Thursday, 4 June 2020

ईश्वर का स्वरूप विभिन्न धर्मों में।

विभिन्न धर्मों और ग्रंथों में ईश्वर के नाम।

ईश्वर का स्वरूप सनातन धर्म में।
ईश्वर को विभिन्न नामों से पुकारा जाता है, जैसे:-

वह एकाम है अर्थात एकम है यानी वह केवल एक है।
वह निराकार है अर्थात उसका कोई आकार, रंग, रूप नही है।
वह अकायम है अर्थात अकाय है, काया रहित, शरीर रहित है।

वह अज है अर्थात अजाम है, अजन्मा है। जो जन्म नही लेता!
वह अमर है अर्थात वह कभी नहीं मरता।
वह अजर है अर्थात वह कभी वृद्ध या बूढ़ा नही होता।
वह अनीश्वर है अर्थात वह कभी नष्ट नही होता।
वह अनादि है अर्थात उसका कोई आरम्भ नहीं।
वह अंनत है अर्थात उसका कोई अंत नहीं।
वह अकाल है अर्थात उसका कोई काल, कोई समय नही।
वह असीम है अर्थात असीमित यानी उसकी कोई सीमा नहीं है।
वह अपार है अर्थात उसका कोई पार नही है।
वह अनुपम है अर्थात उसके जैसा कोई भी नहीं।

वह नित्य है अर्थात वह सदैव और हमेशा है।
वह निरन्तर है अर्थात उसमे कोई अंतराल, कोई अंतर नहीं है।
वह निर्विकार है अर्थात वह कभी नही बदलता, उसमें कोई कमी नही।
वह निर्भय है अर्थात उसे किसी का भय नहीं, किसी का डर नहीं

वह स्वयंभू है अर्थात स्वंय से विद्यमान है, स्वयं से स्थापित है।
वह सर्वेश्वर है अर्थात वह सबका स्वामी है।
वह सर्वाधार है अर्थात वह सबका आधार है।
वह सर्व्यापक है अर्थात सबपे व्यापक है, सब उसके अधिकार में है। 
वह सर्वान्तर्यामी है अर्थात वह सब जानता है।
वह सर्वज्ञ है अर्थात सर्वज्ञानी है, वह सब का ज्ञान रखता है।

वह सर्वशक्तिमान है अर्थात सबसे शक्तिशाली है।
वह सर्वश्रेष्ठ है अर्थात वह सबसे श्रेष्ठ!
वह सर्वोत्तम है अर्थात वह सबसे उत्तम है।
वह सर्वोपरि है अर्थात वह सबसे ऊपर, सबसे ऊंचा है।

वह सर्वाधिक दयालु है!
वह सर्वाधिक कृपालु है!
वह सर्वाधिक न्यायकारी है।
वह सर्वाधिक क्षमावान है।

केवल वही वंदिनीय है।
केवल वही पूजनीय है
केवल वही उपासनीय है।
केवल वही अराधनीय है।

केवल वही है संध्या के योग्य।
केवल वही है स्तुति के योग्य।
केवल वही है भक्ति के योग्य।
केवल वही है श्रद्धा के योग्य।
केवल वही है प्रशंसा के योग्य।
केवल वही है गुणगान के योग्य।
केवल वही है अर्चना के योग्य।
केवल वही है आरती के योग्य।
केवल वही है नमन करने के योग्य।
केवल वही है नत्मस्तक करने के योग्य!
केवल वही है सर झुकाने के योग्य।
केवल वही आराध्य है जिसे साष्टांग किया जाए।
केवल वही आराध्य हैं जिसे दण्डवत किया जाए।
 
वही निर्माता है, वही संचालक है और वही संहारक है।
वही सृष्टा है, वही पालनहार है और वही विनाशक है।
वही सृजक है, वही व्यवस्थापक है और वही नाशक है।
वही दाता है, वही विधाता है और वही मोक्षदाता है।

वेदों और वैदिक काल में उसी एक ईश्वर के नाम आते है..

ओअम, अग्नि, आदिशक्ति, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इंद्र, सरस्वती, वरुण, मित्र, यम, मातरिश्वा,आदित्य, विराट, वायु, गुरुतमान, परब्रह्म, परब्रम्हा, परब्रह्मन, देव, महादेव, महेश, शिव, गणेश, प्रजापति, परमपुरुष, तेजस, हिरण्यगर्भ।

उसी एक ईश्वर को सामान्य भाषा मे पुकारते है..
ईश्वर, परेमश्वर, परमात्मा, प्रभु, हरि (पापों को हरने वाला), मालिक, ऊपर वाला

इस्लाम धर्म, क़ुरान और मुसलमान उसी को कहते है...
अल्लाह, इलाह, ख़ुदा, रब, ख़ालिक़, राज़िक।

सिख धर्म, गुरुग्रंथ साहिब और सिख उसी को कहते है..
वाहे गुरु, ओंकार, सतनाम, सतश्रीअकाल

यहूद धर्म, तोराह/तनख/तलमूड ग्रंथ और यहूदी उसी को कहते है..
एल, एली, एलाह, एलोह, एलोहिम, एलोहाई, एलशददाई, एलीयोन, जेहोवा, यहोवा, यावेह, याहवेह।

ईसाईयत धर्म, बाइबिल और ईसाई उसी को कहते है..
गॉड, लार्ड।

पारसी धर्म, दसातीर/जेंद/अवेस्ता ग्रंथ और पारसी उसी को कहते है..
अहुरमाज़द, हुर्मुज़।

और विज्ञान, वैज्ञानिक और नास्तिक उसे ही कुछ अलग प्रकार से कहते है..
सुप्रीम बीइंग, सुप्रीम ऑलमाइटी, सुपर नेचुरल पॉवर, नेचर

ईश्वर एक ही है जिसे हम यंहा अपनी इन तुच्छ आंखों से नही देख सकते। ईश्वर का कोई भी व्यक्तिगत नाम नहीं है। क्योंकि नामकरण तो माँ-बाप करते है। इसलिए उसका व्यक्तिगत नाम हो भी नहीं सकता।

उसे विभिन भाषाओ में भिन्न भिन्न नामों से बुलाया गया। उसे सामान्य नामों से भी पुकारा गया। उसके नाम उसकी विशेषताओं और गुणों के आधार पर पड़े।  ईश्वर के नाम उसके गुणवाचक या गुणात्मक नाम है। वेदो में बहुत से नाम उसी एक के लिए प्रयोग हुए है। परन्तु उत्तर वैदिक काल मे समय के साथ-साथ, मनुष्य उसके अलग-अलग नामों पर बहुत से अलग-अलग देवी, देवताओं के स्वंतंत्र अस्तित्व बनाता चला गया। यंहा तक कि उसकी विशेषताओं और गुणों के आधार पर भी बहुत से पृथक देव, देवी, देवता बनाता चला गया। जबकि सारी शक्तियां, गुण तो उसी अकेले में ही निहित है, जिनका वह एक अकेला स्वामी है।


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