अगर अब भी न जागे तो। आप नहीं तो कौन, अब नहीं तो कब?
इस उम्मत का फ़रीज़ा
हमारी दो हसीयत है, इंफ्रादी और ईश्तेमाई। हम एक फर्द है और हम मिलकर एक उम्मत बनते हैं। उम्मत की हसियत एक तंजीम की तरह होती है. कोई तनजीम बिना मकसद नहीं बनती है. कुरान के मुताबिक फर्द की ज़िम्मेदारी है बंदगी कि ज़िंदगी गुज़ारनी है। कुरान ने उम्मत की भी ज़िम्मेदारी बताई कि तुम बेहतरीन उम्मत हो, तुम्हें तमाम लोगों के लिए लाया गया है, तुम भलाई का हुकुम देते हो और बुराई से रोकते हो। कुरान कहता है कि जो फायदेमंद होता है ज़मीन पर ठहर जाता है। कुरान कहता है कि तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में बेहतरीन नमूना है। रसूल कि सबसे पहला नमूना है कारे रीसालत अंजाम देना। कुरान ने भी गैर नबी के लिए ये लफ्ज इस्तेमाल किया है। आपने यह लफ्ज दूसरों के लिए भी इस्तेमाल किया। हज़रत माज़ को जबल के लिए रवाना करते हुए अपना रसूल बताया। (मुहम्मद सलल ने हज़रत माज़ को जबल के लिए रवाना करते हुआ पूछा कि वंहा कैसे फैसलों करोगे। तो उन्होने कहा कि अल्लाह की किताब से फिर न मिली तो सुननत में और वंहा भी न मिली तो अकल कि रोशनी में फैसले करूंगा। ये नहीं कहा कि नहीं हुई तो। आप ने खुशी से कहा कि अल्लाह का शूकर है जो अल्लाह ने अल्लाह के रसूल के रसूल को सही रास्ते पर होने कि तौफीक दी।) वो अल्लाह के रसूल थे। अब हम सब रसूल के रसूल है। कारे रीसलत बाकी है। कयामत तक इसे अंजाम देना है। दुनिया तक इस पैगाम को पहुंचाना है। तमाम लोगो को नफे का रास्ता बताना था। क़ौमों का इमाम बनना था। अगर ये फर्ज़ अंजाम नहीं दिया तो उम्मत नहीं रहेगी। मगर उम्मत को तो रहना है। क्योंकि उम्मत रसूल से होती है। आखिरी रसूल जा चुके है और अब कोई रसूल नहीं आना। इसलिए उम्मत तो रहेगी बाकी। मगर ज़्यादातर उम्मत इस इश्तेमाई फर्ज़ से दूर हो जाये चाहे इंफ्रादी फर्ज़ अदा करते हो, तो उम्मत मुर्दा हो जायगी। ऐसा ही हो रहा है। तो फिर अब इस ज़िम्मेदारी को कौन अंजाम देगा। क्योंकि अल्लाह इस तंजीम को मुर्दा नहीं होने देगा। इसलिए इसका एक हल होगा?
गैर कौम को ज़िम्मेदारी
कुरान में न एक लफ्ज गैर ज़रूरी है और न एक भी ज़रूरी लफ्ज कम है। कुरान कई जगह कहता है कि जब तुम अपनी ज़िम्मेदारी से मुंह मोड लोगो या तुम नहीं निकले तो अल्लाह तुम्हें तब्दील कर के एक नयी कौम को लाएगा, वो तुम्हारी तरफ न होंगे और तुम उसका कुछ न बिगाड़ सकोगे। इस पर साहबा सवाल करते थे कि रसुलुल्लाह ये कौन सी कौम है? आप दो जवाब देते थे, कभी ईरान कि तरफ और कभी यमन कि तरफ कहते थे, कभी कहा कि हज़रत सलमान फारसी (ईरान) और कभी अबू मूसा अशरी जो यमन) के यंहा के लोग। कभी ईरान का नाम, कभी सलमान फारसी का जो फरस से थे, कभी यमन का, कभी अबू मूसा अशरी का नाम जो यमन के थे। ईरान सऊदी अरब के शुमाल में और यमन जुनूब में है। दोनों की डिरेक्शिन अलग। सवाल एक है और जवाब दो आ रहे है यानि अहले इल्म जानते हैं कि दोनों जवाब में कोरेलशन बिठाते है। दो हादिसो को एक साथ देखा जाएगा। हमारे लिए ये जवाब आसान था समझना क्योंकि ये जवाब क़ौमों के बारे में था। ईरानी आर्यन नसल से थे। आर्य ईरान से ही हिंदुस्तान आए थे। यंहा आ कर मिक्स हो गए। भारत के मौजूदा ईरानी आज भी इन मिक्स लोगों से ज़्यादा आर्यन है। यमन में आज भी खंडरात मौजूद है, राम,श्याम, हिन्द, हिंदा के नाम से। द्रविड़ और सिंधी कौम वंहा पर आबाद थी। यंहा से क़ौमों ने हिजरत कि थी। जैसे यहूदी मदीना मे बसे थे, ईसाई नजरान में बसे थे। इस खितते के बारे में , ये लोग अपनी किताबों में आखिरी रसूल के बारे में पाते थे। इरानी यानि आर्यन, द्रविड़ और सिंधी को जमा करने पर हिन्दू कौम सामने आती है। हिन्दू कौम का नाम था। द्रविड, सिन्धी यमन में आबाद। भारत में तीनों कौम बसी। उस वक्त ये तीनों कौम हिन्दू नहीं कहलाती थी। आज भी मजहब का नाम नहीं है मगर कहलाता है। इसमें दीगर मत और मजहब शामिल है, ये तब आपस में विरोधी थे। मुस्लिम इन मुशरीकों का मजहब नहीं जानते थे। इनको हिन्दी कहा। मुस्लिम ने इन्हे एक और हिन्दू बनाया। नबी के वक़्त में हिन्दू किसी कौम या मजहब का नाम ही नहीं था। यानि ये बाद में एक हुआ।
इतिहास में कौम तबदीली
इन्हे इधर आना है, ये लिखा है। इन सबको बदलना है। ये एक अरब हैं। इस पूरी कौम को आना है। पहले ऐसा हुआ था। कुरान कहता है तारीख पर नज़र डालो क्योंकि जो पहले हुआ, वही पैटर्न चल रहा है तो दुबारा वही होगा। सिर्फ किस्से कहानिया सुनाने का मक़सद थोड़े होता है। तारतारि भी ऐसे ही आए थे सब, एक दिन में। पासबान मिल गए बुतख़ाने से। रेवोलुशन से पहले काउंटर रेवोलुशन आया था। तातारियों ने बेंतेहा जुल्म किया. तारतार ज्यादती करने वाले, खून की नदिया बहाने वाले, खोपड़िया की मीनारे बनाने वाले थे. इन्होने लाइब्ररी की किताबों से दरिया पाट दी थी, तलवार से गर्दन उतारने वाले सारे तारतारियों ने इस्लाम कुबूल किया। तारतारि कैसे बदले थे। तारतारके शाह ने दरबारियों को बुलाया और कहा कि ये मजहब इस्लाम सही लगता है। दरबारीयों ने कहा कि हमे भी यही लगता है और हम तो आपके डर से ऐसा कहने से बच रहे थे। देग के चावल देखने वाला तरीका था। शाह ने ऐलान किया और पूरी क़ौम इधर आ गायी, एक दिन में। कौम लीडर के कहने पर ऐसे नहीं आती बल्कि अपनी ही वजह से आई थी। कौम पहले से तैयार होती है तो लीडर के कहने पर आती है वर्ना लीडर तक को हटा देती है कि ये क्या फिजूल बातें कह रहा है। ये कौम असल में एक दिन में नहीं आई थी, ये तीन नस्लों से काम चल रहा था। मुस्लिम लड़कियों ने अंदर अंदर दावत का काम किया जिनको घरों में ज़बरदस्ती डाल दिया गया था। असल में तारतार में सब एक दूसरे से डर रहे थे कि ऐसे कह दिया तो फिर उनका क्या होगा। यह होता है तबदीलें कौम। यंहा भी यही लागू होगा। अन्डर करंट पैदा करने वाले चाहिए। तो फिर अल्लाह कैसे और कब लाएगा?
कौम तब्दील कैसे होगी?
इस मुल्क के मसाइल का हल थोड़ी थोड़ी तब्दीली नहीं है। थोडा थोडा इंफ्रादी आज भी हो रहा है। इश्तेमाई बहुत पहले से ही बंद है। इनफारदी भी अब लगभग बंद हो चुका है। अब ये लोग होने नहीं देंगे। इस स्पीड से लाखों साल लगेंगे। तो फिर कैसे आयंगे? यंहा का हल इंफ्रादी नहीं इश्तेमाई है। इंफ्रादी में रोटी, बेटी के मासाइल होते हैं और दूसरे भी। आपस में ही इसका हल निकाल लेंगे जब इश्तेमाई आयंगे। मसाइल वैसे ही हल होंगे जैसे अनसार ने मुहाजिर के साथ किया था। एक लाख - एक लाख करके भी आये तो कोई सामाजिक, राजनीति, आर्थिक हल्ला नहीं होगा। दायी किसी से नफरत नहीं करता। आज भी इनमें बहुत ही सहिष्णुता है। हमने मंदिरों पर जा कर पैगाम पेश कर है. हरिद्वार में लाखों के बीच यात्रा निकाली. अगर वो लोग मारने वाले होते तो हमारे टुकडें कर देते हैं. वैसे मारते भी हैं. मगर हमसे मोहब्बत करते हैं. दुनिया में एक ही कौम है जो लक्ष्मी की पूजा करती है. दौलत से मोहब्बत तो सब करते हैं. इन्हें बस ये समझा दीजिये कि आप इनके फायदे के हैं तो ये गले से लगाते हैं. बात ऐसे हो कि इनके नाराज़ होने से पहले इन्हें फायदे की बात समझा दीजिये. इसके लिए हिकमत, टेकनिक चाहिए. इनके गुरु और बड़े जानते हैं की ये तब्दील होनी वाली है। ये चाहते है की तब्दील के बाद भी यही आगे रहे, यही लीड करे, उसकी तैयारी कर रहे हैं। नबी ने कहा था तुम मे से जो कुफ़र में अच्छे थे वो, इस्लाम में भी अच्छे होंगे।
अव्वलीन-आखिरीन (कौन?)
कुरान में एक ही सूरह में अव्वलीन और आखिरीन का ज़िक्र है। यानि पहले वाले और बाद वाले लोग। यानि साहबा और उनके बाद वाले जैसे हम। किस लाइन से अवलीन खतम होंगे और किस से आखिरीन शुरू होंगे, ये हमें देखना हैं। कुरान में... असहाबुल यमीन (दायें, सीधे हाथ वाले यानि अहले जन्नत, जन्नत वाले) का ज़िक्र है। असहाबुल शिमाल(बाएँ, उल्टे हाथ वाले यानि अहले जहन्नुम, जहन्नुम वाले) का भी ज़िक्र है। साबीक़ीन का भी ज़िक्र है (यानि सबकत करने वाले, अहले सबकत, आगे बढ़ने या आगे निकलने वाले या पहल करने वाले)। अहले साबीकीन - इनका अववलीन (मुहाजिरीन और अनसार में) में होने का ज़िक्र है। अल्लाह इनसे राज़ी हो गया। अहले जन्नत - अवलीन और आखिरीन दोनों में बहुत होंगे. अहले सबकत - अवलीन में बहुत होंगे और आखिरीन में कम होंगे। कुरान कह रहा है अखीरीनी में भी अहले सबकत होंगे। मगर आखिरीन आखिर में आने वाले है तो अहले सबकत आखिरीन में कैसे होंगे? पहल करने वाले तो कर चुके? अवलीन में भी पहल करने वाले थोड़े से थे जो शुरू में थे, सब नहीं थे। एक ही तरीका है। एक रेस हो रही है, फ़र्स्ट सेकेंड थर्ड आ गए। बीच में से कोई कहे, यंहा से दुबारा शुरू करेंगे रेस, पीछे वालों को आने दो। तो दुबारा होगी और फ़र्स्ट सेकेंड थर्ड आखिरी वालों में से भी हो सकते। हमें अखिरीन के अव्वलीन, बनना है। ये लाइन टाइम में कंहा है?
अल्लाह का अम्र (कब?)
कुरान (3 आयतें/ 32:5, 34:29-30, 22:47) ने कहा कि अल्लाह का अमर नाज़िल होता है 1000 साल में। एक जगह अमर के साथ अज़ाब का भी जिक्र है क्योंकि कौमे भ्रष्ट हो जाती हैं।
कुरान कहता है कि अल्लाह आसमान से ज़मीन कि तरफ अमर भेजता है, फिर वो अमर या सारे मामले या निज़ाम उसी कि और लौटते है वापिस, एक दिन यानि इंसानी एक हज़ार साल के अरसे के बाद। वो पूछते हैं कि ये वादा कब पूरा होगा, कह दो कि तुम्हारे लिए एक दिन इंसानी कि मियाद है, न एक घड़ी आगे और पीछे। वो अज़ाब के लिए जल्दी मचा रहा हैं, अल्लाह कभी वादे के खिलाफ नहीं करेगा। पर उसके यंहा एक दिन तुम्हारे एक हज़ार साल जैसे है। (ये उस वक़्त के नहीं, बल्कि किसी आने वाले अज़ाब का ज़िक्र है).
एक एक्सटेंशन का ज़िक्र है। अबू दाऊद की हदीस में नबी ने फरमाया की मेरी उम्मत अपने रब की नज़र में इतनी हक़ीर तो नहीं हो जाएगी की वो उसे आधे दिन की मोहलत न दे दें। मोहलत पकड़ या सज़ा से होती है। आधे दिन का मतलब बताया 500 साल। यानि 1500 में उम्मत की पकड़ होने जा रही है। मुहलत पकड़ से होती है। ये नबी से गिनेंगे। दो मौके हैं ऐसे। एक पैदाइश से क्योंकि नबी जन्म से ही नबी होता है, शऊर बाद में होता हैं। इसके हिसाब से 2026 में मोहलत पूरी हो रही है। दूसरा जब आप नबी बनाए गए। इसके हिसाब से 2026 के 40 कमरी साल बाद। अगर एक अल्लाह की मुक़र्रर तादाद ने काम कर लिया तो 2026 तक यह हो जायेगा वरना 40 साल बाद होगा. ये साल आज़ाब के बढेंगे. यह तकदीरे मुआल्ल्क़ है. बनी इस्राइल में ये हो चूका है जब उन्हें बस्ती में घुसने का हुक्म हुआ था मगर उन्होंने इंकार कर दिया था. अगर कुरान की बात यही है तो उसे सच मनाना पड़ेगा। अगर एक साल भी बचा है तो ये होके रहेगा भले ही नामुमकिन लगे। कैसे मुमकिन है, इसके कुछ सबूत रखना चाहता हूँ।
काउन्टर रेवोलुशन/ जारी अज़ाब
अखलाक से सिलसिला चला। मक़सद था डराना। गुजरात में भी यही हुआ था। एक मेसेज दिया गया। इतने लोग पहले भी मर चुके हैं मगर यंहा वहशी तरीके इस्तेमाल हुए। बाद में भी बहुत सपोर्ट किया। । कितना प्रेशर बाहर से आयेगा, अंदर क्या करना है, अपने स्ट्रॉंग मैन चुन लिया था। हिन्दुत्व की लेबॉरेटरी बना। खुद खड़ा किया था। गुजरात समाचार और संदेश 90% घरों में जाते हैं, उसने छापा की कारसेवक, औरतों का बलात्कार, छातियाँ काट कर मार डाला। सभी निकल आए, उन्हें लीड करने वाले पहले से ही मौजूद थे। गुजरात समाचार ने बाद में खबर गलत होने की बात छापी। संदेश ने ये भी नहीं किया। आगे फ़ासिज़्म आ रहा है। वन पार्टी रूल। नो ओपोजीशन। चुनाव नहीं होंगे। इटली में हुआ था। फ़िलॉसफ़ि बना के पेश किया था। हथियारों का दौर था। मुसोलनी ने किया था। राष्ट्रवाद पर जीत कर आया था। सबके उसके साथ हो गए। अंदाज़ा हो गया की लोग उसके साथ आ गए। उसने ऐलान किया नए चुनाव नहीं होंगे, हम ही रूल करेंगे। लोगों ने सपोर्ट किया। ओपोजीशन के एक लीडर को उसी ने मरवाया जो बेहद जरूरी था, बाद में उसने खुद कुबुला, उसी ने करवाया। फ़ासिज़्म पहले केपिटलिस्ट को समर्थन करता है और मजदूरों को दबाता है फिर केपिटलिस्ट को कंट्रोल करता है ताकि इकॉनमी चलती रहे। एजुकेशन और मीडिया पर पकड़ बनाते हैं। ये एक डिज़ाइन है। यंहा भी यही डिज़ाइन दिख रहा है। अवाम इनके साथ जा रही है। 50% वोट पाले में आने के बाद ये भी कह देंगे अब वन पार्टी रूल लागू होगा। यंहा नाम हिन्दुत्व है इसका, इनके दो बड़े मुद्दे हैं गौहत्या और लव जिहाद। आप टीवी पर डीबेट करिए, पोलोरोइजेश की स्पीड बढ़ जाएगी, आप डीबेट नहीं करिए, इनकी पब्लिसिटी जा जा रही है, मोबिलाईजेशन चलता रहेगा। चिट और पट दोनों इनके हैं। आप अपनी पार्टी बना लीजिये, कुछ जीत जायेंगे मगर हिन्दू वोट और ज़्यादा कोनसोलीडेट हो जायेंगे, न्यूट्रल लोग भी वंहा चले जायेंगे। हिन्दुत्व का मक़सद है इनका कल्चर अपना लीजिये, दो नंबर शहरी बनके रहिए फिर सुकून से रहिए, मानते रहें अपना दीन। गुजरात के लोग अब मान गए है और इनके साथ हो गए है क्योंकि उन तक मेसेज पहुँच गया है, वो अब आगे नहीं पीछे रहते हैं। ये अज़ाब है। उस रेवोलुशन से पहले यह काउंटर रेवोलुशन आ रहा है।
कौन बचाया जाएगा?
अभी अज़ाब में से गुज़र रहे है, लोग समझ नहीं रहे। पता ही नहीं की अज़ाब चल रहा है इसलिए यह तो और बड़ा अजाब है। पूरी दुनिया के मुसलमान अजाब में है. अज़ाब सिर्फ प्रकृतिक आपदा नहीं होती। ज़िल्लत भी अज़ाब है, कुरान ने कहा है। ये अज़ाब चल रहा है. क्या इसी अज़ाब मे रहना है। इस अज़ाब से बचना है। यनूस की क़ौम पर से अज़ाब टाल दिया था क्योंकि उन्होने तौबा कर ली थी। कुरान कहता है तुम्हारे रब की ओर से जो मिला है, वो सब पहुंचा देना, लोगों से नहीं डरना, अल्लाह बचा लेगा। बहुत सी जगह कुरान का वादा है दायी को बचा लिया जायगा। अल्लाह का वादा है अज़ाब से दायी को बचाने का। जब जब क़ौमों पर अज़ाब आया है दायी को बचाया गया है। बचेंगे वही जो दवत का काम अंजाम दे रहे है क्योंकि यह अल्लाह की सुन्नत है की हर बार नबी या रसूल के साथ वही बचाए जाते हो निज़ाम को सही करने की कोशिश, और लोगो तक पैगाम पहुंचाने का काम करते है। सिर्फ दावत ही इससे बचने का रास्ता है। हमारा काम बदलवाना नहीं है, सिर्फ हुज्जत पूरी करना है। नबी ने अली से कहा था की दुनिया मे सबसे बढ़कर है तुम्हारे जरिये आने वाला एक आदमी। यंहा तो करोड़ों आने है। छोटा सा जरिया बने। कहते हैं तुम्हारे जरिये आने वाला एक आदमी तुम्हारी नजात की जमानत है। नेकियों वाला भी एक गुनाह पर पकड़ा जा सकता है। इंश्योरेंस करवा लीजिये। चलते फिरते, मिलते जुलते हुए किसी को इस्लाम की बात समझा दी। इसको कोई और कुछ और समझा देगा। जब भी वो आयेगा आयेगा, मगर आपका कोंट्रीब्यूशन अभी ही हो गया। इसलिए हल सिर्फ वही है जो कुरान ने बताया लेकिन हिकमत से काम लेना होगा।
एक हदीस है कि - अगर एक शख्स भी तुम्हारे जरिए हिदायत पा जाए तो यह , इस दुनिया और दुनिया में जो कुछ भी है , उससे बढ़कर है। सोचे जरा यहां तो पूरी कौम की तब्दीली की खबर है, हर एक के हिस्से में लाखों लोग आएंगे, बहुत बड़ा खज़ाना तकसीम होने जा रहा है लेकिन बदनसीब है वे लोग जो पता होते हुए भी यह काम नही कर रहे है।
ज़ालिम या गाफ़िल
ये गाफिल है, ज़ालिम नहीं है। कुरान इशेतामाई हलाकत को अज़ाब कहता है। कभी सोचा अल्लाह का अज़ाब आ जाये तो ज़ालिमो के सिवा और कौन हलाक होगा। हम बस्तियों को हलाक करने वाले नहीं जब तक वो ज़ालिम न हो। दुनिया में ज़लज़ले, सैलाब वगैरह हर वजह से सब जगह मुस्लिम ही हलाक क्यों हो रहे है। हमने उनकी आखिरत बर्बाद की। हमने उन तक वो चीज़ नहीं पाहुचाई जो पहुंचानी थी, लेके बैठे रहे। ये ज़ुल्म था। जब तक दावत की हुज्जत पूरी नहीं होती तब तक वो ज़ालिम नहीं गाफिल है। कुरान कहता है अल्लाह उन बस्तियों को हलाक करने वाला नहीं जब तक वो गाफिल रहे। सबसे कुरान में काफिर लफ्ज आत है, कुरान 2:6 जो लोग काफिर हो गए, चाहे तुम सचेत करो या न करो, वो ईमान नहीं लाएँगे। जब से आयात आई है तब से क्या कोई ईमान नहीं लाया, करोड़ों ला चुके हैं और आज भी ला रहे हैं। तर्जुमा सही है। कलाम भी सच्चा है। लफ्ज का मतलब गलत समझ रहे हैं। सिर्फ ब्रैकेट में 'ऐसे' लफ्ज लगा लें तो बात समझ आ जाएगी कि किसे कहा जा रहा है। आखिरी बार जब कुरान में काफिर लफ्ज आया है जंहा कहा गया है कि कह दो इनसे कि ऐ काफिरो, मैं उसकी इबादत नहीं करूंगा जिसकी तुम करते और जिसकी तुम करते हो, मैं नहीं करूंगा, तुम्हें तुम्हारा दीन, मुझे मेरा दीन। ये स्टेज कब आएगी जब ये पता लग जाये कि वो नहीं मानेंगे। हज़रत इब्राहीम अपने कहलाए जाने वाले बाप हाजर को छोड़ कर गए, उसी के कहने पर, मगर कह गए की दुवा करते रहेंगे। फिर दुआ रोकी, कुरान ने उसूल बताया। कुरान 9:113-114 ने कहा की ईमान वालों के लिए जायज़ नहीं वो मुशरीकों के लिए मगफिरत की दुवा करें जब उन पर खुल चुका हो की ये जहन्नुम की आग में होंगे। इब्राहिम ने जो क्षमा याचना की थी वो एक वादे के तहत थी। मगर जब ये बात खुल गयी कि वो अल्लाह का दुश्मन है तो वो उससे बरी हो गए। यानि ये बात बाद में खुली जबकि मुशरीक तो वो पहले से ही था। यानि उम्मीद थी कि सुधार जाएंगे, उस पर काम करते रहे थे पर फिर यकीन हो गया। हमने उन्हें पहले ही काफिर, ज़ालिम मान लिया। जबकि दावत नहीं हुई। उनका क्या कसूर उस घर मैं पैदा हुए। दीने फितरत साबित की जा सकती है। जो फितरत है वही दीन है। साबित कर दीजिये यही अल्लाह का दीन है वो ज़ालिम हो जायेंगे। या तो कुबूल करेंगे या अज़ाब आएगा। दावत इसे नहीं कहते की बस कह दिया। ये दावा है, दावत नहीं। कुरान मे सिर्फ इमानीयत या निजात पाने की तफसील नहीं है जो चंद आयतों मे आ जाती बल्कि 6000+ आयतें हैं दावा नहीं करती, दावत देती है। मेंटल लेवेल पर साबित करने के बाद वो इंकार करे तो फिर काफिर होंगे और फिर वो ऐसी हरकते करें तो फिर वो लोग ज़ालिम होंगे।
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इजराईलीयों पर 40 साल का अज़ाब
[Quran 05:18-26]
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यहूदी और नसारा* कहते हैं कि हम अल्लाह के बेटे और उसके चहेते हैं। इनसे पूछो : फिर वो तुम्हारे गुनाहों पर तुम्हें सज़ा क्यों देता है? हक़ीक़त में तुम भी वैसे ही इनसान हो जैसे और इनसान ख़ुदा ने पैदा किए हैं। वो जिसे चाहता है माफ़ करता है जिसे चाहता है सज़ा देता है, ज़मीन और आसमान और उनमें मौजूद सारी चीज़ें उसकी मिलकियत हैं और उसी की तरफ़ सबको जाना है।
ऐ किताबवालो*, हमारा ये रसूल* ऐसे वक़्त तुम्हारे पास आया है और दीन की वाज़ेह तालीम* तुम्हें दे रहा है, जबकि रसूलों के आने का सिलसिला एक मुद्दत* से बन्द था, ताकि तुम ये न कह सको कि हमारे पास कोई ख़ुशख़बरी देनेवाला और डरानेवाला नहीं आया। तो देखो, अब वो ख़ुशख़बरी देनेवाला और डरानेवाला आ गया और अल्लाह हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है।
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याद करो जब मूसा* ने अपनी क़ौम* से कहा था कि “ऐ मेरी क़ौम के लोगो, अल्लाह की उस नेमत को याद करो जो उसने तुम्हें दी थी। उसने तुममें नबी पैदा किए, तुमको हाकिम* बनाया और तुमको* वो कुछ दिया जो दुनिया में किसी को न दिया था।
ऐ मेरी क़ौम के लोगो, उस मुक़द्दस सरज़मीन* में दाख़िल हो जाओ जो अल्लाह ने तुम्हारे लिये लिख* दी है। पीछे न हटो, वरना नाकाम और नामुराद पलटोगे।”
उन्होंने जवाब दिया, “ऐ मूसा, वहाँ तो बड़े ज़बरदस्त* लोग रहते हैं, हम वहाँ हरगिज़ न जाएँगे, जब तक वो वहाँ से निकल न जाएँ। हाँ, अगर वो निकल गए तो हम दाख़िल होने के लिये तैयार हैं।”
उन डरनेवालों में दो* लोग ऐसे भी थे, जिनको अल्लाह ने अपनी नेमत से नवाज़ा था। उन्होंने कहा कि “इन जब्र* करनेवालों के मुक़ाबले में दरवाज़े के अन्दर घुस जाओ, जब तुम अन्दर पहुँच जाओगे तो तुम ही ग़ालिब* रहोगे, अल्लाह पर भरोसा रखो, अगर तुम ईमानवाले हो।”
लेकिन उन्होंने फिर यही कहा कि “ऐ मूसा हम तो वहाँ कभी न जाएँगे जब तक कि वो* वहाँ मौजूद हैं। बस तुम और तुम्हारा रब, दोनों* जाओ और लड़ो, हम यहाँ बैठे हैं।”
इस पर मूसा ने कहा, “ऐ मेरे रब, मेरे इख़्तियार में कोई नहीं, मगर मेरी अपनी ज़ात या मेरा भाई*। तो तू हमें इन नाफ़रमान लोगों से अलग कर दे।”
अल्लाह ने जवाब दिया, “अच्छा तो वो मुल्क चालीस साल तक इन पर हराम है। ये ज़मीन में मारे-मारे फिरेंगे। इन नाफ़रमानों की हालत पर हरगिज़ तरस न खाओ।”
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अम्र और खलक: अल्लाह के फैसले जो दिखाई नहीं देते अम्र है और जब लागू हो जाते है तो खलक कहलाते हैं। अम्र और खलक दोनों खुद के है। जैसे आर्किटेक्ट के दिमाग में नक्शे अम्र और कंप्युटर या पेपर पर आने के बाद खलक।
हक़ और सच्चाई: हक़ और सच्चाई में फर्क होता है, हर दौर का सच अलग अलग हो सकता है मगर हक़ हमेशा एक रहेगा।
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