शमशान शब्द का अर्थ क्या है?
श्मशान को शमशान भी लिखा जाता है। बल्कि इसे भी छोटा करके अब इसे मसान भी कहते है। श्म का अर्थ होता है शव और शान का अर्थ होता है शयन। इसलिए शमशान का अर्थ हुआ जंहा शव सोते हैं। मगर शमशान में तो मुर्दा जलाने के बाद शरीर का कुछ अंग बचता ही नहीं है। देखा जाये तो मुर्दे कब्रिस्तान में सोते हैं। इसलिए ऐसा भी कहा जाता है कि ये असल में शयनशान शब्द था जो बाद में बदल गया क्योंकि शयन का अर्थ निद्रा या नींद है। इसलिए शयनशान का अर्थ हुआ वह जगह जंहा मुर्दे सोते हैं।
हालांकि चाणक्य के नाम पर एक श्लोक प्रचलित है जिसमें यह शब्द आता है:-
उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे शत्रु विग्रहे। राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति सः बान्धवः।
अर्थात उत्सव के समय, बुरे समय में, अकाल के समय में, उपद्रव के समय में , राजदरबार में, श्मशान में जो साथ रहता है, वही बन्धु है।
अर्थात उत्सव के समय, बुरे समय में, अकाल के समय में, उपद्रव के समय में , राजदरबार में, श्मशान में जो साथ रहता है, वही बन्धु है।
हमेशा से ही विश्व भर मे दफनाने का रिवाज रहा है जो भारत मे भी
था। हड़प्पा - मोहनजोदड़ो सभ्ययता (लगभग 4 हज़ार साल पुरानी) की खुदाई में
राखीगढ़ी और सिनौली में कब्रे मिली है जिनमे कंकाल उसी अवस्था मे मीले है
जैसे मुसलमान दफनाते है। यानी पांव दक्षिण की तरफ, सिर उत्तर की तरफ और
मुंह पश्चिम की तरफ मुड़ा हुआ। आज भी दुनिया भर में लाखों वर्ष पुराने दबाए
गए कंकाल मिलते है, न कि जलाए गए।
हिन्दुओं में भी संतों और बच्चों को दफनाया जाता है. पार्थिव शरीर में पार्थिव का अर्थही है, पृथ्वी से जुडा या पृथ्वी का विकार.
क्या खुदा को ब्रह्मा आदि बोला जा सकता है?
ब्रह्म और ब्रह्मा में फर्क है। अल्लाह या ख़ुदा को ब्रह्म बोला जा सकता है। हिन्दू भाई इससे निराकार ईश्वर ही मुराद लेते हैं। जबकि दूसरी ओर ब्रह्मा से मुराद त्रिदेव में शामिल उस देव अर्थात सृष्टि रचियता से लिया जाता है, इसलिए इस शब्द का इस्तेमाल तभी करा जाए जब वज़ाहत भी साथ करी जाए। जैसे कि ईश्वर के ही ये तीनों यानी ब्रह्मा विष्णु महेश नाम थे, उसकी अलग अलग विशेषताओं के आधार पर, मगर बाद में इन नामों और विशेषताओं पर लोगों ने स्वतंत्र देवताओं के अस्तित्व बना लिए। ऋग्वेद भी इन्हें उस एक के नाम बताता है।
राम, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, रुद्र, शिव, इंद्र नाम से ईश्वर को पुकारना सही नहीं है जब तक सामने वाला इनसे वही देवता के मायने ले। अगर वो इनका असल मतलब समझता है तब तो उसके सामने इनका इसतेमाल कर सकते हैं क्योंकि ये आरम्भ में ईश्वर के गुणवाचक नाम भी थे। इनके अर्थ के वज़ाहत करते हुए भी इनका इस्तेमाल खुल कर किया जा सकता है। बाकी आपातकाल स्तिथियों में इनका एमबीगयुअस इस्तेमाल करके बाहर निकला जा सकता है। वैसे ईश्वर को ब्रह्म शब्द से पुकारा जा सकता है। ब्रह्मा और ब्रह्म में अंतर है।
वैसे एक ब्रह्मन् शब्द या अस्तित्व भी होता है जिसका अर्थ है, सृष्टि का परम तत्त्व/सत्य, निराकार, निर्गुण, अनन्त.
हिन्दुत्वादियों द्वारा बात बात में इस्लाम का डर दिखाना कि एक दिन मुस्लमान सभी हिन्दुओं का धर्मांतरण कर देंगे.
मैं ऐसे बयानों को 3 तरह से देखता हूँ, और ऐसे बयान देने के पीछे यही 3 वजह समझ आती हैं, अलग अलग हस्तियों, उनके लफ़्ज़ों और वक़्त के हिसाब से।
पहला कि बहुत से हिन्दू धर्म या हिंदुत्व के बड़े लीडर्स ये बात जानते हैं कि इस्लाम और क़ुरान में वो माद्दा मौजूद है कि इसे सही से पढ़ने या समझने वाला, इसका हो ही जाता है। इस बात के सबूत बहुत से लोगों ने दिए हैं, जैसे तारिक़ साहब, मरहूम अनवर जमाल साहब, मौलाना सिद्दकी साहब और दीगर दा.यी. हज़रात।
दूसरा, इनके बहुत से लीडर्स ये जानते हैं कि भारत में क़ौम तब्दीली की पेशनगोईयां या अशांकाएँ (उनके अनुसार अधिक उपयुक्त शब्द) है। पहले भी बड़े स्तर पर यंहा ऐसा हुआ है जो यंहा इस्लाम दाखिल होने से पिछली सदी तक चला था।
तीसरी वजह है कि ऐसे बयान हमेशा से ही दक्षिणपंथी लोगों के लिए प्रोपगंडा स्लोगन्स होते हैं जिनसे लोगों को उत्तेजित किया जाता है और अपनी कमियों को दूसरी क़ौम पर डाइवर्ट कर दिया जाता है। जर्मनी, युगांडा आदि में हुए नस्लीय नरसंहारों में भी ये ऐसे ही इस्तेमाल हुए थे।
सभी लाज़मी इबादतें सबसे पहले अपने मालिक का हुकुम हैं, जिन्हें पूरा किया जाना ज़रूरी है। इनसे भले ही कोई फायदा किसी को ज़ाहिर हो या न हो, मगर उसे इन्हें अदा करना है। अगर फायदे नहीं हो रहे, तो इबादतों की रूह हासिल करना सबको चाहिए, वरना सिर्फ एकसरसाइज बन जाती हैं। वैसे हमारे दीन में हर इबादत के फायदे बताये या रखे गए हैं। दीने इस्लाम में कुछ भी ऐसा नहीं है जो बिना वजह हो। इबादतों के फायदे मानसिक, शारीरिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक सभी तरह के हैं। हज या ज़ियारत को जाने के पीछे भी ये सभी फायदें हैं। इसके साथ ही हज में अदा होने वाली रसुमात के पीछे भी मानसिक, नाफिसयाती, रूहानी फायदें हैं। हज की ज़ियारत या रसुमात पर ज़्यादा डिटेल के लिए ब्लॉग देखें।
पहला कि बहुत से हिन्दू धर्म या हिंदुत्व के बड़े लीडर्स ये बात जानते हैं कि इस्लाम और क़ुरान में वो माद्दा मौजूद है कि इसे सही से पढ़ने या समझने वाला, इसका हो ही जाता है। इस बात के सबूत बहुत से लोगों ने दिए हैं, जैसे तारिक़ साहब, मरहूम अनवर जमाल साहब, मौलाना सिद्दकी साहब और दीगर दा.यी. हज़रात।
दूसरा, इनके बहुत से लीडर्स ये जानते हैं कि भारत में क़ौम तब्दीली की पेशनगोईयां या अशांकाएँ (उनके अनुसार अधिक उपयुक्त शब्द) है। पहले भी बड़े स्तर पर यंहा ऐसा हुआ है जो यंहा इस्लाम दाखिल होने से पिछली सदी तक चला था।
तीसरी वजह है कि ऐसे बयान हमेशा से ही दक्षिणपंथी लोगों के लिए प्रोपगंडा स्लोगन्स होते हैं जिनसे लोगों को उत्तेजित किया जाता है और अपनी कमियों को दूसरी क़ौम पर डाइवर्ट कर दिया जाता है। जर्मनी, युगांडा आदि में हुए नस्लीय नरसंहारों में भी ये ऐसे ही इस्तेमाल हुए थे।
सभी लाज़मी इबादतें सबसे पहले अपने मालिक का हुकुम हैं, जिन्हें पूरा किया जाना ज़रूरी है। इनसे भले ही कोई फायदा किसी को ज़ाहिर हो या न हो, मगर उसे इन्हें अदा करना है। अगर फायदे नहीं हो रहे, तो इबादतों की रूह हासिल करना सबको चाहिए, वरना सिर्फ एकसरसाइज बन जाती हैं। वैसे हमारे दीन में हर इबादत के फायदे बताये या रखे गए हैं। दीने इस्लाम में कुछ भी ऐसा नहीं है जो बिना वजह हो। इबादतों के फायदे मानसिक, शारीरिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक सभी तरह के हैं। हज या ज़ियारत को जाने के पीछे भी ये सभी फायदें हैं। इसके साथ ही हज में अदा होने वाली रसुमात के पीछे भी मानसिक, नाफिसयाती, रूहानी फायदें हैं। हज की ज़ियारत या रसुमात पर ज़्यादा डिटेल के लिए ब्लॉग देखें।
क्या इस्लाम शब्द भी धर्म शब्द की तरह व्यक्तिगत कर्तव्य के अर्थ रखता है?
क़ुरान और इस्लामी लिटरेचर के मुताबिक इंसान को इख़्तियार करने के लिहाज़ से दीन को एक मुकम्मल निज़ाम (as a complete way or system or code of laws or life) बताया गया है, जो मुहम्मद सल्ल. के वक़्त में (अपनी आखिरी सूरत में) मुक़म्मल हुआ और लोगों को उसे अपनाने और उस पर अमल करने के लिए दिया गया। ये भी मालूम पड़ता है कि ये मुक़म्मल निज़ाम खुद से बना के खुद को दिए जाने का नहीं है बल्कि किसी ऑथरीटी के ज़रिए दिये जाने का है। इसके उलट धर्म शब्द वेदों और हिंदू साहित्य में व्यक्तिगत या सिंगल कर्तव्य, नैतिकता, कर्म के अर्थों में आया है, न कि किसी व्यवस्था के अर्थों में। क्योंकि हमारा यक़ीन है कि वेदों में ईश्वरीय ज्ञान मौजूद है और वेदों का ज्ञान आरम्भ में इस क़ौम को मिला था, इसलिए ऐसा महसूस होता है (गलत भी हो सकता है) कि उस समय धर्म एक व्यवस्था यानी मुक़म्मल निज़ाम में होना भी नहीं चाहिए था, यानी ये शुरआती अनुयायियों के फलाह के लिए पर्याप्त था मगर एक पूर्ण व्यवस्था के रूप में उपलब्ध नहीं था। क्योंकि पूर्ण रूप तो इसे अंत में ही लेना था जब आखिरी बार दुनिया के लिए जारी हुआ था।
क़ुरान और इस्लामी लिटरेचर के मुताबिक इंसान को इख़्तियार करने के लिहाज़ से दीन को एक मुकम्मल निज़ाम (as a complete way or system or code of laws or life) बताया गया है, जो मुहम्मद सल्ल. के वक़्त में (अपनी आखिरी सूरत में) मुक़म्मल हुआ और लोगों को उसे अपनाने और उस पर अमल करने के लिए दिया गया। ये भी मालूम पड़ता है कि ये मुक़म्मल निज़ाम खुद से बना के खुद को दिए जाने का नहीं है बल्कि किसी ऑथरीटी के ज़रिए दिये जाने का है। इसके उलट धर्म शब्द वेदों और हिंदू साहित्य में व्यक्तिगत या सिंगल कर्तव्य, नैतिकता, कर्म के अर्थों में आया है, न कि किसी व्यवस्था के अर्थों में। क्योंकि हमारा यक़ीन है कि वेदों में ईश्वरीय ज्ञान मौजूद है और वेदों का ज्ञान आरम्भ में इस क़ौम को मिला था, इसलिए ऐसा महसूस होता है (गलत भी हो सकता है) कि उस समय धर्म एक व्यवस्था यानी मुक़म्मल निज़ाम में होना भी नहीं चाहिए था, यानी ये शुरआती अनुयायियों के फलाह के लिए पर्याप्त था मगर एक पूर्ण व्यवस्था के रूप में उपलब्ध नहीं था। क्योंकि पूर्ण रूप तो इसे अंत में ही लेना था जब आखिरी बार दुनिया के लिए जारी हुआ था।
कांवड़ का आरंभ
कुछ दशक पहले राम मंदिर आंदोलन के साथ, कांवड़ यात्रा को भी एक टूल के रूप में संघ द्वारा बेहद ज़्यादा प्रोत्साहन दिया गया ताकि लोगों को धर्म से ज़मीनी स्तर पर जोड़ रखा जा सके। जैसे गली- गली में मंदिर बनाये जाते हैं या जागरण, लीलाएं आदि आयोजित की जाती हैं। इस यात्रा का सबसे पुराना उल्लेख अंग्रेज़ो द्वारा लगभग 250 साल पहले बिहार के आस पास के क्षेत्रों के सम्बंध में किया हुआ मिलता है। हालाँकि अब ये सभी उत्तर भारतीय हिंदी बेल्ट क्षेत्रों में प्रचलित है। कांवड़ (अर्थात बांस) शब्द अधिक पुराना नहीं है। मगर कांवड़ यात्रा ज़रूर सदियों पुरानी है। पुराणों के अनुसार देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया जिसमें कई पदार्थ निकले और सृष्टि को समाप्त कर देने वाला विष भी निकला। शिवजी ने सारा विष पी लिया मगर वह इसकी जलन से पीड़ित रहने लगे तो त्रेता युग में शिवभक्त परशुराम गंगाजल लेके आये और उसे शिव पर चढ़ाया। (इस अमृत के लिए हुई छीना झपटी में कुछ बूंदें हरिद्वार, प्रयाग, नासिक, उज्जैन में गिरी और इन चार कुंभ मेला लगने लगा स्नान करके मोक्ष प्राप्ति के लिए)। इसके अलावा पुराणों में श्रावण माह में शिव जल अभिषेक को महत्वपूर्ण बताया गया है। रामायण में वर्णित श्रवण कुमार से श्रावन महीना का नाम रखा हुआ भी माना जाता हूं। श्रवण कुमार अपने अंधे माता पिता को चार धाम की यात्रा पर ऐसे ही कांवड़ की टोकरी में बिठा कर ले गया था मगर शिकार के दौरान राजा दशरथ के तीर से गलती मारा गया था। संभवत इन्हीं देवामालाओं के कारण श्रावण माह में कांवड़ लाने का आरंभ हुआ जो कि मूलतः एक लोक प्रथा है। इस शब्द या यात्रा का कोई ठोस प्रमाण हिन्दूग्रंथों में सीधे तौर पर मौजूद नहीं है। नेट पर इस बारे में लिखा हुआ ज्यादातर इतिहास सुनी सुनाई बातें, गप्प और देवामालाओं पर आधारित है और उनमें ज़्यादातर ऐतिहासिक तथ्य गलत होते हैं और उनके धार्मिक तथ्यों का कांवड़ से सीधा संबंध भी नहीं मिलता है।
कुंभ
अलाहाबाद और शाही स्नान नाम मुस्लिम शासकों से संबंधित लगते हैं. ये सच है कि अकबर, मुख्य मुगल दौर में हिन्दू-मुस्लिम परमपरा के अखाड़े, आयोजन आम थे। इसलिए कुंभ भी मुग़ल काल का आयोजन रहा होगा. हो सकता है कि इसे अकबर ने शुरू किया हो। ये बात तो मशहूर है कि अकबर ने, अकबर के समय में, मुगल काल के दौरान कुम्भ मेले ने ये रूप लेना शुरू किया, जैसा हम आज भी देखते हैं। हो सकता है ये पुराना हिंदू मेला हो और अकबर ने दुबारा स्थापित करवाया हो। इतिहास में हर्षवर्धन (7वीं सदी) द्वारा यंहा बहुत बड़े बौद्ध आयोजन का ज़िक्र ज़रूर मिलता है। शायद ये आयोजन बाद में हिन्दू धर्म वालों ने अपना लिए या हिन्दू आयोजन से रिप्लेस कर दिए या समय के साथ बदल गए/दिए गए, विशेष धर्म के रंग में।
राखी या रक्षाबंधन
राखी बाँधना- बंधवाना गलत नहीं है। ये कोई धार्मिक त्योहार कभी नहीं था। किसी ग्रंथ में इसे धर्म का हिस्सा नहीं बताया गया। कुछ रक्षाबंधन बाँधने की कुछ कथाएं मिलती हैं. इतिहास में भी कुछ उदाहरण मिलते हैं. इनको मिलाकर ये सांस्कृतिक रिवाज बना और फिर बाद में हिन्दू धर्म का त्योहार। मगर ये कल्चरल है। राखी में धर्म का कोई रोल ही नहीं है। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, मित्रता दिवस, मातृ दिवस आदि भी तो गैरों के दिन हैं। ये सभी हराम नहीं है.
गैर मुसलमानों का होने से कोई चीज़ हराम नहीं हो जाती है और कोई मौलाना के कहने से नहीं। इस्लाम में सांस्कृतिक त्योहार की इजाजत है अगर उन्हें शिर्क नहीं है तो, चाहे गैर मुस्लिम ने वो त्योहार बनाया हो। किस के धर्म के उत्सव में भी भाग लेना है, कोई हर्ज़ नहीं, बस हमसे जा कर कोई शुरुआत या गैर अखलाकी काम नहीं करना है।
राखी बाँधना- बंधवाना गलत नहीं है। ये कोई धार्मिक त्योहार कभी नहीं था। किसी ग्रंथ में इसे धर्म का हिस्सा नहीं बताया गया। कुछ रक्षाबंधन बाँधने की कुछ कथाएं मिलती हैं. इतिहास में भी कुछ उदाहरण मिलते हैं. इनको मिलाकर ये सांस्कृतिक रिवाज बना और फिर बाद में हिन्दू धर्म का त्योहार। मगर ये कल्चरल है। राखी में धर्म का कोई रोल ही नहीं है। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, मित्रता दिवस, मातृ दिवस आदि भी तो गैरों के दिन हैं। ये सभी हराम नहीं है.
गैर मुसलमानों का होने से कोई चीज़ हराम नहीं हो जाती है और कोई मौलाना के कहने से नहीं। इस्लाम में सांस्कृतिक त्योहार की इजाजत है अगर उन्हें शिर्क नहीं है तो, चाहे गैर मुस्लिम ने वो त्योहार बनाया हो। किस के धर्म के उत्सव में भी भाग लेना है, कोई हर्ज़ नहीं, बस हमसे जा कर कोई शुरुआत या गैर अखलाकी काम नहीं करना है।
अंशवाद की धारणा
अंशवाद का अर्थ है कि ब्रह्म का अंश प्रत्येक जीव में विद्दमान है या जीव उस ब्रह्म का अंश है। अंशवाद से अवतारवाद जन्मा है। वैदिक काल और वेदों में अंशवाद नहीं है। उनपनिषद काल में कुछ मंत्रो जैसे ऋग्वेद पुरुष सूक्त, यजुर्वेद अंतिम अध्याय आदि के आधार पर अंशवाद की धारणा पनपी। यधपि इनका अर्थ प्रतीकात्मक था और स्पष्ट या प्रत्यक्ष रूप से अंशवाद से सम्बंधित नहीं था। बाद में दर्शन शास्त्रों (उनपनिषदों से जन्मा) में ये धारणा जटिल हो गयी। अंशवाद को मुख्य रूप से 2 भागों में बांटकर समझा जा सकता है।
पहला यह की ब्रह्म सर्व्यापक है क्योंकि सृष्टि ही ब्रह्म में मौजूद है। इसलिए अंत में सब उसी में लीन हो जायेगा। सृष्टि ईश्वर की माया से ढकी हुई है। अज्ञानता दूर होने पर ब्रह्म और स्वयं के एक होने का बोध होता है। दूसरा यह कि सभी (जीवात्मा) एक परमात्मा यानी ब्रह्म से निकली है और इसलिए हर जीवात्मा ब्रह्म है। सब उसी से निकले या बने है मगर सब अलग अलग हैं।
आर्य समाजियों अनुसार ब्रह्म (ईश्वर, परमात्मा अर्थात सवश्रेष्ठ आत्मा), जीवात्मा (प्राणधारी देह को जीव कहते हैं, सूक्ष्मरूप चेतन को आत्मा को कहते हैं, जीवों में मौजूद आत्मा को जीवात्मा कहते हैं जो अनेकों हैं), प्रकृति (जड़ पदार्थ) अनादि और अविनाशी हैं। ईश्वर सर्वज्ञ है, जीवात्मा अल्पज्ञ है और प्रकृति अज्ञ है। ईश्वर साध्य है, जीवात्मा साधक है, प्रकृति जगत जड़ साधन है। जीवात्मा विभिन्न योनियों में विचरण करती है जिनमें मनुष्य सर्वोत्तम योनि है। ईश्वर जीवात्मा, प्रकति को आरम्भ से अस्तित्व देता आया है।
वेदांत दर्शन के अद्वैत मत अनुसार सृष्टि और ईश्वर एक ही हैं, केवल भेद भ्रम है। जगत मिथ्या, माया, भ्रम हैं। वंही द्वैत दर्शन अनुसार जीव और ब्रह्म अलग हैं। जीव ईश्वर का अंश नहीं, बल्कि एक अलग स्वतंत्र सत्ता है हालाँकि उसके अधीन है। जबकि विशिष्टाद्वैत मत अनुसार जीव ब्रह्म का एक अंश है, परन्तु स्वतंत्र नहीं है। वे ईश्वर के अंश नहीं, बल्कि उसके शरीर अंग जैसे है।
हर हिन्दू अंशवाद में आस्था रखता है मगर थोड़े मतान्तर के साथ।
पहला यह की ब्रह्म सर्व्यापक है क्योंकि सृष्टि ही ब्रह्म में मौजूद है। इसलिए अंत में सब उसी में लीन हो जायेगा। सृष्टि ईश्वर की माया से ढकी हुई है। अज्ञानता दूर होने पर ब्रह्म और स्वयं के एक होने का बोध होता है। दूसरा यह कि सभी (जीवात्मा) एक परमात्मा यानी ब्रह्म से निकली है और इसलिए हर जीवात्मा ब्रह्म है। सब उसी से निकले या बने है मगर सब अलग अलग हैं।
आर्य समाजियों अनुसार ब्रह्म (ईश्वर, परमात्मा अर्थात सवश्रेष्ठ आत्मा), जीवात्मा (प्राणधारी देह को जीव कहते हैं, सूक्ष्मरूप चेतन को आत्मा को कहते हैं, जीवों में मौजूद आत्मा को जीवात्मा कहते हैं जो अनेकों हैं), प्रकृति (जड़ पदार्थ) अनादि और अविनाशी हैं। ईश्वर सर्वज्ञ है, जीवात्मा अल्पज्ञ है और प्रकृति अज्ञ है। ईश्वर साध्य है, जीवात्मा साधक है, प्रकृति जगत जड़ साधन है। जीवात्मा विभिन्न योनियों में विचरण करती है जिनमें मनुष्य सर्वोत्तम योनि है। ईश्वर जीवात्मा, प्रकति को आरम्भ से अस्तित्व देता आया है।
वेदांत दर्शन के अद्वैत मत अनुसार सृष्टि और ईश्वर एक ही हैं, केवल भेद भ्रम है। जगत मिथ्या, माया, भ्रम हैं। वंही द्वैत दर्शन अनुसार जीव और ब्रह्म अलग हैं। जीव ईश्वर का अंश नहीं, बल्कि एक अलग स्वतंत्र सत्ता है हालाँकि उसके अधीन है। जबकि विशिष्टाद्वैत मत अनुसार जीव ब्रह्म का एक अंश है, परन्तु स्वतंत्र नहीं है। वे ईश्वर के अंश नहीं, बल्कि उसके शरीर अंग जैसे है।
हर हिन्दू अंशवाद में आस्था रखता है मगर थोड़े मतान्तर के साथ।
आम तौर पर पहली तख़लीक़ की रचना में अल्लाह का अंश शामिल होना मानना इस्लाम में शिर्क माना जाता है।मगर इस्लाम या क़ुरान कंहा लिखा है कि क़ायनात की शुरवात में पहली तख़लीक़ में खुदा का कोई ज़ाती अंश शामिल नहीं था?

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