Tuesday, 23 December 2025

नास्तिक बनाम आस्तिक - भाग 1 (इतिहास और बुनियाद)

 

 

आइये आज हम नास्तिक बनाम आस्तिक विषय का इतिहास और बुनियाद समझते हैं. नास्तिकों और आस्तिकों में हमेशा से ही ईश्वर को लेके बहस चलती आ रही है. आज नास्तिकता का दौर चल रहा है. एतिहासिक तौर पर नास्तिकता की नींव लगभग 2500 साल पुरानी है जो भारतीय दर्शन काल में पड़ गयी थी. यानी इस्लाम से 1000 साल पहले. मगर इसकी पुनर्स्थापना 500 साल पहले रेनेसाँ युग में दुबारा हुई. यानी इस्लाम के 1000 साल बाद. 19वीं सदी की शुरवात में हुए कार्ल मार्क्स, चार्ल्स डार्विन, सिगमंड फ़्रायड ने आधुनिक समय में नास्तिकता को बेहद ज़्यादा मज़बूती दी. आज एक्स-मुस्लिम बनने का ट्रेंड भी ज़ोरों पर है जिसके पीछे कारण हैं, उनके ज़ाती तजुर्बे, उनके सामने आई मज़हब की गलत एक्सप्लेनेशन और मौजूदा इस्लामोफोबिक माहौल. अपने अक़ाईद पर अड़े रहने के मामले में आज मुल्हिद उन मज़हबी पेशवाओं से भी ज़्यादा अड़ियल हैं जिन्हें वो अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं. ख़ैर असल में नास्तिक ईश्वर को इसलिए नहीं मानना चाहते क्योंकि इसके बाद वो अपनी मर्ज़ी से ज़िन्दगी नहीं जी पाएंगे. उन्हें अपने ऊपर कोई अथॉरिटी नहीं चाहिए. अगर नास्तिकों को कहा जाए कि ईश्वर को मान कर भी आपको जीवन अपनी मन-मर्ज़ी से जीने की आज़ादी दी जाती है तो वो शायद फ़ौरन ईश्वर को मान लेंगे. नास्तिक नेचर या क़ुदरत को ईश्वर के बराबर मानते ही इसलिए हैं क्योंकि नेचर अखलाक या कर्मों पर कोई भी पाबंदी नहीं लगाती. 
  
 
■ आस्तिकों-नास्तिकों के सतही तौर पर 5 प्रकार (Worldviews)

 
 
हम सबसे पहले आस्तिकों और नास्तिकों को सतही तौर पर  5 कैटेगरी में बाँट कर उनके Worldviews समझते हैं. 
 
पहले कैटेगरी में वो लोग आते हैं, जो कई ख़ुदाओं में यक़ीन रखते हैं और पोलीथिएस्ट कहलाये जाते हैं. इनमें वो लोग भी आते हैं जो हर चीज़ को ख़ुदा मानते हैं और पेन्थिएस्ट कहलाये जाते हैं. इनकी दलीलें  सबसे कमज़ोर होती हैं. इस कैटेगरी में आम हिन्दु और क़दीम मिस्र, ग्रीक, रोमन, नॉर्स जैसे विभिन्न (विलुप्त हो चुके) पेगन मज़ाहिब आते हैं. 
 
दूसरी कैटेगरी में वो लोग आते हैं, जो यह मानते हैं कि कोई भी ख़ुदा या क़ायनात का ख़ालिक़ नहीं है। ये एथिएस्ट कहलाये जाते हैं. इनकी दलीलें सतही तौर पर असर डालती हैं मगर मेरिट में कमज़ोर होती हैं और पूरी तरह खरी नहीं उतरती हैं। ज़्यादातर साइंटिस्ट ख़ुद को इस जमात में शुमार करते हैं. इनमें बहुत से मिस्टिकल, सूफी या अध्यात्मिक मज़ाहिब भी आते हैं जैसे बौद्ध, जैन, कन्फुयशियस, ताओ और शिंतो मज़ाहिब. 
 
तीसरी कैटेगरी में वो लोग आते हैं, जो ये कहते हैं कि वो यकीन से नहीं जानते कि कोई ख़ुदा है या कोई ख़ुदा नहीं है. इनमें वो लोग भी आते हैं, जो ये मानते हैं कि कोई ख़ुदा तो नहीं है पर इस क़ायनात का कोई ख़ालिक़ ज़ुरूर है और वो ख़ालिक़ खुद ये क़ायनात या क़ुदरत ही है। इनकी दलीलें तुलनात्मक रूप से मज़बूत होती हैं पर उनसे ये किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाते हैं। ये एगनोसटिक कहलाये जाते हैं. ख़ुदा के तसव्वुर पर ये नास्तिकों से ज़्यादा निष्पक्ष होते हैं। ये खुदा को मानकर भी ज़िन्दगी जी लेते हैं क्योंकि अभी तक ये साबित नहीं हो पाया है कि उसका वजूद नहीं है. ये खुदा को ना मानकर भी ज़िन्दगी जी लेते हैं क्योंकि अभी तक उसका वजूद पूरी तरह साबित नहीं हो पाया है. कुछ साइंटिस्ट और बहुत से फिलोसोफरस एगनोसटिक जमात में आते हैं। 
 
चौथी कैटेगरी में Deistic लोग आते हैं, जो ये मानते है कि कोई खुदा मौजूद है पर वो ज़ाती खुदा या personal God नहीं है. उसका न तो कोई मज़हब है, न किताब, न पैग़म्बर और ना ही तख़लीक़ के बाद अब क़ायनात या मख़लूकात से उसका कोई राब्ता या वास्ता है. इनके ख़ुदा को गॉड ऑफ स्पिनोज़ा भी कहा जाता है. स्पिनोज़ा 17वीं सदी का एक दार्शनिक था. उसी ने दुनिया के सामने ऐसे ख़ुदा का कॉन्सेट खुलकर रखा था. आइंसटीन और कई साइंटिस्टस को इसी अक़ीदे का हामी माना जाता है। इनके तर्क मज़बूत होते हैं पर उनसे निकाले गए ज़्यादातर नतीजे गलत होते हैं क्योंकि अगर ये क़ायनात किसी ने बनायी है तो बनाने वाला इससे लापरवाह नहीं हो सकता। इनमें ब्राह्मो समाज, Determinist, Naturalist वगैरह आते हैं.
 
Spinoza was a Determinist who believe that everything is caused by something, following necessary laws, nothing is random or free in the absolute sense. He believed that everything in the universe, including human actions, follows necessary causal laws. He did not believe in free will in the usual sense. He did not believe in a personal God (conscious, aware, relational). He believed that God has created the universe and left it like that on its motion means He just kept making things and have no relation to its creation. This is absurd as there are only two possibilities: the universe was created either by chance or designed, there is no chance of a deistic God.
 
पांचवीं कैटेगरी में वो Theist लोग आते हैं, जो इस क़ायनात के एक निराकार खुदा में यक़ीन रखते हैं और क़ायनात को बनाने के पीछे का मक़सद, ख़ुदा के मज़हब के ज़रिए समझते हैं। पैगम्बरों और उनकी किताबों को हिदायत का ज़रिया बनाते हैं. इनमें तीनों अब्राहिमिक मज़हब आते हैं और एक हद तक पारसी मज़हब को भी इनमें शामिल किया जा सकता है. 
 
अंत में मैं बस यही कहना चाहूँगा कि निष्पक्ष तौर पर ये कहना ज़्यादा बेहतर है कि 'मैं ईश्वर में यकीन रखता हूँ' या ये कि 'मैं ईश्वर में यकीन नहीं रखता हूँ'. मगर ये कहना कि 'मुझे पता है कि ईश्वर मौजूद है' या ये कहना कि 'मुझे पता है कि ईश्वर कतई मौजूद नहीं हैं', ऐसे दावे बहुत से सवालों को पैदा करते हैं।
 
 
 
■ साइंस और फिलॉसफी: इतिहास, दायरा, हदें
 
 
 
  
ईश्वर के अस्तित्व के विरुद्ध हमेशा Science या philosophy से तर्क दिए जाते हैं. सो आज हम Science और philosophy के इतिहास और कार्यक्षेत्र को डिटेल में समझने की कोशिश करेंगे. ईश्वर के वजूद को विज्ञान की बुनियाद पर समझने से पहले, नास्तिकों को Science की history, scope और  limitations को जान लेना चाहिए। चीज़ों को Specialization के तौर पर समझना तो modern दौर में जाके शुरू हुआ है. जबकि आज से 2500 साल पहले Knowledge और information सीमित थी. क्योंकि तब population बहुत कम थी और दुनिया globalized नहीं थी. इसलिए उस वक़्त अमीर वर्ग या aristocrat class ही science, philosophy या arts के क्षेत्र में जाने की हैसियत रखते थे. और अक्सर एक ही व्यक्ति कई कई fields में माहिर होता था. जैसे philosophy, science, mathematics, astronomy, arts, writing, medicine etc. यह वही समय था जब कई महान विचारक सामने आयें, खासकर युनान और भारत में, जैसे Pythagoras, Archimedes, Aristotle, Aryabhatt, Varahmihir, Panini आदि. ऐसे विद्वानों ने existence और nature का एक साथ अध्ययन करना शुरू किया। 
 
तब Science और philosophy अलग-अलग fields नहीं थीं। बल्कि Science, philosophy का ही हिस्सा थी. तब Philosophy, existence को समझने की कोशिश करती थी और science, nature को समझने की. इसीलिए तब science को natural philosophy पुकारा जाता था. मगर धीरे धीरे समय के साथ ये साफ़ हो गया कि, natural phenomena के बारे में उठने वाले सवालों के जवाब देने के लिए तो, scientific experiments वाकई कारगर थे. मगर  reality या meaning या purpose के बारे में, उठने वाले ultimate सवालों के जवाब देने के लिए, Science काफी नहीं थी. 
ख़ैर नतीजा ये हुआ कि धीरे-धीरे Science और philosophy अलग होने शुरू हुए. Science ने physical world यानी भौतिक संसार की empirical investigation करने पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया, जो observation, sensory experience, experiments से हासिल होता है. जबकि फिलॉसफी ने metaphysical सवालों, जैसे existence और universe के ultimate purpose या causes को समझने पर, ध्यान केन्द्रित करना शुरू किया, जो logic, reasoning, deliberation से हासिल होता है. meta का मतलब होता है, beyond. इसलिए metaphysics का मतलब है, वो ज्ञान जो Physics से परे या दूर है. Science और philosophy का असल अलगाव 15वी सदी में शुरू हुए renaissance period, और फिर आये Scientific revolution के साथ शुरू हुआ. इसी समय में Copernicus, Descartes और newton जैसे महान दार्शनिक और वैज्ञानिक हुए. 
 
आज उसी natural philosophy को natural science के नाम से जाना जाता है. और ultimate purpose (rather than the prior causes) जैसे existence क्यों मौजूद हैको समझने के ज्ञान को  philosophy के अंतर्गत Teleology नाम दिया गया है. Philosophy उन सवालों का जवाब देती है, जो science के दायरे से बाहर हैं। इसलिए Questions of purpose, विज्ञान के दायरे से बाहर हैं, और वो theology, philosophy, metaphysics से जुड़े हुए हैं। 
 
विज्ञान materialistic world और matter की study करता है, जैसे कि चीज़ें क्या हैं, कैसे काम करती हैं, किन कारणों से होती हैं. पर विज्ञान इसका जवाब नहीं देता, कि वो चीज़ें क्यों हैं? Ultimate why का मतलब है, कि universe और  life के, ultimate purpose या meaning क्या हैं? 

आज तक Science द्वारा ईश्वर के अस्तित्व की जांच नहीं करी जा सकी है, क्योंकि Scientific तरीकें, सिर्फ observable या testable events और objects तक ही महदूद हैं। ईश्वर को physics के इन तरीकों से देखा, मापा या परखा नहीं जा सकता। नतीजतन, साइंस न तो ख़ुदा को साबित करती है और न ही ख़ुदा का इनकार करती है। ख़ुदा के बारे में Science, neutral है. हालांकि, कोई भी Scientist ख़ुदा का इंकार करने की ज़ाती राय रख सकता है. मगर Scientists के ऐसे personal opinions को  scientific thoughts नहीं कहा जाना चाहिए। 
 
असल में ख़ुदा के बनाये Laws of Nature जो हमने खोज लिए हैं वही Science है और बहुत से कानून हम भविष्य में खोजेंगे। Science universe को जानने का एक तरीका है जो अपने हक़ाईक के ज़रिये ख़ुदा तक भी पहुंचा सकता है. इसलिए आज गहरी researches के बाद Scientists ये कह रहे हैं कि यह universe एक intelligent design है. जैसे हम बाहर की दुनिया का मुआयना करते हैं कि कब, कैसे, क्यों चीज़े बनी हैं, ऐसे ही जब इन्सान अपने वजूद को समझने की कोशिश करता है तो वो जान जाता है कि वो भी बना हुआ है. इंसान इस universe में ज़र्रा बराबर और बेबस मख़लूक़ है मगर फिर भी बेहद  extra-ordinary है।  
 

 
■ अंतिम सत्य की खोज: इतिहास से वर्तमान

 
 

अब हम इंसान द्वारा करी जा रही अंतिम सत्य की खोज का, इतिहास और वर्तमान जानने की कोशिश करते हैं. इंसान में Self awareness, Conscience, Reasoning, Analytical thinking, Aesthetic sense जैसे गुण हैं. इसलिए शुरवात से ही तमाम इन्सान अपने वजूद के सिलसिले में दो approaches अपनाता आया है. पहली approach में इन्सान, इस क़ायनात, ज़िन्दगी और सत्य की प्रकृति को समझने की कोशिश करते रहे हैं. और दूसरी  approach में इंसान, सिर्फ अपने survival के लिए, या फिर ऐशो-आराम (कम्फर्ट) हासिल करने की जद्दोजहद में ही लगे रहे हैं. 
 
ये कायनात और जीवन क्यों मौजूद हैं, इस पर भी पारंपरिक रूप से 2 तरीकों से ही विचार किया जाता रहा है. पहला विचार ये रहा है कि इस कायनात का कोई ख़ालिक है. दूसरा विचार ये रहा है कि ये कायनात क़ुदरती तौर पर अपने आप बनी हुई है और ख़ुद ही अपने आप की ख़ालिक है। इनके अलावा, तीसरी कोई भी व्याख्या नज़र नहीं आती है. क़ायनात के बने हुए होने से, कोई इनकार नहीं करता है। आज तक किसी scientist ने इसका इनकार ही नहीं किया कि क़ुदरत ख़ालिक़ नहीं है। नास्तिक कहते हैं कि क़ायनात ने ही खुद को बनाया है। आस्तिक कहते हैं कि क़ायनात को भी बनाने वाला मौजूद है। क़ायनात और इंसान, दोनों के पास गैर मामूली ताक़त और सलाहियत है, मगर फिर भी वो अपने आप की ultimate explanation नहीं कर सकते, जैसे कि उनका वजुद क्यों हैं? इस सवाल या क्यों, को जानने के लिए ही, मानव इतिहास में 3 तरीके उभर कर सामने आये हैं। 
 
पहला तरीका है कि इस सवाल का जवाब इंसानी अक़ल के ज़रिये हासिल किया जाएगा. इससे साइंस और फिलोसोफी वजूद में आईं। इसमें तजुर्बें और सोच-विचार ज़रिया बनते हैं. क्योंकि साइंस पहले ही philosophy से अपने रास्ते अलग कर चूकी है, और आमतौर पर लोगों को इस अलगाव की जानकारी नहीं होती है,  इसलिए इस सवाल पर अब, बॉल कभी साइंस के पाले में जाती है और कभी philosophy के। दुसरा तरीका है कि इस सवाल का जवाब अपने बातिन या अंदर से लिया जाएगा, यानी इनरसेल्फ से। इससे अध्यात्म और मिस्टिसिज़्म, तसव्वुफ़ या सूफीवाद की पैदाइश हुई। इसमें बाहरी दुनिया की बजाय अपने अंदर झाँका जाता है। ये तरीका भारत में चार्वाक, बुद्ध और महावीर के वक़्त में मक़बूलियत पाते हुए, यूनानी, चीनी और जापानी अध्यात्म का सफर तय करते हुए, मुस्लिम वर्ल्ड में सूफ़ीइज़्म की शक्ल में बहुत ऊँचाइयों पर पहुंचा। तीसरा और आखिरी तरीका है कि इस सवाल का जवाब, ख़ुद वजूद बनाने वाले से ही पूछ लिया जाए। यही से ख़ुदा, मज़हब, रिसालत और किताब का concept सामने आता है। जैसे कोई नया प्रोडक्ट बनाने के बाद उसका एक मैन्युअल तैयार किया जाता है और डेमो देने के लिये एक रिप्रेजेन्टेटिव को Exhibition में खड़ा कर दिया जाता है। उसी तरह ख़ुदा के प्रोडक्ट मज़हब के लिए किताब एक मैन्युअल का काम करती है और पैग़म्बर एक exhibition रिप्रेजेन्टेटिव का।  ultimate explanation या इस क्यों सवाल का, जवाब पाने के लिए यही सबसे बेहतर तरीका है। क्योंकि आमतौर पर ज़िन्दगी की जद्दोजेहद में मुब्तिला, ज़्यादातर आम इंसानों को पहले दो तरीकों से न तो कोई खास वास्ता होता है और न उन रास्तों पर जाने के लिए वक़्त या रूचि. ख़ल्क के लिए कौन सा तरीका सबसे आसान और कारगर होगा, यह ख़ालिक ही तय कर सकता है. 

 
 
■ Science - Philosophy - Religion
 
 

 

अब हम Science Philosophy और Theology के बारे में समझेंगे. 

Universe के natural laws और environment की study को Science कहते हैं जो observation और experiment के ज़रिये करी जाती है. इसकी चार stages होती हैं, Observation, Hypothesis, Prediction, और result की Testing, जो repeatable होने चाहिए. 

इसी तरह, reality, existence, universe और knowledge के बारे में उठने वाले  fundamental questions की study को Philosophy कहते हैं, जिसका literal मतलब होता है love of wisdom. Philosophy की कई शाखाएं होती हैं जैसे:- Metaphysics (तत्त्वमीमांसा), Epistemology, Ethics, Logic और Aesthetics

Reality, existence, universe के असल nature और physical world के beyond या परे जो चीज़ें हैं, उनकी study को Metaphysics कहा जाता है.  जैसे कि  existence की ultimate reality क्या है, क्या ईश्वर का अस्तित्व है, आत्मा क्या है या consciousness क्या है आदि. ये सभी सवाल science के scope से बाहर हैं इसलिए ये चीज़ें unscientific नहीं कहलाई जा सकती.  metaphysics की सबसे अहम approach है Spirituality या Spiritualism/Spiritualism जिसे रूहानियत भी कहा जाता है. Spirituality का मतलब होता है अन्दुरुनी खोज, और इसका एक method Mysticism होता है यानी रहस्यवाद या Tasawwuf जिसका मतलब है direct experience, और इसी के एक method को मुस्लिम में Sufism (inner experiential dimension) पुकारा जाता है. ऐसे ही knowledge की nature, origin, scope और limits की study को epistemology कहा जाता है जैसे कि जो कुछ हम जानते हैं, वो कैसे जानते हैं, या इन्सान की समझ की हदें क्या हैं? इसी तरह, Philosophy की Ethics या values शाखा में सही और गलत की study करी जाती है और इसीलिए इसे Moral Philosophy भी पुकारा जाता है. Logic या mind शाखा में  reasoning और rationale के उपयोग के ज़रिये झूठ और सच में अंतर करने की study करी जाती है. Aesthetics शाखा में कला, सुन्दरता और स्वाद आदि की study करी जाती है.  

दूसरी ओर, God, religion, faith और उनके  nature की study को Theology कहते हैं और इसे सही से जानने के लिए अक्सर Science और Philosophy का संगम बेहद ज़रूरी हो जाता है. ये थी Science, Philosophy और Theology की परिभाषाएं. कोई भी  religious belief या faith जिसे science approve कर सकती है वो scientific कहलाया जाता है. पर अगर science किसी religious belief या faith को disapprove नहीं कर सकती है तो उस कारण से वो unscientific नहीं हो जाता है बल्कि वो metaphysical होता है. यक़ीनन ऐसे phenomena क़ायनात में मौजूद हैं जो scientific domain या realm के बाहर हैं और जिनकी हक़ीक़त science test या experiment नहीं कर सकती. Science metaphysical दावों को ना तो approve कर सकती है और ना ही disapprove.  

विज्ञान ना तो धर्म है और ना ही धर्म विज्ञान है. ना तो विज्ञान धर्म का स्थान ले सकता है और ना ही धर्म विज्ञान का स्थान ले सकता है. विज्ञान हर विषय पर हमारा मार्गदर्शन नहीं कर सकता क्योंकि विज्ञान केवल ये बताता है कि ईश्वर द्वारा स्थापित laws of nature कैसे कार्य करते हैं. मार्गदर्शन तो केवल ईश्वर कर सकता है. आसान शब्दों में कहूँ तो विज्ञान समाज को सहुलतें देता है, धर्म समाज को दिशा देता है और अध्यात्म समाज को शुद्धि और पवित्रता देता है. 

 

 

■ नास्तिकों से बहस की तरतीब

 
अब हम अपने तजुर्बों की बुनियाद पर ये जानने की कोशिश करते हैं कि नास्तिकों से बहस की तरतीब क्या होनी चाहिए. सबसे पहला argument यही होना चाहिए कि क्या ये क़ायनात अपने आप बनी हुई है या बनाई गयी है. दूसरा argument यह होना चाहिए कि अगर ये बनाई गयी है तो इसको किसने बनाया है. तीसरा argument ये होगा कि अगर इसको कोई बनाने वाला है तो वो कैसा या कितने हैं. फिर ये बात होगी कि क्या उसका कोई मज़हब या पैग़म्बर या किताब हो सकती है. बाकी तमाम सवालों पर आखिर में बात होनी चाहिए जैसे कि मौजूदा मज़ाहिब में कौन सा पहलू वाकई असल है और कौन सा मिलावटी है, या फिर मज़हब में फला-फला चीज़ क्यों है, या मज़हबी लोगों से दुनिया परेशान क्यों है वगैरह वगैरह. ऐसे एक-एक सवाल पर कई-कई घंटो बात करी जा सकती है जो हम कभी किसी और विडियो में detail में discuss करेंगे. फिलाहल बस ये समझ लेते हैं कि इन सवालों को एक-एक करके लेकर चलने से ही ख़ुदा का वजूद आसानी से समझा या समझाया जा सकता है। अगर इन सवालों की तरतीब बदल कर या नज़रअंदाज़ करके बात करी जाएगी तो मसला हल होने की बजाए dead-end की तरफ भी बढ़ सकता है. ये तरतीब अक्सर civilised atheist लोगों के साथ कामयाब होती है.
 
मगर क्योंकि इन्डियन सबकॉन्टिनेंट के मुलहिद, हर चीज़ में साइंस  को बुनियाद बनाते हैं इसलिए उनके लिए एक अलग तरतीब भी हो सकती है. वो ये कि सबसे पहले, क़ायनात के एक ख़ालिक होने पर कुछ बड़े ग़ैर-जानिबदार साइंसदानों और फलसफीयों का क्या कहना है, वो सामने रखा जाये. फिर ख़ालिक की तरफ इशारा कर रहे क़ायनात और हयात के हैरतअंगेज़ हक़ाईक़ सामने रखे जाएँ. इसके बाद उनसे Science, Philosophy और लोजिक based सवाल किये जाएँ. और सबसे आखिर में उनके मज़हब पर उठाये जा रहे सवालों के जवाब दिए जाएँ. 

 

■  Unanswered questions by Atheism and Scientism

 

 
अब हम उन सवालों के बारे में जानते हैं जिनके जवाब अभी तक नास्तिकता और Scientism नहीं दे पाया है. जो हैं big bang और singularity के बारे में, universe में मौजूद intelligence और perfection के बारे  में, निर्जीव में पैदा हुई life और consciousness के बारे में जिसने उसे स्वयं और उसके आस-पास के सम्बन्ध में जागरूक किया, इंसानों में पैदा हुई ज़बरदस्त competency और सलाहियतों के बारे में जो अन्य प्राणियों में नहीं दिखती है, और इन्सान की अपने अस्तित्व के सत्य की खोज के बारे में जिसे existential curiosity कहा जाता है. 

कई नास्तिकों और वैज्ञानिकों के अनुसार universe, life और consciousness, by Chance  अस्तित्व में आए हैं। इन्होने Chance को ही ईश्वर मान लिया है। वो कहते हैं कि nature खुद ही universe की Creator है। जबकि nature ना तो moral है और न ही immoral, बल्कि non-moral है। उधर आस्तिक कहते हैं कि nature या universe का भी एक Creator है। क्योंकि जब creation मौजूद है, तो creator भी मौजूद होना चाहिए 
(MWK). और वो  creator ही  Ultimate Creator है. 

असल में नास्तिकों ने प्रकृति को ही ईश्वर मान लिया है क्योंकि इनके अनुसार प्रकृति में सारे ultimate गुण उपलब्ध हैं जैसे कि उसका सृष्टि का मूल कारण और हर चीज़ का निर्माता होना, उसका सदा से और स्वयं अपने आप होना. जबकि ये सारे गुण आस्तिक ईश्वर के मानते हैं जैसे ईश्वर का अनादी, अनंत, स्वयं से होना. प्रकृति और ईश्वर की कोई ज़ाती शक्ल नहीं होती है. ईश्वर के 2 गुण जो इंसानों से सबसे अधिक सम्बंधित हैं, वो हैं करुणा और न्याय. ये दोनों गुण प्रकृति मानवों को नहीं दे सकती क्योंकि  प्रकृति तो मुर्दा है, वो ना सुन सकती है और ना बोल सकती है. मगर उस प्रकृति के दाता ईश्वर को जैसे ही आप alive और observer मान लेते हो, इन गुणों का प्रदर्शन होना या इनके हासिल होने की उम्मीद पैदा हो जाती है. ख़ैर इस तरह देखा जाये तो नास्तिक, आस्तिकों से बस एक पायदान नीचे खड़े हैं। फैसला नास्तिकों को करना है कि अब ऊपर चढ़ना है या वापिस नीचे उतरना है. 

 
Arguments in Atheism vs Theism debate
 
 
 

ये सत्य है कि ईश्वर के अस्तित्व को साबित करना हो या साबित नहीं करना हो, दोनों ही cases में कोई भी empirical evidence मौजूद नहीं है। नास्तिकों का ये मानना गलत है कि ईश्वर को साबित करने का burden of proof आस्तिकों पर है. ऐसे तो नास्तिकों पर भी ईश्वर का अस्तित्व नहीं होने का burden of proof होना चाहिए. वैसे भी नास्तिकता ना तो कोई neutral default position है और ना ही justification देने से exempted है.  
 
हम ज्ञान और तर्कों के आधार पर ईश्वर के अस्तित्व के बारे में जानने का प्रयास करेंगे. 

आमतौर पर knowledge के 3 Sources माने जाते हैं. पहला है Science जो Observation और experiment का नाम है. दूसरा है History जो Records और archeology से प्राप्त होती है. तीसरा source है Reason जो evidence से Infer किया जाता है, जैसे gravity और evolution को किया गया है.

इसी तरह ईश्वर के अस्तित्व पर होने वाली बहसों में भी 4 चीज़ों को आधार बनाया जाता है. पहला ईश्वरीय ग्रंथों को, जो universally, proof of God स्वीकार नहीं करा जाता है. दूसरा विज्ञान को, जो अभी तक ईश्वर को जांचने का tool नहीं बन पाया है. तीसरा है, ईश्वर के बारे में हुई observations को, जो subjective हो सकती हैं और उनसे अलग अलग निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं. अंत में बस चौथा आधार ही बचता है जो ईश्वर के अस्तित्व पर एक healthy discussion के लिए  neutral और common ground हो सकता है और वो है, logic या rationale.
  
Be careful while debating, as atheists may use logical fallacies (a flaw in reasoning that makes an argument invalid, deceptive, even if it sounds convincing.), rhetorical statements (a statement or question made for emphasis and not to get answer) and sweeping remarks (a comment that cover a large topic without considering facts) to diminish or win the debate unfairly. 
 
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