ऊँचे पांयचे,
रेशम, सोना,
न्यू ईयर,
जुमे का रोज़ा,
शतरंज लूडो कैरम,
इस्लामी टीवी सीरियल,
अल्कोहोल,
थूक,
दहेज़,
वतन से मुहब्बत ईमान।
ईद मुबारक कहना. दो हाथों से मुसाफा कितना जायज़. हस्तमैथुन.
टखनों से ऊपर पायंचे
पुराने ज़माने में और नबी के वक़्त में भी, लटकते हुए कपडे तकब्बुर, अमीरी, फिज़ुलखर्ची, दिखावे की पहचान हुआ करती थी. लोग गरीब, मज़दूर हुआ करते थे. उनके लिए कपड़े
लटकाना मुमकिन ही नहीं था वरना वो काम ही नहीं कर सकते थे, न
ही ऐसे कपडे खरीद सकते थे। उनके कपडे पैबन्दो से भरे होते थे, लम्बे या लटके हुए होने का तो सवाल ही नहीं था. अमीर लोग घरों, महलो में रहते थे और वो मेहनतकश नही थे. इसलिए उनके
कपड़े लंबे चौड़े शाही झलक दिखाने वाले और लटकने वाले होते थे जिन्हें ट्रैन क्लॉथ भी कहा जाता है.
कुरान में लटकते हुए कपड़ो की मनाही नहीं करी गयी है मगर कुरान ने तकब्बुर और फिज़ुलखर्ची को हराम कहा है. इसीलिए नबी ने तकब्बुर की वजह से कपड़े लटकाने
को भी मना कर दिया था क्योंकि ये घमंड, गुरुर की निशानी थे. ये मुमानियत दरअसल नीचे पहने जाने कपडे जैसे तहमद, धोती के बारे में थी. तकब्बुर की वजह से ही अमामा (पगड़ी) की बहुत लम्बी छोड़ी जाने वाली लटकन (शिमला) को भी मना किया गया था. अगर तकब्बुर शामिल है तो यह मुमानियत सलवार या कमीज़ की लम्बाई पर भी लागू होती है.
तकब्बुर की वजह से ही बार बार हदीसों में कपड़ो को
लटकाने से मना किया हुआ मिलता है। इन हदीसों में कपडे लटकाने को मना करने की वजह तकब्बुर बताई गई है. बल्कि एक हदीस से मालूम पड़ता है कि बड़े पेट की वजह अबु बक्र के लटक खुद जाते थे, जिस पर नबी
उनसे कहा था कि तुम घमंड दिखावे वाले लोगों में थोड़े ही हो यानि तुम्हारे लिए इसमें कोई हर्ज नहीं है।
एक सहाबी ने जब नबी से पूछा कि मेरा दिल करता है कि मैं अच्छी, खुबसूरत चीज़ें पहनूं तो क्या यह तकब्बुर है. इस पर आपने कहा कि अल्लाह खुद खुबसूरत है और खूबसूरती पसंद करता है, यह तकब्बुर नहीं है, तकब्बुर तो वो है जब कोई हक के सामने मुखालफत में खड़ा हो जाता है या जब कोई दूसरों को हकीर जानने लगता है. इस हदीस से वाज़ेह है कि लटकते हुए कपडे, रेशम, सोना पहनना भी उस वक़्त तकब्बुर की निशानी था. आज तकब्बुर की निशानियाँ कुछ और सकती हैं, जिनसे बचना बहुत ज़रूरी है.
The Prophet said: Isbaal (wearing ones garment below
the ankles) may apply to the izaar (lower garment), the shirt or the turban.
Whoever allows any part of these to trail on the ground out of arrogance,
Allaah will not look at him on the Day of Judgement (Dawud 4085 and Nisaai 5334).
The Prophet said: Allaah will not look at the one
who trails his izaar on the ground out of pride (Bukhari 5788).
The Prophet said: Beware of wearing ones lower garment below the ankles, because this is a
kind of showing-off, and Allaah does not love showing-off (Tirmidhi 2722).
Abu Bakr said to the Prophet: My izaar slips down if I do not pay attention to
it. He said: You are not one of those who do it out of pride (Bukhari 5784).
रेशम, सोना
पुराने ज़माने में और नबी के वक़्त में भी, लटकने वाले कपडे, रेशम और सोना, तकब्बुर, अमीरी, फिज़ुलखर्ची, दिखावे की पहचान हुआ करती थी. कुरान में रेशम, सोने की मनाही नहीं करी गयी है मगर कुरान ने तकब्बुर और फिज़ुलखर्ची को हराम कहा है.
पहले के ज़माने में सोना, चांदी करेंसी हुआ करती थी. नबी ने औरतो, मर्दों को सोना, चांदी पहनने से रोक दिया था जिसके बाद औरतों
ने जब इसे श्रृंगार, ज़ेनब से जोड़ कर इजाज़त चाही तो नबी ने औरतों को इसकी
इजाज़त दे दी थी.
इसी तरह रेशम अमीरों का या मंहगा लिबास हुआ करता था. रेशम को विदेशों से आयात किया जाता था जो अमीर ही करते थे. इसलिए रेशम को भी मना कर दिया गया था.
अंग्रेज़ी नया साल मनाना कैसा है?
दुनिया में सभी कैलेंडर या तो सोलर होते हैं या लूनर। एक लूनर कैलेंडर में सोलर के मुक़ाबले 10-12 दिन कम होते हैं। कोई भी कैलेंडर धार्मिक नहीं है। न ईसाई, न हिन्दू, न मुस्लिम न कोई अन्य। सभी कैलेंडर का अपना शासकीय, सांस्कृतिक, स्थानीय इतिहास है। भले ही किसी धर्म या उसके अनुयायियों में धार्मिक, सामाजिक तौर पर किसी खास कैलेंडर को तवज्जो मिली हुई हो।
विक्रम (1st Cent. BC) और शक (1st Cent. AD) संवत राजाओं द्वारा शुरू हुए थे। इन हिन्दू माने जाने वाले कैलेंडर में (जो कि धार्मिक नहीं हैं) में हर 2-3 साल में 1 'अधिक' मास बढ़ा कर इनके दिनों की संख्या अंग्रेज़ी कैलेंडर के समानांतर कर दी जाती है। हिजरी कैलेंडर भी एक लूनर कैलेंडर है। यह भी वैसे ही हर साल कुछ दिन कम हो जाता है और इसीलिए लगभग 33 साल में यह वापिस घूम कर उसी मौसम में आ जाता है।
हिजरी कैलेंडर भी दीनी या इस्लामिक नहीं है क्योंकि इस्लाम का असल मक़सद इंसानों को फलकियात नहीं बल्कि अखलाकियात सीखाना है। हम इसे ज़्यादा से ज़्यादा इस्लाम या मुसलमानों से जुड़ा हुआ कह सकते हैं।
हिजरी कैलेंडर प्राचीन अरब का एक लूनर कैलेंडर है जो मुहम्मद साहब से पहले से ही चालू था और इसके महीनों के नाम भी यही थे। इस कैलेंडर को किसने बनाया, किसने इसके महीनों का नामकरण किया, मुस्लमानों ने या किसी गैर मुसलमानों ने, हम यक़ीन से कुछ नहीं कह सकते। कुछ लोग इसमें कुछ दिन जोड़ कर इसे सोलर कैलेंडर के बराबर ले आते थे ताकि दूसरे देश के व्यापारियों आदि से विनिमय, लेन देन आसान हो सके।
क़ुरान (9:36-37) के मुताबिक (हुरमत के) पाक महीने (2:217, 9:5 में भी इनका ज़िक्र है) पहले से ही लोगों को वाज़ेह थे और क़ुरान ने यंही पर यह भी बताया कि अल्लाह के यंहा 12 महीने ही होते हैं जो तब से चले आ रहे हैं जब से ज़मीन- आसमान बने हैं और इनमें से 4 महीने पवित्र हैं। क्योंकि दौरे जाहिलिया के दौरान अरब में बहुत लूट-पाट होती थी इसलिए काबे की यात्रा के मद्देनजर लोग इन चार महीनों में लड़ना बंद कर देते थे ताकि सभी हज को प्रायोरिटी दे सके। ये महीने थे जुलकदा (11th महीना) और जुलहिज्जा (12th महीना) जो हज के लिए मख़सूस थे। साथ ही रमज़ान (1st महीना) जो हज से सुरक्षित वापसी के लिए मख़सूस था और रजब (7th महीना) जो अरब वासियों को साल के बीच में उमराह करने के लिए था। अल्लाह ने क़ुरान में सिर्फ इनकी हुरमत का बयान किया है। इसलिए हम यकीन से नहीं कह सकते कि इसके चार पाक महीनों को इतिहास में कब, किसने, कैसे हुरमत दी, इंसानों ने या अल्लाह ने।
यंहा पाक महीनों का ज़िक्र है इसलिए यह बात यक़ीनन लूनर कैलेंडर के बारे में है। इसका मतलब यह है कि पृथ्वी के निर्माण से ही चांद के यही सेटजेस होते थे।
हालांकि 10 मुहर्रम पहले से ही मूसा अलैह. के साथ जुड़ा हुआ था और फिर यह दिन बाद में हुसैन अलैह. की शहादत के साथ जुड़ भी गया। इसी तरह बाद में रजब में ही नबी को इसरा- मेराज हुआ था।
हज़रत उमर ने हिजरत (622 AD में) के लगभग 16 साल बाद इसे हिजरी नाम से हज़रत अली के मशवरे पर हिजरत के साल से फिक्स किया था और हज़रत उस्मान के मशवरे पर इसका पहला महीना मुहर्रम तय किया था। मुहर्रम पहले से ही एक पाक महीना माना जाता था और जुल हिज्जा के बाद आता था यानी अब इबादतों या हज का नया साल शुरू होगा। आखिर शासकीय, राजनीतिक, व्यापारिक गतिविधियों के लिए सन संख्या और वर्ष का पहला महीना तय करना बहुत ज़रूरी था। इसलिये अंग्रेज़ी कैलेंडर जिसे ईसाई कैलेंडर भी कहा जाता को मनाने में कुछ भी गैर इस्लामिक नहीं है। इसे बिना शिर्क, कुफ्र, गुनाह, बदअखलाकी करे हुए मनाया जा सकता है। सूरज और चांद दोनों अल्लाह के हैं और इस्लाम के मुताबिक सोलर और लूनर दोनों चालों से वक़्त (जैसे नमाज़ों और रोज़े का) और दिन (महीनों और साल) का हिसाब रखा जाता है।
मुसलमानों के साथ साथ आज बहुत से हिंदुओं में भी ये विपरीत भावना फैल गई है कि यह अंग्रेज़ी कैलेंडर हमारा नहीं है बल्कि हमारा तो फला फला होता है। हालांकि यही लोग अपने जीवन में अपनी जन्म दिन, शादी की डेट, कारोबार संबंधित तारीखें इसी अंग्रेज़ी कैलेंडर के हिसाब से लेके चल रहे होते हैं बल्कि इन्हें अपने तथाकतीथ धार्मिक कैलेंडर के अनुसार इन दिनों की तिथियां भी याद नहीं होती।
सिर्फ जुमे या शनिवार का रोज़ा रखना कैसा है?
कुछ हदीसों में है कि जुमे के दिन रोज़ा रखने की मनाही नबी ने करी थी। पर साथ ही उन्हें इजाज़त दी थी जो जुमेरात या शनिवार के दिन भी रोज़ा रखे जुमे के साथ साथ। इसलिये उलेमा ने सिर्फ जुमे को रोज़ा रखना मकरूह क़रार दिया है।
इसे मना करने की कुछ वजूहात थी जैसे:-
जुमे का दिन इस्लाम में अहम दिन है, इस दिन ग़ुस्ल किया जाता है, धुले-साफ कपड़े पहने, तैयार हुआ जाता है, जुमे की बड़ी भीड़, जमात में दूर जा के शामिल होना होता है, लंबी नमाज़ और खुतबा होता है, दवाओं, अज़कार, इबादतों में बढ़ोतरी हो जाती है वगैरह वगैरह। ये सब रोज़दार के लिए मशक्कत पैदा करेंगी। खासतौर पर उस ज़माने में या पुराने ज़माने में तो ये दुश्वारियां बहुत ज़्यादा थी जब आज जैसी सहूलतें नहीं थी।
इसके अलावा, नबी को यह अंदेशा हुआ था कि जुमे की अहमियत देखते हुए लोग सिर्फ जुमे का रोज़ा रखना शुरू कर देंगे तो बाद में यह एक बिदअत न बन जाये। इसलिए दो लगातार दिन रोज़ा रखने की शर्त लगा दी ताकि लोग डिस्करेज हो जाएं।
इन सबकी रोशनी में, यह साफ है कि यह खास प्रीकॉशनरी हिदायत थी और अगर ऐसे इमकान न हो तो सिर्फ जुमे के दिन रोज़ा रखा जा सकता है, इन सभी बातों का ख्याल करते हुए (मगर हर जुमे को या बार बार जुमे को ही रोज़ा नहीं रखना)।
इसी तरह हदीसों में शनिवार का रोज़ा भी मना किया हुआ मिलता है, बशर्ते दो लगातार रोज़े रखने वालों के लिए नहीं यानी शनिवार के साथ साथ जुमे या इतवार को भी। इसकी वजह यह बताई जाती है कि शनिवार यहूदियों के लिए जुमे जैसा इबादत का दिन होता है (जैसे ईसाइयों के लिए इतवार होता है, असल में इन दोनों कौमों ने सिर्फ अपने अपने इस दिन को इबादत के लिए खास कर लिया था जैसे अमलन आज मुसलमानों ने भी जुमे को कर लिया है), वो इस दिन कोई काम नहीं करते और आराम करते हैं। इसलिए उनकी मुशाबिहत से बचने के लिए ऐसा कहा गया है क्योंकि रोज़दार भी रोज़े की हालत में आराम की तरफ माइल होगा। इस हदीस को बाज़ उलेमा कमज़ोर मानते हैं इसलिए वो शनिवार को रोज़ा रखना मकरूह नहीं मानते हैं। हो सकता है जुमे वाली हदीस से ही शनिवार वाली हदीस पैदा हुई हो। खैर जो भी हो, शनिवार का हुक्म जुमे के हुक्म जैसा नहीं है।
निष्कर्ष यह है कि सिर्फ शनिवार या सिर्फ जुमे के दिन रोज़े रखे जा सकते हैं, मगर ऊपर बताई गयी सभी बातों का ख्याल रखते हुए।
लूडो, कैरम, शतरंज क्या हराम है?
लूडो और शतरंज को जिन हदीस की बुनियाद पर नाजायज़ कहा जाता है, उन हदीस में नर्द शब्द आया है जो शतरंज की तरह ही एक फारसी खेल था जो मुख्य रूप से जुआ था। उलेमा ने इसे शतरंज, लूडो और कैरम के साथ मिला दिया। शतरंज, लूडो आदि अपने आप में हराम नहीं हैं। कुरान में साफ-साफ बताया गया है कि कौन सी चीजें हराम हैं और कुरान की हराम चीजों में ऐसा कुछ नहीं है। दरअसल चौसर भी हराम नहीं है, सिर्फ जुआ खेलना हराम है। जैसे ताश खेलना गलत नहीं है। लेकिन जुवे के लिए ताश खेलना हराम है। जब भी दिवाली पर ताश की बात होगी तो इसे हराम ही माना जाएगा क्योंकि दिवाली पर ताश खेलना 100% जुआ होता है। पत्ते खेलना और दिवाली पर पत्ते खेलना, दोनों में फर्क है। यही उसूल हर ऐसे खेल पर लागू किये जायंगे जिन पर शक है और उन पर आखिरी फैसले लिए जायंगे. बहुत से जायज़ खेल दिमाग - जिस्म को चुस्ती देते हैं, उन्हें खेला ही जाना चाहिए.
कुरान ने लहवल हदीस यानी अनावश्यक बातचीत या किसी चीज़ की अति से मना किया है। यानी ऐसी ज्यादती या अधिकता जो बन्दे को अपने रब, आखिरी मकसद से दूर, गाफिल कर दे. इस बात का भी हर क्षेत्र कार्य में ख्याल रखा जाए .
इस्लामी ड्रामे या मुसलमानी
ये वही क़ौम और उलेमा है जो कभी न्यूमेरिकल साइंस, प्रेस, घड़ी से नमाज़ टाइम देखना, लाउडस्पीकर से अज़ान, स्कूल यूनिवर्सिटी, वेस्टर्न एजुकेशन, कैमरा, फोटो और पता नही क्या क्या हराम कह चुके थे। 10-20 साल और रुक जाइए। सहाबा के चेहरे दिखानवाली फिल्म न देखिये कहने वाले उलेमा खुद उनके रेफरेन्स देते हुए नज़र आएंगे। जैसे अन्य मामले में हुआ है। उन्हें अभी ये एहसास ही नही है आने वाले वक्त में किताबों और लेखन की जगह, यही वीडियोस ले लेगी। वैसे मैं खुद भी साहबा के चहरे दिखाने को तरजीह नही देता हूँ। पर अगर मास लेवल पर न्यूट्रलिटी मेन्टेन करते हुए, सभी मुस्लिम स्कूल ऑफ थॉट्स या तथाकथित फ़िरक़े या पंथों के साथ एग्री करके सिर्फ कॉमन हिस्ट्री को दिखाया जाए, कॉन्ट्रोवर्शियल चीज़ें छोड़ते हुए, जिनका दिखाना आज के वक़्त ज़रूरी हो जाये, या कोई ऐसी फिल्म बना दे तो मुझे नही लगता इसमे शरीयतन कोई मनाही है। मैलवियों की हठधर्मी और दूरंदेशी तो आप सब को पता ही है। लोगो की किताबों में रुचि खत्म है, वो बेहयाई देखना छोर कर, ऐसी बनाई हुई फ़िल्म देख ले तो क्या बुरा है। वैसे मैं मुसलमानों की तारीख को इस्लाम की तारीख बना के दिखाने की सख्त खिलाफ हूँ। इससे बनावटी शौर्य उम्मत में भर जाता है जिसकी हवा तब निकल जाती है जब ऐसे ज़्यादातर बदशाओं की गलतियां निकल कर सामने आती है। हालांकि ऐसे ड्रामे, बॉलीवुड आदि देखने से तो अच्छे है।
Alcohol in Perfumes and Sanitizers
Alcohol nahi nahin hai par Haram hai. Yani uska peena hi haram hai, na ki kanhi lagana. There is a difference between Napak (Najis) and Haram things. You can drink Gallons of Alcohol, if you don't get intoxicated a bit. It's a fatwa given by Shaikh Asim Al Haqim, a Salafi Scholar from Gulf. The example about gallons is for non intoxication purposes and not for those who say we don't get intoxicaated with just one peg. The person who says he doesnt get intoxicated with one peg and that is why he drinks till he is conscious. Every such person who says so doesn't drink the first peg with this intention, on the contrary he intends to drink for intoxication. He has this intention from the first peg. That is why for such people and with such feelings, a drop of alcohal is haram. The alcohol is prohibited for its intoxication, and if one feels no intoxication with it, it's not haram, that is why, it's use in medicine is allowed.
Similarly, it's allowed in perfumes and in sanitizers and even it may be used to wash masajid floor etc. Because no one gets intoxicated by the above acts. The point is we should undersigned things in detail. The alcohol will treated as haram only when the intention or purpose of using it will be intoxication. Before that it's not haram. It may be used for non drinkable and for drinkable medical purpose, if scientifically proven and no other treatment is available there. You know if you keep alcohol open for a few days in certain conditions, the intoxication qualities vanish from it and it becomes as plain as water. In that condition, it will be still called alcohol but it will not give the expected results.
थूक हराम है या नापाक
थूक हराम नहीं पाक़ है। थूक कपड़ो पर लगा हुआ हो तो भी नमाज़ हो जाएगी। थूक गंदगी, नजिस होता है। थूक न लगा हो कपड़ो पर या जिस्म पर तो बेहतर है और अफ़ज़ल भी है। और वैसे भी सबको अपनी और हर जगह सफाई रखनी चाहिए।
रही बात मस्जिद में थूकने की तो थूकना नही चाहिए क्योंकि मस्जिद या मंदिर या अपना घर ही क्यों न हो, वंहा गंदगी न मचाई जाए बल्कि साफ सुथरा रखना चाहिए। हालांकि मस्जिद में अगर थूकने की जगह दूर है या वंहा जाने में टाइम लग सकता है या वंहा पहुंचना मुश्किल है क्योंकि बाकी लोग आस पास नमाज़ पढ़ रहे है या आदमी की तबियत खराब है तो मस्जिद में भी थूक सकता है पर वंहा ज़मीन मट्टी वाली होनी चाहिए और थूक कर उस पर मिट्टी डाल देना चाहिए ताकि किसी को उसे देख कर घिन्न न आये। इन कंडीशन्स में मस्जिद में परमिटेड है। पर आजकल मस्जिदे मिट्टी की फर्श वाली नही बाकी कालीन या मार्बल वाली होती है इसलिए वंहा नही थूक सकते क्योंकि वंहा थूक ज्यों का त्यों बना रहेगा यानी गंदगी रहेगी। ये वैसे ही है जैसे चप्पल जूते पहन कर पढ़ना जायज़ है बल्कि सुन्नत भी साबित है। पर शर्त है की वह पाक या साफ होनी चहिए उसपर कोई गंदगी न लगी हो।
नापाकी और गंदगी में भी क्या फर्क होता है। जैसे सड़क पर पड़ा गू नापाक होता पर सड़क पर पढ़ा खून गंदगी माना जाएगा। नमाज़ के लिए पाकी होनी चाहिए। यानी कपड़ो पर गू लगा हो तो नही पढ़ सकते ओर खून लगा हो तो पढ़ सकते है पर अच्छा तो यही होगा कि खून को साफ कर लिया जाए। हर गंदी चीज़ नापाक नही होती पर हर नापाक चीज़ गंदी होती है।
दहेज़
क़ुरान
ने सुरहः अराफ में किसी का हक़ मारने और किसी कि जान,माल,आबरू के खिलाफ
ज़्यादती को हराम करार दिया है। अगर दहेज से किसी के माल के साथ ज़्यादती हो
रही है या दहेज़ इकट्ठा करने, लेने, देने में किसी का हक़ मर रहा है तो ये
हराम ही है। दहेज की और भी कई सूरत हो सकती है जो इन आयात में फिट बैठे।
क्या वतन से मुहब्बत आधा ईमान है जैसी कोई हदीस है?
वतन से मुहब्बत आधा ईमान है, ऐसी कोई हदीस नहीं है। वतन से मुहब्बत ईमान का हिस्सा है, ऐसी रिवायत ज़रूर हदीस की दीगर किताबों में मिलती है जिसे तमाम मुहद्दिस मौज़ू, मनघडंत करार दे चुके हैं।
हालांकि यह कहना बिल्कुल दुरुस्त है कि वतन से मुहब्बत फ़ितरी है या फितरत का हिस्सा है। (यंहा मुराद अपने इलाके से है क्योंकि यह मुल्क, शहर, बस्ती, गली कुछ भी हो सकता है और उसकी हदें भी उसी कॉन्टेक्स्ट में समझी जायँगी)। यह जज़्बाती जुड़ाव अक्सर पैदाइश, परवरिश से जुड़ी हुई जगह के प्रति बेहद शदीद होता है। यह इलाकाई मुहब्बत या लगाव न सिर्फ इंसानों में बल्कि जानवरों, परिंदों वगैरह में भी पायी जाती है।
नबी सल्ल. को भी मक्का (अपनी जगह, ज़मीन) से बहुत मुहब्बत थी जो आपकी सीरत और हदीसों से मालूम पड़ता है। आपने बड़े गम के साथ दिल पर पत्थर रख कर मक्का छोड़ा था और जाते हुए पलट कर मुहब्बत का इज़हार किया था।
ईद मुबारक कहना और दो हाथों से मुसाफा कितना जायज़?
ईद मुबारक कहना भी नबी से साबित नहीं है। नबी और सहाबा ने ऐसा किया, किसी हदीस में नही है। इसी तरह दो हाथों से मुसाफा करने से ज़्यादा नबी से आम हालातों में एक हाथ से मुसाफा करना बेहतर तरीके से साबित है।
ऐसे मामूली और सिंपल सोशल रिवाज, एटीकेट इतने बड़े बड़े मसलाइल बना कर, तमाम तरह की बहसें, सबूत इकट्ठा करके हमारे उलेमा और मौलवी हज़रात ने अपनी जिंदगियां लगा कर हम हल करके दिये हैं कि आप फला कर सकते हो, फला नहीं क्योंकि नबी ने ऐसा नहीं किया, वैसा नहीं किया। जैसे इस्लाम का इन्हीं मक़सद के लिए नाज़िल हुआ था। दुनिया चांद पर पहुँच गयी है और हम अभी पहली तारीख के चांद के दीदार के पर मसले अनेको फिरको में बंटे हैं।
हस्तमैथुन के जयाज होने का प्रचार प्रसार करना
हस्तमैथुन करना वैसे तो जायज़ है क्योंकि इसमें किसी और के साथ ज़्यादती नहीं हो रही होती है मगर इससे बचना ज़्यादा बेहतर है.
इस मुद्दे को इस तरह अधूरा वाज़ेह करना सही नहीं है। इससे गैर ज़िम्मेदाराना व्यवहार व्यक्त हो रहा है। जिस वक्त की बात हो रही है उस वक़्त पोर्न मटेरियल नहीं था। उस वक़्त शादियां भी जल्द हो जाया करती थी। उस वक़्त अफ्फेयरस या फ़ोन सेक्स वगैरह जैसी बहुत चीज़ें नहीं थी। तब और अब में फर्क है। इस फर्क समाज में बहुत सी बुरी चीजों को बढ़ावा दे सकता है। ऐसी चीजों को जायज़ नाजायज़ प्रकृति को आम करते हुए है ये भी ज़ुरूरी है कि ये भी वाज़ेह किया जाए कि इससे क्या खतरे पैदा हो सकते है समाज मे, इंसान के अंदर आदि। साथ ही शादी, हया वैगरह मकसद को भी स्पष्ठ किया जाए और अल्लाह ने जिस चीज़ के लिए ये दुनिया, इंसान, शरीर, अंग बनाये हैं, या इनसे संबधीत दूसरे अहकाम के मद्देनजर भी इन पर रोशनी डाली जाए। ये मुद्दा एक डेटिलेड टॉपिक है, इस चंद शब्दो में समझाने से फायदे की बजाय नुकसान ज़्यादा हो सकता है।
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