Friday, 5 June 2020

रामचरितमानस के रचयिता गौस्वामी तुलसीदास का जीवन और लेखन।


राम नाम ईश्वर का था और राम चन्द्र ईश्वर के भक्त श्री राम का, ये एक सत्य है। भक्तिकाल के समय में राम (ईश्वर) नाम से ईश्वर की भक्ति करने वाले भी थे और श्री रामचंद्र जी के भी। इसीलिए निराकार राम (ईश्वर) और साकार राम (श्रीरामचन्द्र अवतार के रूप में) संबोधन उनके लिए भक्तिकाल में प्रयोग हुआ। गौस्वामी तुलसीदास साकार राम के भक्त थे और इसीलिए उन्होंने अवधि भाषा (हिंदी की एक बोली) में वाल्मीकि रामायण के आधार पर अपने अनुसार एक और रामकथा लिखी (16वीं सदी). इसका नाम है राम चरितमानस  और इसे तुलसी रामायण भी कहते हैं। गीता के बाद सबसे अधिक घरों में यही पाया और पढ़ा जाता है। ये साकार राम की कथा है। इन्होंने ही हनुमान जी के गुणों का वर्णन करने के लिए, हनुमान चालीसा  कृति या पाठ लिखा था।

आज के समय में लोग जब राम के नाम पर धार्मिक कट्टरता और हिंसा फैला रहे हैं, वंही इस राम के भक्त तुलसीदास एक सच्चे सनातनी होने के साथ साथ धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति थे। उनकी लेखनी और जीवनी यही बताती है।


गौस्वामी तुलसीदास गंगा जमुनी तहज़ीब के संरक्षक थे।

"रघुबर तुमको मेरी लाज। सदा सदा मैं सरन तिहारी तुमहि गरीबनवाज।।"

रामचरितमानस के रचयिता, गौस्वामी तुलसीदास ने रामचन्द्र जी को 'गरीबनवाज़' कहा है। गरीबनवाज़, सूफी संत ख़्वाजा मईनुद्दीन चिश्ती (अजमेर शरीफ़) की उपाधि है जिसका अर्थ होता है निर्धनों के सरंक्षक या पोषक।

"तुलसी सरनाम गुलाम है राम को, जाको रुचे सो कहै कछु कोहू।
मांगि के खैबो, मसीत को सोइबो, लैवे को एक न दैबे को दोऊ।।"

स्वयं को रामचन्द्र जी का 'ग़ुलाम' कहते हुए तुलसीदास अपने बारे में बताते है कि वह मांग कर भोजन करते थे और 'मस्जिद' में सोते थे।

शायद तुलसीदास, ख़्वाजा जी को मानते हो। शायद उनका फ़ारसी-अरबी भाषा से लगाव रहा हो। शायद मस्जिद में उनको आराम मिलता हो। शायद मस्जिद का इमाम उनका मित्र रहा हो। किसे पता। पर ये पता है कि मध्यकाल का भारत सभी धर्मों में रचा-बसा और रंगा पुता था।

तुलसी की रहीम से गहरी दोस्ती थी। तुलसी ने मानस लिख कर रहीम को दिखाया था और रहीम ने कुछ दोहे लिख का मानस की प्रशंसा की थी।



तुलसीदास द्वारा कृत श्रीरामचरितमानस का एक दोहा है जिसमें उन्होंने नकली रामभक्तों पर टिप्पणी की है।

"बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई॥"

अर्थात श्रीरामचंद्र का तेज-प्रताप पाने से मनुष्य में से घृणा व द्वेष समाप्त हो जाता है। यानी जिस मन में श्रीराम बसते है, उस मन में बैर नहीं बस सकता।

सच्चा रामभक्त वही है जिसमें दूसरों के प्रति कोई भेदभाव-विषमता न हो। हृदय में लोगों के लिए असमानता रख कर, जय श्रीराम बोलने वाले राम के नाम का सम्मान बढ़ाने की बजाय बदनाम कर रहे है।


तुलसीदास जी की वाणी या लेखन से कई जगह श्रीराम एक महापुरुष सिद्ध होते हैं और ईश्वर के निरककर स्वरूप को उनके द्वारा माने जाने की बात भी सिद्ध होती है। उन्होंने लिखा:


सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई॥
जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौ मोहि बरजहु भय बिसराई॥

श्रीरामचंद्र जी प्रजा को उपदेश देते हुए कहते हैं कि वही मेरा सेवक है और वही प्रियतम है, जो मेरी आज्ञा माने। हे भाई! यदि मैं कुछ अनीति (अनैतिक) की बात कहूँ तो भय भुलाकर (बेखटके) मुझे रोक देना

[रामचरितमानस की चौपाई]

इस चौपाई में राम जी अपने मुख से किसी अनैतिक बात कहने की बात कर रहे हैं। अगर वो ईश्वर होते तो उनके मुख से कतई कोई अनैतिक बात नहीं निकल सकती थी।


बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥

अर्थात उस निराकार ईश्वर के पैर नहीं पर फिर भी वह चलता है। उसके कान नहीं, फिर भी वह सुनता है। उसके हाथ नहीं, फिर भी विविध प्रकार के कार्य करता है।

[रामचरितमानस की चौपाई]

ये चौपाई ईश्वर, ब्रह्म या निराकार राम के बारे में वर्णन करती है।

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रामचरितमानस में सृष्टि रहस्य।

वैसे तो युगों के साल सबकी अलग अलग गिनती है। अधिकतर मत में लाखों साल के युग माने जाते है। फिर भी सिर्फ 8 मील को 1.6 में गुना करो ना, अगर KM में चाहिए तो। सारे नंबर्स जो कि डिस्टेंस के मानक नहीं बल्कि समय और गिनती के मानक है, उनको क्यों 1.6 से गुना कर रहे हो। कंही की ईंट कंही का रोड़ा भानुमति ने नाता जोड़ा।
 


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