सनातन धर्म या हिन्दू धर्म के ग्रंथों की जानकारी।
सबसे पहले हम (पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार) कालक्रम पर दृष्टि दाल लेते हैं:-
सिन्धु घट घाटी सभ्यता: 2500-1500 BC
वैदिक काल: 1500–600 BC (ऋग्वैदिक/प्रारंभिक वैदिक काल 1500–1000 BC और उत्तर वैदिक काल: यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद काल 1000–600 BC).
उपनिषद् काल: 800–600 BC
आस्तिक व नास्तिक दर्शन: 600-200 BC
इतिहास (रामायण, महाभारत), मनुस्मृति: 400 BC-200 AD
अन्य स्मृतियाँ, पुराण: 200 BC–400 AD (त्रिदेव/ अवतारवाद/ शैव, वैष्णव, शाक्त आदि का जन्म)
अद्वैत, द्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि सम्प्रदाय: 800 AD पश्चात
सनातनी ग्रंथों को मुख्यता दो भागों में बाँटा जाता है: श्रुति और स्मृति।
[श्रुति ग्रंथ]
इन्हें मनुष्य द्वारा ईश्वर से सुना हुआ माना जाता है। इन्हें ऋषियों ने सुन कर आगे दूसरों को सुनाया और आगे बढ़ाया। इनमें आते हैं:- वेद सहिंताएँ, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक, उपनिषद। वैदिक साहित्य या ज्ञान के क्षेत्र में सामान्यतः इन चारों को मिलाकर वेद कहा जाता है। यानी प्रत्येक वेद के चार भाग होते है:- कोई भी एक वेद सहिंता, उसके ब्राह्मण ग्रंथ, उसके आरण्यक ग्रंथ और उसके उपनिषद। कुछ विद्वान वेद संहिता और ब्राह्मण ग्रंथ दोनों को वेद के अंतर्गत मानते हैं और कुछ इससे अलग भी मत रखते हैं। स्वामी दयानन्द ने केवल वेद संहिताओं को वेद कहा है। आज आम तौर पर जब वेद शब्द कहा जाता है तो उससे तात्पर्य केवल वेद संहिता से होता है, न कि ब्राह्मण, आरण्यक या उपनिषद से। मान्यता है कि वेद सहिंताएँ ईश्वर कृत है जबकि ब्रह्मण्ड, आरण्यक, उपनिषद मानव कृत हैं। यद्यपि बाकी तीनों को लोग ईश्वर की वाणी न होते हुए भी, ईश्वर से सुना इस अर्थ में मानते है कि वे हैं तो वेदों का सीधा ज्ञान पर बस शब्द भिन्न हैं जो कि ऋषियों के हैं। यद्यपि आर्य सामजी केवल वेद संहिता को श्रुति मानते हैं। ये ऋषियों ने जब वेद सहितां की वाणी को अपने शब्दों में कह कर शिष्यों को दिया तो ये तीनों अस्तितव में आयें। वेदों सहिंताओं में दिए गए विषयों और ज्ञान को ही विस्तार करके ऋषि, मुनियों, विद्वानों ने ब्राह्मणों, आरण्यकों, उपनिषदों का निर्माण किया। मूल मंत्र वाला भाग संहिता कहलात है। कर्मकाण्ड वाला भाग ब्राह्मण कहलाता है. आरण्यक भाग में तपस्वीयों के नियम आदि हैं। दार्शनिक भाग उपनिषद कहलाता है। इनमें सर्पोपरि 4 वेद संहिता हैं। 4 वेद सहिंताएँ, ब्राह्मणों, आरण्यकों और उपनिषदों के साहित्य को मिलाकर ही वैदिक साहित्य कहा जाता है।
[1] वेद सहिंता: कुल 4 वेद हैं, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद। सामान्यतः वेद सहिंताओं को वेद ही कहा जाता है। वेद संहिता अर्थात वेदों का मंत्र वाला भाग (4 वेद की 4 वेद सहिंताओं को ईशवाणी माना जाता है)। उपासना, स्तुति के लिए मंत्र संहिताएं हैं. इनमें मंत्र लिखे हुए हैं। वेद का अर्थ होता है ज्ञान। वेद का अर्थ ब्रह्म का निजज्ञान भी होता है. वेदों को आदिग्रन्थ
भी कहते है यानी सबसे प्राचीन ग्रंथ। इन्हें स्वत: प्रमाण
कहते है यानी जो स्वयं सिद्ध हैं। हर वेद की कुछ शाखाएं होती हैं यानी ऑफशूट या फ़िक़ह। वेदों के लिए एक मंत्र है, वेदों अखिलो धर्म मूलम अर्थात धर्म का आधार वेद है।
एक मत अनुसार 4 वेद आरंभ से ही स्वतंत्र अलग-अलग वेद थे। इस मत को ही अधिक मान्यता प्राप्त है। दूसरे मत अनुसार 4 वेद एक ही वेद में थे जिन्हें विषय वस्तु के आधार पर अलग अलग करने के बाद 4 अलग अलग वेद अस्तित्व में आये। जैसे महाभारत में कहा गया है कि "एक एव पुरा वेद: प्रणव: सर्ववा वाङमय:"। पर बहुत से विद्वानों ने 3 ही वेद माने हैं और अथर्ववेद को बाकी 3 वेड का भाग माना है क्योंकि उसमे बाकी 3 वेदों का दोहराव बेहद अधिक है. वैसे ऋग्वेद की कई ऋचाओं का प्रयोग अन्य वेदों में
हुआ है. कई भाषा विद्वानों ने सिद्ध कर दिया है कि ऋग्वेद से अथर्ववेद तक आते आते इनकी
संस्कृत कम जटिल और कम प्राचीन होती चली जाती है जो इनके क्रमवार निर्माण
को दर्शाता है।
सूक्त के आरम्भ में लिखे ऋषि का तात्पर्य उस मंत्र के निर्माता या द्रष्टा ऋषि (देखने वाला) से है। देवता का अर्थ है विषय। यह वर्तमान देवता से भिन्न क्योंकि ऋग्वेद में सूक्त देवता: सपत्नी (सौत), धूत (जुआ), दरिद्रता, विनाश आदि भी है। छंद मंत्र का साँचा है। विनियोग का अर्थ प्रयोग है यानी मंत्र किस काम आता था।
ऋग्वेद पुरुषसूक्त (10/90/9) बताता है कि उस पुरुष के होम वाल यज्ञ से ऋक, साम, छंद, यजु की उत्पत्ति हुई है.
वेदों
को अपौरुषेय (जो मानव निर्मित न हो) भी कहा जाता है। अपौरुषेय होने
के कारण इनमें मानव हस्तक्षेप करना मना था. पुरुषार्थ का मलतब है पुरुष
(मनुष्य) का लक्ष्य. चंद लोग ऐसा भी समझते हैं कि वेदों को अपौरुषय इसलिए
पुकारा गया है क्योंकि वेदों में जिस पुरुष (सर्वसत्ता, शाश्वत आत्मा, परम
चेतना और जीवात्मा, ईश्वर के प्रतीक के रूप में वर्णन, ना कि लिंग-विशेष नर
के रूप में) से वर्ण व्यवस्था (ऋग्वेद पुरुष सूक्त अनुसार) निकली है, वेद
स्वयं उस पुरुष से उत्पन्न नहीं माने जाते बल्कि वे अनादि, नित्य और
अपौरुषेय ज्ञान हैं।
आम मान्यता है कि वेदो का ज्ञान
स्वयं ब्रहम/ईश्वर द्वारा प्रदत्त यानी प्रदान किया गया है और वेद संसार के
सर्वप्रथम इश्वरीय धर्मग्रंथ है। पौराणिक हिन्दू मानते हैं कि वेद ब्रह्मा जी (त्रिदेव
में से एक) के मुख से (अलंकारिक अर्थ भी किये जाते हैं) निकले और चारों वेदों की रचना हुई और फिर वेद
सूक्त ऋषियों ने ज्ञान प्राप्त किया और अंत में वेदव्यास ने इनका संकलन
किया. जबकि आर्य समाजी ऐसा मानते हैं कि वेदों का अवतरण सृष्टि के आरंभ में समाधिस्थ अवस्था में आत्मा में प्रेरणा
से अग्नि, वायु, आदित्य, अंगिरा
नामक चार ऋषियों के माध्यम से हुआ (इनके समय में अन्य अमैथूनी जन्मे मनुष्य भी थे). ऐसा भी माना जाता है
कि इन्होंने ब्रह्मा ऋषि को एक एक करके चारों वेदों का ज्ञान दिया
और उन्होंने अन्य ऋषियों (वेद ऋषि) को वेदों का ज्ञान दिया और उन्होंने आगे
जारी किया. जबकि जबकि इतिहासकार मानते हैं कि वेद रचियता अनेकों थे क्योंकि वेदों की ऋचाएं ऋषियों ने
अनेकों वर्षों में बनायीं थी और परमपरा से चलती आ रही थी और अलग अलग जगह थी
जिन्हें अंत में इकट्ठा किया गया संकलनकर्ता वेद व्यास द्वारा.
महर्षि वेदव्यास (कृष्ण दैव्पायन) को वेदों का संकलनकर्ता माना जाता है। इन्होने 18 पुराणों, महाभारत, गीता की रचना भी करी थी. हालाँकि विवेकानंद ने वेदव्यास को एक पीठ बताया है और कुछ आधुनिक विद्वानों (जैसे वाचस्पति गैरोला) ने वेदव्यास और ऋषि बादरायण (वेदांत के जन्मकर्ता) को एक ही माना है।
जेंद अवेस्ता से लगभग 450 शब्द ऋग्वेद में प्रयोग हुए है जैसे देव, सुर असुर आदि. जेंद और वेद एक ही पूर्व-शब्द से बने शब्दों के तौर पर देखा जाता है।. अवेस्ता भाषा के सबूत 4 हज़ार साल से पुराने
मिल चूके हैं पर संस्कृत के 2-2.5 हजार से पुराने लेख या पुरातात्विक
प्रमाण नहीं मिले है।
वेदो के प्राचीन भाष्य है:- स्कन्द स्वामी, नारायण, 7वीं सदी में उद्गीथ, 8वीं सदी में हस्तमलक, 11वीं सदी में वेंकटमाधव, उवट, भट्टभास्कर और लक्ष्मण, 13वीं सदी में आनन्दतीर्थ, धनुश्क्यज्वा और आत्मानन्दध, 14वीं सदी में सायण (1315-1387) और भट्टगोविन्द, 15वीं सदी में सायण, मुद्गल और रावण (यह दक्षिण का
अर्वाचीन पंडित था), 16वीं सदी में चतुर्वेद स्वामी,और 19वीं सदी में स्वामी दयानन्द सरस्वती (1825-1882) जो कि लोकप्रिय जर्मन संस्कृत विद्वान मैक्स मूलर (1823–1900) के समकालीन थे जिसने वेद आदि ग्रंथों को अनुवाद किया था।
कुछ अन्य है:- महीधर (इन का
यजुर्वेद भाष्य अत्यंत अश्लीलता से भरा और कुरुचिपूर्ण है), देवस्वामी,
शौनक, भवस्वामी. सबसे पहले ऋग्वेद का अनुवाद H.H. विल्सन ने किया था 19वीं
सदी के मध्य में। जर्मन संस्कृत विद्वान मैक्स मुलर ही सबसे पहले 19वीं
सदी के अंत में सभी वेदों को गैर ब्राह्मणों के सामने लाये। उससे पहले
वेदों की पूर्ण वाणी अन्य वर्णों के लिए अनजान थी। इनमें
उवट (11वीं सदी), सायण (14वीं सदी) और महीधीर (16वीं सदी) सबसे प्रसिद्ध
हैं। आचार्य सायण से पहले किसी के भी लिखे हुए 4 वेदों के पूर्ण भाष्य नहीं
मिलते है। सिर्फ सायण ही है जिनके लिखे हुए 4 वेदों के पूर्ण भाष्य आज भी
मौजूद हैं। बाकीयों ने या तो सारे लिखे नहीं या आज उपलब्ध नहीं है। इसलिए
सबसे ज़्यादा मान्यता सायण को ही प्राप्त है। एक आम आदमी अगर वेदों की
निष्पक्ष और अविवादित जांच करना चाहता है तो सायण वेद भाष्य पढ़े।
इतिहासकारों अनुसार वेदों में स्पष्ट एकेश्वरवाद नहीं बल्कि अनेकेश्वरवाद या
देवतावाद है मगर क्योंकि ये आपस में जुड़े भी होने चाहिए इसलिए वेदों ने
सबके एक होने का आधार भी दिया जैसे एकम सद्विपरा बहुधा वंदति मंत्र। असल
में प्राचीन काल में सभी स्थानों पर देने वाली प्राकृतिक शय को ईश्वर मान
लिया जाता था जैसे सूर्य, चन्द्र, अग्नि, जल, वायु, जैसे मिस्र, यूनान,
रोम, जापान और भारत में. वेदों में चिंतन से अधिक प्रार्थनाये हैं, ईश्वर/देवताओं को प्रसन्न करके वरदान पाने की जैसे हमें स्वास्थ्य, बल, शक्ति दो, हमारे बैल मोटे और घोड़े ताकतवर हों. वेदों में बलिप्रथा, कर्मकांड, स्वर्ग पर विचार दिखते हैं परन्तु नरक पर बेहद कम विचार हैं साथ ही पुनर्जन्म (अवागमन नहीं) के संकेत भी हैं.
■ ऋग्वेद:- ये सबसे प्राचीन यानी पुराना और सबसे महत्वपूर्ण वेद है। इसी में देवी सावित्री (सूर्य का अन्य रूप) को समर्पित गायत्री मंत्र है। इसके मंत्रो को ऋचाएं भी कहा जाता है। इसमे मंत्र, मंडल और सूक्त में बटें हैं। इसमे मंत्र पद्द रूप में हैं। ऋग्वेद की ऋचाएं अन्य तीनों वेदों में भी पायी जाती हैं। साहित्यिक तौर पर ऋग्वेद पद्य प्रधान है। ऋग्वेद से उस समय की प्रणाली और इतिहास की जानकारी मिलती है। ऐसा भी कहा जाता है कि प्रथम और दसवें मंडल को बाद में इसमें जोड़ा गया।
■ युजुर्वेद:- इसे दूसरा वेद भी कहा जाता है। इसमें मंत्र, अध्यायों में बटें हुए है। इसमे मंत्र गद्द रूप में हैं। यजुर्वेद गद्य प्रधान (हालांकि ये पद्य में भी है) है। यजुर्वेद पाठ, अनुपालन और नियनों का संकलन है। यजुर्वेद की 100 शाखाओं में से कृष्ण यजुर्वेद (इसकी भी कई शाखाएं व संस्करण है जैसे तैत्तरीय सहिंता, मैत्रयाणी संहिता, काठक संहिता एंव कठ कपिष्ठल संहिता है) और शुक्ल यजुर्वेद (इसकी शाखाएं हैं, वाजसनेयी माध्यन्दिन संहिता और काण्व संहिता) है। इनकी दोनों की सामग्री एक है पर क्रम में अंतर है।
■ सामवेद:- कुछ लोग इसको इसलिए अधिक महत्व देते हैं क्योंकि श्रीकृष्ण जी ने गीता में कहा है कि "वेदानां सामवेदोऽस्मि" अर्थात मैं वेदों में सामवेद हूँ। इसमें दो भाग है जिन्हें पूर्वाचिरक और उत्तराचिरक कहते है। प्रथम भाग में 6 अध्याय है जो 4 पर्वो के अंतर्गत आते हैं, उनमे मंत्र विभाजित हैं। दूसरे भाग में 21 अध्याय है उनमें मंत्र विभाजित हैं। इसमें मंत्र गान रूप में हैं। सामवेद की 1000 में से आज उपलब्ध 3 शाखाओं में मंत्रो की संख्या तो अलग अलग है ही साथ ही पाठभेद भी है। ब्राह्मणों और पुराणों के अनुसार इसके मंत्रो की संख्या 1 लाख थी जो अब नही है। सामवेद गान प्रधान है। सामवेद गायन रूप में है। सामवेद के आदि आचार्य जैमिनी माने जाते हैं, जो वायु, भागवत, विष्णु पुराणों से सिद्ध है।
■ अथर्ववेद:- ये चौथा वेद कहलाता है। इसमे मंत्र, कांड और सूक्त में बटें हुए हैं। साहित्यिक तौर पर अथर्ववेद भी पद्य प्रधान है। अथर्ववेद में औषधि, जादू टोना आदि ज्ञान है। बाकी तीनों में यज्ञों, स्तुतियों पर महत्व दिया गया है। पतंजलि (2 सदी ईसापूर्व) ने अथर्ववेद की 9 सहिंताओ का उल्लेख किया है। आज तीन ही उपलब्ध है और जिनमें शौनक प्रचलित है। इसकी भाषा में कम जटिलता होने के कारण ही यह कहा जाता है कि इसकी रचना लंबे अंतराल के बाद हुई।
[2] ब्राह्मण : ये वेदों के लिए किए गए भाष्य हैं। इनमे मंत्रो की व्याख्या है। वेदों की गद्य रूप में यानी सरल भाषा में व्याख्या, ब्राह्मणों में लिखी गयी। इनकी सहायता से वेदों के अर्थ समझने में आसानी होती है।
ब्राह्मण ग्रंथ कर्मकांड और उपासना के विधि विधान से संबंधित हैं. शायद इसलिए ही इन्हें करने वालो को बाद में ब्राह्मण पुकारा गया। वैसे ब्राह्मण का अर्थ होता है ब्रह्मांड से संबंधित या सेेेकरीफ़ाइज़ (Sacrifice). ये गृहस्थाश्रम में पढने के लिए हैं। हर एक वेद का एक या एक से ज़्यादा ब्राह्मण ग्रंथ होते हैं। प्रत्येक ब्राह्मण ग्रंथ के आरण्यक और उपनिषद होते हैं। ऋग्वेद का ब्राह्मण है ऐतरेय और कौषटकी ब्राह्मण। सामवेद का है छान्दोग्य ब्राह्मण। यजुर्वेद का है शतपथ और तैत्तरीय ब्राह्मण। अथर्ववेद का है गोपथ ब्राह्मण। इनमें प्रमुख है ऐतरेय, शतपथ, गोपथ ब्राह्मण। ये कुल 18 हैं।
[3] आरण्यक: इसका अर्थ है जो वनों में पढ़ा जाए। इनका निर्माण सन्यासियों के लिए हुआ। वृहदारण्यक, ऐतरेय और तैत्तरीय आरण्यक इनमें प्रमुख है। आरण्यको में वेदों में निहित दर्शन है। इनमे वेदों में दिये गए कर्मकांड का उल्लेख नही है। अथर्ववेद को छोड़ कर हर वेद का एक या एक से ज़्यादा आरण्यक होता है। ये भी 18 है। हर ब्राह्मण ग्रंथ के समान्तर एक आरण्यक है।
[4] उपनिषद: उपनिषद उप (निकट) और षद (बैठना) शब्दों से बना है, उपनिषद जिसका अर्थ होता है गुरुओं के समीप बैठ कर ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना। इन्हें कभ कभी वेदांत (वेदों का अंत या अंतिम भाग) भी कह दिया जाता है। उपनिषदों में वेदों का दर्शन और आध्यात्मिक ज्ञान का विस्तार और व्याख्या है।
ब्रह्म की साधना ही उपनिषदों
का मुख्य लक्ष्य है। हर मुख्य उपनिषद किसी न किसी वेद से जुड़ा हुआ है। इनकी संख्या 272 तक है जिनमे लगभग 200 साधारणतः स्वीकार्य हैं, 108 लोकप्रिय हैं और 11 सर्वमान्य हैं। इनमे से कुछ के नाम हैं, ईशोपनिषद, छान्दोग्यउपनिषद, अल्लोपनिषद आदि। बृह्दराण्यक उपनिषद सबसे पुराना माना जाता है और फिर छान्दोग्य। इनमें निराकर ईश्वर को परब्रह्म आदी पुकारा गया है और उसे एकमेवाद्वितीयं कहा है अर्थात जिसके जैसा दूसरा कोई नहीं है। उपनिषद काल में जंगल, वीरान में जाके चिंतन होना शुरू हो गया था इसलिए इससे सन्यास और वैराग्य के भाव जन्मे जैसे जीवन, मोक्ष, पुनर्जन्म क्या है? उपनिषद काल तक आते आते ब्रह्म (परमतत्व), आत्मा, पुनर्जन्म, मोक्ष जैसी धारणाएं दर्शन में स्थिर हो जाती हैं और ब्रह्म सगुण है या निर्गुण आदि, जैसे मतों पर चर्चाएं होती हैं.
उपनिषदों में कई दार्शनिक संवाद जैसे गार्गी–याज्ञवल्क्य संवाद, मैत्रेयी–याज्ञवल्क्य, नचिकेता–यम अदि मिलते हैं. उपनिषद काल में मैत्री, गार्गी, घोषा, लोपामुद्रा जैसी कई दार्शनिक विद्वान स्त्री हुई हैं।
कुछ अन्य श्रुति ग्रंथ इस प्रकार है, यद्यपि बहुत से विद्वान इन्हें श्रुति ग्रंथ नहीं मानते हैं:-
(i) उपवेद :- वेदों से निकली शाखाओं, ज्ञान से ही उपवेद बने हैं। ये हैं, आयुर्वेद (चिकिस्ता ज्ञान), धनुर्वेद (सैन्य ज्ञान), गान्धर्ववेद (संगीत ज्ञान), शिल्पवेद (कला ज्ञान)।
(ii) वेदांग/षडांग:- वो ग्रंथ हैं जो वेदों को पढ़ने-समझनें के लिए सहायक माने जाते हैं। वेदांग का अर्थ है, वेदों का अंग। ये हैं:-
■ शिक्षा : इसमें वेद मंत्रों के उच्चारण की विधि है। प्रतिशाख्य इसका प्राचीनतम ग्रन्थ है। विभिन्न प्रातिशाख्य हैं, ऋग्वेद प्रातिशाख्य, अथर्ववेद प्रातिशाख्य, शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि प्रतिशाख्य, कृष्ण यजुर्वेद तैत्तिरीय प्रातिशाख्य। प्रातिशाख्य में वेदों की शाखाओं की विभिन्न परम्पराओं का ब्योरा है।
■ कल्प/कल्पसूत्र : कल्प का अर्थ है, विधि, नियम, न्याय आदि। यह बताते हैं कि वेद मंत्रों का प्रयोग किस क्रम में करना है। इसमें यज्ञकर्मो का क्रम है व ज्योतिष समय का ज्ञान है। इनमें व्यवहार, आचार, कानून आदि का उल्लेख है। ये बहुत से हैं, परंतु लगभग 20 के करीब ही पूर्ण उपलब्ध हैं और प्रसिद्ध हैं।
इनके 4 प्रकार हैं: शुल्बसूत्र (यज्ञशाला का शिल्प, ज्यामितीय विज्ञान संबंधित), श्रौतसूत्र (यज्ञ और कर्मकांड संबंधित), गृह्यसूत्र या स्मार्तसूत्र (घरेलू जीवन, कुलाचार संबंधित), धर्मसूत्र (वर्ण, आश्रम, धर्माचार संबंधित) जिसमें आते हैं, गौतम धर्मसूत्र, आपस्तम्ब धर्मसूत्र, बुद्धयानसूत्र, वसिष्ठ सूत्र।
ऐसा भी माना जाता है कि सूत्र में ही सारे वेदांग और उपांग ग्रन्थ आते हैं। थोड़े अक्षरों वाले साररूप एवं निर्दोष वाक्य का नाम सूत्र होता है. वेदो की भाषा कठिन होने के कारण, उनका ज्ञान सूत्र के रूप में दिया गया। आम तौर पर इनके नाम के आगे सूत्र लिखा होता है। जैसे शिक्षासूत्र, छंदसूत्र, कल्पसूत्र। योगसूत्र, न्यायसूत्र, वैशेषिकसूत्र, मीमांसासूत्र, वेदांतसूत्र/ब्रह्मसूत्र। शिवसूत्र, कामूसुत्र आदि सूत्र भी हैं। सूत्रपिटक (बौद्ध), कल्पसूत्र (जैन) अन्य धर्मों के सूत्र हैं।
■ व्याकरण: इनमें शब्दों का ज्ञान है। शब्द वाक्यों की प्रयोग विधि है। इनमें पाणिनि कृत अष्टध्यायी प्राचीनतम है (चौथी सदी ई.पु.)।
■ निरुक्त: यह बताता है कि वेदों में किन शब्दों का प्रयोग किन किन अर्थों में किया गया है। इसमें शब्दों के अर्थ और व्याख्या है। यह वेदांग में सबसे महत्तपूर्ण ग्रंथ है। इसके लेखक यास्क मुनि हैं। निरुक्त में 1770 शब्द है. इसमें 3 काण्ड और 14 अध्याय है. इसके पहले काण्ड को निघंटु कहते हैं, दुसरे को नैगम और तीसरे को देवत्व कहते हैं. मूलतः निघण्टु एक वैदिक शब्दकोश है जिसकी व्याख्या निरुक्त है।
■ ज्योतिष: इसमें वैदिक ज्योतिष संम्बंधी ज्ञान है। इनमे लगधमुनि का वेदांग ज्योतिष प्राचीनतम है।
■ छन्द: इसमें वेद छंदों संबंधी ज्ञान है। संहिताएँ छंदों में बंधी हुई है. छंद अर्थात अक्षरों की संख्या. केवल अथर्ववेद और यजुर्वेद (कृष्ण) कंहीं कंहीं पद्द में हैं. इसमें पिंगलाचार्य का छंदसूत्र प्रसिद्ध है।
[स्मृति ग्रंथ]
ये वो हैं जिन्हें मनुष्य ने बनाया। स्मृति का अर्थ है याद किया हुआ। यानी जिन्हें याद कर कर के अगली पीढियों को दिया गया। इनको श्रुति ग्रंथ यानी वेदों से निचला दर्जा प्राप्त है। ये हैं:-
[1] पुराण :- पुराण का अर्थ होता है पौराणिक, प्राचीन या पुराना। यद्दपि पुराणों का निर्माण वैदिक काल के बहुत समय बाद हुआ। कई तथ्य ये कहते हैं की इनका निर्माण कुछ शताब्दियों पूर्व ही हुआ है। ये उन लोगों के लिए लिखे गए जो वेदों को सुन नही पाते थे, ताकी वो धर्म से जुड़े रहें। इसीलिए इनमें देवी, देवताओं की कथाएँ, देवमालाएं आदि भरी हुई हैं। वेदों के ज्ञान को अत्यंत गूढ़ मानने के कारण, आम जनता को वेदों का ज्ञान देने के लिए पुराण लिखे गए और इनमें रोचक कथाएं डाली जिससे साधारण लोग इनमें रुचि ले सके। जिनको वेदों की मनाही थी, उनको पुराण सुनाए जाते थे। ये वेदों का ऊपरी सार है। कंही कंही पुरणो को भी पांचवा वेद माना गया है जो कि एक दुर्लभ मत हैै। पुराणों के संकलनकर्ता लौहर्ष और उनके पुत्र, उग्रश्रवा माने जाते हैं। महाऋषि वेदव्यास को भी इनका वक्ता या रचीयता माना जाता है। वैसे ये बहुत सारे हैं पर प्रामाणिक पुराण 18 माने जाते हैं। कुछ के नाम है श्रीमद्भागवत महापुराण या भागवत पुराण (श्रीमद्भगवत गीता अलग है), मत्स्य पुराण, भविष्य पुराण, गरुड़ पुराण आदि। इन्हीं को महापुराण भी कहा जाता है। मत्स्य पुराण (आंध्र सातवाहन वंश संबंधित क्योंकि ये इनके द्वारा और इनेक शासनकाल में निर्मित हुए, ऐसा ऐतिहासिक तौर पर प्रतीत होता है), विष्णु पुराण (मौर्य वंश संबंधित), वायु पुराण (गुप्त वंश संबंधित), भागवत पुराण और ब्राह्मण पुराण में राजाओं की वंशावली आयी है। सबसे प्रामाणिक और प्राचीन मत्स्य पुराण माना जाता है।
पुराणों में
उस समय के महापुरुषों जैसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि की कहानियां है।
आधुनिक पुराणों में संतोषी पुराण लिखा गया जिसमें संतोषी माता को गणेश की
पुत्री बताया गया।
■ उपपुराण :- ये वे ग्रन्थ हैं जो प्रसिद्ध महापुराणों से विषयों के विन्यास तथा देवी देवताओं के वर्णन में न्यून हैं, परन्तु उनसे कई प्रकार से समानता भी रखते हैं। ये पुराणों की तरह ही होते हैं। इनकी संख्या तथा नाम के विषय में बहुत मतभेद है। इनकी संख्या 32 तक कही जाती है पर बहुमत इनकी संख्या लगभग 18 मानती है जिनमे लगभग 4 लाख श्लोक हैं। कई विद्वान कुछ महापुराणों को उपपुराणों में गिनते हैं और कुछ उपपुराणों को महापुराणों में यानी इनमें विद्वान एकमत नहीं हैं। इनके नाम हैं कर्म पुराण, स्कन्द पुराण, पदम पुराण और कपिल पुराण आदि।
■ जैन पुराण : - जैन धर्म की कई धार्मिक पुस्तकों को भी पुराण कहा जाता है। जैसे महापुराण (आदि पुराण एंव उत्तर पुराण इसके दो भाग है), पदमपुराण, पांडव पुराण, हरिवंश पुराण आदि। कई जैन पुराण और हिन्दू पुराणों के नाम एक जैसे हैं। जैनीयों के अपने महाभारत और रामायण संस्करण हैं।
[2] स्मृतिया:- इनमे मूलतः कानून होते है। ये लगभग 40 है पर 18 प्रचलित । इनमे प्रमुख है :-
● मनुस्मृति - इसका निर्माता मनु को कहा जाता है, कुल 14 मनु हुए हैं। इसमें सामाजिक कानून व नियम है। दलित समाज और कुछ अन्य लोग इसे स्वीकार नहीं करते हैं। सबसे प्राचीन और प्रमाणिक मनुस्मृति मानी जाती है। मनुस्मृति शुंग काल का मानक ग्रन्थ माना जाता है। इसके प्रसिद्ध भाष्यकार है - मेदातिथि (9-11वीं सदी के बीच - इनका भाष्य सर्वमान्य है), गोविंदराज (11वीं सदी), कुल्लुकभट्ट (13-15वीं सदी), भरुचि, विश्वरूप।
● याजनवल्कय स्मृति - गुप्तकाल पूर्व रचयित।
● पाराशर स्मृति।
● बृहस्पति स्मृति - गुप्तकाल रचयित (3rd से 6th सदी AD)।
● कात्यायन स्मृति - गुप्तकाल रचयित।
● नारद स्मृति - गुप्तकाल की जानकारी देती है।
★ धर्मशास्त्र/शास्त्र, वे ग्रंथ जिनमें धर्म का ज्ञान सम्मिलित है, इनमें सभी स्मृतियां आती हैं। वैसे अन्य क्षेत्रों के ज्ञान को भी शास्त्र कहा जाता है जैसे अर्थशास्त्र (कौटिल्य/चाणक्य का), वास्तुशास्त्र, खगोलशास्त्र, कलाशास्त्र।
[3] उपांग:- इन्हें षडदर्शन/वैदिक दर्शन/दर्शन शास्त्र भी कहते है। इन्हें वैदिक दर्शन इसलिए कहते हैं क्योंकि ये वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार करते हैं, ना कि सीधे-सीधे वेदों से निकले हैं. इनमें फलसफा, फिलोसोफी भरी हुई है। ये हैं:-
■ सांख्य दर्शन: इसकी स्थापना कपिल
मुनि ने की थी। सांख्यसूत्र इसका ग्रन्थ है। यह श्वेताश्वर-कठोपनिषद में मिलता है.
■ न्याय दर्शन: इसके प्रवर्तक अक्षपाद गौतम है जिनका न्यायसूत्र इस दर्शन का प्रमुख ग्रंथ है
■ वैशेषिक दर्शन: इसके प्रवर्तक कणाद मुनि या उलूक है, जिनका वैशेषिकसूत्र इसका प्रमुख ग्रंथ है।
■ योग दर्शन: इसके प्रवर्तक पतंजलि है जिनका योगशास्त्र इसका प्रमुख ग्रंथ है और जिसकी सर्वोत्तम व्याख्या व्यास मुनि ने की है।
■ (पूर्व) मीमांसा/कर्म मीमांसा: ये जैमिनी मुनि द्वारा रचयित है और मीमांसासूत्र इसका ग्रन्थ है। पूर्व
मीमांसा नाम वेदों के कर्मकांड (शुरुआती
हिस्से, संहिता, ब्रह्माण, आरण्यक) पर
आधारित होने के कारण पड़ा.
■ उत्तर मीमांसा/वेदांत/ब्रह्म मीमांसा: इसके प्रवर्तक बादरायण है। इसका ग्रन्थ है, ब्रह्मसूत्र/वेदांतसूत्र/उत्तर मीमांसा सूत्र। इसके लिए उपनिषद सबसे महत्वपूर्ण आधार है. इसलिए इसका नाम वेदांत भी है. उत्तर मीमांसा नाम वेदों के ज्ञानकांड (आखिरी हिस्से, उपनिषद) पर आधारित होने के कारण पड़ा.
वेदांत दर्शन में 'श्रुति' से आशय (वेद, गीता, ब्रह्मसूत्र आदि) से है. योग दर्शन में 'आगम'
(ऋषियों, मुनियों, सिद्धियों के परम्परागत अध्यात्मिक उपदेश) से है, हालाँकि
शैव (तंत्र), वैष्णव, शाक्त, बौद्ध और जैन के आगम ग्रन्थ भिन्न होते हैं.
ब्रह्मसुत्र: यह एक ग्रंथ है, जिसके रचियता बादरायण है। उपनिषदों में कुछ विरोधाभासी मन्त्र थे तो उन में समरूपता लाने के लिए ब्रह्मसूत्र ग्रन्थ लिखा गया. वेदांत में ब्रह्मसूत्र को पढ़े बिना आचार्य नहीं माना जाता. इस पर कई विद्वानों ने भाष्य लिखे हैं। शंकरभाष्य और रामानुज भाष्य प्रमुख हैं। आदि शंकराचार्य के दर्शन का निचोड़, 'एकम ब्रह्म द्वितीय नास्ति' ब्रह्मसूत्र है,जो उपनिषदों के संबंधित भावों का मिश्रण है.
वेदांत:- इसका अर्थ है वेदो का अंत। ये दर्शन वेदों का अंतिम, तात्त्विक, दार्शनिक निष्कर्ष है. वेदांत का मुख्य स्रोत उपनिषद है और क्योंकि उपनिषद वैदिक साहित्य का अंतिम भाग
है इसलिए इन्हें वेदांत कहा गया है। प्रारंभ में ये केवल उपनिषदों पर ही
आधारित थे। परन्तु बाद में उपनिषदों और वेदांत के सिद्धांतों पर जो अन्य
दर्शन और विचार जन्म लेते गए, फिर उनको भी वेदांत कहा जाने लगा। वेदांत की विभिन्न शाखाएं/धाराएँ है:-
◆ अद्वैतवाद वेदांत:
इसका श्रेय आदि शकराचार्य (8वीं सदी) को जाता है। यह मानते थे कि केवल ब्रह्म ही सत्य है बाकी सब मिथ्या (अर्थ सच-झूठ से परे: ना पूरा सत्य और ना पूरा असत्य या सत्य-असत्य के बीच) है और जगत माया (जैसे स्वपन/सत्य होके भी असत्य) है।
◆ विशिष्टाद्वैतवाद वेदांत : इसके जनक रामामुज थे (11वीं सदी)। इन्होंने कहा कि जीव, जगत् और ब्रह्म तीनों सत्य हैं। यह मत अद्वैत ही है परन्तु विशिष्ट।
◆ द्वैतवाद वेदांत : इसे माध्वाचार्य (12वीं सदी) ने शुरू किया। ये विशिष्टाद्वैतवाद से मिलता जुलता है। इसके अनुसार ईश्वर जीव और जगत् तीनों
एक दूसरे से भिन्न हैं।
◆ द्वैताद्वैत वेदांत : इसके प्रणेता, निम्बार्क (12वीं सदी) हैं। ये द्वैतवाद व अद्वैतवाद दोनों का मिला जूला रूप है।
◆ शुद्धाद्वैतवाद वेदांत : इसके रचियता बल्लभाचार्य है (15वी सदी)। इनके अनुसार जीव और ब्रह्म स्वरूप से एक हैं।।
[4] इतिहास : - इतिहास में जो ग्रंथ आते हैं, उनका ऐतिहासिक महत्व है। इनका निर्माण कब हुआ ठोस दावे से नही कहा जा सकता है। आश्चर्यजनक रूप से कुछ दावे लाखों वर्ष पूर्व के हैं और कुछ मात्र ईसा काल आरंभ होने के आस पास के। ये हैं-
◆ रामायण : यह एक महाकाव्य है जिसमें श्री रामचंद्र जी की जीवनी है, जिसे संस्कृत भाषा में लिखा है महर्षि वाल्मीकि ने। इसमें श्लोक होते हैं। इसे वाल्मीकि रामायण कहते है।
इसमें पहेले 6 हज़ार श्लोक थे फिर 12 हज़ार हुए और आज 24 हज़ार श्लोक हैं। इसमें 7 कांड हैं। माना जाता है कि पहला और अंतिम कांड बाद में जोड़ा गया है।
● रामचरितमानस : यह 16वीं सदी में अवधि भाषा में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखी श्री रामचन्द्र जी की जीवनी है जिसका आधार वाल्मीकि रामायण ही है। इसे तुलसी रामायण भी कहा जाता है। यह मूल वाल्मीकि रामायण से ज़्यादा पढ़ी जाती है।
◆ महाभारत : यह भी एक महाकाव्य है जिसको संस्कृत भाषा में लिखा है महर्षि वेदव्यास ने। इनमें भी श्लोक हैं। इसे पहले कभी भारत या जय या जयसंहिता कहते थे। इसे पंचम वेद यानी पांचवा वेद भी कहा जाता है। ये दुनिया का सबसे बड़ा ग्रंथ है लंबाई के अनुसार। इसमें 5 पांडव भाइयों और 100 कौरव भाइयों के बीच हुए युद्ध का विवरण है। इसमें पहले 8800 श्लोक थे फिर 24 हज़ार हुए और आज 1 लाख श्लोक हैं। हरिवंश पुराण, महाभारत के बाद की गाथा बताता है।
● श्रीमद्भगवत गीता: ये महाभारत का ही हिस्सा है। महाभारत का भीष्म पर्व ही गीता है। यह कुरुक्षेत्र में युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण जी द्वारा अर्जुन को दिया संदेश है। इसमें 700 श्लोक है। कुछ आर्य समाजी केवल 70 श्लोकी गीता को मानते हैं।
पूरी महाभारत वेदव्यास ने लिखी है और संजय गीता सूना रहे हैं, सूर्य इसका प्रत्यक्षदर्शी है. जिस
समय कृष्ण पार्थ (अर्जुन) को गीता का उपदेश दे रहे थे उस समय इस उपदेश को
विश्व में चार और लोग सुन रहे थे जिसमें हनुमान, महर्षि व्यास के शिष्य तथा
धृतराष्ट्र की राजसभा के सदस्य संजय और बर्बरीक शामिल थे। जब गीता का
उपदेश चल रहा उस दौरान पवन पुत्र हनुमान अर्जुन के रथ पर बैठे थे जबकि
संजय, धृतराष्ट्र से गीता आख्यान कर रहे थे। धृतराष्ट्र ने पूरी गीता संजय
के मुख से सुनी। कृष्ण की मंशा थी कि धृतराष्ट्र को भी अपने कर्त्तव्य का
ज्ञान हो और एक राजा के रूप में वो भारत को आने वाले विनाश से बचा लें।
गीता
में एकेश्वरवाद, बहुदेववाद, अवतारवाद सभी का मिश्रण है। इसलिए इसमें
व्याख्या की मुख्य भूमिका हो जाती है.
[अन्य ग्रन्थ]
आगम: हिन्दू धर्म में इन्हें तंत्र शास्त्र भी कहते हैं. ये विभिन्न भारतीय धर्मों (मुख्यतः शैव, वैष्णव और शाक्त) के शास्त्र हैं, जो आगमन या प्राप्त ज्ञान का अर्थ रखते हैं. इनमें मंदिर निर्माण, मूर्ति पूजा, अनुष्ठान, दर्शन और आध्यात्मिक साधना की विधियाँ, परंपराएँ, और सिद्धांत मिलते हैं। ये ग्रंथ वैदिक परंपरा से भिन्न, तंत्र-मंत्र और गूढ़ ज्ञान पर आधारित होते हैं. जैन धर्म में भी आगम ग्रंथ होते हैं, जो भगवान महावीर के उपदेशों और जैनी कथा-कहानियों का संकलन हैं. बौद्ध (मुख्यता वज्रयान तांत्रिक सम्प्रदाय में) धर्म में भी आगम ग्रंथ होते हैं जैसे दीर्घ आगम, मध्यम आगम, संयुक्त आगम. आगमों के उप आगम (उपागम)भी होते हैं.
वैदिक धर्म में उपास्य देवता की भिन्नता के कारण इसके तीन प्रकार है: शैवागम (पाशुपत, शैवसिद्धान्त, त्रिक आदि), वैष्णव आगम (पंचरात्र तथा वैखानस आगम), तथा शाक्त आगम (कुलार्णव, कामधेनु, कुब्जिक, तन्त्रराज, वाराहीतन्त्र, रुद्र यामल, भूतशुद्धितन्त्र, तथा महानिर्वाणतन्त्र आदि). शैव परम्परा में तन्त्र ग्रन्थों के वक्ता साधारणतयः शिवजी होते हैं।
---------------------------
इन सभी धर्म ग्रंथों में वेदों का स्थान सबसे ऊपर है। नियम यह है कि अगर कोई मान्यता, आस्था, धारणा, वृतान्त में मतभेद पाया जाता है तो
वेदों में लिखी बात को ही वरीयता मिलेगी और केवल उसी विवरण को ही
प्राथमिकता दी जायगी जो वेदो के अनुसार होगा परंतु व्यावहारिकता में ऐसा
होता नहीं है।
No comments:
Post a Comment