सवाल : मुहम्मद साहब नबी नहीं है, क्यूंकि आपकी मृत्यु जहर से हुई। ज़हर देने वाली यहूदी औरत ने कहा था कि अगर आप नबी हुए तो ज़हर आपका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा।
सूरह 69 आयत 44-47 : और अगर यह हम पर कोई बात बना लेता ( यानी खुद गढ़ कर कोई बात अल्लाह की ओर मंसूब की होती ) तो अलबत्ता हम इस का दाहिना हाथ पकड़ लेते फिर इसकी शह रग ( गर्दन की रग ) काट देते।
अबू दाऊद हदीस 4512 : रसूल हदिया ( उपहार ) कुबूल फरमाते थे और सदका ( दान ) नहीं खाते थे नीज़ इसी सनद से एक और मकाम पर अबू हुरैरह के ज़िक्र के बगैर सिर्फ अबू सलमा से रिवायत है रसूल हदिया कुबूल करते थे और सदका नहीं खाते थे इसमें इतना इज़ाफा है कि आपको खैबर की एक यहूदी औरत ने एक भुनी हुई बकरी तोहफ़ा में भेजी जिसमे उसने ज़हर मिला रखा था रसूल ने इसमें से खाया और लोगो ने भी खाया फिर आपने लोगो से फरमाया अपने हाथ रोक लो इस गोश्त ने मुझे बताया है कि वह ज़हर आलूद है चुनांचे बिश्र बिन बराअ बिन मारूर अल अंसारी मर गये तो आपने उस यहूदी औरत को बुला कर फरमाया ऐसा करने पर तुझे किस चीज़ ने आमादा किया वह बोली अगर आप नबी हैं तो जो मैने किया है वह आपको नुकसान नहीं पंहुचा सकता और अगर आप बादशाह हैं तो मैने लोगो को आपसे निज़ात दिला दी चुनांचे रसूल ने हुक्म दिया तो वह कत्ल कर दी गई फिर आपने अपनी उस तकलीफ के बारे में फरमाया जिसमे आपने वफात ( मौत ) पाई मैं बराबर खैबर के उस खाने के असर को महसूस करता रहा यहाँ तक कि अब वह वक़्त आ गया कि उस ने मेरी शह रग ( गर्दन की रग ) काट दी ।
अतः सिद्ध है की क़ुरआन और पूरा दीन मोहम्मद साहब ने ही गढ़ा था, और मोहम्मद साहब कोई पैगम्बर भी न थे। एक हुक्मरां थे जो यहूदी औरत के इम्तिहान में सफल न हुए। इसीलिए उसी ज़हर के ज़रिए कत्ल हुए। यहूदी औरत को इन आयातों का पता चला होगा कि तथाकथित पैगम्बर ने ये आयतें बनाई है कि अगर वह अल्लाह पर बोहतान बांध कर खुद की पैगम्बरी साबित कर रहा है। और अल्लाह के इज़्न से ऐसा ही हुआ। मोहम्मद यहूदी औरत के इम्तिहान में नाकामयाब हुए और उस यहूदी औरत को मोहम्मद ने कत्ल भी करवा दिया। अतः सिद्ध है मोहम्मद ने खुदा पर बोहतान बांधा था कि वह खुदा की ज़ानिब से भेजा हुआ है।
जवाब:
लगता है कि सवाल करने वाले का पुरा विश्वास है क़ुरान के सच्चा होने में तभी तो क़ुरान में बताई बात (भले ही उसका प्रसंग अलग हो) को, वो भी सच मान कर हदीस से मैच कर रहा है। यानी की वो क़ुरान के विरोध के अंधेपन में क़ुरान की ही बात भी मान रहा है बल्कि हदीस की व्याख्या पर पूर्ण विश्वास करते हुए ये भी मान रहा है कि नबी पर उनके रुतबे के कारण 4 साल तक ज़हर का असर नहीं हुआ। बस उसे ये न समझ आया की दोनों प्रंसग आपस में कोई संबंध नहीं है।
कोई भी पढ़ कर समझ जाएगा कि क़ुरान की ये आयतें पॉसिबिलिटी की बात कर रही है की अगर ऐसा करते तो आपकी रग काट दी जाती। यानी ऐसी कोई बात की ही नहीं वरना वंही के वंही मौत आ जाती। पर ऐसा नबी के साथ न होना उनके सच्चे होने की दलील है। यहाँ एक ह्यपोथेटिकल सिचुएशन की बात हो रही है। क़ुरान में इस रग के लिए वतीन शब्द आया है। हदीस में इसके लिए अहबर शब्द आया है। यानी दोनों एक ही रग की बात नही कर रहे।
अरबी में अहबर कट जाने का मुहवारतन प्रयोग होता था जिसका अर्थ मौत आने से सम्बंधित होता है। जैस हमारे यंहा किसी को पीड़ा पहुंचाने के लिए कहते है कि दुखती रग पर हाथ धर दिया।
हदीस में सिर्फ यह बताया गया है कि यहूदी औरत के ज़हर का असर 4 साल बाद फिर से नबी ने महसूस किया। जबकी क़ुरान ज़हर से नहीं बल्कि दाहिना हाथ पकड़ कर रग काटकर मृत्यु देने की बात कर रहा है तमसीली ज़ुबान में। दोनो तरह की मौत में बुनयादी अंतर है।
वैसे भी मुहम्मद सल्लo की वफात, अस्तगफिरूललह, किसी पाप या पकड़ की वजह से नही हुई जिसका उल्लेख क़ुरान ह्यपोथेटिकल कॉन्टेक्स्ट में कर रहा है। बल्कि ज़हर के कारण शहादत हुई, जिसे सभी स्कॉर्ल्स मानते है।
ज़हरीला सांप अगर काट ले तो , रक्त में मिल जाने में कारण नाड़ी तंत्र, शवासन तंत्र आदि प्रभवित होता है। पर ज़हर खाने के केस में अक्सर आमाशय प्रभावित होता है और उल्टी करने पर अधिकतर ज़हर बाहर आ जाता है। ये जहर के प्रकार पर निर्भर करता है की कब, कितना, कैसे प्रभाव दिखयेगा। यही वजह है कि नबी ने मुंह से फौरन निवाला निकाल दिया था पर ज़हर का थोड़ा हिस्सा फिर भी शरीर में चला ही गया जो उनके नबी होने के कारण फौरन असर न दिखा पाया। हालांकि कुछ विद्वान मानते है कि खुदा के इस ज़हर को दुबारा जिस्म में पैदा या वापिस असरदार कर दिया ताकि शहादत की मौत हो।
रही बात यहूदी की राय की तो एक बात समझ लो कि मुहम्मद साहब एक महापुरुष तो थे पर शरीर के हिसाब से एक इंसान भी थे। ज़हर, मीठा, खट्टा आदि उन्हें भी लगता था। हालांकि शरीर के ऐतबार से भी उनकी योग्यता, आम आदमी से काफी अधिक ही थी। गहराई में देखो तो यहूदी की अज्ञानता में कही बात का और मुहम्मद साहब की जिस्मानी सीमितता का खुदा ने यूनिक कॉम्बिनेशन बना कर पेश किया जैसे कि नबी होने के कारण हूज़र पर ज़हर का असर नही हुआ और वो बच गए। पर इसी ज़हर से हज़रत बशर की हुई शहादत, यहूदी की बात सच कर रही है। साथ ही, नबी का इंसानी शरीर होने के कारण असर हुआ भी पर तब जा कर हुआ जब नबी के तौर पर वो धरती में अपने सारी ज़िम्मेदारिया निभा चुके थे।
यानी साफ है कि न तो शाब्दिक और न ही कॉन्टेक्स्ट में इन आयात का इस हदीस से कोई लेना देना है। यानी क़ुरान और हदीस दोनों की तरफ से आप सल्लoके नबी होने का प्रमाण मिल गया।
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