Thursday, 4 June 2020

सनातन धर्म - भाग 2 (ईश्वर, परमेश्वर, परमात्मा, शिवलिंग, देवता, भगवान, अवतार, ब्रह्म का अर्थ)।

ईश्वर, परमेश्वर, परमात्मा, शिवलिंग, देवता, भगवान, अवतार, ब्रह्म  आदि का अर्थ।


ईश्वर, परमेश्वर, परमात्मा, जीवात्मा, आत्मा। 

ईश्वर
ईश्वर शब्द, ईश धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है, नियंत्रित करना। ईश से ही ईशन बना है, जिसका अर्थ होता है, शासन। ईश्वर का मतलब है शासक या शासन करने वाला। ईश्वर ही सर्वोच्चय शासक है। सर्व का मतलब सबसे पहले और उच्च का मतलब सबसे ऊपर है।

हज़ारो वर्षों से चली आ रही परम्पराओं, धर्म में अनेकों चीजें और शब्द आपस में गडमड हो गए है। ईश्वर शब्द के साथ भी यही हुआ। जब ईश्वर शब्द को इंसानी गुणों के समानांतर प्रयोग होना शुरू हुआ यानी ईश्वर शब्द कभी कभी दूसरों के लिए भी प्रयोग होना शुरू हुआ। जैसे लंकेश्वर यानी लंका का ईश्वर (रावण), वानेश्वर यानी वानरों या बंदरों का ईश्वर (हनुमान जी की उपाधि), योगेश्वर यानी योग का ईश्वर (श्रीकृष्ण जी) आदि शब्द बने। 
 
इस तरह ईश्वर को इन मानवीय चरित्रों से अलग करने के लिए ईश्वर में परम जोड़ कर परमेश्वर कर दिया गया। हालांकि साधारणत: दोनों शब्द उसी के लिए प्रयोग होते आए हैं।

यजुर्वेद 40:1 में ईश्वर शब्द आया है। योगसूत्र में (1.23-24) में ईश्वर शब्द मौजूद है। वाल्मीकि रामायण (अरण्य कांड 3.30.3) में ईश्वर शब्द आया है। मनुस्मृति में (12.123) में ईश्वर शब्द आया है और उसके गुण भी। गीता (18.61) में भी ईश्वर शब्द आया है। 
 
 
परमेश्वर
ईश्वर शब्द से छेड़छाड़ के बाद, परमेश्वर शब्द की उत्पत्ति हुई। परम अर्थात सबसे श्रेष्ठ, बड़ा या ऊंचा। परम ईश्वर यानी ईश्वरों में सबसे बड़ा ईश्वर। हालांकि ईश्वर और परेमश्वर दोनों शब्द अपनी जगह उपयुक्त हैं। इन्हें यूँही प्रयोग किया जा सकता है क्योंकि सामान्यतः इन शब्दों के साथ उस सर्वोच्य सत्ता को ही संबोधित किया जाता है।

महाभारत में परमेश्वर शब्द और उसके गुण आए हैं, जैसे शांतिपर्व 12.204.13, 12.201.15, अनुशासन पर्व 13.14.41. 
 

ब्रह्म - परब्रह्म
ऐसे ही ब्रह्म के बाद परब्रह्म शब्द बना। ब्रह्म का अर्थ है विस्तार करने, फैलने वाला। दोनों ईश्वर के लिए मूल रूप से प्रयोग होते हैं। ऐसा भी माना जाता है कि सृष्टि में जंहा पृथ्वी, जीवन, मानव उपलब्ध हैं, वंहा वो सर्वशक्तिमान ईश्वर कहलाता है और अन्य जगह ब्रह्म।
 
सबसे प्राचीन शब्द ब्रह्म है जो वैदिक साहित्य में उपलब्ध है. जब दर्शन आदि का समय आया तो भिन्न भिन्न व्याख्या और मत उभरे और फिर ब्रह्म से परब्रह्म हुआ। परब्रह्म, का शाब्दिक अर्थ है सर्वोच्च ब्रह्ममोटे मोटे  तौर पर दोनों एक ही है। जैसे अल्लाह की सिफ़त पर अलग अलग मसलक/फिरके थोड़ी बहुत अलग राय रखते हैं। बस हिन्दू धर्म में नाम में भी जोड़ तोड़ कर दी गई, यही फ़र्क़ है।
 
वेदों, उपनिषदों , सांख्य सूत्र/दर्शन (3.82) आदि में ब्रह्म शब्द मौजूद है। दर्शन शास्त्र में परब्रह्म शब्द है। न्याय सूत्र/दर्शन (2.1.11), वाल्मीकि रामायण में (1.2.30) में, महाभारत (12.110.36) में, गीता (10.12) में भी परम ब्रह्म शब्द आया है। 
  

परमात्मा
परमात्मा शब्द बना है परम और आत्मा से। यानी सबसे बड़ी या सबसे पहली आत्मा। इसका प्रयोग जगह जगह, प्रथम पुरष स्वयंभू मनु में डाली गई प्रथम आत्मा के लिए भी हुआ है और परमेश्वर के लिए भी।  प्रथम आत्मा ही को प्राण शक्ति कहते है। ऐसा बाद के ग्रंथो में कहा जाता है कि सबसे पहले ईश्वर ने आत्मा की ही उत्पत्ति की, वही परमात्मा कहलाई। इसको आप रूहे अव्वल से मिला कर भी समझ सकते हो जो अनेक नही, एक ही है। जिसे हक़ीक़त ए अहमदी भी कहा जाता है। वेदों में परमात्मा शब्द नहीं है, यह बाद की उत्पत्ति है।

परमात्मा  का मतलब है सर्वोच्च आत्मा, सृष्टि की आत्मा, या वह आत्मा जो सभी बंधनों और सीमाओं से परे है या जा चुकी है, इसीलिए इस शब्द को ईश्वर के समानान्तर भी माना जाता है।
ब्रह्म सारे विश्व का परम सत्य है और जगत का सार है। वो दुनिया की आत्मा है। वो विश्व का कारण है जिससे विश्व की उत्पत्ति हुई है, जिसमें विश्व आधारित होता है और अन्त में जिसमें विलीन हो जाता है। वो एक -अद्वितीय है। वो स्वयं ही परमज्ञान है और प्रकाश-स्त्रोत है। वो निराकार, अनन्त, नित्य और शाश्वत है। ब्रह्म सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है। जैन धर्म में यह आत्मा के अर्थो में  लिया जाता है। 

पर सामान्य तौर पर परमात्मा का तात्पर्य या पर्याय ईश्वर या परमेश्वर से ही है क्योंकि प्रथम मानव में फूंकी जाने वाली प्रथम आत्मा, वो सब ईश्वर के द्वारा ही किया गया यानी परमआत्मा के तार उस एक सर्वोच्चय शक्ति से ही जाके मिलते है। बात वही आती है कि अधिकतर चीजें गडमड है। ज़्यादा डिटेल में जा कर भी चीजें उतनी स्पष्ठ नही होती जितनी होनी चाहिए। इसलिये ये सामान्य स्तर पर हो रहा शब्दों का प्रयोग से ही काम चलाया जा सकता है।

यानी ईश्वर को परमात्मा कह सकते है मगर फिर रूहे अव्वल को कुछ भिन्न नाम से पुकारना चाहिए।

जीवात्मा
एक दूसरा शब्द और है जीवात्मा जो सभी जीवों की आत्मा के लिए प्रयोग होता है। जो सर्व्यापक नहीं है। जो विचरण करता है यानी जन्म मृत्यु से गुजरता है। ये व्यक्तिगत चेतना और कार्यकर्ता है। इसे नफ़्स से मिलाकर समझ सकते हैं।

आत्मा 
आत्मा का अर्थ है व्यक्तिगत चेतना, प्राण शक्ति।  वेदों में आत्मा शब्द आया है और वो भी एकवचन में। वंहा आत्मा को अक्सर ब्रह्म से संबंधित बताया गया है।
 
प्राण
ये जीवात्मा का कार्य-साधन और जीवन-शक्ति है। प्राण जीवन है, चेतना नहीं।



देवता, भगवान, अवतार कौन होते है।
 
देवता
देवता शब्द बहुवचन है। इसका एकवचन है देव, स्त्रीलिंग है देवी।

देव शब्द बना है दिव्य से जिसका अर्थ होता है दिव्यमाम होना, प्रकाशमान होना, चमकना या रोशनी। यानी देवता मतलब है कोई पारलौकिक शक्ति। इसलिए अचानक प्रकट हुए शक्ति प्रकाश को दैवीय शक्ति प्रकट होना भी कहते है।  देवताओं का स्थान देवलोक माना जाता है। यानी जैसे स्वर्ग, जंहा अप्सराएं आदि भी रहती है। 

देखा जाय तो शब्द से ही साफ है कि देवता, एक प्रकाश या रोशनी है, और प्रकाश स्वयं का नही होता बल्कि किसी और वस्तु का होता है या उससे निकलता है जैसे सूर्य से किरणे निकलती है या बल्ब से बल्ब का प्रकाश निकलता है। उसी प्रकार ये देवतागण, खुद उत्पन्न नहीं हुए है बल्की किसी के द्वारा बनाये गए है। ईश्वर के सिवा और कौन हो सकता है इन्हें बनाने वाला।

देव के अर्थ देने वाला भी होता है। देने वाला तो कोई भी हो सकता है । इसलिए जो सबसे बड़ा है देने वाला यानी ईश्वर, उसको  देवो: देव: कहते है अर्थात देने में सबसे अच्छा देने वाला।

कोई विद्वान कहता है कि दो प्रकार के देवता है, जड़ औए चेतन। कोई कहता है की दो प्रकार है मनुष्यकृत और ईश्वरकृत। सबसे प्रचलित मान्यता ये है कि 33 कोटि यानी 33 करोड़ देवता है। हालांकि अब ये कहा जाने लगा है कि कोटि का अर्थ 'प्रकार' भी होता है इसलिए 33 प्रकार के देवता होते है, न कि 33 करोड़।

ऋग्वेदिक काल के प्रचलित देवता थे, इंद्र या पुरंदर (दुर्ग भेदी) जो सबसे प्रचलित था, अग्नि और वरुण। धौ, आकाश का देवता है और सबसे प्राचीन है। अग्नि मनुष्य और देवता के बीच मध्यस्ता निभाने वाले देवता होने के कारण अग्नि पूजनीय हो गयी। इंद्र युद्ध और वर्षा का देवता है।  वरुण, सूर्य, पृथ्वी, समुद्र और ऋतुओं का देवता है। मरुत आंधी तूफान का देवता है। सोम वनस्पति, उषा प्रगति, पूषन पशुओं का, अश्विन विपत्तियों को हराने वाला देवता है। सावित्री प्रकाश की देवी है। सृष्टि निर्माता प्रजापति को बाद में ब्रह्मा कहा जाने लगा और रुद्र को शिव या महेश। 

वेदों ने जिन देवताओ का उल्लेख आता है वे सभी ईश्वर की शक्तियां थी जिसे अलग देवता बना कर अलग स्वरूप दे दिया गया उत्तर वैदिक काल मे। ये सब शक्तियां ईश्वर में ही निहित है। क्योंकि ईश्वर एक है सर्वशक्तिशाली बाकी सब उसकी बनाई सृष्टि। ये मत मुख्यत आर्य समाजियो का है। ये शक्ति का देवता है जैसे:

ब्रह्मा (सृष्टि निर्माता), विष्णु (सृष्टि संचालक), महेश या रुद्र या शिव (विनाशक, दृष्टो को रुलाने वाला, कल्याण करने वाला)। इंद्र (वर्षा, जल का स्वामी), प्राण (जग को गति देने वाला) अक्षर (नष्ट न होने वाला), स्वराट (स्वयं का राजा) , कालाग्नि (काल का भी काल), चंद्रमा (शीतल स्वभाव वाला)। अग्नि, वायु,  सूर्य, पृथिवी, वसु, सविता, प्रजापति, जगदम्बा, वरुण। गणेश, दुर्गा।

यंहा तक की इन्ही देवताओ की पत्नियां भी देवी बन गयी जबकि उनकी शक्तियां उनके पति कि शक्ति से मिलती जुलती होती है या उसी का अंग होती है। जैसे.. ब्रह्मा जी की पत्नी सरस्वती (ज्ञान की, यानी जो सृष्टि को बनाने के लिए चाहिए), विष्णु जी की पत्नी लक्ष्मी (धन की, यानी जो जग चलाने के लिये चाहिए), शिव जी की पत्नी पार्वती (शक्ति की, यानी जो संहार करने के लिए चाहिए)।

असल में हुआ ये है कि जो भी देवता है उसकी शक्ति को जब स्त्रीलिंग में परिवर्तित करके बताया गया तो वह शक्ति उस देवता की पत्नी के रूप में सामने आई। सत्यार्थ प्रकाश में दयानंद सरस्वती भी कहते है कि जो जिस देवता की शक्ति है वो उस देवता की पत्नी संज्ञा है। स्वामी जी यह भी साबित कर चुके है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश, वेदों में उस एक ईश्वर की ही तीन विशेषताओं के नाम है जिन्हें लोगो ने अलग अलग देवताओ भगवानों का रूप दे दिया बाद में। 

वेदों में ब्रह्मा विष्णु महेश या रुद्र, इंद्र, सरस्वती, गणपति, वरुण, मित्र आदि नाम उस एक परमेश्वर के ही बताए गए है।। इनको पृथक अस्तित्व या ईश्वर से भीन्न मानना वेदो और उपनिषदो के विरुद्ध है। 

जैसे घर का निर्माता, संचालक और विनाशक एक ही व्यक्ति हो सकता है यानी घर का मुखिया। जैसे एक बिल्डिंग का निर्माता, संचालक, विध्वंसकर्ता भी एक बिल्डर हो सकता है। ईश्वर तो सर्वशक्तिशाली है, उसमें ये तीनों गुण एकसाथ क्यों नहीं हो सकते। अगर ये तीनों कार्य ईश्वर नहीं बल्कि यह त्रिमूर्ति करते है तो प्रश्न उठता है कि फिर ईश्वर क्या करता है?

अतिथि, मां बाप, डॉक्टर, गुरु या शिक्षक, सब  देवता के समान होते है या भगवान के समान। इन्हें ईश्वर के समान कोई नही कहता। इसलिए स्पष्ट है कि इसलिए ईश्वर सभी भगवानो और देवताओं से बहुत ऊपर है।

सनातनी विद्वान सर्वेपल्ली राधकृष्णन ने भारतीय दर्शन के प्रथम अध्याय में कहा है  कि देव का अर्थ है मनुष्यों को देने वाला (निरुक्त 7.15), ईश्वर भी देने वाला है क्योंकिं वो पूरे संसार को देता है, मनुष्य भी दूसरों को देता है तो वो भी देव है। इसलिए सूर्य, चंद्र, आकाश भी देव है क्योंकि वो भी सृष्टि को प्रकाश देते है। ऋग्वेद में मनुष्य के मस्तिष्क द्वारा देवता बनाने कि प्रक्रिया और कंही भी इतनी स्पष्ट नहीं देखी जाती। तब प्राकृतिक शक्तियों को ही दैवीय रूप दे दिया जाता था।

महादेव शब्द बना है, महा और देव से यानी देवों का देव या देवो में सबसे बड़ा। और शिव जी का दूसरा नाम महादेव है। इसी तरह महेश बना है शब्द महा और ईश्वर से अर्थात महा ईश्वर, यानी महेश। महेश या शिव जी सबसे बड़े देवता या भगवान है। ऐसे ही गणेश बना है, गण (अर्थात लोग) और ईश्वर से मिलाके गणेश।  यानी लोगो का ईश्वर या गणों का स्वामी। इसलिए गणेश जी को 'प्रथम पूज्य' भी कहते है।
इसी तरह जगदीश्वर का अर्थ है जग का ईश्वर। हरि भी ईश्वर को ही कहते है। अलख निरंजन का अर्थ भी निराकर परमात्मा है।

कहना कठिन है कि किस काल से सभी देवता, भगवान, उनकी शक्तियां (जो असल में केवल ईश्वर की ही है) और ये दोनों शब्द आपस मे गडमड हो गये, समानांतर हो गए। या कब इन सब का प्रयोग मिलाजुला के, एक दुसरे के बदले या साथ साथ करना आरंभ हुआ।

हज़ारों साल पहले असुर और देव शब्द भी समान्तर समझे जाते थे। पर बाद में दोनों के अर्थ और प्रयोग बदल गए। वैसे ग्रंथो में ईश्वर को देव भी कहा गया है।  मतलब ये है कि ये सब चीज़े गडमड कर दी गयी है या हो गयी है।

देवतावाद के आधार पर दो सम्प्रदाय बन गए। वैष्णव और शैव जिनमे हमेशा कटुता, विवाद और शत्रुता रही। वैष्णव सम्प्रदाय की जानकारी उपनिषदों से मिलती है। इनका विकास भागवत सम्प्रदाय से हुआ। इसके प्रवर्तक कृष्ण थे जो वृषण कबीले के थे और मथुरा के थे। कृष्ण का उल्लेख सर्वप्रथम छान्दोग्य उपनिषद में आया है देवकी पुत्र नौर आंगिरस शिष्य के रूप में। वैष्ण सम्प्रदाय में कुछ मतों में विष्णु के 18 अवतार भी माने जाते है। विष्णु के 10 अवतारों का उल्लेख मत्स्यपुराण में आता है। वामनपुराण में शैव सम्प्रदाय का उल्लेख है।  कालामुख सम्प्रदाय के अनुयाइयों को शिवपुराण में महाव्रतधर कहा गया है जो नरकपाल में ही जल-भोजन करते है और शरीर पर चिता की राख मलते है। लिंगायत शिवलिंग की पूजा करते है। ऋग्वेद में शिव को रुद्र कहा गया है और अथर्वेद में शिव को पशुपति और भूपति भी कहा गया है।  


भगवान कौन होते है।
 
भगवान बना है शब्द भगग और वान से। भगग का अर्थ भंजन करना यानी नष्ट करना होता है। वान का अर्थ होता है तृष्णा या इच्छा। यानी भगवान मतलब जो मनुष्य अपनी इच्छाओं को नष्ट कर दे वो भगवान यानी कोई महापुरुष है।
भगग का एक और मतलब है कला और वान का मतलब 'वाला'। तो भगवान मतलब कला वाला। जैसे बलवान, धनवान आदि। यानी यंहा भी भगवान मतलब कई कलाओ का स्वामी मनुष्य हुआ। जिन्हें हम महापुरुष भी कहते है। भगवान का एक और मतलब भाग्यवान या भाग्यशाली भी होता है। यानी भाग्य वाला। ये भी महापुरुषों के लिए एक उपाधि हुई। यानी भगवान असल मे किसी महापुरुष को कहते है जो शायद कभी धरती पर आए संदेष्टा, नबी, रसूल भी हो सकते है।

विष्णु पुराण के एक श्लोक से ज्ञात होता है कि जो व्यक्ति ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री (संपत्ति), ज्ञान और वैराग्य — इन छह गुणों से परिपूर्ण है, वह भगवान कहलाता है।

भगवान उपाधी है जो आदर सम्मान के लिए प्रयोग होती थी। महर्षि पतंजलि ने पाणिनि को भगवान पाणिनि लिखा है। आदि शंकराचार्य को भगवान शंकराचार्य पुकारा गया। भगवान शब्द का स्त्रीलिंग, भागवान या भाग्यवान होता है।

सबसे ज़्यादा लोकप्रिय 4 भगवान  है। भगवान राम, भगवान कृष्ण, भगवान बुद्ध, भगवान महावीर। इन चारों को विद्वान मनुष्य मात्र मानते है पर उत्तम मनुष्य, महान मनुष्य, महापुरष। सो सकता हैं ये शायद संदेष्टा, नबी, रसूल रहे हो। जबकि बौद्ध और जैन लोग ईश्वर में विश्वास नहीं रखते पर फिर भी, बुद्ध और महावीर को भगवान कहते है। इससे साबित होता है कि भगवान शब्द ईश्वर के लिए है नही है बल्कि महान मनुष्य के लिए प्रयोग होता था। और आज भी किसी महान मनुष्य को लोग भगवान बोलना शुरू कर देते है जैसे बाबा साहब अम्बेडकर को, तेंदुलकर को। यानी भगवान जो महान मनुष्य थे, समय के साथ साथ, ईश्वर माने जाने लगे।। 

अगर वास्तव में भगवान ही ईश्वर होते तो इतने सारे भगवान हुए है, उनमे से किसी एक तो संसार के छोटे छोटे दूर दराज के सभी देशों में भी मानने वाले होते पर उल्टे सांसर के कोने कोने में कोई इन्हें कोई जाने या न जाने पर एक निराकार गॉड या ईश्वर को ज़रुर जानते और मानते है। यानी भगवान नहीं बल्कि सृष्टि का स्वामी ईश्वर है।

भारत मे सदियों से ही हर राज्य या प्रान्त के अलग अलग भगवान है। कंही शिव, कंहीं गणेश तो कंही दुर्गा की मुख्यता पूजा, उपासना होती है और उससे प्राथना की जाती की। ऐसा कैसे हो सकता है की एक जगह का दाता कोई और हो। और किसी दूसरी जगह का कोई और। या किसी एक क़ौम का कोई एक पालनहार हो और किसी अन्य क़ौम दूसरा पालनहार। इस तरह तो हर दुनिया में हज़ारो प्राथनाएं सुनने वाले और जीवन चलाने वाले भगवान हो जायँगे। 

यंहा तक कि आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि हर एक चीज़ का एक अलग भगवान या देवता है, जिसका उस विशेष क्षेत्र पर पूर्ण अधिकार है और जिसमे किसी और का हस्तक्षेप नहीं हो सकता।  हर चीज़ का अलग भगवान या देवता कैसे हो सकता है? इससे तो अर्थ यही निकलेगा कि ईश्वर को सब चीज़ों पर अधिकार और शक्ति नहीं है। इसीलिए तर्कसंगत और धर्मानुकूल बात यही है कि दाता, पालनहार, संचालक आदि केवल और केवल एक ही ईश्वर है, भगवान या देवता आदि नही।

बचपन में एक चुटकुला सुनते थे कि एक हवाई जहाज़ में खराबी आने पर मुसलमान, ईसाई और सिख अपने अपने गॉड से बचाने की प्राथना करके कूदे और सही समय पर उनके गॉड ने उनका पैराशूट खोल कर बचा लिया। पर एक हिन्दू नहीं बच पाया क्योंकी उसने एक एक करके सभी भगवानों से मांगा था। और सब इसलिए बुरा मान गए कि सिर्फ मुझ ही से क्यों नहीं मांगा। दूसरों से मांगा है तो वही बचाएंगे। वैसे भी हर काम मैं कोई करूंगा, इस बार दुसरे बचा लें।


अवतार कौन होते है।

अवतार स्वयं ईश्वर नही बल्कि उसका नीचे उतारा या भेजा गया कोई मनुष्य ही हो सकता है। हो सकता है ये अवतार कहलाये जाने वाले मनुष्य भी नबी, रसूल रहे हो क्योंकि उन्हें भेज तो ईश्वर ही रहा है। 

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य काल्कीपुराण की भूमिका में बताते है कि दरअसल समाज का उद्धार करने के वाले महापुरष और महामानव ही अवतार है। स्वामी दयानंद भी अवतारवाद में विश्वास नहीं रखते थे।

अवतार, ईश्वर कैसे हो सकते है क्योंकि अवतार मनुष्य योनि में जन्म लेके मनुष्यों के गुण पायंगे और मनुष्य देश काल सम्बंधित है, सीमित हैै, अशक्तिशाली है, तुच्छ है। अवतार जन्म मरण, जीवन चक्र आदि के फेर में संलिप्त है। ईश्वर तो अजन्मा, अजर, अमर, असीमित, अकाल, अनंत, अनादि, आत्मनिर्भर, सर्वशक्तिशाली और निराकार है।

ऐसा नहीं सकता कि ईश्वर अवतार लेके केवल एक ही देश, सम्प्रदाय, क़ौम में आये और और दुनिया के दूसरी नस्लो में न आए।

हमें ईश्वर के महापुरुषों का आदर, सम्मान, सत्कार, अनुसरण करना है पर उन्हें ईश्वर नहीं कहना है। आदरणीय होने का अर्थ पूजनीय नहीं होता। पुजनीय केवल ईश्वर है। जैसे किसी इंसान का मालिक उसके घर में दीवाली पर किसी के अन्य नौकर द्वारा मिठाई भेजता है तो वह इंसान उस नौकर को सम्मान देगा, बिठाएगा पर उसे मालिक के नाम से संबोधन नहीं करेगा। जैसे एक देश का स्टेट हेड दूसरे देशों में अपने अम्बेसडर भेजता है, उन्हें सम्मान मिलता है मगर इससे वे स्टेट हेड नहीं हो जाते। जैसे चिट्ठी लाने वाला डाकिया केवल संदेशवाहक होता है, वह चिट्ठी का मालिक नहीं होता। 

परब्रह्म, अपरब्रह्, ब्रह्मन, ब्रह्मा में अंतर।

ब्रह्म: ब्रह्म वह परम सत्ता है जो गुणों के साथ (सगुण) प्रकट होती है। इसे कई दर्शन ईश्वर कहते हैं। ब्रह्म को आत्मा भी कहते हैं। ब्रह्म उपाधिभेद से तीन तरह का व्यवहार में समझा जाता है। सगुण साकार (प्रकृति), सगुण निराकार(जीव), निर्गुण निराकार (ब्रह्म).

परब्रह्म/परमब्रह्म, ब्रह्म का निराकर मायारहित वो रूप है जो निर्गुण और अनन्त गुणों वाला भी है। परब्रह्म का शाब्दिक अर्थ है सर्वोच्च ब्रह्म. परा का अर्थ है उच्चतम, सर्वोच्य. । 

अद्वैत में ईश्वर (मतलब सर्वोच्य भगवान), परम सत्य यानी ब्रह्मन, के सीमित गुणों वाला एक आंशिक सांसारिक रूप है। अद्वैत वेदान्त में निर्गुण ब्रह्म भी परब्रह्म है और परब्रह्म को ही परमात्मा कहा गया है। अद्वैत में यही निर्गुण है और द्वैत में सगुण परब्रह्मन है। अद्वैत, वेदांत का एक मत है, इसी प्रकार वेदांत के अनेक मत है जिनमें आपसी विरोधाभास है परंतु अन्य पांच दर्शन शास्त्रों में कोई विरोधाभास नहीं।  वैष्णव और शैव सम्प्रदायों में क्रमशः विष्णु तथा शिव को परब्रह्म माना गया है।

अपरब्रह्म ब्रह्म का वो रूप है, जिसमें अनन्त शुभ गुण हैं। वो पूजा का विषय है, इसलिये उसे ही ईश्वर माना जाता है। 

ब्रह्मन, ब्रह्म का ही न्यूट्रल जेंडर है। ब्रह्मन कभी भी बहुवचन के रूप में प्रयोग नहीं हो सकता। ब्रह्मन और ब्रह्म वैदिक संस्कृत में उपयोग हुआ है जबकि ब्रह्म और ब्रह्मा उत्तरवैदिक संस्कृत में। ब्रह्मन ब्रह्माण्ड का सबसे बड़ा सिद्धान्त है। ब्रह्म कभी-कभी सगुण ब्रह्म के लिए प्रयोग होता है, जैसे गीता में श्रीकृष्ण के लिए हुआ है। जबकि ब्रह्मन पूर्ण रूप से निराकार, निरगुण का बोध कराता है, दार्शनिक और वैदांतिक रूप से। यह परम तत्त्व/सत्य, निराकार, निर्गुण, अनन्त है.

[Brahman is the highest universal principle, the Ultimate reality of the universe. It is a gender-neutral concept and the supreme self. It is the immaterial, efficient, formal and final cause of all that exists. In the Upanishads (mentioned in Vedas also) and later philosophies it means That from which all existence proceeds and to which everything returns; the origin and cause of all that exists. Brahman is discussed in Hinduism in relation to the concept of आत्मन् (Self), personal, impersonal or Para Brahman, or in various combinations of these qualities depending on the philosophical school. 

ब्रह्मा, त्रिमूत्री भगवानों/देवताओं में से एक है। 


शिवलिंग का अर्थ
 
लिंगपूजा का प्रथम स्पष्ट प्रमाण मत्स्यपुराण में मिलता है। महाभारत के अनुशाशन पर्व में भी लिंगपूजा का उल्लेख है। वेदो में लिंग पूजा नही है।

शिवलिंग अर्थात शिव का लिंग। शिव आप जानते ही है कि कोई अलग देवता या भगवान नहीं बल्कि उस एक ईश्वर की ही संहार या कल्याण करने की विशेषता का नाम है। लिंग का अर्थ होता है चिन्ह या प्रतीक। जैसे स्त्रीलिंग का मतलब कोई अंग नहीं बल्कि स्त्री रूप को बोध करवाने वाला कोई भी प्रतीक। तभी तो नदी आदि प्रयेक वस्तुओं के स्त्रीलिंग होते है। ऐसे ही पुर्लिंग होते है। योनि का अर्थ भी अंग विशेष ही नहीं बल्कि स्थायी घर और प्रजातियां भी होता है। जैसे अनेक योनियां में जन्म लेना कहा जाता है।

इसलिए शिव लिंग, शरीर का अंग नहीं बल्कि शिव के प्रतीक यानी ईश्वर के प्रतीक या चिन्ह होता है जो संसार के कोने कोने में, आसमान से पाताल तक बिखरे हुए है जिन्हें देख कर या महससू करके उस ईश्वर की असीमता का बोध होता है। जैसे इस्लााम में शब्द आयातुल्लाह हैै यानी अल्लाह की आयात या निशानी। शिवलिंग शब्द वेदों में है ही नहीं है। उपनिषदों में लिंग शब्द का अर्थ प्रत्येक जगह चिन्ह या प्रतीक के रूप में आया है, बिना किसी अपवाद के। मुण्डकोपनिषद:3:2:4  में लिखे लिंग शब्द का अर्थ चिन्ह ही है।

वैसे भी वेद, उपनिषद ईश्वर को अकायम कहते है यानी काया रहित या शरीर रहित, ईश्वर अंग को तो प्रश्न ही नहीं उठता। इसलिये शिव लिंग को शरीर का अंग मानना, ऐसी धारणा या मान्यता सीधा सीधा वैदिक ग्रंथों के विरुद्ध  हो जाएगी जो उचित हो ही नही सकता।  बहुत से बड़े विद्वान और आर्य समाज भी ऐसा ही मानता है और वेदों को ही परम प्रमाण कहते है।

■    यंहा मैं उन्ही का इस बारे में मत रख रहा हूँ की कैसे शिवलिंग सृष्टि में फैले उसके प्रतीकों की बजाय एक शरीर का अंग के रूप में मानां जाने लगा:-

"वेदों में अनेक जगह परमात्मा को एक ऐसे स्तम्भ के रूप में देखा गया है जो समस्त गुणों का आधार है। यही कारण है कि हिंदू मंदिरों और हिन्दू स्थापत्य कला में स्तम्भ या खंभे प्रचुर मात्रा में होते थे जो आज भी है। योग साधना भी अग्नि की लौ पर ध्यान केंद्रित करने का अभ्यास करने को कहती है, जो स्वयं शिवलिंगाकार है। इसका भी स्पष्ट आधार वेदों में मिलता है। शिवलिंग ऐसा लौकिक स्तंभ ही था जिस पर (अग्नि की लौ की तरह) ध्यान केंद्रित किया जाता था। यही कारण है कि शिवलिंग को ज्योतिर्लिंग भी कहा जाता है। ज्योति वह है जो आपके अंदर के अंधकार को दूर करके ईश्वर का प्रकाश फैला दे। इसलिए समय के साथ साथ शिवलिंग उसके प्रतीक की जगह एक अंग होता चला गया।"

■   लिंग शब्द का अर्थ पहचान के रूप में होता था। इसका अर्थ निशानी था। क्योंकि लड़का या लड़की की पहचान करने के लिए बच्चो के जिस अंग को देखा जाता था, उसे लिंग कहा जाने लगा। अक्सर कुछ नाम मशहूर हो जाते है जैसे अल्लाह या ख़ुदा नाम मशहूर है पर कबीर या अकबर नहीं। इसी तरह शिवलिंग शब्द उसकी मशहूर पहचान हो गया। शिवलिंग पहले मूलतः श्वेत रंग का होता था, एकदम चमकदार सफेद। समय के साथ साथ आज इसका रंग काला हो गया है।  भारत में आज भी सफेद शिवलिंग कंही कंही मंदिरों में मिलते है। दक्षिण भारत के मंदिरों में अन्य रंगों के भी मिलते है। दक्षिण ब्राह्मण कहते है कि एकदम से सफेद से काला कोई हो गया होगा, बीच में अन्य रंग में भी रहा होगा। अभिषेक करना वुज़ू है। शिवलिंग का 5 चीज़ों से अभिषेक किया जाता है दूध, दही, घी, शहद, पानी या शुगर, गन्ना आदि से। 
 
आदम को भारत में उतारा गया था और हव्वा को अरब में। हजरे अस्वद नामक पत्थर (अल्लाह की निशानी, आयतुल्लाह है) आदम के समय में समय में जन्नत से आया था। इसे आदम ने काबा में लगया था जो आज तक वंहा लगा हुआ है. हजरे अस्वद भी पहले सफेद रंग का था जिसे इंसानों ने छू - छू कर काला कर दिया।
 
■    रुद्र का अर्थ है बर्बाद करने वाला, रुलाने वाला। शिव का अर्थ है कल्याण करने वाला। सदाशिव का अर्थ है नित्य कल्याण करने वाला। शंकर का अर्थ है खुशियां देने वाला (अल बशीर) या कल्याण करने वाला। शंभु का अर्थ है आनंद स्वरूप वाला। भोलेनाथ का अर्थ है मासूमों का नाथ। आदिगुरु का अर्थ है सबसे पुराना गुरु। कैलाशवास का अर्थ है सलामती वाला घर। महादेव का अर्थ है सबसे अधिक देने वाला (देवो देवा)। हरि का अर्थ है हरण करने वाला, हरने वाला, भगवान, ईश्वर, विष्णु, इंद्र, सोम। हरि हरि महादेव (सुरक्षा करो हमारी, वहन या हरण करने वाला)
 
■  शिवलिंग रुपी किसी मत्स्य शिला या शालीग्राम नामक पत्थर का उल्लेख किसी प्रमुख ग्रंथ में नही है, और न ही किसी मनु कथा में है। नारायण शिला या शालीग्राम का उल्लेख ब्रह्मवैवर्त पुराण आदि में है (वो भी पूजा के लिए एक पत्थर के प्रयोग के रूप में)। ये पत्थर एक खास प्रकार का होता है जो शालिग्राम नदी में मिलता है, इसलिए इसका नाम ऐसा पड़ा और ये पत्थर पूजा के लिए लोकप्रिय हो गया। नारायण शिला से ही मत्स्य शिला शब्द बहुत बाद में पैदा हुआ लगता हैं। क्योंकि मनु की कथा को पुराणों में नारायण से जोड़ा गया है और विष्णु से भी, शायद इसलिए नारायण शिला को मत्स्य शिला भी कहा जाने लगा होगा। शिव लिंग या प्रतीक का इससे कोई संबंध नज़र नहीं आता है क्योंकि शिवलिंग प्राचीन है, ये शिला या शालीग्राम बाद की उत्पत्ति। नारायण शब्द ब्राह्मण ग्रंथों व उपनिदों के समय की उत्पत्ती है। विष्णु नाम वेदों में आता है, जो असल में ब्रह्म का एक गुणात्मक नाम था। वेदों के बाद, निराकार ब्रह्म को नारायण कहा जाने लगा और ब्रह्म के साकार स्वरूप को विष्णु कहा जाने लगा.
 
 
अलख निरंजन 
 
अलख (अदृश्य, अलक्ष्य) निरंजन (दुर्गुण रहित, गुण दोष रहित, अज्ञानता का नाश) गुरु गोरखनाथ का वाक्य है। जिसे कोई भेद न सके या जिसे देखा न जा सके। ईश्वर का नाम ही है। मगर अधिकतर लोग और नाथ सम्प्रदाय के लोग इसे शिव के निराकार रूप के लिए प्रयोग करते हैं।
 
नारायण
 
नारायण का शाब्दिक अर्थ है जिसमें सभी नर (जीव) स्थित हों और जिससे वे उत्पन्न हों. निर्गुण-निराकार परब्रह्म , नारायण है और सगुण ब्रहम ईश्वर है. सृष्टि की उत्पति नारायण से हुई इसलिए इस नारायण को विष्णु भी कहा गया (पुराणों में). 
 
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