Thursday, 4 June 2020

आर्य समाज, महर्षि दयानंद सरस्वती और सत्यार्थ प्रकाश पर आपत्तियां और प्रश्न

महर्षि दयानंद के जीवन के कुछ पहलू और विचार।

★ स्वामी जी नशे के आदि थे, भांग और गांजा पीते थे। तम्बाकू, हुक्का, पान का सेवन करते थे। इन्होने अपनी जीवनी में खुद लिखा कि मुझे भांग के नशे के आदत पड़ गयी है जिससे मैं बेसुध रहता हूं।

दयानन्द सरस्वती भांग के नशेड़ी थे, वे स्वयं कहते है:-दुर्भाग्यवश वंहा मुझे एक बड़ा दोष लग गया। अर्थात भांग पीने का स्वभाव हो गया। सो कई बार उसके प्रभाव से मैं बेसुध हो जाया करता था। एक दिन मंदिर से निकल कर चंडालगढ़ के निकटस्थ एक गाँव था, वंहा एक पुराना साथी मिल गया। गाँव की दूसरी तरफ कुछ ही दूर शिवालय था।  वहाँ जाकर मैंने रात काटी। रात के समय भांग से उत्पन्न हुई मादकता के कारण मैं अचेत सो गया था। [सम्पूर्ण जीवन चरित्र दयानन्द सरस्वती, भाग 1, पेज 55]


★ महर्षि दयानन्द ने नियोग पर ज़ोर दिया। विधवा स्त्री को 11 पुरुषों से नियोग की अनुमति दी।  

★ स्वन्त्रता संग्राम में शामिल होने की बजाए 3 साल तक लापता रहे और जंगलों में रहे।

★ स्वामी जी ने विधवा पुर्नविवाह का विरोध किया पर बाद में इन्ही के अनुयायियों ने इसके लिए कानून बनवाया।

¶ महर्षि दयानंद को ईसाइयों के एजेंट कहा गया है। ये भी कहा जाता है कि इस्लाम और ईसाइयत के प्रभाव में आकर इन्होंने वेदों का अनुवाद एकेश्वरवाद पर कर डाला।

¶ स्वामी जी ने वेदों का अनुवाद अगले जन्म में आकर करने को कहा था। जब नही आये तो किसी और व्यक्ति से अनुवाद करवाया गया।

¶ इन्होंने जबरन सूर्य, चंद्रमा, अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश, राहु, केतु, अश्व (घोड़ा), दादा, परदादा और भाई का अर्थ परमेश्वर कर दिया। अपना वेदार्थ जब बहुत से ज्ञानियों को भेजा तो सबने रिजेक्ट कर दिया। क्योंकि स्वामी जी वेदों में इतिहास नही मानते थे और न वेदों को ऋषियों का लिखा हुआ मानते थे।

■ दयानंद जी के आदेश:  गुरुकुल में वेद सीखना, गुरुकुल में मां बाप को बच्चों से मिलने को मना किया, रोज़ 2 समय हवन करना (कहा कि जो न करे उसको शुद्र जान कर बहिष्कार करो), 4 आश्रमों और 16 संस्कारों को मानना अनिवार्य है। (पर इन आदेशों कोई आर्य समाजी नहीँ मानता, यंहा तक की इनके मंदिर में भी सुबह शाम हवन नहीँ होते है)।

■ इन्होंने 4 आश्रम न मानने वाले को वेद निन्दक, शुद्र, अधर्मी कहा। स्वामी जी ने कहा कि: प्रथम आश्रम में गुरुकुल जाओ। द्वितीय आश्रम में रजस्वला के समय स्त्री घर से बाहर रहे, खाना भी न बनाये, एक बेड पर पति के साथ न सोए। तृतीय में जंगल में रहो। चतुर्थ में आश्रम में जाकर रहो। (इन आश्रमों का कोई अनुयायी अनुसरण नही करता है)

■ 16 संस्कार बताए : विवाह संस्कार में बताया कि लड़की कानी न हो, खून की कमी न हो, बाल-कद ऐसे लंबे हो, वंशानुगत बीमारी न हो परिवार में।  अंतेयष्ठी संस्कार में बताया कि अंतिम संस्कार के लिये 2 मन चंदन, 4 मन देशी घी, 10 मन पीपल, केसर जाफरान, कस्तूरी आदि चाहिए। (इन्हें भी कोई आर्य समाजी जीवन मे नही मानता)

■ आर्य समाजी आज 150 साल के बाद भी अलग थलग पड़े है। सनातन धर्मी जिन्हें ये पौराणिक हिन्दू कहते है  इनसे अलग ही रहते है। गांवों में तो इनका कोई मंदिर भी नही है। गांव से कटे हुए है यानी भारत की आत्मा से कटे हुए है। शहरों में इनके मंदिर भी खाली वीरान पड़े रहते है। 

● दयानंद जी ने वेदों को 1,96,8,53000 वर्ष पुराना कहा, सृष्टि को 4 साल बाद का बना हुआ कहा है और मनुस्मृति को सृष्टि के आदि में होना माना है। जबकि हमारी आकाशगंगा 13.2 और धरती 4.54 अरब वर्ष पुरानी है। 

● ऋग्वेद:6 मंडल: 57 सूक्त में इंद्र और पूषण नामक दो देवताओं एक साथ सयुंक्त सुतूती कि गयी है यानी बहुदेववाद है वेदों में। एक सोम पीता है एक जौ खाता है, एक रथ घोड़े और एक का बकरे खींच रहे है। जबकि स्वामी जी तो वेदों को शुद्ध एकेश्वरवाद वाला बता कर गए है।

● ऋग्वेद के पुरूष सूक्त उल्ल्लेखित 4 वर्ण आधारित मंत्र की आर्य समाजी व्याख्या भी वही है जो शुद्रो को निचला साबित करती है यानी वो ब्रह्म जी के पैरों से जन्मे है। 

◆ स्वामी जी का व्यवहार बताता है कि उनका उद्देश्य वर्ण व्यस्था को सदृढ़ करना था। एक बार रायपुर में राजा ठाकुर हरिसिंह से यवनों को मंत्री न बनाने को कहा। कारण ये बताया कि वो 'दासी पुत्र' होते है।  (संदर्भ: युगप्रवर्तक स्वामी दयानंद - लाल लाजपत राय)

◆ सत्यार्थ प्रकाश में मनु का हवाला देते हुए स्वामी जी ने बताया कि शुद्रो का कर्म है तीनों वर्णों की सेवा करना और उनके घर का खाना सिर्फ आपातकाल में खा सकते है। स्वामी जी की पुस्तसक सत्यार्थ प्रकाश में शूद्रों को नीच आदि कहा गया है।

◆ सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम संस्करण में स्वामी जी ने पूर्व में लोगों द्वारा मांस खाये जाने का उल्लेख किया है। परन्तु दुसरे संस्करण में ये बदल दिया गया।

◆ सत्यार्थ प्रकाश के द्वितीय समुल्लास में स्वामी जी कहते है कि ब्रह्मण्ड का उपनयन (जेनऊ पहनाने का यग्योपवित संस्कार) घर पर करके आचार्य कुल में भेज दे और शूद्र को बिना उपनयन किये भेज दे। (ये भेदभाव क्यों?).

◆ दशम समुल्लास में स्वामी जी लिखते है कि आर्यो के घर पर शुद्र मुंह पर कपड़ा बांध कर रसोई बनाये ताकि उनका श्वास भी अन्न पर न पड़े।

◆ सत्यार्थ प्रकाश में बार बार भंगी चमार नीच आदि शब्दो का प्रयोग किया गया है जो भेदभाव और घृणा के सूचक के रूप में किया गया है।

◆ सत्यार्थ प्रकाश का 14वा समुल्लास दयानंद की मौत बाद छापा गया। उनके जीवन में 13 तक समुल्लास छपे थे। प्रथन संस्करण में 14वा अध्याय नहीं था। पर उनके अनुयायी कहते है कि उन्ही का लिखा हुआ था जिसे उन्होंने आरम्भ में छपने से रुकवा दिया था। सवाल ये है कि दयानन्द बहादुर थे, बहुत बार जानलेवा पौराणिकों के हमले हुए फिर कैसे हो सकता है कि उन्होजे इस छपने से रुकवा दिया हो कि मेरे मरने के बाद छपवाना। यानी ये उनका लिखा शायद है ही नहीं।

संत रामपाल द्वारा महर्षि दयानंद और सत्यार्थ प्रकाश पर उठाये गए प्रश्न

(1) समुल्लास 4, पृष्ठ 70: किसी लड़की के शरीर पर बड़े बड़े बाल हो, बातूनी हो, पीले रंग वाली हो, रोगी हो, पुरूष से बढ़ी हो भूरी आंखों वाली हो उससे विवाह न करो। किसी कुल में किसी को खांसी, दमा, पेट गड़बड़ी, मिर्गी, बवासीर, कोढ़ आदि जैसी बीमारियां हो तो उस कुल में किसी भी लड़की या लड़के से विवाह न करो। (ऐसे तो आधा विश्व अविवाहित रह जाएगा?)

(2) समुल्लास 4, पृष्ठ 71: जिसके भूरे नेत्र हो, जिसका नाम पार्वती, काली, गंगा, गोदावरी, गोमती आदि हो या नदियों और पर्वतों पर हो, उनसे विवाह न करो। (फिर तो शिवजी ने पार्वती जी से विवाह करके गलती कर दी क्या? ऐसा तो लाखों स्त्रियां अविवाहित रह जायेगीं?)!  दांत युक्त लड़की से विवाह करो (और जिसके न हो या कम हो वो क्या करें?)।  24 वर्ष की स्त्री का 48 वर्ष के पुरूष से विवाह उत्तम है।

(3) समुल्लास 4, पृष्ठ 82: मां 6 दिन से ज़्यादा बच्चे को दूध न पिलाएं औए ऐसी दाई रखो जिसके स्तनों में दूध है। (डॉ० कहते है की बच्चे को कम से कम 6 महीने मां का दूध पिलाओ तो क्या विज्ञान गलत है? और यदि एक गाँव 10 बच्चे पैदा हो जाये एक ही दिन तो इतनी दाई कंहा से आयेंगी?).

(4) समुल्लास 4, पृष्ठ 96-97: पुनर्विवाह में दोष होता है। स्त्री का पुनर्विवाह करने से उसका पति व्रत धर्म नष्ट हो जाता है। (तो क्या पुनर्विवाह की बजाए नियोग करे?)

(5) समुल्लास 4, पृष्ठ 102: यदि पति कमाने विदेश गया हो और तीन साल हो जाये तो पत्नी नियोग करके संतान पैदा कर ले जो कि उसके पति की ही संतान माना जायेगा। पति दुखदायी हो, मार पिटाई करता हो, लड़ाई झगडा करता हो तो किसी पुरुष से नियोग करके संतान उत्पन्न करले, संतान पति की ही मानी जायेगी और संपत्ति में अधिकार भी पाएगी। (अर्थात सुहागन स्त्रियां भी नियोग किया करे?) 

(6) समुल्लास 4, पृष्ठ 103: अगर पुरूष से न रहा जाए तो वह विधवा से नियोग कर सकता है।

(7) पृष्ठ 100: विधवा देवर के साथ नियोग कर ले।

(8) पृष्ठ 154: उपासना से ईश्वर का साक्षत्कार होगा (क्या ईश्वर साकार है?)।

(9) समुल्लास 8, पृष्ठ 111 : सूर्य पर भी पृथ्वी की तरह जीवन संभव है। सूर्य आदि पर भी मानव रहते है।
[सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी दयानांद कहते हैं कि चाँद तारों में मानव रहते हैं। वह भाष्यभूमिका में लिखते हैं कि पृथ्वी सूरज के प्रकाश को रोक देती है, जहा जमीन का छाया पड़ती है तो वहा सर्दी हो जाती और वहा ऐटम जन्म लेते हैं, प्रकाश पड़ने पर वो भाप बन जाते हैं। फिर गर्मी बढ़ जाती है]

(10) समुल्लास 7, पृष्ठ 155 व 163: परमात्मा साधक के पाप नाश नहीं कर सकता।  (फिर कौन करता है? क्या ये वेद विरुद्ध बात नहीं है?)

∆∆ आज आर्यो समाजियो में भी कई गिरोह बनकर फुट पड़ी हुई है। कोई खुद को दयानंदी आर्य समाजी कहता है कोई और कुछ। दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा और पंडित लेखराम वैदिक मिशन या परोपकारिणी सभा की आपस मे बिल्कुल नही बनती है। निर्मात्री सभा भी एक अलग संस्था है।


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