स्य्येद सुलैमान नदवी ने कहा है कि मेहदी पर हदीसों में इस तरह मिलावाट हुई है कि अब इनमें सही और गलत पहचानना नामुमकिन है. इस मुद्दे पर लगभग 80% से ज़्यादा हदीसें जईफ और मौजू हैं. नासिबियों, राफिज़ियों ने हदीसों में बहुत गड़बड़ करेक दीन में फितना फैलाने की कोशिश करी है. तारीख में मेहदी होने के बड़े बड़े फितने फसाद हो चुके हैं. हर सौ साल में एक-दो लोग मेहदी होने का दावा करते ही रहे हैं. बड़े-बड़े उलेमा ने इसका रद्द किया है.
1. पहला मौकिफ तो यही है कि एक महान इन्सान अंत में आएगा और ह. ईसा के साथ मिलकर दज्जाल का अंत करेगा.
अक़ाएद लफ़्ज़ नबी ने कभी इस्तेमाल नहीं किया। दीन के बुनियादी अकायद के लिए क़ुरआन और हदीसों में इमानियत लफ़्ज़ इस्तेमाल हुआ है। ईमान की जगह अक़ाएद लफ्ज़ तो बाद में इस्तेमाल होना शुरू हुआ. बाद में बने मस्लकों ने अपने अतिरिक्त अकाएद बनाए जैसे 5 फ़िक़्ह के अकाएद या शियाओं का इमामत का अकीदा. शुरवाती दौर में ही मुसलमानों में खवारिज नामक अनार्किस्ट पैदा हुए. उन्होंने सुन्नत (सुन्नह) को कुरान जैसी अहमियत नहीं दी और न ही मुस्लिम के नज़्मे इश्तमाई (अल जमा जिसे अल सुल्तान भी कहा जाता है) को। इसलिए इनसे अलग पहचान के लिए बाकी मुसलामानों ने खुद को अहल सुन्नत वल जमात कहा यानी जो अल जमा के साथ है। यंहा से अकाईद की फेहरिस्त बढ़ना शुरू हुई थी।
इस्लाम के अकाएद तो वही हदीसे जिब्रील वाली 5 इमानियात हैं (अल्लाह, फरिश्तों, पैगम्बरों, किताबों/इल्हाम, रोज़े जज़ा पर ईमान). इसमें ह. जिब्रील ने ईमान के बारे में पूछा था, ना कि अकाएद। इनके इमानियत होने की बात रिसालत में सभी को समझा दी गयी थी. इसे वाकये में तो इन्हें बस हाईलाईट किया गया है. इसलिए नबी ने कहा भी था कि जिब्रील तुम्हें दीन सीखाने आये थे. इसमें नबी ने ये भी बताया कि वो नहीं जानते कि क़यामत कब आयेगी मगर पूछे जाने पर उन्होंने कुछ अलामात बताई थी. इन्हें मानने के हम पाबंद हैं. इनमें कमी पेशी नहीं करी जा सकती क्योंकि नबी ने बताएं हैं. इमानियात में शामिल हर चीज़ आदम अलैह. से जारी होनी चाहिए. अब इन इमानियत को ही इस्लाम के अकाईद कहना चाहिए. इसके अलग किसी बात को बुनियादी इमानियात या अकाईद कहना सही नहीं है.
हदीस जिब्रील के इमानियत ही असल दीन है जिन पर दीन टीका है। बाकी सब इल्म का हिसा है. हदीसे जिब्रील बाकी हदीसों से हर लिहाज़ से मज़बूत है, मतन से खासतौर पर। इसमें बताई 2 अलामतें पूरी हो चुकी मालूम पड़ती है, तावील करने के बाद, इसलिए उन्हें माना जायेगा. हदीसों में जिन किस्सों पर मुतमईन हो गए हैं, उन्हें माना जायेगा. मगर फिर भी वो ईमान का हिस्सा नहीं है. कयामत ईमानियात का हिस्सा है मगर हदीसों में बताई उसकी निशानियाँ नहीं। निशानियाँ, मुस्तकबिल के अख़बार हैं.
कुरान में इमान, अख्लाकियात, शरयत या कानून और अख़बार या इल्म हैं. कुरान और हदीसों में अख़बार बयान हुए हैं यानि इत्तालात या किस्से. हदीसों में माज़ी और मुस्तकबिल दोनों के किस्से बयान हुए हैं. जैसे हदीसों में आये पुराने किस्से जांचे जाते हैं ऐसे ही बाद में होने वाले भी किये जायेंगे, कुरान दोनों के लिए सबसे अहम किरदार निभाएगा. क़ुरान में ज़ुलकरनैन, असहाबे कहफ़, मलिका बिलकिस वगैरह के माजी के किस्से आयें हैं. इन्हें ईमान का हिस्सा हदीसे जिब्रील में नहीं बताया गया है. इन्हें अकाएद या इमानियात में शामिल करना खुद एक बिदत है. इन्हें ईमानियात की फेहरिस्त में शामिल भी नहीं किया जाता है और न ही करना चाहिए. कुरान यकीनी इल्म है। हम कुरान को अल्लाह की तरफ से मानते हैं तो उसके अखबार को भी मानते हैं. मगर इनका सही फ़हम, तावील, ताबीर, तफसीर, शरह फिर से इल्म का हिस्सा है, न की ईमान का। इन किस्सों की तावीलात हदीसों में भी मिल जाती है.
इसलिए मेहदी हदीसों में आया एक मुस्तकबिल का अखबार है. मेहदी पर यकीन ईमान का हिस्सा बिलकुल नहीं है.
मेहदी का ज़िक्र क़ुरान में नही है। हदीस की पहली किताब मुवत्ता में भी नही है। हदीसे जीब्रील में भी नहीं है. ये रिवायतें अहले तश्शियु से आ गयी हैं. शिया के हिसाब से 12वें इमाम मरवी आ चुके थे फिर गैब फरमा गया और बाद में आएंगे, वो पहले गयब सुगरा (झूठे गायब) थे फिर गयब कुबरा हो गए. ये रिवायतें कमज़ोर हैं और इल्म अक़ल पर साबित नहीं होती हैं. जिस तरह इन हदीसों दुनिया भर के ज़ुल्म के खात्मे की बात कही गयी है, ऐसा किसी नबी ने नही किया, मुहम्मद सल्ल. तक ने भी नहीं किया। मेहदी की रिवायतें 23 सहाबा से बयान हुई हैं और उनके कुल 500 तुर्क हैं। मुवत्ता में महदी पर एक हदीस भी नहीं है। इसके 2 ही मतलब निकलते हैं कि या तो इन 23 सहाबा ने मेहदी के बारे में इमाम मालिक को कुछ बयान ही नहीं किया (यानी ये रिवायतें उस वक़्त मौजूद ही नहीं थी) और या फिर इमाम मालिक को ये रिवायतें काबिले कुबूल ही नहीं लगी होंगी. हदीस की पहले दर्जे की किताबें मुवत्ता, बुखारी, मुस्लिम में मेहदी के नाम की कोई रिवायत नहीं है। ज़ाहिर हैं वो इनके मयार पर खरी नहीं उतरी होंगी। बाद में इनकी बाज़ हदीसों को मेहदी से ज़रूर जोड़ा गया हैं. इन 3 के बाद फिर दूसरे, तीसरे, चौथे दर्जे की हदीस की किताबों में मेहदी की हदीसें ज्यादतर या तो मौजू हैं या बेहद जईफ. और जो रिवायतें सहीह या हसन हैं, वो सिर्फ 7 वाकयात हैं, जो सिर्फ 4 सहाबा से हैं और जब इन सहाबा ने इन्हें अलग - अलग तरह से बयान करा तो कुल 14 हदीसें बन गई। मदीना के मुहद्दिस जिया आज़मी साहब की अल जामी अल कामिल में यहीं 14 लिखे हुए हैं। इन्हें सभी मुहद्दिसों की कुबूल करी गयी रिवायतें हैं. इनमें भी यही वाक्यात हैं (बस इनमें 2 सहाबी/सहबिया ह. अली और उम्मे सलमा जायद हैं. मगर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता). अगर ये वाकई सच हो गयी तो वाकई नबी की बात थी और नहीं हुई तो ये उनकी तरफ मंसूब करी गयी गलत बात होगी.
मेहदी की बाज़ हदीसों को तवातुर का लकब देना सही नहीं है. महदी की रिवायतों को कुरान-सुन्नत जैसे तवातुर के बराबर नहीं माना जा सकता और ना ही हदीसों को तवातुर का लकब देना चाहिए. ये लकब कुरान के लिए है. मेहदी की रिवायतों पर इज्मा है, ऐसा भी नहीं कहना चाहिए, बल्कि ये कहना चाहिए कि इस मौकिफ को शोहरत हासिल है. क्योंकि इस मौजू पर इख्तिलाफ तो हमेशा मौजूद रहे हैं.
मेहदी के मायने है, हिदायत याफ्ता. एक हदीस में खुलफा ए रशीदीन के लिए भी ये लफ्ज़ इस्तेमाल हुआ है (जो मेरे बाद खुलफा अल राशीदीन और अल मेहदीइन होंगे उनकी पैरवी करना). ये सभी खलीफा हिदायत पाए हुए थे. आइन्दा हक पर हुए हुक्मरान भी मेहदी हो सकता है. मेहदी नाम या लकब के कोई 50-60 बड़े हुक्मरान, उलेमा, बड़ी शक्सियात और झूठे दावेदार हो चुके हैं. यंहा तक कि अब्बासियों में एक खलीफा भी मेहदी नाम के हो चुके हैं. बाज़ उलेमा और इब्ने खलदून का रुझान यही है कि ये मेहदी वाली बात इन्ही के दौर में शोहरत पायी थी. बुखारी-मुस्लिम से साबित रिवायतों के मुताबिक सिर्फ यही काबिले कुबूल है कि नबी के बाद एक आदिल और फ़य्याज़ या न्यायप्रिय और दानवीर शासक होगा. ऐसा हुक्मरान अब्दुल्लाह बिन अज़ीज़ थे, वो मानन खलीफा ए मेहदीइन ही थे. उनका नाम मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह होना और उनका अहले बयत में से होना दुरुस्त बयान नहीं है.
हर दौर में मुजद्दिद पैदा होने वाली पेशनगोई का भी मेहदी से कोई वास्ता नहीं है, क्योंकि हर दौर में कोई न कोई बड़ी दीनी शक्सियत पैदा होती ही रहती है. कुरान की बात कि दीन पूरा का पूरा अल्लाह के लिए हो जाएगा, इसका ताल्लुक नबी की हुज्जत और उसके नतीजे से फैले दीन के गलबे से है.
[यहाँ मेहदी का ज़िक्र नहीं है. ऐसे बहुत से हुक्मरान हुए हैं और आइन्दा किसी भी मुस्लिम देश में भी हो सकते हैं.]
■2. मुस्लिम 2913: जाबिर बिन अब्दुल्लाह से रिवायत है कि नबी ने फ़रमाया कि वो वक़्त करीब है जब अहले इराक के पास कोई माल-दौलत नहीं आएगी क्योंकि अजम की तरफ से इन्हें रोक लिया जायेगा. अनकरीब अहले शाम के पास कोई माल-दौलत नहीं आएगी क्योंकि रोम की और से इन्हें रोक लिया जायेगा. मेरी उम्मत के आखिरी ज़माने में एक हुकुमरान होगा जो लोगों को बिना शुमार किये खूब माल अता करेगा.
[यहाँ भी मेहदी का ज़िक्र नहीं है. पहली हदीस वाली ही बात है जो लोगों ने नबी से शायद एक ही मजलिस में सुनी होगी.]
●Muslim 2913: Jabir bin Abdullah said it may happen that the people of Iraq may not send their Qafiz and Dirhams (their measures of food stuff and their money). The non-Arabs would prevent them. There is the possibility that the people of Syria may not send their Dinars and Mudds. He said this prevention would be made by the Romans. The Messenger said that there would be a caliph in the last (period) of my Ummah who would freely give handfuls of wealth to the people without counting it. I said to Abu Nadra and Abu al Ala: Do you mean Umar bin Abd al Aziz? They said: No (means he would be Imam Mahdi).
■3. मुसनद अहमद 15127/मुस्लिम, किताबुल ईमान: जाबिर बिन अब्दुल्लाह की रिवायत है कि नबी ने फ़रमाया कि मेरी उम्मत का एक गिरोह मुसलसल हक पर कितआल करता रहेगा और क़यामत तक गालिब रहेगा और फिर ईसा नाजिल होंगे. फिर उस हक पर चलने वाले गिरोह का अमीर उनसे इमामत की दरखास्त करेगा और वो मना कर देंगे कि तुम इस उम्मत में बाज़ बाज़ के अमीर होंगे.
[यहाँ भी मेहदी का ज़िक्र नहीं है. इमाम लफ्ज़, अमीर और हुक्मरान के लिए भी इस्तेमाल होता है. ये कोई भी अमीर या इमाम हो सकता है. पैगम्बर से इमामत की दरख्वास्त करना एक आम फितरी बात है.]
{ये हदीस हारिस बिन ओवसामा की मुसनद में भी है, जिसे इब्ने क़य्यिम ने भी नक़ल किया है. इसमें इमाम की जगह मेहदी लफ्ज़ आया है. सो सवाल उठता है कि इमाम मुस्लिम ने मेहदी लफ्ज़ क्यों नहीं कुबूल किया. यानि ये लफ्ज़ रिवातों में दाखिल हुआ है. यानि तफ्सीलात वाली रिवायतें, बुखारी मस्लिम ने नहीं ली, यानि इसमें नाम, खानदान, मुद्दत का ज़िक्र नहीं है. सवाल तफ्सीलात कुबूल करने का नहीं है बल्कि ये है कि बुखारी मुस्लिम ने इन तफ्सीलात को कुबूल क्यों नहीं किया? उन्होंने सिर्फ यही लिया जितनी बात वाक्यतन सही लगती है, जिसका मोटा मोटा मफहूम है नबी के बाद एक आदिल और फ़य्याज़ या न्यायप्रिय और दानवीर शासक होगा.}
■4. 20841 (2 तरीक): अबू हुरेरा से रिवायत है कि नबी ने फ़रमाया कि जब ईसा आसमान से हकम के तौर पर तुम्हारे बीच नाजिल होंगे, उस वक़्त तुम में से ही कोई इमामत करेगा (ईमाम का मतलब नमाज़ का इमाम और हुकुमरान दोनों होता है)/ईसा तुम्हारे बीच नाजिल होंगे और वो तुम्हारे इमाम होंगे (दोनों मतलब इसमें सही बैठते हैं)
■5. (3 तरीक): अब्दुल्लाह बिन मसूद से रिवायत है कि नबी ने फ़रमाया कि दुनिया ख़त्म नहीं होगी/कयामत कायम नहीं होगी/ज़माना ख़त्म नहीं होगा कि मेरे अहले बयत में से एक शख्स आयेगा जिसका अपना और वालिद का नाम मेरे जैसा होगा/मेरा हमनाम होगा जो ज़मीन को इंसाफ से भर देगा जैसे पहले ज़ुल्म से भरी हुई थी/मेरे अहले बयत में से मेरा एक हमनाम "अरब का हुक्मरान" बनेगा.
[यंहा भी मेहदी का ज़िक्र नहीं है. ऐसे बहुत से हुक्मरान हुए हैं और कोई आइन्दा भी हो सकता है.]
■6. मुसनद अहमद 11130: अबू सईद खुदरी की रिवायत है कि नबी ने फ़रमाया कि क़यामत तब तक नहीं आएगी जब तक मेरे अहले बयत में से एक कुशादा पेशानी और ऊँची नाक वाला हुक्मरान नहीं बन जायेगा, उसका दौर 7/9 साल होगा.
[यंहा भी मेहदी का ज़िक्र नहीं है. ये ऊपर वाली हदीस की ही बात है.]
■7. मुसतदरक अलहाकिम 8673: अबू सईद खुदरी की रिवायत है कि नबी ने फ़रमाया कि मेरी उम्मत के आखिरी दौर में मेहदी ज़ाहिर होगा जिसके दौर में खूब बारिश होगी, ज़मीन खूब उगआएगी, मवेशी बहुत होंगे वगैरह, वो 7/8 साल रहेगा.
[इसमें पहली बार मेहदी का नाम आया है.]
■ Musnad 11313, Mustadrak 8669: The Hour will not begin until the earth is filled with oppression, injustice, transgression and then there will emerge from my family one who will fill it with fairness and justice as it was filled with injustice and transgression.
■ Majah 4085 (Hasan), Musnad 645 (Daif): Mahdi is one of us, the people of the Household/ Ahlalbait. Allah will rectify him in a single night.
■ Majah 4086 (Daif): Mahdi will be one of the descendants of Fatimah.
■ Tirmidhi 2232 (Daif): There will be a Mahdi who comes in my Ummah living (ruling) for 5 or 7 or 9 years.
■ Majah 4083 (Daif): Mahdi will be among my nation. If he lives for a short period it will be 7 and if he lives for a long period, it will be 9, during which my nation will enjoy a time of unprecedented ease. Then the wealth will be piled up.
■ Dawud 4286 (Daif): Disagreement will occur at the death of a caliph and a man of the people of Medina will come flying forth to Mecca. Some of the people of Mecca will come to him, bring him out against his will and swear allegiance to him between the Corner and the Maqam. An expeditionary force will then be sent against him from Syria but will be swallowed up in the desert between Mecca and Medina. When the people see that, the eminent saints of Syria and the best people of Iraq will come to him and swear allegiance to him between the Corner and the Maqam. Then there will arise a man of Quraysh whose maternal uncles belong to Kalb and send against them an expeditionary force which will be overcome by them and that is the expedition of Kalb. Disappointed will be the one who does not receive the booty of Kalb. He will divide the property and will govern the people by the Sunnah of their Prophet and establish Islam on Earth. He will remain 7 or 9 years then die and the Muslims will pray over him.
■ Tabarani's Al Mujam AlKabir 8/101 (Weak), Musnad Ash Shamiyyin 2/410 (Weak): Between you and the Byzantines there will be 4 truces and the 4th will be concluded by a man from the family of Heraclius (may be Prophet Haroon) which will last for 7 years. The leader will be a 40 year old man with a face like a shining star, on whose right cheek will be a black mole, and he will be wearing two white velvet Abayahs (may be Qutwani cloaks) as if he is one of the Children of Israel. He will rule for 20 years and bring forth treasures and will conquer the cities of the polytheists.
■ Naim ibn Hammad's Al Fitan 1/365 (Weak): Mahdi will appear when he is 40 years old, looking like a man from among the Children of Israel.
■ Ad Dani's As Sunan Al Waridah fil Fitan 5/1074 (Weak): Mahdi will be 40 years old and he will do the deeds of the Children of Israel. If it is not Umar then I do not know who it will be.
■ Mishkat 546, Musnad, Baihaqi: When you see the black standards have come from the direction of Khurasan go to them, for God's Khalifa the Mahdi will be among them.
■ Majah 4088 (Daif): People will come from the East, paving the way for Mahdi (for his rule).
[Name Mahdi is not named in these Ahadith but in other Ahadith such as the one recorded by Abu Naim in his Musnad which is declared Good by Ibn Al Qayyim in his Naqd al-Manqul at page 87]
■ Muslim 2913, Musnad 3/38, 317, 333: Jabir b. Abdullah narrated that Prophet said that there would be a caliph in the last (period) of my Ummah who would freely give handfuls of wealth to the people without counting it. On this, one Sahaba asked: Do you mean Umar b. Abd al Aziz? It was replied: No (because it was considered as Mahdi).
■ Ahmad 6/316, Ibn Abi Shaybah's Al Musanaf 14/ 45, 46, At Tabarani's Al Awsat 9613, Al Haithami's Mujma Az Zawaid (7/315) declared it trustworthy: Umm Salamah said that after the death of a Ruler there will be some dispute between the people. So a citizen of Madinah will flee and go to Makkah. While in Makkah, certain people will approach him between Hajral Aswad and Maqaame Ibrahim, and forcefully pledge their allegiance to him. Thereafter, a huge army will proceed from Syria to attack him but when they will be at the Baidah desert, which is between Makkah and Madinah, there they will be swallowed into the ground. On seeing this, the Abdaals of Shaam as well as large numbers of people from Iraq will come to him and pledge their allegiance. Then a person from the Quraish, whose uncle will be from the Bani Kalb tribe, will send an army to attack him, only to be overpowered. This (defeated) army will be that of the Bani Kalb. Unfortunate indeed is he who does not receive a share from the booty of the Kalb. This person (considered as Mahdi) will distribute the spoils of war after the battle. He will lead the people according to the way of the Prophet, and during his reign Islam will spread throughout the world. He will stay for 7 years (from his emergence). He will pass away and the Muslims will perform his Janazah Salaat.
शिया रिवायतों के मुताबिक, जब सूफ़ियानी को महदी के बारे में पता चलेगा, तो वह और उसकी सेना इराक की ओर उस पर हमला करने के लिए जाएगी। जब उसकी सेना बैदा (Bayda), मक्का और मदीना के बीच एक रेगिस्तानी क्षेत्र में प्रवेश करेगी तो खसफ अलबैदा की घटना होगी जिसमे उसकी सेना के साथ धरती बैदा को निगल लेगी।
■ Muslim 249: The Prophet came to the graveyard and said: The abode of the believing people and we are about to join you. I love to see my brothers (Ikhwan-e-Rasool). People said: Are not we your brothers? He said: You are my companions and our brothers are those who have, so far, not come into the world. People said: How would you recognize those persons of your Ummah who have not yet been born? He said: They would come with white faces and arms and legs owing to ablution, and I would arrive at the Cistern before them.
[It is said to be about Dayee or Fighters according to different views]
■ Muslim 2937: An individual will arise (Hajeej) and
will put an end to the menace of Dajjal by using scientific evidence. He
will prove the Dajjal's arguments baseless by putting forward superior
arguments at the ideological level.
[No such text is
found at this number. Hadith on this number talks about a person which is same as talked about in Muslim 2938, also given below]
■ Muslim 2938: A
person who would be the best of men or one from amongst the best of men
would say to Dajjal: I bear testimony that you are Dajjal. Dajjal would
kill this person and then bring him back to life. Then the man would
say: I had no better proof that you are a Dajjal. The Dajjal would then
make an attempt to kill him again but he would not be able to do that.
It was said that person would be Khadir. He would be the most eminent amongst persons in regard to martyrdom in the eye of the Lord of the world.
[In these Ahadith, this man does not seem to be an extra ordinary man like Mehadi or Isaa as believed.]
■ बुखारी 1474, 1475: पैगंबर ने कहा, क़यामत के दिन लोग आदम से मदद मांगेंगे, फिर मूसा से और फिर मुहम्मद से। रावी ने आगे कहा "मुहम्मद सल्ल. लोगों के बीच न्याय करने के लिए अल्लाह से सिफ़ारिश करेंगे। वह तब तक आगे बढ़ेंगे जब तक कि वह जन्नत के दरवाज़े की घंटी नहीं पकड़ लेते और फिर अल्लाह उन्हें मक़ाम-ए-महमूद तक पहुँचा देंगे।
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■ तिर्मिज़ी 3609 (सहीह - दारुस्सलाम): लोगों ने पैगम्बर से पूछा, आपके लिए पैगम्बरी कब स्थापित हुई? उन्होंने कहा: जब आदम आत्मा और शरीर के बीच में थे।
■ माजह 3546 (जईफ़ - दारुस्सलाम): लोगों ने पैगम्बर से कहा, हर साल आप उस ज़हरीले मांस के कारण दर्द से पीड़ित रहते हैं, जो आपने खाया था। उन्होंने कहा: मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं होता है जो मेरे लिए तब ही तय नहीं कर दिया गया था जब आदम मिट्टी की अवस्था में ही थे।
[ऐसा लगता है कि यह कद्र के बारे में बात हो रही है, जो अल्लाह ने पहले दिन से ही तय कर दी थी।]
■ मिश्कात (5734) और मुस्लिम: पैगंबर ने कहा: अल्लाह ने शनिवार को पृथ्वी बनाई, रविवार को उसमें पहाड़ बनाए, सोमवार को पेड़ बनाए, मंगलवार को उनको बनाया जो आपत्तिजनक (objectionable) हैं, बुधवार को रोशनी (light) बनाई, गुरुवार को पृथ्वी में जानवरों को और सृष्टि के अंत में आदम को बनाया, शुक्रवार को दोपहर में और दोपहर और रात के बीच में आखिरी घंटे में।
[लेकिन इस हदीस के अनुसार प्रकाश पहली चीज़ नहीं थी बल्कि बाद में बनाई जाने वाली चीज़ों में से थी। यह सूरज भी नहीं हो सकता. इसलिए ये किसी गैर मामूली रौशनी की बात लगती है.]
■ कुरान (33:46): वह जो ईश्वर की अनुमति से और एक दीप के प्रकाश (lamp light) के रूप में ईश्वर की ओर बुलाता है।
■ मुस्नद, तिर्मिज़ी, माजा और हिब्बान: सहाबा ने कहा कि जब पैगंबर ने पहली बार मदीना में प्रवेश किया, तो उन्होंने इसमें सब कुछ प्रकाशमय कर दिया, और जब उनकी मृत्यु हुई तो प्रकाश गायब हो गया।
■ हिशाम की सीराह, तबरी की तारीख: पैगंबर ने कहा कि जब मेरी माँ ने गर्भ धारण किया, तो उसने एक प्रकाश देखा जिसने सीरिया में बोसरा (Bosra) के महलों को प्रकाशमय कर दिया।
[ये सभी अलंकारिक बयान मालूम पड़ते हैं।]
{यंहा आये लफ्ज़ मआद के मायने है, लौटाना, लौटाने की जगह, लौटाने का ज़माना/to return, place or time to return~ इमाम रागिब की लुगत}
[पर यंहा पहले से ही आखिरत की बात चल रही है. पिछली आयात में भी कहा गया है कि The good end or triumphant fate is for the righteous. इसलिए ये अपनी बारगाह में वापिस बुलाने की बात लगती है]
[पर ये नबी के शुरवाती और आखिरी दिनों या अंत में नेमतों का ज़िक्र लगता है यानी मक्की और मादिनी दौर का]
■ मुस्लिम 2278/ दाऊद 4673/ तिर्मिज़ी 3615, 3616/ मिश्कात 5744, 5761,5762: मैं क़ियामत के दिन आदम की औलाद में अव्वल होऊँगा। मैं पहला सिफ़ारिश करने वाला हूँगा और पहला जिसकी सिफ़ारिश अल्लाह को क़बूल होगी। किसी नबी पर मुझ जितना ईमान नहीं लाया गया। क़ियामत के दिन मैं प्रशंसा का झंडा (banner of praise) उठाऊँगा जिसके नीचे आदम और अन्य लोग होंगे। उस दिन कोई ऐसा नबी नहीं होगा, न आदम और न कोई और कोई, सब मेरे झंडे के नीचे होंगे.
■ हदीस (बुखारी, मुस्लिम): रसूलुल्लाह ने फरमाया कि मुझे जामे कलिमात के साथ भेजा गया है और मुझे रोअब के साथ नुसरत प्रदान की गई है।
■ हदीस (बुखारी): रसूलुल्लाह की वफात के बाद ह. अबूबक्र र. ने आप की पेशानी को बोसा दिया और कहा: अल्लाह आप पर दो मौतें जमा नहीं फरमाएगा। आप के लिये बस यही मौत लिखी थी और वह घटित हो गई। ■ हदीस: (इब्नुल अस्काफ ने पसन्दीदा सनद से ह. जाबिर बिन अब्दुल्लाह से रिवायत करी कि) जिस ने दज्जाल को झुठलाया उस ने कुफ्र किया और जिस ने महदी को झुठलाया उस ने कुफ्र किया.
■ हदीस: मुहम्मद सल्ल. ने फरमाया कि मैं और ईसा, इन दो उँगलियों (शाहदत और बीच वाली) की तरह हैं.
■ हदीस (बुखारी, मुस्लिम): मुहम्मद सल्ल. ने फरमाया कि मैं अव्वल और आख़िर में ईसा इब्ने मरियम के सब से करीब और संबंधित हूँ।
[ऐसा लगता है कि नबी की ऐसी एक बात से ही ये हदीस अलग नामों के साथ बयान कर दी गयी है. आमतौर पर यह माना जाता है कि इस हदीस का मतलब है कि ईसा और मुहम्मद सल्ल. के बीच कोई नबी नहीं है. मगर इससे ईसा और मुहम्मद सल्ल. के करीबतरीन ज़माना होने से भी मुराद ली जाती है.]
{इससे मुराद ली जाती है कि हर नबी अपनी कौम का प्रतिनिधी होता है तो हर कौम रसूल की मदद करनी होगी. मगर जब हर नबी से अहद लिया तो फिर उनकी उम्मते भी तो मुहम्मद साहब तक जिंदा रहनी चाहिये थी. इसके अलावा अहदे अलस्त में मौके पर भी अल्लाह को हर इन्सान से नहीं बल्कि उनके प्रतिनिधि नबियों से अहद लेना चाहिए थे.}
[दज्जाल और मेहदी की खबर]
■ Bible: Haggai 2:6-9: This is what the Lord Almighty says: In a little while I will once more shake the heavens and the earth, the sea and the dry land. I will shake all nations, and what is desired by all nations will come, and I will fill this house with glory, says the Lord Almighty. The silver is mine and the gold is mine, declares the Lord Almighty. The "glory of this present house will be greater than the glory of the former house", says the Lord Almighty. And in this place I will grant peace, declares the Lord Almighty.
■ Bible: Revelation : 19: 11-12: I saw heaven standing open and there before me was a white horse, whose rider is called 'Faithful and True'. With justice he judges and wages war. His eyes are like blazing fire, and on his head are many crowns. He has a name written on him that 'no one knows but he himself'.
{शिया परम्परा के मुताबिक, मेहदी का नाम लेने की इजाज़त नहीं है और शिया-सुन्नी दोनों असल नाम नहीं जानते}
जिस अग्नि का व्यापक रूप कभी नष्ट नहीं होता उसे तनूनपात कहते हैं (पहला रूप)। जब वह साक्षात होते हैं तब आसुर और नराशंस कहलाते हैं (दूसरा रूप)। जब वह अन्तरिक्ष में अपने तेज को फैलाते हैं तब मातरिशवा होते हैं, जब वह प्रकट होते हैं तब वायु के समान होते हैं (तीसरा रूप)।
■ ऋग्वेद (10:45:1): दि॒वस्परि॑ प्रथ॒मं ज॑ज्ञे अ॒ग्निर॒स्मद् द्वितीयं परिं जातवेदाः। तृतीय॑म॒प्सु नृमणा अर्जन्मिन्या॑न एनं जरते स्वाधीः।।
अग्नि का प्रथम जन्म स्वर्ग लोक में हुआ (रूप 1)। उनका द्वितीय जन्म हम मनुष्यों के मध्य हुआ, तब वे जातवेद कहलाये (रूप 2)। उनका तृतीय जन्म अन्तरिक्ष में हुआ... (रूप 3)।