सज़ा और अज़ाब के लगभग एक ही मायने हैं।
सज़ा और आज़माइश में फ़र्क़ करने का कोई क्लियर कट तरीका नही है। ये तो सेल्फ इंट्रो स्पेक्शन का इशू है यानी खुद में झांकने कर जवाब लेने का। सज़ा और आज़माइश में फ़र्क़ ये है कि..
जब आप अल्लाह, सुन्नत, दीन पर चलोगे और चलने के कारण जो मुश्किलें, तकलीफे, रुकावटे बीच में आएंगी वो सब आज़माइश में मानी जाती हैं। जैसा कि हुज़ूर सल्ल०, सहाबी या दूसरे पैग़म्बर झेलते थे। अज़माइश जितनी बढ़ती जाती है, ईमान और ज़्यादा पुख़्ता, निखरता चला जाता है। अल्लाह के करीब और करीब जाने का महसूस होता रहता है। अज़माइश का एक उसूल ये भी है कि आज़माइश देते हुए रास्ता दिखता रहता है। मंज़िल तो पता होती ही है। मंज़िल भी की कंहा से मिलेगी ये भी दिखता है। कैसे इससे निकलेंगे ये भी मालूम होता चला जाता है। अल्लाह पर यक़ीन बढ़ता चला जाता है। तसल्ली और मुतमयिनी रहती है। एक पाजिटिविटी रहती है। इससे निकलने के बाद आप का मुक़ाम ऊंचा हो जाता है। इसके बाद इनाम है, ख़ासतौर पर आख़िरत में।
पर अल्लाह, सुन्नत, दीन को छोड़ने पर सज़ा मिलती है। इनमे रास्ता नही दिखता। मंज़िल तो पता ही नही होती। चीज़े हल होती हुई नहीं दिखती है। बेसब्री रहती है। डर रहता है। नेगेटिविटी रहती है। इसके बाद आप का मुक़ाम ऊंचा नही होता बल्कि आप दूसरों के लिए इबरत बनते हो। इसके बाद आख़िरत में भी सज़ा है।
इनको छोड़ देने पर जो सज़ा हमें इंफ्रादी तौर पर मिलेंगी वो सज़ा है और जो ईशतिमायी तौर पर जो मिलेगी वो अज़ाब होगा। किसी आज़ाब में किसी के लिए आज़माइश भी हो सकती है।
हमे खुद सोचना है कि हम अल्लाह, सुन्नत, दीन से दूर है या पास। हमे खुद में झांक कर सोचना है कि ये सज़ा है या अज़ामिश? इंफ्रादी है या इश्तिमाई? इसके आने से पहले हम अल्लाह से दूर होते जा रहे थे या पास। इसका हल है हमारे पास या नहीं। जवाब आपको मिल जाएगा।
जब पहले आप ये समझ जाओगे की ये आज़माइश है या सज़ा या आज़ाब। यक़ीनन इन सबका इलाज, मंज़िल, रास्ता, हल वैगरह कंहा से मिलेगा, कैसे मिलेगा, सब बातें आप को सामने साफ साफ़ दिख जाएगी इंशाअल्लाह।
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क़ुदरती आफ़तें: अज़ाब, आज़माइश या सिर्फ मौत?
क़ुरान, तारीख़ और दुनिया के मुशाहीदे से ऐसा मालूम होता है कि क़ुदरती आफतें दो शक्लों में नाज़िल होती है, पहली इंसानों पर आज़माइश के तौर पर और दूसरी हुज्जत तमाम होने पर अज़ाब के तौर पर।
क़ुरान (2:155) ने बताया है कि अल्लाह लोगों को ख़ौफ़ से, भूख से और जान, माल, पैदावार के नुक़सान से आज़माता है। इसमें आज़माइश के तौर पर नाज़िल हुई कुदरती आफ़तों का ज़िक्र किया गया है। क़ुरान (42:30) कहता है कि जो मुसीबत तुम्हें पहुंचती है, वह तुम्हारे अपने हाथों के कमाए हुए अमाल की वजह से है और बहुत कुछ तो वो माफ कर देता है। ज़ाहिर है ये ख़ुदा की हिकमत और फैसला है कि किसे क़ुदरती आफ़तें आज़माइश के तौर पर मिलती हैं और किसे सज़ा के तौर पर।
क़ुरान (6:65, 6:47; 28:59, 17:15) ने बताया कि आसमान या ज़मीन से आने वाले, फिरक़ो में बाँट कर आपस में भिड़ाने वाले या एक दूसरे की ताक़त का मज़ा चखवाने वाले अज़ाब होते हैं; जो चुपके से या ऐलानिया दोनों तरह से आ सकते हैं (इसका मतलब दिन की रोशनी या रात के अंधेरे में, भी लिया जाता है)। प्रसंग से स्पष्ट कि यंहा हुज्जत तमाम होने पर ज़ालिम क़ौमों और बस्तियों पर आने वाले अज़ाब की मुख़तलिफ़ शक्लों का ज़िक्र करा गया है। कुदरती आफ़तों और ऊपर बताई गयी शक्लों के अलावा, इसकी कुछ और शक्लें भी होती हैं जैसे ज़िल्लत, मेहकुमी वगैरह। इस तरह के अज़ाब की आमद उनके हक़ के ख़िलाफ़ किए गए ज़ुल्म की वजह से होती है, मगर तब जब कोई रसूल उनको इल्हामी बेख़बरी से निकालकर अल्लाह की बात से ख़बरदार कर देता है।
क़ुरान (47:38) से मालूम पड़ता है कि जब मोमिन अपनी ज़िम्मेदारीयों से मुंह मोड़ लेते हैं या पीछे हट जाते हैं तो उन्हें हटा या पलट दिया जाता है। इसे भी क़ुरान (9:39) ने अज़ाब कहा है। ऐसा महसूस होता है कि यह बदलाव कई सूरतों के ज़रिए हो सकता है जैसे इल्मी बरतरी, दुनियावी तरक़्क़ी, हुक़ूमती या सियासी ताक़त, माशरी हैसियत वगैरह छिन जाना और शायद क़ुदरती आफ़तें आना भी।
इससे यह बात समझ आती है कि आज के दौर में क़ुदरती आफतें आम इंसानों के लिए बेशक अल्लाह की एक याददिहानी है। यह अल्लाह की तरफ़ से मौत की एक निशानी है ताकि लोग अब तक बीती ज़िन्दगी से सबक लें और आगे सही रास्ते को चुनें। क़ुदरती आफतों की हक़ीक़त यही है कि अल्लाह किसी खास मुक़ाम या इलाक़े में रह रहे लोगों की मौतों को रोज़- रोज़ देने की बजाए, इकट्ठा करके, किसी एक दिन, एक साथ कुदरती आफतों में दे देता है ताकि इनसे बाकी इंसानों को इससे सबक़ मिले और वो ज़िन्दगी की अहमियत और मक़सद को समझें। ऐसे हादसें दुनिया में एक लंबे अरसे तक अपना असर छोड़ते हैं। तमाम इंसानों के लिए यह एक आखिरत की अलामत है और मरने वालों के लिए सिर्फ मौत। इससे बढ़कर, ज़िंदा बच जाने वाले इन्सानों के लिए यक़ीनन ये एक आज़माइश है। रही बात बहैसियत एक क़ौम, उन खास नाफरमान या गैर जिम्मेदार मोमिनों की तो उनके लिए ये कोई आज़माइश है या अज़ाब, इसका फैसला वो क़ुरान और सुन्नत में मौजूद इन दोनों चीजों की बताई गई पहचानों के मद्देनज़र करने की कोशिश करें, क्योंकि इसका असल इल्म तो अल्लाह के ही पास है।
क़ुरान, तारीख़ और दुनिया के मुशाहीदे से ऐसा मालूम होता है कि क़ुदरती आफतें दो शक्लों में नाज़िल होती है, पहली इंसानों पर आज़माइश के तौर पर और दूसरी हुज्जत तमाम होने पर अज़ाब के तौर पर।
क़ुरान (2:155) ने बताया है कि अल्लाह लोगों को ख़ौफ़ से, भूख से और जान, माल, पैदावार के नुक़सान से आज़माता है। इसमें आज़माइश के तौर पर नाज़िल हुई कुदरती आफ़तों का ज़िक्र किया गया है। क़ुरान (42:30) कहता है कि जो मुसीबत तुम्हें पहुंचती है, वह तुम्हारे अपने हाथों के कमाए हुए अमाल की वजह से है और बहुत कुछ तो वो माफ कर देता है। ज़ाहिर है ये ख़ुदा की हिकमत और फैसला है कि किसे क़ुदरती आफ़तें आज़माइश के तौर पर मिलती हैं और किसे सज़ा के तौर पर।
क़ुरान (6:65, 6:47; 28:59, 17:15) ने बताया कि आसमान या ज़मीन से आने वाले, फिरक़ो में बाँट कर आपस में भिड़ाने वाले या एक दूसरे की ताक़त का मज़ा चखवाने वाले अज़ाब होते हैं; जो चुपके से या ऐलानिया दोनों तरह से आ सकते हैं (इसका मतलब दिन की रोशनी या रात के अंधेरे में, भी लिया जाता है)। प्रसंग से स्पष्ट कि यंहा हुज्जत तमाम होने पर ज़ालिम क़ौमों और बस्तियों पर आने वाले अज़ाब की मुख़तलिफ़ शक्लों का ज़िक्र करा गया है। कुदरती आफ़तों और ऊपर बताई गयी शक्लों के अलावा, इसकी कुछ और शक्लें भी होती हैं जैसे ज़िल्लत, मेहकुमी वगैरह। इस तरह के अज़ाब की आमद उनके हक़ के ख़िलाफ़ किए गए ज़ुल्म की वजह से होती है, मगर तब जब कोई रसूल उनको इल्हामी बेख़बरी से निकालकर अल्लाह की बात से ख़बरदार कर देता है।
क़ुरान (47:38) से मालूम पड़ता है कि जब मोमिन अपनी ज़िम्मेदारीयों से मुंह मोड़ लेते हैं या पीछे हट जाते हैं तो उन्हें हटा या पलट दिया जाता है। इसे भी क़ुरान (9:39) ने अज़ाब कहा है। ऐसा महसूस होता है कि यह बदलाव कई सूरतों के ज़रिए हो सकता है जैसे इल्मी बरतरी, दुनियावी तरक़्क़ी, हुक़ूमती या सियासी ताक़त, माशरी हैसियत वगैरह छिन जाना और शायद क़ुदरती आफ़तें आना भी।
इससे यह बात समझ आती है कि आज के दौर में क़ुदरती आफतें आम इंसानों के लिए बेशक अल्लाह की एक याददिहानी है। यह अल्लाह की तरफ़ से मौत की एक निशानी है ताकि लोग अब तक बीती ज़िन्दगी से सबक लें और आगे सही रास्ते को चुनें। क़ुदरती आफतों की हक़ीक़त यही है कि अल्लाह किसी खास मुक़ाम या इलाक़े में रह रहे लोगों की मौतों को रोज़- रोज़ देने की बजाए, इकट्ठा करके, किसी एक दिन, एक साथ कुदरती आफतों में दे देता है ताकि इनसे बाकी इंसानों को इससे सबक़ मिले और वो ज़िन्दगी की अहमियत और मक़सद को समझें। ऐसे हादसें दुनिया में एक लंबे अरसे तक अपना असर छोड़ते हैं। तमाम इंसानों के लिए यह एक आखिरत की अलामत है और मरने वालों के लिए सिर्फ मौत। इससे बढ़कर, ज़िंदा बच जाने वाले इन्सानों के लिए यक़ीनन ये एक आज़माइश है। रही बात बहैसियत एक क़ौम, उन खास नाफरमान या गैर जिम्मेदार मोमिनों की तो उनके लिए ये कोई आज़माइश है या अज़ाब, इसका फैसला वो क़ुरान और सुन्नत में मौजूद इन दोनों चीजों की बताई गई पहचानों के मद्देनज़र करने की कोशिश करें, क्योंकि इसका असल इल्म तो अल्लाह के ही पास है।
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लोगों के लिए परेशानियां उनकी माद्दी तौर पर करी गई कमियों, लापरवाहीयों की वजह से भी आती हैं जैसे गलत खान-पान, रख-रखाव वगैरह और अख़लाक़ी तौर पर करी गई गलतियों, गुनाहों, जुर्म की वजह से भी आती हैं। ये इम्तिहान और आज़माइश दोनों तौर पर भी आती हैं। ये परेशानियां या सज़ा पाक दामन लोगों को दुनिया में ही उनकी किसी खता से पाक करने के लिए भी आती हैं क्योंकि वंहा के मुक़ाबले यंहा सज़ा आसान है और वंहा उनके लिए फिर खुशियां ही खुशियां है। ऐसे इम्तिहान सिर्फ परेशानियां देके नहीं लिए जाते बल्कि नेमतें देके जैसे दौलत, हुस्न, ताक़त के ज़रिए भी लिए जाते हैं। बाज़ वक़्त कुछ लोगों को परशानी देके उसे दूसरों के किये इबरत बनाया जाता है और बाज़ वक़्त उनके ज़रिए उनके आस पास वालों का इम्तिहान लिया जाता है। ज़ाहिर है इन्हें वंहा इसका कंपनसेशन मिलेगा।
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क़ुदरती आफतों से लड़ने और बचने के ज़राए पैदा करने की सलाहियत अल्लाह ने इंसानों को दे रखी है। जो ऐसा करते हैं, उनके लिए काफी हद तक अल्लाह का कानून काम करता है और उनकी अक्सर हिफाज़त भी होती है। जब कोई हादसा हो जाता है तो लोग जानने की कोशिश करें कि उनकी तरफ से इंतज़ाम में कोई कमी रह गई थी या अल्लाह की कोई नाराज़गी रही होगी जो ऐसा फिर भी हुआ?
अल्लाह की स्कीम चालू है। एक परदा है जिसके पीछे क्या कुछ खेल चल रहा है, हमें मालूम नहीं पड़ता है। किस के साथ क्या मामला तय है, अल्लाह ही जानता है। किसी को ज़िन्दगी में अल्लाह ने हजारों बार बचाया भी मगर इस हादसे में मौत के आगोश में जाने दिया, इसके पीछे की वजह अल्लाह ही जानता है। बचाने और मरने देने के, दोनों काम हो रहे थे, बस हमारी नज़र सिर्फ मौत पर होती है। ऐसा सोचना कि दुनिया में ऐसे हादसें कभी नहीं होते तो दुनिया बेहतर होती, इस दुनिया के इम्तिहान को ही खत्म कर देता है।
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