Thursday, 11 June 2020

नास्तिक बनाम आस्तिक - भाग 3 (नास्तिकों से प्रश्न और तर्क)

मानव ने ब्रह्माण्ड, धरती के गर्भ, समुद्र की गहराई को पूरी तरह नहीं जाना है और सृष्टा के अस्तित्व के इनकार के दावे करने शुरू कर दिए है। जबकि विज्ञान और सृष्टि साफ इशारा करती जा रही हैं कि ये सृष्टि निर्मित हुई है और ये निर्मित है इसलिए इसका कोई निर्माता भी होगा।


[परिवेश का अवलोकन]


 Creation Ex Nihilo v/s Ex Nihilo Nihil Fit
 
 
 
 
दर्शन के Creation Ex Nihilo (Creation out of nothing) सिद्धांत से सामने विज्ञान तो Ex Nihilo Nihil Fit (Nothing comes from nothing) सिद्धांत पेश करता है। सबसे मज़बूत और प्रचलित वैज्ञानिक थ्योरी के अनुसार बिगबैंग से ब्रह्माण्ड बनना और फैलना शुरू हुआ। लगभग 13.8 बिलियन वर्ष पूर्व एक हॉट एंड डेन्स पॉइंट था, ब्लैक होल जैसा, जिसे सिंगुलैरिटी कहते है जो एटम से भी बहुत छोटा था (Singularity is a point of zero volume but very high mass which makes the density infinite. Singularity exists mathematically but physical laws do not apply to it and hence cannot describe what actually happens there). Singularity एक beginning थी यानि ये open-circle है. उसमे विस्तार/धमाका हुआ और एनर्जी बनी जिससे छोटे छोटे पार्टिकल बने जो क्वार्क, ग्लूऑन हैड्रन, लेप्टन बनते गए जिनसे फिर आगे प्रोटोन, इलेक्ट्रान और न्यूट्रॉन बने। इससे पहला एलीमेंट- हाइड्रोजन बना और फिर हीलियम। फिर लगभग 3.8 बिलियन वर्ष पूर्व जीवन का उत्पत्ति हुई। 
 
 
इससे कुछ सवाल पैदा होते हैं, जिनके जवाब वैज्ञानिकों के पास अभी नहीं है:-

1. बिगबैंग से पहले क्या था कोई प्रमाणिक रूप से नहीं जानता (ना नास्तिक, ना आस्तिक). विज्ञान कहता है कि An external force changes one's state, तो जिस कण में बिग बैंग हुआ वह कण या सिंगुलैरिटी कंहा से, कैसे, क्यों आई और कौन लाया? धमाका तो तबाही लाता है मगर बिगबैंग निर्माण कैसा लाया? विज्ञान कहता है कि Energy can not be created but can only be transformed, तो ब्रह्माण्ड बनाने के लिए ज़रूरी Dark Energy and Dark matter कंहा से आया?

2. विज्ञान कहता है कि A living thing can't be created out of non living thing, तो निर्जीव में जीवन कैसे और क्यों पैदा हो गया। विज्ञान अनुसार Nothing comes from nothing, तो living cell or a protein molecule का निर्माण कैसे हुआ? Consciousness, wisdom, conscience, reasoning, creativity, cognition, aesthetics जैसे advanced गुण (even alphabet, counting) कैसे पैदा हुए?

3. मानव के समान्तर कोई अन्य जीव क्यों नहीं बन पाया? शरीर के अंग (spl. cell, DNA, eye) अब तक की सबसे काम्प्लेक्स मशीनें है, ये डिज़ाइनस क्या रैंडमली बन गए? शरीर में दुबारा आत्मा वापिस क्यों नहीं आ पाती है?

4. इस सृष्टि में अनेकों चीज़ें इतनी परफेक्ट है की बनते हुए अगर उनमें 1℅ का भी वैरिएशन आ जाता तो ये सृष्टि, जीवन होते ही नहीं। ऐसा परफेक्ट कार्य बार-बार अपने आप कैसे हो सकता है?  किसी अन्य ग्रह पर जीवन क्यों नहीं पैदा हो पाया? धरती पर जीवन के लिए हर ज़ुरूरत की चीज़ क्रमानुसार परफेक्टली कैसे होती गई?
 

■ Universe/Energy can't be the Creator


Universe बारे में दो मुख्य दृष्टिकोण हैं, पहला कि Universe का कोई Creator है और दूसरा कि Universe खुद ही Creator है। Universe की fundamental property - Energy है जो matter, light, heat जैसी forms में दिखाई देती है। ये forms आपस में बदल सकते हैं। Energy को बनाया या नष्ट नहीं किया जा सकता सिर्फ बदला जा सकता है। मतलब वैज्ञानिकों को Energy की पैदाइश का तरीका नहीं मिला है। मगर विज्ञान बताता है कि Universe जो Energy से बना हुआ है, उसकी भी एक पैदाइश थी। हालांकि Energy ना तो self-conscious है और ना ही self-sufficient.  Energy को काफी हद तक इंसान control और convert कर सकते हैं। इंसान Energy के अलग-अलग forms को बदल पाते हैं क्योंकि इसके पीछे इंसानी mind, intellect, consciousness है। इसलिए सवाल उठता है कि Energy से बने Universe के पीछे intellect, consciousness कहाँ है? अगर आज तक ऐसे mind की पहचान नहीं हो पाई है तो इसका मतलब है कि विज्ञान सिर्फ laws of nature की खोज कर रहा है, न कि laws of nature के ultimate origin को समझा रहा है। जैसे कोई गाड़ी बिना ड्राइवर के चल रही है तो  साइंस सिर्फ यही पता लगा रही है कि यह गाड़ी किन कानून पर चल रही है, न कि इसके पीछे के दिमाग को। ऐसे ही यूनिवरस के कानून जानने की कोशिश हो रही है, न की उनके पीछे वाले दिमाग को।
 
Energy खुद Creator होती तो इंसान के इख्तियार में नहीं आ जाती। इंसान आज Energy को बड़ी हद तक अपने हिसाब से चला रहा है। वक़्त और तरक्की के साथ साथ इंसान का Energy पर इख़्तिहार बढ़ता जा रहा है। इसलिए Energy खुद एक Creation है, ultimate Creator नहीं। विज्ञान ऐसा कोई कारण नहीं ढूंढ पाया जिसने Energy को बनाया हो। इसलिए जब Energy को बनाया ही नहीं गया तो हम ये कैसे मान सकते हैं कि यूनिवर्स ने अपने आप खुद को बनाया है। पर जैसे ही हम कहते हैं कि God cannot be created, नास्तिक इसका इनकार कर देते हैं पर Energy को अनादि से मान लेते हैं।
 
Energy cannot be created, वैज्ञानिकों को ये मानने में इतना समय लग गया। हो सकता है आगे भविष्य में इसके कुछ अपवाद भी साबित हो जाये। जैसे ब्लैक मैटर और ब्लैक एनर्जी शुरआत में कंहा से आए इस पर आज भी कुछ नहीं कहा जा सकता। 

■ Vastness of universe 
 
 
 
■ The human body—God's masterpiece


Human body make is so advance and so complex. 
   


■ Design Argument

 
 
 
 

Intelligent Design: कोई सड़क पर जा रहा हो और उसे एक सिक्कों की ऊंची ढहरी रखी हुई दिखती है। आगे फिर, एक के ऊपर रखे हुए सिक्कों को ढहरी दिखाई देती है। और ऐसे ही आगे भी ढहरी बनी हुई मिलती जाती है। ये साफ पता लग जाता है कि ये सिक्के गिरने के बाद अपने आप ढहरी नहीं बने है, बल्कि किसी ने बनाई है। क्योंकि इनमें एक व्यवस्था, मैनजमेंट, आर्डर दिखता है। इसी तरह इस सृष्टि, पृथ्वी, प्रकृति और जीवन के निर्माण में भी एक डिज़ाइन, व्यवस्था, मैनजमेंट, आर्डर दिखाई देता है। इसे ही वैज्ञानिक इनटेलीजेन्ट डिज़ाइन कहते है। शक़्कर के डिब्बे से गिरकर शक्कर के दाने, एक के ऊपर एक खड़े हो जाए तो वो भी इतना विचित्र नहीं है, जितना विचित्र ये मानना है कि ये असीमित ब्रह्माण्ड अपने आप बन गया। इसलिये, वैज्ञानिक अब यह कहने लग गए कि यह ब्रह्माण्ड एक इंटेलिजेंट डिज़ाइन है।
 
 

एनामोरफ़ोसिस: ये एक आर्ट है जिसमे आर्टिस्ट, बेकार समान को इस तरह प्लेस करता है कि वो कूड़ा कबाड़ा रखा हुआ लगता है पर जैसे ही दर्शक एक विशेष स्थान पर खड़ा होता है वो समान एक खूबसूरत आर्टिस्टिक पीस बना हुआ दिखाई दे जाता है। यही हाल इस सृष्टि का जो ऊपरी सतह पर अपने आप बनी दिखाई देती है पर जैसे ही इसकी बनावट और गहराई में झांकते है, पता लग जाता है कि ये प्रीडिटरमींड रिजल्ट के तहत बनी हुई है। तो फिर कोई इसका आर्टिस्ट भी ज़रूर होगा.
 
 
 
 
DNA:  मान लो आपके पास एक ज़बरदस्त बुक है जिसमें बाइक और उसके पार्ट्स को बनाना और रिपेयर करना सीखाया गया है। इस इंस्ट्रक्टशन मैनुअल में रंग बिरंगी टेक्स्ट है, फ़ोटो है, पेज नंबर है, इंडेक्स है और डिटेल में सारी इनफार्मेशन है। क्या कोई ये कह सकता है कि यह मैन्युअल अपने आप बनी हुई है या ज़ीरो से अस्तित्व में आई है यानी किसी ने इसको नहीं बनाया है। या ये सब by an accident हुआ है। या इस बुक में प्रिंटेड चीज़ आसमान से गिरी और एक बुक में इकट्ठा होती चली गयी। नहीं, बल्कि सभी कहँगे की किसी इंटेलिजेंट ने इसको डिज़ाइन किया है।

उसी तरह हर जीवित प्राणी, इंसान, जानवर, पक्षी, कीड़े, मछली, पेड़, फूल आदि सब की व्यक्तिगत इंस्ट्रक्शन मैन्युअल, DNA है। डीएनए हमारा बायोलॉजिकल कोड है, इसमे जीवन की सारे निर्देश होते है। जो हमारे जीन्स हमारे सेल्स को बताते है की हमारी आँखें, नाक, कान, स्किन, रंग, बाल, नाखून, लंबाई, ऑर्गन्स कैसे, किस रंग के, किस आकार के बनेंगे। हर पार्ट्स बनने से पहले डीएनए से इंस्ट्रक्शन लेता है। ये हमारी इंस्ट्रक्शन बुक है।
 
र जीव का अपना एक अलग डीएनए होता है। ऐसी ज़बरदस्त क्षमता वाला डिज़ाइन अपने आप निर्मित हो गया? क्या डीएनए भी अपने आप सृष्टि में बनना शूरू हो गया? क्या कोई हादसा ऐसा परफेक्ट मॉडल बना सकता है? क्या इसे किसी ने डिज़ाइन नहीं किया? एक छोटे सा कंप्यूटर सॉफ्टवेयर तक अपने आप नहीं बनता जिसकी इनफार्मेशन स्टोरेज का डीएनए से कोई मुकाबला ही नहीं है। 

Basically, DNA is the molecule that is the hereditary material in living cells. Genes are made of DNA. Chromosomes contain genes. Genome is divided into chromosomes. So Genome is made of a chemical called DNA. Your genome is all 3.2 billion letters of your DNA. Human DNA is approximately 2 inches.

  

 
 
 
Golden Ratio: दुनिया में हर कारीगर के काम करने का एक तरीका होता है जो उसके काम या उसकी बनाई गई हर चीज़ में दिखाई देता है, जिसे पारखी नज़र वाला पहचान लेता है। जैसे कि फर्नीचर, पेंटिंग, संगीत आदि। उसी तरह इस सृष्टि में बनी प्रत्येक चीज़ में एक खास छाप दिखाई देती है। जो कि असल में एक मैथमेटिकल कोड है। इसे परफेक्ट रेक्टेंगल या गोल्डन रेक्टेंगल या गोल्डन रेश्यो कहते है। इसमे वस्तु एक विशेष क्रम से बढ़ती है जो है 1, 1, 2, 3, 5 , 8, 13, 21, 34....आगे भी ऐसे ही जारी रहती है ( पिछले 2 नंबर जोड़ने पर अगला नंबर बनता है)। इसकी रेशियो बैठती है 1.618 जिसे गोल्डन मीन भी कहते है। Fibonacci नामक मथेमैटिशन के द्वारा सामने लाने के कारण इसे Fibonacci Sequence or Number भी कहते है। हालांकि उससे पहले भी इसका ज्ञान बहुत सी सभ्यताओं में था।

ये क्रम दिखने में एक स्नैल या घोंघे की तरह बढ़ता हुआ दिखाई देता है। इस डिज़ाइन या क्रम को आप देख सकते है अपने फिंगरप्रिंट में, कानों में, फूलों में, लहरों में, चक्रवातों में, भ्रूण में, गैलेक्सी में, डीएनए में, हमारे शरीर के हर भाग में और सभी चीजों में। यंहा तक कि हमारी बनाई लगभग हर वस्तु में भी जाने अनजाने यही रेशयो निकल कर आती है। प्राचीन काल के पायी गई या बनाई गई हर वस्तु में भी ये क्रम पाया जाता है। मोटे तौर पर हम इसे प्रकृति का ही कोड कह सकते है। पर सवाल वही आता है कि सृष्टि में, प्रकृति में यह किसकी छाप है? कौन इसका आर्टिस्ट है?
 
 
■ Physical Phenomena of Nature

देखा जाए तो सृष्टि में हर चीज़ अपनी अस्तित्व में एक असाधारण क्षमता लिए है और किसी चमत्कार से कम नहीं। पर हमें ऐसे फिज़िकल फेनोमेना ऑफ नेचर देखने के आदि हो चुके हैं। इसलिए हमें वो सामान्य सी लगती है। एक छोटा सा बीज, अपने शरीर से लाखों गुना बड़ा पेड़ बन जाता है। जिसे न पता हो कि एक बीज से इतना बड़ा पेड़ निकलता है, वो विश्वास नहीँ करेगा। जिसने कभी मुर्गी न देखी हो अगर उसे कहे कि इस अंडे से ये मुर्गी निकली है, वह विश्वास नहीं करेगा। ऐसे ही एक कण से सम्पूर्ण ब्रह्मांड बनना, भारी भरकम ग्रहों का घूमना, एक बूंद से भ्रूण बनना, मां के पेट मे बच्चा बनने की विभिन्न स्टेज, बिना सिखाए पशु पक्षियों का सरवाइवल सीखना, पानी का बादल बनके बरसना, पत्थर से आग निकलना जैसी दिन रात हो रही लाखों चीज़ें हमारा ध्यान आकर्षण नही करती पर अगर ध्यान से देखें तो वो किसी चमत्कार से कम नहीं।


[चित्त का अवलोकन]
 
 
 
 
■ इंसानी शरीर एक बायोलोजिकल मशीन की तरह फंक्शन करता है. जैसे पार्ट्स में खराबी के कारण एक मशीन में डिफेक्ट आ जाता है वैसे ही इंसानी शरीर में ब्लड क्लोटिंग या हार्ट फैल के कारण डिफेक्ट आ जाता है. जैसे पार्ट्स रिपेयर या रिप्लेसमेंट के बाद मशीनों को रिपेयर करा जा सकता है, वैसे ही वीन्स से ब्लड क्लॉट निकालके या फैल हुए र्हार्ट को ट्रांसप्लांट करके शरीर को वापिस ठीक क्यों नहीं किया जा सकता?  या जैसे बिजली (एनर्जी) कट होने पर मशीन बंद हो जाती है, वैसे ही एनर्जी वापिस आने पर शरीर भी चालू होना चाहिए था? असल में शरीर से मूल शक्ति यानि आत्मा (चेतना) निकल चूकी है और वो अब वापिस नहीं आ सकती. विज्ञान आत्मा को नहीं मानता है और उसके अनुसार ये आत्मा नहीं बल्कि ऊर्जा है. कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा कहते हैं. पहले ऊर्जा शब्द या कांसेप्ट नहीं था तो उर्जा को ही आत्मा कहते थे.  इसी उर्जा या शक्ति से ही शरीर चलता है. जब ऊर्जा (एनर्जी) है तो परम ऊर्जा (सुप्रीम एनर्जी) भी होगी. जैसे बिजली का मुख्य उत्पादक स्रोत, जेनरेटर या ट्रांसफारमर होता है. ऊर्जा आत्मा है तो परम ऊर्जा या सुप्रीम एनर्जी परम आत्मा है यानी परमात्मा

उर्जा को न पैदा और न समाप्त किया जा सकता है, बस रूपांतरित किया जा सकता.  यानि ऊर्जा या आत्मा, शरीर से निकल कर कंही न कंहीं तो रहेगी. इस यूनिवर्स में रहेगी तो कभी mass में  भी बदलेगी जो कि साइंटिफिक लॉ है E=MC2(Square). इसलिए ऊर्जा कभी समाप्त नहीं होगी और कभी मैटर की फॉर्म भी लेगी. यही परलोक में पुनर्जन्म है. इस ब्रह्माण्ड में दूसरी जगह भी जीवन हो सकता है, विज्ञान ढूँढने में लगा है.  यही जीवन ही परलोक (स्वर्ग व नरक) है. 
 
 

■ जब बच्चा मां के पेट में होता है तो ये नहीं जानता कि उसकी कोई मां (जैसे ईश्वर) है या मां के पेट के बाहर भी कोई इतनी बड़ी दुनिया और ब्रह्माण्ड हैं (जैसे स्वर्ग-नरक) या इस कोख के जीवन के बाद भी जीवन (जैसे पारलोकिक जीवन) है। वो मां (जैसे ईश्वर) को देख भी नहीं पाता। पर पैदा होने के बाद धीरे धीरे सब समझ जाता है की बाहर भी एक मां है, एक दुनिया है, एक जीवन है। यही स्तिथि नास्तिकों की होती है, ईश्वर, परलोक और मरने के बाद वाले जीवन को लेकर जिसे वो अभी नहीं जान पा रहे है।

जिस तरह बच्चे को गर्भ में समझ तो नही होती पर चेतना होती है। उसके चारो तरफ़ पेट में हो रही गतिविधियाँ, बाहर घर में हो रही चहल पहल, मां के द्वारा किया जा रहे कार्य और यंहा तक कि मां की मानसिक स्तिथि तक का एहसास बच्चे के शरीर को होता रहता है और बच्चा प्रतिक्रिया भी देता रहता है। उसी तरह आस्तिक भी ये महसूस और अनुभव कर लेता है कि जो भी दुनिया व सृष्टि में चालू गतिवीधियाँ, प्रकृति के द्वारा किया जा रहे कार्य, मानव मस्तिष्क व मन में बसे आस्तिकता के दृष्टिकोण और झुकाव के पीछे भी कोई न कोई सर्वोच्चय शक्ति मौजूद है। और इसीलिए वो इसके अनुसार प्रतिक्रिया देते हुए आस्तिकवादी व्यवहार करता है।
 
 
 

 इंसान न तो अपनी मर्ज़ी से पैदा होता है और न ही अपनी मर्ज़ी से मरता है। इस नियम के अनुसार, अवश्य ही हमारे जीवन में भी मर्ज़ी किसी और की चलनी चाहिए थी। और असल में अक्सर जीवन हमारे अनुसार चलता भी नहीं है। क्योंकि हर काम हमारे हिसाब से नहीं हो पाते है। मेहनत हुमरे हाथ में होती मगर परिणाम नहीं. हमारे जीवन पर ही हमारा 'पूर्ण अधिकार' न चलना, इस बात का प्रमाण है कि इसे चलाने वाला कोई और है।
 

 बहुत बार हमारे काम अटके होते जिनकी उम्मीद नहीं होती और वो अचानक बन जाते है। पता नहीं कैसे। कई बार डर लगता है की फलाना चीज़ हो गयी तो सारा काम बिगड़ जाएगा जिसे आप रोक नहीं सकते। और फिर एक दिन वह चीज़, न जाने कैसे, होते होते रह जाती है। कैसे? इस तरह की घटनाएं बताती हैं कि कोई तो है जो से सब कर रहा है। खतरे में पड़ने पर मन अपने आप कह उठता है, बचा ले।

एक सच्ची घटना है। एक ऑस्ट्रेलियन की गाड़ी से सामने से आता ट्रक टकराने वाला था। उसने मौत देख कर आंख बंद कर ली और पता नहीं कैसे ट्रक उससे टकराने से बच गया। एक बार उसी आदमी को एटीएम में एक लुटेरा लूटने आया और उस पर बार-बार ट्रिगर दबाया पर गोली नहीं चल पायी। 2 बार मौत से बचने पर उसको समझ आया कि कोई तो है जिसने उसको बचाया है। ये सब बातें किसी सर्वोच्चय शक्ति की तरफ ही इशारा करती है।

अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रिया में 2 हज़ार लोगों पर रिसर्च हुई थी जिन्हें हार्ट अटैक हुआ था। ये चार साल चली थी और 2014 में पब्लिश हुई थी। इसमे बताया गया था की दिमाग के काम करना बंद करने के बाद भी इंसान मरता नहीं है और चेतना बनी रह सकती है। ज़िंदा बचे 40% मरीजों ने बताया  कि दुबारा दिल के काम शुरू करने से पहले उन्होंने चेतना महसूस की। एक व्यक्ति ने तो यह तक महसूस किया कि वह खुद गेट पर खड़े होकर अपने आप को दुबारा ज़िंदा होते हुए देख रहा था।

 प्रकृति में भी बहुत से संदेश छुपे है। जैसे जानवरो के लिए उनका गडरिया कुछ रास्ते चुनता है जिन पर चलकर जानवर चरागाहों से वापिस बाड़े में आ जाते है वर्ना बाहर खो जाते है। उसी तरह इंसानों के लिए भी उसके पालनहार है कुछ रास्ते चुने है जिसपर चलकर वो मंज़िल तक पहुंच जाता है वर्ना भटक जाता है। प्रकृति ने भी जानवरो के लिए एक सिस्टम बनाया है जिसे तोड़ कर जीने का उनको कंटोल नहीं दिया गया है इसीलिए वो आज भी फायदे में है। इंसानों के लिए भी एक सिस्टम बनाया गया है जिसे तोड़ने न तोड़ने का कंट्रोल उन्हें दिया गया है और जिसे तोड़ कर वो अक्सर घाटा उठाता है।
 
 
 
 [नास्तिकों की मनोदशा और अंतिम स्तिथि]
 

  Suicide rate of atheist: आज बहुत सी रिसर्च सामने आ चुकी है जिनमे ये देखा गया है कि नास्तिक डिप्रेशन, एंग्जाइटी आदि बीमारी से ज़्यादा ग्रस्त होते है और अतिंम समय में अधिक निराशावादी हो जाते है। यंहा तक कि आत्महत्या और सेल्फ हार्म जैसी चीज़े भी अधिक करते है। आस्तिकों में इन लक्षणों के कम होने का कारण उनका सेंस ऑफ परपज़ और मरके जिंदा होने की आशा बताई गई है। आशावादी, निराशावादी, सकरात्मक और नकारात्मक विचारों का शरीर और जीवन पर प्रभाव बहुत गहरा पड़ता है। ये सभी नफ़्स के क़वानीन है।
 
 
 
 William James' Pragmatic argument: बहुत से दार्शनिकों, मनोवैज्ञानिकों, वैज्ञानिकों द्वारा ईश्वर-धर्म में आस्था का मानव पर सकारत्मक प्रभाव सिद्ध किया गया है. आस्तिकों में आशावाद, सहनशीलता, नियंत्रण अधिक और हीनभावना, अतिभावुकता कम हो सकती है. ऐसे अनेकों  लक्ष्ण हैं. वजह वही है उनके पास एक उद्देश्य है और एक शक्ति साथ होने का अहसास. 
 
 
 
 Pascal's Wager philosophical argument (claimed to be Quranic/Islamic): अगर ईश्वर नहीं हैं तो नास्तिक और आस्तिक दोनों बराबर हो जायंगे, किसी को वंहा कोई फायदा-घाटा नहीं होगा मगर फिर भी इस ज़िंदगी में आस्तिक को और भी कई फायदे होते हैं जैसे नैतिक अनुशासन, मन की शांति, उम्मीद और मकसद, सामाजिक और नैतिक स्थिरता आदि पर अगर ईश्वर है, तो आस्तिक को तो मरने के बाद हमेशा का इनाम-संतुष्टि मिल जाएगी पर नास्तिक का वही हाल होगा जो वो सुनते आया है, तब उसके पछताने के अलावा कोई रास्ता नहीं होगा मगर मगर तब तक बहुत देर हो चूकी होगी। यानि हर हाल में आस्तिक ही फायदे में है। 
 
 
 

[नास्तिकों के दैनिक जीवन में दिखाई देता दोहरापन]

 
● नास्तिक आत्मा में विश्वास रखते हैं, जबकि विज्ञान नहीं करता 
 
● नास्तिक भी शादी, अर्थी, जन्म संबंधित अनेकों संस्कारों और कर्मकांडों का अनुसरण करते हैं।

● नास्तिक बहुत से त्योहार, परम्पराएं, रीति रिवाज़ भी मनाते दिख जाते हैं। तफरी के लिए धार्मिक स्थल जाते हुए दिख जाते है। जेनऊ, टिका, चोटी आदि रखे हुए भी दिख जाते हैं।

● नास्तिकों में भी जाती संबधी गर्व दिख जाता है। जाती एक विशेष धर्म का हिस्सा है और उसी से जात-पात निकली हैं। ये भी अपने नामों के पीछे अपनी जाती का नाम लगाते है।

● नास्तिक भी तथाकथित गौत्र सिस्टम को मानते है और गौत्र में शादी नहीं करते। अगर धर्म जैसी चीज़ नहीं है तो इसके दिए (जाति) गौत्र में विवाह निषेध का नियम नास्तिक क्यों मानते है जैसे नो फर्स्ट कज़िन मैरिज आदि।

● नास्तिक धर्म को नहीं मानते पर धर्म ने ही सबसे पहली बार बहन-भाई और अन्य रिश्तों को पवित्र घोषित कर उनकी आपस में शादी निषेध करी थी। तो इन विवाह के वर्जित नियमों या रिश्तों को नास्तिक क्यों मानते हैं? कहना नहीं चाहिए पर क्यों इन रिश्तों को पवित्र मान कर इनमें शादी नहीं करते। 
 
● किसी के मरने पर नास्तिक भी मृतक के लिए Rest in Peace कहते हैं। पर मरने के बाद जंहा शांति है या जो शांति देगा, उन को तो नास्तिक मानते नहीं है।
  

[आस्तिकता और नास्तिकता में निकटता]

◆ नास्तिकता अगर मानवता की शिक्षा देती है तो यही शिक्षा ईश्वर-धर्म भी देता है। जो इंसानियत की शिक्षा न दे वो ईश्वर-धर्म नहीं हैं। नास्तिक यही मानते है कि अच्छी शिक्षाओं का स्रोत ज़मीर है और इंसानियत ही इंसानों का कल्याण कर सकती है। आस्तिकों का भी यही विचार है। इंसानियत और ईश्वरवाद एक ही सिक्के के दो पहलू है। ईश्वर की सच्ची शिक्षाएं ही इंसानों का कल्याण कर सकती है जिसमें इंसानियत खुद सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा है। नास्तिक और आस्तिक दोनों, अगर मानवता के हिमायती होंगे तभी स्वीकार्य हैं।

◆ अगर कोई नास्तिक गलत काम करे तो दोष नास्तिकतावाद को नहीँ दिया जा सकता क्योंकि नास्तिकता किसी का अहित करने को नहीं कहती। कोई आस्तिक गलत काम करे तो ये उसकी गलती होगी, धर्म की नहीं क्योंकि सच्चा धर्म भी कभी गलत आदेश नहीं देता। धर्म आदेशों में लोग हमेशा से मिलावट करते आए हैं और मिलावट को आसानी से पहचान जा सकता है। जैसे साम्यवादी लीडर जैसे माओ, लेनिन, स्टालिन ने द्वारा लाखों लोगों की हत्या का दोष नास्तिकतावाद को नही दिया जा सकता, वैसे ही धार्मिक लोगों की बुराइयों का दोष आस्तिकता को नहीं दिया जा सकता। असल में गलत कर्मों का कारण स्वार्थ होता है।

◆ ईश्वर में विश्वास बुरे कर्म से रोकता है क्योंकि ईश्वर को जवाब देना है पर नास्तिकता तो जवाबदेही खत्म कर देती है। क्योंकि अधिकतर मनुष्य केवल स्वार्थ अनुसार कार्य करते हैं, चाहे उनेक स्वार्थी कार्यों से दूसरों का कितना भी नुकसान हो जाये। गैर-ईश्वरवादी लोग अपनी हर गलत हरकत को जस्टिफाई करेंगे। कोई भी बुरा काम हम बुरा इसलिए सिद्ध नहीं कर पायंगे क्योंकि उस बुरे काम से करने वाले को तो कोई ना कोई लाभ हो ही रहा है जैसे चोरी से धन आ रहा है, बदकारी से आनंद। ऊपर से ये बुरे काम करने वाला अगर कोई अमीर, पावरफुल इन्सान हुआ तो उसके द्वारा गलत कार्य किये जाने पर भी कानून-प्रशासन उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे क्योंकि वो सब मैनेज कर लेगा।
 
इसलिए अब ये सवाल उठता है कि अगर नास्तिकता ही अंतिम सत्य है तो एक इन्सान इंसानियत सहित नास्तिकवाद क्यों अपनाएं? इंसानियत रहित यानि भौतिकवादी नास्तिकता क्यों नहीं अपनाएं? जब उसे किसी को कर्मो का जवाब देना ही नहीं है, जब स्वर्ग-नर्क जाना ही नहीं है तो पूर्ण भौतिकवाद ही उसे जीवन में सुख दे सकता है, न कि आचारशील जीवन पद्धिति। सोचिये अगर लोग ऐसी नैतिकता रहित नास्तिकता को मानने लग जाए तो पूरी दुनिया जितना मारकाट, लूटमार अभी फैली है, इससे भी ज़्यादा फैल जाएगी क्योंकि लोगों का मानना होगा कि मरने के बाद कर्मो का जवाब ही नहीं देना है। नियन और अनुभव अनुसार प्रैक्टिकली अपराध अक्सर दो तरीके से ही रुकते हैं: पक्के अपराधीयों को कानूनी सज़ा से डराके और कच्चे अपराधीयों को ईश्वर की सज़ा से डराके।

इन सभी प्रश्नों पर नास्तिकों को चिंतन मनन करना चाहिए।

No comments:

Post a Comment

दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...