Thursday, 4 June 2020

सनातन धर्म - भाग 3 (अस्तित्व, धारणाएं और प्रथाएं - इस्लाम के समानांतर)

देवता फ़रिश्ते, भूत प्रेत आत्मा जिन्न, लोक परलोक, प्रलय क़यामत, माईथोलोजिकल कैरेक्टरस, इस्लाम के 5 ख़म्बे, मक्का मक्तेश्वर।




देवता और फ़रिश्ते।

देवता देव का बहुवचन है। देव शब्द बना है दिव्य से जिसका अर्थ होता है दिव्यमाम होना, प्रकाशमान होना, चमकना या रोशनी। यानी देवता मतलब है कोई पारलौकिक शक्ति। इसलिए अचानक प्रकट हुए शक्ति प्रकाश को दैवीय शक्ति प्रकट होना भी कहते है।  देवताओं का स्थान देवलोक माना जाता है यानी जैसे स्वर्ग। प्रकाश स्वयं का नही होता बल्कि किसी और वस्तु का होता है या उससे निकलता है। उसी प्रकार ये देवतागण, खुद उत्पन्न नहीं हुए है बल्की ईश्वर के द्वारा बनाये गए है। देव के अर्थ देने वाला भी होता है। इसीलिए ईश्वर को देवो का देव भी कहते है यानी सबसे अधिक और सबसे अच्छा देने वाला। एक मत है कि देवता कई प्रकार के है और एक मत है कि वो करोड़ो है। वेदों ने जिन देवताओ का उल्लेख आता है वे सभी ईश्वर की अपनी शक्तियां थी जिसे अलग देवता बना कर, अलग स्वरूप दे दिया गया उत्तर वैदिक काल में। और उसके बाद पौराणिक काल में, इन्ही देवताओ की शक्तियां भी देवी बन गयी। देवताओं की शक्तियों को स्त्रीलिंग में परिवर्तित करके उनकी पत्नियां बना दिया गया।

जैसे देवताओ का अस्तित्व प्रकाश से संबंधित है जो देवलोक, स्वर्ग में रहते है और कुछ विशेष शक्ति रखते है। फ़रिश्ते भी नूर, रोशनी, प्रकाश से बनाये गए है। सब जानते है की फरिश्ते अल्लाह के नज़दीक भी रहते है, आसमानों पर भी, अलग जहान में भी। फरिश्तों को एक खास ताक़त, काम या विशेषता का चार्ज दे रखा है। 

यमराज जो मौत का देवता है। इसे कर्म जांचने और अन्य कई काम मृत्यु से संबंधित सौंप रखे है। यमराज के नीचे कोई चार दूत होते हैं जो आत्मा निकालने का, ले जाने आदि का कार्य करते है। इन्हें यमदूत कहते है।  ऐसे ही मलाकुल मौत (अज़राइल भी कहा जाता है) है जो मौत के फरिश्ते हैं। और उनके साथ कई और फ़रिश्ते है जैसे मुनकर नकीर फरिश्ते है जो कब्र में सवाल करेंगे। नाज़िअत और नाशिअत मौत से संबंधित फ़रिश्ते है को मलाकुल मौत के तहत रहते है। मालिक नामक फ़रिश्ता नर्क का रखवाला है, लगभग 19 फरिश्तें नरक पर नियुक्त हैं।

चित्रगुप्त का भी देवताओं में स्थान आता है जो कर्मों का लेखा जोखा रखता है। किरामन कातीबीन (मतलब जो बहुत बुज़ुर्ग और रेकॉर्डर हैं) फरिश्ते जो इंसानों के अमालों, कामों का हिसाब किताब रखते है। ये सब सिफती या गुणात्मक नाम हैं
 
हिन्दू धर्म कहता है कि मरने के बाद वैतरणी नदी (जिसमें खौलता हुआ पानी होता है) को पार करना होता है. जबकि इस्लाम धर्म कहता है कि पुल सिरात को पार करना होता है.
 

नारदमुनि भी एक देवता है जो विष्णु के भक्त है और ब्रह्म के पुत्र है। इनकी सवारी बादल है और निवास ब्रह्मलोक है। इनका काम कथा वाचन और समाचार सुनाना है। इनका काम ज्ञान देना, सत्य बताना और डराना भी है। नारद का अर्थ आत्मज्ञान देना भी होता है। इन्हें संतो का देवता भी कहा जाता है। आपको इनमे और फरिश्ते जिब्रील में कुछ समानता तो मिल ही जाएगी। या फरिश्ता हबीब जो मुसलमानों को सलाह देने और दुआ करने का काम करते है।

मालिक, ज़बानीया जहनुम के फ़रिश्ते है और कलक़ाइल, मिखाइल, इसराफिल आदि जन्नत के फ़रिश्ते है. कारुबिययिन और हमलातअल अर्श कुछ और फ़रिश्ते है।
 
हारूत और मारूत नामक फ़रिश्तें लोगों को जादू सिखाते थे. माया और तंत्र की देवीयों में मुख्य रूप से दुर्गा, काली, माया आदि शामिल हैं (हालाँकि इनमें बेहद अंतरभी है)।
 
इस्लाम के मुताबिक पहाड़ों, समुन्द्र, बारिश के फरिश्तें होते हैं. मीकाईल को वर्षा (संभवत बादल, हवा भी) और वनस्पति (vegetation, plant growth) का प्रभारी नियुक्त किया गया है. पहाड़ों के फ़रिश्ते मलकुल - जिबाल (पर्वतों का फ़रिश्ता) को माना जाता है. वरुण को समुद्र, जल, और ऋत (cosmic order) का देवता माना जाता है और उन्हें लोकपाल (दिशाओं के रक्षक) में पश्चिम दिशा का अधिपति माना गया। इन्द्र को वर्षा, बादल, आकाशीय बिजली, वज्र (thunderbolt) और युद्ध का देवता माना जाता है। 
 
 
 

भूत, प्रेत, आत्मा और जिन्न।

इस्लाम की तरह जिन्न का कॉन्सेट हिन्दू धर्म मे नही है। हालांकि भूत, प्रेत और आत्मा का है। आत्मा, यानी रूह यानी जो शरीर की जान या प्राण है।  इसलिए आत्मा, भूत प्रेत से अलग है। भूत प्रेत असल में जिन्न हो सकते हैं जिनकी एक अलग दुनिया है। भूत प्रेत से हिन्दू भाई भी डरते है और आमतौर पर मुसलमान जिन्न से डरते है। किस्से कहानियां है भूत प्रेत की जैसे जिन्नों की भी है। कभी कभार जिन्न, भूत प्रेत लोगों के शरीरी पर असर डालते हैं। कई ग्रंथ जैसे गरुड़ पुराण में भूत प्रेत की बातें है और आत्मा की भी। ऐसा लगता है की बाकी चीजों की तरह, इन तीनों को यंहा भी मिक्स कर दिया गया है यानी गडमड कर दिया गया है।

रही बात पिशाच, दैत्य, दानव, राक्षस, चंडाल, असुर, अनार्य  आदि की तो इनमें से अधिकतर प्राचीन भारत की मूलनिवासी जातियां याा समुदाय थे (जंगलों में रहने वाले, आदिवासी आदि) जिन्हें एक गलत मंशा के तहत बुरे स्वरूप में ग्रन्थों में दिखाया गया जो सुरों या आर्यों से लड़ा करती थी।

हालांकि आर्य समाज का मानना है कि प्रेत और भूत दोनों मृतक को ही कहा जाता है।
 

याजूज माजूज और कोक विकोक।

पुराणो में याजूज माजूज की तरह दो नाम कोक विकोक के आते है। भविष्यपुराण में भी इनका उल्लेख है और इनके बारे में भविष्यवाणियां कल्कि पुराण में भी आई है। ये दो जुड़वा महाशक्तिशाली भाई होंगे जो महाप्रलय के समीप कल्कि अवतार के विरुद्ध युद्ध करेंगे और इनको हराना बहुत कठिन होगा। ये शकुनि के पोते और बकासुर के पुत्र होंगे।



दज्जाल और अन्धकासुर।

इस्लाम के दज्जाल, ईसाइयत के एन्टी क्राइस्ट और यहूदियत के Armilus की तरह ही सनातम धर्म में एक अंधकासुर या अंधकआसुर नाम का पात्र आता है जो एक दैत्य है। अंधक मतलब अंधे की तरह या अंधेरा फैलाने वाला और आसुर का एक अर्थ है बाद में आने वाला। हरिवंशपुराण में इसका उल्लेख दंतकथा शैली में है जो एक अतीत की घटना की तरह वर्णित है जिसमे कहा गया है कि वह अहंकार के कारण अंधे के समान चलता था। मंदराचल (मक्के) में मंदार पर्वत (मक्के की पहाड़ियां), शिव द्वारा निर्मित एक उच्च जगह है। अन्धकासुर बहुत से दैत्यों (शैतानों) के साथ वंहा पहुंच कर पर्वत से कहता है कि मुझे मेरे पिता द्वारा न मारे जाने का वर प्राप्त है (क़यामत तक की मुहलत)। फिर भूतेश्वर भगवान रुद्र, प्रथम गण (पहली उम्मत), भूतगणों (दूसरी उम्मत) के साथ मिलकर त्रिशूल (अल्लाह अरबी शब्द का लिखित संकेत) लेकर उसे मार डालते है। इस पात्र के कई कथा संस्करण है, अलग अलग पुराणों में।



शैतान, इब्लीस और कलि।

शैतान या इब्लीस जैसा एक अस्तित्व हिन्दू मत में कलि का है जो सारी बुराई की स्रोत है। इसकी भी कई कथाएं है। कलि, कल्कि अवतार का दुश्मन है और इसका अंत कल्कि अवतार द्वार होना है। कलियुग का नाम भी दरअसल इसी कलि के नाम पर है, जिस समय में बुराई और असत्य हर तरफ फैला होगा। कल्कि पुराण कहता है कि कलि ने ब्रह्मा की पीठ से जन्म लिया और इसकी संतानों की संतानें भी है जो बुराई को नियंत्रित करती है। इसके परिवार वाले मनुष्यों का रूप लेके धरती पर भी पैदा होते और लोगों के मन को भटकाने का काम करते है। कलि के सेनापति कोक विकोक ही है।

महाभारत में है कि गंधर्व (देवलौकिक पुरुष प्रकृति आत्मा) कलि, राजकुमारी दमयंती के स्वयंवर में देर से पहुंचता है और दमयंती नल को अपना पति चुन लेती है। ये देख कर कलि को क्रोध आता है और वो नल से बदला लेने का प्रण करता है और इसी कार्य पर लगा रहता है। एक अन्य कथा में राजा परीक्षित जंगल मे शिकार करने जाता है वंहा कलि, राजा से उसके राज्य में घुसने की अनुमति मांगता है और अनुमति नही मिलने पर राजा के मुकुट में घुस कर राजा के विचारों को दुषित कर देता है। आगे जाकर राजा को एक साधु गहरी साधना में मग्न मिलता है। जब राजा के उस साधु से बात करने के कई प्रयत्न असफल हो जाते है तो राजा गुस्से में साधु के गले में एक मरा हुआ सांप डाल देता है। बाद में ये सब सब जानकार साधु का बेटा, राजा को श्राप देता है कि उसे सांप ही काटेगा और राजा सांप के काटने से मर जाता है।



आसमान, लोक, जन्नत, जहन्नुम, स्वर्ग, नर्क।

इस्लाम कहता है कि कुल 7 आसमान है। सनातन धर्म भी कहता है कि 7 लोक है। जिनको 2 भागों में बंटा गया है। एक है कृतक लोक जिनका विनाश हो जाता है जैसे, भूलोक (धरती), भुवर्लोक (आकाश), स्वर्लोक (अंतरिक्ष)। दूसरा है अकृतक लोक है जंहा प्रलय नहीं आती जैसे महर्लोक (जंहा आत्माएं रहती है), जनलोक, तपलोक, सत्यलोक। ये सभी एक के ऊपर एक स्तिथ है। पहले भाग को ही त्रिलोक कहा जाता है और दूसरे वाले को ब्रह्मलोक।  7 स्वर्गलोक का सिद्धांत यहूदी और इसाई धर्मो में भी मान्य है। 7 स्वर्गलोक का ज़िक्र मेसापोटामिया प्राचीनतम सभ्यता में भी पाया गया है।  पुराण धरती के गर्भ में 7 लोको का वर्णन भी करते है जैसे रसातल और पाताल। इस्लाम मे भी 7 जहन्नुम की बात कही जाती है। यंहा तक कि जैनधर्म भी 7 धरती यानी नरकों के बारे में कहता है। जैन कहते है कि कुछ लोग मर के अधोलोक में जांयगे जो धरती के नीचे है जंहा 7 नरक है।

सनातन धर्म में 16 स्वर्ग बातए गए है। जैन धर्म भी कहता है कि कुछ उद्धोलोक में जांयगे जो ऊपर की तरफ जंहा 16 स्वर्ग है। नरक और स्वर्ग के कई प्रकार है जो सत्कर्मों के कम या ज़्यादा होने के अनुसार मिलते है। ऐसे ही बैकुंठ एक तरह का स्वर्ग है जो बहुत अच्छे कर्म वाले को मिलता है। बैकुंठ यानी जंहा कुण्ठा न हो यानी दुख न हो। यंहा विष्णु रहते है। राम जी बैकुंठ में है। कई तीर्थ के नाम भी इसलिए बैकुंठ रख देते है। बेसिकली स्वर्गों को अलग अलग बांट रखा है। जैसे मुसलमानों में  जन्नत के कई दर्जे होते है। कुछ अन्य स्वर्गों के नाम है, परधाम।
 
बोद्धर्म में भी ईहलोक और परलोक का वर्णन मिलता है। सिख धर्म, पारसी धर्म और ईसाइयत,यहूदियत में भी स्वर्ग नरक की मान्यता है.




बरज़ख़ और पितृलोक।

इहलोक (धरती) और परलोक के अलावा एक तीसरे बीच वाला लोक भी है जिसका नाम है संध्या। वह निद्रा का स्थान है। इस मध्यवर्ति स्थान से पुरूष दोनों लोकों का दर्शन करता है। इसे पितरलोक भी कहा गया है। इस्लाम मे बरज़ख़ भी एक ऐसी ही लोक अवस्था है जो जन्नत और जहन्नुम में पहुंचने से पहले का मुक़ाम है।  बरज़ख़ को ही आलमे अरबा भी कहते है। इसके अलावा, अथर्व वेद कहता है कि हमारे पितर, धरती और स्वर्ग नर्क से परे उस तीसरे स्थान ( प्रद्यौ ) में रहते है। इस्लाम के अनुसार अंतिम दिन तक आत्माएं बरजख (क़ुरान जिसे परदा कहता है) में है. शायद ''प्रद्यौ'' शब्द ही ''परदा'' है.



क़यामत और प्रलय।

सनातन धर्म मे 4 प्रलय है। पहली है नित्य प्रलय जो जीवों की सामान्य मृत्यु का ही नाम है। प्राकृतिक आपदा जैसे तूफान, बाढ़ आदि भी इसका उदाहरण है। दूसरी है  आत्यंतिक प्रलय जो मोक्ष प्राप्त होने वाली मृत्यु है। तीसरी है नैमित्तिक प्रलय जो एक कल्प  (4 हज़ार युग या 4 अरब साल) यानी ब्रह्मा के एक दिन के बाद होती है जिसमे तीनों लोकों, पृथ्वी, अन्य ग्रहों का अंत हो जाता है। सूरज से आग बरसती है, फिर जीवन की दुबारा शुरवात होती है। सबसे महत्वपूर्ण है चौथी प्राकृत प्रलय जो सबसे बड़ी प्रलय है। ये ब्रह्मा की आयु पूरी होने यानी ब्रह्मा के 100 वर्ष के बाद होती है जिसमे सम्पूर्ण ब्रह्मण्ड नष्ट हो जाता है, कुछ भी नहीं बचता है। प्रकति भी ब्रह्मा में लीन हो जाती है। सिर्फ अंधकार बचता है। यही इस्लाम मे कयामत के स्वरूप से मिलती है। 



नमाज़ और योग।

यह एक मानसिक और शारीरिक इबादत है। नमाज़ कर लिए अरबी शब्द सलाह है। नमाज़ शब्द संस्कृत भाषा से निकला है जिसका अर्थ है अजन्मे को नमन। जबकि सलाह शब्द बना है सिलह या सिल्ला से जिसका मतलब होता है to connect या जमा करना। यानी सलाह जो खुदा से जोड़ दे। इसी तरह योग का अर्थ भी जोड़ना या जुड़ना होता है। हम जानते है कि योग मानसिक और शरीरिक दोनों रूप से बहुत लाभदायक है जिसमें ध्यान भी किया जाता है। सजदा और साष्टांग (दंडवत एक अलग आसन है) एक ही अवस्था के दो नाम हैं। इसी अवस्था को ईसाई ऑर्थोडॉक्स प्रोस्ट्रेशन, यहूदी कराईट बोविंग, सिख मत्था टेकना कहते है। बोद्धर्म में यही पाली भाषा में पानीपता और जैनधर्म में णमोकार कहलाया जाता है। बौद्धधर्म में विपश्यना एक प्रकार का मानसिक और शरीरिक व्यायाम है। वैदिक काल में इबादत के लिए उपासना व संध्या शब्द प्रयोग होते थे। संध्या दिन में कई समय होती थी। आज भी मुख्यता 3 बार संध्या करना अनिवार्य है और आज भी दिन में 5 बार भजन करने का नियम है। यहूदी, ईसाई, पारसी धर्मों, मेंडिसम, सिक्ख धर्म में भी दिन में अलग अलग संख्या में यानी 3-7 बार प्रार्थना करने का आदेश है। दोनों हाथ ऊपर उठा कर दुवा करते हुए लोगों के 3000 वर्ष पुराने चित्र आज इराक में मिल चुके हैं।
(इस विषय पर अधिक जानकारी के लिये एक अन्य ब्लॉग देखें।)



रोज़ा और उपवास।

इस्लाम में रोज़ा या सौम होता है। रोजा शब्द फ़ारसीयों या मजूसियो में या आतिशपरस्तों का दिया हुआ है। सौम रखने का अंतिम उद्देश्य अल्लाह का क़ुर्ब या निकटता हासिल करना होता हैं। ऐसे ही सनातन धर्म में व्रत या उपवास होता है। ग्रंथों में असली नाम उपवास आया है। उप मतलब होता है छोटा, किसी और, पास का या समीप । वास का अर्थ है रहना। उपवास का अर्थ है निकट रहना। यानी उसके पास आ जाना या उसकी क़ुरबत में आ जाना। उपवास में कुछ भी नही खाया जाता। सनातन धर्म में 3 प्रकार के व्रत होते है। व्रत का मूल अर्थ प्रतिज्ञा करना होता है। नित्त व्रत वो है जो ज़रूरी है और न रखो तो दोष मिलता है। नैमित्तिक, पाप माफी के लिए रखे जाते है। और काम्य व्रत, कामनाए मनवाने के लिए रखे जाते है। मुसलमन अक्सर नफिल (ऑप्शनल) रोज़े भी रखते है और कभी कभी गुनाह माफ करवाने के बदले दंड स्वरूप कफ़्फ़ारा के रोज़े भी रखते है।


हज और तीर्थ।

हज की तरह ही सनातन धर्म में तीर्थ पर जाना होता है। दोनों की परंपराओं में कई समानता है। जैसे हज और तीर्थ के समय बिना सिले हुए 2 कपड़े लपेटना, हज में बाल मुंडवाना या कम से कम, थोड़े बाल काटना या छोटे करवा लेना। यंहा हिन्दू लोग मुंडन करवाते है। थोड़ी सी चोटी भी छोड़ देते है। हज में नंगे पैर चलना या पंजा खुली हुई यानी सिर्फ तले वाली चप्पल पहनना है (जो पहले होता था, अब तो हवाई चप्पल पहनने की इजाज़त है) । यंहा हिन्दू खड़ाऊ पहनते आये है। तवाफ़ को यंहा परिक्रमा करना कहते है।

 
 
ज़कात और दान।

इस्लाम में ज़कात देने का हुक्म है (क़ुरान: सूरह बक़रह: 42)। सनातन संस्कृति में ऐसे ही दान दिया जाता है। ईशोपनिषद में इसे ही "तने व्यक्तेन भूंजीथ:" से संबोधित किया गया है यानी चीज़ों और धन को केवल उतना ही संचय करना चाहिए जितना उयोगी हो, लालच नहीं करना चाहिए। जैन धर्म मे इसे ही अपरिग्रह कहते है अर्थात वस्तुओं को संचित नही करना है और अत्यधिक चीजों को त्याग देना है। बाइबिल भी कहती है कि “Freely you have received, freely give" (Matthew: 10:8).
 
 

मक्का, काबा और इलास्पद, पृथ्वीनाभा।

सनातनी ग्रंथों में कुछ स्थानों के नाम आते हैं जैसे इलास्पद - यानी ईश्वर का स्थान (ईल, ईल्य, इलाया शब्द संस्कृत में ईश्वर के लिए प्रयोग हुए है और पद का मतलब है स्थान)।  इलायास्पद - इसका अर्थ इलास्पद ही है। (इसे पृथिवी का पवित्र स्थान भी कहा जाता है)।  नाभा पृथिव्या - यानी नाफ़े ज़मीन। किसी भी इस्लामिक प्रमाणिक ग्रंथ में काबा को नाफ़े ज़मीन नहीं कहा गया। मुस्लिम द्वारा इस शब्द का इस्तेमाल बाहर से लिया गया मालूम पड़ता है। नाभि कमल - यह वह तीर्थ है जहां से सृष्टि की उत्त्पत्ति का आरंभ हुआ। आदिपुष्कर तीर्थ - यानी पालन पोषण करने वाला सबके प्राचीन तीर्थ।  दारू काबन - जंगलो की मां या वह वन जो तीर्थ हो। मक्तेश्वर - इसे मक्तेश्वर बक्का भी कहा गया है। इसके बारे में लिखा है कि ये तीर्थ देश में नहीं है। इसका अर्थ होता है ईश्वर का मक्का या ईश्वर के लिए यज्ञ की जगह। ये दुनिया मे कंहा है खुद सनातनियों को भी मालूम नहीं है या शायद अब लोग भूल चुके है। मक्का का अति प्राचीन नाम बक्का ही था।



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