Tuesday, 16 June 2020

क्या गैर मुसलमानों के लिए दुआ करना या RIP कहना जायज़ है?


● मुसलमानों में आम ख्याल है कि कुरआन की निम्नलिखित आयत ने इस बात से रोक दिया है कि गैर-मुस्लिमों के लिए क्षमा (मग़फिरत) की दुआ की जाये:

नबी और उसके मानने वालों के लिए सही नहीं कि वह मुश्रीकून (बहुदेववादियों) के लिए मग़फिरत की दुआ करें। चाहे वह उनके रिश्तेदार ही क्यों ना हों, जबकि उनपर साफ़ हो चुका कि वह नरक में जाने वाले लोग हैं। (9:113)

आयत से साफ़ है कि यह रसूलअल्लाह (स.व) के समय के उन बहुदेववादियों (मुशरिकों) के बारे में हैं जो सच को जानते-बुझते हुए भी सिर्फ अपनी ज़िद की वजह से झुठला रहे थे, ऐसे मूर्तिपूजकों को नरक की खबर दी जा रही है और यही वह लोग हैं जिनके लिए क्षमा की दुआ करने से रसूलअल्लाह  (स.व) और बाकी मुसलमानों को मना किया गया है। रसूलअल्लाह (स.व) के बाद अब यह पता नहीं किया जा सकता कि कौन सच का जानते-बुझते इनकार कर रहा है और कौन नहीं क्योंकि यह सिर्फ अल्लाह ही जानता है और अब अल्लाह की तरफ से किसी को “वहीय” (प्रकाशना) नहीं आती। इसलिए, यह आयत रसूलअल्लाह (स.व) और उनके साथियों (रज़ि.) के समय के बाद के गैर-मुसलमानों के बारे में नहीं है और इसकी बुनियाद पर अब किसी के लिए दुआ करने से रोकना आयत को उसके संदर्भ (पसमंज़र) से बाहर लागू करना है ।

अगली आयत में भी ऐसा ही कहा गया है कि इब्राहिम अलैह० ने अपने बाप के लिए जो माफी की दुआ की थी वे तो उस वादे की वजह से थी जो उन्होंने अपने बाप से किया था, मगर जब उन पर खुल गया कि उनका बाप अल्लाह का दुश्मन है तो वे उससे बेज़ार हो गए।

ऐसा ही हुकुम सूरह तौबा, आयत 80-84 में और अब्दुल्लाह बिन उबई (जिसकी मुनाफ़िक़त अल्लाह के नबी को बिल्कुल वाज़ेह थी) के जनाज़े पढ़ाने वाली हदीस से साफ है। क्योंकी नबी को तो था ही और सहाबा को भी इसका वाज़ेह इल्म था कि वह मुनाफ़िक़ है।

● यानी क़ुरान से साबित है कि जब आज़ाब या अल्लाह का हुकुम आ जाये तो वो लोग दुश्मन या काफ़ीर ही माने जाएंगे और उनके लिए अल्लाह से दुआ करना अल्लाह के फैसले में टांग अड़ाने जैसा है। क़ुरान ने दुआ से तब रोका है जब ऐसे लोगों पर अल्लाह ने अपना फैसला सामने रख दिया हो।

अब किसी को तो वाह्य आती नहीं है कि किस के दिल में कुफ्र है या कौन आज़ाब के हकदार है। न ही किसी के मरने के बाद कोई यकीन से यह कह सकता है कि वो शिर्क की हालत में मरा है या उसने मरने से पहले आखिरी वक़्त में तौबा नहीं की थी। यह बात तो सिर्फ अल्लाह जानता है।

● लगभग सभी उलेमाए हक़ मानते है कि गैर मुस्लिमों के लिए हिदायत और शिफा के लिए दुआ करना जायज़ है। उनके के लिए खैर की दुआ और रूकिया तक भी करना जायज़ है। उन्हें सलाम (सलामती की दुआ) करना भी जायज़ है। जिस हदीस के संदर्भ में सलाम करना मना बताया जाता है, उसमें ये है कि कुछ सहाबा ने नबी से कहा कि दुश्मन उन्हें सलाम की बजाए 'अस्सामु अलैकुम (तुम पर मौत हो)' कहते है तो नबी ने फरमाया की तुम भी उन्हें 'वालेकुम (तुम पर भी)' कह दे करो। वरना क़ुरान तो कहता है कि दुआ का जवाब और बेहतर तरीक़े से दो और इस आयत में अल्लाह ने गैर मुस्लिमों की कोई कैद नहीं लगाई। उलमाओं में असल इख़्तेलाफ़ मरने के बाद की दुआ और मगफिरत की दुआ पर है। 

गैर मुस्लिमों के लिए मगरफिरत की दुआ भी की जा सकती है तब तक जब तक आप को अल्लाह यह वाज़ेह न कर दे कि वो मुश्रिक या दुश्मन है जैसे नबियों को इल्म हो जाता है और सहाबा को नबी के ज़रिए। वैसे हर नबी अपनी क़ौम के लिए दुआ करता आया है, ईमान लाने से पहले भी।

● इस संबंध में 3 तरह के इंसान हो सकते है। एक जिन तक दावत ही नहीं पहुंची। दूसरे जिन तक दावत पहुंच गई और हक़ वाज़ेह होने के बाद भी वो ईमान न लाये। तीसरे वो जिन तक दावत पहुंच गई पर उस हसन तरीके से नहीँ जैसा उसका हक़ था और इस कमी की वजह से उन के दिल पर खरी नहीं उतर सकी।

तीसरे केस में गलती हमारी मानी जाएगी क्योंकि हम उनकी मानसिक सतह पर जा कर उनको हक़ न समझा सके। इस केस में फिर वही कानून चलेगा जो अल्लाह ने हर इंसान के वजूद में डाल दिया है यानी तौहीद और अखलाकियात। क्योंकि इंसान को दीने फिरतरत पर पैदा किया गया है और उसके शऊर में एक खुदा और अच्छे अमल का इल्म डाल दीया गया है। कौन जानता है कि मरने से पहले वो इस इल्म पर मुक़म्मल यक़ीन ले आया था या नहीं? और ऐसे शुबा के हालात में किसी के कुफ्र का 100% सही फैसला हम कैसे कर सकते है?

● अल्लाह सामान्यतः सबकी दुआ क़ुबूल करता है। दुनिया मे करोड़ो गैर मुस्लिम अपने अपने खुदाओं से दुआ मांगते है और पूरी होती है, अल्लाह ही तो पूरी करता है। तो ये कैसे हो सकता है कि उनकी दुवाएं अल्लाह खुद पूरी कर दे और आप को मना कर दे कि उनके लिए मत मांगना।

वाक़्यात

हम सब इंसान है और सब हमारे भाई है। सब के लिए दुआ हमारी ज़िम्मेदारी बनती है सिवाए कुछ अपवाद छोड़ कर जिन्हें अल्लाह ने साफ कर दिया हो। इसलिए सभी के लिए दुआ की जा सकती है सिवाए उन लोगो कर बारे में जिन के बारे में अल्लाह खुद न बता दे की वो अल्लाह के दुश्मन है जैसे क़ुरान में बताया गया है। क्योंकि नबियों ने भी मग़फ़िरत की दूआ की है, गुमराहों और मुशरिकों के लिए, यंहा तक कि फैसले और आज़ाब के बाद भी। जैसे:-

● इब्राहीम अलैहo अपने बाप के शिर्क की जानकारी के बावजूद लगभग 20 साल तक उसके लिए मगरफिरत की दुआ करते रहे। फिर अल्लाह ने इससे रोक दिया। इब्राहीम अलैह० बहुत ही नर्म दिल थे।

● इब्राहीम अलैहo के पास आये फरिश्तों ने बताया कि वो लूत अलैहo की क़ौम पर आज़ाब ढाने आये है। सूरह हूद से पता चलता है कि इस बारे में उन्होंने अल्लाह से बहस करी और बाइबिल से इसकी तफसील पता लगती है कि उन्होंने दरख्वास्त करते करते, 50 ईमान वालो से घटाते घटाते, 5 तक ले आए की अगर 5 ईमान वाले भी हुए तो अल्लाह आज़ाब नहीं देगा (और हक़ीक़त में वो 5 भी न निकले)। फिर अल्लाह ने उन्हें रोका और इस पर उनकी तारीफ की। (यानी जिन पर आज़ाब आने वाला था उनके लिए भी दरख्वास्त की गयी)

● क़ुरान 5:118 बताता है कि ईसा अलैहo क़यामत के रोज़ अपनी क़ौम के लिए अल्लाह से कहेंगे की चाहे तो तू इन्हें आज़ाब दे, वो तेरे बंदे है और अगर बक्श दे तो तू बड़ा ज़बरदस्त और हिकमत वाला है। (यानी फैसले के बाद भी मुशरिकों के लिये दरख़्वास्त करेंगे).

● हदीस से पता लगता है कि मुहम्मद सल्लo ने अब्दुल्लाह बिन उबई के बारे में कहा कि अल्लाह ने उन्हें इख्तियार दिया है कि वो उसके लिए दुआ मांगे या न मांगे। आयात नाज़िल हुई कि 70 बार भी मांगोगे तो भी मगफिरत नहीँ होगी। फिर जब नबी ने जनाज़ा पढ़ा दिया तब उन्हें मुशरिकों का जनाज़ा पढ़ने से मना कर दिया गया।

■ क़ुरान: 20:51-52:  मूसा अलैह० से जब फिरौन ने पूछा कि हमारे बाप दादा (जो गुमराही और शिर्क पर मरे) उनकी क्या हालत है (क्या वो आज़ाब के लायक़ है). मूसा अलैह० ने कहा उसका ज्ञान मेरे रब के पास है और मेरा रब न चूकता हैं और न भूलता है (वो जैसे भी थे रब के पास जा चुके, उनकी हर हरकत रब जनता है, उनके साथ जो भी मामला करना है, रब जानता है)

यानी मूसा अलैह० ने उन पर किसी तरह का लक़ब नहीं लगाया की वो काफिर थे या मुशरिक मरे बल्कि उन्हें अल्लाह के सुपुर्द कर दिया।

दलीलें और जवाबात

● दलील आती है कि लोग ज़ाहिर पर फैसले करते हैऔर गेर मुस्लिम ज़ाहिरन कुफ्र पर मरते है। अगर ज़ाहिर पर ही फ़ैसला करना है तो बहुत से मुसलमान खुला शिर्क करते है, अल्लाह के सिवा न जाने किस किस से मांगते है। उनके लिए फिर लोग दुआ क्यो करते है?

जो लोग या अली मदद और या ग़ौस मदद  कहते है, जिन्हें आप शिरकीया कलाम मानते हो (भले ही इस पर उनके तर्क अलग है), फिर तो उनके लिए भी आपको दुआ नहीं करनी चाहिए।

बल्कि लगभग हर फ़िरक़े ने दूसरे फ़िरक़े के कई आलिमों पर कुफ्र और शिर्क के फतवे लगा रखे है और ये भी कह रखा है कि अपनी मौत से पहले वो रुजू नहीं करके गए इसलिए गुमराही पर मरे। फिर इनके लिए दुआ करना कितनी जायज़ है?

● एक और दलील है की ज़िंदा शख्स के लिए दुआ जायज़ है क्योंकी उसके सुधरने के आगे चांस है पर ग़ैर मुसलिम के मरने के बाद कोई चांस ही कंहा है। ऐसा है तो फिर चांस ये भी है कि मरने वाले ने शायद मौत के किनारे पर पहुंच कर तौबा कर ली हो

● एक दलील ये भी दी जाती है कि मरने वाला अगर वाकई मुनाफ़िक़ निकला तो हमारी दूआ की पकड़ होगी। असल में हमारी पकड़ हमारे इल्म की बुनियाद पर है। कौन मुनाफ़िक़ या काफ़िर है इसका इल्म अब सिर्फ अल्लाह के पास है, वाह्य की सिलसिला बंद हो चुका है। अगर कोई ऐसा अल्लाह का दुश्मन निकला भी तो इंशाल्लाह हमारी गलती नहीँ मानी जाएगी।

● क़ुरान में जिस तरह कहा गया है कि काफ़िर को जंहा पाओ (जंग में) क़त्ल कर दो। इस आयत के पसमंजर में वो लोग है जिन्हें अल्लाह ने काफ़िर घोषित कर दिया था, न कि सब अरबवासी। सहाबा ने इसी बुनियाद पर उन्हें काफ़िर कहा। रसूलल्लाह ने कभी किसी को काफ़िर नहीं पुकारा। उसी तरह दुआ के पसमंज़र वाली आयतों में भी कुछ खास मुश्रिक और मुनाफ़िक़ है, न कि सब।

वैसे ईसाई मत है कि ईसा अलैह० ने सलीब पर चढ़ते हुए कहा था कि 'परमेश्वर इन्हें क्षमा करना ये नहीं जानते ये क्या कर रहे है' जबकि वो लोग एक रसूल के क़त्ल पर आमादा थे। वैसे ही अंग्रेजी भाषी या ईसाई अक्सर गॉड फोरगिव मी ही का करते है जिससे उनकी मुराद एक खुदा से ही होती है। रही बात स्टीफन हॉकिंग्स या मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद कादियानी के लिए दुआ की तो आखिरी वक्त में इनके दिल में क्या था, क्या तौबा कर ली थी, हम नहीं जानते। हम बस ये जानते है कि जीते जी तो ये खुले तौर पर खुदा के खिलाफ थे। और मौत के वक़्त का हाल अल्लाह ही जानता है। वैसे हर गैर मुस्लिम इनकी बराबरी का मुख़ालिफ़ नहीं होता। बहुत से सादे, शरीफ भी होते हैं। फैसला अब आप का है की दुआ करें या न करे। अगर आप किसी के लिए दुआ नहीं करना चाहते तो न करे, पर किसी को रोके भी न।
 
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RIP की दुआ सबके लिए की जा सकती है। गैरों के लिए दुवा करने पर इस्लाम कोई रोक नहीं लगाता। तब तक दुवा करी जा सकती है जब तक अल्लाह रोक न लगा दे या किसी का जहन्नमी होना साबित न हो जाये। अमाल की बुनियाद पर आख़िरत में फैसला होगा तब तक अल्लाह के सिवा कोई किसी को जहनुमि या जन्नती नही करार दे सकता। क़ुरान ऐसा तब रोकता है, जब ये खुल चुका हो कि कोई जहन्नुमी है। पर लोगों को कैसे पता कि फला जहन्नुमी है? क्योंकि आज न तो नबी मौजूद और न ही अल्लाह हमें ये बताता है, न यौमे ए आख़िरा आया है? क़ुरान तो कहता है जो ईसाई, यहूदी, मजूसी को कोई हिसाब वाले दिन कोई डर न होगा। यंहा मुहम्मद सल्ल अपर ईमान की शर्त तो नहीं लगाई गई। हज़रत ईसा ने अपने पैरोंकारों (जो शिर्क करते हैं) के लिए भी दुवा की है और अल्लाह ने मना नही किया। इसलिए अल्लाह और रसूल की मानोगे या उन लोगों की जो दीन में अपनी बातें घुसाए बैठे है। जब आप लोग क़ुरान को बिना समझे पढ़ोगे तो यही होगा। रियावायतो कि तरह दीन को घसीट रहे हो। लोग खुद दीन को समझे बैगर बड़े बुजुर्गों के कहे को दीन मानते है। अगर सिर्फ मोमिन के लिए जन्नत है तो कितने मुस्लिम मोमिन है? 

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Reference:
(1) तज़कीरुल क़ुरान, मौलाना वहिदुुद्दीन खान साहब।
 

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