Thursday, 4 June 2020

क्या सभी मांसाहार और जीव हत्या करते है।

मांसाहार और जीव हत्या।

मनुष्य, पशु, पक्षी, कीड़े, वनस्पति ये जब जीव है। जीव हत्या कई कारणों के लिए होती है, मांसहार के लिए, खाल- हड्डियों के लिए, शौकिया शिकार के लिये, जीवन व्यापन आदि आदि के लिए। जिसमे पोषण अधिक होता है जीव वही खाने के लिए भागता है। शेर कभी पत्ते खाने के लिए पेड़ पर नही चढ़ेगा पर बकरी चढ़ जाएगी। उसी तरह मनुष्य को ज़ुरूरत न होती तो वो मांस खाने को नही दौड़ता। इंसान की अगर मांस से भुख न मिटती तो वो इसे न खाता। दुनिया के प्रारंभ में ही मानव इसे खाना छोड़ देता, अगर मांस मानव शरीर के लिए नही बना होता। 

इतिहास, वर्तमान और भूगोल।

जानवरों को मांसाहार, सवारी और बोझा ढोने के लिये प्रयोग तो आदिकाल से हो रहा है। प्राचीन काल से ही विश्व और भारत में जानवरो की शिकार के नाम पर भी हत्या की जा रही है शौक के लिये।  जान ले लेना ही अत्याचार नही है बल्कि सवारी और बोझ ढोना भी असल में अत्याचार है।  विज्ञान कहता है कि जब मनुष्य आदिमानव था तब सभी मांसाहारी थे और बढ़ने वाले नाखून ही मांसाहार के लिए ही काम आए। 

आज भी ऐसी पहाड़ी, बर्फ़ीली, रेतीली जगह है जंहा वेज मिलना असम्भव है इसलिए वंहा हमेशा से ही मांसाहार होता आया है और होता रहेगा, ये प्रकृति के बनाये नियम है। जैसे एस्किमोज़ को सब्ज़ी नसीब नही हो सकती और आदिवासीयों का मांस के बिना जीना दुर्लभ हो जाए। अत्यधिक ठंडे, गर्म, पहाड़ी और समुद्री इलाको में मुख्य मांस, मछली, सी फ़ूड ही है। आज भी दुनिया मे अधिकतर मांसाहारी है। विश्व मे रोज़ 20 करोड़ से भी अधिक जीवों को खाने के लिए मारा जाता है। 

सरकार प्रायोजित जीवहत्या।

आज तक किसी देश की सरकार भी मांसहार पर प्रतिबंध नहीं लगा पायी और न लगा पाएगी क्योंकि ये जीवन का अंग है। भारत सबसे बड़ा बीफ निर्यातक देशों में से है। भारत में मीट इंडस्ट्री को सरकारें कई प्रकार की छूट और सुविधाएं देती है तभी तो बीफ एक्सपोर्ट में भारत टॉप पर है। भारत की 10 सबसे बड़ी बीफ निर्यात कंपनियों में ज़्यादातर गैर मुसलमानों की है। मोदी जी एक इंटरव्यू में खुद कह चुके है कि उनके कई जैन मित्र इस धंधे में है। जीव हत्या का जितना बड़ा कारण फ़ूड इंडस्ट्री है उतना ही बड़ा कारण लेदर इंडस्ट्री भी है।

जीव हत्या अगर अपराध है तो सरकार और समाज इसकी आज्ञा क्यो देता है।  कई प्रदशो में जैसे यूपी, एमपी, हिमाचल, उत्तराखण्ड, बिहार, राजस्थान, पंजाब, हरयाणा आदि में नीलगाय, जंगली सुवर को मारने की आज़ादी दी जाती है। हिमाचल में तो बंदर, सांभर, खरगोश, तोता, काला भालू तक को मारने की छूट मिलती है। बंगाल में हाथी, गोआ में मोर मारने की छूट दी जाती है। खेती को जानवरों द्वारा नुकसान पहुंचाने से बचाने के लिए जंगली जानवरों जैसे नीलगाय आदि को मारने के सरकारी नोटिफिकेशन बहुत से राज्य हर साल देते है जैसे UP, HP, पंजाब, गुजरात आदि।


धर्म और धार्मिक लोगों की स्तिथि

ताज़ा सर्वेक्षणों के अनुसार भारत मे 75% यानी 3/4 से भी अधिक जनसंख्या मांसाहारी है। मुसलमान तो 20% भी नही है तो बाकी 55% कौन से धर्म के लोग है ये। शराब पीकर या पीते हुए होटलों और बार्बीक़ुयु पर चिकन, मीट खाते सबसे ज़्यादा लोग हिन्दू समाज के ही मिलते है। 

भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में, बंगाल, नार्थ ईस्ट राज्यों, दक्षिण राज्यों, गोआ आदि में मांसाहार ही मुख्य भोजन है और तटीय इलाकों में मछली आदि सी फूड मुख्य भोजन है। सब जानते है कि बंगाली, मराठी, पहाड़ी और दक्षिण भारत क्षेत्र के ब्राहमण भी मांसाहारी होते है।

यहाँ तक की धुर्वीकरण और धर्म की राजनीति करने वाले बहुत से नेतागण तक मांसाहारी होते हैं और इनमें से कई नेता जो गोवा, नार्थ ईस्ट आदि राज्यों से हैं, वे बीफ भी सेवन करते हैं।

वैसे भारत में कई प्रकार के दलबदलू मांसाहारी भी पाए जाते है। कुछ सिर्फ नवरात्रों में मांस नहीं खाते है। कुछ सिर्फ मंगलवार को मांस नहीं खाते है। कुछ सिर्फ पार्टी में मांस खाते है। कुछ सिर्फ शराब पी कर खाते है। कुछ घर मे नही बनाते पर बाहर खा लेते है। कुछ बकरे, चिकन, मछली का मांस खाते है, बीफ आदि नही। कुछ सिर्फ चिकन खाते है। कुछ सिर्फ अंडा खाते है। कुछ सिर्फ अंडे वाला केक खा लेते है बाकी कुछ नहीं। पूरे भारत में नवरात्री में मांस की खपत कम हो जाती है और इसलिए रेट भी कम हो जाते है।

भारत, नेपाल में ही सेकड़ो मंदिरों में बलि का प्रचलन है। पिछड़ी जातियों के देवी आदि के मंन्दिरों में बलि प्रथा का प्रचलन है।  बंगाल में दुर्गा पूजा में प्रसाद मांस के रूप में होता है। नेपाल में हर वर्ष विश्व का सबसे बड़ा पशुबलि त्योहार मनाया जाता है। रांची के Ratu Fort में भैंसों की बलि दी जाती है दुर्गा पूजा पर।  मंगलोर के Sridurgambika मंदिर में, मदुरई के Pandi Muneeswarar मंदिर में,  Pauri के Bhukal Kalinka मंदिर में,  Bhubneshwari Devo मंदिर में, श्रीलंका में Munneswaram मंदिर में बलि होती है। गुड़गांव में एक मंदिर वार्षिक बलि के लिए प्रसिद्ध है। Bhawanipatna में Chattar Yatra में, Deodhani महोत्सव में बलियां दी जाती है।

जो ये कहते है कि भारत में मांसाहार कभी नही होता था, वो जान लें कि बलि शब्द संस्कृत का ही है जिसका अर्थ जीवहत्या है। मेधयज्ञ में मेध का अर्थ ही बलि है। अश्वमेध (घोड़ा), गौमेध (गाय), अजमेध (बकर) यज्ञ बहुत प्रचलित थे। नरमेध यज्ञ में मनुष्यों की आहुति दी जाती थी। नरबलि हिन्दू धर्म की ही कुप्रथा थी। काली मां और इष्टदेवों को प्रसन्न करने के लिए ही बलि या आहुति दी जाती है। ग्रंथो से पता लगता है कि यज्ञों में बलि का प्रावधान था। बलि और मांसाहार का उल्लेख पुराणों, स्मृतियों, महाभारत, रामायण, वेदों आदि और यंहा तक कि आयुर्वेद तक में मिलता है, भले ही आम हिन्दू ये नही जानता है। हालांकि अब बहुत से अर्थो को बदला जा रहा है परंतु फिर भी ये ग्रंथों में इतने व्यापक रूप से पाया जाता है कि आसानी से ज्ञात हो जाता है। सनातन धर्म में मांसहार तब बंद हुआ जब बौद्ध और जैन धर्म ने अहिंसा का प्रचार प्रसार शुरू किया जिसके प्रभाव में हिन्दू धर्म भी आया।

स्वामी विवेकानन्द ने स्पष्ट कहा है कि वैदिक काल मे मांसहार प्रचलन में था बल्कि गौमांस भी खाया जाता था। यही बात बाबा अम्बेडकर भी लिख कर गए है की मांसहार वैदिक काल का अभिन्न अंग था और ब्राह्मणों का भी। वीर सावरकर तक गौमांस को गलत नहीं मानते थे और स्वयं भी मांसाहारी थे। समकालीन राजनीतिज्ञ जानते है कि अटल बिहारी वाजपेयी जी को कबाब और झींगा बहुत पसंद था। आयुर्वेद में बहुत सी बीमारियों का इलाज बीफ आहार बताया गया है और चरक संहिता में कमज़ोरी और दुबलेपन का इलाज गौंमांस बताया गया है। सभी मुख्य धर्मों में मांसाहार का उल्लेख और अनुमति है, भले ही उनके अनुयायी अपने ग्रंथों में ये नहीं पढ़ पाते है। सर्वेपल्ली राधकृष्णन ने भारतीय दर्शन के प्रथम अध्याय में कहा है की वैदिक काल में बलि प्रथा आदि की बात कही जाती रही है। आर्य समाजी खुद मानते है कि सभी प्राचीन कर्मकांडी विद्वानों के वेद अनुवादों में मांसाहार का उल्लेख है जैसे सायण, उव्वट, महीधर आदि। सनातन धर्म के सभी ग्रंथों जैसे वेद, उपनिषद, पुराण, महाभारत, रामायण, स्मृति ग्रंथो में मांसाहार का वर्णन है। हालांकि अब इनके अर्थों पर एजेंडावादी लोगों के द्वारा लीपापोती की जाने लगी है।



मनुष्य और पशु शारीरिक रचना

प्राकृतिक तौर पर भी मनुष्यो को मांसहारी बनाया गया है। मांसाहारी जीवों के Canine teeth यानी नुकीले दांत होते है मांस काटने के लिए। शाकाहारी जीवों के Flat teeth यानी सपाट दांत होते है चबाने के लिए। पर मनुष्य में मिक्स्ड यानी ये दोनों तरह के दांत होते है क्योंकि वह सर्वाहारी है।

मांसाहारी जावनरों के जबड़े ऊपर नीचे चलते है। शाकाहारी जानवरों के जबड़े साइड की दिशाओं में चलते है। जबकि मनुष्य के जबड़े दोनों तरफ चलते है।

मांसाहारी जानवरों की पैदा होने पर आंखे बंद होती है, जो कुछ दिन तक बंद ही रहती है। जबकि शाकाहारी जानवर की आंखे पैदा होते ही खुली रहती है। पर मनुष्य पैदा होने पर रोशनी की चौंध के अनुसार आँखें बंद भी करता है और खोल कर भी रखता है।

मांसाहारी जानवरो की आंतें सिर्फ मांस को हजम कर सकती है और शाकाहारीयों की आंतें सिर्फ भाजी को। इसके उलट करने पर ये बीमार हो जाते है। परन्तु मनुष्य की आंत दोनों भोजन को हज़म कर सकता है।

मांसाहारी जानवरो की मुंह से निकली राल या enzymes, acidic होती है। शाकाहारियों की राल, alkaline यानी खारी होती है। मनुष्य की राल दोनों प्रकार की होती है ताकि दोनों तरह का भोजन आसानी से पचा सके।

मांसाहारी जानवरो जैसे कुत्ते की digestive track, intestine यानी आंत उसके शरीर से 5 से 6 गुना लंबी होती है।  शाकाहारी जावनरों जैसे भेड़ की आंत उनके शरीर के 27 गुना लम्बी होती है। पर मनुष्यो की आंत इन दोनों के बीच की लंबाई वाली यानी मानव शरीर के 10 से 20 गुना लंबी होती है यानी 20 मीटर।

मांसहारी जानवर पानी पीने के लिए ज़ुबान का और शाकाहारी जानवर होंठो का इस्तेमाल करते है। और मनुष्य पीने के लिए होठों का इस्तेमाल करता है पर चाटने वाली चीजों के लिए मनुष्य ज़ुबान का इस्तेमाल भी करता है।


मांसाहार के फायदे

विज्ञान बताता है कि जितना प्रोटीन और न्यूट्रिशन, मांस में एक ही जगह मिलता है, उतना एक ही जगह किसी अन्य भोजन में नहीँ मिलता है। मेडिकल साइंस और बच्चो की किताबों में अंडा, मछली, व्हाइट मीट पर ज़ोर दिया जाता है। यंहा तक की डॉक्टर भी बुड्ढे और गर्भवती आदि को मांस, अंडे खाने की सलाह देते हैं। बॉडी बिल्डिंग, स्पोर्ट्स आदि में मांस खाने को बढ़ावा दिया जाता है। विश्व में अधिकतर सफलता प्राप्त लोग, स्पोर्ट्समैन और रेसलर आदि मांसहारी होते है। 


मांसाहार के कुछ पक्ष और तर्क

अगर जानवरो को न काटा जाए तो दुनिया भर में इनकी आबादी इतनी हो जाएगी कि मानव को रहना मुश्किल हो सकता है।

अगर ईश्वर की दृष्टि में किसी जानवर की जान खाने के लिए लेना पाप ही होता तो ईश्वर मांसाहारी जानवर बनाता ही नहीं जैसे शेर, कुत्ता आदि।

आहार से किसी के व्यहार पर फ़र्क़ नहीं पड़ता है। क्यूंकि अधिकतर नोबेल पीस प्राइज विनर मांसाहारी ही रहे है। हिटलर और रावण शाकाहारी था। मदर टेरेसा और ईसा मसीह मांसाहारी थे। मांसहार का जीव की आवाज़ की कर्कशता पर भी असर नहीं पड़ता क्योंकि गधे की आवाज़ इतनी भद्दी होती है जबकि वो शाकाहारी है।

मांसाहार से बीमारी होने का चांस उतना है जितना घी, तेल, मख्खन आदि से बीमारी होने का चांस होता है। असल मे मूल कारण किसी भी चीज़ का अधिक सेवन या अति है।

सिकाई से पहले अंडे में कोई जानदार अस्तितव नही होता। न ही अंडा तोड़ने या खाने में किसी की हत्या या अंडे को दर्द होता है। फिर अंडा खाना किस तरफ हिंसा या दर्दनाक हो गया?

लैब या कल्चर्ड मीट बनाना शुरू हो चुका है। सिंगापुर ने सबसे पहले इसकी बिक्री को वैध घोषित कर दिया है। इसमे एक स्टेम सेल से बहुत से फाइबर्स बनाये जाते है। इसमे किसी जानवर की जान नहीं ली जाती और न किसी को दर्द होता है। ऐसे मांसाहार में शाकाहारीयों को क्या दिक्कत है। आखिर इसमें भी तो केवल सूक्ष्म बैक्टीरिया ही हैं।

कुछ प्रश्न और हैं? जैसे खून न निकले तो क्या जीव खा सकते हैं? यानी कोई भी छोटा जीव सीधे पेट मे निगल जाना। फड़फड़ाये नहीं तो क्या खा सकते हैं? जैसे बेहोश करके जीव को मारना। पेड़ पौधों में मानव की तरह ही सेंसेस होती है और पेड़ के फल अपनी वंशवृद्धि में सक्षम हैं तो फिर उन्हें खा कर उनका वंश क्यों समाप्त करते हो? जो भी जीव सामान्यतः खाये जाते है आज तक उन का अस्तित्व खतरे में नहीं पड़ा है बल्कि उनकी संख्या और पालन में अधिक वृद्धि हुई है क्योंकि  उनका सम्बंध भोजन और व्यवसाय से जुड़ा हुआ है। जड़ चेतन सिद्धांत जो ग्रंथो में लिखा है, वो हज़ारो साल पुराना है और फैल हो चुका है। 

बक़रा खा सकते हो तो सुव्वर भी खाया करो कहने वालों से उल्टा सवाल है कि अगर आप जाती में विवाह कर सकते हो तो गौत्र में भी कर लिया करो, आख़िर वो भी एक स्त्री ही होती है। हलाल किया हुआ जानवर खा सकते है तो झटके का भी खाया करो कहने वालों से उल्टा सवाल है कि मंत्रं और फेरों के बिना कोई स्त्री आपकी पत्नी बन जाएगी क्या। इनके ऐसे सवाल वापिस इन्हीं की ओर लौट जाते हैं।


शाकाहारियों द्वारा जीवहत्या

मांसहार और जीवहत्या के बिना जीना ही सम्भव नहीं है। जीव केवल जानवर ही नहीं होते हैं। जीव, सेल से बनते हैं, इनमें मूवमेंट होती है, इनमें आकार और संख्या बढ़ाने की योग्यता होती है। । ये adjustable, habitual नेचर के होते हैं। अंदरूनी और बाहरी घटनाओं की इन पर प्रतिक्रिया होती  है। जीव सांस, भोजन लेते है। इनसे उत्सर्जन होता है और हानिकारक पदार्थ बाहर निकालते है। बैक्टेरिया भी जीव ही है।

सांस लेते हुए अरबों बैक्टेरिया इंसान मुंह में ले जाता है। हमारे थूक, लार, दांतो के मेल में अनगिनत बैक्टीरिया होते है जिन्हें हम पेट मे ले जाते है।  

दही लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया के कारण ही जमती है। पानी में clostridium butyrium जीवाणु और दूध में bacterium lactici acidi जीवाणु होते है। अब तो ये भी साबित हो चुका है कि पानी में कई प्रकार का जीवन पैदा होता है जैसे बैक्टरिया, वायरस, फंगी आदि जो खुद को बढ़ाते रहते हैं। बल्कि पानी एक रिसर्च तो ये आयी है कि मानव इमोशन्स की तरह, पानी भी कई प्रकार के इमोशनल एक्सप्रेशन देता है जिन्हें आधुनिक उपकरणों से रिकॉर्ड किया गया।

खरबों जीव खेती के दौरान में मारे जाते है। कीटनाशक से जीवो का सफाया किया जाता है ताकि फसल उग सके। फार्मिंग इज़ द लार्जेस्ट किलिंग इंडस्ट्री। इनको मारे बिना फल सब्ज़ी उगाया ही नहीं जा सकती यानी किसी न किसी प्रकार हर मनुष्य जीव हत्या के लिए ज़िम्मेदार है।

आज विज्ञान ये साबित कर चुका है पेड़-पौधे में भी जान होती है। वो सुख- दुख भी महसूस करते है। वो चिल्लाते है, रोते भी है और यंहा तक कि डरते भी है जब उन्हें काटा जाने वाला होता है। पर हम उनकी आवाज़ इसलिए नहीं सुन पाते क्योंकि हम सिर्फ वही आवाज़ सुन पाते है जिसकी frequency 20 Hertz to 20K Hertz होती है। और प्लांट्स की आवाज़ 20 Hertz से कम होती है। पेड़ पौधों के परिवार भी होते है और पूर्वज भी। पेड़ पौधे अपनी जड़ों के द्वारा एक दूसरो से जुड़े भी रहते है और इन्ही जुड़ी हुई जड़ो के द्वारा संपर्क भी करते है जैसा अवतार फ़िल्म में दिखाया गया है। पूरा का पूरा जंगल आपस में जड़ों द्वारा जुड़ा होता है और जिनकी मुख्य बतचीत अपने सरवाइवल के बारे में होती है। पेड़ फलने फूलने में छोटों की मदद भी करते हैं। बल्कि कुछ बुरे पेड़ भी होते है जो जलन भी फील करते है और आसपास के पेड़ पौधों की तरफ आती धूप के रोकते हुए, खुद अपने शाखों पत्तो आदि पर पड़ने देते है ताकि दूसरो की बजाय खुद अधिक फल फूल सके। फल सब्जियां अनाज सब इन्ही से तोड़ कर मिलती है। 


जीवहत्या या मंसाहार बिना जीवन असंभव

अब तो ये साबित हो चुका है कि दूध, चीस, पनीर, दही और अन्य डेरी प्रोडक्ट्स भी मांसाहार का ही हिस्सा है तभी तो वेस्ट में लोग, वीगन (vegan) पद्धिति अपनाने लगे है जिसमे डेरी प्रोड्क्टड का भी सेवन नहीं किया जाता। पर अब वेगन के कई केस सामने आ चुके हैं जिसमे वे ऐसे आहार के कारण कुपोषण के शिकार हुए है।


गाय भैंस मांस है तो उनसे निकलने वाला दूध भी तो मांसाहार हुआ। दूध पीने वालों ने कभी सोचा कि दूध के लिए गाय, भैसों को कितना टॉर्चर किया जाता है। इंजेक्शन लागये जाते है तब इतना दूध निकलता है। बल्कि उस दूध पर जानवरो के बच्चो का हक़ भी नहीं होता। और फिर जब जानवर बूढ़ा हो जता है और उसे दूध निकाल निकाल कर चूस लिया जाता है तो पैसो के लिए उस कटने के लिए बेच दिया जाता है। रोज़ लोग दूध निकाल कर सड़क पर गाय को प्लास्टिक खाने को छोड देते है। गौशालाओं में बिना देखभाल के छोड़ देते है। सड़को पर गौरक्षक गाय की ही पैसे लेकर तस्करी करवाते है। नकली गौरक्षकों पर तो मोदी जी भी निशाना साध चुके है।

मधुमखियों के शहद को लूटना भी तो उनके साथ अन्याय है। पर मनुष्य को इसकी मनाही नहीं है। चौपाए जानवरो के दूध पर उनके बच्चो का पहला हक़ है पर उससे दूध लेने का भी मनुष्य को अधिकार दिया गया। 


तथाकथित शाकाहारियों से कुछ प्रश्न

क्या आप के कारण ही खेती में जीव, कीड़े आदि नही मरते है। क्या आप सब्ज़ी, फल खाते है। क्या अंडे वाला केक खाते हो। क्या दूध, दही, घी, पनीर, चीस खाते हो। आपके द्वारा पानी पीना और सांस लेना कितने जीवो को मारता है। कुछ अंजीर के फल भी मांसहारी माने जाते हैं.होता है. 

अगर जानवरों पर अत्याचार दलील है तो गाय का दूध और मधुमक्खी का शहध क्यों छीनना.

जीवहत्या का विरोध करने वाले ही आज लेदर के जूते, बेल्ट, पर्स, बैग, जैकेट, सीट- सोफा कवर खरीदते है। फर वाली टोपी, जैकेट खरीदते है। फर्नीचर प्रयोग करते हो। लकड़ी पेड़ो से आती है और पेड़ो में जान होती है। लड़की में दीमक मारक लगाते है। कीट नाशक रसोई, घर में डालते है। मच्छर, मक्खी, कॉकरोच, झिंगर, चींटी,खटमल, जुंवे, कीड़े, मकौड़े, छिपकली, चूहे आदि को मारने की दवाई डालते है। कोरोना वायरस मारने के लिए ना जाने क्या क्या इस्तेमाल किया। डेटोल, सेनिटाइज़र, हार्पिक का प्रयोग भी करते है। रेशम को बनाने के लिए रेशन के कीड़ों का मारा जाता है और शाकाहारी रेशन पहनते हैं। यानी हर व्यक्ति किसी न किसी प्रकार जीवहत्या कर रहा है। 

आज हम अच्छी तरह जानते है कि हड्डीयों का प्रयोग दवाईयां बनाने में होता है। जैसे मांस और खून से एन्टी बायोटिक बनाई जाती है। चीनी को पोलिश करने में हड्डियों का प्रयोग होता हैं। और 2 चमड़ों के बीच मे पीट पीट कर ही मिठाई पर लगाने वाले चांदी का वर्क बनाया जाता है। बोन चाइना क्राकरी बनाने में भी हड्डियों का मिश्रण प्रयोग होता है।और ऐसे ही न जाने कितने काम हैं जिनमें पुशुओं के अंगों का प्रयोग होता है मगर आम शाकाहारीयों को उनके बारे में जानकारी नहीं होती। जानकारी दे भी जाये तो वो इनसे प्रयोग से खुद को अलग नहीं कर पाते। आज की सच्चाई यही है कि मांसाहार से अछूता कोई नही है।


निष्कर्ष

ईश्वर न सही तो नेचर ने खुद कुछ प्राणियों को सिर्फ मांस खाने के लिए बनाया है, चाहे वो ज़मीन, पानी, आसमान कंही की भी हो। वो जिन्हें खाते हैं उनमें भी प्राण हैं। इस तरह इंसान भी एक प्राणी है और मांसाहार करता है। यही नेचर ने चाहा है। शाकाहारी होना नेचर की स्कीम के विरुद्ध है। हालांकि भावना अच्छी है कि न खाए मगर कोइ पाबंदी नहीं है।
 
अधर्मी और पापी कौन है ये तो उसके धर्म के अनुसार तय होगा। अगर ये मान भी लिया जाए कि हिन्दू धर्म मांसाहार को मना करता है तो मांस भक्षण करके, मांसहारी हिंदू, अधर्म पाप कर रहै है। दूसरे धर्म मांसभक्षण को पाप नही कहता तो उन्हें वो करने दो। हिन्दू अपने धर्म की बात नही मानते तो दूसरे को तो उसके धर्म की मानने दो। न ही लॉ के अनुसार मांस भक्षण मना है। मांसाहारी तो कोई कानून भी नही तोड़ रहे। इसलिए संविधान में दिये हुए इन धार्मिक अधिकारों का हनन किसी को नहीं करना चाहिए।
 
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Animal Killing and Eating.

Are you a pure vegetarian? Do you eat cake made of egg? Do you wear leather shoes, jacket, belt, have leather bags, seat covers? 

Do you know plants have life too, they even cry when we cut them, but we can't hear their voices because we humans can hear a sound frequency of 20 Hertz to 20k Hertz only. But plants have below 20 Hertz sounds. They even fear if one tries to pluck them, they try to go back from one's hand who wants to pluck them.  They also feel happiness and sorrows.  They even have families, and ancestors as today's science tells us.  They are connected to each by their roots under ground in  a place, by which they communicate with each other (as shown in Avtar Movie). They even feel jealous and try to get all the sunshine and prevents the other trees around them to not prospers.

Do you use wooden things or woods.  if yes, that's also killing of a creature like animals.  We also eat vegetable and plants, they also have life.  We even daily kill mosquitoes cockroaches, lizards, bees, flies, insects, lice in our hair.


वेदों में मांसाहार नहीं है, इतना बड़ा झूठ नहीं बोलना चहिए आपको, जबकि आप तो खुद को आर्य कह रहे हो। सनातन धर्म के प्रत्येक ग्रंथ, वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद, स्मृतियां, रामायण, महाभारत, पुराण और यंहा तक की आयुर्वेद तक में मांसाहार दिखा सकता हूँ।  सभी प्राचीन भाष्यकार जैसे सायण, उव्वट, महीधर के वेदार्थ में मांसाहार है। मनुस्मृति के व्याख्याकर कुल्लूकभट्ट या मेदातिथि के भाष्य भी मांसाहार से भरे है। आपके स्वामी दयानंद से पहले लगभग सभी की वेद भाष्य मांसाहार का जीता जागता उदाहरण थे और है।  इसलिए ये न कहो कि सनातन धर्म के ग्रंथों में मांसाहार नहीं है बल्कि ये कहो कि आपके स्वामी जी के भाष्य में मांसाहार नहीं है।

सनातन के विशुध्द स्वरूप को जानना है तो स्वामी जी की पूर्ववर्ती वेदार्थ से जानूँगा न। स्वामी जी तो मात्र 150 पहले साल वेदार्थ कर गये है। जबकि वेद तो लगभग 2 अरब पुराने मानते है आप। तो मैं सिर्फ 150 साल पुराना ज्ञान क्यों पढू। स्वामी जी से पहले वेद और सनातन बहुदेववाद, कर्मकांड और मांसाहार आदि आधारित था और आज भी है। स्वामी जी इस्लाम और ईसाईयत से प्रभावित होके वेद में एकेश्वरवाद डाल गए। इसी जोड़ तोड़ के कारण सभी सनातनी विद्वानों ने दयानंद वेदार्थ को मनघडंत कहा और अस्वीकार कर दिया। यही वजह है सनातन में आर्य समाज आज भी मुट्ठीभर का गिरोह है। अगर दयानंद भाष्य सही है तो दिखाओ मुझे स्वामी जी पहले किसी विद्वान ने एकेश्वरवादी भाष्य किया है? नहीं दिखा सकते। क्योंकि है ही नहीं। स्वामी जी मुसलमान और ईसाई बन रहे हिन्दुओ को रोकने के लिए वेद में एक ईश्वर लाए थे। आपके पूर्वजो ने या आपने तो मात्र 150 साल पुराना दयानंद धर्म स्वीकारा है, सनातन नहीं। क्योंकि सनातन अलग है और आर्य समाज अलग। इसलिए अपने 150 साल पुरानी अज्ञानता से निकलिए।
 

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इस्लाम शाकाहार या  वीगानिज्म को न तो प्रतिबंधित करता है और न ही अनिवार्य करता है। यह वनस्पति और मांस आधारित दोनों प्रकार के आहारों की अनुमति देता है, बशर्ते वे इस्लामी निर्देशों का पालन करें। ईद पर कुर्बानी अनिवार्य नहीं, बल्कि वैकल्पिक है। जो मुसलमान शाकाहारी होने के कारण कुर्बानी नहीं करता, उसके दीन पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसके अलावा, यह ज़रूरी नहीं है कि कुर्बानी देने वाला व्यक्ति भी इस मांस को खाए या मांसाहारी हो। कुर्बानी (ईद के दौरान कुर्बानी) एक सुन्नत है, या यूँ कहें कि एक नफ़्ल (अनिवार्य) इबादत है। शाकाहारी व्यक्ति के लिए इसे लगातार छोड़ना पाप नहीं है। इस्लाम किसी व्यक्ति के स्वभाव के विरुद्ध नफ़िल कर्मों को लागू नहीं करता। ईद पर कुर्बानी एक प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है जो अंततः मांसाहारियों को भोजन प्रदान करती है। इस्लाम पशु बलि या मांसाहार का आदेश देता है क्योंकि शुद्ध शाकाहारी होना न तो स्वाभाविक है और न ही संभव। शाकाहारियों को सोचना चाहिए और पशु हत्या के संबंध में मांसाहारियों को अन्यायपूर्ण कहना बंद करना चाहिए। हाँ, उन्हें पशु क्रूरता की आलोचना करने का अधिकार है, जो आजकल अत्यधिक मांसाहार के कारण एक बड़ी चिंता का विषय बन गया है। जानवरों को मारना निस्संदेह एक प्रकार की क्रूरता है। लेकिन अल्लाह ने इसे पोषण के उद्देश्य से अनुमति दी है। प्रकृति में, प्रजातियाँ जीवित रहने के लिए एक-दूसरे का शिकार करती हैं। अल्लाह ने प्रत्येक प्रजाति को एक उद्देश्य के साथ बनाया है। इसी प्रकार, इस्लाम में जानवरों की सवारी करना क्रूरता नहीं माना जाता है। हालाँकि, अनावश्यक रूप से जानवरों को मारना, पीटना, उन पर अत्यधिक बोझ डालना, या उन्हें भोजन या आराम न देकर उनकी उपेक्षा करना क्रूरता माना जाता है और इस्लाम में इसकी मनाही है। लोग अपने अत्यधिक मांसाहार के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार हैं, क्योंकि वे चटाखे  खोर हैं। पैगम्बर मोहम्मद ने पेट को सिर्फ़ एक तिहाई भरने का हुक्म दिया था, लेकिन मुसलमानों के लिए कोई सीमा नहीं है। इसलिए, जहाँ भोजन के लिए जानवरों को मारना जायज़ है, वहीं उन्हें क्रूर तरीकों से पालना जायज़ नहीं है। इसी प्रकार, मांस खाना जायज़ है, लेकिन केवल भोग-विलास के लिए उस पर अत्यधिक निर्भर रहना—खासकर जब शाकाहारी भोजन आसानी से उपलब्ध हो—क़यामत के दिन अल्लाह की नज़र में हिसाब किताब के अंतर्गत आ सकता है। यदि मांसाहारी आहार ग्लोबल वार्मिंग में योगदान करते हैं, तो यह मुसलमानों के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक ज़िम्मेदारी का विषय बन जाता है - न कि इस्लाम का एक सैद्धांतिक मुद्दा। यदि शाकाहारी या वीगन होना वास्तव में कई आधुनिक समस्याओं का समाधान कर सकता है, तो मुसलमानों को इसे यथासंभव अपनाने का प्रयास करना चाहिए। हालाँकि, विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, वीगनवाद पूर्ण पोषण संबंधी लाभ प्रदान करता है या नहीं, इस पर अभी भी बहस चल रही है। दूसरी ओर, शाकाहारी होने से कोई बड़ा नुकसान नहीं होता है और यह काफी हद तक सुरक्षित है। इस्लाम एक लचीला और अनुकूलनशील धर्म है—और इसके अनुयायियों को भी ऐसा ही होना चाहिए। यदि कोई ऐसे क्षेत्र में रहता है जहाँ शाकाहारी विकल्प सीमित या अनुपलब्ध हैं, तो मांस का सेवन व्यावहारिक और स्वीकार्य दोनों है। लेकिन आदर्श रूप से, जहाँ बेहतर विकल्प मौजूद हैं, वहाँ मांस का सेवन कम करना एक विचारशील और ज़िम्मेदाराना निर्णय हो सकता है। यह आदर्श रूप से अच्छा लगता है, लेकिन क्या इसे लागू किया जा सकता है, यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है।
 
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अगर किसी के कोई हाथ काट दे तो उस इन्सान के दिमाग को थोड़े वक्त बाद पता लगता है। बल्कि बेध्यानी में हाथ कट जाए तो और भी देर से पता लगता है। यही हाल ज़िबह में होता है. 



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