क्या वाकई कोई ईश्वर है?
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इतने अनुपम ब्राह्माण्ड का एक एक्सीडेंट के द्वारा अस्तित्व में आ जाने की
प्रोबेबिलिटी शून्य है इसलिए अब वैज्ञानिक और नास्तिक ब्रह्माण्ड को निर्माता मानने
लगे है। और आस्तिक लोग, ब्रह्माण्ड का एक निर्माता मानते है। डार्विन
थ्योरी के अनुसार बहुत सी समझ में नहीं आने वाली चीजें या फैक्ट्स By
chance हुए हैं। यानी डार्विन के पैरोकार, ईश्वर को ही बाई चांस नाम से बुलाते है। देखा जाए तो विज्ञान ये मानने ये सिर्फ एक कदम दूर है कि प्रकृति या ऊर्जा खुद क्रिएटर नहीँ है बल्कि खुद एक क्रिएशन है और क्रिएशन है तो कोई क्रिएटर भी होगा (जो खुद क्रिएट नहीं हुई, उसका क्रिएटर भी नहीं होता).
■ मानव निर्मित चीज़ें देख कर अंदाज़ा हो जाता है कि किसी ने इन्हें कुछ
उद्देश्य के तहत डिज़ाइन किया गया है और जिन्हें कुछ विशेष फंक्शन परफॉर्म
करने है। जीव, प्रकृति, ब्रह्माण्ड को जांच कर भी मालूम हो जाता है कि ये
भी बनाई गई सृष्टि है, वो भी परफेक्ट, न कि अपने आप बनी हुई। इसीलिए आज वैज्ञानिक इस ब्रह्माण्ड को इंटेलिजेंट डिज़ाइन कहने लग गये हैं। जब सृष्टि का डिज़ाइन-निर्माण हुआ है
तो कोई निर्माण करने वाला भी होगा
■ ईश्वर और धर्म तो हमेशा से कहता आया है कि इस सृष्टि का निर्माण हुआ है और एक दिन इसका अंत भी होना है। उसी से आयें हैं और उसी पे वापिस जायेंगे. यही बात आज विज्ञान भी कह रहा है कि जिस तरह बिग बेंग से सृष्टी फैलना शुरू हुई, उसी तरह एक समय आएगा जब से सृष्टि वापिस सिकुड़ना शुरू हो जाएगी और वापिस उसी सिंगुलेरिटी पर जाकर खत्म हो जायगी। Universal law है कि जिस चीज़ की beginning
है, उसका end भी होगा और इसका vice versa भी. जैसे एक गुब्बारा पहले तेज़ी से फूलता है, फिर slow होता जता है, वैसे ही सृष्टि का अतं तय किया गया है।
■ वैज्ञानिक पहले ये मान रहे थे कि यह एक flat or tube like universe है मगर अब उनका यह मत बदल रहा है। इसी तरह Periodical Table भी पहले अधूरी थी मगर धीरे धीरे पूरी कर ली गई। इसमें खाली स्थान थे मगर कुछ को नाम-नम्बर दे रखे थे क्योंकि वो जानते थे कि जल्द ही वो इसे ज्ञात कर लेंगे और यही हुआ भी। ऐसे ही वैज्ञानिकों को पहले लगा कि energy लगतार Black holes इसमें जा रही और खतम हो रही रही है क्योंकि ये energy को absorb करते हैं। मगर energy तो कम हो ही नहीं रही इसलिए अब उन्हे लगा कि जरूर white holes भी हैं जो करोड़ों वर्षों से energy create कर रहे होंगे। सो अब white hole भी एक hypothesis है। इसिलिय सिर्फ विज्ञान की बुनियाद पर ईश्वर का इंकार कल गलत भी सिद्ध हो सकता है.
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समय के साथ प्रगति करते हुए हम जान गए है कि पेड़ पौधों में भी जान और
सेंसेस होती है। अब तो लेटेस्ट रिसर्च में ये सामने आ चुका है कि पानी तक
में इमोशन, एक्सप्रेशन होते है। हज़ारों साल पहले मानव ये समझते थे धरती
के छोर नहीं हैं और ये निरंतर चलती रहती है। फिर पता लगा कि धरती का अंत है। यही ब्रह्मांड के साथ भी होगा। एक ब्रह्माण्ड के बाद दूसरा
ब्रह्माण्ड मिलेगा फिर उसके बाद अनेकों ब्रह्माण्ड मिलेंगे और फिर अंत में ब्रह्माण्ड निर्माता भी मिलेगा। इसी तरह एक समय आ सकता है जब सृष्टि को बनाने वाले को सब, विज्ञान के आधार पर बेजिझक मान लोगे।
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God can not be observed with present human senses. मनुष्य की अपनी 5
इंद्रियों से उसे नहीं ग्रहण कर सकता। हाँ, पर ईश्वर को अनुभव करने में 6th sense जैसी कोई क्षमता (spiritual/ paranormal/ psychological
/ gut feeling/ subconsciousness ability) इसमें मददगार हो सकती है। उससे
जानने के लिए विज्ञान वो तकनीक हासिल नहीं कर पाया है। पर इन्सान उसे
महसूस, अहसास कर सकते हैं, मन से भी और प्रकृति देख कर भी। वैसे उसे
पूर्णतया जानने के लिये, मौत जैसे बैरियर को क्रॉस करना ज़ुरूरी है।
■ इन्सानी दिमाग अपने अस्तित्व, उद्देश्य के बारे जब भी गहन विचार करता है, उसे खुद के बने हुए होने का और इस सृष्टि में ज़र्रे बराबर होने का बोध होता है. इससे 2 ही परिणाम निकलते हैं कि वो या तो यह मान ले कि वो भी बस एक जीव है, अन्य करोड़ों प्रजतिओं की तरह और उसे मिली गैर मामूली सलाहियते बस एक हादसा हैं या फिर ये माने नहीं कि कुछ भी बिना उद्देश्य के नहीं हैं और उद्देश्य है तो उद्देश्य देने वाला भी कोई होगा।
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जिस तरह गिनती ज़ीरो से शुरू नहीं बल्कि 1 से शरू होती है आगे बढती जाती
है, उसी तरह बिग बैंग की गिनती उस एक ईश्वर से शूरू हुई और बढती चली जा रही
है। वही पहला नंबर है। बिना आरंभ, आरंभ नहीं होता, बिना क्रिया,
प्रतिक्रिया नहीं होती।
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जिस प्रकार गणित में एक संख्या को X (एक्स) मान कर, गणना हल करी जाती है, उसी
प्रकार इस सृष्टि का रहस्य सुलझाने के लिए भी एक शक्ति को मानना पड़ेगा। X का मान शुरू में अज्ञात होता है, उसी तरह सृष्टि को समझते हुए भी निर्मता
का ज्ञान होने लगता है।
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प्रकृति में जिस चीज़ का अस्तित्व नहीं है, इंसानी फितरत, स्वभाव को उसकी
चाह या ज़रूरत हो नहीं सकती। अगर पानी, हवा नहीं होती तो इंसान को इनकी
ज़रूरत ही नहीं होती। जब से दुनिया चली आ रही है तब से ही किसी न किसी रूप
में लोग अपना एक ईश्वर मानते आ रहे हैं. कोई तो है जिसकी
आवशयकता इंसानों को हमेशा रही है। ईश्वर के अस्तित्व ना होने का दावा करने वालो को ईश्वर के होने के सबूत मांगने से पहले ईश्वर के ना होने के सबूत देने चाहिए.
इंसानी फितरत में किसी के आगोश, छत्रचाय में रहने की चाहत भी मौजूद है. यही वजह है कि अक्सर लोग बाबाओ-गुरुओं के चंगुल में फंसे हुए होते हैं क्योंकि ये चाह उनकी वो पूरी करने की कोशिश करते हैं. यही चाहत, माँ-बाप, बड़ो-बुजुर्गों को समाज में अहमियत दिला पाता है.
■ मां की ममता को
देखा नहीं किया जा सकता पर वो है। दुनिया का हर आदमी इसे मानता है इसलिए
जो नहीं मानता वो इसके न होने के सबूत दे। बहुत थोड़ी से खुदगर्ज़ और अमानवीय
औरतें ही होंगी जो इसका इनकार करे इसलिए उनकी राय पर इसके न होने की दलील
नहीं मानी जा सकती। ऐसे ही दुनिया में लोग हमेशा से ईश्वर का अस्तित्व
मानते आ रहे है, बहुत थोड़े से हुए हैं, जो नहीं मानते। इसलिए न मानने वालों को ईश्वर के न होने का सबूत
देना चाहिए। हालांकि अब इनकी संख्या बढ़ती जा रही है पर अब भी यह
अल्पसंख्यक ही है। इसलिए आज भी इस मत के मानने वालों को ईश्वर के न होने के
सबूत देने चाहिए। जिन तर्कों को वो लोग देते हैं, वो ईश्वर के अस्तित्व से
संबंधित नहीं बल्कि संसार के संचालन और अपनी जाती मस्याओं से संबंधित होते
हैं, जिन पर अगर खुले दिमाग से सोचा जाए तो जवाब मिल जायँगे।
असल
में इनकार ईश्वर का नहीं बल्कि अकॉउंटेबिलिटी का है। नास्तिक नहीं चाहते कि
उन्हें अपने कर्मो का हिसाब देना पड़े। वो हर चीज़ अपने मन मुताबिक़ करना
चाहते हैं। उन्हें ये पसंद नहीं कि वो किसी के अधीन जीवन बिताए।
ईश्वर क्यों नहीं दिखता है?
इसे Hiddenness Argument कहा जाता है.
■ ईश्वर को हमारी 5 इंद्रियों से नहीं परखा जा सकता। कुछ चीज़ one dimensional होती हैं यानी जिनकी सिर्फ लंबाई होती हैं जैसे कोई सीधी लाइन (थेयोरोटिकली)। कुछ चीज़ें two dimensional होती हैं यानी जिनकी लंबाई और चौड़ाई दोनों होती है जैसे परछाई या स्क्रीन पर आती पिक्चर्स। 3 डायमेंशनल चीज़े वो होती हैं, जिनकी लंबाई, चौड़ाई, मोटाई होती हैं जैसे पेड़, पहाड़, जीव आदि। वैज्ञानिक ये कह चुके हैं कि space 4 dimensional है यानी उसका एक और dimension होता है जो time है। बल्कि अब तो ये तक कहा जा रहा है कि ब्रह्मण्ड की 10 से भी ज़्यादा dimension हो सकती हैं पर ये dimensions क्या-कैसी हो सकती हैं, इस पर रिसर्च चालू है। लाखों साल बाद जाके आज हमें पता लगा है कि 3 से भी ज़्यादा डायमेंशन हो सकती है तो यकीनन ऐसे भी चीज़ हो सकती है जिनकी डायमेंशन ज़ीरो हो या जो dimension less हो यानी जिसकी dimensions ही न हो। यक़ीनन ईश्वर dimension के फेर से बहुत परे है, जो भविष्य में विज्ञान अवश्य जान लेगा।
■ ईश्वर निराकर है। दुनिया में बहुत चीज़े है जिनका कोई आकार नहीं हैं पर वो हैं जैसे ग्रेविटी, हवा आदि. भावनाएं, थोट्स और इंटेलीजेन्स का कोई आकर नहीं होता. किसी के अस्तित्व की पहचान उसका दिखना नहीं बल्कि उसके अस्तित्व के प्रमाण होते हैं यानि किसी चीज़ के होने का प्रमाण उसका अनुभव होना होता है। जैसे किसी ने भी बिगबैंग होते हुए नहीं देखा है परन्तु कई आधार पे ये मान्य है। ब्रह्मांड बनाने वाली डार्क एनर्जी, डार्क मैटर के बारे में पता तो लग चुका है कि वो हैं, पर वो एक्ज़ेक्टली क्या-कैसी हैं, हम अभी तक नहीं जान पाए है। यंहा तक कि न दिखने और न समझ में आने वाले बरमूडा/ड्रैगन ट्रायंगल को भी अभी तक पूरी तरह नहीं जान पाए हैं, कि आखिर वो क्या-क्यों हैं? ग्रेविटी दिखती नहीं है मगर शुरू से है पर उसे हम अब बस 350 साल पहले उसे जान पाए हैं. इंसान 20-20000 हर्ट्ज की फ्रीक्वेंसी वाले साउंड सुन सकता है पर इससे कम और इससे ज़्यादा फ्रीक्वेंसी की आवाज़ें भी होती हैं, हम आज जान गए है। क्योंकि पहले हम उन्हें सुन नहीं पाते थे तो इसका मतलब ये नहीं हुआ कि वे नहीं थी। सही समय आने पर ईश्वर का भी ज्ञान-अनुभव हो जाएगा.
कुछ साल पहके तक हम क्वार्क, इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन, प्रोटोन, एटम, बैक्टिरिया, गलैक्ससीज़
नहीं देख पाते थे पर वो मौजूद थे और आज हम उन्हें देख सकते हैं। ऐसे भी
स्टार है जिनकी लाइट अभी तक पृथ्वी पर पहुंच ही नहीं पाई है क्योंकि स्पेस
लाइट की स्पीड से भी तेज़ फैल रहा है। बहुत से ऐसे ग्रह हैं जो अरबो लाइट
वर्ष दूर है और उन्हें अबतक देखा
नहीं जा सका है मगर वो ऑब्ज़र्व कर लिए गए हैं और इसलिए उन्हें भविष्य में
कभी देखा भी जा सकेगा। यही तर्क ईश्वर के साथ मानने में क्या हर्ज है?
कल्पना करो कि धरती पर सभी अंधे होते तो क्या हम सूरज, चांद, सितारों के अस्तित्व का इनकार कर देते? नहीं करते क्योंकि हम अनुभव कर लेते।
■ किसी दरवाज़े के पीछे न दिखने वाले व्यक्ति की चहल कदमी, दरवाज़े के नीचे से कोई साया, कोई सुंगंध, हवा के दबाव आदि से पता लग जाता है कि कोई न कोई दरवाजे के उस पार है। क्योंकि इन्हें सेंस किया जा सकता है। बल्कि अक्सर हमें हमारी इंट्यूशन बहुत सी चीज़े बता देती है। इसी तरह बहुत से चीज़े हम फील करके अनुभव करते है। जैसे मन से, सिक्स्थ सेंस से, मननशक्ति से या तर्कशक्ति से। जैसे आपने भी कई बार महसूस किया होगा कि आप अपने किसी को याद कर रहे है और दुसरे शहर में बैठा वही व्यक्ति ठीक उसी समय आपको याद कर रहा होता है। ये कनेक्शन मन की भावनाओ और दिमाग की विचार तंरगों (telepathy) से होता है। क्या ईश्वर के साथ यही संबंध नहीं हो सकता। जैसे आज मोइबल पर हमारी वोइस-डेटा हमारे वातावरण में ही घूम रहा है मगर हमें दिखाई नहीं देता मगर इसका मतलब ये तो नहीं कि मौजूद नहीं हैं।
■ ईश्वर कैसा है, ये नास्तिकों को समझ नहीं आता क्योंकि मनुष्य की बुद्धि सीमित है और उसे अक्सर असम्भव लगने वाली चीज़ तब संभव लगने लगती है जब उसे कोई हिंट मिल जाये। जैसे आज ऑप्टिकल इल्लुज़न तकनीक से ऐसी पिक्चर बना रही हैं जिन्हें ध्यान से देखने पर या थोड़ा सा एंगल बदलने पर कोई चीज़, एक अन्य चीज़ दिखने लगती है जैसे square-circle, काला-सफ़ेद, जाती गाड़ी-आते हुए या फिर उलटी प्लेट-सीधी दिखने लगती हैं. यानी ना दिख रही चीज़ भी दिखने लग जाती है। ऐसे ही ईश्वर भी दिख जाएगा, बस थोडा ध्यान केन्द्रित करने या दृष्टिकोण बदलने की ज़ुरूरत है (अभी नही तो अंत में दिख ही जाएगा)।
■ जैसे कोई इन्सान अपने शरीर को दिखा सकता है मगर अपने अंदर के स्वयं को नहीं. उस तरह ईश्वर को किसी को दिखाया नहीं जा सकता पर वो है।
किसी से पूछो कि तुम कौन हो? वो अपना नाम बताएगा। फिर पूछो की तुम कंहा हो? वो उंगली से खुद की छाती की ओर इशारा करेगा। फिर से पूछोगे तो वो कहेगा कि मैं इसी के अंदर हूँ। उससे कहो कि ये तो तुम्हारा शरीर है, तुम कंहा हो, या तो शरीरी से बाहर आके दिखाओ या मुझे दिखाओ कि तुम अंदर से कैसे दिखते हो? वो कहेगा कि नहीं दिखा सकता पर मैं जानता हूँ कि ये मैं हूँ।
● अगर ईश्वर है तो वो निराकर ही होगा है ये बात नास्तिक भी अच्छी तरह जानते हैं। अचानक आई विपदा या एक्सीडेंट को देखके लोग मन में या आसमान की तरह देख कर ही प्रार्थना करता है। तब उसे किसी आकार- सूरत का ध्यान नहीं आता।
● वैसे ईश्वर आसमान से सर बाहर निकाल कर अगर अपना चेहरा दिखा देता सभी के लिए ये एक बचकाना बात से ज्यादा और कुछ नहीं होती.
क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है जिसे खुद न उठा सके?
ईश्वर बड़ा है या ईश्वर के विराजमान होने का सिंहासन?
सवालो के मायने: ईश्वर
सब कुछ कर सकता है तो ऐसा पत्थर भी बना सकता है जो वो खुद ना उठा सके मगर
जब वो ऐसा पत्थर उठा नहीं सकेगा तो उसके सब कुछ कर सकने की शक्ति फैल हो
जायगी. इसी तरह अगर ईश्वर सबसे बड़ा है तो वो सिंहासन पर बैठ नहीं पायेगा और अगर
सिंहासन ईश्वर से बड़ा है तो ईश्वर सिंहासन से छोटा हो गया [वैसे ईश्वर किसी तख्त या सिँहासन पर विराजमान नहीं है].
ये विरोधाभासी, absurd या illogical
सवाल होते हैं क्योंकि ये अपने आधार में ही गलत होते हैं। जैसे कि क्या कोई
झूट, सच्चा हो सकता है? क्या आग, ठंडी हो सकती है? क्या बर्फ गर्म हो सकती
है? या जैसे कोई कहे कि क्या ईश्वर धोखा दे सकता है या चोरी कर सकता है?
इस तरह के सवालो को science paradox कहते हैं। इनके जवाब न तो 'हां' में हो सकते और ना ही 'नहीं' में। इनके तसल्ली बख्श जवाब नहीं हो सकते क्योंकि ये सवाल अपनी बुनियाद में ही गलत होते हैं।
जैसे एक पैराडॉक्स है, Socratic paradox: जो कुछ में जानता हूँ वो यही है कि मैं कुछ भी नहीं जानता (इसमे क्या सोक्रेटस को कुछ ज्ञान है या कोई ज्ञान ही नहीं है। दोनों जवाब हो सकते हैं)। कुछ अन्य पैराडॉक्स हैं: Omnipotence paradox, crocodile paradox etc.
सवाल उस वक्तव्य को कहते हैं जिसका अंत जवाब पर होता है (भले ही जवाब अभी न मिल पाए). इसलिए
जिसका कोई जवाब हो ही नहीं सकता, वह सवाल, सवाल ही नहीं कहलायेगा क्योंकि
वो इस परिभाषा से ही बाहर है। जैसे 2+2=5 क्यों होते है? ये सवाल, कोई सवाल ही नहीं है.
ईश्वर को किसने बनाया है?
Everything has not a creator. Every created thing has a Creator. The God is un-created so He has no creator.
सृष्टि में किसी भी चीज़ का कोई निर्माता है या नहीं, इसको जानने के लिए
सबसे पहले ये पता लगाना होता है कि वो चीज़ क्या है और कैसे बनी हुई है।
क्या उसका रंग, रूप, आकार इस बात की और इशारा कर रहा है कि उसे किसी ने
बनाया है। जैसे किसी कुर्सी को देख कर अंदाज़ा हो जाता है कि किसी ने लकड़ी
को काटके, ठोकके, जोड़के, तराशकेर
और रंग करके कुर्सी बना दी है। इसलिए कुर्सी बनाने वाला कोई कारपेंटर है।
इसी तरह पेड़ को देख कर भी अंदाज़ा हो जाता है कि इसे किसी कारपेन्टर ने नहीं
तराशा बल्कि प्रकृति ने बनाया है। तो फिर पेड़ का भी कोई बनाने वाला है।
सृष्टि और जीवन को देख कर भी अंदाज़ा लगाया जाता है कि ये बने हुए हैं और
इसलिए इनका भी निर्माता खोजा जाता है। Created things can be sensed.
बनी हुई चीजों को छुआ, देखा, सुना, सूंघा और चखा जा सकता है। ईश्वर के साथ
ये नहीं किया जा सकता, बल्कि उसे तो केवल अनुभव किया जा सकता है। इसी तरह
ईश्वर को किसी ने बनाया है या नहीं, ये जानने के लिए पहले ईश्वर का जायजा
करना पड़ेगा, उसे जांचना पड़ेगा। यानी जब तक आप उस का जायज़ा नहीं ले लेते तब
तक ये सवाल बेतुका है कि उसे किसने बनाया है? जब आप ये जांच लोगे कि ईश्वर
तो एक बनाई हुआ अस्तित्व या शय है तब ये सवाल उठेगा कि उसे किस ने बनाया
है? उससे पहले तक ये एक इररेलेवेंट सवाल है।
पहले कौन आया, मुर्गी या अंडा?
ये सवाल हज़ारों सालो से अनसुलझा था। कुछ साल पहले वैज्ञानिकों ने बताया कि
मुर्गीयां पहले आयी (बनी) क्योंकि अंडे में एक खास प्रोटीन होता है जो
सिर्फ मुर्गी के जिस्म में होता है जंहा से वो अंडे को मिलता है। यानी जब
दुनिया इस लायक हो गयी कि मुर्गी और अंडे को जांचा जा सके किसी खास तकनीक
से, तभी ये मालूम हुआ। इसी प्रकार अभी ईश्वर को सेंसेस से जांचने की तकनीक
नहीं बन पायी है इसलिए अभी ये सवाल बनता ही नहीं है कि उसे किस ने बनाया
है?
◆
नास्तिको की समझ में एक बहुत बड़ा कंट्राडिक्शन है। ये लोग ख़ुद तो कायनात
को बगैर ख़ालिक (निर्माता) के मान रहे हैं, मगर ख़ालिक को मानने के लिए वो
एक खल्क ए ख़ालिक (निर्माता के निर्माता) का मुतालबा करते हैं। हालांकि
कायनात का वजूद अगर बगैर ख़ालिक के मुमकिन है तो ख़ालिक का वजूद भी बगैर
ख़ालिक के मुमकिन होना चाहिए।
Anything which has Limited physical qualities are created things, they don't give birth to themselves, something external give birth to them. This applies to the Universe as well.
अगर सब ईश्वर ने बनाया है तो फिर ईश्वर को किसने बनाया है?
ये भी एक Absurd या Illogical
सवाल है क्योंकि अगर ईश्वर को किसी ने बनाया है तो फिर ईश्वर को बनाने वाले को भी किसी ने बनाया होगा, फिर उस बनाने वाले को भी किसी और ने बनाया होगा और फिर उसे भी. इस तरह तो ये चैन चलती जाएगी और कभी नहीं खत्म होगी। इसलिए ये सवाल एक ad infinitum बन जाता है जिसका कभी अंत नहीं होता।
जैसे कि गिनती का अंतिम अंक क्या है? कुछ नहीं। गिनती अनन्त है। जिसका अंत नहीं। 10 को 3 से भाग दो तो जवाब 3.333333... में अंतिम अंक 3 infinitely चलता चला जायेगा।
इसलिए इस सवाल का जवाब Infinite Regression में होगा जो विज्ञान का एक लॉ है। यानी कि जब आप इनके जवाब ढूंढने पीछे ही
पीछे जाते रहते तो है तो ऐसे छोर पर पहुंच ही जाते है जंहा से ये चीज़ शुरू
हुई होगी। जैसे फौज में सिपाही को गोली चलाने के लिए पहले सूबेदार से आज्ञा
लेनी होगी। सूबेदार मेजर से आज्ञा लेगा, मेजर ब्रिगेडियर से, ब्रिगेडियर
आर्मी चीफ से, आर्मी चीफ राष्ट्रपति से, राष्ट्रपति पीएम से, पीएम अपनी
पार्टी वालों से, पार्टी वाले अपने बिज़नेसमैन दोस्तो से, बिज़नेसमैन अपनी
वाइफ से और वाइफ, बाप से। ऐसे तो ये सिलसिला चलता रहेगा और वो सिपाही कभी
सरहद पर गोली नहीं चला पाएगा।
पर असल मे गोली तो अरबों साल पहले चल चुकी
है, जब बिग बैंग हुआ। ये क़ायनात यानी सृष्टि तो वजूद में आ चुकी है। यानी ये कंही से तो शुरू हुई थी, किसी ने तो शुरू करी थी, बस वही तो ईश्वर है।
ऐसे ही एक पैराडॉक्स Place paradox भी होता है कि दुनिया में किसी चीज़ ने कुछ स्थान घेर रखा है, तो दुनिया ने ब्रह्मांड में कुछ स्थान घेर रखा है। फिर ब्रह्मण्ड ने भी किसी चीज़ में स्थान घेर रखा होगा, फिर चीज़ ने भी कंही कुछ स्थान घेर रखा होगा और फिर आगे उस स्थान ने भी। यानी ये सिलसिला चलता जाएगा. इसलिए इस सवाल का भी जवाब infinity बन जाता है जो अंनत तक चलता रहेगा।
ईश्वर एक है या अनेक?
ईश्वर तो एक ही है अगर दो होते तो इस सृष्टि, प्रकृति का संचालन ऐसे ही भली भांति नहीं हो रहा होता। अगर ईश्वर दो या दो से अधिक होते तो प्रत्येक अपनी इच्छा अनुसार सृष्टि, प्रकृति, जीवन बना और चला रहा होता। इन ईश्वरों में ही आपस में द्वंद चल रहा होता। कोई ग्रहों को अपने अनुसार चला रहा होता, कोई उपग्रहों को अपने अनुसार। कोई पानी से प्यास भुजाने का नियम रखता, कोई हवा से प्यास भुजाने का। यानी जिन नियमों के अनुसार संसार चल रहा है, वो फिजिकल फेनोमेना ऑफ नेचर भी अलग अलग ईश्वर के अनुसार अलग-अलग रिजल्ट दे रहे होते। सर्वोच्चय संचालन भी एक ही मस्तिष्क के द्वारा होता है। अपनी यही विशेषता ईश्वर ने अपनी प्रकृति में भी रख दी। इसलिए मनुष्य भी एक ही राजा बनाते आ रहे हैं. PM-Prez एक ही बनाया जाता है। कई कमांड- ऑथरिटी रखने वाली गठबंधन की सरकारें जल्दी गिर जाती हैं. सास-बहु के या बाप-बेटे के दो दिमागों के कारण घर तक सही से नहीं चल पाता। किसी कार के दो ड्राइवर नहीं होते हैं.
बचपन में एक चुटकुला सुनते थे कि एक हेलिकॉप्टर में खराबी आने पर मुसलमान, ईसाई और सिख अपने अपने गॉड से बचाने की प्राथना करके कूदे और सही समय पर उनके गॉड ने उनका पैराशूट खोल कर बचा लिया। पर एक हिन्दू नहीं बच पाया क्योंकी उसने एक-एक करके सभी भगवानों से मांगा और सब ये सोच कर आराम से बैठ रहे कि भक्त ने सभी को पुकारा है तो कोई न कोई तो बचा लेगा।
शुरुवात से आज तक मनुष्यों, धर्म, ग्रंथों, तर्कों के द्वारा ईश्वर को आमतौर पर एक ही माना जा रहा है।
ईश्वर निराकर है तो सृष्टि के प्रथम तत्व की रचना किस चीज़ से हुई?
ईश्वर के अस्तित्व का अंश, किसी रचना में शामिल नहीं है। मगर एक मत ये भी है कि ईश्वर ने सृष्टि बनाने का विचार किया, तो विचार करने से जो तरंगें उत्पन्न हुई वो अणु, परमाणु का रूप लेती चली गईं और उनसे चेतन-भौतिक स्वरुप बनता चला गया। जैसे आपके मुंह से निकली आवाज़, रिकार्डेड वॉइस फ़ाइल बन जाती है, जो आपकी ज़ाती होते हुए भी, आपके शरीर का अंग नहीं होती।
ईश्वर कंहा है?
ईश्वर
निस्संदेह इस सृष्टि के अंदर नहीं बल्कि बाहर है और अपनी सृष्टि को लगभग
ऐसे ही देखता है जैसे एक इंजीनियर टेबल पर रखे अपने आर्किटेक्चर स्केल मॉडल
को देखता है। बल्कि उससे भी श्रेष्ठ तरीके से देखता है। आगर मानव शरीर में
CT, MRI मशीनें झांक सकती है, दिमाग में मनोवैज्ञानिक, माइंड रीडर, पर्सनेलिटी डेवेलपर झांक
सकते हैं तो ईश्वर भी मन-मस्तिष्क में झाँक सकता है. जबकि मानव की
शक्ति-क्षमता की तुलना में ईश्वर अपार शक्तिशाली है तो उसके लिए ये सब करना
असंभव नहीं है। जो जितना ऊंचा उड़ने वाला पक्षी होता है, प्राकृतिक तौर पर उसकी उतनी
ही पैनी नज़र होती है। यह प्राकृतिक नियम स्वयं ईश्वर की ओर इशारा है
क्योंकि वही सबसे ऊपर और सबके ऊपर है, उसकी दृष्टि से कोई चीज़ कैसे छुप
सकती है। ईश्वर किसी सिंहासन या अर्श पर बैठा हुआ नहीं है. ऐसे होता तो ये एक बचकानी बात होती. ये एक रूपक वाक्य है.
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ईश्वर ने सृष्टि-जीवन क्यों बनाया?
● पहली बात कि कोई भी रचना अपने रचियता से स्वयं को बनाए जाने के कारण पर चेलेंज नहीं कर सकती। कंप्यूटर अपने निर्माता से यह नहीं कह सकता कि मुझे क्यों बनाया या मुझे नहीं बनाना चाहिए था आदि। दूसरी बात कि अगर कोई रोबोट अपने निर्माता से यह पूछ भी ले कि उसे क्यों बनाया गया और निर्माता कह दे दी कि क्योंकि वो ऐसा चाहता था या फला फला कार्य करवाना चाहता है तो रोबोट को कोई अधिकार ही नहीं रह गया कि वो निर्माता के उद्देश्य की पूर्ति से विपरीत अपने कोई उद्देश्य पूर्ण करने हेतु कार्य करने लगे। जैसे कोई औलाद मां-बाप से पूछे कि उसे क्यों पैदा किया तो ये सवाल बैमानी होगा।
● ईश्वर सबसे महान, शक्तिशाली और प्रशंसनीय है। मनुष्य भी चाहता है कि वह स्वयं अपनी बढ़ाई न करे. मनुष्य जानता है कि असली मज़ा तो तब है जब कोई अन्य प्रशंसा करे और वो भी दिल से। ईश्वर ने चाहा कि उसकी सच्ची प्रशंसा और भक्ति की जाए। ये सच्ची श्रद्धा तभी संभव है जब फ्री विल के बावजूद उसको सर्वेसर्वा माना जाय। इसलिए ईश्वर ने अपनी महानता को ज़ाहिर करने, अपनी शक्ति को व्यवहारिक मूल्य देने, अंतर्मन से प्रशंसा करवाने और सच्ची उपासना करवाने के लिए सृष्टि और मनुष्य को बनाया है (इबादत का अर्थ होता मुक़म्मल बंदगी)। उसने हमें फ्री विल दी कि हम जो भी करे अपनी ईच्छा और सच्चे मन से करे। इसके बदले में ईश्वर ने मनुष्यों को अनगिनत सुख और अमरता देने का वादा किया। जैसे मां-बाप अपने बच्चो को जन्म देने के बाद उनसे ये अपेक्षा करते है कि वो उन्हें सच्चा प्रेम करें, मन से उनका आदर करे, उनके आदेश माने आदि।
● ईश्वर के पास रचना की शक्ति तो उस शक्ति के प्रयोग से ही रचनाएं करी गयी। सृष्टि करने की शक्ति, बिना सृष्टि किए कोई शक्ति ही नहीं होगी, मूल्यहीन होगी। इसीलिए शक्ति है तो उसका प्रयोग भी है। ईश्वर ने प्रकृति में भी ये गुण रख दिया है कि वह ईश्वर की तरह ही रचना की शक्ति से रचनाएं करती जाए। इसलिए ब्रह्मांड की हर रचनात्मक शक्ति अन्य रचनाएं बनाये चली जाती है। उदाहरण के लिए मनुष्य के पास जन्म देने की शक्ति है और वह उसका प्रयोग करके बच्चो को जन्म देता है। बच्चे पैदा करने के लिए बहुत से लोगो के पास कारण होते है और बहुत से लोगों के पास कोई कारण नहीं होता। पर इस शक्ति का प्रयोग सभी करते हैं। नस्ल बढाने के पीछे अक्सर कारण, उद्देश्य छिपे होते हैं। इन उद्देश्य की पूर्ति की कोई संभावना न भी हो तो भी लोग बच्चे पैदा करते हैं। क्यों? इसका जवाब वही है जो ईश्वर द्वारा सृष्टि पैदा क्यों करी गई, प्रश्न का जवाब है। शक्ति है तो प्रयोग है।
मनुष्यों
को जितनी भी शक्तियां या क़ुव्वते दी गई है, मनुष्य उन सभी का इस्तेमाल
करता है। जैसे दिमाग है तो सोचता है, हाथ पांव आँखें है तो उनका प्रयोग
करता है, ज़ुबान है तो उससे चखता है आदि। यही मनुष्यो की प्रकृति है कि वो
अपनी क्षमताओं का इस्तेमाल करता है। इसी लिए मनुष्य बच्चे भी पैदा करता है.
वैसे नस्ल बढ़ाना इंसानी फितरत का हिस्सा है. इंसानों के एक दुसरे से रिश्ते-सम्बन्ध होने हैं क्योंकि ये इंसानी ज़रूरत होती है, इन्सान कोई मशीन नहीं है. संतान इन्सान की आवश्यकता होती है, कौन उनकी नस्ल चलाएगा, कौन बुढ़ापे में सहारा बनेगा, कौन विरासत संभालेगा, कौन नाम आगे बढ़ाएगा जैसे कई कारण हैं इसके पीछे.
● जिसकी मर्ज़ी से जन्म-मृत्यु मिलती है, वो चाहता तो जीवन में भी अपनी कंपलसरी इच्छा चला सकता था। पर क्योंकि जीवन एक परीक्षा है, इसलिए बिना फ्री विल दिए इस परीक्षा को लिया ही नहीं जा सकता है और टेस्ट लेने का यही बेस्ट तरीका है। फ्री विल न होती तो ये जीवन ऐसे ही होता जैसे टेस्ट पेपर बच्चो को थमाते हुए, आंसर सहेत भी साथ पकड़ा दी जाये। जैसे एक टेस्ट पास करके IAS बन जाते हैं और फिर जीवन भर आरामदायक ज़िंदगी चलती रहती है, वैसे इस टेस्ट को पास करने के बाद परलोक में अनन्त काल का सुखदाई जीवन है, जिसकी पूरी तरह से कल्पना भी नहीं की जा सकती।
ईश्वर अपनी भक्ति क्यों करवाना चाहता है?
● ईश्वर अपनी भक्ति या अपनी मर्ज़ी क्यों चलवाना चाहता है?
यह ऐसा ही सवाल है जैसे कोई अपने माँ-बाप से पूछे कि आप क्यों मुझसे अपने
आदेश मनवाना चाहते हो या आप क्यों चाहते हो कि मैं आपके पास रोज़ थोड़ी देर
बैठू, बात करूं या सम्मान करूँ वगैरह। असल में मां-बाप ऐसा क्यों चाहते
हैं, ये हर मां-बाप समझता है और हर नेक औलाद भी। अपनी औलादों से उनका लगाव-चाह होती है। उन्हें अच्छा लगता जब हम उनके लिए अपना समय निकाल कर बातचीत करते हैं.
ईश्वर अगर सब देखता है तो बुराई-दुखों में हस्तक्षेप क्यों नहीं करता?

इसे Problem of Evil argument कहा जाता है.
वह
इस सृष्टि-जीवों को प्राकृतिक नियमों में बांध कर चला रहा है, जिनमें वह
अक्सर और अधिकत्तर हस्तक्षेप नहीं करता है क्योंकि फ्री विल उपयोग की सही
परीक्षा तब ही हो पाएगी जब उसकी निगरानी तो हो पर उसका व्यवधान नहीँ हो। अगर ईश्वर अपने आप को सामने ले आये तो ये जीवन, परीक्षा ही नहीं बचेगी। परीक्षा के लिए सवाल सामने रखे जाते हैं और जवाब बाद में उपलब्ध करवाये जाते हैं। पहले ही जवाब दे दे तो वो परीक्षा नहीं फॉर्मेलिटी या चीटिंग कहलाई जाती है। अगर उसने पर्दा हटा दिया तो ऐसे में फ्री विल का भी औचित्य नहीं रह जायेगा। फ्री विल है इसलिए हर किसी को अच्छा-बुरा करने की आज़ादी है. अगर वो सामने आ जाये तो फ्री विल एक अनउपयोगी वरदान रह जायेगा। वैसे भी ईश्वर नाम की सत्ता का आम चीज़ों की तरह दिखाई देना उसे एक आम चीज़ जैसा सिद्ध कर देगा और दुनिया में हर जगह, हर समय, हर चीज़ में उसका हस्तकक्षेप अगर होने लगता तो फिर कोई नास्तिक नहीं होता और फिर कोई परीक्षा भी नहीं होती, दुनिया एक शतरंज की बिसात और इन्सान पियादे बनके रह जाते. इसलिए गहराई से समझने पर ये साफ़ हो जाता है कि इम्तिहान के लिए इससे बेहतर कोई दुनिया या निज़ाम हो ही नहीं सकता था। ये दुनिया या निज़ाम एग्ज़ाम का परफेक्ट डिज़ाइन है।
क्या ईश्वर ने ही बुराई को पैदा किया है?
ईश्वर ने इंसानों को इरादा, इख़्तियार दिया है, इसके बदले अच्छाई-बुराई दोनों अपने आप पैदा होगी. अच्छाई-बुराई को शय नहीं हैं बल्कि कर्मों का वर्गीकरण है. बहुत से विद्वान बुराई को भी एक शय मानते हैं और इसे ईश्वर द्वारा निर्मित बताते हैं जो इंसानों के इम्तिहान के लिए बनायी गयी है जैसे टेस्ट पेपर में एक्जामिनर सही और गलत दोनों तरह के ऑप्शन रखता हैं, मगर कौन सा चुनना है और कौन सा नहीं, ये बच्चों पर निर्भर करता है.
अल्लाह की मर्ज़ी की बजाए अल्लाह की अप्रूवल से हर चीज़ होती है, ये कहना ज्यादा बेहतर है क्योंकि उसकी पसिंदीदगी से हर चीज़ नहीं होती है।
दुनिया में इतना दुख, बीमारी, निर्धनता, ज़ुल्म आदि क्यों हैं?
● एक अच्छे मां बाप चाहते हैं कि उनकी संतान कामयाब हो, इसके लिए वो उनसे मेहनत करवाते है जो अक्सर संतान के लिए दुखदायी होती है जैसे रोज़ पढ़ाई करना, सुबह जल्दी उठना, पढ़ने के लिए पैदल-बसों में धक्के खाते हुए जाना। उनसे घर का छोटा-मोटा काम भी करवाते हैं। बच्चों को ये सब पसंद नहीं होता, वो रोते हैं, नाराज़ होते हैं क्योंकि वो खेलना, मौज-मस्ती करना चाहता हैं मगर हम उनसे ये सब करवा कर ही छोड़ते हैं क्योंकि ये उनके उज्जवल भविष्य के लिए होता है। इसके लिए कभी उसकी पिटाई भी करनी पड़ती है। माँ-बाप चाहते हैं कि बच्चें चीजों का मोल, दुनिया का निज़ाम और अपने बेहतर भविष्य को बनाने की प्रक्रिया को समझें। जबकि माँ-बाप चाहें तो बच्चे को हर चीज़ आसनी से उपलब्ध करवा दें, उनकी पढाई रुकवा दें, उन्हें काम-धंधा ना सिखा कर, हर सुख यूँही देते रहें मगर हम ऐसे नहीं करते बल्कि बच्चों को दुनिया की जद्दो-जेहद, चुनौतियों, कठिनाइयों का सामना करने देते हैं ताकि वो खुद अपने बलबूते पर ज़िन्दगी जीना सीखें. इसी तरह मेहनत करेक और दुखो को झेलकर ही एक बच्चा कामयाब इंसान बनता है। इसलिए दुनिया में दुःख इन्सान की परीक्षा, बेहतरी के लिए हैं.
● दुख को लेके दो दृष्टिकोण है। पहला की दुख सिर्फ परेशानी है। दुसरा की दुख, चैलेंज या परीक्षा भी है। पैदल चलना किसी के लिए दुख है, किसी के लिए एक्सरसाइज जिसके करने के बाद बॉडी फिट रहती है। जैसे परीक्षा में आसान सवाल आते हैं और मुश्किल भी। मेघावी छात्र के लिए मुश्किल सवाल भी आसान है। और न पढ़ने वाले छात्र के लिए आसान सवाल भी मुश्किल है। ज़िंदगी में सिर्फ दुख ही दुख नहीं है। और सुख ही सुख भी नहीँ है। दोनों का मिक्सचर ही जीवन है। अपने से नीचे या कमज़ोर को देखो तो लगता है कि हम तो बहुत दुखी है। खुद से अमीर या ऊपर वालों को देखो तो लगता है कि हम तो बहुत सुखी है। और जब ऊपर वालों से पूछो तो वो कहते है कि अरे हम तो बहुत परेशान है। इसलिए दुख और सुख मापना आसान काम नहीं। सुख-दुख, उतार-चढ़ाव न हो तो जीवन का एक्साइटमेंट खत्म हो जाये, जीवन इतना नीरस हो जायेगा की सभी जीवन का अंत करने की ठान लेंगे क्योंकि हर दिन एक जैसा बीतने लगेगा। हम एक मशीन बनके रह जायंगे. दुख न होता तो सुख क्या है, हम जान ही नहीं पाते. दुःख है तो सुख का एहसास हो पात है।
● हम अक्सर बच्चों को कोई समझाने के लिए डांटते हैं या कभी कभी थोड़ी पिटाई भी कर देते हैं. क्योंकि हम जानते हैं ये डांट-पिटाई मात्र कुछ मिनटों भर की है मगर इनसे उसके जीवन और भविष्य में हमेशा के लिए बदलाव आएगा. इससे एक अच्छा परिणाम, उद्देश्य प्राप्त होता है. देखा जाये तो उन दुखदायी चंद मिनटो के कारण आने वाला 50-60 साल का जीवन खुशहाल हो जाता है. इसी तरह 50-60 साल की अपंगता, निर्धनता, दुखी जीवन के बदले मिलने वाली स्वर्ग में हमेशा का सुख और अमरता कोई छोटा इनाम नहीं है।
● ईश्वर ने दुनिया में इंसानों के इम्तिहान के लिए दो बुनियाद बनाई है। एक है शुक्र का, यानी जिनको बहुत सी नेमतें दी गयी है, उन्हें शुक्र अदा करते हुए ये टेस्ट देना है। दूसरा है सब्र का, यानी जिनको कम नेमतें दी गई है और उन्हें सब्र करते हुए ज़िंदगी का इम्तिहान देना है. आम तौर पर ईश्वर, इन बुनियादों को बदलता नहीं हैं।
●
इस दुनिया का निर्माण इंसाफ के आधार पर नहीं बल्कि इम्तिहान के आधार पर
किया गया है। तभी तो यंहा अक्सर पापी पाप करके यानी अपनी परीक्षा देकर बिना
कुछ खास सज़ा पाए मर जाते है। हिटलर 80 लाख लोगों को तड़पा तड़पा के मार कर
खुद आत्महत्या करके मार गया। असली और पूर्ण न्याय तो तब होता जब हिटलर को
भी 80 लाख बार तड़पा तड़पा कर मर जाता। ऐसा न्याय इस जगत में संभव नही है।
इसीलिए पूर्ण न्याय के लिए एक अलग जहान और वक़्त मुकर्रर है। भगत सिंह आजादी के लिए जवानी में ही सूली पर लटक गए, मगर उन्हें इसका बदला या सुख इस जीवन में नहीं मिला. उन्हें भी इसका बदला वंही मिलेगा.
यह ज़िन्दगी
अधूरी है. यंहा पूरा इंसाफ नहीं होता है. पुरे इंसाफ के लिए ज़िन्दगी आगे जानी
चाहिए. इंसान की ख्वाहिशात पूरी होनी चाहिए. जैसे कोई जीवन भर अपना करियर बनाने
की तय्यारी करे पर जब तक उसकी मेहनत का परिणाम सामने आता तब तक वो बुढा हो जाता है. एक्शन का रीएक्शन नहीं हुआ. इसीलिए यंहा किये गए नेक कामों परिणाम यंहा नहीं मिले तो कंहीं और मिलने चाहिए. अगर तत्काल सभी
कर्मों के नतीजे मिलने लगते तो कोई जानदार जीवित बच ही नहीं पाता और ये दुनिया भी
नहीं चल पाती.
Results are meaningful only when efforts are made with purposes.
Marshmallow
Experiment or Test by Stanford University in 1972: Class
में बच्चों से कहा गया की इतना देर तक रुकोगे तो उनके लिए एक small
मगर
immediate reward
मिलेगा या दो small rewards मिलेंगे. अगर
वो room में और ज्यादा लंबे टाइम तक
रुकते हैं तो इससे भी बड़ा reward
मिलेगा. कुछ बच्चे कुछ देर रुके,
कुछ ज्यादा देर तक और कुछ बहुत ज़्यादा देर तक. इन सभी को बड़ा होने तक बहुत से index
and parameters के According
judge किया गया. फिर यह पता लगा की जिन्होंने लंबा wait
किया था उन्होंने भविष्य में बहुत कुछ हासिल किया. जबकि कम wait
करने वालों को जीवन में कुछ ख़ास सफलता नहीं मिली. यानी सब्र, इंतज़ार,
करने वालो के कुछ बेहतर हासिल करने के इमकान ज्यादा होते हैं, जो सच्चे-धार्मिक लोग करते हैं.
● रही बात सुख-दुख में किये गए कर्मों के फल की तो जिस तरह बहुत से हायर एग्जाम में पेपर के सेटस, डिफिकल्टी लेवल, डे-शिफ्ट अलग अलग होते हैं। उसके बाद नॉर्मलाइज़शन, इक्वलाइज़ेशन, स्टैण्डरडाईज़ेशन सिद्धांत के अनुसार बच्चों को तैयारी के लिए मिले दिन, डिफिकल्टी लेवल आदि के अनुसार मार्क्स दे कर सबको बराबर का मौका दे दिया जाता है ताकि किसी के साथ अन्याय न हो। इसी तरह खुदा भी हमारे साथ कुछ ऐसा ही नियम प्रयोग करेगा जब सबको उनकी तकलीफों, कठिनाइयों, संघर्ष और अन्य बहुत सी बातों के मद्देनजर समान मार्क्स दिए जांयँगे। इसमे गरीब, मजबूर, अपंग आदि लोग अधिक मार्क्स पायंगे और अमीर कम मार्क्स पाएंगे क्योंकि दोनों के पास समय-हालत-सुविधायें अलग अलग थी, बशर्ते उन्होंने जिनता मुमकिन था, उतना जीवन ईश्वर की आज्ञा अनुसार बिताया हो। सभी की स्तिथि के अनुसार न्याय किया जाएगा क्योंकि ईश्वर से अच्छा इकवालाईज़ेशन कोई कर भी नहीं सकता।
भाग्य अनुसार ही जीवन चलना है तो फ्री विल का क्या फायदा?
● ईश्वर को भविष्य का ज्ञान है, वह जानता हैं कि जीवन में हम कब क्या-क्या करेंगे। ईश्वर ने इसी ज्ञान के आधार पर हमारा मुक़द्दर लिख दिया है कि हम फला फला समय पर फला फला काम करेंगे। इसका अर्थ ये नहीँ है कि हमारी तक़दीर में यह लिखा हुआ है की यह तो होना ही था इसलिए हमनें ये किया है। ईश्वर ने ताक़दीर में अपने ज्ञान के आधार पर चीज़ें रख दी है कि फला मानव अगर ऐसा करेगा तो उसे ये प्राप्त होगा और वैसा करेगा तो उसे वो प्राप्त होगा। ईश्वर जानता है कि समय आने पर कोई क्या करेगा। पर ईश्वर अपने ज्ञान पर किसी का निर्णय नहीं करता अगर करता तो ये दुनिया नही बनाता। पर उसने ये दुनिया बनाई की तुम खुद अपने फैसलो लो और कार्य करो, उन कार्यो के आधार पर तुम्हारे निर्णय होगा हालांकि उसे पता है कौन क्या करता है और क्या करेगा। ये दुनिया का सिस्टम हमारी तसल्ली के लिए है कि हर कर्म हमने स्वयं किया है और इसीलिए उसके कर्मफल के भी हम ही जिम्मेदार है। ये ईश्वर की परीक्षा नहीं है बल्कि मनुष्यों की परीक्षा है, इसलिए उसे उसे परिणाम पता होने के बाद भी परीक्षा चालू है.
● जैसे एक टीचर पढ़ाई न करने वाले बच्चे के बारे में क्लास को पहले ही कह दे यह फैल होगा और वो बच्चा वाकई फैल हो जाये तो वो बच्चा टीचर को दोष नहीं दे सकता कि इन्होंने ही मुझे फैल करवाया है। टीचर ने तो आसार देख कर परिणाम बताया था। इसी तरह ईश्वर को सारे परिणाम पता है। कर्म हम अपनी ईच्छा से ही करते है।
● तक़दीर में सिर्फ कुछ चीज़ें ही फिक्स होती है जैसे जन्म समय, स्थान, काल, परिवार, मृत्यु, शरीरिक बनावट, कुछ कर्मों के परिणाम आदि। बाकी हम स्वयं अपने निर्णयों से निर्धारित करते है। हमारे निर्णय दुसरो के निर्णयों से मिलते और टकराते भी है जिससे परिणाम बदलते है। इसीलिए ईश्वर इन मिश्रण और टकरावों के आधार पर ही हमारे कर्मों के फल देगा और हमारे साथ उचित न्याय करेगा।
बिना पूछे ईश्वर ने हमें कठिन परीक्षा में क्यों डाल दिया?
इस्लाम के मुताबिक, इंसानियत की पैदाइश (अहदे अलस्त) के समय, ईश्वर
ने हम सबसे पूछा था कि क्या हम ये परीक्षा देने को तैयार हैं? ये सवाल हमारे अंतरमनों या
आत्माओं से हुआ था और हम सब ने हां करी थी। इनामों को देखते हुए ये
परीक्षा देने को हम तैयार हुए थे। ऐसे इनाम देख कर हर कोई हां ही कहेगा। पर
हमें यह घटना याद नहीं है। ईश्वे ने इसे भुलावा दिया है. क्योंकि याद होता तो फिर यह जीवन परीक्षा ही नहीं रह
जाती। फ्री विल का इस्तमाल बेजान हो जाता. इसलिए ये घटना हमारे डीएनए में तो है पर याददाश्त में नहीं है। इसीलिए एक
सुप्रीम शक्ति के होने की और अच्छे-बुरे कर्मों के बारे में संकेत हमेशा मन
से आते रहते हैं। बस अंतर इतना है कि हम अक्सर इन्हें नज़रंदाज़ कर अपने
स्वार्थ अनुसार आचरण करते रहते हैं। इसलिए हमारी आज्ञा से ही हमें इस परीक्षा में बिठाया गया है पर ये बात हमें याद
नही है। ये वैसे ही जैसे हमें मां के पेट के 9 महीने और नवजात आयु के शुरू
के चंद साल की बातें याद नहीं होती पर वो ज़ुरूर घटित हुई होती हैं।
खुले दिमाग से सोचे तो एक बात साबित है कि अगर किसी को परलौक के जैसी
सुविधाएं जैसे अनंत जीवन, मनचाही इच्छाओं की पूर्ति, अनगिनत सुख आदि दिखा
कर पूछे कि सिर्फ कुछ साल दुनिया में फलां फलां प्रकार जीवन बीतना पसंद
करोगे तो सभी कह उठेंगे कि हां, तैयार हैं. क्योंकि इतने बड़े इनाम के लिए
इतनी छोटी से क़ीमत या परीक्षा कोई बड़ी बात नहीं। कोई आपके द्वारा एक घूंट
पानी पीलाने के बदले आपको मीठे पानी का बहता हुआ दरिया देने को तैयार हो तो
आप खुशी-खुशी भगाते दौड़ते हुए कुछ भी जतन करके उसे एक घूंट पानी पिलाने को
फौरन तैय्यार हो जाओगे। छोटे से कार्य के बदले इतना बड़ा इनाम कोई दे तो
ये उसका एहसान माना जाएगा।
कियास है कि जिन लोगों
ने अहदे अलस्त के मौके पर इस इम्तिहान के लिए हां नहीं करी थी या असमंजस
दिखाई थी, ये वही लोग हैं जो यंहा शिशु अवस्था में ही मर जाते हैं या फिर मेंटली
रिटायर्ड पैदा होते हैं। इनकी अनिच्छा के बदले ये उपयुर्क्त परीक्षा है. इनका जन्नत में खास- लिमिटेड मक़ाम पहले से
तय है। इनमें से कोई भी नरक नहीं जायेगा। एक मतानुसार अहदे अल्स्त पर ही हमें सारी चॉइस दे दी गयी थी और हमने ही उन्हें चुनने का फैसला लिया, उनके बदले मिलने वाले अजर के मद्देनजर जैसे मुश्किल या आसान हालत की ज़िन्दगी चाहिए, कब-कंहा-कैसे पैदाइश चाहिय ज़िंदगी के दूसरे मयार क्या चाहिए वगैरह.
कोई ये इम्तिहान देने से मना करदे या ख़ुदकुशी करले तो?

दुनिया
में आया हर अक़्ल वाला इंसान इम्तिहान में है। वो भले ही इसे देने से मना
कर दे। वो एग्जाम सेंटर में दाखिल हो चुका है। चाहे तो कुछ लिखे और चाहे न
लिखे। खुदकुशी करना एग्जाम का पर्चा फाड़ कर बाहर चले जाने जैसा है। हर नफ़्स
से अहदे अलस्त के मौके पर इस इम्तिहान में दाखिल होने की हामी ली गई थी।
सभी ने हामी दी थी। क्योंकि इम्तिहान लेवल के सामने जन्नत के नेमतें का
लेवल कई गुना ज़्यादा ऊंचा था। ये हामी हमें वैसे ही याद नहीं है जैसे बचपन
के कुछ साल याद नहीं है। आख़िरत में ये वाकया फिर से प्ले कर दिया जायेगा
ताकि आख़िरत में हमारे पास कोई मामूली सी भी गुंजाइश न बचे, अपनी गलतियों-
कमियों को ढाकने की। कोई वंहा ये कह ही नहीं पाएगा कि उसे दुनिया में खुदा
ने अपनी मर्ज़ी से भेजा था या उससे पूछा नहीं गया था। कोई यंहा खुदा, क़यामत वगैरह को जानने- मानने के बावजूद इम्तिहान
देने से इनकार करता है तो यकीनन ये सब कुछ जान - समझ कर अनजान बनने जैसा
है। उसे इसका आख़िरत में ज़ुरूर पछतावा होगा जब उसकी अहदे अलस्त की हामी को
दिखाया जायेगा बल्कि वंहा उसे उसका पहले से अहसास होगा कि उसने ये किया था।
यक़ीनन जिसने अहदे अलस्त के मौके पर एग्जाम नहीं देना चाहा या अनिच्छा दिखाई, वो एग्जाम के
लिए या तो यंहा है ही नहीं या वैसे नहीं है जैसे बाकी हैं। इसलिए यंहा ऐसे बीच एग्जाम में इनकार करने वाले का भी
वंहा हिसाब होगा और उसके अहद के मुताबिक ही उसका इंसाफ होगा, ज़्यादती ज़रा
भी नहीं होगी। मगर अगर किसी ऐसे शक्स के पास वाकई कोई जायज़ उज़र हुआ जिसके
तहत उसने इस एग्जाम देने को मना कर दिया या इसे बीच में छोड़कर बाहर निकल
गया, तो अल्लाह वाकई उसे देखेगा और उसी के मुतबिक आखिरी फैसला लिया
जायेगा।
ईश्वर भविष्य जानता है तो बिना दुनिया बनाए ही फैसले कर देता?

ईश्वर अपने ज्ञान पर किसी का निर्णय नहीं करता। उसने ये दुनिया बनाई कि ताकि कोई अंतिम दिन खड़ा होक ये न कह दे तो ये तो ईश्वर अपने ज्ञान के आधार पर मेरे नरक का फैसला कर रहा है, मैं तो धरती पर गया ही नहीं था। इसलिए ये दुनिया का सिस्टम दरअसल हमारी अपनी तसल्ली के लिए है
कि हर कर्म हमने स्वयं किया है. ये
जीवन भी हमें इसलिए दिखाया जा रहा है ताकि हम स्वयं अपने साक्ष्य हो जाएं
कि हमने ये कर्म किए है और अपने कर्मो से मुकरने की कोई गुंजाईश न बचे।
ताकि बाद में जब हमारे कर्मों का हिसाब होगा और उन्हें रीप्ले किया जाएगा तो कोई यह न कह सके की मैंने
यह कर्म किए ही नही है।
ईश्वर ने कायनात को एक झटके में क्यों नहीं बनाया, वो भी इतना बड़ा?
अल्लाह ने क़ायनात को एक बार मे
बनाया या कई मरहलों में ये इंसानी समझ की बात है। हमारे लिए 13 बिलयन सालों में ये
बनी। मगर अनादि,
अमर अनन्त ईश्वर के लिए ये अवधि तो क्षण मात्र हैं। इसलिए क़ुरान ने
कहा कि वो कहता है, हो जा और वो हो जाती है (उसके लिए इतनी
मामूली बात है)। रही बात हमारे लिए ये इतने सालों में इसलिए बनी क्योंकी अगर ये क़ायनात अल्लाह
हमें यूँही चुटकियों में बनती हुई दिखा देता तो हमारा इम्तिहान ही नहीं रह जाता,
फ्री चॉइस ही खत्म हो जाती, अल्लाह की स्कीम
ही बिना मायने के हो जाती। क्योंकि फिर तो अल्लाह और हमारे बीच पर्दा ही नहीं रह
जाता। पर्दा है तो इम्तिहान है, इम्तिहान है तो इनाम है। इसलिए ये क़ायनात और इसकी हर शेय के बनने का एक प्रोसेस मौजूद है, जो हमारे लिए है। इसका
बनना तो उन लोगों के लिए भी निशानी है जो क़ायनात को ही खुदा मान बैठे है जबकि वो
कह रही है कि मुझे इतने वक़्त पहले बनाया गया है। ये तरीका हमारी दिमागी तहक़ीक़, वजूद की तसल्ली, जिज्ञासा की पूर्ति के लिए है। यही
उसके रचने की पद्धत्ति है। यही सुन्नतूल्लाह है। यही अल्लाह की हिकमत है।
कायानात इतनी बड़ी क्यों बनायी गयी है? हमारे कियास है कि इन्सान जब इस महान कायनात के निर्माण, फैलाव, सिमटाव निष्पक्ष ढंग से समझने की कोशिश करता है तो ये उसे किसी खालिक या निर्मात की ओर ही लेके जाते हैं. बाकी असल वजह तो बनाने वाला ही जानता है. शायद भविष्य में हम भी विज्ञान के सहारे ये जान पायें. जब हम अपने खालिक से मिलेंगे तो ये सभी राज़ खुल जायंगे.
क्या सृष्टि में कंहीं और भी जीवन है? कुरान ने 7 कायनात (एक कायानात माने जितनी इन्सान ओब्ज़र्व कर सकता है) होने का और हर कायनात में एक मखलूक होने का ईशारा किया है. इससे हमारे इत्मिहान पर कोई फर्क नहीं पड़ता है. बाकी ये सवाल दीन का नहीं बल्कि दुनिया का है. शायद इन्सान इसकी हकीकत जल्दी ही जान पाए. अन्य ग्रहों पर जीवन या एलियन ढूंढना आज एक आम वैज्ञानिक काम है.
इंसानो को ईश्वर की नही, सिर्फ विज्ञान की आवश्यकता है।
विज्ञान धर्म विरुद्ध चीज़ नहीं है बल्कि विज्ञान तो मानवता के लिए बहुत ही कल्याणकरी है। पर विज्ञान स्वयं एक सृष्टि है।
विज्ञान जीवन के हर क्षेत्र में मार्गदर्शन नहीं करता है। विज्ञान मोरल वैल्यू, एथिक्स, सोशल बीहेवीयर के बारे में बात नहीं करता। विज्ञान ये भी नहीं बताता है कि सभी जीवों को स्नेह, प्रेम करना है, उनकी परवाह करनी है, उनकी सहायता करनी है। विज्ञान हमें नहीं बता सकता कि कौन से कार्य है जो मानव और जीवन के लिए फायदेमंद है और कौन से नुकसानदायक। विज्ञान सिर्फ ये बाताता है कि चीज़ें या पदार्थ कैसे है, कब से है, कंहा है आदि आदि और उनसे क्या क्या किया जा सकता है। विज्ञान ये नही बताता की पदार्थ आखिर है क्यों, उनका उद्देश्य क्या है, आखिर वो यंहा है क्यों।
विज्ञान आज तक हमारा या जीवन का उद्देश्य नहीं बता पाया है कि ये सृष्टि आखिर है क्यों। इन सब पक्षो को केवल एक ही अस्तित्व कवर करता है। केवल वही इनकी व्यख्या करता है। और उस अस्तित्व को ही ईश्वर कहते है।
ईश्वर ने मनुष्यों को भिन्न-भिन्न क्यों बनाया?

ईश्वर
ने मनुष्यों को अलग-अलग इसलिए बनाया क्योंकि ये ह्यूमन केटालोगिंग है जैसे
लायब्ररी में अलग अलग किताबें होती हैं. सभी इन्सान एक जैसे होते तो कौन
किसका पति होता और कौन किसकी पत्नी, ये पहचान पाना ही मुश्किल होता
(जानवरों में भी लुक और गंध आदि का अंतर होता है). इंसानो में जानवरों की तरह सूंघने, पहचानने की क्षमता नहीं होती। वैसे भी जब विभिन्न DNA
के आधार पर हम रंग रूप पाते हैं तो भिन्न भिन्न दिखना ही था.
ईश्वर टाइम-स्पेस से पहले कंहा था?

टाइम-स्पेस बिगबैंग से शुरू हुआ. यानी इससे पहले नहीं था. इससे पहले singularity थी जिससे ये शुरू हुआ. टाइम-स्पेस पहले ईश्वर क्या क्या कर रहा था, ये पूछना वैसा ही है जैसे ये पूछना कि singularity टाइम-स्पेस से पहले क्या कर रही थी? तब ईश्वर क्या कर रहा था ये तो वही जानता है.
अगर ईश्वर टाइम-स्पेस में हैं तो बुढा होगा और परे है तो कण्ट्रोल कैसे कर रहा है? ईश्वर स्पेस-टाइम से बाहर है. ईश्वर स्पेस-टाइम के पास है या परे है, हम नहीं जानते, हमारी जानकारी की सीमाएं हैं. मगर वो जंहा भी है, स्पेस-टाइम से बेशक रीलेशन रखता है.
Absolute time belongs to God and Relative time belongs to us. Absolute time means a time that exists on its own, same everywhere, for all, independent of observers or events means it would exist and pass even if nothing were there.
नास्तिक दावा करते हैं कि उन्होंने खुदा को स्पेस में ढूंढा मगर नहीं दिखा?
The observable universe has a radius of about 46 billion light years. We have seen less than 1% of it.
The total universe may be larger or infinite. Earth’s
radius is 6371 km but the deepest humans have ever drilled is 12.3
km which make only 0.2% (Super-deep Borehole, Russia). Over 95% of the deep ocean is unexplored in terms of direct observation. Over 80% of the deepest and densest forests on Earth, such as the Amazon, remain unexplored.
पूरी कायनात तो छोड़ीये, इन्सान ने अभी दुनिया का हर कोना-गहराई तक नहीं देखी है, मगर फिर भी नास्तिक ये दावा करते हैं कि हमने उसे स्पेस में हर जगह ढूंढा मगर हमें वो नहीं दिखा।
Creator, Creation, His Universe, His Scheme क्या है?
सृष्टि में एक order, pattern, arrangement, organization दिखता है. यानि इसक कोई organizer है. वो organiser है इसलिए active, watchful भी होगा. सो वो alive, living entity है. जिंदा की चाह होती है. सो उसने चाहा कि उसे पहचाना जाये। पहचान के लिए उसके गुण, attributes, qualities भी होंगी। क्योंकि गुण ज़ाहिर होते हैं सो उसने चाहा किउसके गुणों को मायने मिले, उसके गुण ज़ाहिर हो। क्योंकि creator अगर Creation ना करे तो creator की सिफ्तें meaningless हो सकती है. रचियता है तो रचना भी होगी. जैसे दया करने वाला है तो दया पाने वाले भी होने चाहिए. इसलिए उसने चाहा, दूसरों का अस्तितिव भी हो. Recognition चाहिए तो Recognzie करने वाली मखलूक भी चाहिए. जैसे राजा है तो प्रजा भी होनी चाहिए. वो सबसे बड़ा है तो बहुत से छोटे भी होंगे. यानि सबसे बड़े ने सभी छोटो को पैदा किया.
उसकी हमीयत तब होगी जब उसकी creation उसे मन से बड़ा माने और बड़ा जाने। इससे बढ़कर मकसद है, उसकी मशियत (रज़ा) जानना और मार्फत (मुकम्मल जानना, पहचानना) पाना। इसके लिए Creation में इसकी सलाहियत होनी चाहिए। इसके लिए intelligence, conscience, free will, free choice चाहिए। क्योंकि असली तारीफ वही है जो मन से निकले. टेप रिकॉर्डर पर रिकॉर्डेड तारीफ चलाना जबरदस्ती करी गयी तारीफ होती है.
उसने बना के छोड़ दिया तो बनने वाले recognize नहीं करेंगे. सो दोनों में Link होना चाहिए. ऐसा राबता जिसमें पर्देदारी भी हो. पर्देदारी होगी इम्तिहान होगा. इम्तिहान में एक्ज़ामिनर का सेट किया पेपर होगा और उसी के रूल्स होंगे. कुछ अपवाद छोडके हर क्षेत्र में choice मिली. जब मर्जी, इख्तियार, इरादा है तो फिर अच्छाई-बुराई दोनों अस्तित्व में आएँगी. choice है तो फिर test भी होगा. टेस्ट है तो . अच्छाई-बुराई है तो Injustice होगा. Injustice है तो अदालत भी होगी और compensation भी होगा. Test के लिए venue, examination Hall, material, stationery etc सब होना चाहिए। Test के लिए syllabus, books, Teacher भी चाहिए. Syllabus बता दिया जाता है या गया है. Guidance, inspiration के लिए role model भी चाहिए होते है. Test में मुश्किल, आसान सभी तरह के सवाल होते है. किसी को कुछ आसान लगता है, किसी को कुछ. Test के लिए marks हैं, passing marks भी हैं और grace marks. होनहार बच्चा 100% marks भी लाता है. Pass होने के बाद next class में जाते हैं और fail होने पर तो वही सड़ते हैं.
Creation Product होता है तो उसका quality control test भी होता है. Quality test में pass होता है तो वंहा भेज दिया जात है जिस मकसद के लिए बनाया गया था। Product Fail हो जाये तो recycle कर दिया जाता है, scrap में फेंक दिया जाता है या आग की भट्टी में गला दिया जाता है।
मेहमान नवाज़ी कैसी हो ये host और guest कैसे है इस पर निर्भर करता है। कुछ को कुछ गली से विदा कर दिया जाता है, कुछ को घर में बिठाया जाता है, कुछ को घर में ठहराया जाता है, मेजबान और उसका घर शानदार हो तो सारी सुख-सुविधाएँ उसे दी जाती है.
स्कूल टेस्ट में कोई असमानता नहीं होती फिर इस टेस्ट में क्यों?
जीवन परीक्षा है इसलिए यंहा असामानता बनायीं गयी ताकि परीक्षा हो पाए. अगर सभी एक जैसे या बराबर होते तो कोई परीक्षा हो ही नहीं पाती. सब pass होते जाते या fail. असमानता बनाते ही परीक्षा शुरू हो गयी है. असमानता से ही परीक्षा है. किसी स्कूल में बच्चों के साथ असमानता इसलिए नहीं करी जाती या परीक्षा इसलिए नहीं ली जाती क्योंकि बच्चे पहले से ही असमानता से ग्रसित हैं. कुछ गरीब हैं, कुछ नासमझ, कुछ पढने में कमज़ोर. इसलिए इन सबको पहले बराबर शिक्षा और समान परीक्षा पर्चा दिया जाता है ताकि उनकी तरफ से कोई असमानता न हो और बच्चे सामान अवसर पा कर अपनी पूर्व असमानताओं से आगे बढ़ सके. वैसे ढंग से देखो तो जुड़वाँ बच्चों तक में असमानता पायी जाती है. बाकी बहुत से exam के बाद equalization भी होता है. Exams evaluation के लिए होते हैं, harassment के लिए नहीं. Syllabus और guidance इसे pass करने के लिए ज़रूरी है.
ईश्वर के कानून ही क्यों? दुनिया में इन्सान की मर्ज़ी जो मर्ज़ी कानून बनाए?
कानून पहले राजा बनाते थे, आज भी नेतागण बनाते हैं. खुद को बहुत सी छूट देते हैं जबकि बाकियों को निचोड़ देते हैं. इसलिए इनके ऊपर भी कोई लॉ बनाने और लागू करने वाला होना चाहिए. ये काम ईश्वर ने करके दे रखा है. Basic code of conduct (objective morality) दे रखा है. इनके ऊपर, बाकी इन्सान जैसे चाहे कानून बनायें, ईश्वर ने नहीं रोका.
Law and order न हो तो गुंडाराज होगा. जबकि अभी तो सिर्फ यही शिकायत है कि police मनमानी करती, क़ानून, police, court, jail वगैरह न हो तो हर गुंडा राज कर रहा होता. सरकार Law and order न संभाले तो anarchy होगी. इसी लिए धार्मिक कानून होते हैं.
अधिकतर आस्तिक धर्म के कारण ही उतने
बुरे कार्य नहीं करते जितने वो धर्म रहित होने पर कर सकते थे. आस्तिकों के कारण ही
दुनिया भली है, जितनी भी है। धर्म न होता तो लगभग सभी स्वार्थ में पागले हुए होते.
ईश्वर क्यों लोगों को नरक डालना चाहता है?
कानून हमारे फायदे के लिए होते हैं, अगर कोई तोड़े, तो उसे सजा मिलनी लाज़मी है. एक natural process of justice होता है. जब क़ानून निर्मित होता है तो पहले उसका क्रियान्वन होता है फिर मुक़द्दमा चलता है और फिर दंड मिलता है.
4 stages of Justice: Making Law – Implementation – Judgement – Execution.
Guidance
उतनी ही ज़रूरी है जितना jungle
में signboards कि उधर मत जाओ,
उधर हाथी हैं. तुम पहले यह नहीं जानते थे,
मगर अब जान गए हो इसलिए अब भी उधर गए तो तो यह तुम्हारी गलती होगी और इसका
खामियाज़ाना भी भुगतना होगा. सो लोग ही जहन्नुम में जा रहे हो,
वो तुम्हे नहीं भेज रहा.
नास्तिकों को ईश्वर इतना दंड क्यों देगा?
आप जो मर्ज़ी
खाएं, आपकी मर्ज़ी मगर result
system के मुताबिक़ ही मिलेंगे,
चाहे जहर हो या दवाई. सबको पता हिया कि सिगरेट पीओगे तो फेंफडे ख़राब हो जायंगे और शराब पीओगे तो लीवर. इन्सान कोई भी कार्य करे, उनके result pre-fixed system के हिसाब ही मिलते हैं.
जन्नत में क्या कोई खुदा भी बन सकता है?
हमारा
evolution आगे की ओर होना है,
न कि वापिस singularity की ओर. कोई भी ख्वाइश करने पर खुदा नहीं बन सकता क्योंकि
इसके बदले किया जाने वाला कोई भी अमल इस दर्जे का इस दुनिया में है ही नहीं और न
हो सकता है. जैसे जन्नत के दर्जात है,
निचले वाला ऊँचे में जाने की ख्वाहिश नहीं कर सकता क्योंकि उसके अमल उस लायक नहीं
है. जो खुदा बनने का अहल हो सकता है वही तो खुदा बन सकता है. इस कायनात में ऐसा कोई potential है ही नहीं जो खुदा के दर्जे तक ले जाए. इसके अलावा वंहा ऐसी ख्वाहिश ही
पैदा नहीं होगी क्योंकि तुम खुद वंहा अल्लाह की अजमत देखोगे तो यह ख्वाहिश ही
बेवकूफी नज़र आएगी.
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असल
में हम में इतनी क्षमता ही नहीं है की हम ईश्वर को पूर्णतया जान सके
इसीलिए हम उसको उसी कि दी गयी परिभाषा से अधिक पहचानते है। वैसे भी स्वयं
के द्वारा दी गयी सच्ची परिभाषा ही सबसे शुद्ध होती है।
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