वेदों का अग्नि रहस्य।
वेदों
अखिलो धर्म मूलम (धर्म का आधार वेद है)। वेदों को अपौरुषेय (जो मानव
निर्मित न हो) माना जाता है। वेदों को श्रुति ग्रन्थ भी कहा जाता है।
वेदों में दिए गए विषयों और ज्ञान को ही विस्तार करके ऋषि-मुनियों,
विद्वानों ने ब्राह्मणों, आरण्यकों, उपनिषदो का निर्माण किया। उपवेदों,
वेदांत, वेदांग, स्मृतियों, दर्शनों, पुराणों, रामायण, महाभारत एवं गीता
आदि का निर्माण भी किया। कुछ सदी पहले ही में मानस जैसे ग्रन्थ भी लिखे
गए। सनातनी विद्वानों के अनुसार इनमें ईश्वरीय ज्ञान केवल वेद है और वेद ही
सर्वोपरि है।
वेदों में 'अग्नि के रहस्य' का उल्लेख आता है जिसे सुलझाने पर बहुत महत्व दिया गया है।
वेदों में अग्नि शब्द, ईशदूतों, प्रथम जीवात्मा या परमात्मा और परमेश्वर, तीनों के लिए प्रयोग हुआ है।
वेदों में अलंकृत भाषा में ज्ञान को अरणी (मशाल) कहा गया है जो मूलतः अग्रणी शब्द से ही निकला है जिसका अर्थ होता है सबसे आगे या सबसे पहले।
ऋग्वेद का एक मंत्र है:
"उत्तनायामव भरा चिकित्वानतनसघ: प्रविता वृषणज जान।"
ऊपर मुख वाली मशाल (अंतिम ज्ञान) को नीचे मुख वाली मशाल (प्रथम ज्ञान) पर रखोगे तो तुरंत गर्भ वाली मशाल से कामनाओं की वर्षा करने वाली अग्नि प्रकट होगी।
[ऋग्वेद: 3:29:3]
अर्थात सबसे अंतिम ज्ञान 'क़ुरान' के प्रकाश में सबसे प्रथम ज्ञान 'वेद' का अध्ययन करोगे तो अग्नि अर्थात परमेश्वर, जीवात्मा और ईशदूतों का रहस्य जान जाओगे।
दुनिया में केवल एक ही समुदाय है जो कहता है कि प्रथम ईश्वरीय ग्रंथ (प्रथम ज्ञान) उनके पास है और ऐसा भी केवल एक ही समुदाय है जो ये कहता है कि आखिरी खुदाई कलाम (अंतिम ईश्वरीय ज्ञान) उनके पास है। यानी वेद और क़ुरान। दोनों के दावे आज प्रमाण के साथ सत्य भी साबित होते है। यानी क़ुरान और वेदों पर साथ चिंतन करोगे तो ईश्वर का मार्ग पा लोगे।
_____________________________________________
वो समान मंत्र और बातें ये है की ईश्वर एक है जिसका कोई आकार नहीं और केवल वही पूजनीय है। उसके भेजे सारे दूत आदरणीय है और सभी ग्रंथ मार्गदर्शन है। महाप्रलय के दिन, अच्छे-बुरे कर्मों के अनुसार स्वर्ग-नर्क का निर्णय होगा।
ऋगवेद●समानम मंत्रमभी मंत्रयेव:
(मैं तुम्हे समान मंत्रो से अभिमंत्रित करता हूँ)
क़ुरान●तआलव इला कलिमतिन
(आओ उन कलमों की तरफ जो हममे और तुममे एकजैसे हैं।
_____________________________________________
इन्हीं ग्रंथों में लिखा है कि ईश्वर का धर्म और उसका विधान कभी नहीं बदलता, केवल नियमवालियाँ (सामाजिक क़ानून, कर्म का पथ, शरीयत, Social Laws)बदलता है, जो समय, परिस्थितियों और समाज में हो रहे क्रम विकास आदि के अनुसार होता है। जिस स्थान पर नया क़ानून आता वंहा पिछला वाला कानून निरस्त हो जाता पर धर्म वही चलता रहता जो आज भी वही चल रहा है और आगे भी चलता रहेगा। सभी धर्मों के लोगों के धर्म के मूल और धर्म द्वारा दिए सामाजिक नियमों से हट कर जो उनकी मान्यताओं और धारणाओं में अंतर दिखता है, वह सब मनुष्य का हस्तक्षेप है। सभी धर्मों में जो समानता, जो एक जैसी बातें है, वही ईश्वर का धर्म है! और इस प्रकार उसका धर्म एक ही हुआ।
ऋग्वेद: अदबधानी वरुणस्य व्रतानि।
(ईश्वर के विधान नहीं बदलते)
क़ुरान: वलन तजिदलिससुन्नतिल्लाहि तब्दीला।
(और तुम ईश्वर के विधान में कोई परिवर्तन नहीं पाओगे।)
_____________________________________________
एक ईश्वर, एक धर्म, उसके धर्मग्रंथ
ईश्वर या अल्लाह या गॉड का धर्म या दीन हमेशा से एक ही है। मानवता के आरंभ में एक ही धर्म था. संसार के हर कोने में उसने समय समय पर अपना एक ही धर्म भेजा। उसकी शिक्षाएं केवल एक भाषा में सीमित नहीं हो सकती क्योंकि लोगों और क्षेत्रों की भाषाएं हमेशा से बदलती रही है। इसलिए उसकी शिक्षाएं पूरे विश्व में अलग अलग भाषाओं में दी गए ताकि मनुष्य उन्हें समझ कर उनके अनुसार जीवन जी सके। जो ग्रथों में संकलित करी गई. धर्म केवल एक बार, एक ही क्षेत्र में, एक ही समय में और एक ही क़ौम को दिया जाता तो दुनिया के अलग अलग क्षेत्रों, अलग अलग कालों में गुज़रे हुए लोगों की मुक्ति कभी नहीं हो पाती। क्योंकि धरती पर लाखों सालों के मानव जीवन में दुनिया महज़ कुछ दशकों पहले एक ग्लोबल विलेज बनी है और एक दूसरे संपर्क बना पाई है।
उसके एक धर्म को धीरे धीरे मनुष्यो ने बिगड़ना शुरू किया। हमेशा से ही लोग उसके धर्म और ग्रंथों में बिगाड़, मिलावट, अपनी जमा-घटा, जोड़-तोड़ करने का प्रयास करते रहे है और अपने अपने अलग अलग धर्म अर्थात पंथ, मत, सम्प्रदाय, मज़हब, रिलिजन बनाते गए है. इसलिए उसका एक हर जगह भेजा गया एक ही धर्म हर जगह बदल बदल कर भिन्न हो गया. इसलिए आज इतने धर्म बन गए है। जिसके कारण एक ही धर्म के कई धर्म बनते गए जो ऊपरी सतह पर एक दूसरे से अलग लगते है। पर लोग उसके धर्म और ग्रंथों के मूल को न बदल सके। ये मूल ही उसका असल धर्म है। आज भी संसार के सभी ईश्वरीय धर्मों के ईश्वरीय ग्रंथों का मूल समान ही मिलता है। धर्म के मौजूद ये सब अंतर्विरोधी और विरोधाभासि अर्थ व मत यही बताते है कि धर्म और ग्रंथों में मनुष्य ने बिगाड़ पैदा किए है। और इसलिए घर वापसी पुराने धर्म मे नही बल्कि ईश्वर के असल धर्म में होनी चाहिए। और असल धर्म आज वही सारी बातें है जो दुनिया के सभी ईश्वरीय ग्रंथों में समान है। इसलिए उनमें सुधार करने के लिए बार बार ग्रन्थ और संदेशवाहक आते रहे। ईश्वर ने समय समय पर इसी धर्म का बार बार विश्व के प्रत्येक कोने में पुनरुद्धार किया अपने भेजे महापुरुषों के द्वारा थोड़ी अपडेट के साथ। भारत मे वेद उसकी वाणी आयी। अरब में क़ुरान। इस्रायल में तोरह और बाइबिल। और जगह भी अनेको वाणी आयी। इन वाणियों का मूल एक ही था। ये एक सत्य की धर्मिक ग्रन्थों में मिलावट हमेशा से ही उसी धर्म के मानने वाले या उन्हें याद करने वाले करते आये है और करते है।
वेदों का एक मूल है। संसार के दूसरे ईश्वरीय ग्रंथो का भी एक मूल हैं। ये सभी धर्मों का मूल एक जैसा ही मिलता है। ये मूल कभी नहीं बदला चाहे वो ग्रन्थ किसी भी कालखण्ड या क्षेत्र का हो। धरती के आरंभ होने से अंत होने तक मुक्ति का मार्ग एक ही रहेगा इसलिए मुक्ति का साधन वही धार्मिक आदेश होंगे जो आदिकाल से चले आ रहे है, दुनिया में सर्वमान्य भी हो और अंतरात्मा को भी संतुष्टि दे. जो धारण किया जा सके वही धर्म है। यानी जो प्राकृतिक और मानवतावादी होगा वही असल धर्म है। जो मनुष्य के स्वभाव से मेल न खाए वो धर्म नही है, उसका बिगाड़ है। यही 3 बातें धर्म के असल सिद्धान्त है। सबको इनमे माप लीजिए। सब इनसे दूर भी लगेंगे और पास भी। जिस जिस धर्म की जो जो बात इन 3 बातों के पास लगे, वही ईश्वर का सच्चा मूल धर्म है। जब कागज़ के निर्माण या ग्रँथ के सुरक्षित रहने की तकनीक मानव ने बना ली और दुनिया एक गोलबल विलेज बनने के आखिरी पड़ाव में आ चुकी थी तो अंतिम बार ग्रन्थ और धर्म वही संदेश भेज दिया। समय के मार्ग पर महाप्रलय क़रीब है इसलिए किसी न किसी ग्रँथ को अंतिम होना भी था वैसे ही जैसे पहला भी किसी को होना ही था।
No comments:
Post a Comment