Thursday, 4 June 2020

बौद्धधर्म - भाग 1 (बुद्ध, अम्बेडकरवाद और नास्तिकता पर चर्चा)

बुद्धिज़्म और अम्बेडकरवाद पर प्रकाश

पाली भाषा में धर्म को धम्म कहते है क्योंकि पाली में र शब्द नहीं होता। वैदिक परंपरा एक अलग परम्परा है और श्रमण परंपरा एक अलग परंपरा। श्रमण के अग्रणी माने जाते हैं, बुद्ध व महावीर। इस परंपरा का आधार है कि स्वयं श्रम करके ही निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है न कि ब्रह्मा के द्वारा। हालाँकि इसी परंपरा के अंतर्गत समकालीन कई नास्तिक महापुरुष व भौतिकवादी दर्शन भी आते हैं जैसे लोकायत या चार्वाक, आजीविक और अज्ञान आदि।

बौद्ध धर्म का मूल मंत्र है:-
बुद्धम शरणं गच्छामी (मैं जागृत, Enlightened की शरण मे आता हूँ)।
धम्मम शरणं गच्छामी (मैं जीवन, महानियम की शरण मे आता हूँ)।
संघम शरणं गच्छामी (मैं सत्संगी, सत्यखोजी, साधकों, संगीसाधि, ध्यानामान, शिष्यो की शरण मे आता हूं)।

बुद्ध का एक प्रसिद्ध वाक्य है:-
अप्पो दीपो भव या अत्त दीपो: अर्थात अपना दीपक या प्रकाश स्वयं बनो।

शुद्र वर्ण

आज जो भारत में बुद्ध के मानने वाले है, वो अधिकतर तथाकथित शुद्र वर्ण या दलित जातियों या निचले वर्ग से हैं। इनक बौद्ध धर्म अपनाने का मुख्य कारण भेद भाव है। शूद्रों में पिछड़ी जातियां और आदिवासी आते है। शूद्रों में जो सबसे नीचे हैं उन्हें ही अछूत कहा गया है। सामान्यता, ये दलित कहलाये जाते हैं। ऐसा सिद्ध किया जाता है कि ब्राह्मणवादी लोग पहले शुद्रो के गले में हांडी और पीछे झाड़ू लटकवाया करते थे, वो अगर वेद मंत्र सुन लें तो पिघला हुआ सीसा उनके कान में डालने का और अगर मंत्र पढ़ लें तो जिह्वा काटने का आदेश होता था। ऋग्वेद कहता है कि ब्राह्मणों को ब्रह्मा ने अपने मुख से और शूद्रों को पांव से जन्म लिया। रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने लिखा है कि शुद्र तो ताड़ना के योग्य है, हालांकि इस चौपाई के शब्दों पर आज लीपापोती की जाती है। मनुस्मृति शूद्रों के दमन के आदेशों से भरी पड़ी है।

बाबा साहब अम्बेडकर ने शुद्र विरोधी होने के कारण मनुस्मृति को सार्वजनिक तौर पर जलाया था। बाबा अम्बेडकर ने 1956 में नागपुर में अपने 5 लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया था और इसके लिए 22 प्रतिज्ञा भी निर्धारित करके धारण करी थी। हालांकि बुद्ध धर्म का पूर्ण अध्ययन अनेकों वर्ष करने के बाद ही उन्होंने ये फैसला लिया था और उन्होंने बुद्ध धर्म के केवल वही सिद्धान्त अपनाये थे जो उन्हें सही लगे थे। ऐसे कहते हैं कि उन्होंने धर्मांतरण से पहले एक समय इस्लाम में भी रुचि दिखाई थी जो भारतीय मुस्लिम में भी जात पात (तुलनात्मक रूप से कम ही सही) होने के कारण खत्म हो गयी थी। हालांकि उनके लेखन में इस्लाम और मुस्लिम विरोधी कई बातें मौजूद हैं।

 बाबा साहब ने शिक्षा पर बहुत जोर दिया था। उनका वाक्य, "शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो", बहुत प्रसिद्ध है।

एकलव्य, शम्भुक, दशरथ जातक कथा, महिषासुर, होलिका, कृष्णा, शिव आदि की कथाओं के इन लोगों के संस्करण अलग ही कथा कहते हैं जिनमें कुछ सत्यता और तार्किकता भी प्रतीत होती है। शूद्रों में जो नास्तिक हैं, वो पेरियार स्वामी और ज्योतिबा फुले को बहुत मानते हैं। इनके अन्य आदर्श हैं- छत्रपति शिवाजी, शाहूजी महाराज, कांशीराम जी। वामन मेश्राम, मायावती, चंद्र शेखर आज़ाद 'रावण' आदि आज इनके नेता हैं। शूद्रों में कई जातियां है जो बाबा साहब को पूरी तरह अपना चुकी हैं और हिन्दू धर्म छोड़ चुकी है। 


दलित नास्तिकों से तर्क

दलित नास्तिकों में कबीरदास और गुरु रैदास या रविदास जी के लिए बड़ा सम्मान है, जबकि ये निराकार एकेश्वरवादी थे। वो ईश्वर को निर्गुण, सर्व्यापी मानते थे और मूर्तिविरोधी थे। 

उदाहरण:-
कबीर ने उसके बारे में कहा कि दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोई (ईश्वर का)।
कहे रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै। (ईश्वर भक्ति भाग्य से मिलती है)

दलित नास्तिक लोग ईश्वर, धर्म मानने वालों को मूर्ख मानते हैं जबकि ईश्वर, धर्म मानने और उनके प्रचार का संविधानिक मूल अधिकार बाबा साहब का ही दिया हुआ है। इस संविधानिक अधिकार को छीनना उनके सिद्धान्तों के विरुद्ध कार्य करने जैसा है। इसलिए किसी को ये अधिकार नही छीनना चाहिए, चाहे उन्हीं के मानने वाले नास्तिक लोग ही क्यों न हो।

दलित नास्तिक या बौद्ध धर्म शब्द से नफ़रत करते हैं, मगर स्वयं धर्म के लिए पाली भाषा का शब्द धम्म खूब प्रयोग करते हैं।

ईश्वर में विश्वास बहुत लोगों को बुराई से रोकता है कि मरने के बाद ईश्वर को जवाब देना है। पर नास्तिकता जवाबदेही खत्म कर देती है जिसके कारण अधिकतर मनुष्य केवल स्वार्थ अनुसार अपने लिए कार्य करते हैं, चाहे दूसरों का कितना भी नुकसान हो जाये। माओ, लेनिन, स्टालिन आदि नास्तिक थे और उन्होंने लाखों लोगों को मरवाया। अपराध रोकने का सबसे सफल कारण होता है, सज़ा का डर। पक्के अपराधी अक्सर कानून की सज़ा के डर से रुकते हैं और कच्चे अपराधी ईश्वर की सज़ा के डर से।

अगर नास्तिकता ही सत्य है तो कोई बुद्ध या अम्बेडकर का ही नास्तिकवाद क्यों अपनाएं? चार्वाक का क्यों नहीं? जब किसी को कर्मो का जवाब ही नहीं देना, जब स्वर्ग-नर्क ही नहीं है तो पूर्ण भौतिकवाद ही उसे जीवन में सुख दे सकता है, न कि बुद्ध की आचारशील जीवन पद्धति या अमेडकर की समाज सेवी जीवन शैली।

वैसे अगर मौत के बाद पता लगा कि एक और ज़िंदगी है या कोई बनाने वाला था। तो नास्तिकों के लिए पछताने के अलावा कोई रास्ता नही होगा यानी सिर्फ नुकसान होगा। पर एक आस्तिक के लिए ईश्वर अनुसार भली प्रकार जीवन जीने पर मृत्यु बाद में इनाम है। और अगर सिर्फ बहस के लिए मान भी लें कि कोई ईश्वर नहीं है, तब भी उस आस्तिक को मरने के बाद कोई नुकसान नहीं है।


बौद्धों से तर्क

जैसे किसी बौद्ध को ईश्वर से, ईश्वरीय धर्म से असहमति हो सकती है कि ये निर्वाण या मुक्ति का रास्ता नहीं है। ऐसे ही किसी को बुद्ध से, बौद्ध धर्म से भी असहमति हो सकती है कि ये निर्वाण का रास्ता नही है। ये दोनों लोग अगर बुद्धि और तर्कों से निर्णय करे तो इन्हें जो सही लगे वो उस विचार को मानें। 

बुद्ध ने मानवता की शिक्षा दी, यही शिक्षा तो ईश्वर ने भी दी। वे अच्छी शिक्षाओं का स्रोत बुद्ध को मानते हैं और आस्तिक लोग ईश्वर को मानते हैं। यानी एक बौद्ध नास्तिक और एक सच्चे आस्तिक में कोई अंतर नही। बौद्ध गण अच्छे कर्म का आदेश इसलिए मानते है कि बुद्ध ने कहा और आस्तिक इसलिए मानते हैं कि ईश्वर ने कहा।  मानवता और ईश्वरता में बारीक लाइन है।  आप बुद्ध की शिक्षाएं कल्याणकारी मानते हो। हम ईश्वर की शिक्षाओं को कल्याणकारी मानते हैं। सिर्फ स्रोत अलग हैं। दोनों शिक्षाएं मानवता से पूर्ण है। जो मानवता पर नहीं है वो सत्य शिक्षा है ही नहीं। सिर्फ आत्मा-परमात्मा आदि की बात छोड़कर ऐसे कौन सी अच्छी बात है जो कोई भी नेक इंसान मानने से इनकार दे, बस इसी पर एक अच्छे धार्मिक मनुष्य और बौद्ध मनुष्य का अंतर है।

अगर बौद्ध धर्म के मानने वाले कुछ गलत करे तो ये उनकी गलती होगी, बुद्ध की नही क्योंकि बुद्ध ने कभी ऐसे गलत आदेश नहीं दिए। इसी तरह आस्तिक की गलती का दोष भी ईश्वर को नही दिया जा सकता क्योंकि ईश्वर ने भी कोई गलत आदेश नहीं दिए म। जैसे किसी बदमाश बेटे का दोष उसके शरीफ बाप को नही दिया जा सकता क्योंकि बाप ने तो हमेशा अच्छे कर्म करने को कहा था। इसी तरह ईश्वर कहता है कि अच्छे कर्म करो मगर भक्त नहीं करते, तो यह भक्तो की गलती मानी जाएगी। बुद्ध भी अच्छे कर्म को कह गए और अगर बौद्ध लोग ऐसा नहीं करते तो बुद्ध की गलती नहीं मानी जाएगी। जैसे इतने साम्यवादी-नास्तिक लीडर हुए हैं, उनके द्वारा किये गए अत्याचारों का दोष नास्तिकतावाद को नही दिया जा सकता। म्यांमार, श्रीलंका, बर्मा में कुछ बौद्धों द्वारा अन्य लोगों पर होते अत्याचारों का दोष बुद्ध या धम्म को नहीं दिया जा सकता। ये सभी लोग स्वार्थ के कारण ऐसा करते रहे हैं।

बुद्ध ने तो अपनी प्रतिमा बनाने को मना किया था, मांसाहार के लिये मना किया था और किसी भी प्रकार की हिंसा लिए भी मना किया था। अगर कोई बौद्ध ये सब करने लगे तो उसमें दोष उस व्यक्ति का ही होगा, न को बुद्ध या धम्म का। उसी प्रकार दूसरे धर्म वालों के धर्म विरोधी कार्य के लिए उनका ईश्वर या धर्म दोषी नहीं हो जायँगे। कहते है कि बुद्ध काल से पहले भी मूर्तिया होती थी। पर बुद्ध की मूर्ति अधिक से अधिक बनाने से ही वैदिक धर्म में मूर्ति पूजा का सबसे अधिक फैलाव हुआ। तो क्या मूर्तिपूजा के लिए भी बुद्ध या धम्म को दोष दिया जाए?

धर्म में अनुयायी ही बिगाड़ पैदा करते है। बौद्ध धर्म भी बाहरी देशों में अधिक लोकप्रिय है और अनुसरण किया जाता है। और वंहा का बोद्ध धर्म और भारत का बौद्ध धर्म बेहद अलग है। बुद्ध के काफी समय बाद बोद्ध धर्म में अलग अलग सम्प्रदाय बनते चले गए। यानी बौद्ध धर्म में भी लोगों के मतभेद पैदा कर लिए जबकि बुद्ध ने तो एक ही धम्म दिया था। इसी तरह ईश्वर ने भी एक ही धर्म दिया था जिसे लोग बांटते चले गए। लोगों ही धर्म में सम्प्रदाय बनाते हैं जैसे हीनयान, महायान, नवयान।


बौद्ध सिद्धान्तों पर तर्क

बौद्ध धर्म का मत है कि हर चीज़ हर क्षण बदल रही है। पर बौद्ध धर्म ये भी कहता है कि 4 आर्य सत्य कभी नहीं बदलते। 
बौद्ध अनुयायी कहते है कि सृष्टि में ऐसी एक भी चीज़ नहीं है जो बदलती न हो। यंहा प्रश्न ये है कि ये नियम जो शुरू से यूं ही चला रहा फिर ये भी तो नहीं बदला। जबकि इस नियम को भी तो बदलना चाहिए था।

बौद्ध मत कहता है कि दुख है और इसी दुख पर बौद्धधर्म का पूरा आधार खड़ा है। पर जीवन में सुख भी तो है। ये तो उसी तरह है जैसे जैन धर्म कहता है कि जीवन से दुख खत्म करना है पर जैन अनुयायी अपने शरीर को ही सबसे अधिक दुख देते है जिससे दुख तो और बढ़ जाता है।

बुद्ध के 4 आर्य सत्य हैं। दुख है, दुख का कारण है जो है इच्छाएं, दुख का निवारण है जो है अपनी इच्छाओं को समाप्त करना, और इसके लिए आष्टांगिक मार्ग अपनाना है। तो दूसरा और तीसरा नियम विरोधाभासी है। क्योंकी दुख का निवारण करना, मोक्ष प्राप्त करना या आष्टांगिक मार्ग पर चलना, भी तो इच्छाएं हो गईं।

बुद्ध कर्मफल और कर्मसिद्धांत को मानते थे यानी कर्म ही निर्वाण का आधार है। पर बौद्ध धर्म ग्रंथों में बुद्ध परलौक के जीवन को भी मानते थे, यह बुद्ध की वाणी से स्पष्ट है।  धम्मपद के प्रथम अध्याय यमकवग्गो में ही बुद्ध परलोक के जीवन का उल्लेख करते हैं कि कर्मों के आधार पर परलोक मिलता है। और बुद्धवाणी से ही सिद्ध है कि यह परलोक किसी अन्य स्थान पर है, न कि यंही पृथ्वी पर। हालांकि अब बौद्ध भी इस पर आर्य समाजी पारलौकिक मान्यता जैसी लीपापोती करने लगे हैं। ज़रा सोचिए क्या ईश्वर के अस्तितव को माने बिना परलोक के अस्तित्व की कल्पना की जा सकती है। परलोक शुद्ध रूप से ईश्वरवादी दृष्टिकोण है क्योंकि कर्मों का हिसाब या माप तौल करने वाला कोई या कुछ होगा तभी तो कर्मों का निर्णय होगा। हालांकि इनका मानना है यह सब प्रकृति स्वयं करती है। यह तो वही नास्तिकों की तरह प्रकृति को ईश्वर स्थान पर स्थापित करने का विफल प्रयास प्रतीत होता है।

विज्ञान आत्मा में विश्वास नहीं रखता पर आज पूर्ण रूप से इसका इनकार भी नहीं कर पाता। बुद्ध ने आत्मा और मोक्ष को नकारा पर निर्वाण को स्वीकारा यानी मरने पर ही दुखों से मुक्ति है। अगर आत्मा नहीं है तो ऑर्गन फेलियर के बाद दुबारा नया ऑर्गन ट्रांसप्लांट करने के बाद भी मानव का शरीर दुबारा जीवित अवश्य होना चाहिए था। मगर हम जानते हैं कि ब्लड क्लोटिंग से मरे आदमी का क्लॉट निकालने के बाद भी शरीर ज़िंदा नहीं हो पाता है। शरीर के साथ ऐसा नहीं हो पाता है जबकि मशीन के पार्ट्स बदल दो तो वो तो वपिस स्टार्ट हो जाती है।  इसका अर्थ यही है कि मानव के शरीर में कुछ तो था जो अब नहीं रहा और जिसको वापिस शरीर में नहीं लाया जा सकता। यही आत्मा है। बुद्ध जैसा ध्यानी और बुद्धिजीवी व्यक्ति जो सदैव अन्तर्मनन में ही लीन रहता हो, वो कैसे आत्मा का इनकार कर सकता है, विश्वास नहीं होता। अवश्य ये बुद्ध का अनुभव या शिक्षा नहीं होगी। बोद्ध अनुयायी मानते हैं कि अधिकतर बौद्ध साहित्य बुद्ध के कई सदियों बाद लिखा गया और बहुत सी पांडुलिपियां नष्ट कर दी गई और ग्रंथों में मिलावट भी हुई है।


बुद्ध मार्ग पर तर्क।

सब जानते है कि सिद्धार्थ गौतम सत्य प्राप्त कर बुद्ध बने।
सिद्धार्थ और बुद्ध दोनों पहले अलग अलग थे। बुद्ध होना एक प्रक्रिया है। उनसे पहले भी बुद्ध हुए हैं और बाद में भी होने की भविष्यवाणी थी। इसीलिए उन्हें तथागत बुद्ध नाम से पुकारा जाता है।

आर्य शब्द से अमेडकरवादियों को घृणा है। मगर बुद्ध का आर्य शब्द से लगाव था। 4 आर्य सत्य, आर्यमार्ग आदि शब्द उनकी शिक्षाओं में बहुत आते हैं जबकि बुद्ध को आर्य संस्कृति का विरोधी माना जाता है। शायद आर्य शब्द का परिपेक्ष बहुत बड़ा है।


बुद्धुत्व।

बोधिस्त्व का मतलब होता है वह व्यक्ति जो बुद्ध बनने की राह पर चल पड़े या बुधुत्व को प्राप्त कर ले। और बुधुत्व का मतलब होता है बुद्ध की स्तिथि या स्थान पा लेना या सत्य, पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेना। जो ये स्तिथि पा ले उसे ही बुद्ध कहते है।

गौतम बुद्ध को ही ग्रंथों में तथागत बुद्ध कहकर संबोधित किया गया है।  आरम्भ में बुद्ध, राजपाट, घरबार, यंहा तक कि सोती हुई पत्नी और दूधमुंहे बच्चे (गलत या सही ये अलग विषय है) को छोड़ सत्य प्राप्ति के लिए निकले। पहले जैन मुनि बन कर कुछ महीने रहे, फिर भूख लगने पर एक स्त्री का दिया भोजन खाया और फिर सत्य प्राप्ति के लिए एक दूसरा रास्ता चुना। क्योंकि वह जान गए थे कि भूखा रह कर सत्य प्राप्त नहीं होता। बुद्ध ने देखा कि एक मार्ग पर तो स्वयं को दुख ही दुख देना है यानी जैन साधना और दूसरे में भौतिकतावाद है यानी चार्वाक जिसे शुद्ध नास्तिकता भी कह सकते हैं । इसलिए बुद्ध ने मध्यम मार्ग को चुना। 

बुद्ध ने कहा कि ध्यान किया करो, मध्यम मार्ग अपनाओ (अति मत करो), 4 आर्यसत्य अपनाओ, अष्टांगिक मार्ग अपनाओ।  

बुद्ध ने 4 आर्य सत्य बताए जो हैं: दुख है, दुख का कारण है, दुख का निवारण है, दुख के निवारण के लिए अष्टांगिक मार्ग है।

बुद्ध का अष्टांगिकक मार्ग है: सम्यक दृष्टि (4 आर्य सत्य में विश्वास रखना), सम्यक संकल्प (मानसिक, नैतिक विकास करना), सम्यक वाक (झूट और हानिकारक न बोलना), सम्यक कर्म (हानिकारक काम न करना), सम्यक जीविका (हानिकारक व्यापार न करना), सम्यक प्रयास (स्वयं सुधरने के प्रयास करना), सम्यक स्मृति (ज्ञान से देखने की योग्यता पाने का प्रयास करना), सम्यक समाधि (निर्वाण यानी मुक्ति पाना)


बौद्धमत दर्शन।

बुद्ध आवागमन को मानते थे जिसमें निर्वाण या परिनिर्वाण अष्टांगिक मार्ग से हो जाता है। कहा जाता है कि बुद्ध ने ब्रह्मा, वैदिक धर्म और वेद की निन्दा की। वैसे बुद्ध पर झूठे आरोप भी बहुत लगे हुए हैं। हालांकि बुद्ध की वाणी में स्पष्ट रूप से तो ईश्वर को स्वीकारती नहीं मिलती है। पर ये भी सत्य है कि बड़े पैमाने पर बौद्ध धर्मग्रन्थो का नष्ट कर दिया गया है या उनमे में मिलवाट हुई है।

बुद्ध का मत यही रहा है कि कोई परम शक्ति है या नहीं, वर्तमान में हम इतने सक्षम नहीं हो पाए है कि यह जान पाए। इसलिए इस विषय पर चर्चा अनर्थ है। अभी तो केवल दुख का निवारण करना है। बुद्ध ने कभी ईश्वर का साफ इंकार नही किया। बुद्ध ने कभी खुल के ईश्वर को न तो स्वीकारा और न नकारा।  पर बौद्ध धर्म के सभी मतों ने ईश्वर का इनकार किया है। 

सत्य ये है कि भगवान बुद्ध ने केवल ब्रह्मा का विरोध किया क्योंकि सनातन धर्म का मत था कि उस ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण और पांव से शुद्र पैदा हुए थे जो कण कण में विद्यमान था। बुद्ध ने कभी भी किसी परमशक्ति या परमेश्वर का इनकार नहीं किया। बल्कि बौद्ध साहित्य में ऐसी घटनाएं भी उपलब्ध हैं जब संसार चलाने वाली परमशक्ति पर सवाल पूछे जाने पर बुद्ध मौन धारण कर लिया करते थे। एक बार तो बुद्ध ने सिर्फ इसलिए जवाब नहीं दिया क्योंकि उनके जवाब से सवाल करने वाला व्यक्ति जवाब का अनर्थ करके समस्या खड़ी करने के उद्देश्य से उनके पास आया था।  एक बोधकथा में लिखा है कि बुद्ध ने ईश्वर की खोज के लिए लोगो को प्रोत्साहित करते है, खुद उत्तर इसलिए नही देते थे कि वे इस खोज में उदासीन न हो जाये।

बुद्ध को वेद निंदक और नास्तिक कह कर बहिष्कार किया जाता था। हो सकता है उनकी वाणी से ईश्वर की कल्पना ब्राह्मणों ने हटा दी। क्योंकि सदियों तक बौद्ध धर्म का नरसंहार हुआ है, ग्रन्थ जलाए गए हैं। यंहा तक कि सारे ग्रंथ लिखे भी बुद्ध के 200 साल बाद गए हैं। इनमें से कई तो ईसा काल के बाद मिलना ही दुर्लभ हो चुके थे। अभी पिछली सदी में ही तिब्बत आदि स्थानों से विद्वान राहुल सांकृत्यायन ने ऐसे ही कई दुर्लभ बौद्ध साहित्य को खोज निकाला था।

बुद्ध ने कंही नहीं कहा कि वह ईश्वर या आत्मा को नही मानते। बल्कि बोद्ध अनुयायी ऐसा अनुमान करते है, बोद्ध ग्रंथों से।


भौतिकवाद दर्शन।

बृहस्पति (बृहस्पतिसूत्र ग्रंथ रचयिता) के शिष्य चारवर्क (चारु+वाक यानी मीठे वाणी वाले) (चार्वाक सिद्धांतों के लिए बौद्ध पिटकों में ‘लोकायत’ शब्द का प्रयोग है यानी जो इस लोक में विश्वास न करती है और स्वर्ग, नरक, मुक्ति में) ने भौतिकवाद, materialism, सुखवाद, hedonism की शिक्षा दी। उन्होंने मनुष्य के 4 लक्ष्य यानी पुरुषार्थ के 4 तत्व, अर्थ (समृद्धि), काम (आनंद), धर्म और मोक्ष में से पहले दो को ही महत्व दिया। ये कहती है कि खाओ पियो मौज करो और जब तक जीओ सुख से जीओ, उधार लो और घी पीयो।  विश्व का अधिकतर हर मानव जो जीवन जीता है वह चार्वाक दर्शन ही है यानी वो भौतिक सुख के लिए है। भले ही बाहर से वह कुछ भी कहे।

इनका आशय यह होता है कि लौकिक कर्मों का फल, राजा देता है और पारलौकिक कर्मो का फल किसी ने देखा नहीं तो इनकी चिंता ही मत करो। संसार में दुःख भी है, यह समझकर जो सुख नहीं भोगना चाहते, वे मूर्ख हैं। मछली में काँटे होते हैं तो क्या इससे कोई मछली ही न खाए।  ये बुद्ध के सिद्धान्तों और ग्रंथो के विरोधी भी थे। बुद्ध के अच्छे कर्मों का इनके लिए कोई महत्व नही है। पर बुद्ध इसके उलट थे और वह भौतिकवाद के सख्त विरुद्ध थे। इससे ये मालूम  होता है कि नास्तिक ऐसे भी होते हैं। तो फिर दोनों में कौन से नास्तिक ठीक हुए? जब नरक ही नहीं तो अच्छे कर्म कोई क्या करें । वर्ण जाती रहने से भी उच्च वर्ण का फायदा है। यानी ये कैसे निर्णय हो कि दोनों में से कौन सा नास्तिक दर्शन एक व्यक्ति के लिए हितकारी है। यह तो सब्जेक्टिव चीज़ है।

पर मूल नियम यही है कि नास्तिकता मानवता की हिमायती होगी, तभी स्वीकार्य होगी। इसी तरह धर्म भी तभी स्वीकार्य होगा जब मनावतावादि होगा। तभी तो बहुत से पिछड़े लोगों ने जातिवाद के विरुद्ध इस्लाम स्वीकार किया क्योंकी यह जातिवाद के बेहद खिलाफ था। पर कुछ लोगों ने अपने फायदे के लिए इस्लाम स्वीकार किया और कुछ लोग इस्लाम स्वीकार करने के बाद जातिवादी मानसिकता से पीछा नहीं छुड़ा पाए इसलिए भारतीय मुसलमानों में भी जातिवाद पाया जाता है। हालांकि फिर भी यह मुस्लिम में उतना भयंकर नहीं है जितना हिन्दुओ में है।

बौद्ध धर्म की विस्तृत जानकारी।

प्रथम बौद्ध धर्म की दो ही शाखाएं थीं,  हीनयान- निम्न वर्ग (गरीबी) और महायान - उच्च वर्ग (अमीरी)। हीनयान एक व्‍यक्त वादी धर्म था। इसका शाब्दिक अर्थ है निम्‍न मार्ग। यह मार्ग केवल भिुक्षुओं के लिए ही संभव था। हीनयान संप्रदाय के लोग परिवर्तन अथवा सुधार के विरोधी थे। यह बौद्ध धर्म के प्राचीन आदर्शों का ज्‍यों त्‍यों बनाए रखना चाहते थे। हीनयान संप्रदाय के सभी ग्रंथ पाली भाषा मे लिखे गए हैं। हीनयान बुद्ध की पूजा भगवान के रूप मे न करके बुद्ध को केवल महापुरुष मानते थे। हीनयान की साधना अत्‍यंत कठोर थी तथा वे भिक्षुु जीवन के हिमायती थे। हीनयान संप्रदाय श्रीलंका, बर्मा, जावा आदि देशों मे फैला हुआ है। वैसे असल बौद्ध धर्म हीनयान शाखा को ही माना जाता है। बाद मे यह संप्रदाय दो भागों मे विभाजित हो गया- वैभाष्क एवं सौत्रान्तिक।

महायान और थेरवाद दो शाखाएं है। महायान फैला चीन, जापान, कोरिया, ताइवान, तिब्बत, भूटान, मंगोलिया और सिंगापुर में। इसकी शाखाएं है जैसे तिब्बती बौद्ध धर्म। इसमे देवी-देवताओं जैसे बहुत से दिव्य जीवों को माना जाता है। इसमे हज़ारों बोधिसत्त्वों को पूजा जाता है और उनका इस सम्प्रदाय में देवताओं जैसा स्थान है जैसे मैत्रेय आदि।

थेरवाद का अर्थ है 'बड़े-बुज़ुर्गों का कहना'। इसमे पालि में प्राचीन त्रिपिटक धार्मिक ग्रंथों का पालन होता है। ये बौद्ध धर्म को उसके मूल रूप में मानते हैं। इनके लिए गौतम बुद्ध एक गुरू एवं महापुरुष अवश्य हैं लेकिन कोई अवतार या ईश्वर नहीं। वे उन्हें पूजते नहीं और न ही उनके धार्मिक समारोहों में बुद्ध-पूजा होती है। इसमे किसी हस्ती को नहीं पूजा जाता। इनका मानना है कि हर मनुष्य को स्वयं ही निर्वाण का मार्ग ढूंढना होता है। इनमें भिक्षु बनने को बहुत शुभ माना जाता है। भिक्षु बनकर फिर गृहस्थ में लौट जाते है। ये है श्रीलंका, बर्मा, कम्बोडिया, म्यान्मार, थाईलैंड और लाओस में।  पहले 'थेरवाद' को 'हीनयान शाखा' कहा जाता था, लेकिन अब बहुत विद्वान कहते हैं कि यह दोनों अलग हैं।

वज्रयान को तांत्रिक बौद्ध धर्म, तंत्रयान, मंत्रयान, गुप्त मंत्र, गूढ़ बौद्ध धर्म और विषमकोण शैली या वज्र रास्ता भी कहा जाता है। वज्रयान बौद्ध दर्शन और अभ्यास की एक जटिल और बहुमुखी प्रणाली है जिसका विकास कई सदियों में हुआ। वज्रयान संस्कृत शब्द, अर्थात हीरा या तड़ित का वाहन है, जो तांत्रिक बौद्ध धर्म भी कहलाता है तथा भारत व पड़ोसी देशों में विशेषकर तिब्बत में बौद्ध धर्म का महत्त्वपूर्ण विकास समझा जाता है। बौद्ध धर्म के इतिहास में वज्रयान का उल्लेख महायान के आनुमानिक चिंतन से व्यक्तिगत जीवन में बौद्ध विचारों के पालन तक की यात्रा के लिये किया गया है। वज्र का प्रयोग मनुष्य द्वारा स्वयं अपने व अपनी प्रकृति के बारे में की गई कल्पनाओं के विपरीत मनुष्य में निहित वास्तविक एवं अविनाशी स्वरूप के लिये किया जाता है। यान वास्तव में अंतिम मोक्ष और अविनाशी तत्त्व को प्राप्त करने की आध्यात्मिक यात्रा है।

नवयान, भीमराव अम्बेडकर द्वारा निर्मीत हैं बौद्ध मत है। नवयान का अर्थ है - "नया मार्ग"। इसमें अम्बेडकर की 22 प्रतिज्ञाओं का पालन अनिवार्य और महत्वपूर्ण माना जाता हैं। जिसमे हिन्दू धर्म को पूरी तरह नकार दिया। नये धर्म में बुद्ध के मूल सिद्धांतो के साथ केवल विज्ञानवादी एवं तर्कशुद्ध, तर्कसंगत सिद्धांतों को ही लिया गया हैं। यंहा तक की बौद्ध बुनयादी सिद्धांत जैसे 4 आर्य सत्य, विपश्यना, साधना, पुर्नजन्म, कर्म, निर्वाण आदि तक को नकार दिया। नास्तिक दर्शन के अजित केशकंबली से बाबा अम्बेडकर ने अपने नवयान में काफी कुछ लिया है। अम्बेडकर ने कहा था कि दोनों संप्रदायों में कुछ अंधविश्वासी बातें हैं इसलिए मेरा ये बौद्ध धर्म नवयान बौद्ध धर्म होगा। जिसमें किसी बुद्ध के मूल सिद्धांत और केवल विवेकवादी सिद्धांत ही होंगे, कोई भी कुरितीयों या अंधविश्वास नहीं होंगा। यह एक ‘शुद्ध बौद्ध धर्म’ होंगा।’  22 प्रतिज्ञाओं में से एक है कि मैं बुद्ध के सिद्धांतों और उपदेशों का उल्लंघन करने वाले तरीके से कार्य नहीं करूँगा। यानी अम्बेडकर साहब ने खुद ही बुद्ध की मूल बातें नहीं अपनाई। बौद्ध लोग इनमें से कुछ प्रतिज्ञाओं का पालन नहीं कर पाते हैं.
 
डा अम्बेडकर की प्रसिद्ध 22 प्रतिज्ञाएँ कुछ इस प्रकार हैं: मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश, राम, कृष्ण, गौरी, गणपति, अवतार, हिन्दू देवी-देवताओं, बुद्ध को विष्णु अवतार मानने में विश्वास नहीं रखूँगा.  श्राद्ध, पिंडदान, ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित समारोह नहीं करूँगा.  मैं हिंदू धर्म का त्याग करता हूँ जो मानवता के लिए हानिकारक और बाधक है. स्व-धर्मं के रूप में बौद्ध धर्म अपनाता हूँ, बुद्ध का धम्म ही सच्चा धर्म है, धर्म परिवर्तन के द्वारा मैं फिर से जन्म ले रहा हूँ. मैं बुद्ध के सिद्धांतों और उपदेशों का उल्लंघन नहीं करूँगा, बुद्ध के सिद्धांतों व शिक्षाओं एवं उनके धम्म के अनुसार मार्गदर्शन करूँगा, आष्टांगिक मार्ग का पालन करूँगा, बुद्ध द्वारा निर्धारित परमितों का पालन करूँगा. मैं चोरी, झूठ, कामुक पाप, शराब, ड्रग्स, नशा नहीं करूँगा. मैं सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया  रखूँगा तथा उनकी रक्षा करूँगा.
 
 

भूत और भविष्य के बुद्ध।

त्रिपिटक के दूसरे भाग सुत्तपिटक के अंतिम निकाय, खुद्दकनिकाय की 14वीं पुस्तक बुद्धवन्स में बुद्ध से पूर्व जो अन्य 27 बुद्ध हुए है उनके जीवन का वर्णन है, इसमे गौतम बुद्ध के बोधित्व के प्राप्त करने की भी जानकारी दी गई है। सिद्धार्थ गौतम 28वें बुद्ध थे और मैत्रेय 29वें बुद्ध होने थे जो सिद्धार्थ गौतम के बाद आने थे। भविष्य में मैत्री बुद्ध के आने के बारे में तथागत बुद्ध बहुत कुछ बता कर गए है।

बुद्ध को किसने बताया कि भविष्य में क्या होगा, कौन आएगा, कैसा होगा। ये तो कोई दिव्य या ईश्वरीय ज्ञान लगता है। अगर धर्म का सिर्फ तर्कशीलता ही आधार होना चाहिए तो बौद्ध अनुयायी, मैत्री बुद्ध को क्यों मानते हैं। बौद्ध धर्म में कई बुद्ध हैं जिनमें से कुछ आकाशीय या दिव्यलोकीय भी है जैसे अमिताभ और वैरोचन।

सभी बुद्धों को एक ही सत्य प्राप्त हुआ तो इसका अर्थ यही है कि उस सत्य का स्रोत भी एक ही होगा। दूसरे धर्मो के महापुरषों का ज्ञान भी एक ही होता है और सृष्टि के सत्य का स्रोत भी एक है यानी ईश्वर।

बुद्ध बनने या ज्ञान प्राप्ति की एक प्रक्रिया है और इसके कई चरण होते हैं। दूसरे धर्मों में भी इसके लिए एक प्रक्रिया होती है। इस तरह बौद्ध धर्म अन्य अस्तिकवादी धर्मो के साथ कुछ तो समानता रखता है।
 

No comments:

Post a Comment

दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...