मुसलमान और वंदेमातरम: इतिहास और वर्तमान पर एक नज़र
1.
“वन्दे मातरम् वन्दे मातरम् सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम् शस्यशामलां मातरम् वन्दे मातरम् वन्दे मातरम् ।
शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीं फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीं सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीं सुखदां वरदां मातरम् वन्दे मातरम् वन्दे मातरम् ।”
मैं तेरी वंदना करता हूँ, मातृ (माता) [मातृभूमि/भारतभूमि]।
पानी से सींची, फलों से भरी, दक्षिण की हवा के साथ शान्त, कटाई की फ़सलों के साथ गहरी, ओ माता।
तेरी रातें चाँदनी की गरिमा में प्रसन्न हो रही हैं, ज़मीन खिलते फूलों वाले पेड़ों से बहुत सुंदर ढकी हुई है, हंसी की मिठास, भाषा की मिठास, सुख देने वाली, वरदान देने वाली है, ओ माता।
2.
आनंदमठ उपन्यास से भारत का राष्ट्रगीत वंदेमातरम लिया गया है जो संस्कृत/बंगाली में है। लेखक बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय/चटर्जी ने इसे 1881 के करीब लिखा था. जो ब्रिटिश अधिकारी भी थे. उपन्यास 1763 के ब्रिटिश विरोधी सन्यासी आंदोलन और 1770 के बंगाल अकाल पर आधारित था.
उपन्यास में बहुत जगह मुस्लिम विरोधी कंटेंट मौजूद है। इस पर टैगोर का भी यही विचार था।
जैसे कि कैसे शाही खज़ाना लूटा जाये, अंग्रेजों को बसाया जाये. मुसलमानों के घरो में आग लगा दो और लोग उन्हें मारने दौड़ते थे. मुस्लिम राज्य तबाह हो गया, हिन्दू राष्ट्र बनाने पर जोर. इसमें बंगाल के नवाब मीर जाफर को आड़े हाथों लेते हुए बाकी मुसलमानों के लिए दुर्भावना साफ लिखी मिलती है, जबकि बंगाल में सन्यासियो के साथ फकीरों ने भी विद्रोह किया था और अकाल में भी सभी धर्म के लोग मरे थे.
इसमें ब्रिटिश शासन की इनडारेक्ट तारीफ भी की गई है. जैसे अँगरेज़ भारत के रक्षस हैं, ब्रिटिश राज, मुस्लिम राज से बेहतर है.
गौर करने वाली बात है कि बंकिमचंद्र पत्रिका ने बंगदर्शन में मूर्तिपूजा को विज्ञान विरोधी बताया था। मगर वो भी जिन्ना, सावरकर की तरह ज़िन्दगी के दुसरे हिस्से धार्मिक राष्ट्रवादी बन गए।
1870 के करीब वन्देमातरम मूलतः एक वंदनागीत या स्तुति के रूप में रचा गया और अप्रकाशित रहा मगर फिर इसमें पक्तियां बढ़ा कर 1881 में आनंदमठ में प्रकाशित किया गया. ये गीत मुख्यतः देवी दुर्गा (के कई रूपों जैसे काली) के बारे में है जो कि आन्दोलनकारी गाते हैं.
1905 तक राजनितिक नारे में तब्दील हो गया. टैगोर ने गाया और अरबिंद घोष ने सराहा. 1920 तक राष्ट्रगान की हैसियत पा चूका था. 1930 में जाके इस पर विवाद होना शुरू हुआ. गाँधी जी ने वन्देमातरम की तुलना अल्लाहु अकबर से करी थी जी पर हिन्दुओ को ऐतराज़ था. 1937 में नेहरु, बोस, टैगोर, आजाद आदि की कांग्रेस कमिटी में इसके देविपूजा वाले हिस्से को काट कर, बाकी का अपना लिया. राजेन्द्र प्रसाद के कहने पर राष्ट्रगीत का दर्जा. वन्देमातरम के अर्थ राजिनितक परिस्थियों और समय अनुसार बदलते रहे हैं.
मगर शुरवाती स्टेंज़ा मातृभूमि के बारे में है। शुरू से इसका आज़ादी के नारे के तौर पर इस्तेमाल शुरू हो गया था। अंग्रेज़ो ने इसे बैन कर दिया। शुरवात में इसे हिन्दू-मुस्लिम सभी गाते थे. मुस्लिम को कोई समस्या नहीं थी. फिर अंग्रेज़ो ने इसे चालाकी से मूर्तिपूजा से जोड़ने जोड़ने की साज़िश करी ताकि हिन्दू-मुस्लिम में खायी पैदा हो जो हुआ भी। वही फूट डालो शासन करो नीति. समझने वाली बात यह है इस गीत में शिर्क शामिल होने का मुद्दा बहुत बाद में जाके तूल पकड़ा और अंत में इसे जिन्ना ने लपका.
हालांकि इसे बंगालभूमि के लिए लिखा हुआ गीत भी माना जाता है. क्योंकि गीत में 7 करोड़ लोगों का ज़िक्र है, लगभग जितनी 1881 की जनगणना में तत्कालीन बंगाल की आबादी थी क्योंकि एक-डेढ़ सदी पहले तक बंगाली, बंगाल को ही बाकी भारत से भिन्न और बरतर हिस्सा मानते थे और नेपाल को हिन्दुराष्ट्र और हिंदी भाषियों को हिंदुस्तानी पुकारते थे।
3.
राष्ट्रगान के लिए 3 गीत चुने गए थे, जनगणमन, वन्देमातरम और इकबाल का सारे जंहा से अच्छा. जिसे उनके पाक चले जाने के कारण पहले ही रेस से बाहर कर दिया गया था. यानी लेखन से अधिक लेखक ज़ाती फैसले ने इस चुनाव पर असर डाला. इसी तरह बंकिमचंद्र की हिन्दू-मुस्लिम एकता विरोधी मानसिकता का भी गीत के चुनाव के पर उतना ही असर पड़ना चाहिए था?
टैगोर के गीत जनगणमन के पेहले स्टेंज़ा को राष्ट्रगान दर्जा मिला क्योंकि वो इतिहास और भविष्य संजोय था। हालांकि दक्षिणपंथियों द्वारा जनगणमन के बैकग्राउंड को ब्रिटिश क्राउन की तारीफ़ बताया गया था क्योंकि वे वंदेमातरम को राष्ट्रगान बनाना चाहते थे मगर टैगोर एक ब्राह्मो समाजी थे. उन्होंने ने इन आरोपों को रद्द करते हुए कहा था कि ये ईश्वर पर आधारित है। भारत के सिवाय किसी भी देश का राष्ट्रगान ईश्वर की प्रशंसा नहीं करता है. सोचने वाली बात है कि (अगर कट्टरवादियों को) जनगण के बैकग्राउंड पर देश विरोधी होने का शक था तो वन्देमातरम का बैकग्राउंड खुलेआम भारतीय एकता और अखंडता का विरोधी था।
संविधान निर्माण के दौरान वन्देमातरम पर बहुत बहस हुई थी। खैर अंत में वन्देमातरम के पहले दो स्टेंज़ा को राष्ट्रगीत का दर्जा मिला. दोनों स्टेंज़ा में भारतभूमि का गुणगान था और कुछ भी देवीपूजा से जड़ा हुआ नहीं था।
4.
एंटी-मुस्लिम होने के कारण उपन्यास का विरोध करने में आज भी कुछ भी गलत नहीं है मगर इस बुनियाद पर गीत का शिद्दत से विरोध नहीं करना चाहिए। देवीमाता से जुड़े होने के कारण गीत का विरोध संविधान निर्माण के समय करने में भी कुछ गलत नहीं था. जब बहस जारी थी और माहौल सेक्युलर था तब गीत का विरोध भी गलत नहीं था। मगर इस बुनियाद पर आज भी गीत का शिद्दत से विरोध नहीं करना चाहिए. क्योंकि अब ये राष्ट्रगीत है और नफरती ताकतों के लिए एक बहाना बन चूका है. इस्लामफोफोबिया फैलाने का टूल है।
क्योंकि इस गीत के सिर्फ गैर-शिरकीया और मातृभूमि से जुड़े हुए अंश ही राष्ट्रगीत में लिए गए हैं
इसलिए अब इसका अंधा विरोध या कट्टर विरोध करना सही नही है।
5.
गीत में मातृ के मायने मातृभूमि, मादरे वतन, मदरलैंड से हैं. जिसका उच्चारण इस्लाम के मुताबिक जायज़ है। ज़मीन को मां मानना इस्लाम में कभी भी शिर्क नहीं माना गया है. मक्का को उम्मुल क़ुरा यानी बस्तियों की मां, पुकारा गया है। हालांकि कोई अपनी मातृभूमि को देवी माने तो ये उसका अकीदा है, हमारा नहीं। संविधान ने इसे देवीमाता के गीत के रूप में नहीं बल्कि मातृभूमि के गीत के रूप में स्वीकारा है। ये सबसे अहम बात है।
गीत में मां (मातृभूमि) की वन्दना को कहा गया है।
वंदना का मतलब होता है, पूजा, आराधना, नमन, श्रद्धा, भक्ति, प्रशंसा, आदर, सत्कार आदि.
वन्द धातु से बने शब्द वंदन का अर्थ है प्रणाम, स्तुति, सम्मान आदि। इसका (इन सभी शब्दों का) अर्थ उपासना नहीं होता जो कि इबादत का पर्यायवाची है। जैसे पूजा का मतलब होता है सत्कार, सम्मान करना, उचित व्यवहार करना (महाभारत, मनुस्मृति)।
क्योंकि संविधान ने भारतभूमि या मातृभूमि को कोई देवी या मूर्ति नहीं माना है. इसलिए यंहा वंदना शब्द भी पूजा-नमन के मायनों में नहीं बल्कि जयकार-सत्कार के मायनों में है। बहुत से शब्दों के अर्थ भावनासदर्भ पर निर्भर होते हैं।
6. (i)
हमेशा से वन्दना का अनुवाद हो होता आया है, वो है: 'मातृभूमि की जय (Hail) और मातृभूमि को नमन (Bow) किया जा रहा है.
जय का मतलब है विजय होना या प्रशंसा करना। मातृभूमि का जयकारा लगाने में हर्ज नहीं जैसे ‘मादरे वतन जिंदाबाद’ कहना। ज़िंदाबाद एक फ़ारसी उद्गम का शब्द है जिसका मतलब है जिंदा रहो, शाबाश।
ये नारा किसी जीवित, मृत, निर्जीव के आदर में लगाया जाता है। गांधीजी ज़िंदाबाद के लिटेरल अर्थ हैं कि गाँधीजी ज़िंदा रहे और मेटाफोरिकल अर्थ है कि गांधी विचारधारा चलती रहे। बाज़ शब्दों के खास वाक्यों-नारों में मेटाफोरिकल मतलब हो जाते हैं। कुछ प्राचीन शब्दो के मतलब वक़्त के साथ बदल जाते हैं जैसे धर्म, पूजा। वंदन का मतलब भी ‘जयकार (जिंदाबाद)’ लिए जाने चाहिए और लिए गए हैं।
6. (ii)
नमन (2 अर्थ निकाले जाते हैं)
वंदना का मतलब है: नमन, नमस्कार, प्रणाम (सम्मान-आदर में) [मतलब सलाम, Salute]
जैसे एक प्रसिद्द आधुनिक काव्यगीत में कहा गया है:-
देववाणीं वेदवाणीं मातरं वन्दामहे। चिरनवीना चिरपुराणीं सादरं वन्दामहे।
हम संस्कृत का वंदन (आदर, नमस्कार) करते हैं—जो देवों की वाणी है, वेदों की वाणी है, और हमारी मां की तरह है। वह बहुत प्राचीन होते हुए भी सदैव नई सी है, हम उसे सादर प्रणाम करते हैं।
वंदना का मतलब है: नमन, नमस्कार, प्रणाम (सजदे-रुके समान) [मगर मतलब सजदा-रुकू नहीं]
नम धातु से नमन बना है जिसका मतलब है: झुकना, सम्मान, अभिवादन। इसी से विनम्र शब्द बना है जिसका मतलब है: शिष्टाचार वश झुका व्यक्ति।
नमन बोलते हुए मायने Greetings के लिए जाते हैं। यानि ‘सम्मान में झुकते हैं’ कहना सांकेतिक होता है। कोई भी सच में नहीं झुकता। जैसे Hats Off कहने पर कोई टोपी नहीं उतारता है।
झुकने (उपासनीय/सम्मानीय) के कई स्तर व प्रकार होते हैं: दंडवत, आष्टांग (सजदा), अर्ध शारीरिक (रुकू), उपरी धड़/गर्दन को थोडा झुकाना। वैदिक काल में ‘उपासनीय-नमन’ कौन से प्रकार का था हमें ज्ञान नहीं है। आज भी ‘सम्मानीय-नमन’ का प्रकार बोलने वाले की भावना पर निर्भर करता है, ना कि सुनने वाले की।
नबी ने (नमाज़ जैसे आसन वाले) ताजीमी सजदे को मना किया था। पर सम्मान में ऊपरी धड-गर्दन को झुकाना सजदा-रुकू नहीं होता। जैसे (अंग्रेजों की तरह) हेट को सम्मान में झुकाना भी सजदा-रुकू नहीं होता।
मगर मुस्लमान तो सिर्फ सम्मान में) ‘झुकना’ कहने भर को ही ये मान लेता है कि वो सच में झुक गया और वो भी (इबादती) सजदा-रुकू की तरह.
जब कोई मुस्लमान कुछ समान उठाने के लिए किसी के सामने झुकता है तब तो शिर्क नहीं माना जाता क्योंकि लोगों को झुकने का उद्देश्य मालूम होता है।
अगर सिर्फ 'झुकता हूँ' बोलने से शिर्क होने लगता तो मुसलमानों को “मैंने उसे झुका के ही छोड़ा”, “उसने सबको झुका दिया” जैसे वाक्य नहीं बोलने चाहिए।
6. (iii)
उर्दू में वंदना से 'सलाम माँ' मायने लिए जाने चाहिए। इसीलिए ए.आर. रहमान ने भी अपने (विवादित गाने में वंदेमातरम की व्याख्या मां तुझे सलाम के रूप में करी थी। आरिफ मुहम्मद खान (Ex-Governor/ Congressi) ने मायने 'माँ तस्लीमात' लिखे हैं। इंग्लिश में जिसका निचोड़ है: I Salute to Motherland
7.
संविधान में मज़हब की आजादी छूट है. दूसरों पर कुछ भी जबरन थोपना गलत है. गांधी जी ने भी वन्देमातरम को थोपने से मना कर दिया था पर ये आज भी हो रहा है, पहले से ज़्यादा। विडंबना ये है कि थोपने वालो को अक्सर इसके बोल या मायने मालूम नहीं होते हैं। देशभक्ति की भावना, नारों से ज़्यादा कर्मों में दिखाई देनी चाहिए। एकेश्वरवादी मुसलमानों का मूल विरोध सिर्फ धरती को पूजने, झुकने के शब्दों पर है (जो कि चर्चा का विषय है)। भारत की जय या जय हिंद कहने से किसी मुसलमान को कोई दिक्कत नहीं है।
8.
ख़ैर दक्षिणपंथीयों के लिए वंदेमातरम का मुद्दा तब तक ही ज़िंदा है जब तक मुसलमान इसे खुलकर अपना नहीं लेते। उसके बाद ये मुद्दा अपनी मौत मर जायेगा, सिवाय गड़े मुर्दे उखाड़ने वालों के।
सिस्टम से बाहर, सियासत से बेदखल, समाज से बहिष्कारित होते जा रहे मुसलमानों के लिए अपने ऐतराज़ खुलके जताने से बेहतर है, दूसरों के ऐतराज़ात को जितना मुमकिन और जायज़ है, उतना खत्म करना चाहिए. पहले जब मुसलमानों का एक रुतबा (जितना भी) मुल्क में क़ायम था, उसी के अनुपात में मुसलमान अपने विचार, ऐतराज़ जता दिया करता था और बाज़ काम भी अपने हक़ में करवा लिया करते थे। फिर से वो दौरआना मुमकिन है बशर्ते मुसलमान जज़्बातों की बजाय हिकमत से काम लें तो।
होली के दौरान रंग फेंकने वाले गुंडों से हमेशा लड़ा नहीं जाता बल्कि कभी-कभी कपड़े झाड़ कर आगे भी चल देना चाहिए। इसलिए सही वक्त आने का इंतज़ार नहीं किया जाए बल्कि वक़्त को बदलने में किरदार अदा किया जाए। दावत, अख्लाकियात, तरबियत, तालीम, तिजारत पर काम करें.
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भारतमाता
भारतमाता शुरवात में कोई देवी नहीं थी बल्कि एक खुशहालल मातृभूमि के रूप में चित्रण भर थी.
1905 में स्वदेशी आंदोलन में रबिन्द्रनाथ टैगोर के भतीजे अबिन्दरनाथ टैगोर ने एक 4 हाथ रूपी (देवीय धारणा/ परम्परा अनुसार) स्त्री (माँ) का चित्र बनाया जिसके हाथों में पुस्तक (शिक्षा), रुद्राक्ष माला (दीक्षा), धान की बालियां (अन्न) और (सफेद) वस्त्र थे। इसे स्प्रिट ऑफ इंडिया के नाम से सबसे पहले छापा गया थ। उन्होंने इसका नाम पहले बंगमाता रखा था मगर बाद में इसे भारतमाता कर दिया था। एक-दो साल बाद दक्षिण भारत में भी भारत माता के सामान्य चित्र (भारत मानचित्र और स्त्री) छपना शुरू होते हैं जिनमे हिन्दू-मुस्लिम दोनों को सामने खड़ा दिखाया जाता है। इस समय तक भारत एक माता के रूप में दिखाई जाती रही है। फिर चित्र में (देवीय रूप समान) बदलाव होना शुरू होते हैं जैसे दो हाथ वाली देवी, मुकुट, साड़ी, अखंड भारत नक्शा, तिरंगे या भगवा, दुर्गा देवी रूप आदि.
भारतमाता की जय नारा (एक आम मुसलमान का नजरिया)
राष्ट्रभक्ति का पैमाना भारतमाता का जयकारा नहीं होना चाहिए। संविधान में कोई भारतमाता नहीं है। इसी तरह वन्देमातरम पर सवाल उठाये जाते हैं क्योंकि उसमें भी माता की वंदना का विचार आता है।
एकेश्वरवादी धर्म देवी-देवता में विश्वास नहीं करते, उनसे यह ज़बरदस्ती नहीं बुलवाया जाना चाहिए. यही वजह है देश का राष्ट्रगान जनगणमन को बनाया गया और इसे हर कोई गाता है।
भारत की जय बुलवाए, तो ऐसे सभी लोग ज़ुरूर नारा लगाते हैं।
ये प्रयोजित नारा है. वो भारत माता को एक देवी की तरह प्रस्तुत और पूजा करते हैं. उनके हित भारत शब्द की बजाय भारतमाता शब्द में छिपे हैं. ये शब्द मुसलमानों को देशद्रोही बताने के काम आता है।
जो गांधीजी को राष्ट्रपिता नहीं पुकारते तो क्या वो राष्ट्रद्रोही नहीं हैं? वैसे सबसे बड़े राष्ट्रदोषी- देशद्रोही वो होते हैं जो देश के पैसे से भ्रष्टाचार करते हैं और देशवासियों से रिश्वतखोरी करते हैं। ऐसे नेता, पार्टियां, अधिकारी, जनता सबसे बड़े देशद्रोही हैं.
वैसे भारत माता ही क्यों, पिता क्यों नहीं या केवल भारत ही क्यों नहीं कहा जाये? धरती को मां मनाने में किसी मुसलमानों को कोई परेशानी नहीं है। अगर भारतमाता की देवी और पूजा ना हो तो फिर मुस्लिम भी भारतमाता शब्द पर ऐतराज नहीं करंगे।
वैसे भारतमाता की जय और वन्देमातरम ज़रूर कहा करें। लाखों मुस्लिम कहते हैं. इसके पीछे की रणनीति और इसके मायने गहराई से समझिये.
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जन गण मन अधिनायक जय हे, भारत भाग्य विधाता। पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा, द्राविड़, उत्कल, बंगा। विंध्य, हिमाचल, यमुना, गंगा, उच्छल जलधि तरंगा। तव शुभ नामे जागे, तव शुभ आशीष मांगे। गाहे तव जय गाथा। जन गण मंगलदायक जय हे, भारत भाग्य विधाता। जय हे! जय हे! जय हे! जय जय जय जय हे।
जन गण मन के उस अधिनायक की जय हो, जो भारत के भाग्यविधाता हैं! उनका नाम सुनते ही पंजाब सिन्ध गुजरात और मराठा, द्राविड़ उत्कल व बंगाल एवं विन्ध्या हिमाचल व यमुना और गंगा के लोगों के हृदयों में तरंगें भर उठती हैं। सब तेरे पवित्र नाम पर जाग उठते हैं, सब तेरे पवित्र आशीर्वाद पाने की अभिलाषा रखते हैं। और सब तेरे ही जयगाथाओं का गान करते हैं। जनगण के मंगल दायक की जय हो, हे भारत के भाग्यविधाता। विजय हो विजय हो विजय हो, तेरी सदा सर्वदा विजय हो।
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ब्रह्मा
का चिन्तन, ध्यान उपासना. धूप-दीप से सत्कार-स्मरण
पूजा. ध्यान, मनन व भक्ति के अध्यात्मिक स्वरुप आराधना. विधि
द्वारा श्रद्धा से कर्मकांड से पूजन अर्चना. आरती शब्द आर्तिका से बना है जिसका
अर्थ है, कष्ट, विपत्ति, आपत्ति, क्लेश।
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