मायने होते हैं जो अल्लाह की सबसे ज्यादा तारीफ करे या जिसकी सबसे ज्यादा तारीफ करी जाए (मुहम्मद के भी यही मायने हैं). बाइबिल में इसके समानांतर Periclytos (the praised one) लफ्ज़ इस्तेमाल हुआ है. क्योंकि ईसा ने एक भविष्य की खबर दी थी इसलिए वो इसमें एक लकब ही बयान करेंगे, ना कि वो आइन्दा नाम जो माँ-बाप को रखना है. हमें ऐसे उदाहरण और भी मिल जाते हैं जैसे नराशंस, महामद, जातवेद (जन्मजात ज्ञानी), अग्नि आदि नामक लकब के साथ हिन्दू ग्रंथों में भविष्यवाणीयाँ आई हैं. इसलिए यही मत ज्यादा तार्किक लगता है.]
 
  
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[ईमाम मेहदी की शक्सियत और मुहम्मद सल्ल. के रूहानी ज़हूर में दिए जाने वाले दलाईल]

 
हकीकत-ए-मुहम्मदी, हकीकत-ए-अहमदी, नूर-ए-मुहम्मदी/ मक़ाम-ए-महदी/ मक़ाम-ए-महमूद/ हकीकत-ए-काबा/ क़यामत-ए-कुबरा, क़यामत-ए-सुग़रा
  
अहमद सरहिंदी उर्फ़ मुजददिद अल्फसानी (1564–1625) ने फ़रमाया है कि नबी कि विलादत के एक हज़ार साल से कुछ ज्यादा अरसा नहीं गुजरेगा कि हकीकत-ए-मुहम्मदी, हकीकत-ए-अहमदी में बदल जाएगी. क़ुरान पैगंबर को नूर और बशर कहता है। सूफ़ी परंपराओं के अनुसार, ईश्वर ने सबसे पहले मुहम्मद सल्ल. के नूर (प्रकाश) की रचना की और उस प्रकाश से संपूर्ण ब्रह्मांड अस्तित्व में आया। इसे नूर-ए-मुहम्मदी कहते हैं.  उनकी यह स्तिथि ही हकीकत-ए-मुहम्मदी है. उनके पृथ्वी पर भौतिक रूप में जन्म लेने से पहले, उनकी मौलिक आध्यात्मिक या वास्तविकता (रूहानी वजूद) हकीकत-ए-अहमदी कहलाती है. इसलिए हकीकत-ए-अहमदी पैगम्बर मुहम्मद का आसमानी नाम माना जाता है. मक़ाम-ए-महदी इमाम महदी के आध्यात्मिक और अंतिम काल को संदर्भित करता है. मक़ाम-ए-महमूद (जन्नत में) सबसे ऊंचा आध्यात्मिक पद है जो पैगंबर मुहम्मद को मिलेगा. इसी तरह हकीकत-ए-काबा, काबा के ढांचे का नाम नहीं है. जैसे जिस्म के अलवा भी इन्सान का एक रूहानी वजूद है. उसी तरह हकीकत-ए-काबा उसकी रूह है. हदीसों में आता है की क़यामत में काबा उठा लिया जायेगा यानी उसकी रूह को, इमारत को नही. क़यामत-ए-कुबरा का मतलब आखिरत वाली क़यामत है और क़यामत-ए-सुग़रा वह काल, स्तिथि और घटनाएँ है जो किसी व्यक्ति की मृत्यु और पुनरुत्थान के बीच घटित होती हैं.
 
 
■ इस्लामी स्रोतों में कहा गया है कि मुहम्मद स. तब से पैगम्बर थे, जब आदम पानी और मिट्टी के बीच में थे।/ He was a Prophet while Adam was between water and clay.
■ तिर्मिज़ी 3609 (सहीह - दारुस्सलाम): लोगों ने पैगम्बर से पूछा, आपके लिए पैगम्बरी कब स्थापित हुई? उन्होंने कहा: जब आदम आत्मा और शरीर के बीच में थे।
■ माजह 3546 (जईफ़ - दारुस्सलाम): लोगों ने पैगम्बर से कहा, हर साल आप उस ज़हरीले मांस के कारण दर्द से पीड़ित रहते हैं, जो आपने खाया था। उन्होंने कहा: मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं होता है जो मेरे लिए तब ही तय नहीं कर दिया गया था जब आदम मिट्टी की अवस्था में ही थे।

[ऐसा लगता है कि यह कद्र के बारे में बात हो रही है, जो अल्लाह ने पहले दिन से ही तय कर दी थी।]


■ एक (कमज़ोर/अप्रमाणिक) हदीस में कहा गया है कि पैगंबर ने कहा कि सबसे पहली चीज़ जो अल्लाह ने बनाई वह मेरी रोशनी/तुम्हारे पैगंबर की रोशनी थी।/ The light of your Prophet (my light).
■ मिश्कात (5734) और मुस्लिम: पैगंबर ने कहा: अल्लाह ने शनिवार को पृथ्वी बनाई, रविवार को उसमें पहाड़ बनाए, सोमवार को पेड़ बनाए, मंगलवार को उनको बनाया जो आपत्तिजनक (objectionable) हैं, बुधवार को रोशनी (light) बनाई, गुरुवार को पृथ्वी में जानवरों को और सृष्टि के अंत में आदम को बनाया, शुक्रवार को दोपहर में और दोपहर और रात के बीच में आखिरी घंटे में।

[लेकिन इस हदीस के अनुसार प्रकाश पहली चीज़ नहीं थी बल्कि बाद में बनाई जाने वाली चीज़ों में से थी। यह सूरज भी नहीं हो सकता. इसलिए ये किसी गैर मामूली रौशनी की बात लगती है.]

 
■ कुरान (24:35): अल्लाह आसमानों और ज़मीन का प्रकाश है।
■ क़ुरान (64:8): अल्लाह, उसके रसूल में यकीन करो और उस प्रकाश (क़ुरान) में जो उसने नाज़िल है।
■ कुरान (5:15): अब तुम्हारे पास ईश्वर की ओर से एक प्रकाश (मुहम्मद सल्ल.) आ गया है और एक स्पष्ट किताब.
■ कुरान (33:46): वह जो ईश्वर की अनुमति से और एक दीप के प्रकाश (lamp light) के रूप में ईश्वर की ओर बुलाता है।
■ मुस्नद, तिर्मिज़ी, माजा और हिब्बान: सहाबा ने कहा कि जब पैगंबर ने पहली बार मदीना में प्रवेश किया, तो उन्होंने इसमें सब कुछ प्रकाशमय कर दिया, और जब उनकी मृत्यु हुई तो प्रकाश गायब हो गया।
■ हिशाम की सीराह, तबरी की तारीख: पैगंबर ने कहा कि जब मेरी माँ ने गर्भ धारण किया, तो उसने एक प्रकाश देखा जिसने सीरिया में बोसरा (Bosra) के महलों को प्रकाशमय कर दिया।

[ये सभी अलंकारिक बयान मालूम पड़ते हैं।]

नूर मतलब वो चीज़ होती है जो खुद चमकदार हो और दूसरों को भी रोशन कर दे। इसीलिए सभी ज़ुबानों में सूरज, चांद, महान लोगों वगैरह को नूर, रोशनी, प्रकाश का प्रतीक कहा जाता है। क़ुरान (14:1) में अल्लाह ने मुहम्मद सल्ल. को लोगों को अंधेरे में से निकाल कर रोशनी (नूर) में लेके आने वाला बताया है। क्योंकि नबी लोगों को ईमान, हिदायत की रोशनी में लेके आये। क़ुरान ने कई जगह नबी को बशर और आम इन्सानों सा करार दिया है, बल्कि ये तक इंडिरेक्टली बताया है कि नबी फरिश्तों से नहीं है (25:7), जो कि नूर से पैदा हुए हैं। इसलिए नबी को तमसीली तौर पर नूर कहा जा सकता है मगर माद्दी तौर पर नहीं। यानी वो नूर हैं मगर नूर से पैदा नहीं हैं। क़ुरान में कंहीं नहीं कहा गया कि नबी क़ायनात से पहले एक नूर थे या क़ायनात उनके नूर से बनी है। इस बारे में एक कमज़ोर रिवायत ह. जाबिर वाली पेश करी जाती है जिसमें कहा गया है कि सबसे पहले अल्लाह ने मुहम्मद सल्ल. के नूर को पैदा किया (फिर इस नूर से क़ायनात को पैदा किया)। बहुत से मुहद्दिसों के नज़दीक ये हदीस झूठी है (जैसे शेख अल्बानी ने अल सिलसिलाह अल सहीहा: 458 में कहा)। इसका मतन को भी क़ुरान के खिलाफ करार दिया गया है। इसके एक तुर्क में तो यह तक कहा गया है कि अल्लाह ने अपने नूर का एक हिस्सा लिया और उससे नबी पाक को बनाया और फिर उससे क़ायनात को बनाया। क्या इसका मतलब ये नहीं निकलेगा कि अल्लाह या नबी के नूर से दुनिया की तमाम गंदी- गलीज़ चीज़ें बनाई गई हैं? असल में यह सब वाहदतुल वजूद वाले लोगों की करी गयी कारस्तानी थी ताकि ये साबित करा जा सके कि क़ायनात नूरे नबी है और नूरे नबी नूरूल्लाह है और हर चीज़ ही अल्लाह है (हिन्दू दर्शन की तरह)।

 
■ कुरान (28:85): जिसने इस क़ुरआन की ज़िम्मेदारी तुम पर डाली है, वह तुम्हें 'लौटाने की जगह' या 'लौटाने के जमाने' तक ज़रूर लौटाएगा./ He who ordained upon you the Quran, surely take you back to a place of return (maadin) or good fate.

{यंहा आये लफ्ज़ मआद के मायने है, लौटाना, लौटाने की जगह, लौटाने का ज़माना/to return,  place or time to return~ इमाम रागिब की लुगत}

[पर यंहा पहले से ही आखिरत की बात चल रही है. पिछली आयात में भी कहा गया है कि The good end or triumphant fate is for the righteous. इसलिए ये अपनी बारगाह में वापिस बुलाने की बात लगती है]


■ कुरान (21:95-96): एक बस्ती पर (के लिए) नामुमकिन है, जिसे हमने विनाश कर दिया कि वे (उसके लोग) वापिस ना लौटें (यानी उनका वापिस आना लाज़मी है)। यहाँ तक कि वह समय आ जाए जब याजूज और माजूज खोल दिए जाएँगे। और वे हर ऊँची जगह से निकल पड़ेंगे./ There is prohibition upon a city which We have destroyed, that they will not return. Until when Gog and Magog has been opened and they descend from every elevation.
 
{ये बरमूडा ट्रायंगल में डूबी हुई बस्ती मानी जाती है}
 
[This verse means that for whichever community, We have destined destruction, it is forbidden for them to turn to the truth because they shall never turn to it until God-Magog are let loose and they launch an attack from every high place. Further, the style of this Surah is called Return to Beginning. The address of the Prophet were facing an established practice of God i.e destruction for the stubbornness. That is why they would reach the same fate which was met by earlier similar nations.]


■ कुरान 93: 4-5: अवश्य ही बाद में आनेवाला (walalakhiratu) तुम्हारे लिए पहले वाले (ula) से बेहतर है।  शीघ्र ही तुम्हारा रब तुम्हें प्रदान करेगा कि तुम प्रसन्न हो जाओगे।

[पर ये नबी के शुरवाती और आखिरी दिनों या अंत में नेमतों का ज़िक्र लगता है यानी मक्की और मादिनी दौर का]


■ मिश्कात 5764/ दारीमी: मैं रसूलों का सरदार (क़ायद) हूँ, मैं नबियों का मुहर हूँ, मैं सबसे पहले सिफ़ारिश करूँगा और सबसे पहले मेरी सिफ़ारिश स्वीकार की जाएगी।
■ मुस्लिम 2278/ दाऊद 4673/ तिर्मिज़ी 3615, 3616/ मिश्कात 5744, 5761,5762: मैं क़ियामत के दिन आदम की औलाद में अव्वल होऊँगा। मैं पहला सिफ़ारिश करने वाला हूँगा और पहला जिसकी सिफ़ारिश अल्लाह को क़बूल होगी। किसी नबी पर मुझ जितना ईमान नहीं लाया गया। क़ियामत के दिन मैं प्रशंसा का झंडा (banner of praise) उठाऊँगा जिसके नीचे आदम और अन्य लोग होंगे। उस दिन कोई ऐसा नबी नहीं होगा, न आदम और न कोई और कोई, सब मेरे झंडे के नीचे होंगे.
 
[इनसे नबी की आखिरत में सिर्फ फ़ज़ीलत ज़ाहिर होती है. मगर अपनी ज़िन्दगी के दौरान ही नबी ने सहाबा को पैगम्बरों के बीच बरतरी की बहसें करने को माना फरमा दिया था. तो फिर क्या हदीसें काबिले कुबूल हैं?] 
 
 
■ हदीस (तबरानी): रसूलुल्लाह स. को इख़तियार दिया गया था कि आप बादशाहत वाली नबुव्वत चाहते हैं या बन्दगी वाली, ह. जिब्रईल ने आप को विनम्रता का इशारा दिया तो आपने तीन बार फरमाया: नहीं, मैं बन्दगी वाली नबुव्वत चाहता हूँ (इसी मज़मून की रिवायत बग़वी ने शरहुस्सुन्नह में ह. आयशा से की है)
■ हदीस (बुखारी, मुस्लिम): रसूलुल्लाह ने (वफात से चन्द दिन पहले) फरमाया कि बेशक मुझे ज़मीन के ख़ज़ानों की कुन्जियाँ अता की गईं हैं।
■ 
हदीस (बुखारी, मुस्लिम): रसूलुल्लाह ने फरमाया कि मुझे जामे कलिमात के साथ भेजा गया है और मुझे रोअब के साथ नुसरत प्रदान की गई है।
■ हदीस (मुसनद अहमद): रसूलुल्लाह ने फरमाया कि मेरी मदद दुश्मनों के दिलों में डर डालकर करी गयी है और मुझे ज़मीन के ख़ज़ानों की कुन्जियाँ अता की गईं हैं, मेरा नाम अहमद है, सारी धरती मेरे लिए पाक बना दी गयी है और मेरी उम्मत को तमाम उम्मतों से बेहतर बनगया गया है (शायद यंहा दो हदीसों - कुंजियों और अहमद नाम वाली का मतन, अल्लामा साहब ने साथ जोड़ दिया है, समझाने के ऐतबार से)।
 
[इन हदीसों से कुछ ख़ास साबित होता हुआ नहीं लगता है, सिवाए नबी को दुनिया और आखिरत में मिलने वाले गलबे के]
 

■ हदीस: रसूलुल्लाह की वफात के मौके पर ह. उमर तलवार लेकर खड़े हो गए और कहने लगे कि जो यह कहेगा कि आप की मौत हो गई मैं उस की गरदन उड़ा दूँगा। आप वापिस आएंगे जैसे मूसा कोहे तूर से वापिस आए थे और अल्लाह की कसम मुनाफिकीन के हाथ पैर काटेंगे।
■ हदीस 
(बुखारी) रसूलुल्लाह की वफात के बाद ह. अबूबक्र र. ने आप की पेशानी को बोसा दिया और कहा: अल्लाह आप पर दो मौतें जमा नहीं फरमाएगा। आप के लिये बस यही मौत लिखी थी और वह घटित हो गई। ■ हदीस: (इब्नुल अस्काफ ने पसन्दीदा सनद से ह. जाबिर बिन अब्दुल्लाह से रिवायत करी कि) जिस ने दज्जाल को झुठलाया उस ने कुफ्र किया और जिस ने महदी को झुठलाया उस ने कुफ्र किया.

[इन सभी हदीसों में जज्बात बयान हो रहे हैं, आखिरत के बारे में बन चुके तसव्वुरात से जोड़ते हुए.】
 
 
 
ह. ईसा और मुहम्मद सल्ल.की मुशाबिहत और उनके दरमयान कोई नबी नहीं?
 
■ हदीस: मुहम्मद सल्ल. ने फरमाया की मैं और क़यामत, इन दो उँगलियों (शाहदत और बीच वाली) के सामान भेजे गए हैं. 
■ हदीस: मुहम्मद सल्ल. ने फरमाया कि मैं और ईसा, इन दो उँगलियों (शाहदत और बीच वाली) की तरह हैं. 
■ हदीस (बुखारी, मुस्लिम): मुहम्मद सल्ल. ने फरमाया कि मैं अव्वल और आख़िर में ईसा इब्ने मरियम के सब से करीब और संबंधित हूँ।

[
ऐसा लगता है कि नबी की ऐसी एक बात से ही ये हदीस अलग नामों के साथ बयान कर दी गयी है. आमतौर पर यह माना जाता है कि इस हदीस का मतलब है कि ईसा और मुहम्मद सल्ल. के बीच कोई नबी नहीं है. मगर इससे ईसा और मुहम्मद सल्ल. के करीबतरीन ज़माना होने से भी मुराद ली जाती है.]

असल में एक आयात और एक हदीस की बुनियाद पर ये माना जाता है कि ईसा और मुहम्मद सल्ल. के दरमयान कोई नबी नहीं थे. पर इनकी गहराई से देखें तो ऐसा लगता है कि शायद ऐसे नहीं है और ये दोनों दुनिया के नहीं, बल्कि सिर्फ एक खास कौम या इलाके में आये दो लगातार पैगम्बर हों

●कुरान 5:19: ऐ एहले किताब हमारा रसूल ऐसे समय में तुम्हारे पास आया है और तुम्हारे सामने खोलकर बयान कर रहा है जबकि रसूलों के आने का सिलसिला रुक गया था.
 
[पहली चीज़ यंहा रसूलो के आने का ज़िक्र है, ना कि नबी इसलिए कोई न कोई नबी ह. ईसा-मुहम्मद सल्ल के दरमयान हो सकता हैं. दूसरी चीज़ कि ये बात बनी इस्राईल के लिए कही जा रही है, ना कि दुनिया की दूसरी कौमों या स्थानों के लिए]

Bukhari 3442 & Dawud 4324 (Sahih by Albani): The Prophet said that there is no prophet between me and Isaa.
 
[यंहा नबी लफ्ज़ का ज़िक्र है. मगर हो सकता है कि शायद असलन यंहा रसूल लफ्ज़ का ही नबी ने ईस्तमाल किया हो जो बाद में 'दो उँगलियों' वाली हदीस के साथ मिलकर इन अलफ़ाज़ में ढल गयी हो या फिर ये बात सिर्फ ख़ास अरब इलाके या बनी इस्राईल-इस्माइल कौमों के बारे में बयान हो]

 
■ कुरान (3:81): याद करो जब अल्लाह ने नबियों (nabiyinaसे वचन लिया था, मैंने तुम्हें जो कुछ किताब और हिकमत प्रदान की, इसके पश्चात तुम्हारे पास कोई रसूल (rasulun) उसकी पुष्टि करता हुआ आए, जो तुम्हारे पास मौजूद है, तो तुम अवश्य उस पर ईमान लाओगे और निश्चय ही उसकी सहायता (नुसरत) करोगे। कहा, क्या तुमने इक़रार किया? इस पर मेरी ओर से डाली हुई ज़िम्मेदारी को बोझ उठाया? उन्होंने कहा, हमने इक़रार किया। कहा, अच्छा तो गवाह रहो और मैं भी तुम्हारे साथ गवाह हूँ।
 
{इससे मुराद ली जाती है कि हर नबी अपनी कौम का प्रतिनिधी होता है तो हर कौम रसूल की मदद करनी होगी. मगर जब हर नबी से अहद लिया तो फिर उनकी उम्मते भी तो मुहम्मद साहब तक जिंदा रहनी चाहिये थी. इसके अलावा अहदे अलस्त में मौके पर भी अल्लाह को हर इन्सान से नहीं बल्कि उनके प्रतिनिधि नबियों से अहद लेना चाहिए थे.}
 
[मगर इससे ऐसा लगता है कि अहदे अलस्त के मौके पर लिया गया वादा है कि बाज़ नबियों के दौर में अगर अल्लाह का फैसला लिए कोई रसूल आता है तो उनकी मदद करनी है जैसे ह. याह्या के वक़्त में ईसा अलैह. और हारुन के वक़्त में मूसा का आगमन हुआ था. हम जानते हैं कि किसी कौम के पास एक ही समय में नबी और रसूल एक साथ हो सकते थे बल्कि कई रसूल भी एक साथ हो सकते थे जैसे ह.नूह के बारे में कुरान इशारा देता है.]


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दुसरे धर्मों में मौजूद सम्बंधित भविष्यवाणियां

 
Christian Sources
 
■ Bible: Haggai 2:6-9: This is what the God says: In a little while I will once more shake the heavens, earth, sea and the dry land. I will shake all nations and what is desired by all nations will come and I will fill this house with glory. The silver and gold is mine. The glory of this present house will be greater than of the former house. In this place, I will grant peace.

[दज्जाल और मेहदी की खबर]

 Bible: Haggai 2:6-9: This is what the Lord Almighty says: In a little while I will once more shake the heavens and the earth, the sea and the dry land. I will shake all nations, and what is desired by all nations will come, and I will fill this house with glory, says the Lord Almighty. The silver is mine and the gold is mine, declares the Lord Almighty. The "glory of this present house will be greater than the glory of the former house", says the Lord Almighty. And in this place I will grant peace, declares the Lord Almighty.
 
■ Bible: Malachi 3:1-2: (God says) I will send my messenger, who will prepare the way before me. Then suddenly, the Lord you are seeking, will come to his temple; the messenger of the covenant, whom you desire, will come, says the Lord Almighty. But who can endure the day of his coming? Who can stand when he appears? For he will be like a refiner’s fire or a launderer’s soap.

■ Bible: Revelation : 19: 11-12:  I saw heaven standing open and there before me was a white horse, whose rider is called 'Faithful and True'. With justice he judges and wages war. His eyes are like blazing fire, and on his head are many crowns. He has a name written on him that 'no one knows but he himself'.

{शिया परम्परा के मुताबिक, मेहदी का नाम लेने की इजाज़त नहीं है और शिया-सुन्नी दोनों असल नाम नहीं जानते}
 
■ Psalm 22:30-31: भविष्य में हमारे वंशज यहोवा की सेवा करेंगे। लोग सदा सर्वदा उस के बारे में बखानेंगे। वे लोग आयेंगे और परमेश्वर की भलाई का प्रचार करेंगे, जिनका अभी जन्म ही नहीं हुआ।

{कुरान की तरह ही बाइबिल में भी ऐसी ही भविष्यवाणी है}
 
 
Vedic Sources
  
■ ऋग्वेद (3:29:11): तनूनपा॑दुच्यते॒ गर्भ आसुरो नरा॒शंसतॊ भवति यद्विजाय॑ते। मात्रिश्वा यदर्मिमीत मातर वात॑स्य॒ सर्गो अभवत्सरींमणि।।
जिस अग्नि का व्यापक रूप कभी नष्ट नहीं होता उसे तनूनपात कहते हैं (पहला रूप)। जब वह साक्षात होते हैं तब आसुर और नराशंस कहलाते हैं (दूसरा रूप)। जब वह अन्तरिक्ष में अपने तेज को फैलाते हैं तब मातरिशवा होते हैं, जब वह प्रकट होते हैं तब वायु के समान होते हैं (तीसरा रूप)। 

■ ऋग्वेद (10:45:1): दि॒वस्परि॑ प्रथ॒मं ज॑ज्ञे अ॒ग्निर॒स्मद् द्वितीयं परिं जातवेदाः। तृतीय॑म॒प्सु नृमणा अर्जन्मिन्या॑न एनं जरते स्वाधीः।।
अग्नि का प्रथम जन्म स्वर्ग लोक में हुआ (रूप 1)। उनका द्वितीय जन्म हम मनुष्यों के मध्य हुआ, तब वे जातवेद कहलाये (रूप 2)। उनका तृतीय जन्म अन्तरिक्ष में हुआ... (रूप 3)।
{प. श्रीराम शर्मा आचार्य वेदार्थ}

 ऋग्वेद (10:45:2): विद्मा ते अग्ने त्रेधा त्रयाणिं विद्मा ते धाम विभृता पुरुत्रा । विद्मा ते नार्म परर्म गुहा यद्विद्मा तमुत्सं यतं आजगन्थे ॥
हे अग्नि, हम तुम्हारे तीनों पदों को जानते हैं। जहाँ जहाँ तुम्हारा वास है, उन स्थानों को भी हम जानते हैं। हम तुम्हारे अत्यंत गोपनीय नाम और तुम्हारे जन्म स्थल को भी जानते हैं। जंहा से तुम आये हो वो भी हम जानते हैं।

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Wednesday, 25 June 2025

दाब्बातुलअर्ज़, जुलकरनैन

 


दाब्बातुल अर्ज़

कुरान में एक मखलूक दाब्बातुल अर्ज़ का ज़िक्र दो जगह हैं. 


 1. कुरान 34:14: And when We decreed for Solomon death, nothing indicated to the jinn his death except a creature of the earth (dabbatulardi) eating his stick. But when he fell, it became clear to the jinn that if they had known the unseen, they would not have remained in humiliating punishment. 

[इसे आयात को तम्सीली कहा जाता है. यंहा इससे मुराद दीमक वगैरह जैसे जमीनी कीड़ों से ली जाती है.]


 2. कुरान 27:82: And when the decree of the Hour comes to pass against them, We will bring forth for them a beast from the earth (dabbatanlardi), speaking to them (tukallimuhum) that the people were not certain of Our signs.  

[एक मत अनुसार ज़मीन से निकलना अरबी मुहावरा है जो हिकारत से निकलने के मायनों में इस्तेमाल होता है इसलिए दाब्बतुलअर्ज़ एक ऐसी ही छोटी, मामूली जमात है जो लोगों को क़यामत के वक़्त हक़ बताएगी. दुसरे मत अनुसार यंहा लफ्ज़  तुकल्लिमुहुम इस्तेमाल हुआ है जिससे इसके मायने ये हो जाते हैं कि दाब्बतुलअर्ज़ अपने वजूद से हकाईक बयान करेगा यानी खुदा की आयातों/ निशानियों के बारे में. इन्हीं मायनो में तुकल्लिमुहुम लफ्ज़ कुरान में एक और जगह भी आया है जैसा नीचे बताया गया है.]            


■ 3. कुरान 30:35: Or have We sent down to them an authority, and it speaks (yatakallamu) of what they were associating with Him?

[यंहा भी यतकल्लमु शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका मतलब है कि अपने वजूद से हक़ बयान करना. ये इसलिए कहा गया था कि जो लोग खुदा के पैगम्बर की बातें सुनने को तैयार नहीं हैं, उन पर जानवरों को ही गवाही देनी चाहिए। मगर ऐसी नौबत नहीं आई क्योंकि कुरेश ईमान ले आये थे. यानी इसकी तावील यह करी जाती है कि कुरेश के पास खुदा का नबी आया था जो खुदा का कलाम सूना रहा था और वो इसकी बात नहीं मान रहे थे तो कहा गया था कि क्या हम कोई जानवर खड़ा कर दें और वो तुमसे कलाम करें मगर फिर कुरेश ईमान ले आये थे तो ऐसा करने की ज़रुरत नहीं पड़ी. कुरान और रिवायतों से मालूम होता है कि आखरी जमाने में भी लोगों के साथ इसी तरह का मामला होगा और उन पर गवाही के लिए इसी नोईय्य्त का एक दाब्बतुलअर्ज़ ज़मीन से निकाल कर खड़ा कर दिया जायगा जो इसी तरह हक़ वाज़ेह करेगा.


ये आयतें क़ुरैश से मुखातिब हैं और पिछली आयतों (22:71) में कुफ्फार क़यामत और अज़ाब के आने का वक़्त पूछ रहे हैं (यानी क़यामत की निशानियाँ मांग रहे हैं)। मगर अल्लाह उन्हें मोहलत दे रहे हैं और कह रहे हैं कि जब वो वक़्त आएगा तब हमारे लिए मुश्किल न होगा कि ज़मीन से एक जानवर निकाल कर खड़ा कर दें जो गवाह देगा कि तुम मुनकिर थे।

जैसे क़ुरान ने बताया कि जब क़ौमे समुद अज़ाब की निशानियाँ मांगते थे तो ह. सालेह ने एक ऊंटनी को नामज़द कर दिया कि अगर इसको नुकसान पहुंचाया तो अल्लाह का अज़ाब आएगा और फिर ऐसा ही हुआ। 


● एक मत अनुसार क़ुरान में बताए गए इस दाब्बतुलअर्ज़ का हदीसों के दाब्बतुलअर्ज़ से कोई रिश्ता नहीं है। 

रीवायतों में दाब्बतुलअर्ज़ का ज़िक्र क़यामत की अलामतों में शामिल है. क़यामत की 10 अलामतों वाली हदीस में एक अलामत ये बताई गयी है. दूसरी रिवायतों में आता है कि ये अलग अलग जगह से तीन बार निकलेगा, बहुत बड़ा, तेज रफ़्तार और चीखता हुआ होगा, कई जानवरों से मुशाबिहत रखेगा, काफ़िर मोमिनो को पहचान कर मुहर लगा देगा, मुसा की लाठी और सुलेमान की अंगूठी लिए होगा. इन्हें देवमालायें भी माना जाता है. क़यामत के ताल्लुक से इसकी तावील करने में अलग अलग राय हैं. अब तक क़यामत की अलामतों के बारे में दो अलामात (हदीसे जिब्रील की) साबित हो चुकी है तो उन पर हक्मी तौर पर कहा जा सकता है. जो नहीं हुई, उनकी असलियत कैसी होगी, तभी पता लगेगा.  

कुरान ने बताया कि जब क़यामत से पहले सुर (नरसिंघा) फूंका जायगा तो कान फौडू शोर होगा.

इस आख़िरत में आने वाले दाब्बातुलअर्ज़ पर कुछ बड़े तार्किक मौकिफ मिलते हैं:-


1. जैसे पहले ज़मीन से मख्लूक पैदा होती थी, फिर जिस्म से होने लगी। इसलिए ऐसा लगता है कि एक बार फिर से ज़मीन के पेट से एक मख्लूक पैदा
होगी जिसे दाब्बातुल अर्ज़ कहा गया है। ये इस बात कि निशानी होगा कि दुनिया वापिस सिमट रही है। इसके अपने वजूद से यह हक़ बयान हो जायगा.

     
2. ये आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस या इससे बनी कोई शय होगी जैसे आज भी बनाई जा रही है. इससे वैज्ञानिक तक डर रहे हैं क्योंकि भविष्य में यह खुद अपनी प्रोगामिंग कंट्रोल कर सकता है. 
दाब्बातुल अर्ज़ से मुराद अपने इरादे से चलने वाली हर चीज़ से ली जाती है.

3. हो सकता है ये किसी हालिया एक्सटिंट (बहुत पुरानों जानवरो के साथ ये मुमकिन नहीं है) हो चुके जानवर को ज़मीन में दबे उसके फॉसिल, DNA से वापिस वजूद में लाने की बात हो जैसे वूली ममूथ या कोई अनजान ऐतिहासिक जानवर। जैसे जुरासिक पार्क फ़िल्म या नॉवेल में दिखाया गया है (हालांकि इनका दुबारा जन्म असंभव है) उसका वापिस आना अक़्ल वालों के लिए खुदा की निशानी ही होगा। वैसे क्या ऐसा भी हो सकता है ये ज़मीन से उठने वाला जानवर, दरअसल ज़मीन से मिले फॉसिल के आधार पर डायनासौर की खोज की ओर सांकेतिक इशारा हो?

[यंहा गौर करने वाली बात ये है कि डायनासौर के फॉसिल 1820s में ही मिलना शुरू हो गए थे मगर इन्हें पूरी में शोहरत और कुबूलियत में जुरासिक पार्क फ़िल्म, 1990s के बाद। अरब दुनिया में तेल 1930s में निकलना शुरू हो गया था मगर 1970s में जाके अरब वर्ल्ड अमीर होना शुरू हुआ और 1990s में इन मुल्कों में इमारतों की प्रतिस्पर्धा शुरू हुई। गुलामी के खात्मे की शुरवात 1920s में ही हो गयी थी मगर UN द्वारा 1940-1950s में आधिकारिक रूप से ख़त्म किया गया मगर फिर भी सभी देशों द्वारा इसे लागू करते करते 1980s तक का समय लग गया। इसी तरह याजूज माजूज क़ौम यानी पश्चिमी क़ौमे भी दुनिया पर कहर ढाती आ रही है। 1500s से व्यापार की आड़ में शुरू हुआ कोलोनियल दौर,  18वीं सदी के अंत व 19वीं सदी के आरम्भ में अपने शबाब पर होते हुए, 1970s में जाके पूरी तरह खत्म हुआ है। फिर बड़े पश्चिमी और पूर्वी देश जैसे अमेरिका, यूरोप, रशिया, जापान, चीन आदि ने देशों या क़ौमों ने दुनिया पर सिक्का चलाया। जैसे क़ुरान के मूताबिक याजूज माजूज का ग़लबा और दाब्बा जानवर क़यामत की निशानी है वैसे ही हदीसे के मूताबिक गुलामी का अंत और अरबियों की ऊंची इमारतों में होड़ भी क़ायमत की निशानी है ]

4. ऐसा भी लगता है ऊपर बताई गयी कुरान की पहली आयत शायद उस वक़्त के मुशरिकों को एक मुहावरतन तम्बी है और हदीसों में क़यामत के वक़्त आने वाले हैवान का अकीदा या तो इसी आयत की बुनियाद से पैदा हुआ (जिसे शायद बाद में ज़मीन से निकलने वाला भी माना जाने लगा इसी बुनियाद पर) या फिर किसी ज़मीन से जुड़े हुए सेल्फ ऑपेर्टेड हथियार/मशीन/तकनीक आदि को तम्सीली तौर पर हैवान कहा गया होगा.


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जुलकर नैन

कुरान में 25 नबियों के नाम बताए गए हैं। कुरान में तीन अस्पष्ट व्यक्ति (संभावित नबी/फरिश्तें/अल्लाह के बन्दे) जैसे खिज़र, लुकमान और जुलकरनैन के नाम भी आते हैं. जुलकरनैन के बारे में सवाल किये जाने पर कुरान ने इनके बारे में कुछ प्रासंगिक महत्वपूर्ण बातें बयान करी थी. पहले सिकंदर को जुलकरनैन माना जाता था। फिर सर सय्यद और अबुल कलाम अज़ाद द्वारा खोसरो (Cyrus the Great, 6th Cent. BC, Persian) के जुलकरनैन मानने पर इस मत को शोहरत मिली. जुलकरनैन (मतलब दो सींग या दो ज़माने वाला) संभवतः साइरस (कुरश/अरब और यहूद में इन्हें इनके लकब जुलकरनैन से पुकारा जाता था) था जो दो सींग वाला मुकुट पहनता था (इसके बनाये गए कदीम बुत और तस्वीर अनुसार). यह Achaemenid साम्राज्य के संस्थापक और Median व Babylon (दो साम्राज्य/सींग) के विजेता थे। जब साइरस ने बेबीलोन पर विजय प्राप्त की, तो यहूदी यहाँ निर्वासन (बेबीलोन की कैद) में थे, जिसे Babylonian Captivity/ Exile कहा जाता है. इसने उन्हें अपने वतन यरूशलेम लौटने और अपने मंदिर का पुनर्निर्माण करने की अनुमति दी। ये बहुत न्यायप्रिय, उदार, शालीन राजा थे, धर्म और सत्ता मामलात में भी. दुनिया का पहला मानवता पर लिखा गया चार्टर, इसी का माना जाता है. इसके cylindrical clay inscription  में Marduk की प्रशंसा की गई है, जो मुख्य बेबीलोनियन देवता थे जिन्होंने खुसरो को राजा बनने के लिए चुना था। हालाँकि, उन्हें ज़ोरोस्ट्रियनियन, एकेश्वरवादी और ईमान वाला माना जाता है. शायद ये ज़र्थ्रुष्ट के पैगम्बर वाले सिलसिले के नबी रहे हों.

कुरान में तारीखी वाक्यात इंसानों के बारे में हैं, ना कि जिन्नात के बारे में. सिर्फ जिन्नों के ही 2 सींग नहीं होते हैं. बादशाही ताजों में भी 2 सींग होते थे. उलेमा ने इन्हें इन्सान ही माना है, कौन सी तारीखी शक्शियत थे, इस पर इख्तेलाफ़ ज़रूर है. इसलिए जुलकरनैन कोई जिन्न नहीं थे. 

साइरस की इरान, ईराक, मिस्र तक इसकी सल्तनत थी. पहले और दुसरे सफ़र की तुलना में साइरस को तीसरे सफर में कोई  मुकाबला सामने नहीं आया इसलिए इसका ज़िक्र भी इतिहास में नहीं मिलता है. बाबिल की फतह के बाद वो कैस्पियन की तरफ तुर्कमेनिस्तान के लिए रवाना हुआ लगता है. इसके बाद पहाड़ी इलाकें शुरू हो जाते हैं जो हिमालय तक पहुच जाते हैं. केस्पियन और ब्लैक सी के बीच के इलाके ही याजूज माजूज का कदीम वतन है. याजूज - माजूज कबाईली लोग थे. ये ईरान पर भी हमला करते थे और नीचे के इलाकों पर भी. पहाड़ो के दर्रों से हमला करते थे. वंहा उसे बेहद जंगली किस्म के लोग मिले जिनसे बातचीत भी मुमकिन नहीं थी. जंहा तक इन्सान आबाद थे, उन किनारों तक वो पहुँच गया. कुरान ने सिर्फ याजूज माजूज को क़यामत की बड़ी निशानी के तौर पर बयान किया है. साइरस ने इनके लिए एक दीवार बनवाई. 

 

■ कुरान 18:83-99: वे तुमसे ज़ुलक़रनैन के विषय में पूछते हैं। कह दो, मैं तुम्हें उसका कुछ वृत्तान्त सुनाता हूँ। हमने उसे धरती में सत्ता प्रदान की थी और उसे हर प्रकार के संसाधन दिए थे। अतएव उसने एक अभियान का आयोजन किया। यहाँ तक कि जब वह सूर्यास्त स्थल तक पहुँचा तो उसे मटमैले काले पानी (a spring of dark mud/hot spring) के एक स्रोत में डूबते हुए पाया और उसके निकट उसे एक क़ौम मिली। हमने कहा, ऐ ज़ुलक़रनैन, तुझे अधिकार है कि चाहे तकलीफ़ पहुँचाए और चाहे उनके साथ अच्छा व्यवहार करे। उसने कहा, जो कोई ज़ुल्म करेगा उसे तो हम दंड देंगे। फिर वह अपने रब की ओर पलटेगा और वह उसे कठोर यातना देगा। किन्तु जो कोई ईमान लाया और अच्छा कर्म किया, उसके लिए तो अच्छा बदला है और हम उसे अपना सहज एवं मृदुल आदेश देंगे। फिर उसने एक और अभियान का आयोजन किया। यहाँ तक कि जब वह सूर्योदय स्थल पर जा पहुँचा तो उसने उसे ऐसे लोगों पर उदित होते पाया जिनके लिए हमने सूर्य के मुक़ाबले में कोई ओट नहीं रखी थी। ऐसा ही हमने किया था और जो कुछ उसके पास था, उसकी हमें पूरी ख़बर थी। उसने फिर एक अभियान का आयोजन किया, यहाँ तक कि जब वह दो पर्वतों के बीच पहुँचा तो उसे उनके इस किनारे कुछ लोग मिले, जो ऐसा लगते थे कि कोई बात नहीं समझ पाते हों। उन्होंने कहा, ऐ ज़ुलक़रनैन, याजूज और माजूज इस भूभाग में उत्पात मचाते हैं। क्या हम तुम्हें कोई खर्च/कर इस काम के लिए दें कि तुम हमारे और उनके बीच एक अवरोध निर्मित कर दो? उसने कहा, मेरे रब ने मुझे जो कुछ अधिकार एवं शक्ति दी है वह उत्तम है। तुम तो बस बल से मेरी सहायता करो। मैं तुम्हारे और उनके बीच एक सुदृढ़ दीवार बनाए देता हूँ। मुझे लोहे के टुकड़े (sheets of iron) ला दो। यहाँ तक कि जब दोनों पर्वतों के बीच के रिक्त स्थान को पाटकर (leveled) बराबर कर दिया तो कहा, धौंको (blow), यहाँ तक कि जब उसे आग कर/बना दिया तो कहा, मुझे पिघला हुआ ताँबा ला दो ताकि मैं उस के ऊपर उँड़ेल दूँ। तो न तो वे (याजूज, माजूज) उस पर चढ़कर (scaleआ सकते थे और न वे उसमें सेंध (penetration) ही लगा सकते थे। उसने कहा, यह मेरे रब की दयालुता है किन्तु जब मेरे रब के वादे का समय आ जाएगा तो वह उसे ढाकर बराबर (level) कर देगा और मेरे रब का वादा सच्चा है। उस दिन हम उनमें से कुछ को छोड़ देंगे कि वे एक-दूसरे पर उठते हुए (मौजों की तरह) आएंगे। और सूर फूँका जाएगा। फिर हम उन सबको एक साथ इकट्ठा करेंगे।

कुरान की आयतों के मुताबिक वो पश्चिम में उस जगह तक पहुंचे जिसके आगे सिर्फ पानी ही पानी था (जंहा सूरज डूबता था). ये पूर्व में भी उस सीमा तक गए जंहा सिर्फ दूर तक धुप ही धुप थी यानि कोई सपाट रेगिस्तान था.

 

■ Bible : Daniel: Chapter 8: में उल्लेख किया गया है कि पैगम्बर दानियाल (खुसरो के समकालीन) ने एक रोया (सोते या जागते हुए इल्हामी ख्वाब) देखा जिसमें उन्होंने एक मेंढे के दो सींग उगते हुए देखे. पहला उगा हुआ सींग छोटा था और बाद में उगा हुआ लम्बा. वो हर दिशा में दौड़ रहा है, मार रहा है, कोई उसे रोक नहीं पा रहा है. फिर जिब्रील ने इनको आके सपने की व्याख्या करी कि वो दो सींग मादी और फारस के देश हैं.

{मगर हम पूरी तरह से इस कहानी पर भरोसा नहीं कर सकते, शायद इसमें मिलावट हुई हो जैसे भविष्यपुराण ने इतिहास को भविष्य बना कर पेश किया है. क्योंकि इस कथा में आगे एक बकरे का ज़िक्र है जो मेंढे को मार देगा और इसे यूनान का राजा बताया गया है अर्थात संभवत सिकंदर. कथा आगे कहती है कि फिर पश्चिम से एक बकरा आया जिसके आँखों के बीच सींग था और वह पैर धरती से छुए बिना ही सारी धरती पर दौड़ गया। बकरे ने  मढ़े के दोनों सींग तोड़ डाले और उसे कुचल दिया। फिर उसका बड़ा सींग टूट गया और फिर उस बड़े सींग की जगह चार सींग और निकल आये जो चारों दिशाओं की ओर मुड़े हुए थे। फिर एक सींग में एक छोटा सींग निकल आया और दक्षिण - पूर्व की ओर बढ़ा। वह सींग बढ़ता ही गया और तारों के शासक अर्थात परमेश्वर के विरूद्ध हो गया। उसने उस शासक को  अर्पित की जाने वाली दैनिक बलियों को रोक दिया और शासक की उपासना किये जाने वाली जगह उजाड़ दिया. जिब्रील नेबताया कि वह बकरा यूनान का राजा है और उसका सींग, वह पहला राजा है। वे चार राज्य, उसके राष्ट्र से प्रकट होंगे. तब वहाँ एक और क्रूर राजा होगा जब पापियों की संख्या बढ़ जायेगी और वह परमेश्वर के पवित्र लोगों को भी नष्ट कर देगा। किन्तु उसका भी अंत कर दिया जायेगा जो किसी मनुष्य द्वारा नहीं होगा।


जुलकरनैन और उनकी दीवार पर 5 मौकिफ

1. पहले मौकिफ तो वही सबसे आम मत है कि ऐसा जादुई तौर पर हुआ था मगर फिर यंहा कई सवाल खड़े होते हैं जैसे इनकी बनायीं गयी दीवार आज तक क्यों नहीं मिल पायी है, खुली ज़मीन में ऐसे कितनी लम्बी दीवार बनायेंगे? दो पहाड़ों के बीच दीवार बना दी तो भी याजूज माजूज घूम कर आ जायेंगे? आज सेटलाईट से ऐसी कोई दीवार या ऐसी फसादी छिपी हुई कौम क्यों नहीं मिल रही है? 

2. इसलिए दुसरे मौकिफ के मुताबिक, कुछ का मानना है कि ये वाकया किसी और दुनिया का है. 

3. तीसरे मौकिफ के मुताबिक जुलकरनैन और इनकी बनायी दीवार दोनों गैर-माद्दी है. जुलकर नैन भी (याजूज, माजूज, दज्जाल की तरह) अलग-अलग दौर के होने चाहिए, आखिर उनके नाम का मतलब 'दो दौर वाला' भी है। कुरान में अल्लाह ने कहा कि वे तुमसे जुलकर नैन (दो दौर वाले) के बारे में सवाल करते हैं. जुलकर नैन के तीसरे सफ़र के बारे में कुरान ने सिम्त/जगह नहीं बताई, जैसे पहले दो सफर की बताई है.

4. चौथे मौकिफ के मुताबिक यह इसी ज़मीन का मामला है जो गैर मामूली (तम्सीली) तरीके से बयान हुआ है. इसलिए हो सकता है कि जुलकरनैन ने किसी क्षेत्र को दोनों कौमों (जो उसके अधीन थीं) में बाँट दिया हो और आर्टिफिशियल भोगोलिक सीमायें ठहरा दी हो जिन्हें पार करने से मुराद दूसरी और शासन, वर्चस्व, फसाद करने की मनाही कर दी गयी हो. 

5. पांचवें मौकिफ के मुताबिक ऐसी ही एक दीवार Darial Pass के पास Caucasus क्षेत्र में पायी जाती थी (निशान अब भी मौजूद है) जो 50 मील लम्बी, 290 फीट ऊँची, 10 फीट चौड़ी थी. इसका श्रेय कई शासकों को दिया जाता था मगर ये साइरस की बनायीं हुई भी मालूम पड़ती है. अब्बासी खलीफा वासित ने इस दीवार की तहकीक के लिए 50 लोगों की एक टीम भेजी थी. साइरस ने इस जगह को भी जीता होगा इसीलिए उसके नाम (साइरस/खुसरो/कुरश) नाम पर वंहा कुछ जगह जैसे दरिया के नाम भी रखे हुए मिलते हैं. ये सबसे मजबूत और तार्किक मत लगता है.


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ऐतिहासिक तौर पर महान साइरस की यात्राएं और दीवार के मायने 

 

पश्चिम की यात्रा: महान साइरस ने राजा Croesus के अधीन Lydia (तुर्की में) पर विजय प्राप्त की और वह Asia Minor (ग्रीक भाषा में Anatolia - तुर्की में जहाँ एशिया और यूरोप मिलते हैं) में Aegean Sea (जिसे मेसोपोटामिया और फारसियों के लिए सूर्यास्त का स्थान माना जाता है) तक पहुँचा था।

पूर्व की यात्रा: महान साइरस ने अपने साम्राज्य का विस्तार पूर्व की ओर Central Asia तक किया, जिसमें गांधार (अफगान-पाक) और बैक्ट्रिया आदि (ताजिक, उज्बेक, कजाक, किर्गिज़) शामिल थे।

संभवतः उत्तर की ओर तीसरी यात्रा: फारसी शासकों द्वारा फारस के लिए Derbent Fortress और Caspian Gates जैसी किलेबंद संरचनाओं का निर्माण करने के बारे में प्राचीन परंपराएँ और किंवदंतियाँ हैं, ताकि Derbent और Darial pass के पास Caucasus क्षेत्र में उत्तरी जनजातियों जैसे कि Scythians, Cimmerians, Massagetae (central Asia के Indo- European- Iranian nomadic groups, जिन्हें यूनानियों/फारसी लोगों द्वारा असभ्य माना जाता था और गोग और मागोग से जोड़ कर पहचाना जाता है) को रोका जा सके. हालाँकि इनका श्रेय Sassanid काल (224-651 ई.) को दिया जाता है परन्तु कुछ किंवदंतियाँ महान साइरस या अन्य प्राचीन फ़ारसी राजाओं को पहले की नींव रखने का श्रेय देती हैं।

फारस (ईरान) में महान साइरस ने अपनी राजधानी Pasargadae में दीवारों, द्वारों और मीनारों के साथ एक रक्षात्मक किलेबंद गढ़ बनाया। इसने Ecbatana, Babylon, Sardis, Uruk और अन्य मेसोपोटामिया शहरों में मौजूदा दीवारों और द्वारों को मजबूत किया। इसने बेबीलोन में (जिसमें वह शांतिपूर्वक घुसा  था) बेहद मजबूत और विशाल दोहरी दीवारें कायम रखीं। इसने मध्य एशिया में Oxus River (Amu Darya) जैसी प्राकृतिक बाधाओं के रूप में पहाड़ी दर्रों, नदियों और साथी ही स्थानीय गठबंधनों का उपयोग किया। इसलिए, उसकी बनायीं हुई दीवार literal रूप में कोई लोहे की दीवार नहीं हो सकती है, बल्कि यह एक सभ्यता को अराजकता से बचाने के उसके प्रयासों का symbolic representation होना चाहिए, शासन, गठबंधन, किलेबंदी द्वारा. हो सकता है ये उसकी बनाई हुई कोई पत्थर की दीवार हो जिसमें लोगे के बने द्वार, रोशनदान, छड़ें, लंगर और तांबे से अंत में लगाये कोट, सीलिंग, शाही प्रतीक हों।

इनके अलावा भी कई अलग अलग कयास हैं जैसे एक ये है कि 14वीं शताब्दी के यात्री इब्न बतूता ने बताया कि यह दीवार चीन के तट पर स्थित Zeitun शहर से साठ दिन की यात्रा की दूरी पर थी, इस पर अनुवादको ने लिखा है कि इब्न बतूता ने चीन की महान दीवार को जुलक़रनैन की दीवार समझ लिया होगा। वैसे भी ये चीन की दीवार (7th cent. BC - 3rd cent. AD) नहीं हो सकती है क्योंकि वो उन्होंने खुद बनायीं और इसे आज पार करा जा सकता है। इसके अलावा चीनी दीवार को स्थापित -पुनर्स्थापित करवाने वाला कोई भी नेक - रहम दिल चीनी राजा ऐसा नहीं मिलता है जिसने पूर्व, पश्चिम में विजय हासिल करी हो (पर शायद इस पर और तहकीक की ज़रूरत है). दूसरा यह है कि Borgia विश्व मानचित्र (जर्मनी में 1430 AD के समीप निर्मित, copper से engraved) में सबसे उत्तर-पूर्वी भाग में याजूज-माजूज को दर्शाते हुए दो किलेबंद/नाकेबंद क्षेत्र मार्क किये हुए मिलते हैं, जिन पर लैटिन भाषा में लिखा है: गोग का प्रांत जिसमें यहूदियों को फारसियों के राजा Artaxerxes के समय में रोके रखा गया था। यह तर्क दिया जा सकता है कि Artaxerxes और Cyrus the Great का सम्मिश्रण इतिहास में किसी समय हुआ होगा। 

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दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...