Thursday, 22 January 2026

दर्शन विज्ञान और ईश्वर

  

दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:-


I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics- beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का अध्ययन] या सत्तामीमांसा/अस्तित्वमीमांसा (Ontology) [सत्ता, Being-होने, का अध्ययन] जो तत्वमीमांसा के सामान और अंतर्गत ही है. इस शाखा के 3 भाग हैं:-

(1) सृष्टि मीमांसा (Cosmology)

(2) ईश मीमांसा (Theology) अर्थात ईश्वर पर 3 प्रकार के विचार हैं:-

(i) Atheism

(ii) Agnosticism

(iii) Theism. इसमें ईश्वर का स्वरुप:-

(a) One-ism/Non-Dualism:- 

(अ) सगुण (Personalistic) है जैसे अब्रहिमिक धर्मों और भक्ति परम्परा में [इंसानी गुणों वाला]
(ब) निर्गुण (Impersonalistic)  जैसे अद्वैत वेदांत में [एक सार्वभौमिक शक्ति, सिद्धांत, चेतना जैसे में ब्रह्मन,ना कि इंसानी गुणों जैसा]
(स) तटस्थेश्वरवाद (Deism): ईश्वर सृष्टि को बना कर गौण हो गया है और अंत में फिर से अगगौण हो जायेगा. ईश्वर सृष्टि में घडी की तरह चाबी भरके अलग हो गया और ये अपने आप चल रही है. 

Voltaire (1694–1778), Rousseau (1712–1778), Benjamin Franklin (US founders, 1706-1790) को Diestic माना जाता है.

प्रकृतिवादी (Naturalist): ईश्वर कोई अलग सत्ता नहीं होना बल्कि  ब्रह्मांड, प्रकृति के अंदर ही मौजूद होना या अपने बनाये प्राकृतिक नियमों के दायरे में ही काम करना है/ये भौतिक संसार ही वास्तविक संसार है/प्रकृति ही अंतिम सत्य है/संसार अपने आप चलता रहता है]. नियतिवादी (Deterministic): घटनाएं, नतीजे पहले से तय, ईश्वर की मर्ज़ी या पूर्व जानकारी के अनुसार,  प्राकृतिक नियमों के कारण, लेकिन स्वतंत्र इच्छा मर्ज़ी भ्रम नहीं है बल्कि इन तय कारणों को समझने और स्वीकार करने से पैदा होती है, ना कि बिना किसी कारण के चुनाव करने से।

(b) Dualism:-

(c) Polytheism:- 

(अ) सर्वेश्वरवाद (Pantheism) [सब  ईश्वर है और ईश्वर सब है], 
(ब) सर्वेश्वरवाद समावेशी (Panentheism) [ईश्वर सब में है और सब ईश्वर में है]

(3) मनोविज्ञान (Psychology of  Mind/Soul): Psyche का अर्थ आत्मा है इसलिए इसका आरम्भ Science of the Soul के रूप में हुआ था लेकिन अब ये आधुनिक व्यवहार, मन, चेतना का वैज्ञानिक अध्ययन है जो आत्मा को consciousness, identity, and spirituality [connecting with something greater for meaning, sacredness, peace] के रूप में समझता है.

II. ज्ञानमीमांसा (Epistemology- Science/Theory of knowledge): यह ज्ञान की प्रकृति, सीमाओं का अध्ययन है. इसमें प्रत्यक्ष अनुमान, उपमान, शब्द आदि जैसे प्रमाण है. इसमें Rationalism (logic/reasoning/बुद्धिवाद-बुद्धि से ज्ञान प्राप्त होता है), Empiricism (प्रत्यक्ष इन्द्रिय ज्ञान/अनुभव से ज्ञान प्राप्त होता है/ by Descartes/Locke), Criticism/Critical Theory (समीक्षावाद/ ज्ञान के लिए बुद्धि और अनुभव दोनों द्वारा समीक्षा आवश्यक - by Kant), Intutionism (अंतःप्रज्ञावाद - बौद्धिक ज्ञान के विरोधियों ने अंतर्ज्ञान को साधन माना), Skepticism (संदेह करना जब तक  प्रमाण न हो), Mysticism (रहस्यवाद- परमतत्व रहस्मय है जो जानाना भी एक रहस्य है), Pragmatism (ज्ञान का मूल्य व्यावहारिक परिणाम से मापा जाना), जैसी विधियां भी हैं.  

III. मूल्यमीमांस/शास्त्र (Axiology). यह मूल्य और आदर्शों का अध्ययन है और इसके 2 भाग हैं:-

(1) नितिमिमांसा (Ethics- morality and values): शुभ–अशुभ, नैतिक-अनैतिक, सही–गलत कर्मों. जो अच्छे परिणाम देता है, वही नैतिक है (Consequentialism/ Utilitarianism), कर्म का नैतिकता कर्तव्य, नियम से तय होता है, परिणाम से नहीं। (Deontology - Kant), नीति का केंद्र कर्म नहीं, बल्कि चरित्र है (Virtue Ethics).

(2) सौंदर्यमीमांसा (Aesthetics-beauty and art): देखने वाले पर निर्भर (subjectivism), वस्तु में निहित (Objectivism), संस्कृति और संदर्भ पर निर्भर (Culturism/ Contextualism) 

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◆ अस्तित्ववाद (Existentialism): अस्तित्व क्या है? मनुष्य होने का अर्थ क्या है? स्वतंत्रता, चयन, प्रामाणिकता (authenticity) क्या हैं?

◆ सिनिकवाद/निंदकवाद (Cynicism) और स्टोइकवाद (Stoicism/बैरागी) दोनों प्राचीन यूनानी दर्शन हैं जो सादगी, प्रकृति के अनुसार जीवन जीने और बाहरी चीज़ों के प्रति अजुड़ाव पर जोर देते हैं. निंदकवाद सामाजिक मानदंडों को पूरी तरह से अस्वीकार करता है, जबकि स्टोइकवाद तर्क और सद्गुण के माध्यम से समाज के भीतर सामंजस्य स्थापित करने पर ध्यान केंद्रित करता है. निंदक 'कुछ भी नहीं' इच्छा रखते हैं, जबकि स्टोइक हर परिस्थिति में शांत और संयमित रहना सीखते हैं, जिसमें बाहरी चीज़ों को नियंत्रित करने के बजाय अपनी प्रतिक्रियाओं पर ध्यान केंद्रित किया जाता है.

◆ Dystheism: एक विश्वास है कि ईश्वर पूरी तरह से अच्छा नहीं है बल्कि बुरा, उदासीन, या नैतिक रूप से दोधारी हो सकता है.

◆ Realism: (यथार्थवाद/वस्तुस्वतंत्रवाद) दुनिया और वस्तुएँ हमारी सोच या विश्वास से स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में हैं। चीज़ें, प्रॉपर्टीज़, नंबर, आकार  मौजूद हैं, चाहे हम उनके बारे में सोचें या नहीं।

◆ Electicism: यूनानी लोग दार्शनिकों के मतभेदों पर झगड़ने की बजाय उनका संग्रह करते थे और जिस जिस के जो जो मत अच्छे लगते थे, उन्हें अपने जीवन के लिए चुन लेते थे. 

◆ सोफिस्ट यूनानी समुदाय शिक्षकों का वर्ग था जो फीस के बदले विभिन्न ज्ञान सीखाने का कार्य करते थे. 

◆ In Greek philosophy and mythology, deus creatus (created god) is God made by humans and deus humanoid (humanoid god) is God imagined like humans.

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सार्वभौमिक सत्य (Universal Truth) की मूल प्रकृति/ स्वरूप:-

(1) भौतिकवाद (Materialism)/ पदार्थवाद: वह भौतिक है. भौतिक से ही चेतना जन्म लेती है क्योंकि भौतिक तत्वों के उपयुक्त मिश्रण से ही चेतना पैदा होती है. जैसे भौतिक दिमाग से ही अभौतिक चेतना जन्म लेती है. जैसे भौतिक  कंप्यूटर (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से चेतना जन्म लेती है. इसके अनुयायी हैं, चार्वाक, मार्क्स व एंजेल्स.

(2) आदर्शवाद, प्रत्यवाद (Idealism)/ आध्यात्मवाद (Spiritualism)/ चेतना (Conscience): वह चेतन  है. शरीर और चेतना दोनों अलग हैं. इनके विद्वान है शंकराचार्य, हीगेल. इन दोनों का मत है कि जैसे सपने में चेतना नहीं होती बल्कि सब कुछ भौतिक स्तर पर हो रहा होता है क्योंकि महसूस भी हो रहा होता है, वैसे ही ईश्वर के चिंतन, विचार में सृष्टि चल रही है, सपना टूटते ही प्रलय हो जायगी.

(3) तटस्थतावाद (Neutralism)/ निरपेक्षवाद: वह इन दोनों में से कोई भी नहीं है. 

(4) द्वैतवाद (Dualism): वह भौतिक (materialistic) और चेतना (conscience) दोनों है. Descartes का Interactionism कहता है कि अगर पदार्थ और चेतना एक-दूसरे से पूरी तरह अलग होते तो उनके बीच सपर्क संभव ही नहीं होता [उसने कहा कि I think therefore I am].

भारतीय दर्शन में सत्य की प्रकृति को समझने के लिए वर्गीकरण:-


(1) बहुतत्ववाद (Pluralism): पूर्व मीमांसा, न्याय, वैशेषिक दर्शन इसी में आते हैं. 

(2) एकतत्ववाद/ अद्वैतवाद (Monism): उत्तर मीमांसा या वेदांत दर्शन इसी में आता है (संतुष्टिदायक क्योंकि क्योंकि केंद्रित, लोकप्रिय, तार्किक और स्वाभाविक).

(3) द्वैतवाद (Dualism) [गहराई में अद्वैतवाद ही]: सांख्य व योग दर्शन इसी में आते हैं (यह पदार्थ [प्रकृति] और चेतना/विचार/भावना [पुरुष] का संगम है और पदार्थ चेतना-जीवन पैदा नहीं कर सकता).


सार्वभौमिक सत्य की  प्रकृति और भारतीय/पाश्चात्य दर्शन:-

Pluralism Materialism: Charvaka [केवल भौतिक तत्त्व वास्तविक]
Pluralism Idealism:  Leibniz (Monadology) [असंख्य स्वतंत्र चेतन सत्ता-Monad]
Pluralism Neutralism: William Jones, Bertrand Russell [मूल तत्त्व न भौतिक न चेतन]
Pluralism Dualism: Buddha [पदार्थ-चेतन अस्थायी/क्षणिक], Jain [जीव-अजीव अनेक], Mimansa, Nyay/Vaisheshik
Monism Materialism: Thales [जल  मूल तत्त्व] 
Monism Idealism:  Aadi Shankracharya [ब्रह्म एकमात्र सत्य]
Monism Neutralism: Spinoza [Mind, Matter एक ही Substance के गुण ]
Monism Dualism: XXX
Dualism Materialism: XXX
Dualism Idealism: XXX
Dualism Neutralism: XXX
Dualism Dualism: --- 

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◆ Thales (624–546 BC) is considered the first philosopher in West for seeking naturalistic explanations for the world, moving away from myths. He was one of the Seven Sages of Ancient Greece. For Thales, the ultimate matter is water. Anaximander was his disciple. He contrary argued that the ultimate matter should be boundless/eternal. Further, Anaximenes was his disciple. They together was called Milesian School of Greek Philosophy. 

◆ Xenophanes (570–475 BCE) proposed a radical, non-anthropomorphic conception of the divine, often described as a formless, single, supreme God. He was a pioneer in criticizing the traditional Greek view of gods as human-like, flawed, and multiple Gods.

◆ Pythagoras (532 BC), mathematician and philosopher

◆ एम्पेडोकल्स (Empedocles,  490-430 BC) ने चार्वाक की तरह दुनिया के लिए भौतिकवादी या प्राकृतिक स्पष्टीकरण दिए और यह सिद्धांत दिया कि सभी पदार्थ चार मौलिक, शाश्वत तत्वों से बने हैं: पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि ।

◆ Socrates (469-399 BC) is  acclaimed as the father of Western philosophy. His disciple was Plato, whose Republic is world famous book and Plato's disciple was Aristotle.

सुकरात का दर्शन  व्यवहार, नैतिकता और बौद्धिकता पर था. प्लेटो का मानना ​​था कि सृष्टि के चरम तत्व दो हैं, good और matter. अच्छाई का स्वरूप वास्तविकता का सबसे ऊँचा सिद्धांत है और पदार्थ निराकार है. ब्रह्मांड एक तर्कसंगत डेमियर्ज द्वारा व्यवस्थित है - इनमें से किसी को भी वह ईश्वर नहीं कहता। जबकि अरस्तु ने कहा ये दो चरम तत्त्व, matterऔर (उसकी) form  हैं. 

यूनानी दर्शन ही यूरोपीय दर्शन था. अरस्तु का मानना था कि सृष्टि में सारा परिवर्तन उद्देश्य की तरफ गति है. ईसाइयत के बाद दर्शन में धर्म प्रभाव भी चलता रहा और St. Augustine (354-430), St. Thomas Aquinas जैसे दार्शनिक भी हुए. मगर फिर बेकन (Francis Bacon, 1561 – 1626) ने सबसे पहले  Aristotle के तर्कशास्त्र (Deduction) को अस्वीकार करेक  आधुनिक अनुभववाद (Empiricism) को जन्म दिया. इससे पहले दार्शनिक धर्म +दर्शन के समन्वय में विचार रखते थे. इसने धर्म से स्वतंत्र दर्शन रखा. 

◆ डेकार्ट (Descartes, 1596 – 1650) आये और उन्हें Father of Modern Philosophy कहा गया। डेकार्ट का मानना था कि सृष्टि में जो कुछ हो रहा है सब प्राकृतिक नियमों अनुसार हो रहा है और आयोजन का कोई हस्तक्षेप नहीं है. बेकन और डेकार्ट ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं. डेकार्ट ने चरम द्रव्य को ultimate/supreme substance कहा. इनको Sceptic माना जाता है पर वह उनका माध्यम भर था, वो असल में एक Rationalist थे.

देकार्त का ईश्वर सृष्टि से बाहर है और सृष्टि से को सम्बन्ध नहीं रखता जबकि स्पिनोज़ा के ईश्वर में ही सृष्टि और सृष्टि में ही ईश्वर है.  

◆ लॉक (Locke, 1632–1704) — आधुनिक Father of Empiricism) माने जाते हैं। ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं.

◆ स्पिनोज़ा (Spinoza, 1632–1677/Jew-boycotted) ने Monism यानि ईश्वर-प्रकृति को एक और Mind–Body को एक ही Substance माना. इसने देकार्त के मत की कमियों को सुधार कर अपना दर्शन बनाया. 

◆ लाइबनिज़ (Leibniz, 1646–1716) ने Monads (नाम ब्रूनो से लिया) का सिद्धांत दिया जो ब्रह्मांड की  अदृश्य, आत्मिक, अटूट,  स्वतंत्र, मूल इकाइयां हैं जिनके बीच  ईश्वर ने पहले से तय तालमेल बनाया है। लाइबनिज़ का मानना था कि सब कुछ होता तो उद्देश्य पूर्ति के लिए मगर परमात्मा इसके लिए प्राकृतिक नियमों को प्रयोग करता है.  

◆ बर्कले (Berkeley, 1685–1753) एक दार्शनिक, बिशप और नास्तिक भौतिकवाद का विरोधी था. इसने लॉक की कमियों को सुधार कर अपना दर्शन बनाया.

◆ ह्यूम (Hume, 1711–1776) एक संदेहवादी (Skeptical) दार्शनिक थे।

◆ कांट (Kant, 1724–1804) सबसे प्रभावशाली आधुनिक जर्मन दार्शनिक थे। Kant said: We do not create the world, we structure or build it. कांट: आँखों पर चश्मा (फ़िल्टर/मन) लगा है, हम  उस चश्मे के बिना दुनिया को नहीं देख सकते. दार्शनिक विवेचना में दो मार्ग प्रसिद्ध हुए, विवेकवाद (स्पिनोज़ा, लाइबनिज़ द्वारा उंचाई तक पंहुचाना) और अनुभववाद (ह्यूम द्वारा उंचाई तक पंहुचाना). कांट ने तीसरा मार्ग चुना  Critical Philosophy/Criticism/Critique का. Kant believed in God as a moral necessity, not as a provable object.

◆ हीगल (Hegel, 1770–1831) एक जर्मन दार्शनिक था और उसके अनुसार ईश्वर व्यक्तिगत नहीं, बल्कि चेतना में प्रकट होने वाला Absolute Spirit/ Reason है, जो मानने की नहीं, बल्कि समझे जाने की प्रक्रिया है और वह चर्च कि बजाय दर्शन में जीवित है. ईश्वर सर्व्यापक होते हुए भी निरपेक्ष सत्ता है. हीगल और शंकर एक ही विचार वाले हैं, केवल अंतर ये है कि हीगल अनुसार सृष्टि वास्तविक है और शंकर अनुसार भ्रम. 

◆ जेम्स मार्टिन्यू (James Martineau, 1805–1900) ने अपनी किताब 'द स्टडी ऑफ़ रिलिजन' ने एथिकल बुनियादों पर ईश्वर के अस्तित्व के लिए तर्क दिए हैं. 

◆ नीत्शे (Nietzsche, 1844-1900) का मत था कि God is dead, जिसकी अर्थ था कि समाज में इसाई विश्वासों का खत्म हो चूका है. इस घोषणा के कारण समाज में शून्यवाद (Nihilism) का खतरा पैदा हुआ, जहाँ जीवन का कोई अर्थ नहीं रह गया.

 James Watt (1736–1819), Hermann Lotze (1817–1881), William James (1842–1910), James Ward (1843–1925), Pringle Pattison (1856-1931) believed in God.

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Dante (1265-1321) was a Italian poet, writer, philosopher.
Voltaire (1694-1778) was a writer and philosopher
Rousseau (1712–1778) was a French philosopher.

Friedrich Engels (1820-1895) was a German philosopher.
Bertrand Russell (1872-1965)
Jean Paul Sartre (1905–1980) was a French philosopher in existentialism.

Archimedes (287–212 BC) was a Greek mathematician, scientist, engineer, astronomer.
Fibonacci (1170–1250), an Italian mathematician.

Copernicus (1473-1543), first to say earth moves around sun
Martin Luther (1483-1546) was a German priest, theologian, author.
Bruno (1548-1600), burned to death for the same concept and anti christian beliefs. He said that God is the Monad of monads (conscious atoms).
Gallileo (1564-1642)
Campanella (1568–1639) was deeply religious, believing in God as the ultimate source of being.
Kepler (1571-1630)

Pascal (1623–1662) was a French mathematician, scientist, philosopher, Catholic.
Newton (1642-1727)

Adam Smith (1723-1790) was a Scottish economist and philosopher 
Charles Darwin (1809-1882)
Herbert Spencer (1820-1903), a philosopher, psychologist, scientist originated the expression "survival of the fittest" after reading Charles Darwin.
Karl Marx (1818-1883)

Leo Tolstoy (1828-1910), a Russian writer
Sigmund Freud (1856-1939) 

Al-Kindi (801–873) is considered as father of Arab philosophy and was a mathematician, physician.
Al-Farabi is credited as the first Muslim who presented philosophy as a coherent system in the Islamic world.
Al-Razi, a Persian physician, philosopher and alchemist. 
Ibn Sabin was an Sufi philosopher, the last philosopher of the Andalus in the west land of Islamic world.
Ibn Khaldun was an Arab scholar, historian, philosopher, and sociologist.
Abbas ibn Firnas
Al-Biruni
Ibn Sina
Omar Khayyam was a Persian poet and polymath, 
Ibn Rushd was an Andalusian polymath and jurist 

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Tuesday, 23 December 2025

नास्तिक बनाम आस्तिक - भाग 1 (इतिहास और बुनियाद)

 

 

आइये आज हम नास्तिक बनाम आस्तिक विषय का इतिहास और बुनियाद समझते हैं. नास्तिकों और आस्तिकों में हमेशा से ही ईश्वर को लेके बहस चलती आ रही है. आज नास्तिकता का दौर चल रहा है. एतिहासिक तौर पर नास्तिकता की नींव लगभग 2500 साल पुरानी है जो भारतीय दर्शन काल में पड़ गयी थी. यानी इस्लाम से 1000 साल पहले. मगर इसकी पुनर्स्थापना 500 साल पहले रेनेसाँ युग में दुबारा हुई. यानी इस्लाम के 1000 साल बाद. 19वीं सदी की शुरवात में हुए कार्ल मार्क्स, चार्ल्स डार्विन, सिगमंड फ़्रायड ने आधुनिक समय में नास्तिकता को बेहद ज़्यादा मज़बूती दी. आज एक्स-मुस्लिम बनने का ट्रेंड भी ज़ोरों पर है जिसके पीछे कारण हैं, उनके ज़ाती तजुर्बे, उनके सामने आई मज़हब की गलत एक्सप्लेनेशन और मौजूदा इस्लामोफोबिक माहौल. अपने अक़ाईद पर अड़े रहने के मामले में आज मुल्हिद उन मज़हबी पेशवाओं से भी ज़्यादा अड़ियल हैं जिन्हें वो अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं. ख़ैर असल में नास्तिक ईश्वर को इसलिए नहीं मानना चाहते क्योंकि इसके बाद वो अपनी मर्ज़ी से ज़िन्दगी नहीं जी पाएंगे. उन्हें अपने ऊपर कोई अथॉरिटी नहीं चाहिए. अगर नास्तिकों को कहा जाए कि ईश्वर को मान कर भी आपको जीवन अपनी मन-मर्ज़ी से जीने की आज़ादी दी जाती है तो वो शायद फ़ौरन ईश्वर को मान लेंगे. नास्तिक नेचर या क़ुदरत को ईश्वर के बराबर मानते ही इसलिए हैं क्योंकि नेचर अखलाक या कर्मों पर कोई भी पाबंदी नहीं लगाती. 
  
 
■ आस्तिकों-नास्तिकों के सतही तौर पर 5 प्रकार (Worldviews)

 
 
हम सबसे पहले आस्तिकों और नास्तिकों को सतही तौर पर  5 कैटेगरी में बाँट कर उनके Worldviews समझते हैं. 
 
पहले कैटेगरी में वो लोग आते हैं, जो कई ख़ुदाओं में यक़ीन रखते हैं और पोलीथिएस्ट कहलाये जाते हैं. इनमें वो लोग भी आते हैं जो हर चीज़ को ख़ुदा मानते हैं और पेन्थिएस्ट कहलाये जाते हैं. इनकी दलीलें  सबसे कमज़ोर होती हैं. इस कैटेगरी में आम हिन्दु और क़दीम मिस्र, ग्रीक, रोमन, नॉर्स जैसे विभिन्न (विलुप्त हो चुके) पेगन मज़ाहिब आते हैं. 
 
दूसरी कैटेगरी में वो लोग आते हैं, जो यह मानते हैं कि कोई भी ख़ुदा या क़ायनात का ख़ालिक़ नहीं है। ये एथिएस्ट कहलाये जाते हैं. इनकी दलीलें सतही तौर पर असर डालती हैं मगर मेरिट में कमज़ोर होती हैं और पूरी तरह खरी नहीं उतरती हैं। ज़्यादातर साइंटिस्ट ख़ुद को इस जमात में शुमार करते हैं. इनमें बहुत से मिस्टिकल, सूफी या अध्यात्मिक मज़ाहिब भी आते हैं जैसे बौद्ध, जैन, कन्फुयशियस, ताओ और शिंतो मज़ाहिब. 
 
तीसरी कैटेगरी में वो लोग आते हैं, जो ये कहते हैं कि वो यकीन से नहीं जानते कि कोई ख़ुदा है या कोई ख़ुदा नहीं है. इनमें वो लोग भी आते हैं, जो ये मानते हैं कि कोई ख़ुदा तो नहीं है पर इस क़ायनात का कोई ख़ालिक़ ज़ुरूर है और वो ख़ालिक़ खुद ये क़ायनात या क़ुदरत ही है। इनकी दलीलें तुलनात्मक रूप से मज़बूत होती हैं पर उनसे ये किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाते हैं। ये एगनोसटिक कहलाये जाते हैं. ख़ुदा के तसव्वुर पर ये नास्तिकों से ज़्यादा निष्पक्ष होते हैं। ये खुदा को मानकर भी ज़िन्दगी जी लेते हैं क्योंकि अभी तक ये साबित नहीं हो पाया है कि उसका वजूद नहीं है. ये खुदा को ना मानकर भी ज़िन्दगी जी लेते हैं क्योंकि अभी तक उसका वजूद पूरी तरह साबित नहीं हो पाया है. कुछ साइंटिस्ट और बहुत से फिलोसोफरस एगनोसटिक जमात में आते हैं। 
 
चौथी कैटेगरी में Deistic लोग आते हैं, जो ये मानते है कि कोई खुदा मौजूद है पर वो ज़ाती खुदा या personal God नहीं है. उसका न तो कोई मज़हब है, न किताब, न पैग़म्बर और ना ही तख़लीक़ के बाद अब क़ायनात या मख़लूकात से उसका कोई राब्ता या वास्ता है. इनके ख़ुदा को गॉड ऑफ स्पिनोज़ा भी कहा जाता है. स्पिनोज़ा 17वीं सदी का एक दार्शनिक था. उसी ने दुनिया के सामने ऐसे ख़ुदा का कॉन्सेट खुलकर रखा था. आइंसटीन और कई साइंटिस्टस को इसी अक़ीदे का हामी माना जाता है। इनके तर्क मज़बूत होते हैं पर उनसे निकाले गए ज़्यादातर नतीजे गलत होते हैं क्योंकि अगर ये क़ायनात किसी ने बनायी है तो बनाने वाला इससे लापरवाह नहीं हो सकता। इनमें ब्राह्मो समाज, Determinist, Naturalist वगैरह आते हैं.
 
Spinoza was a Determinist who believe that everything is caused by something, following necessary laws, nothing is random or free in the absolute sense. He believed that everything in the universe, including human actions, follows necessary causal laws. He did not believe in free will in the usual sense. He did not believe in a personal God (conscious, aware, relational). He believed that God has created the universe and left it like that on its motion means He just kept making things and have no relation to its creation. This is absurd as there are only two possibilities: the universe was created either by chance or designed, there is no chance of a deistic God.
 
पांचवीं कैटेगरी में वो Theist लोग आते हैं, जो इस क़ायनात के एक निराकार खुदा में यक़ीन रखते हैं और क़ायनात को बनाने के पीछे का मक़सद, ख़ुदा के मज़हब के ज़रिए समझते हैं। पैगम्बरों और उनकी किताबों को हिदायत का ज़रिया बनाते हैं. इनमें तीनों अब्राहिमिक मज़हब आते हैं और एक हद तक पारसी मज़हब को भी इनमें शामिल किया जा सकता है. 
 
अंत में मैं बस यही कहना चाहूँगा कि निष्पक्ष तौर पर ये कहना ज़्यादा बेहतर है कि 'मैं ईश्वर में यकीन रखता हूँ' या ये कि 'मैं ईश्वर में यकीन नहीं रखता हूँ'. मगर ये कहना कि 'मुझे पता है कि ईश्वर मौजूद है' या ये कहना कि 'मुझे पता है कि ईश्वर कतई मौजूद नहीं हैं', ऐसे दावे बहुत से सवालों को पैदा करते हैं।
 
 
 
■ साइंस और फिलॉसफी: इतिहास, दायरा, हदें
 
 
 
  
ईश्वर के अस्तित्व के विरुद्ध हमेशा Science या philosophy से तर्क दिए जाते हैं. सो आज हम Science और philosophy के इतिहास और कार्यक्षेत्र को डिटेल में समझने की कोशिश करेंगे. ईश्वर के वजूद को विज्ञान की बुनियाद पर समझने से पहले, नास्तिकों को Science की history, scope और  limitations को जान लेना चाहिए। चीज़ों को Specialization के तौर पर समझना तो modern दौर में जाके शुरू हुआ है. जबकि आज से 2500 साल पहले Knowledge और information सीमित थी. क्योंकि तब population बहुत कम थी और दुनिया globalized नहीं थी. इसलिए उस वक़्त अमीर वर्ग या aristocrat class ही science, philosophy या arts के क्षेत्र में जाने की हैसियत रखते थे. और अक्सर एक ही व्यक्ति कई कई fields में माहिर होता था. जैसे philosophy, science, mathematics, astronomy, arts, writing, medicine etc. यह वही समय था जब कई महान विचारक सामने आयें, खासकर युनान और भारत में, जैसे Pythagoras, Archimedes, Aristotle, Aryabhatt, Varahmihir, Panini आदि. ऐसे विद्वानों ने existence और nature का एक साथ अध्ययन करना शुरू किया। 
 
तब Science और philosophy अलग-अलग fields नहीं थीं। बल्कि Science, philosophy का ही हिस्सा थी. तब Philosophy, existence को समझने की कोशिश करती थी और science, nature को समझने की. इसीलिए तब science को natural philosophy पुकारा जाता था. मगर धीरे धीरे समय के साथ ये साफ़ हो गया कि, natural phenomena के बारे में उठने वाले सवालों के जवाब देने के लिए तो, scientific experiments वाकई कारगर थे. मगर  reality या meaning या purpose के बारे में, उठने वाले ultimate सवालों के जवाब देने के लिए, Science काफी नहीं थी. 
ख़ैर नतीजा ये हुआ कि धीरे-धीरे Science और philosophy अलग होने शुरू हुए. Science ने physical world यानी भौतिक संसार की empirical investigation करने पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया, जो observation, sensory experience, experiments से हासिल होता है. जबकि फिलॉसफी ने metaphysical सवालों, जैसे existence और universe के ultimate purpose या causes को समझने पर, ध्यान केन्द्रित करना शुरू किया, जो logic, reasoning, deliberation से हासिल होता है. meta का मतलब होता है, beyond. इसलिए metaphysics का मतलब है, वो ज्ञान जो Physics से परे या दूर है. Science और philosophy का असल अलगाव 15वी सदी में शुरू हुए renaissance period, और फिर आये Scientific revolution के साथ शुरू हुआ. इसी समय में Copernicus, Descartes और newton जैसे महान दार्शनिक और वैज्ञानिक हुए. 
 
आज उसी natural philosophy को natural science के नाम से जाना जाता है. और ultimate purpose (rather than the prior causes) जैसे existence क्यों मौजूद हैको समझने के ज्ञान को  philosophy के अंतर्गत Teleology नाम दिया गया है. Philosophy उन सवालों का जवाब देती है, जो science के दायरे से बाहर हैं। इसलिए Questions of purpose, विज्ञान के दायरे से बाहर हैं, और वो theology, philosophy, metaphysics से जुड़े हुए हैं। 
 
विज्ञान materialistic world और matter की study करता है, जैसे कि चीज़ें क्या हैं, कैसे काम करती हैं, किन कारणों से होती हैं. पर विज्ञान इसका जवाब नहीं देता, कि वो चीज़ें क्यों हैं? Ultimate why का मतलब है, कि universe और  life के, ultimate purpose या meaning क्या हैं? 

आज तक Science द्वारा ईश्वर के अस्तित्व की जांच नहीं करी जा सकी है, क्योंकि Scientific तरीकें, सिर्फ observable या testable events और objects तक ही महदूद हैं। ईश्वर को physics के इन तरीकों से देखा, मापा या परखा नहीं जा सकता। नतीजतन, साइंस न तो ख़ुदा को साबित करती है और न ही ख़ुदा का इनकार करती है। ख़ुदा के बारे में Science, neutral है. हालांकि, कोई भी Scientist ख़ुदा का इंकार करने की ज़ाती राय रख सकता है. मगर Scientists के ऐसे personal opinions को  scientific thoughts नहीं कहा जाना चाहिए। 
 
असल में ख़ुदा के बनाये Laws of Nature जो हमने खोज लिए हैं वही Science है और बहुत से कानून हम भविष्य में खोजेंगे। Science universe को जानने का एक तरीका है जो अपने हक़ाईक के ज़रिये ख़ुदा तक भी पहुंचा सकता है. इसलिए आज गहरी researches के बाद Scientists ये कह रहे हैं कि यह universe एक intelligent design है. जैसे हम बाहर की दुनिया का मुआयना करते हैं कि कब, कैसे, क्यों चीज़े बनी हैं, ऐसे ही जब इन्सान अपने वजूद को समझने की कोशिश करता है तो वो जान जाता है कि वो भी बना हुआ है. इंसान इस universe में ज़र्रा बराबर और बेबस मख़लूक़ है मगर फिर भी बेहद  extra-ordinary है।  
 

 
■ अंतिम सत्य की खोज: इतिहास से वर्तमान

 
 

अब हम इंसान द्वारा करी जा रही अंतिम सत्य की खोज का, इतिहास और वर्तमान जानने की कोशिश करते हैं. इंसान में Self awareness, Conscience, Reasoning, Analytical thinking, Aesthetic sense जैसे गुण हैं. इसलिए शुरवात से ही तमाम इन्सान अपने वजूद के सिलसिले में दो approaches अपनाता आया है. पहली approach में इन्सान, इस क़ायनात, ज़िन्दगी और सत्य की प्रकृति को समझने की कोशिश करते रहे हैं. और दूसरी  approach में इंसान, सिर्फ अपने survival के लिए, या फिर ऐशो-आराम (कम्फर्ट) हासिल करने की जद्दोजहद में ही लगे रहे हैं. 
 
ये कायनात और जीवन क्यों मौजूद हैं, इस पर भी पारंपरिक रूप से 2 तरीकों से ही विचार किया जाता रहा है. पहला विचार ये रहा है कि इस कायनात का कोई ख़ालिक है. दूसरा विचार ये रहा है कि ये कायनात क़ुदरती तौर पर अपने आप बनी हुई है और ख़ुद ही अपने आप की ख़ालिक है। इनके अलावा, तीसरी कोई भी व्याख्या नज़र नहीं आती है. क़ायनात के बने हुए होने से, कोई इनकार नहीं करता है। आज तक किसी scientist ने इसका इनकार ही नहीं किया कि क़ुदरत ख़ालिक़ नहीं है। नास्तिक कहते हैं कि क़ायनात ने ही खुद को बनाया है। आस्तिक कहते हैं कि क़ायनात को भी बनाने वाला मौजूद है। क़ायनात और इंसान, दोनों के पास गैर मामूली ताक़त और सलाहियत है, मगर फिर भी वो अपने आप की ultimate explanation नहीं कर सकते, जैसे कि उनका वजुद क्यों हैं? इस सवाल या क्यों, को जानने के लिए ही, मानव इतिहास में 3 तरीके उभर कर सामने आये हैं। 
 
पहला तरीका है कि इस सवाल का जवाब इंसानी अक़ल के ज़रिये हासिल किया जाएगा. इससे साइंस और फिलोसोफी वजूद में आईं। इसमें तजुर्बें और सोच-विचार ज़रिया बनते हैं. क्योंकि साइंस पहले ही philosophy से अपने रास्ते अलग कर चूकी है, और आमतौर पर लोगों को इस अलगाव की जानकारी नहीं होती है,  इसलिए इस सवाल पर अब, बॉल कभी साइंस के पाले में जाती है और कभी philosophy के। दुसरा तरीका है कि इस सवाल का जवाब अपने बातिन या अंदर से लिया जाएगा, यानी इनरसेल्फ से। इससे अध्यात्म और मिस्टिसिज़्म, तसव्वुफ़ या सूफीवाद की पैदाइश हुई। इसमें बाहरी दुनिया की बजाय अपने अंदर झाँका जाता है। ये तरीका भारत में चार्वाक, बुद्ध और महावीर के वक़्त में मक़बूलियत पाते हुए, यूनानी, चीनी और जापानी अध्यात्म का सफर तय करते हुए, मुस्लिम वर्ल्ड में सूफ़ीइज़्म की शक्ल में बहुत ऊँचाइयों पर पहुंचा। तीसरा और आखिरी तरीका है कि इस सवाल का जवाब, ख़ुद वजूद बनाने वाले से ही पूछ लिया जाए। यही से ख़ुदा, मज़हब, रिसालत और किताब का concept सामने आता है। जैसे कोई नया प्रोडक्ट बनाने के बाद उसका एक मैन्युअल तैयार किया जाता है और डेमो देने के लिये एक रिप्रेजेन्टेटिव को Exhibition में खड़ा कर दिया जाता है। उसी तरह ख़ुदा के प्रोडक्ट मज़हब के लिए किताब एक मैन्युअल का काम करती है और पैग़म्बर एक exhibition रिप्रेजेन्टेटिव का।  ultimate explanation या इस क्यों सवाल का, जवाब पाने के लिए यही सबसे बेहतर तरीका है। क्योंकि आमतौर पर ज़िन्दगी की जद्दोजेहद में मुब्तिला, ज़्यादातर आम इंसानों को पहले दो तरीकों से न तो कोई खास वास्ता होता है और न उन रास्तों पर जाने के लिए वक़्त या रूचि. ख़ल्क के लिए कौन सा तरीका सबसे आसान और कारगर होगा, यह ख़ालिक ही तय कर सकता है. 

 
 
■ Science - Philosophy - Religion
 
 

 

अब हम Science Philosophy और Theology के बारे में समझेंगे. 

Universe के natural laws और environment की study को Science कहते हैं जो observation और experiment के ज़रिये करी जाती है. इसकी चार stages होती हैं, Observation, Hypothesis, Prediction, और result की Testing, जो repeatable होने चाहिए. 

इसी तरह, reality, existence, universe और knowledge के बारे में उठने वाले  fundamental questions की study को Philosophy कहते हैं, जिसका literal मतलब होता है love of wisdom. Philosophy की कई शाखाएं होती हैं जैसे:- Metaphysics (तत्त्वमीमांसा), Epistemology, Ethics, Logic और Aesthetics

Reality, existence, universe के असल nature और physical world के beyond या परे जो चीज़ें हैं, उनकी study को Metaphysics कहा जाता है.  जैसे कि  existence की ultimate reality क्या है, क्या ईश्वर का अस्तित्व है, आत्मा क्या है या consciousness क्या है आदि. ये सभी सवाल science के scope से बाहर हैं इसलिए ये चीज़ें unscientific नहीं कहलाई जा सकती.  metaphysics की सबसे अहम approach है Spirituality या Spiritualism/Spiritualism जिसे रूहानियत भी कहा जाता है. Spirituality का मतलब होता है अन्दुरुनी खोज, और इसका एक method Mysticism होता है यानी रहस्यवाद या Tasawwuf जिसका मतलब है direct experience, और इसी के एक method को मुस्लिम में Sufism (inner experiential dimension) पुकारा जाता है. ऐसे ही knowledge की nature, origin, scope और limits की study को epistemology कहा जाता है जैसे कि जो कुछ हम जानते हैं, वो कैसे जानते हैं, या इन्सान की समझ की हदें क्या हैं? इसी तरह, Philosophy की Ethics या values शाखा में सही और गलत की study करी जाती है और इसीलिए इसे Moral Philosophy भी पुकारा जाता है. Logic या mind शाखा में  reasoning और rationale के उपयोग के ज़रिये झूठ और सच में अंतर करने की study करी जाती है. Aesthetics शाखा में कला, सुन्दरता और स्वाद आदि की study करी जाती है.  

दूसरी ओर, God, religion, faith और उनके  nature की study को Theology कहते हैं और इसे सही से जानने के लिए अक्सर Science और Philosophy का संगम बेहद ज़रूरी हो जाता है. ये थी Science, Philosophy और Theology की परिभाषाएं. कोई भी  religious belief या faith जिसे science approve कर सकती है वो scientific कहलाया जाता है. पर अगर science किसी religious belief या faith को disapprove नहीं कर सकती है तो उस कारण से वो unscientific नहीं हो जाता है बल्कि वो metaphysical होता है. यक़ीनन ऐसे phenomena क़ायनात में मौजूद हैं जो scientific domain या realm के बाहर हैं और जिनकी हक़ीक़त science test या experiment नहीं कर सकती. Science metaphysical दावों को ना तो approve कर सकती है और ना ही disapprove.  

विज्ञान ना तो धर्म है और ना ही धर्म विज्ञान है. ना तो विज्ञान धर्म का स्थान ले सकता है और ना ही धर्म विज्ञान का स्थान ले सकता है. विज्ञान हर विषय पर हमारा मार्गदर्शन नहीं कर सकता क्योंकि विज्ञान केवल ये बताता है कि ईश्वर द्वारा स्थापित laws of nature कैसे कार्य करते हैं. मार्गदर्शन तो केवल ईश्वर कर सकता है. आसान शब्दों में कहूँ तो विज्ञान समाज को सहुलतें देता है, धर्म समाज को दिशा देता है और अध्यात्म समाज को शुद्धि और पवित्रता देता है. 

 

 

■ नास्तिकों से बहस की तरतीब

 
अब हम अपने तजुर्बों की बुनियाद पर ये जानने की कोशिश करते हैं कि नास्तिकों से बहस की तरतीब क्या होनी चाहिए. सबसे पहला argument यही होना चाहिए कि क्या ये क़ायनात अपने आप बनी हुई है या बनाई गयी है. दूसरा argument यह होना चाहिए कि अगर ये बनाई गयी है तो इसको किसने बनाया है. तीसरा argument ये होगा कि अगर इसको कोई बनाने वाला है तो वो कैसा या कितने हैं. फिर ये बात होगी कि क्या उसका कोई मज़हब या पैग़म्बर या किताब हो सकती है. बाकी तमाम सवालों पर आखिर में बात होनी चाहिए जैसे कि मौजूदा मज़ाहिब में कौन सा पहलू वाकई असल है और कौन सा मिलावटी है, या फिर मज़हब में फला-फला चीज़ क्यों है, या मज़हबी लोगों से दुनिया परेशान क्यों है वगैरह वगैरह. ऐसे एक-एक सवाल पर कई-कई घंटो बात करी जा सकती है जो हम कभी किसी और विडियो में detail में discuss करेंगे. फिलाहल बस ये समझ लेते हैं कि इन सवालों को एक-एक करके लेकर चलने से ही ख़ुदा का वजूद आसानी से समझा या समझाया जा सकता है। अगर इन सवालों की तरतीब बदल कर या नज़रअंदाज़ करके बात करी जाएगी तो मसला हल होने की बजाए dead-end की तरफ भी बढ़ सकता है. ये तरतीब अक्सर civilised atheist लोगों के साथ कामयाब होती है.
 
मगर क्योंकि इन्डियन सबकॉन्टिनेंट के मुलहिद, हर चीज़ में साइंस  को बुनियाद बनाते हैं इसलिए उनके लिए एक अलग तरतीब भी हो सकती है. वो ये कि सबसे पहले, क़ायनात के एक ख़ालिक होने पर कुछ बड़े ग़ैर-जानिबदार साइंसदानों और फलसफीयों का क्या कहना है, वो सामने रखा जाये. फिर ख़ालिक की तरफ इशारा कर रहे क़ायनात और हयात के हैरतअंगेज़ हक़ाईक़ सामने रखे जाएँ. इसके बाद उनसे Science, Philosophy और लोजिक based सवाल किये जाएँ. और सबसे आखिर में उनके मज़हब पर उठाये जा रहे सवालों के जवाब दिए जाएँ. 

 

■  Unanswered questions by Atheism and Scientism

 

 
अब हम उन सवालों के बारे में जानते हैं जिनके जवाब अभी तक नास्तिकता और Scientism नहीं दे पाया है. जो हैं big bang और singularity के बारे में, universe में मौजूद intelligence और perfection के बारे  में, निर्जीव में पैदा हुई life और consciousness के बारे में जिसने उसे स्वयं और उसके आस-पास के सम्बन्ध में जागरूक किया, इंसानों में पैदा हुई ज़बरदस्त competency और सलाहियतों के बारे में जो अन्य प्राणियों में नहीं दिखती है, और इन्सान की अपने अस्तित्व के सत्य की खोज के बारे में जिसे existential curiosity कहा जाता है. 

कई नास्तिकों और वैज्ञानिकों के अनुसार universe, life और consciousness, by Chance  अस्तित्व में आए हैं। इन्होने Chance को ही ईश्वर मान लिया है। वो कहते हैं कि nature खुद ही universe की Creator है। जबकि nature ना तो moral है और न ही immoral, बल्कि non-moral है। उधर आस्तिक कहते हैं कि nature या universe का भी एक Creator है। क्योंकि जब creation मौजूद है, तो creator भी मौजूद होना चाहिए 
(MWK). और वो  creator ही  Ultimate Creator है. 

असल में नास्तिकों ने प्रकृति को ही ईश्वर मान लिया है क्योंकि इनके अनुसार प्रकृति में सारे ultimate गुण उपलब्ध हैं जैसे कि उसका सृष्टि का मूल कारण और हर चीज़ का निर्माता होना, उसका सदा से और स्वयं अपने आप होना. जबकि ये सारे गुण आस्तिक ईश्वर के मानते हैं जैसे ईश्वर का अनादी, अनंत, स्वयं से होना. प्रकृति और ईश्वर की कोई ज़ाती शक्ल नहीं होती है. ईश्वर के 2 गुण जो इंसानों से सबसे अधिक सम्बंधित हैं, वो हैं करुणा और न्याय. ये दोनों गुण प्रकृति मानवों को नहीं दे सकती क्योंकि  प्रकृति तो मुर्दा है, वो ना सुन सकती है और ना बोल सकती है. मगर उस प्रकृति के दाता ईश्वर को जैसे ही आप alive और observer मान लेते हो, इन गुणों का प्रदर्शन होना या इनके हासिल होने की उम्मीद पैदा हो जाती है. ख़ैर इस तरह देखा जाये तो नास्तिक, आस्तिकों से बस एक पायदान नीचे खड़े हैं। फैसला नास्तिकों को करना है कि अब ऊपर चढ़ना है या वापिस नीचे उतरना है. 

 
Arguments in Atheism vs Theism debate
 
 
 

ये सत्य है कि ईश्वर के अस्तित्व को साबित करना हो या साबित नहीं करना हो, दोनों ही cases में कोई भी empirical evidence मौजूद नहीं है। नास्तिकों का ये मानना गलत है कि ईश्वर को साबित करने का burden of proof आस्तिकों पर है. ऐसे तो नास्तिकों पर भी ईश्वर का अस्तित्व नहीं होने का burden of proof होना चाहिए. वैसे भी नास्तिकता ना तो कोई neutral default position है और ना ही justification देने से exempted है.  
 
हम ज्ञान और तर्कों के आधार पर ईश्वर के अस्तित्व के बारे में जानने का प्रयास करेंगे. 

आमतौर पर knowledge के 3 Sources माने जाते हैं. पहला है Science जो Observation और experiment का नाम है. दूसरा है History जो Records और archeology से प्राप्त होती है. तीसरा source है Reason जो evidence से Infer किया जाता है, जैसे gravity और evolution को किया गया है.

इसी तरह ईश्वर के अस्तित्व पर होने वाली बहसों में भी 4 चीज़ों को आधार बनाया जाता है. पहला ईश्वरीय ग्रंथों को, जो universally, proof of God स्वीकार नहीं करा जाता है. दूसरा विज्ञान को, जो अभी तक ईश्वर को जांचने का tool नहीं बन पाया है. तीसरा है, ईश्वर के बारे में हुई observations को, जो subjective हो सकती हैं और उनसे अलग अलग निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं. अंत में बस चौथा आधार ही बचता है जो ईश्वर के अस्तित्व पर एक healthy discussion के लिए  neutral और common ground हो सकता है और वो है, logic या rationale.
  
Be careful while debating, as atheists may use logical fallacies (a flaw in reasoning that makes an argument invalid, deceptive, even if it sounds convincing.), rhetorical statements (a statement or question made for emphasis and not to get answer) and sweeping remarks (a comment that cover a large topic without considering facts) to diminish or win the debate unfairly. 
 
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Sunday, 14 December 2025

वंदेमातरम, राष्ट्रगान, भारतमाता

 

मुसलमान और वंदेमातरम: इतिहास और वर्तमान पर एक नज़र

 

1.

“वन्दे मातरम् वन्दे मातरम् सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम् शस्यशामलां मातरम् वन्दे मातरम् वन्दे मातरम् ।

शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीं फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीं सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीं सुखदां वरदां मातरम् वन्दे मातरम् वन्दे मातरम् ।”

मैं तेरी वंदना करता हूँ, मातृ (माता) [मातृभूमि/भारतभूमि]।

पानी से सींची, फलों से भरी, दक्षिण की हवा के साथ शान्‍त, कटाई की फ़सलों के साथ गहरी, ओ माता।

तेरी रातें चाँदनी की गरिमा में प्रसन्न हो रही हैं, ज़मीन खिलते फूलों वाले पेड़ों से बहुत सुंदर ढकी हुई है, हंसी की मिठास, भाषा की मिठास, सुख देने वाली, वरदान देने वाली है, ओ माता।

2.

आनंदमठ उपन्यास से भारत का राष्ट्रगीत वंदेमातरम लिया गया है जो संस्कृत/बंगाली में है। लेखक बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय/चटर्जी ने इसे 1881 के करीब लिखा था. जो ब्रिटिश अधिकारी भी थे. उपन्यास 1763 के ब्रिटिश विरोधी सन्यासी आंदोलन और 1770 के बंगाल अकाल पर आधारित था.

उपन्यास में बहुत जगह मुस्लिम विरोधी कंटेंट मौजूद है। इस पर टैगोर का भी यही विचार था।

जैसे कि कैसे शाही खज़ाना लूटा जाये, अंग्रेजों को बसाया जाये. मुसलमानों के घरो में आग लगा दो और लोग उन्हें मारने दौड़ते थे. मुस्लिम राज्य तबाह हो गया, हिन्दू राष्ट्र बनाने पर जोर. इसमें बंगाल के नवाब मीर जाफर को आड़े हाथों लेते हुए बाकी मुसलमानों के लिए दुर्भावना साफ लिखी मिलती है, जबकि बंगाल में सन्यासियो के साथ फकीरों ने भी विद्रोह किया था और अकाल में भी सभी धर्म के लोग मरे थे.

इसमें ब्रिटिश शासन की इनडारेक्ट तारीफ भी की गई है. जैसे अँगरेज़ भारत के रक्षस हैं, ब्रिटिश राज, मुस्लिम राज से बेहतर है.

गौर करने वाली बात है कि बंकिमचंद्र पत्रिका ने बंगदर्शन में मूर्तिपूजा को विज्ञान विरोधी बताया था। मगर वो भी जिन्ना, सावरकर की तरह ज़िन्दगी के दुसरे हिस्से धार्मिक राष्ट्रवादी बन गए।

1870 के करीब वन्देमातरम मूलतः एक वंदनागीत या स्तुति के रूप में रचा गया और अप्रकाशित रहा मगर फिर इसमें पक्तियां बढ़ा कर 1881 में आनंदमठ में प्रकाशित किया गया. ये गीत मुख्यतः देवी दुर्गा (के कई रूपों जैसे काली) के बारे में है जो कि आन्दोलनकारी गाते हैं.

1905 तक राजनितिक नारे में तब्दील हो गया. टैगोर ने गाया  और अरबिंद घोष ने सराहा. 1920 तक राष्ट्रगान की हैसियत पा चूका था. 1930 में जाके इस पर विवाद होना शुरू हुआ. गाँधी जी ने वन्देमातरम की तुलना अल्लाहु अकबर से करी थी जी पर हिन्दुओ को ऐतराज़ था.  1937 में नेहरु, बोस, टैगोर, आजाद आदि की  कांग्रेस कमिटी में इसके देविपूजा वाले हिस्से को काट कर, बाकी का अपना लिया. राजेन्द्र प्रसाद के कहने पर राष्ट्रगीत का दर्जा. वन्देमातरम के अर्थ राजिनितक परिस्थियों और समय अनुसार बदलते रहे हैं.

मगर शुरवाती स्टेंज़ा मातृभूमि के बारे में है।  शुरू से इसका आज़ादी के नारे के तौर पर इस्तेमाल शुरू हो गया था। अंग्रेज़ो ने इसे बैन कर दिया। शुरवात में इसे हिन्दू-मुस्लिम सभी गाते थे. मुस्लिम को कोई समस्या नहीं थी. फिर अंग्रेज़ो ने इसे चालाकी से मूर्तिपूजा से जोड़ने जोड़ने की साज़िश करी ताकि हिन्दू-मुस्लिम में खायी पैदा हो जो हुआ भी। वही फूट डालो शासन करो नीति. समझने वाली बात यह है इस गीत में शिर्क शामिल होने का मुद्दा बहुत बाद में जाके तूल पकड़ा और अंत में इसे जिन्ना ने लपका.

हालांकि इसे बंगालभूमि के लिए लिखा हुआ गीत भी माना जाता है. क्योंकि गीत में 7 करोड़ लोगों का ज़िक्र है, लगभग जितनी 1881 की जनगणना में तत्कालीन बंगाल की आबादी थी क्योंकि एक-डेढ़ सदी पहले तक बंगाली, बंगाल को ही बाकी भारत से भिन्न और बरतर हिस्सा मानते थे और नेपाल को हिन्दुराष्ट्र और हिंदी भाषियों को हिंदुस्तानी पुकारते थे।

3.

राष्ट्रगान के लिए 3 गीत चुने गए थे, जनगणमन, वन्देमातरम और इकबाल का सारे जंहा से अच्छा. जिसे उनके पाक चले जाने के कारण पहले ही रेस से बाहर कर दिया गया था. यानी लेखन से अधिक लेखक ज़ाती फैसले ने इस चुनाव पर असर डाला.  इसी तरह बंकिमचंद्र की हिन्दू-मुस्लिम एकता विरोधी मानसिकता का भी गीत के चुनाव के पर उतना ही असर पड़ना चाहिए था?

टैगोर के गीत जनगणमन के पेहले स्टेंज़ा को राष्ट्रगान दर्जा मिला क्योंकि वो इतिहास और भविष्य संजोय था। हालांकि दक्षिणपंथियों द्वारा जनगणमन के बैकग्राउंड को ब्रिटिश क्राउन की तारीफ़ बताया गया था क्योंकि वे वंदेमातरम को राष्ट्रगान बनाना चाहते थे मगर टैगोर एक ब्राह्मो समाजी थे. उन्होंने ने इन आरोपों को रद्द करते हुए कहा था कि ये ईश्वर पर आधारित है। भारत के सिवाय किसी भी देश का राष्ट्रगान ईश्वर की प्रशंसा नहीं करता है. सोचने वाली बात है कि (अगर कट्टरवादियों को) जनगण के बैकग्राउंड पर देश विरोधी होने का शक था तो वन्देमातरम का बैकग्राउंड खुलेआम भारतीय एकता और अखंडता का विरोधी था।

संविधान निर्माण के दौरान वन्देमातरम पर बहुत बहस हुई थी। खैर अंत में वन्देमातरम के पहले दो स्टेंज़ा को राष्ट्रगीत का दर्जा मिला. दोनों स्टेंज़ा में भारतभूमि का गुणगान था और कुछ भी देवीपूजा से जड़ा हुआ नहीं था।

4.

एंटी-मुस्लिम होने के कारण उपन्यास का विरोध करने में आज भी कुछ भी गलत नहीं है मगर इस बुनियाद पर गीत का शिद्दत से विरोध नहीं करना चाहिए। देवीमाता से जुड़े होने के कारण गीत का विरोध संविधान निर्माण के समय करने में भी कुछ गलत नहीं था. जब बहस जारी थी और माहौल सेक्युलर था तब गीत का विरोध भी गलत नहीं था। मगर इस बुनियाद पर आज भी गीत का शिद्दत से विरोध नहीं करना चाहिए. क्योंकि अब ये राष्ट्रगीत है और नफरती ताकतों के लिए एक बहाना बन चूका है. इस्लामफोफोबिया फैलाने का टूल है।

क्योंकि इस गीत के सिर्फ गैर-शिरकीया और मातृभूमि से जुड़े हुए अंश ही राष्ट्रगीत में लिए गए हैं

इसलिए अब इसका अंधा विरोध या कट्टर विरोध करना सही नही है।

5.

गीत में मातृ के मायने मातृभूमि, मादरे वतन, मदरलैंड से हैं. जिसका उच्चारण इस्लाम के मुताबिक जायज़ है। ज़मीन को मां मानना इस्लाम में कभी भी शिर्क नहीं माना गया है. मक्का को उम्मुल क़ुरा यानी बस्तियों की मां, पुकारा गया है। हालांकि कोई अपनी मातृभूमि को देवी माने तो ये उसका अकीदा है, हमारा नहीं। संविधान ने इसे देवीमाता के गीत के रूप में नहीं बल्कि मातृभूमि के गीत के रूप में स्वीकारा है। ये सबसे अहम बात है।

गीत में मां (मातृभूमि) की वन्दना को कहा गया है।

वंदना का मतलब होता है, पूजा, आराधना, नमन, श्रद्धा, भक्ति, प्रशंसा, आदर, सत्कार आदि.

वन्द धातु से बने शब्द वंदन का अर्थ है प्रणाम, स्तुति, सम्मान आदि। इसका (इन सभी शब्दों का) अर्थ उपासना नहीं होता जो कि इबादत का पर्यायवाची है। जैसे पूजा का मतलब होता है सत्कार, सम्मान करना, उचित व्यवहार करना (महाभारत, मनुस्मृति)।

क्योंकि संविधान ने भारतभूमि या मातृभूमि को कोई देवी या मूर्ति नहीं माना है. इसलिए यंहा वंदना शब्द भी पूजा-नमन के मायनों में नहीं बल्कि जयकार-सत्कार के मायनों में है। बहुत से शब्दों के अर्थ भावनासदर्भ पर निर्भर होते हैं।

6. (i)

हमेशा से वन्दना का अनुवाद हो होता आया है, वो है: 'मातृभूमि की जय (Hail) और मातृभूमि को नमन (Bow) किया जा रहा है.

जय का मतलब है विजय होना या प्रशंसा करना। मातृभूमि का जयकारा लगाने में हर्ज नहीं जैसे ‘मादरे वतन जिंदाबाद’ कहना। ज़िंदाबाद एक फ़ारसी उद्गम का शब्द है जिसका मतलब है जिंदा रहो, शाबाश।

ये नारा किसी जीवित, मृत, निर्जीव के आदर में लगाया जाता है। गांधीजी ज़िंदाबाद के लिटेरल अर्थ हैं कि गाँधीजी ज़िंदा रहे और मेटाफोरिकल अर्थ है कि गांधी विचारधारा चलती रहे। बाज़ शब्दों के खास वाक्यों-नारों में मेटाफोरिकल मतलब हो जाते हैं। कुछ प्राचीन शब्दो के मतलब वक़्त के साथ बदल जाते हैं जैसे धर्म, पूजा। वंदन का मतलब भी ‘जयकार (जिंदाबाद)’ लिए जाने चाहिए और लिए गए हैं।

6. (ii)

नमन (2 अर्थ निकाले जाते हैं)

वंदना का मतलब है: नमन, नमस्कार, प्रणाम (सम्मान-आदर में) [मतलब सलाम, Salute]

जैसे एक प्रसिद्द आधुनिक काव्यगीत में कहा गया है:-

देववाणीं वेदवाणीं मातरं वन्दामहे। चिरनवीना चिरपुराणीं सादरं वन्दामहे।

हम संस्कृत का वंदन (आदर, नमस्कार) करते हैं—जो देवों की वाणी है, वेदों की वाणी है, और हमारी मां की तरह है। वह बहुत प्राचीन होते हुए भी सदैव नई सी है, हम उसे सादर प्रणाम करते हैं।

वंदना का मतलब है: नमन, नमस्कार, प्रणाम (सजदे-रुके समान) [मगर मतलब सजदा-रुकू नहीं]

नम धातु से नमन बना है जिसका मतलब है: झुकना, सम्मान, अभिवादन। इसी से विनम्र शब्द बना है जिसका मतलब है: शिष्टाचार वश झुका व्यक्ति।

नमन बोलते हुए मायने Greetings के लिए जाते हैं। यानि ‘सम्मान में झुकते हैं’ कहना सांकेतिक होता है।  कोई भी सच में नहीं झुकता। जैसे Hats Off कहने पर कोई टोपी नहीं उतारता है।

झुकने (उपासनीय/सम्मानीय) के कई स्तर व प्रकार होते हैं: दंडवत, आष्टांग (सजदा), अर्ध शारीरिक (रुकू), उपरी धड़/गर्दन को थोडा झुकाना। वैदिक काल में ‘उपासनीय-नमन’ कौन से प्रकार का था हमें ज्ञान नहीं है। आज भी ‘सम्मानीय-नमन’ का प्रकार बोलने वाले की भावना पर निर्भर करता है, ना कि सुनने वाले की।  

नबी ने (नमाज़ जैसे आसन वाले) ताजीमी सजदे को मना किया था। पर सम्मान में ऊपरी धड-गर्दन को झुकाना सजदा-रुकू नहीं होता। जैसे (अंग्रेजों की तरह) हेट को सम्मान में झुकाना भी सजदा-रुकू नहीं होता।

मगर मुस्लमान तो सिर्फ सम्मान में) ‘झुकना’ कहने भर को ही ये मान लेता है कि वो सच में झुक गया और वो भी (इबादती) सजदा-रुकू की तरह.

जब कोई मुस्लमान कुछ समान उठाने के लिए किसी के सामने झुकता है तब तो शिर्क नहीं माना जाता क्योंकि लोगों को झुकने का उद्देश्य मालूम होता है।

अगर सिर्फ 'झुकता हूँ' बोलने से शिर्क होने लगता तो मुसलमानों को “मैंने उसे झुका के ही छोड़ा”, “उसने सबको झुका दिया”  जैसे वाक्य नहीं बोलने चाहिए।

 

6. (iii)

उर्दू में वंदना से 'सलाम माँ' मायने लिए जाने चाहिए। इसीलिए ए.आर. रहमान ने भी अपने (विवादित गाने में वंदेमातरम की व्याख्या मां तुझे सलाम के रूप में करी थी। आरिफ मुहम्मद खान (Ex-Governor/ Congressi) ने मायने 'माँ तस्लीमात' लिखे हैं। इंग्लिश में जिसका निचोड़ है: I Salute to Motherland

7.

संविधान में मज़हब की आजादी छूट है. दूसरों पर कुछ भी जबरन थोपना गलत है. गांधी जी ने भी वन्देमातरम को थोपने से मना कर दिया था पर ये आज भी हो रहा है, पहले से ज़्यादा। विडंबना ये है कि थोपने वालो को अक्सर इसके बोल या मायने मालूम नहीं होते हैं। देशभक्ति की भावना, नारों से ज़्यादा कर्मों में दिखाई देनी चाहिए। एकेश्वरवादी मुसलमानों का मूल विरोध सिर्फ धरती को पूजने, झुकने के शब्दों पर है (जो कि चर्चा का विषय है)। भारत की जय या जय हिंद कहने से किसी मुसलमान को कोई दिक्कत नहीं है।

8.

ख़ैर दक्षिणपंथीयों के लिए वंदेमातरम का मुद्दा तब तक ही ज़िंदा है जब तक मुसलमान इसे खुलकर अपना नहीं लेते। उसके बाद ये मुद्दा अपनी मौत मर जायेगा, सिवाय गड़े मुर्दे उखाड़ने वालों के।

सिस्टम से बाहर, सियासत से बेदखल, समाज से बहिष्कारित होते जा रहे मुसलमानों के लिए अपने ऐतराज़ खुलके जताने से बेहतर है, दूसरों के ऐतराज़ात को जितना मुमकिन और जायज़ है, उतना खत्म करना चाहिए. पहले जब मुसलमानों का एक रुतबा (जितना भी) मुल्क में क़ायम था, उसी के अनुपात में मुसलमान अपने विचार, ऐतराज़ जता दिया करता था और बाज़ काम भी अपने हक़ में करवा लिया करते थे। फिर से वो दौरआना मुमकिन है बशर्ते मुसलमान जज़्बातों की बजाय हिकमत से काम लें तो।

होली के दौरान रंग फेंकने वाले गुंडों से हमेशा लड़ा नहीं जाता बल्कि कभी-कभी कपड़े झाड़ कर आगे भी चल देना चाहिए। इसलिए सही वक्त आने का इंतज़ार नहीं किया जाए बल्कि वक़्त को बदलने में किरदार अदा किया जाए। दावत, अख्लाकियात, तरबियत, तालीम, तिजारत पर काम करें.

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भारतमाता

भारतमाता शुरवात में कोई देवी नहीं थी बल्कि एक खुशहालल मातृभूमि के रूप में चित्रण भर थी.

1905 में स्वदेशी आंदोलन में रबिन्द्रनाथ टैगोर के भतीजे अबिन्दरनाथ टैगोर ने एक 4 हाथ रूपी (देवीय धारणा/ परम्परा अनुसार) स्त्री (माँ) का चित्र बनाया जिसके हाथों में पुस्तक (शिक्षा), रुद्राक्ष माला (दीक्षा), धान की बालियां (अन्न) और (सफेद) वस्त्र थे। इसे स्प्रिट ऑफ इंडिया के नाम से सबसे पहले छापा गया थ। उन्होंने इसका नाम पहले बंगमाता रखा था मगर बाद में इसे भारतमाता कर दिया था। एक-दो साल बाद दक्षिण भारत में भी भारत माता के सामान्य चित्र (भारत मानचित्र और स्त्री) छपना शुरू होते हैं जिनमे हिन्दू-मुस्लिम दोनों को सामने खड़ा दिखाया जाता है। इस समय तक  भारत एक माता के रूप में दिखाई जाती रही है। फिर चित्र में (देवीय रूप समान) बदलाव होना शुरू होते हैं जैसे दो हाथ वाली देवी, मुकुट, साड़ी, अखंड भारत नक्शा, तिरंगे या भगवा, दुर्गा देवी रूप आदि.

 

भारतमाता की जय नारा (एक आम मुसलमान का नजरिया)

राष्ट्रभक्ति का पैमाना भारतमाता का जयकारा नहीं होना चाहिए। संविधान में कोई भारतमाता नहीं है। इसी तरह वन्देमातरम पर सवाल उठाये जाते हैं क्योंकि उसमें भी माता की वंदना का विचार आता है।

एकेश्वरवादी धर्म देवी-देवता में विश्वास नहीं करते, उनसे यह ज़बरदस्ती नहीं बुलवाया जाना चाहिए. यही वजह है देश का राष्ट्रगान जनगणमन को बनाया गया और इसे हर कोई गाता है।

भारत की जय बुलवाए, तो ऐसे सभी लोग ज़ुरूर नारा लगाते हैं।

ये प्रयोजित नारा है. वो भारत माता को एक देवी की तरह प्रस्तुत और पूजा करते हैं. उनके हित भारत शब्द की बजाय भारतमाता शब्द में छिपे हैं. ये शब्द मुसलमानों को देशद्रोही बताने के काम आता है।

जो गांधीजी को राष्ट्रपिता नहीं पुकारते तो क्या वो राष्ट्रद्रोही नहीं हैं?  वैसे सबसे बड़े राष्ट्रदोषी- देशद्रोही वो होते हैं जो देश के पैसे से भ्रष्टाचार करते हैं और देशवासियों से रिश्वतखोरी करते हैं। ऐसे नेता, पार्टियां, अधिकारी, जनता सबसे बड़े देशद्रोही हैं.

वैसे भारत माता ही क्यों, पिता क्यों नहीं या केवल भारत ही क्यों नहीं कहा जाये? धरती को मां मनाने में किसी मुसलमानों को कोई परेशानी नहीं है। अगर भारतमाता की देवी और पूजा ना हो तो फिर मुस्लिम भी भारतमाता शब्द पर ऐतराज नहीं करंगे।

वैसे भारतमाता की जय और वन्देमातरम ज़रूर कहा करें। लाखों मुस्लिम कहते हैं. इसके पीछे की रणनीति और इसके मायने गहराई से समझिये. 

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जन गण मन अधिनायक जय हे, भारत भाग्य विधाता। पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा, द्राविड़, उत्कल, बंगा। विंध्य, हिमाचल, यमुना, गंगा, उच्छल जलधि तरंगा। तव शुभ नामे जागे, तव शुभ आशीष मांगे। गाहे तव जय गाथा। जन गण मंगलदायक जय हे, भारत भाग्य विधाता। जय हे! जय हे! जय हे! जय जय जय जय हे।

 जन गण मन के उस अधिनायक की जय हो, जो भारत के भाग्यविधाता हैं! उनका नाम सुनते ही पंजाब सिन्ध गुजरात और मराठा, द्राविड़ उत्कल व बंगाल एवं विन्ध्या हिमाचल व यमुना और गंगा के लोगों के हृदयों में तरंगें भर उठती हैं। सब तेरे पवित्र नाम पर जाग उठते हैं, सब तेरे पवित्र आशीर्वाद पाने की अभिलाषा रखते हैं। और सब तेरे ही जयगाथाओं का गान करते हैं। जनगण के मंगल दायक की जय हो, हे भारत के भाग्यविधाता। विजय हो विजय हो विजय हो, तेरी सदा सर्वदा विजय हो।

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ब्रह्मा का चिन्तन, ध्यान उपासना. धूप-दीप से सत्कार-स्मरण पूजा. ध्यान, मनन व भक्ति के अध्यात्मिक स्वरुप आराधना. विधि द्वारा श्रद्धा से कर्मकांड से पूजन अर्चना. आरती शब्द आर्तिका से बना है जिसका अर्थ है, कष्ट, विपत्ति, आपत्ति, क्लेश।

दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...